सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) से आशय उन डिजिटल एवं इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकियों से है, जिनका उपयोग सूचना के सृजन, संग्रह, प्रसंस्करण, संचार, आदान-प्रदान और प्रस्तुतीकरण के लिये किया जाता है। शिक्षा में ICT का प्रयोग शिक्षण-अधिगम के साथ-साथ मूल्यांकन, प्रशासन और शोध को अधिक व्यवस्थित एवं प्रभावी बनाने में किया जाता है।
- मूल्यांकन में ICT के प्रयोग से ऑनलाइन परीक्षण, डिजिटल प्रश्नावली, ई-पोर्टफोलियो, कंप्यूटर-आधारित परीक्षण, स्वचालित स्कोरिंग तथा त्वरित प्रतिपुष्टि जैसी व्यवस्थाएँ संभव होती हैं। डिजिटल प्रणालियाँ शिक्षार्थी के प्रदर्शन से संबंधित आँकड़ों को संगृहीत और व्यवस्थित कर सकती हैं, जिससे अधिगम की प्रगति का विश्लेषण करने में सहायता मिलती है।
- ICT आधारित मूल्यांकन में रचनात्मक एवं संकलनात्मक दोनों प्रकार के मूल्यांकन किये जा सकते हैं। ऑनलाइन क्विज, इंटरैक्टिव गतिविधियाँ और त्वरित प्रतिपुष्टि रचनात्मक मूल्यांकन को समर्थन दे सकती हैं, जबकि डिजिटल परीक्षाएँ निर्धारित अधिगम-परिणामों की उपलब्धि के समग्र आकलन में प्रयुक्त हो सकती हैं।
- शैक्षिक प्रशासन में ICT का उपयोग विद्यार्थियों के अभिलेख, प्रवेश, उपस्थिति, समय-सारणी, परीक्षा, परिणाम, वित्तीय एवं मानव संसाधन संबंधी सूचनाओं के प्रबंधन में किया जा सकता है। Management Information Systems (MIS) और अन्य डिजिटल प्रणालियाँ सूचना के संग्रह, संगठन और निर्णय-निर्माण में सहायता प्रदान करती हैं।
- प्रशासनिक स्तर पर ICT संचार और समन्वय को भी सुगम बनाती है। संस्थान विभिन्न डिजिटल माध्यमों के द्वारा शिक्षकों, शिक्षार्थियों, अभिभावकों तथा प्रशासनिक इकाइयों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं।
- शैक्षिक शोध में ICT साहित्य की खोज, डिजिटल डेटाबेस तक पहुँच, संदर्भ-प्रबंधन, ऑनलाइन सर्वेक्षण, साक्षात्कार, डिजिटल आँकड़ा-संग्रह, आँकड़ा-संगठन और सांख्यिकीय विश्लेषण में सहायक है। शोधकर्ता विभिन्न सॉफ्टवेयर और डिजिटल उपकरणों का उपयोग शोध प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में कर सकते हैं।
- ICT शोध के लिये ऑनलाइन प्रश्नावली और अन्य डिजिटल साधनों के माध्यम से व्यापक स्तर पर डेटा संग्रह की सुविधा प्रदान कर सकती है। साथ ही, डिजिटल उपकरण गुणात्मक डेटा के कोडिंग, वर्गीकरण और थीम विश्लेषण में भी उपयोगी हो सकते हैं।
- ICT के प्रभावी उपयोग के साथ डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा, सूचित सहमति, डिजिटल पहुँच, डेटा की शुद्धता और शोध नैतिकता जैसे प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। तकनीक का प्रयोग करते समय प्रतिभागियों की व्यक्तिगत जानकारी और शोध-संबंधी डेटा की सुरक्षा आवश्यक है।
- निष्कर्षतः, ICT ने मूल्यांकन, शैक्षिक प्रशासन और शोध की प्रक्रियाओं को अधिक डिजिटल, तीव्र और डेटा-आधारित बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी वास्तविक शैक्षिक उपयोगिता तभी सुनिश्चित होती है जब उपयुक्त तकनीकी अवसंरचना, मानव क्षमता, गुणवत्तापूर्ण डिजिटल प्रणालियों और नैतिक मानकों का समुचित समन्वय हो।
- ई-लर्निंग (E-Learning) ऐसी अधिगम व्यवस्था है जिसमें डिजिटल एवं इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके शिक्षण-सामग्री, अधिगम गतिविधियों, संचार, सहभागिता और मूल्यांकन को उपलब्ध कराया या समर्थित किया जाता है। इसमें कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल उपकरण, डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का उपयोग हो सकता है।
- ई-लर्निंग का मूल उद्देश्य प्रौद्योगिकी का उपयोग करके अधिगम की पहुँच, लचीलापन, सहभागिता और प्रभावशीलता को बढ़ाना है। यह केवल डिजिटल सामग्री को ऑनलाइन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शिक्षार्थी, विषय-वस्तु, शिक्षक तथा तकनीकी माध्यम के बीच होने वाली अंतःक्रिया भी महत्त्वपूर्ण है।
- ई-लर्निंग में समकालिक (Synchronous) और असमकालिक (Asynchronous) दोनों प्रकार के अधिगम की व्यवस्था हो सकती है। समकालिक अधिगम में शिक्षक और शिक्षार्थी एक ही समय पर ऑनलाइन जुड़ते हैं, जबकि असमकालिक अधिगम में शिक्षार्थी अपनी सुविधा के अनुसार उपलब्ध सामग्री और गतिविधियों का उपयोग करता है।
- ई-लर्निंग के प्रमुख घटकों में डिजिटल शिक्षण-सामग्री, मल्टीमीडिया, ऑनलाइन संचार, चर्चा मंच, आकलन एवं प्रतिपुष्टि, तथा लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS) शामिल हो सकते हैं। LMS के माध्यम से पाठ्यक्रम सामग्री, गतिविधियों, प्रगति और मूल्यांकन को व्यवस्थित किया जा सकता है।
- ई-लर्निंग में ऑडियो, वीडियो, एनिमेशन, सिमुलेशन, इंटरैक्टिव गतिविधियाँ और डिजिटल पाठ्य-सामग्री का प्रयोग किया जा सकता है। मल्टीमीडिया का प्रभावी उपयोग जटिल अवधारणाओं को विभिन्न प्रकार के प्रतिनिधित्व के माध्यम से समझने में सहायता कर सकता है।
- ई-लर्निंग की एक प्रमुख विशेषता लचीलापन है। शिक्षार्थी समय और स्थान की सीमाओं से अपेक्षाकृत स्वतंत्र होकर अधिगम कर सकता है। यह विभिन्न पृष्ठभूमियों और आवश्यकताओं वाले शिक्षार्थियों तक शैक्षिक अवसर पहुँचाने में भी सहायक हो सकता है।
- ई-लर्निंग के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये डिजिटल पहुँच, तकनीकी अवसंरचना, डिजिटल साक्षरता, उपयुक्त शिक्षण-अभिकल्प, गुणवत्तापूर्ण सामग्री और तकनीकी सहायता आवश्यक हैं। केवल तकनीकी उपकरणों की उपलब्धता प्रभावी ई-लर्निंग सुनिश्चित नहीं करती।
- ई-लर्निंग की कुछ चुनौतियों में डिजिटल विभाजन, इंटरनेट एवं उपकरणों तक असमान पहुँच, तकनीकी समस्याएँ, शिक्षार्थी की आत्म-नियमन क्षमता, सामाजिक अंतःक्रिया की सीमाएँ और डिजिटल सामग्री की गुणवत्ता शामिल हो सकती हैं।
- ई-लर्निंग को ऑनलाइन, मिश्रित (Blended) और दूरस्थ अधिगम जैसे विभिन्न शैक्षिक संदर्भों में उपयोग किया जा सकता है। मिश्रित अधिगम में आमने-सामने शिक्षण और ऑनलाइन अधिगम का योजनाबद्ध संयोजन किया जाता है।
- निष्कर्षतः, ई-लर्निंग शिक्षा में डिजिटल प्रौद्योगिकी के सार्थक एकीकरण का माध्यम है। इसकी प्रभावशीलता केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उपयुक्त शिक्षण-अभिकल्प, शिक्षार्थी की आवश्यकताओं, गुणवत्तापूर्ण सामग्री, अंतःक्रिया, प्रतिपुष्टि और मूल्यांकन के समन्वित उपयोग पर निर्भर करती है।
अनुदेशात्मक अभिकल्प (Instructional Design) एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से निर्धारित अधिगम-उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शिक्षण-अधिगम अनुभवों, विषय-वस्तु, गतिविधियों, संसाधनों और मूल्यांकन की योजना बनाई जाती है। इसका केंद्र शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रभावी अधिगम-अनुभवों का निर्माण है।
- अनुदेशात्मक अभिकल्प के विभिन्न उपागम (Approaches) इस आधार पर अलग-अलग होते हैं कि वे अधिगम को किस प्रकार समझते हैं और अनुदेश की योजना में किन तत्वों को प्राथमिकता देते हैं। प्रमुख उपागमों में व्यवहारवादी, संज्ञानात्मक, रचनावादी और प्रणालीगत उपागम शामिल हैं।
- व्यवहारवादी उपागम (Behaviourist Approach) में प्रेक्षणीय एवं मापनीय व्यवहार में परिवर्तन पर बल दिया जाता है। अधिगम-उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया जाता है और अभ्यास, पुनर्बलन तथा प्रतिपुष्टि के माध्यम से अपेक्षित व्यवहार विकसित करने की योजना बनाई जाती है। इस दृष्टिकोण का संबंध B. F. Skinner के प्रचालन अनुबंधन तथा programmed instruction से विशेष रूप से जोड़ा जाता है।
- संज्ञानात्मक उपागम (Cognitive Approach) शिक्षार्थी की आंतरिक मानसिक प्रक्रियाओं जैसे ध्यान, स्मृति, बोध, सूचना-प्रसंस्करण और समस्या-समाधान पर बल देता है। इसमें विषय-वस्तु को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि शिक्षार्थी नई जानकारी को पूर्वज्ञान से जोड़कर अर्थपूर्ण ढंग से ग्रहण कर सके।
- रचनावादी उपागम (Constructivist Approach) के अनुसार शिक्षार्थी अपने पूर्वज्ञान और अनुभवों के आधार पर सक्रिय रूप से ज्ञान का निर्माण करता है। इसलिए अनुदेशात्मक अभिकल्प में समस्या-समाधान, अन्वेषण, सहयोगात्मक अधिगम, वास्तविक जीवन की परिस्थितियों और प्रामाणिक कार्यों को महत्व दिया जाता है।
- प्रणालीगत उपागम (Systems Approach) अनुदेश को परस्पर संबंधित घटकों वाली एक प्रणाली के रूप में देखता है। इसमें शिक्षार्थियों और आवश्यकताओं का विश्लेषण, उद्देश्यों का निर्धारण, अनुदेशात्मक रणनीतियों का चयन, संसाधनों का विकास, क्रियान्वयन और मूल्यांकन एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
- अनुदेशात्मक अभिकल्प में शिक्षार्थी-केंद्रित उपागम भी महत्वपूर्ण है, जिसमें शिक्षार्थियों की पूर्व-ज्ञान स्थिति, क्षमता, आवश्यकताओं, रुचियों, सीखने की गति और संदर्भ को ध्यान में रखकर अनुदेश की योजना बनाई जाती है।
- ADDIE मॉडल जैसे अभिकल्प ढाँचे में Analysis, Design, Development, Implementation और Evaluation के माध्यम से अनुदेश की व्यवस्थित योजना और विकास किया जाता है। यह किसी एक अधिगम सिद्धांत का पर्याय नहीं, बल्कि अनुदेशात्मक विकास के लिए एक सामान्य प्रक्रिया-ढाँचा है।
- इन उपागमों का चयन अधिगम-उद्देश्यों, विषय-वस्तु, शिक्षार्थियों, संदर्भ, उपलब्ध संसाधनों और अपेक्षित अधिगम-परिणामों के आधार पर किया जाता है। व्यवहारिक अनुदेशात्मक अभिकल्प में एक से अधिक उपागमों के तत्वों का उपयुक्त संयोजन भी किया जा सकता है।
- निष्कर्षतः, अनुदेशात्मक अभिकल्प के उपागम शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से नियोजित करने के विभिन्न सैद्धांतिक आधार प्रदान करते हैं। प्रभावी अभिकल्प वही है जो अधिगम के स्वरूप, शिक्षार्थी की आवश्यकताओं और निर्धारित परिणामों के अनुरूप उपयुक्त उपागम का चयन करे।
शैक्षिक प्रौद्योगिकी (Educational Technology) शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावी, व्यवस्थित और वैज्ञानिक बनाने के लिए ज्ञान, सिद्धांतों, प्रक्रियाओं, विधियों, तकनीकों और संसाधनों के व्यवस्थित उपयोग का अध्ययन एवं अनुप्रयोग है। इसे केवल कंप्यूटर या डिजिटल उपकरणों के प्रयोग तक सीमित नहीं किया जाता।
- एक विषयानुशासन (Discipline) के रूप में शैक्षिक प्रौद्योगिकी का अपना विशिष्ट ज्ञान-क्षेत्र, अवधारणात्मक आधार, सिद्धांत, शोध-पद्धतियाँ और व्यावहारिक अनुप्रयोग हैं। इसका अध्ययन यह समझने का प्रयास करता है कि विभिन्न परिस्थितियों में अधिगम को किस प्रकार अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
- शैक्षिक प्रौद्योगिकी का आधार शिक्षा, मनोविज्ञान, संचार, समाजशास्त्र, दर्शन तथा प्रबंधन जैसे विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त ज्ञान पर विकसित हुआ है। इसलिए इसकी प्रकृति अंतर्विषयक (Interdisciplinary) है, लेकिन इसका विशिष्ट केंद्र अधिगम एवं प्रदर्शन में सुधार है।
- शैक्षिक प्रौद्योगिकी में शिक्षण-अधिगम के उद्देश्यों का निर्धारण, शिक्षार्थी एवं संदर्भ का विश्लेषण, विषय-वस्तु का संगठन, शिक्षण-अधिगम रणनीतियों का चयन, उपयुक्त माध्यम एवं संसाधनों का विकास, क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन जैसी प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं।
- Instructional Design शैक्षिक प्रौद्योगिकी का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसमें निर्धारित अधिगम-परिणामों को ध्यान में रखते हुए शिक्षण-अनुभवों, गतिविधियों, सामग्री और मूल्यांकन की व्यवस्थित योजना बनाई जाती है। इस संदर्भ में ADDIE जैसे अभिकल्प मॉडल का उपयोग किया जाता है।
- शैक्षिक प्रौद्योगिकी के विकास में व्यवहारवादी, संज्ञानात्मक और रचनावादी अधिगम दृष्टिकोणों का योगदान रहा है। इन दृष्टिकोणों ने शिक्षण-सामग्री, अधिगम गतिविधियों, प्रतिपुष्टि और शिक्षार्थी की सक्रिय भूमिका को समझने के विभिन्न आधार प्रदान किए हैं।
- विषयानुशासन के रूप में शैक्षिक प्रौद्योगिकी में प्रणाली उपागम (Systems Approach) महत्वपूर्ण है। इसमें शिक्षण-अधिगम को परस्पर संबंधित घटकों वाली प्रणाली के रूप में देखा जाता है, जिसमें उद्देश्यों, शिक्षार्थियों, प्रक्रियाओं, संसाधनों और मूल्यांकन के बीच संबंध स्थापित किया जाता है।
- समकालीन शैक्षिक प्रौद्योगिकी में ई-लर्निंग, लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS), मल्टीमीडिया, ऑनलाइन एवं मिश्रित अधिगम, मुक्त शैक्षिक संसाधन (OER) तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरणों का उपयोग बढ़ा है। इनका उद्देश्य तकनीक को अधिगम के लक्ष्यों के अनुरूप प्रभावी ढंग से एकीकृत करना है।
- निष्कर्षतः, विषयानुशासन के रूप में शैक्षिक प्रौद्योगिकी केवल उपकरणों और माध्यमों का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह अधिगम एवं प्रदर्शन की समस्याओं के विश्लेषण, उपयुक्त समाधान के अभिकल्प, उनके क्रियान्वयन और मूल्यांकन का व्यवस्थित क्षेत्र है।
- शिक्षा का मूल्यांकन एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति, शिक्षार्थियों के अधिगम, शिक्षण-अधिगम प्रक्रियाओं तथा शैक्षिक कार्यक्रमों की प्रभावशीलता के संबंध में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया जाता है। इसका उद्देश्य केवल उपलब्धि का निर्धारण करना नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना भी है।
- शिक्षा के मूल्यांकन में शैक्षिक उद्देश्यों, अधिगम-अनुभवों, शिक्षण प्रक्रियाओं और अधिगम-परिणामों के बीच संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इसके लिए परीक्षण, अवलोकन, परियोजना, पोर्टफोलियो, प्रदर्शन-आधारित कार्य और अन्य आकलन तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
- शिक्षा के संदर्भ में रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Evaluation) शिक्षण-अधिगम के दौरान प्रतिपुष्टि और सुधार के लिए तथा संकलनात्मक मूल्यांकन (Summative Evaluation) किसी पाठ्यक्रम, इकाई या शैक्षिक अवधि के अंत में उपलब्धि के समग्र निर्धारण के लिए प्रयुक्त होता है। नैदानिक मूल्यांकन विशिष्ट अधिगम कठिनाइयों की पहचान में सहायक होता है।
- प्रौढ़ शिक्षा (Adult Education) में मूल्यांकन की प्रकृति औपचारिक विद्यालयी शिक्षा से कुछ भिन्न हो सकती है। प्रौढ़ शिक्षार्थी अपने साथ जीवन-अनुभव, पूर्वज्ञान, कार्य-अनुभव और सामाजिक संदर्भ लेकर आते हैं। इसलिए मूल्यांकन में उनके पूर्व अनुभवों, व्यावहारिक दक्षताओं, कार्यात्मक साक्षरता और वास्तविक जीवन में अर्जित ज्ञान के प्रयोग को महत्व दिया जा सकता है।
- प्रौढ़ शिक्षा के मूल्यांकन में केवल लिखित परीक्षा पर निर्भर रहने के बजाय प्रदर्शन, मौखिक अभिव्यक्ति, व्यावहारिक कार्य, समस्या-समाधान, परियोजना और पोर्टफोलियो जैसी विधियाँ उपयोगी हो सकती हैं। इससे शिक्षार्थी की वास्तविक दक्षताओं का व्यापक आकलन संभव होता है।
- प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत अधिगम तक सीमित नहीं रहता। इसमें कार्यक्रम की प्रासंगिकता, पहुँच, सहभागिता, निरंतरता, संसाधनों की पर्याप्तता, शिक्षण की गुणवत्ता तथा अपेक्षित परिणामों का भी अध्ययन किया जा सकता है।
- प्रौढ़ शिक्षा के संदर्भ में मूल्यांकन को शिक्षार्थियों की विविध सामाजिक, आर्थिक, भाषायी और व्यावसायिक पृष्ठभूमियों के अनुरूप संवेदनशील होना चाहिए। मूल्यांकन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो शिक्षार्थियों के अनुभवों और गरिमा का सम्मान करे।
- शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा दोनों में प्रभावी मूल्यांकन के लिए वैधता, विश्वसनीयता, निष्पक्षता, व्यावहारिकता और उपयुक्तता महत्वपूर्ण हैं। मूल्यांकन से प्राप्त प्रतिपुष्टि का उपयोग शिक्षण-पद्धतियों, कार्यक्रमों और अधिगम-अनुभवों में सुधार के लिए किया जाना चाहिए।
- निष्कर्षतः, शिक्षा का मूल्यांकन अधिगम और शैक्षिक कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को समझने का आधार प्रदान करता है, जबकि प्रौढ़ शिक्षा का मूल्यांकन जीवन-अनुभव और व्यावहारिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए अधिगम तथा कार्यक्रम-परिणामों का आकलन करता है। दोनों का अंतिम उद्देश्य शैक्षिक गुणवत्ता और अधिगम के परिणामों में सुधार करना है।
- मूल्यांकन (Evaluation) शिक्षा की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से शिक्षार्थी के अधिगम, उपलब्धि, प्रगति अथवा किसी शैक्षिक कार्यक्रम की प्रभावशीलता के संबंध में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय किया जाता है। यह केवल अंक प्रदान करने या उपलब्धि मापने तक सीमित नहीं है।
- मापन (Measurement), आकलन (Assessment) और मूल्यांकन (Evaluation) परस्पर संबंधित किंतु भिन्न अवधारणाएँ हैं। मापन किसी विशेषता या उपलब्धि को संख्यात्मक रूप में व्यक्त करता है। आकलन में शिक्षार्थी के अधिगम से संबंधित विभिन्न साक्ष्यों का संग्रह और उनकी व्याख्या की जाती है, जबकि मूल्यांकन इन साक्ष्यों के आधार पर किसी उपलब्धि, प्रक्रिया या कार्यक्रम के मूल्य अथवा प्रभावशीलता के संबंध में निर्णय करने की प्रक्रिया है।
- मूल्यांकन का संबंध केवल शिक्षार्थी की उपलब्धि से नहीं, बल्कि शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया, पाठ्यचर्या, शिक्षण-सामग्री, कार्यक्रम तथा शैक्षिक संस्थाओं की प्रभावशीलता से भी हो सकता है। इस प्रकार मूल्यांकन शिक्षा के विभिन्न घटकों के संबंध में निर्णय लेने का आधार प्रदान करता है।
- नैदानिक मूल्यांकन (Diagnostic Evaluation) का उद्देश्य शिक्षार्थी की अधिगम संबंधी कठिनाइयों, कमियों और उनकी संभावित प्रकृति की पहचान करना है। इससे उपयुक्त सुधारात्मक शिक्षण की योजना बनाने में सहायता मिलती है।
- रचनात्मक मूल्यांकन (Formative Evaluation) शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया के दौरान किया जाता है। इसका उद्देश्य शिक्षार्थी के अधिगम की प्रगति के संबंध में प्रतिपुष्टि प्राप्त करना तथा शिक्षण और अधिगम में आवश्यक सुधार करना है।
- संकलनात्मक मूल्यांकन (Summative Evaluation) सामान्यतः किसी इकाई, पाठ्यक्रम या शैक्षिक अवधि के अंत में किया जाता है। इसका उद्देश्य निर्धारित अधिगम-परिणामों की समग्र उपलब्धि का निर्धारण करना होता है।
- संदर्भ के आधार पर मूल्यांकन मानक-संदर्भित (Norm-Referenced) अथवा मानदंड-संदर्भित (Criterion-Referenced) हो सकता है। मानक-संदर्भित मूल्यांकन में प्रदर्शन की तुलना संदर्भ समूह से, जबकि मानदंड-संदर्भित मूल्यांकन में पूर्वनिर्धारित मानदंड या अपेक्षित अधिगम-स्तर से की जाती है।
- मूल्यांकन के लिए परीक्षण, अवलोकन, मौखिक प्रश्न, परियोजना, पोर्टफोलियो, प्रदर्शन-आधारित कार्य और असाइनमेंट जैसी विभिन्न विधियों एवं तकनीकों का प्रयोग किया जा सकता है। विधि का चयन निर्धारित अधिगम-उद्देश्यों और मूल्यांकन किए जाने वाले परिणामों के अनुरूप किया जाता है।
- प्रभावी मूल्यांकन में वैधता, विश्वसनीयता, वस्तुनिष्ठता, व्यावहारिकता और निष्पक्षता जैसे गुण अपेक्षित होते हैं। समकालीन शिक्षा में मूल्यांकन को अधिगम की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है, ताकि प्राप्त साक्ष्यों का उपयोग शिक्षण में सुधार और शिक्षार्थी के विकास के लिए किया जा सके।
- निष्कर्षतः, मूल्यांकन शिक्षा-प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। यह अधिगम और शैक्षिक कार्यक्रमों की प्रभावशीलता के संबंध में प्रमाण-आधारित निर्णय लेने तथा शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में निरंतर सुधार के लिए आधार प्रदान करता है।
- शिक्षणशास्त्र (Pedagogy) से आशय शिक्षण और अधिगम की प्रकृति, प्रक्रियाओं, सिद्धांतों, विधियों तथा शिक्षक-शिक्षार्थी संबंधों के व्यवस्थित अध्ययन से है। पारंपरिक रूप से इसे बच्चों के शिक्षण से जोड़ा गया, किंतु आधुनिक अर्थ में यह विभिन्न आयु-समूहों और संदर्भों में प्रभावी शिक्षण-अधिगम की व्यापक प्रक्रिया को भी संदर्भित करता है।
- शिक्षणशास्त्र का केंद्र केवल शिक्षक द्वारा ज्ञान प्रदान करना नहीं है, बल्कि शिक्षार्थी के पूर्वज्ञान, अनुभव, आवश्यकताओं और सक्रिय सहभागिता को ध्यान में रखते हुए अर्थपूर्ण अधिगम का वातावरण तैयार करना है। इसलिए आधुनिक शिक्षणशास्त्र में शिक्षार्थी-केंद्रितता को विशेष महत्व प्राप्त है।
- प्रभावी शिक्षणशास्त्र में शैक्षिक उद्देश्यों का निर्धारण, विषय-वस्तु का चयन एवं संगठन, उपयुक्त शिक्षण विधियों का चयन, अधिगम गतिविधियों की योजना, शिक्षण-संसाधनों का प्रयोग और मूल्यांकन परस्पर जुड़े हुए घटक हैं।
- शिक्षणशास्त्रीय विश्लेषण (Pedagogical Analysis) किसी विषय-वस्तु को इस प्रकार विश्लेषित एवं व्यवस्थित करने की प्रक्रिया है कि उसे शिक्षार्थियों के लिए शिक्षण योग्य, समझने योग्य और अर्थपूर्ण बनाया जा सके। इसमें विषय-वस्तु की प्रकृति, उद्देश्यों, पूर्व-आवश्यक ज्ञान, अवधारणाओं, शिक्षण-अनुभवों और मूल्यांकन को आपस में जोड़ा जाता है।
- शिक्षणशास्त्रीय विश्लेषण में सामान्यतः विषय-वस्तु की इकाइयों एवं अवधारणाओं की पहचान, विषय-वस्तु का तार्किक क्रम निर्धारण, पूर्व-ज्ञान की पहचान, शिक्षण उद्देश्यों का निर्धारण, उपयुक्त शिक्षण-अधिगम गतिविधियों का चयन और मूल्यांकन की योजना शामिल होती है।
- इसका प्रमुख उद्देश्य विषय के ज्ञान को केवल प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उसे शिक्षार्थी की आयु, संज्ञानात्मक स्तर, पूर्वज्ञान, अनुभव और सीखने की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में रूपांतरित करना है।
- शिक्षणशास्त्रीय विश्लेषण में विषय-वस्तु ज्ञान (Content Knowledge) और शिक्षण संबंधी ज्ञान (Pedagogical Knowledge) के बीच संबंध महत्वपूर्ण है। शिक्षक को यह जानना आवश्यक है कि किसी विषय को केवल क्या पढ़ाना है, इसके साथ-साथ उसे कैसे और किस क्रम में पढ़ाया जाए।
- आधुनिक संदर्भ में शिक्षणशास्त्रीय विश्लेषण में समावेशी शिक्षा, विविध शिक्षार्थियों की आवश्यकताएँ, डिजिटल संसाधन, गतिविधि-आधारित अधिगम, अनुभवात्मक अधिगम और दक्षता-आधारित शिक्षा को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
- शिक्षणशास्त्र और शिक्षणशास्त्रीय विश्लेषण में अंतर यह है कि शिक्षणशास्त्र शिक्षण-अधिगम के व्यापक सिद्धांत एवं व्यवहार का क्षेत्र है, जबकि शिक्षणशास्त्रीय विश्लेषण किसी विशिष्ट विषय-वस्तु को प्रभावी ढंग से पढ़ाने के लिए उसका व्यवस्थित शैक्षिक विश्लेषण है।
- निष्कर्षतः, शिक्षणशास्त्र प्रभावी शिक्षण की व्यापक आधारभूमि प्रदान करता है और शिक्षणशास्त्रीय विश्लेषण विषय-वस्तु को शिक्षार्थी-केंद्रित शिक्षण-अधिगम अनुभव में रूपांतरित करने में सहायता करता है। दोनों का उद्देश्य अर्थपूर्ण, प्रभावी और शिक्षार्थी-केंद्रित अधिगम को बढ़ावा देना है।
- समाजीकरण (Socialization) वह सतत सामाजिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से व्यक्ति समाज की भाषा, मूल्य, मानदंड, विश्वास, व्यवहार-पद्धतियाँ और सामाजिक भूमिकाएँ सीखता है तथा समाज के सदस्य के रूप में विकसित होता है। यह जन्म से शुरू होकर जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है।
- समाजीकरण व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। इसके माध्यम से व्यक्ति सामाजिक अपेक्षाओं को समझता है और अपने व्यवहार को सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालना सीखता है। साथ ही, व्यक्ति केवल सामाजिक मूल्यों को ग्रहण ही नहीं करता, बल्कि सामाजिक अंतःक्रिया के माध्यम से अपनी पहचान और व्यक्तित्व का भी निर्माण करता है।
- शिक्षा समाजीकरण का एक प्रमुख औपचारिक माध्यम है। विद्यालय विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ-साथ अनुशासन, सहयोग, जिम्मेदारी, समानता, लोकतांत्रिक व्यवहार और सामाजिक मूल्यों का अनुभव कराता है। इस प्रकार शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक जीवन के लिए तैयार करती है।
- परिवार समाजीकरण का प्राथमिक अभिकरण है। बालक भाषा, व्यवहार, प्रारंभिक मूल्य, विश्वास और सामाजिक संबंधों की समझ मुख्यतः परिवार से प्राप्त करता है। विद्यालय, सहकर्मी समूह, समुदाय, धर्म, जनसंचार माध्यम और डिजिटल माध्यम भी समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) ने शिक्षा को समाजीकरण की प्रक्रिया से जोड़ा। उनके अनुसार शिक्षा बच्चों में समाज द्वारा अपेक्षित शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक अवस्थाओं का विकास करती है। इससे नई पीढ़ी सामाजिक जीवन के लिए तैयार होती है।
- जॉर्ज हर्बर्ट मीड (George Herbert Mead) ने सामाजिक अंतःक्रिया के माध्यम से ‘स्व’ के विकास को समझाया। उनके विचारों के अनुसार व्यक्ति दूसरों की भूमिकाओं एवं अपेक्षाओं को समझते हुए अपने ‘स्व’ का विकास करता है। शिक्षा ऐसी अंतःक्रियाओं के अवसर प्रदान करती है।
- समाजीकरण को प्राथमिक और द्वितीयक समाजीकरण के रूप में भी समझा जाता है। प्राथमिक समाजीकरण मुख्यतः परिवार में प्रारंभ होता है, जबकि विद्यालय एवं अन्य संस्थाएँ व्यक्ति के द्वितीयक समाजीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- शिक्षा समाजीकरण के माध्यम से संस्कृति के हस्तांतरण और सामाजिक निरंतरता को बनाए रखती है। साथ ही, शिक्षा आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नए मूल्यों को विकसित करके सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बन सकती है।
- निष्कर्षतः, शिक्षा और समाजीकरण का संबंध द्विपक्षीय एवं घनिष्ठ है। शिक्षा व्यक्ति को समाज के अनुरूप ढालने के साथ-साथ उसे सामाजिक मूल्यों की आलोचनात्मक समीक्षा, सामाजिक सहभागिता और परिवर्तन के लिए भी सक्षम बनाती है।
- शिक्षा का समाजशास्त्रीय आधार इस बात का अध्ययन करता है कि शिक्षा और समाज एक-दूसरे को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सामाजिक जीवन, संस्थाओं, संस्कृति, मूल्यों और सामाजिक परिवर्तन से गहराई से जुड़ी हुई प्रक्रिया है।
- शिक्षा और समाज का पारस्परिक संबंध है। समाज अपने आदर्शों, आवश्यकताओं और मूल्यों के अनुरूप शिक्षा की व्यवस्था करता है, जबकि शिक्षा ज्ञान, कौशल, मूल्यों और सामाजिक मानदंडों का संचार करके समाज के निरंतर विकास में योगदान देती है।
- समाजीकरण (Socialization) शिक्षा का एक प्रमुख सामाजिक कार्य है। परिवार, विद्यालय, सहकर्मी समूह, समुदाय और अन्य सामाजिक संस्थाएँ व्यक्ति को भाषा, व्यवहार, मानदंड, मूल्य और सामाजिक भूमिकाएँ सीखने में सहायता करती हैं। इस प्रकार शिक्षा व्यक्ति को समाज के प्रभावी सदस्य के रूप में विकसित करती है।
- संस्कृति का संरक्षण एवं हस्तांतरण शिक्षा का महत्वपूर्ण कार्य है। शिक्षा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान, परंपराएँ, विश्वास, मूल्य, कला और सामाजिक विरासत पहुँचाती है। साथ ही, शिक्षा व्यक्तियों को संस्कृति की आलोचनात्मक समझ विकसित करने और आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन करने में सक्षम बनाती है।
- एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) ने शिक्षा को समाजीकरण की प्रक्रिया के रूप में देखा। उनके अनुसार शिक्षा बच्चों में समाज द्वारा अपेक्षित शारीरिक, बौद्धिक और नैतिक अवस्थाओं का विकास करती है। उन्होंने शिक्षा के सामाजिक चरित्र पर विशेष बल दिया।
- जॉर्ज हर्बर्ट मीड (George Herbert Mead) के विचारों के अनुसार व्यक्ति का ‘स्व’ सामाजिक अंतःक्रिया के माध्यम से विकसित होता है। शिक्षा सामाजिक अंतःक्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति में सामाजिक भूमिकाओं और आत्म-बोध के विकास में सहायता करती है।
- शिक्षा सामाजिक नियंत्रण का भी माध्यम है। विद्यालय अनुशासन, नियमों, उत्तरदायित्व और सामाजिक मूल्यों के माध्यम से विद्यार्थियों में समाज-स्वीकृत व्यवहार विकसित करने में योगदान देता है।
- शिक्षा सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) का महत्वपूर्ण साधन है। गुणवत्तापूर्ण और समान अवसरों वाली शिक्षा व्यक्ति को सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार करने के अवसर प्रदान कर सकती है।
- शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक मूल्यों, समानता, सामाजिक न्याय, लैंगिक संवेदनशीलता और आलोचनात्मक चिंतन को विकसित करके सामाजिक परिवर्तन को प्रोत्साहित करती है।
- निष्कर्षतः, शिक्षा का समाजशास्त्रीय आधार शिक्षा को समाज से अलग करके नहीं, बल्कि समाजीकरण, संस्कृति, सामाजिक नियंत्रण, सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में समझता है। इसलिए शिक्षा व्यक्ति और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करती है।
- पाश्चात्य दार्शनिक विचारधाराओं ने शिक्षा के उद्देश्यों, पाठ्यचर्या, शिक्षण-पद्धतियों, अनुशासन तथा शिक्षक-शिक्षार्थी संबंधों के विकास को व्यापक रूप से प्रभावित किया। प्रमुख विचारधाराओं में आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, यथार्थवाद, प्रयोजनवाद और अस्तित्ववाद शामिल हैं।
- आदर्शवाद (Idealism) शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति के आत्मिक एवं नैतिक विकास तथा सत्य, शिव और सुंदर जैसे उच्च मूल्यों की प्राप्ति मानता है। प्लेटो के अनुसार शिक्षा व्यक्ति को सत्य एवं न्याय की समझ विकसित करने में सहायता करती है। आदर्शवाद में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका, मूल्य-आधारित शिक्षा और बौद्धिक विकास पर बल दिया जाता है।
- प्रकृतिवाद (Naturalism) ने शिक्षा को बालक की प्रकृति, रुचि, क्षमता और विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने पर बल दिया। ज्याँ-जाक रूसो ने बालक-केंद्रित शिक्षा तथा प्रकृति के अनुरूप विकास का समर्थन किया। इस विचारधारा ने प्राकृतिक विकास, स्वतंत्रता और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व दिया।
- यथार्थवाद (Realism) ने शिक्षा में वास्तविक जगत, वस्तुनिष्ठ ज्ञान और इंद्रिय-अनुभव को महत्व दिया। इसने शिक्षा को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ने तथा विज्ञान, गणित और व्यावहारिक विषयों के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। अरस्तू की अनुभव एवं अवलोकन-आधारित ज्ञान परंपरा को यथार्थवादी चिंतन की महत्वपूर्ण आधारभूमि माना जाता है।
- प्रयोजनवाद (Pragmatism) ने शिक्षा को जीवन और अनुभव से जोड़ते हुए करके सीखने (Learning by Doing), समस्या-समाधान और लोकतांत्रिक सहभागिता पर बल दिया। जॉन ड्यूई ने शिक्षा को सामाजिक प्रक्रिया माना और विद्यालय को लोकतांत्रिक समाज का लघु रूप समझा। इससे बालक-केंद्रित एवं गतिविधि-आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिला।
- अस्तित्ववाद (Existentialism) व्यक्ति की स्वतंत्रता, चुनाव, उत्तरदायित्व और प्रामाणिक अस्तित्व पर बल देता है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं निर्णय लेने, अपने मूल्यों को समझने और अपने जीवन के अर्थ की खोज करने में सक्षम बनाना माना जाता है। ज्याँ-पॉल सार्त्र और कीर्केगार्द जैसे विचारकों का अस्तित्ववादी चिंतन महत्वपूर्ण है।
- पाश्चात्य विचारधाराओं ने आधुनिक शिक्षा में बाल-केंद्रितता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुभवात्मक अधिगम, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों, आलोचनात्मक चिंतन और व्यावहारिक शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- इस प्रकार पाश्चात्य दर्शन ने शिक्षा को पारंपरिक ज्ञान-प्रदान की सीमाओं से आगे बढ़ाकर व्यक्ति, अनुभव, समाज, प्रकृति, तर्क, स्वतंत्रता और व्यावहारिक जीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- भारतीय दार्शनिक परंपरा में शिक्षा को केवल सूचना या ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं माना गया, बल्कि इसे व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, आत्मबोध, चरित्र-निर्माण और जीवन के उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति का माध्यम माना गया। इस दृष्टिकोण ने भारतीय शिक्षा को नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आधार प्रदान किया।
- वैदिक एवं उपनिषदिक विचारधारा ने शिक्षा में सत्य, आत्मसंयम, अनुशासन, सदाचार तथा आत्मज्ञान को महत्व दिया। गुरु-शिष्य संबंध, व्यक्तिगत मार्गदर्शन और जीवन-मूल्यों का विकास इसकी प्रमुख विशेषताएँ थीं। उपनिषदिक परंपरा में श्रवण, मनन और निदिध्यासन के माध्यम से ज्ञान की गहन समझ पर बल दिया गया।
- बौद्ध दर्शन ने शिक्षा को नैतिकता, प्रज्ञा, करुणा और आत्मानुशासन से जोड़ा। शील, समाधि और प्रज्ञा के माध्यम से व्यक्ति के नैतिक एवं मानसिक विकास पर बल दिया गया। बौद्ध महाविहारों ने उच्च शिक्षा और ज्ञान-विमर्श की परंपरा को विकसित किया।
- जैन दर्शन ने शिक्षा में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, आत्मसंयम और अनेकांतवाद जैसे मूल्यों को महत्व दिया। अनेकांतवाद विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने और बौद्धिक सहिष्णुता विकसित करने में शैक्षिक रूप से महत्वपूर्ण है। जैन दर्शन के सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को भी शिक्षा के नैतिक आधार से जोड़ा जा सकता है।
- सांख्य दर्शन ने पुरुष और प्रकृति के विवेकपूर्ण ज्ञान को मुक्ति का आधार माना। इसके दार्शनिक दृष्टिकोण से शिक्षा में विवेक, आत्मबोध और ज्ञान के माध्यम से अज्ञान के निवारण को महत्व मिलता है।
- योग दर्शन ने शिक्षा में आत्मसंयम, एकाग्रता और मानसिक अनुशासन को विशेष महत्व दिया। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के माध्यम से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास की अवधारणा प्रस्तुत की गई।
- वेदांत दर्शन, विशेषकर अद्वैत वेदांत, में शिक्षा का संबंध आत्मज्ञान और परम सत्य की अनुभूति से है। यह शिक्षा को व्यक्ति के आंतरिक विकास और आत्मबोध की दिशा में ले जाता है।
- आधुनिक भारतीय चिंतकों में स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को मनुष्य में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति माना। महात्मा गांधी ने नैतिकता, श्रम, स्वावलंबन और कार्य-केंद्रित शिक्षा पर बल दिया। श्री अरविंद ने समग्र शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विकास पर ज़ोर दिया।
- इस प्रकार भारतीय दार्शनिक विचारधाराओं ने शिक्षा को ज्ञान, नैतिकता, आत्मानुशासन, चरित्र-निर्माण, आत्मबोध, सामाजिक उत्तरदायित्व और सर्वांगीण व्यक्तित्व-विकास से जोड़कर शिक्षा की व्यापक अवधारणा विकसित की।
मापन (Measurement) से आशय किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना की किसी विशेषता को निर्धारित नियमों के अनुसार संख्यात्मक मान प्रदान करने की प्रक्रिया से है। शिक्षा में मापन के माध्यम से उपलब्धि, अभिक्षमता, बुद्धि, अभिप्रेरणा आदि विशेषताओं का परिमाण निर्धारित किया जा सकता है।
- मूल्यांकन (Assessment/Evaluation) और मापन में अंतर समझना आवश्यक है। मापन मुख्यतः किसी विशेषता का मात्रात्मक वर्णन करता है, जबकि मूल्यांकन में प्राप्त जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति या कार्यक्रम के संबंध में मूल्य-निर्णय किया जाता है। इसलिए मापन मूल्यांकन की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण आधार है।
- मापन में मापन के स्तर (Scales of Measurement) का विशेष महत्व है। नाममात्र (Nominal), क्रमिक (Ordinal), अंतराल (Interval) और अनुपात (Ratio) चार प्रमुख स्तर हैं। प्रत्येक स्तर में सूचना की प्रकृति और उपयुक्त सांख्यिकीय प्रक्रियाएँ अलग हो सकती हैं।
- विश्वसनीयता (Reliability) से तात्पर्य किसी मापन उपकरण की परिणामों में स्थिरता और संगति से है, जबकि वैधता (Validity) यह बताती है कि उपकरण वास्तव में वही विशेषता मापता है, जिसे मापने का दावा किया गया है। एक उपकरण का विश्वसनीय होना आवश्यक है, लेकिन केवल विश्वसनीयता पर्याप्त रूप से वैधता सुनिश्चित नहीं करती।
- शैक्षिक शोध में आँकड़े प्राथमिक (Primary) अथवा द्वितीयक (Secondary) हो सकते हैं। प्राथमिक आँकड़े शोधकर्ता द्वारा स्वयं एकत्र किए जाते हैं, जबकि द्वितीयक आँकड़े पहले से उपलब्ध स्रोतों से प्राप्त किए जाते हैं।
- डाटा विश्लेषण (Data Analysis) का उद्देश्य एकत्रित आँकड़ों को व्यवस्थित, संक्षिप्त और अर्थपूर्ण बनाकर शोध प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करना है। विश्लेषण की विधि शोध की प्रकृति, आँकड़ों के प्रकार और शोध-अभिकल्प पर निर्भर करती है।
- वर्णनात्मक सांख्यिकी (Descriptive Statistics) में आँकड़ों को सारांशित करने के लिए माध्य (Mean), माध्यिका (Median), बहुलक (Mode), परास (Range), प्रसरण (Variance) और मानक विचलन (Standard Deviation) जैसी प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाता है।
- अनुमानात्मक सांख्यिकी (Inferential Statistics) के माध्यम से नमूने से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर जनसंख्या के संबंध में अनुमान लगाया जाता है। इसमें शोध की प्रकृति के अनुसार t-test, ANOVA, correlation और regression जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जा सकता है।
- गुणात्मक शोध में डाटा विश्लेषण का स्वरूप अलग हो सकता है। इसमें कोडिंग, श्रेणीकरण, विषय-वस्तु/थीम की पहचान और व्याख्या जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से प्रतिभागियों के अनुभवों और अर्थों को समझा जाता है।
- निष्कर्षतः, मापन शोध में विशेषताओं को व्यवस्थित रूप से मापने का आधार प्रदान करता है, जबकि डाटा विश्लेषण प्राप्त सूचनाओं से अर्थपूर्ण निष्कर्ष निकालने में सहायता करता है। उपयुक्त मापन उपकरण, विश्वसनीय एवं वैध आँकड़े तथा शोध-अभिकल्प के अनुरूप विश्लेषण वैज्ञानिक शैक्षिक शोध की गुणवत्ता के लिए आवश्यक हैं।
- शोध प्रस्ताव (Research Proposal) एक औपचारिक एवं व्यवस्थित दस्तावेज है, जिसमें प्रस्तावित शोध की समस्या, उद्देश्य, औचित्य, शोध प्रश्न/परिकल्पना, पद्धति तथा अपेक्षित दिशा का पूर्व-निर्धारित विवरण प्रस्तुत किया जाता है। यह शोध कार्य शुरू करने से पहले उसकी योजना और तर्क को स्पष्ट करता है।
- शोध प्रस्ताव का प्रमुख उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि क्या शोध किया जाना है, क्यों किया जाना है और उसे कैसे किया जाएगा। एक अच्छा प्रस्ताव शोध की प्रासंगिकता, व्यवहार्यता तथा प्रस्तावित पद्धति की उपयुक्तता को प्रदर्शित करता है।
- शोध प्रस्ताव का प्रारंभ सामान्यतः शीर्षक (Title) से होता है। शीर्षक संक्षिप्त, स्पष्ट, विशिष्ट और शोध के प्रमुख विषय या चरों को प्रतिबिंबित करने वाला होना चाहिए। अत्यधिक व्यापक या अस्पष्ट शीर्षक से बचना चाहिए।
- इसके बाद समस्या की पृष्ठभूमि एवं समस्या का प्रतिपादन (Statement of the Problem) प्रस्तुत किया जाता है। इसमें विषय का संदर्भ, उपलब्ध साहित्य की स्थिति तथा उस विशेष समस्या की पहचान की जाती है जिस पर शोध केंद्रित होगा।
- प्रस्ताव में शोध की आवश्यकता एवं औचित्य (Rationale/Significance) स्पष्ट किया जाता है। इसमें बताया जाता है कि अध्ययन क्यों आवश्यक है, इससे किस प्रकार का ज्ञान या व्यावहारिक लाभ प्राप्त हो सकता है और संबंधित क्षेत्र में इसका संभावित योगदान क्या होगा।
- शोध के उद्देश्य (Objectives) स्पष्ट, विशिष्ट और प्राप्त करने योग्य होने चाहिए। आवश्यकता के अनुसार शोध प्रश्न (Research Questions) या परिकल्पनाएँ (Hypotheses) भी प्रस्तुत की जाती हैं। परिकल्पना विशेषतः उन शोधों में उपयोगी होती है जहाँ चरों के बीच संबंध या अंतर का परीक्षण किया जाना है।
- साहित्य समीक्षा (Review of Related Literature) प्रस्ताव का महत्वपूर्ण भाग है। इसमें पूर्व शोधों और प्रासंगिक सिद्धांतों का आलोचनात्मक अध्ययन करके वर्तमान शोध की आवश्यकता तथा संभावित शोध-अंतर (Research Gap) को स्पष्ट किया जाता है।
- शोध पद्धति (Research Methodology) में शोध उपागम/विधि, शोध अभिकल्प, जनसंख्या, नमूना एवं नमूना चयन, उपकरण, आँकड़ा-संग्रह की प्रक्रिया तथा आँकड़ों के विश्लेषण की प्रस्तावित विधियों का विवरण दिया जाता है।
- प्रस्ताव में शोध की सीमाएँ, नैतिक पक्ष, संभावित परिणाम, कार्य-योजना/समय-सारणी तथा संदर्भ-सूची भी शामिल की जा सकती है। सभी स्रोतों का उचित शैक्षणिक संदर्भ देना आवश्यक है और साहित्यिक चोरी से बचना चाहिए।
- निष्कर्षतः, शोध प्रस्ताव केवल शोध की औपचारिक अनुमति प्राप्त करने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह शोधकर्ता की समस्या की समझ, शोध की तार्किकता और कार्यान्वयन की व्यवहार्यता को प्रदर्शित करने वाली व्यवस्थित शोध-योजना है।
शोध समस्या (Research Problem) किसी शैक्षिक क्षेत्र में उपस्थित ऐसी स्पष्ट, विशिष्ट और शोध योग्य समस्या, प्रश्न या स्थिति है, जिसके संबंध में व्यवस्थित रूप से प्रमाण एकत्र करके निष्कर्ष प्राप्त किए जा सकते हैं। शोध की गुणवत्ता काफी हद तक समस्या के उचित चयन और स्पष्ट प्रतिपादन पर निर्भर करती है।
- एक अच्छी शोध समस्या स्पष्ट, विशिष्ट, शोध योग्य, प्रासंगिक और व्यवहार्य होनी चाहिए। समस्या का चयन करते समय शोधकर्ता को उपलब्ध संसाधन, समय, नमूना, नैतिक पक्ष तथा आवश्यक आँकड़ों की उपलब्धता पर विचार करना चाहिए। केवल व्यापक विषय शोध समस्या नहीं होता; उसे सीमित और शोध योग्य रूप में व्यक्त करना आवश्यक है।
- शोध समस्या के स्रोत में शोधकर्ता का व्यावसायिक अनुभव, पूर्व शोध एवं साहित्य, शैक्षिक सिद्धांत, सामाजिक आवश्यकताएँ, नीतिगत मुद्दे तथा वास्तविक शैक्षिक परिस्थितियाँ शामिल हो सकती हैं। साहित्य समीक्षा के माध्यम से यह भी पता लगाया जाता है कि समस्या पर पहले क्या कार्य हो चुका है और कौन-सा शोध-अंतर (Research Gap) अभी मौजूद है।
- चर (Variable) ऐसी विशेषता, गुण या मात्रा है जिसमें व्यक्तियों, समूहों या परिस्थितियों के बीच मान में परिवर्तन हो सकता है। उदाहरण के लिए, उपलब्धि, बुद्धि, अभिप्रेरणा और अध्ययन-अवधि शोध में चर हो सकते हैं।
- स्वतंत्र चर (Independent Variable) वह चर है जिसे शोधकर्ता प्रभाव या संबंध के अध्ययन के लिए परिवर्तित, नियंत्रित या वर्गीकृत करता है; आश्रित चर (Dependent Variable) वह परिणाम या प्रतिक्रिया है जिसे मापा जाता है। उदाहरणतः किसी शिक्षण-विधि के प्रभाव का अध्ययन करते समय शिक्षण-विधि स्वतंत्र चर और उपलब्धि आश्रित चर हो सकती है।
- अन्य महत्वपूर्ण अवधारणाओं में नियंत्रित चर (Control Variable) और बाह्य/अवांछित चर (Extraneous Variable) शामिल हैं। नियंत्रित चर को स्थिर रखा जाता है, जबकि बाह्य चर ऐसा कारक है जो अध्ययन के परिणाम को प्रभावित कर सकता है और जिसे शोधकर्ता नियंत्रित करना चाहता है।
- परिकल्पना (Hypothesis) किसी शोध समस्या के संबंध में दो या अधिक चरों के बीच संभावित संबंध के बारे में परीक्षण योग्य कथन है। यह शोधकर्ता को आँकड़ों के संग्रह और विश्लेषण की दिशा निर्धारित करने में सहायता करती है।
- परिकल्पना दिशात्मक या अदिशात्मक, सरल या जटिल, तथा शोध/वैकल्पिक (Research/Alternative) या शून्य (Null) परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है। शून्य परिकल्पना सामान्यतः यह मानती है कि अध्ययन किए जा रहे चरों के बीच कोई महत्वपूर्ण अंतर या संबंध नहीं है।
- शोध समस्या, चर और परिकल्पना में घनिष्ठ संबंध होता है। समस्या शोध का प्रश्न निर्धारित करती है, चर उस प्रश्न के अध्ययन योग्य घटकों को स्पष्ट करते हैं और परिकल्पना चरों के बीच संभावित संबंध का परीक्षण योग्य रूप प्रस्तुत करती है।
- निष्कर्षतः, स्पष्ट शोध समस्या, उचित चर-निर्धारण और तार्किक परिकल्पना वैज्ञानिक शोध की आधारभूत संरचना बनाते हैं। इनके सही निर्धारण से शोध-अभिकल्प, आँकड़ा-संग्रह और निष्कर्ष-निर्माण अधिक व्यवस्थित एवं विश्वसनीय बनते हैं।
शैक्षिक शोध (Educational Research) शिक्षा से संबंधित समस्याओं, प्रक्रियाओं, घटनाओं और परिस्थितियों का व्यवस्थित, वैज्ञानिक तथा प्रमाण-आधारित अध्ययन है। इसका उद्देश्य शिक्षा के संबंध में नए ज्ञान का निर्माण, विद्यमान ज्ञान का परीक्षण तथा शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए विश्वसनीय निष्कर्ष प्राप्त करना है।
- शैक्षिक शोध का क्षेत्र व्यापक है। इसमें शिक्षण-अधिगम, शिक्षार्थी का विकास, शिक्षक, पाठ्यचर्या, मूल्यांकन, शैक्षिक प्रशासन, मार्गदर्शन एवं परामर्श, समावेशी शिक्षा तथा शैक्षिक नीतियों आदि का अध्ययन किया जाता है।
- शैक्षिक शोध की प्रमुख विशेषताओं में व्यवस्थितता, वस्तुनिष्ठता, तार्किकता, अनुभवजन्य प्रमाण, नियंत्रित एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण तथा पुनरावृत्ति की संभावना शामिल हैं। शोधकर्ता समस्या का स्पष्ट निर्धारण करके उपयुक्त विधि और तकनीक के माध्यम से आँकड़े एकत्र करता है तथा उनका विश्लेषण करता है।
- शैक्षिक शोध का एक प्रमुख उद्देश्य वर्णन (Description) है, जिसके माध्यम से किसी शैक्षिक घटना या स्थिति की प्रकृति को समझा जाता है। इसके अतिरिक्त व्याख्या (Explanation), पूर्वानुमान (Prediction) और नियंत्रण/सुधार (Control or Improvement) भी शोध के महत्वपूर्ण उद्देश्य हो सकते हैं।
- शैक्षिक शोध को उसके उद्देश्य एवं प्रकृति के आधार पर विभिन्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। मौलिक शोध (Fundamental/Basic Research) का उद्देश्य सामान्य ज्ञान और सिद्धांतों के विकास में योगदान देना है, जबकि अनुप्रयुक्त शोध (Applied Research) व्यावहारिक शैक्षिक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होता है।
- क्रियात्मक शोध (Action Research) शिक्षक या अन्य शैक्षिक कार्यकर्ता द्वारा अपने व्यावहारिक कार्यक्षेत्र में किसी विशिष्ट समस्या को समझने और उसमें सुधार करने के लिए किया जाता है। इसमें समस्या की पहचान, योजना, क्रियान्वयन, अवलोकन और चिंतन जैसे चरणों का चक्रीय स्वरूप पाया जाता है।
- शैक्षिक शोध में मात्रात्मक (Quantitative), गुणात्मक (Qualitative) और मिश्रित (Mixed Methods) उपागमों का प्रयोग किया जा सकता है। मात्रात्मक शोध में संख्यात्मक आँकड़ों और सांख्यिकीय विश्लेषण पर, जबकि गुणात्मक शोध में अनुभवों, अर्थों और सामाजिक संदर्भों की गहन समझ पर बल दिया जाता है।
- शोध प्रक्रिया में सामान्यतः समस्या का चयन एवं प्रतिपादन, साहित्य समीक्षा, उद्देश्यों/शोध प्रश्नों का निर्धारण, परिकल्पना जहाँ उपयुक्त हो, शोध अभिकल्प, नमूना चयन, आँकड़ा-संग्रह, विश्लेषण एवं व्याख्या तथा निष्कर्ष और रिपोर्ट लेखन शामिल होते हैं।
- शैक्षिक शोध में नैतिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिभागियों की सूचित सहमति, गोपनीयता, स्वैच्छिक सहभागिता, ईमानदार आँकड़ा-प्रस्तुति और शोध में साहित्यिक चोरी से बचाव आवश्यक है।
- निष्कर्षतः, शैक्षिक शोध शिक्षा के क्षेत्र में ज्ञान के विकास और व्यावहारिक सुधार का महत्वपूर्ण साधन है। यह प्रमाण-आधारित निर्णय-निर्माण, प्रभावी शिक्षण, पाठ्यचर्या एवं मूल्यांकन में सुधार तथा शैक्षिक नीतियों के विकास के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
- समावेशी शिक्षा की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि शिक्षा-व्यवस्था विविध शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप कितनी सक्षम है। इसमें सकारात्मक तत्व वे परिस्थितियाँ और व्यवस्थाएँ हैं जो प्रवेश, सहभागिता, अधिगम और उपलब्धि को बढ़ावा देती हैं, जबकि बाधाकारक तत्व वे भौतिक, सामाजिक, शैक्षिक, संस्थागत और दृष्टिकोण संबंधी अवरोध हैं जो शिक्षार्थियों की पूर्ण भागीदारी को सीमित करते हैं
- सकारात्मक तत्वों में समावेशी दृष्टिकोण, भेदभाव-मुक्त वातावरण, सकारात्मक शिक्षक दृष्टिकोण, प्रशिक्षित शिक्षक, सहयोगात्मक शिक्षण, उपयुक्त पाठ्यचर्या, सुलभ शिक्षण-सामग्री, सहायक तकनीक, अभिगम्य भौतिक वातावरण और परिवार तथा समुदाय की सहभागिता प्रमुख हैं। ये तत्व विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा को अधिक अनुकूल बनाते हैं।
- शिक्षक की भूमिका समावेशन का प्रमुख सकारात्मक तत्व है। शिक्षक यदि विविधता को स्वीकार करता है, विद्यार्थियों की क्षमताओं और आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण को अनुकूलित करता है तथा सहयोगात्मक और लचीली शिक्षण रणनीतियों का प्रयोग करता है, तो समावेशी कक्षा को प्रभावी बनाया जा सकता है। शिक्षक-प्रशिक्षण और निरंतर व्यावसायिक विकास भी आवश्यक हैं।
- अभिगम्यता और सहायक तकनीक समावेशन को सुगम बनाने वाले महत्त्वपूर्ण तत्व हैं। सुलभ भवन, परिसर, परिवहन, शिक्षण-संसाधन और संचार व्यवस्था तथा आवश्यकता के अनुसार Braille, Sign Language, assistive devices और डिजिटल तकनीक विद्यार्थियों की सहभागिता को बढ़ा सकती हैं।
- सहयोग और सहभागिता भी सकारात्मक तत्व हैं। शिक्षक, विशेष शिक्षक, अभिभावक, विद्यालय प्रशासन, विद्यार्थी और समुदाय के बीच सहयोग से शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं की पहचान तथा उपयुक्त शैक्षिक सहायता उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है। विद्यालय की ऐसी संस्कृति जो संबद्धता (belonging), सुरक्षा और सम्मान को बढ़ावा देती है, समावेशन को मजबूत करती है।
- बाधाकारक तत्वों में नकारात्मक दृष्टिकोण, पूर्वाग्रह और रूढ़ धारणाएँ, दिव्यांगता के प्रति भेदभाव, भौतिक एवं डिजिटल अभिगम्यता की कमी, कठोर पाठ्यचर्या, अनुपयुक्त मूल्यांकन, अपर्याप्त शिक्षक-प्रशिक्षण तथा शिक्षण-सहायता की कमी शामिल हैं। सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ, भाषा संबंधी बाधाएँ और संसाधनों की कमी भी शिक्षा में बहिष्करण को बढ़ा सकती हैं।
- शिक्षकों की अपर्याप्त तैयारी एक महत्त्वपूर्ण बाधा है। यदि शिक्षक विविध शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं, अनुकूलित शिक्षण, कक्षा-प्रबंधन और सहायक तकनीकों के प्रयोग के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं, तो समावेशी शिक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।
- कठोर पाठ्यचर्या और एकरूप मूल्यांकन व्यवस्था भी बाधा बन सकती है, जब वे विद्यार्थियों की विविध क्षमताओं और सीखने की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलन की पर्याप्त गुंजाइश न दें। इसी प्रकार, अनुपलब्ध या अनुपयुक्त शिक्षण-सामग्री और मूल्यांकन पद्धतियाँ कुछ शिक्षार्थियों की सहभागिता और अधिगम को सीमित कर सकती हैं।
- भारतीय संदर्भ में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 समावेशी शिक्षा के लिए अभेदभाव-मुक्त प्रवेश, समान अवसर, अभिगम्यता, उचित समायोजन, आवश्यक व्यक्तिगत सहायता, उपयुक्त संचार माध्यम, शिक्षक-प्रशिक्षण तथा विद्यार्थियों की सहभागिता और प्रगति की निगरानी जैसे प्रावधानों पर बल देता है।
- अतः समावेशी शिक्षा के लिए केवल विद्यार्थियों को सामान्य विद्यालय में प्रवेश देना पर्याप्त नहीं है। सकारात्मक दृष्टिकोण, सक्षम शिक्षक, अभिगम्यता, लचीली पाठ्यचर्या, उपयुक्त मूल्यांकन, सहायक तकनीक, परिवार-समुदाय सहयोग और संस्थागत समर्थन को सुदृढ़ करते हुए दृष्टिकोणगत, भौतिक, शैक्षिक और सामाजिक बाधाओं को कम करना आवश्यक है।
- क्षति (Impairment) से आशय शरीर की किसी संरचना या शारीरिक/शारीरिक-मानसिक क्रिया में होने वाली समस्या या असामान्यता से है। यह शरीर के कार्य (body functions) या संरचना (body structures) के स्तर पर स्थित होती है। उदाहरण के रूप में दृष्टि, श्रवण, वाक्, गति या किसी अन्य शारीरिक संरचना अथवा कार्य में कमी को समझा जा सकता है।
- अक्षमता (Activity Limitation) किसी कार्य या गतिविधि को करने में व्यक्ति द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाई को दर्शाती है। इसमें व्यक्ति की किसी कार्य को निष्पादित करने की क्षमता प्रभावित होती है। जैसे चलने, संचार करने, सीखने, स्वयं की देखभाल करने या किसी कार्य को पूरा करने में कठिनाई।
- नि:शक्तता/दिव्यांगता (Disability) को केवल व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक स्थिति के रूप में नहीं समझा जाता। आधुनिक कार्यात्मक दृष्टिकोण में यह व्यक्ति की स्वास्थ्य-स्थिति और व्यक्तिगत तथा पर्यावरणीय कारकों के बीच अंतःक्रिया से उत्पन्न होने वाली स्थिति है। इसमें क्षति, गतिविधि-सीमा और सहभागिता-प्रतिबंध जैसे आयाम सम्मिलित होते हैं।
- सहभागिता प्रतिबंध (Participation Restriction) का संबंध जीवन की परिस्थितियों में व्यक्ति की भागीदारी में आने वाली समस्याओं से है। किसी व्यक्ति की वास्तविक सहभागिता उसके सामाजिक, भौतिक और दृष्टिकोण संबंधी वातावरण से प्रभावित होती है। इसलिए समान स्वास्थ्य-स्थिति वाले दो व्यक्तियों में सहभागिता का स्तर अलग हो सकता है।
- WHO का ICF ढाँचा कार्यशीलता और नि:शक्तता को व्यक्ति तथा उसके संदर्भ के साथ जोड़कर देखता है। इसमें Body Functions and Structures, Activities and Participation तथा Environmental Factors प्रमुख घटक हैं। पर्यावरणीय कारक व्यक्ति के कार्यशीलता स्तर को सुविधाजनक बनाने वाले या बाधित करने वाले हो सकते हैं।
- इस दृष्टिकोण में Capacity का संबंध व्यक्ति की किसी कार्य या क्रिया को करने की क्षमता से तथा Performance का संबंध उसके वर्तमान वातावरण में वास्तव में किए गए कार्य या सहभागिता से है। इस प्रकार व्यक्ति की क्षमता और उसके वास्तविक प्रदर्शन के बीच अंतर हो सकता है।
- भारतीय कानूनी संदर्भ में Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 व्यक्ति को दिव्यांगता की स्थिति में तब परिभाषित करता है जब दीर्घकालिक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या संवेदी क्षति, बाधाओं के साथ अंतःक्रिया में, समाज में दूसरों के समान पूर्ण और प्रभावी सहभागिता में बाधा उत्पन्न करती है।
- इस प्रकार क्षति शरीर के कार्य या संरचना के स्तर, अक्षमता गतिविधि के निष्पादन के स्तर और नि:शक्तता/दिव्यांगता व्यक्ति की गतिविधियों एवं सामाजिक सहभागिता तथा पर्यावरणीय बाधाओं के संदर्भ में समझी जाती है। यह अंतर समावेशी शिक्षा में विद्यार्थियों की आवश्यकताओं, समर्थन और अभिगम्यता को समझने के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
- समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) ऐसी शिक्षा-व्यवस्था है जिसमें दिव्यांग और गैर-दिव्यांग विद्यार्थी साथ सीखते हैं तथा शिक्षण-अधिगम की व्यवस्था विभिन्न विद्यार्थियों की सीखने की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित की जाती है। इसका आधार समानता, गैर-भेदभाव, सहभागिता, पहुँच और आवश्यक समर्थन है।
- समावेशीशिक्षा का केंद्र केवल विद्यार्थी को सामान्य कक्षा में प्रवेश देना नहीं है, बल्कि शैक्षिक वातावरण, पाठ्यचर्या, शिक्षण-पद्धति, मूल्यांकन और संसाधनों में आवश्यक अनुकूलन करके उसकी सार्थक सहभागिता और अधिगम सुनिश्चित करना है। इस दृष्टिकोण में विविधता को शिक्षा-व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है।
- समावेशीशिक्षा के प्रमुख सिद्धांतों में समान अवसर, समानता एवं गैर-भेदभाव, सहभागिता, अभिगम्यता (Accessibility), उचित समायोजन (Reasonable Accommodation), व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप समर्थन और सामाजिक समावेशन प्रमुख हैं। उद्देश्य यह है कि शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, सीखने संबंधी या अन्य आवश्यकताओं के कारण कोई विद्यार्थी शिक्षा से वंचित न हो।
- अभिगम्यतासमावेशी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण आधार है। इसमें विद्यालय की इमारत, परिसर, शिक्षण-सामग्री और संचार के माध्यमों को विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप सुलभ बनाना शामिल है। आवश्यकतानुसार Braille, Sign Language, सहायक उपकरण तथा उपयुक्त तकनीकी साधनों का उपयोग किया जा सकता है।
- Rights of Persons with Disabilities Act, 2016में समावेशी शिक्षा को स्पष्ट कानूनी आधार दिया गया है। इसके अंतर्गत शैक्षिक संस्थानों से दिव्यांग बच्चों को बिना भेदभाव प्रवेश देने, समान शैक्षिक एवं सह-पाठ्यचर्या अवसर प्रदान करने, अभिगम्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने और आवश्यक reasonable accommodation तथा individualized support देने की अपेक्षा की गई है।
- इसीअधिनियम के अंतर्गत समावेशी शिक्षा को सुगम बनाने के लिए शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति, resource centres, सहायक संचार माध्यम, Braille और Sign Language, उपयुक्त शिक्षण-सामग्री तथा assistive devices जैसी व्यवस्थाओं पर बल दिया गया है। पाठ्यचर्या और परीक्षा-व्यवस्था में आवश्यक संशोधन, जैसे अतिरिक्त समय और scribe की सुविधा, भी निर्धारित प्रावधानों में शामिल हैं।
- राष्ट्रीयशिक्षा नीति 2020 शिक्षा में समानता और समावेशन को महत्त्व देती है तथा सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों और दिव्यांग विद्यार्थियों की भागीदारी पर विशेष बल देती है। इसमें सहायक उपकरण, उपयुक्त तकनीक, सुलभ प्रारूपों में शिक्षण-सामग्री, Indian Sign Language तथा विशेष शिक्षकों की उपलब्धता जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है।
- समावेशीशिक्षा में Universal Design for Learning (UDL) की दृष्टि विविध शिक्षार्थियों के लिए सीखने के अवसरों को अधिक सुलभ और लचीला बनाने से संबंधित है। उपयुक्त तकनीक, लचीली पाठ्यचर्या और विभिन्न प्रकार की शिक्षण-सामग्री विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं के अनुरूप अधिगम को समर्थन दे सकती हैं।
- इसप्रकार समावेशी शिक्षा का मूल उद्देश्य समान शैक्षिक अवसर, पूर्ण सहभागिता, अभिगम्यता, आवश्यक समर्थन और भेदभाव-मुक्त अधिगम वातावरण सुनिश्चित करना है, ताकि विविध क्षमताओं और आवश्यकताओं वाले विद्यार्थी शिक्षा-व्यवस्था में प्रभावी रूप से भाग ले सकें।
- परिवर्तन प्रबंधन (Change Management) किसी संगठन में होने वाले नियोजित अथवा आवश्यक परिवर्तन को व्यवस्थित रूप से स्वीकार करने, लागू करने और स्थायी बनाने की प्रक्रिया है। शैक्षिक संस्थानों में इसका संबंध नीतियों, संरचना, कार्य-प्रणालियों, प्रौद्योगिकी, पाठ्यचर्या, भूमिकाओं तथा संस्थागत संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों के प्रभावी प्रबंधन से है।
- शैक्षिकसंस्थाओं में परिवर्तन की आवश्यकता नई शैक्षिक नीतियों, तकनीकी विकास, बदलती सामाजिक आवश्यकताओं, गुणवत्ता सुधार, नई शिक्षण-पद्धतियों तथा संस्थागत पुनर्गठन के कारण उत्पन्न हो सकती है। परिवर्तन प्रबंधन का उद्देश्य परिवर्तन को केवल लागू करना नहीं, बल्कि उससे जुड़े व्यक्तियों और संस्थागत प्रक्रियाओं को उसके अनुरूप तैयार करना है।
- परिवर्तनप्रबंधन में परिवर्तन की आवश्यकता की पहचान, वर्तमान स्थिति का विश्लेषण, वांछित स्थिति का निर्धारण, योजना निर्माण, क्रियान्वयन, निगरानी और स्थायित्व जैसी प्रक्रियाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। प्रभावी परिवर्तन के लिए स्पष्ट उद्देश्य, संसाधनों की उपलब्धता और क्रियान्वयन की व्यवस्थित योजना आवश्यक होती है।
- परिवर्तनका प्रतिरोध (Resistance to Change) परिवर्तन प्रबंधन की प्रमुख चुनौती है। शिक्षक, प्रशासक या अन्य हितधारक नई कार्य-प्रणाली के प्रति अनिश्चितता, अपर्याप्त जानकारी, कौशल की कमी, कार्य-भार में वृद्धि अथवा वर्तमान व्यवस्था से जुड़ाव के कारण प्रतिरोध कर सकते हैं। इसलिए परिवर्तन प्रक्रिया में संचार, सहभागिता, प्रशिक्षण और सहयोग महत्त्वपूर्ण हैं।
- कुर्टलेविन (Kurt Lewin) का परिवर्तन मॉडल परिवर्तन प्रबंधन के अध्ययन में प्रमुख है। इसमें तीन चरण हैं—Unfreezing, Changing/Moving और Refreezing। Unfreezing में वर्तमान स्थिति को परिवर्तन के लिए तैयार किया जाता है; Changing/Moving में नई दिशा या व्यवहार को अपनाया जाता है; तथा Refreezing में नए व्यवहार या व्यवस्था को स्थिर किया जाता है।
- परिवर्तनमें नेतृत्व केंद्रीय भूमिका निभाता है। नेतृत्वकर्ता परिवर्तन की आवश्यकता और उद्देश्य को स्पष्ट करता है, हितधारकों को सहभागी बनाता है, प्रतिरोध को समझता है, आवश्यक संसाधन एवं प्रशिक्षण उपलब्ध कराने में सहायता करता है तथा परिवर्तन की प्रगति की निगरानी करता है। प्रभावी संचार परिवर्तन को स्वीकार करने में सहायक होता है।
- शैक्षिकसंस्थानों में सफल परिवर्तन के लिए हितधारक सहभागिता (Stakeholder Participation) महत्त्वपूर्ण है। शिक्षक, विद्यार्थी, प्रशासन, अभिभावक और समुदाय जैसे संबंधित पक्षों को परिवर्तन की प्रकृति, उद्देश्य और अपेक्षित परिणामों से अवगत कराना तथा उपयुक्त स्तर पर उनकी सहभागिता सुनिश्चित करना परिवर्तन की स्वीकृति को बढ़ा सकता है।
- परिवर्तनप्रबंधन और गुणवत्ता सुधार परस्पर संबंधित हैं। संस्थागत परिवर्तन तभी प्रभावी माना जाता है जब वह शिक्षण-अधिगम, संस्थागत कार्यप्रणाली या शैक्षिक परिणामों में अपेक्षित सुधार की दिशा में योगदान करे। परिवर्तन के बाद निगरानी और मूल्यांकन से यह निर्धारित किया जा सकता है कि निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति किस सीमा तक हुई है।
- इसप्रकार शैक्षिक परिवर्तन प्रबंधन एक नियोजित, सहभागी और सतत प्रक्रिया है, जिसमें परिवर्तन की आवश्यकता की पहचान से लेकर उसके क्रियान्वयन, प्रतिरोध के प्रबंधन, मूल्यांकन और स्थायित्व तक की प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं। इसका प्रभावी संचालन संस्थागत विकास और शैक्षिक गुणवत्ता सुधार के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- समावेशी कक्षा ऐसी कक्षा है जिसमें विविध क्षमताओं, आवश्यकताओं और पृष्ठभूमियों वाले विद्यार्थी साथ सीखते हैं तथा शिक्षण-अधिगम की व्यवस्था विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित की जाती है। इसका उद्देश्य केवल विद्यार्थियों की उपस्थिति सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि सार्थक सहभागिता, अधिगम और उपलब्धि के अवसर उपलब्ध कराना है।
- समावेशी कक्षा का नियोजन करते समय विद्यार्थियों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, क्षमताओं, पूर्व-अधिगम, रुचियों और सीखने की बाधाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। पाठ के उद्देश्यों, शिक्षण-अधिगम गतिविधियों, संसाधनों और मूल्यांकन की योजना इस प्रकार बनाई जानी चाहिए कि विविध शिक्षार्थी उनमें भाग ले सकें।
- पाठ्यचर्या और शिक्षण में अनुकूलन समावेशी नियोजन का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। आवश्यकतानुसार शिक्षण-सामग्री, गतिविधियों, संचार के तरीकों और मूल्यांकन प्रक्रियाओं में परिवर्तन किया जा सकता है। Braille, large print, sign language, assistive devices और उपयुक्त डिजिटल तकनीक जैसी व्यवस्थाएँ संबंधित शिक्षार्थियों की पहुँच और सहभागिता को बढ़ा सकती हैं।
- Universal Design for Learning (UDL)विविध शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षण-अधिगम को अधिक लचीला और सुलभ बनाने की दृष्टि प्रदान करता है। UDL-आधारित सामग्री और शिक्षण में विभिन्न प्रकार से जानकारी प्रस्तुत करने, सहभागिता के अवसर देने तथा सीखने की अभिव्यक्ति के वैकल्पिक तरीकों का उपयोग किया जा सकता है।
- कक्षा-प्रबंधन में भौतिक वातावरण, बैठने की व्यवस्था, समय-सारणी, कक्षा की दिनचर्या, शिक्षण-संसाधनों और विद्यार्थियों के बीच सहभागिता को व्यवस्थित करना शामिल है। कक्षा का वातावरण सुरक्षित, सुलभ, सहयोगात्मक और भेदभाव-मुक्त होना चाहिए, ताकि प्रत्येक विद्यार्थी सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले सके।
- समावेशी कक्षा में सहयोगात्मक शिक्षण और सहपाठी सहभागिता उपयोगी रणनीतियाँ हैं। जोड़ी या छोटे समूहों में गतिविधियाँ विद्यार्थियों के बीच सहयोग, संचार और सामाजिक सहभागिता के अवसर प्रदान कर सकती हैं। शिक्षक को विद्यार्थियों की विविधता को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त समूह और गतिविधियाँ निर्धारित करनी चाहिए।
- शिक्षक की भूमिका केवल विषय-वस्तु प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं रहती। शिक्षक को विद्यार्थियों की आवश्यकताओं की पहचान, उपयुक्त शिक्षण रणनीतियों का चयन, प्रगति की निगरानी, आवश्यक अनुकूलन तथा अभिभावकों और अन्य विशेषज्ञों के साथ सहयोग करना होता है। आवश्यकता के अनुसार विशेष शिक्षक और संसाधन-केंद्र भी सहायता प्रदान कर सकते हैं।
- समावेशी कक्षा के प्रभावी प्रबंधन में निरंतर एवं विविध प्रकार का मूल्यांकन महत्त्वपूर्ण है। मूल्यांकन से विद्यार्थियों की सीखने की प्रगति और आवश्यक समर्थन की पहचान की जा सकती है। मूल्यांकन के तरीके और साधन विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित किए जा सकते हैं।
- समावेशी कक्षाओं के सफल नियोजन और प्रबंधन के लिए अभिगम्यता, उपयुक्त शिक्षण-सामग्री, सहायक तकनीक, शिक्षक-प्रशिक्षण, सहयोगात्मक कार्य, अभिभावक सहभागिता और संस्थागत समर्थन आवश्यक हैं। इस प्रकार समावेशी कक्षा-प्रबंधन का केंद्र विविधता को स्वीकार करते हुए प्रत्येक विद्यार्थी के लिए समान सहभागिता और गुणवत्तापूर्ण अधिगम के अवसर सुनिश्चित करना है।
भारत में अध्यापक शिक्षा (Teacher Education) के विकास को व्यवस्थित दिशा देने में विभिन्न शिक्षा आयोगों, समितियों और नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनके माध्यम से शिक्षक की व्यावसायिक दक्षता, प्रशिक्षण की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम, संस्थागत संरचना और शिक्षक-शिक्षा के मानकों में सुधार के प्रयास किए गए।
- सैडलर आयोग (1917–19) ने भारतीय विश्वविद्यालयी शिक्षा के संदर्भ में माध्यमिक शिक्षा और शिक्षक-प्रशिक्षण से संबंधित सुधारों की आवश्यकता पर विचार किया। इसने माध्यमिक स्तर की शिक्षा के विकास को उच्च शिक्षा से अलग व्यवस्थित करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
- सार्जेंट योजना (1944) ने शिक्षक-प्रशिक्षण के विस्तार तथा शिक्षकों की व्यावसायिक तैयारी पर बल दिया। इसने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण को शिक्षा व्यवस्था के विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा माना।
- विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948–49), जिसकी अध्यक्षता डॉ. एस. राधाकृष्णन ने की, ने उच्च शिक्षा में शिक्षकों की गुणवत्ता, योग्यताओं और व्यावसायिक विकास के महत्व पर बल दिया। इसने शिक्षक के बौद्धिक एवं नैतिक स्तर को उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से जोड़ा।
- माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952–53), जिसकी अध्यक्षता ए. लक्ष्मणस्वामी मुदलियार ने की, ने माध्यमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण को अधिक व्यावहारिक एवं विद्यालय की वास्तविक आवश्यकताओं से संबंधित बनाने पर जोर दिया। इसने पूर्व-सेवा प्रशिक्षण तथा सेवाकालीन प्रशिक्षण के महत्व को रेखांकित किया।
- शिक्षा आयोग (1964–66), अर्थात कोठारी आयोग, ने शिक्षक की गुणवत्ता को शिक्षा की गुणवत्ता का केंद्रीय तत्व माना। इसने शिक्षक-शिक्षा में व्यावसायिकता, प्रशिक्षण की गुणवत्ता, सेवाकालीन शिक्षा तथा शिक्षक-शिक्षा संस्थानों के सुधार पर बल दिया। इसका प्रसिद्ध दृष्टिकोण था कि शिक्षा व्यवस्था का भविष्य शिक्षकों की गुणवत्ता से गहराई से जुड़ा है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 तथा कार्यक्रम क्रियान्वयन (POA), 1992 ने शिक्षक शिक्षा के पुनर्गठन पर विशेष बल दिया। DIETs, CTEs और IASEs जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं के विकास को बढ़ावा मिला तथा शिक्षक-शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर जोर दिया गया।
- राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) को 1995 में वैधानिक निकाय का दर्जा मिला। NCTE ने शिक्षक-शिक्षा के मानदंड एवं मानक निर्धारित करने, संस्थानों के नियमन और गुणवत्ता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षक शिक्षा में 4-वर्षीय एकीकृत B.Ed., बहुविषयक संस्थानों, निरंतर व्यावसायिक विकास तथा उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षक-तैयारी कार्यक्रमों पर बल दिया।
- इस प्रकार विभिन्न आयोगों और समितियों ने अध्यापक शिक्षा को सामान्य प्रशिक्षण से आगे बढ़ाकर व्यावसायिक, मानकीकृत, गुणवत्तापूर्ण और सतत विकास-उन्मुख व्यवस्था के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 83(2) संसद के निचले सदन, यानी लोकसभा (Lok Sabha), के विघटन (भंग होने) से संबंधित प्रावधानों को स्पष्ट करता है। सदन का विघटन मौजूदा सदन का कार्यकाल समाप्त करता है और देश में आम चुनाव होने के बाद ही नए सदन का गठन किया जाता है।
- लोकसभा का कार्यकाल और विघटन
- लोकसभा का कार्यकाल निश्चित होता है, लेकिन कुछ असाधारण परिस्थितियों में इसे समय से पहले भी भंग किया जा सकता है :
- निश्चित अवधि पर विघटन : अनुच्छेद 83(2) के अनुसार, लोकसभा अपनी पहली बैठक के दिन से पाँच वर्ष पूरे होने पर स्वतः भंग हो जाती है।
- समय से पूर्व विघटन (राष्ट्रपति द्वारा) : राष्ट्रपति के पास यह शक्ति है कि वे प्रधानमंत्री की सलाह पर लोकसभा को उसके पाँच वर्ष के कार्यकाल की समाप्ति से पहले भी भंग कर सकते हैं।
- वैकल्पिक सरकार का अभाव : लोकसभा को तब भी भंग किया जा सकता है जब पिछली सरकार के इस्तीफे या सदन में विश्वास खोने के बाद, राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि कोई व्यवहार्य (Viable) वैकल्पिक सरकार नहीं बनाई जा सकती है।
- जब लोकसभा भंग हो जाती है, तो उसके समक्ष लंबित (Pending) सभी कार्य (विधेयक, प्रस्ताव, नोटिस आदि) समाप्त हो जाते हैं, और अगली लोकसभा को उन्हें नए सिरे से शुरू करना पड़ता है।
- राज्यसभा की स्थिति
इसके विपरीत, राज्यसभा (Rajya Sabha) एक स्थायी सदन (Permanent House) है और यह कभी भंग नहीं होती है। इसके सदस्य एक चक्रीय प्रक्रिया के तहत सेवानिवृत्त होते हैं (प्रत्येक दो वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं), जिससे सदन की निरंतरता बनी रहती है।
अचानकमार टाइगर रिज़र्व मध्य भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित एक महत्त्वपूर्ण वन्यजीव संरक्षण क्षेत्र है। यह अपने अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र और बाघों के संरक्षण के लिये जाना जाता है।
अवस्थिति और स्थिति
- राज्य और जिला : यह छत्तीसगढ़ राज्य के मुंगेली जिले में स्थित है।
- स्थापना : इसे वर्ष 2007 में भारत के 37वें बाघ अभयारण्य (Tiger Reserve) के रूप में घोषित किया गया था।
- भौगोलिक क्षेत्र : यह टाइगर रिज़र्व अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिज़र्व का एक अभिन्न हिस्सा है, जो छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमाओं पर फैला हुआ है।
- पहाड़ी शृंखला : यह मुख्य रूप से मैकाल पर्वत शृंखला में स्थित है, जो सतपुड़ा पर्वत शृंखला का हिस्सा है।
पारिस्थितिकी और जैव विविधता
अचानकमार टाइगर रिज़र्व एक विशिष्ट जैव विविधता क्षेत्र है जो विविध प्रकार के वन्यजीवों को आश्रय देता है :
- वनस्पति (Flora) : रिज़र्व में मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन पाए जाते हैं। यहाँ साल (Sal) और बाँस (Bamboo) के वन बहुतायत में हैं।
- पशुवर्ग (Fauna) : यह अभयारण्य बाघों (Tigers) के लिये एक महत्त्वपूर्ण निवास स्थान है, जिसके नाम पर इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया है।
- प्रमुख वन्यजीव : बाघों के अलावा, यहाँ तेंदुआ (Leopard), गौर (Indian Bison), चीतल (Spotted Deer), सांभर (Sambar Deer), भालू (Sloth Bear), जंगली कुत्ता (Dhole) और चौसिंगा (Four-horned Antelope) जैसे जानवर भी पाए जाते हैं।
- पक्षी : यह रिज़र्व विभिन्न प्रकार के पक्षियों की प्रजातियों का भी घर है।
संरक्षण का महत्त्व
अचानकमार टाइगर रिज़र्व न केवल बाघों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि यह मैकाल पर्वत शृंखला के समृद्ध प्राकृतिक और जल स्रोतों की रक्षा भी करता है। यह क्षेत्र पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और मध्य भारत के वन्यजीव गलियारों को मजबूत करने के लिये आवश्यक है। यह रिज़र्व अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगल और विविध वन्यजीवों के लिये पर्यावरणविदों और प्रकृति प्रेमियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण स्थल है।
हॉवर्ड गार्डनर ने 1983 में "बहुआयामी बुद्धि" का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनका मानना था कि बुद्धि केवल एकसमान मानसिक क्षमता नहीं है, बल्कि यह अनेक रूपों में प्रकट होती है। प्रत्येक प्रकार की बुद्धि अन्य से स्वतंत्र होती है, अर्थात यदि कोई व्यक्ति किसी एक क्षेत्र में प्रखर है तो यह आवश्यक नहीं कि वह अन्य सभी क्षेत्रों में भी उतना ही सक्षम हो।
गार्डनर के अनुसार, किसी भी समस्या के समाधान में विभिन्न प्रकार की बुद्धियाँ परस्पर सहयोग करते हुए कार्य करती हैं। उन्होंने मानव क्षमता के व्यापक विश्लेषण के आधार पर नौ प्रकार की बुद्धियों का वर्गीकरण किया।
गार्डनर द्वारा वर्णित नौ बुद्धियाँ
1. प्रकृतिवादी बुद्धि (Naturalist Intelligence)
यह बुद्धि व्यक्ति को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाती है। इसमें पौधों, पशु-पक्षियों, मौसम, चट्टानों, बादलों और प्राकृतिक संसाधनों की पहचान एवं उनके बीच सूक्ष्म अंतर करने की क्षमता शामिल होती है। जीवविज्ञानी, पर्यावरणविद् और किसान अक्सर इस बुद्धि में दक्ष पाए जाते हैं।
2. संगीत बुद्धि (Musical Intelligence)
यह बुद्धि लय, स्वर, ताल और धुन को पहचानने, समझने और रचने की क्षमता प्रदान करती है। संगीतकार, गायक, वादक तथा संगीत-निर्माता इस बुद्धि का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं। यह बुद्धि भावनाओं से गहराई से जुड़ी होती है और अक्सर गणितीय सोच से भी साम्य रखती है।
3. तार्किक-गणितीय बुद्धि (Logical-Mathematical Intelligence)
इस बुद्धि से व्यक्ति गणना करने, अमूर्त विचारों पर चिंतन करने, परिकल्पनाएँ बनाने और तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचने में सक्षम होता है। गणितज्ञ, वैज्ञानिक, इंजीनियर और जासूस इस क्षेत्र में विशेष रूप से प्रवीण होते हैं।
4. अस्तित्ववादी बुद्धि (Existential Intelligence)
इसमें जीवन, मृत्यु और अस्तित्व से जुड़े गूढ़ प्रश्नों को समझने और उनके उत्तर खोजने की क्षमता शामिल है। "हम क्यों हैं?" या "जीवन का उद्देश्य क्या है?" जैसे प्रश्नों पर चिंतन करना इस बुद्धि का द्योतक है। दार्शनिक और आध्यात्मिक साधक अक्सर इसमें प्रखर होते हैं।
5. अंतर्वैयक्तिक बुद्धि (Interpersonal Intelligence)
यह बुद्धि दूसरों की भावनाओं, स्वभाव और दृष्टिकोण को समझने तथा उनके साथ प्रभावी संवाद स्थापित करने की क्षमता है। इसमें मौखिक और अशाब्दिक दोनों प्रकार का संचार शामिल है। शिक्षक, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और अभिनेता इस बुद्धि में प्रवीण माने जाते हैं।
6. शारीरिक-गतिसंवेदी बुद्धि (Bodily-Kinesthetic Intelligence)
यह बुद्धि शरीर और मस्तिष्क के बीच गहन तालमेल को दर्शाती है। इसमें गति, संतुलन, कौशल, लचीलापन और वस्तुओं को नियंत्रित करने की क्षमता शामिल होती है। एथलीट, नर्तक, शिल्पकार और खिलाड़ी इस बुद्धि के श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
7. भाषायी बुद्धि (Linguistic Intelligence)
यह शब्दों को समझने, उनका प्रयोग करने और उनके माध्यम से भावों को अभिव्यक्त करने की क्षमता है। इसमें बोलने, लिखने, सुनने और पढ़ने की दक्षता सम्मिलित होती है। कवि, लेखक, पत्रकार और वक्ता इस बुद्धि का उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।
8. अंतरावैयक्तिक बुद्धि (Intra-personal Intelligence)
यह आत्म-जागरूकता और आत्म-विश्लेषण की क्षमता है। व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और कमजोरियों-क्षमताओं को समझकर जीवन को दिशा देने में सक्षम होता है। मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु इस क्षेत्र में विशेष रूप से प्रखर पाए जाते हैं।
9. स्थानिक या त्रिविम बुद्धि (Spatial Intelligence)
यह बुद्धि त्रिविमीय रूप से सोचने, कल्पना करने और चित्रात्मक/कलात्मक रूप में अभिव्यक्त करने की क्षमता है। इसमें चित्र, आरेख, डिज़ाइन और दृश्य कला का गहरा ज्ञान शामिल होता है। चित्रकार, मूर्तिकार, पायलट और वास्तुकार इस बुद्धि का श्रेष्ठ उदाहरण हैं।
गार्डनर का बहुआयामी बुद्धि सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है और उसकी अपनी विशिष्ट प्रतिभाएँ हैं। शिक्षा, समाज और कार्यक्षेत्र में इन विविध बुद्धियों की पहचान एवं प्रोत्साहन से न केवल व्यक्तिगत विकास होता है, बल्कि सामूहिक उन्नति भी संभव होती है।
कोशिका जीवन की मूलभूत संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई है। प्रत्येक जीव का शरीर कोशिकाओं से मिलकर बना होता है। जीवों के अध्ययन में कोशिका का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। कोशिका विज्ञान को Cytology कहा जाता है।
- कोशिका की खोज एवं परिभाषा
- "Cell" शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1665 ई. में रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने किया।
- उन्होंने कॉर्क (Cork) के स्लाइस का अध्ययन करते समय कोशिकाओं जैसी संरचनाएँ देखीं।
- कोशिका विज्ञान (Cytology) का आरंभ भी इसी खोज से हुआ।
- कोशिका के विशेष उदाहरण
- सबसे छोटी कोशिका → Mycoplasma gallisepticum (बैक्टीरिया)।
- सबसे बड़ी कोशिका → शुतुरमुर्ग का अंडा (Ostrich egg)।
- सबसे लंबी कोशिका → तंत्रिका कोशिका (Nerve cell)।
- कोशिका सिद्धांत (Cell Theory)
कोशिका सिद्धांत का प्रतिपादन 1838 में श्लाइडेन (Schleiden) और 1839 में श्वान (Schwann) ने किया। इसने जीव विज्ञान को नई दिशा प्रदान की। - मुख्य बातें :
(i) प्रत्येक जीव की उत्पत्ति एक कोशिका से होती है।
(ii) प्रत्येक जीव का शरीर एक या अनेक कोशिकाओं का बना होता है।
(iii) प्रत्येक कोशिका एक स्वतंत्र इकाई है, परंतु सभी कोशिकाएँ मिलकर जीव का निर्माण करती हैं।
(iv) कोशिका निर्माण में केंद्रक (Nucleus) मुख्य भूमिका निभाता है।
- कोशिकाओं के प्रकार
- प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)
- इनमें केंद्रक विकसित नहीं होता, केवल DNA का सूत्र गुणसूत्र के रूप में पाया जाता है।
- हिस्टोन प्रोटीन अनुपस्थित रहते हैं, इसलिये क्रोमैटिन का निर्माण नहीं होता।
- केंद्रक झिल्ली (Nuclear membrane) का अभाव।
- इनमें सरल कोशिकांग (Cell organelles) होते हैं।
- उदाहरण : जीवाणु (Bacteria), नीलहरित शैवाल (Cyanobacteria)।
- यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)
- इनका केंद्रक (Nucleus) दोहरी झिल्ली से घिरा होता है।
- DNA एवं हिस्टोन प्रोटीन मिलकर क्रोमैटिन का निर्माण करते हैं।
- केंद्रक के भीतर केंद्रिका (Nucleolus) भी उपस्थित होती है।
- विकसित कोशिकांग पाए जाते हैं जैसे—माइटोकॉन्ड्रिया, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम, गोल्जी बॉडी आदि।
- उदाहरण : पौधों एवं जंतुओं की कोशिकाएँ।
- प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)
हमारे शरीर में रक्त परिवहन के लिये रक्त वाहिनियों का जाल-सा बिछा होता है। शरीर की रक्त वाहिनियाँ दो प्रकार की होती हैं- धमनी और शिरा।
धमनियाँ (Arteries)
ये हृदय से ऑक्सीजन समृद्ध रक्त को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाती हैं। रक्त प्रवाह के तेज़ और अधिक दाब पर होने के कारण धमनियों की भित्तियों (दीवारों) मोटी और प्रत्यास्थ होती हैं।
- हम अपने दाहिने हाथ की मध्य एवं तर्जनी अँगुलियों को अपने बाएँ हाथ की कलाई के भीतरी भाग पर रखकर नाड़ी स्पंद या नब्ज (Pulse) के ज़रिये धमनियों के रक्त प्रवाह को अनुभव कर सकते हैं। प्रति मिनट स्पंदों की संख्या स्पंदन दर (Pulse Rate) कहलाती है। विश्रामावस्था में एक वयस्क व्यक्ति की स्पंदन दर सामान्यतः 72 से 80 होती है।
- फुफ्फुस धमनी (Pulmonary Artery) अन्य धमनियों से अलग ऑक्सीजन समृद्ध रक्त परिवहन न करके कार्बन डाइऑक्साइड समृद्ध रक्त को ह्रदय से फेफड़ों तक ले जाती है।
शिराएँ (Veins)
ये कार्बन डाइऑक्साइड समृद्ध रक्त को शरीर के सभी भागों से वापस ह्रदय में पहुंचाती हैं। शिराओं की भित्तियां अपेक्षाकृत पतली होती हैं। शिराओं में विद्यमान वाल्व रक्त को केवल ह्रदय की ओर ही प्रवाहित होने देते हैं।
- धमनियाँ ऊतकों में पहुंचकर अत्यंत पतली नलिकाओं में बंट जाती हैं, जिन्हें केशिकाएं (Capillaries) कहते हैं। केशिकाएं पुनः मिलकर शिराओं का रूप लेती हैं।
- फुफ्फुस शिरा (Pulmonary Vein) अन्य शिराओं से अलग कार्बन डाइऑक्साइड समृद्ध रक्त का परिवहन न करके ऑक्सीजन समृद्ध रक्त को फेफड़ों से ह्रदय तक ले जाती है।
- मानव शरीर में रुधिर प्रवाह- ह्रदय से धमनी से केशिकाओं से शिराओं से हृदय।
- मानव रक्त में विद्यमान प्रोटीन के प्रकार के आधार पर चार रक्त समूह (ब्लड ग्रुप) बनाए गए हैं। ABO प्रणाली (ABO System) के अंतर्गत ये चार रक्त समूह A, B, AB एवं O हैं। रक्त चढ़ाते समय प्रदाता के रक्त समूह का मिलान ग्राही के रक्त समूह से किया जाता है ताकि प्रदाता की लाल रक्त कोशिका की झिल्ली पर उपस्थित एंटीजन ग्राही के रुधिर के प्लाज़्मा में उपस्थित एंटीबॉडी से प्रतिक्रिया न कर ले। सभी व्यक्तियों को रक्त देने वाला समूह ‘O’ सार्वत्रिक प्रदाता (Universal Doner) समूह तथा सभी समूह के व्यक्तियों से रक्त प्राप्त करके वाला समूह ‘AB’ सार्वत्रिक ग्राही (Universal Recipient) समूह कहलाता है।
- A noun is the name of a person, place, thing, idea, or feeling.
- It tells us "what" or "who" we are talking about.
- Nouns are the first and most basic part of speech in English grammar.
Easy Tip: If you can see, touch, name, or think of something – it's usually a noun!
Types of Nouns
I. Common Noun
- Talks about general names of people, places, or things.
- Examples: girl, country, school, phone
- Not capitalized unless starting a sentence.
II. Proper Noun
- Names a specific person, place, or thing.
- Examples: Riya, India, Taj Mahal, Monday
- Always starts with a capital letter.
III. Collective Noun
- Names a group of people, animals, or things.
- Examples: team, herd, bunch, class
- Treated as a single unit.
IV. Abstract Noun
- Names something you cannot see or touch — like an idea or feeling.
- Examples: happiness, truth, love, fear
- Exists only in the mind.
V. Concrete Noun
- Names things you can see, touch, smell, hear, or taste.
- Examples: flower, cake, dog, music
- Based on real-world senses.
- Material Noun: A subcategory of concrete noun, referring specifically to materials or substances used to make other things.
- Used as raw materials — they are usually uncountable.
- Examples:
- Gold (used to make jewelry)
- Wood (used to make furniture)
- Milk (used in cooking)
- Iron (used in machines)
- Examples:
- Nouns can also be divided into two types based on whether we can count them or not:
I. Countable Nouns
- These are nouns that you can count as individual units.
- They have singular and plural forms.
- Examples:
- 1 apple, 3 cars, 10 books, 5 pens
II. Uncountable Nouns
- These are nouns you cannot count one by one.
- They usually refer to mass, substance, quality, or abstract ideas.
- They do not have plural forms and are treated as singular.
- Examples:
- milk, sugar, rice, water, honesty, information
Examples in Sentences
- Person: Sita is reading a book.
- Place: I live in Kanpur.
- Thing: The bag is heavy.
- Idea: Wisdom is more powerful than strength.
- Feeling: She was full of excitement.
Why Are Nouns Important?
- They help us name everything around and inside us.
- Every sentence needs a noun to make sense.
- Without nouns, we can't tell who or what we’re talking about.
- They are the foundation of good English grammar and communication.
मानव विकास का इतिहास एक लंबी और जटिल प्रक्रिया रही है, जिसमें जैविक, भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह यात्रा आदिम जीवों से शुरू होकर आधुनिक मानव तक पहुँची, जिसने सभ्यता और संस्कृति की नींव रखी।
- रामापिथेकस (Ramapithecus) – सबसे प्राचीन पूर्वज
- यह प्राणी लगभग 1.4 से 1.6 करोड़ साल पहले धरती पर था।
- यह चार पैरों पर चलता था और आज के बंदरों जैसा दिखता था।
- इसके जीवाश्म कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में पाए गए हैं।
- यह मानव और वानर के बीच की सबसे आरंभिक कड़ी मानी जाती है।
- ऑस्ट्रेलोपिथेकस (Australopithecus) – दो पैरों वाला पहला प्राणी
- करीब 40 लाख साल पहले यह प्राणी धरती पर आया।
- यह दो पैरों पर चल सकता था, लेकिन शरीर में वानर जैसी झुकावट थी।
- इसने पहली बार पत्थर के औज़ार बनाना और उपयोग करना शुरू किया।
- इसका शरीर इंसान और बंदर का मिश्रण था।
- होमो इरेक्टस (Homo Erectus) – सीधा खड़ा इंसान
- यह प्राणी लगभग 15 लाख साल पहले अस्तित्व में आया।
- यह पूरी तरह से सीधा खड़ा होकर चलता था — जैसे आज हम चलते हैं।
- इसने आग की खोज की और गुफाओं में रहना शुरू किया।
- इस काल में बेहतर औज़ारों का निर्माण और उपयोग भी शुरू हुआ।
- निएंडरथल मानव (Neanderthal) – संवेदनशील और समझदार मानव
- करीब 1 लाख साल पहले यह मानव धरती पर था।
- इसका मस्तिष्क बहुत बड़ा (1350cc से 1750cc तक) था।
- इसने मृतकों का अंतिम संस्कार, चित्रकला, और डोंगी (नाव) बनाना शुरू किया।
- यह सामाजिक जीवन और भावनाओं की अभिव्यक्ति में भी सक्षम था।
- होमो सेपियंस (Homo Sapiens) – आधुनिक मानव
- लगभग 34,000 साल पहले वर्तमान मानव का जन्म हुआ।
- इसने भाषा, लिपि, कला, कृषि, और समाज की परिकल्पना को जन्म दिया।
- इसका दिमाग पहले से अधिक विकसित था, जिससे सभ्यताओं का निर्माण संभव हुआ।
- मानव विकास की यह यात्रा केवल शारीरिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच, संस्कृति और समाज की निरंतर प्रगति की कहानी है।
ह्रदय के संकुचन और फैलाव को संयुक्त रूप से ह्रदय स्पंदन कहा जाता है। हम अपने वक्ष के बाईं ओर हाथ रखकर ह्रदय स्पंदनों (धड़कनों) को महसूस कर सकते हैं।
- चिकित्सक स्टेथोस्कोप (Stethoscope) की सहायता से ह्रदय स्पंदन को मापता है, जिसमें ह्रदय स्पंदन की ध्वनि को आवर्द्धित करके सुना जाता है। स्टेथोस्कोप में एक सिरे पर संवेदनशील डायफ्रॉम युक्त एक चेस्ट पीस तथा दूसरे सिरे पर चेस्ट पीस से जुड़ी नली से संलग्न दो इयर पीस (श्रोतिका) लगे होते हैं।
- हम 6 से 7 सेमी. व्यास वाले कीप के स्तंभ पर 50 सेमी. लंबाई वाली रबड़ की नली कसकर कीप के मुख पर गुब्बारे या किसी झिल्ली को तानकर और उस पर रबड़ बैंड लगाकर स्टेथोस्कोप का नमूना तैयार कर अलग-अलग स्थितियों (विश्राम, दौड़ने आदि) में ह्रदय स्पंदन दर प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक ह्रदय स्पंदन धमनियों में एक स्पंदन उत्पन्न करता है। अतः ह्रदय स्पंदन दर और नाड़ी स्पंदन दर समान ही होती है। एक मिनट में एक सामान्य ह्रदय लगभग 72 बार स्पंदन करता है।
संश्लेषित या मानव-निर्मित रेशा रासायनिक पदार्थों की छोटी-छोटी इकाइयों को जोड़कर बनाई गई एक शृंखला है। इस प्रकार की अनेक छोटी इकाइयाँ मिलकर एक बड़ी एकल इकाई बनाती हैं जो बहुलक (पॉलीमर) कहलाती है।
संश्लेषित रेशों के प्रकार (Types of Synthetic Fibres)
- रेयॉन (Rayon)- हमारे वैज्ञानिकों को संश्लेषित रेशों को प्राप्त करने में सफलता 19वीं शताब्दी के अंत में मिली। काष्ठ लुगदी के रासायनिक उपचार से प्राप्त यह रेशा रेयॉन अथवा कृत्रिम रेशम कहलाया। काष्ठ लुगदी जैसे प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त किये जाने के बावजूद यह एक मानव निर्मित रेशा है। रेशम से सस्ता होने पर भी इसे रेशम रेशों के समान बुना जा सकता है और इसमें मनचाहे रंग भरे जा सकते हैं। इसे कपास के साथ मिलाकर बिस्तर की चादरें तथा ऊन के साथ मिलाकर कालीन या गलीचे बनाते हैं।
- नाइलॉन (Nylon)- प्रथम पूर्णतः संश्लेषित इस रेशे का निर्माण 1931 में कोयले, जल और वायु से किया गया जो प्रबल, प्रत्यास्थ, हल्का, चमकीला और धुलने में सुगम था। नाइलॉन से रस्से, तंबू, दांत साफ करने का ब्रश, कारों की सीट बेल्ट और स्लीपिंग बैग आदि से लेकर पैराशूट और पहाड़ों पर चढ़ने हेतु रस्से तक बनाए जाते हैं। नाइलॉन का तार, इस्पात तार से अधिक मज़बूत होता है।
- पॉलियेस्टर (Polyester)- इससे बने कपड़ों में आसानी से सिलवटें नहीं पड़तीं और ये आसानी से धुल भी जाते हैं। पॉलियेस्टर (पॉलि + एस्टर) का निर्माण फलों को गंध प्रदान करने वाले रसायन यानी एस्टर (Ester) की इकाइयों की पुनरावृत्ति से होता है। एस्टर कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन से निर्मित हो कार्बन की लंबी शृंखला बनाते हैं। टेरीलीन एक लोकप्रिय पॉलियेस्टर है, इसे बहुत महीन रेशों में खींचकर किसी भी अन्य तंतु के समान बुना जा सकता है पॉलियेस्टर से निर्मित कपड़े पॉलिकॉट, पॉलिवूल, टेरीकॉट आदि नामों से बेचे जाते हैं। पॉलिकॉट, पॉलियेस्टर और कपास का मिश्रण है तो पॉलिवूल, पॉलियेस्टर और ऊन का। सुपरिचित पॉलियेस्टर पेट (PET) से बोतलें, बर्तन, फिल्म, तार और अन्य उपयोगी उत्पाद बनाए जाते हैं।
- एक्रिलिक (Acrylic)- सर्दियों में प्रयोग किये जाने वाले ऊन के सदृश दिखने वाले स्वेटर, शॉल और कंबल एक्रिलिक नामक संश्लेषित रेशे से तैयार किये जाते हैं। विविध रंगों में उपलब्ध एक्रिलिक से निर्मित उत्पाद अपेक्षाकृत सस्ते और टिकाऊ होते हैं।
एनालॉग या डायल-अप (Analog or Dial-up)
- यह इंटरनेट कनेक्शन के लिये टेलीफोन लाइन का उपयोग करता है।
- मॉडेम टेलीफोन लाइन तथा PC के मध्य इंटरफेस का कार्य करता है।
- SLP- Serial Line Internet Protocol तथा PPP- Point to Point Protocol, डायल-अप कनेक्शन के प्रोटोकॉल हैं।
- यह सबसे धीमी गति (अधिकतम 56 kbps) वाला इंटरनेट कनेक्शन है।
ISDN (Integrated Services Digital Network)
- कॉपर टेलीफोन वायर पर डिजिटल सिग्नल द्वारा इंटरनेट सेवा प्रदान करता है।
- यह एक साथ डाटा एवं वॉयस कम्युनिकेशन सेवा प्रदान करने में सक्षम है।
- यह डायल-अप कनेक्शन से 2 से 3 गुना ज़्यादा गति से इंटरनेट सेवा प्रदान करता है।
DSL (Digital Subscriber Line)
- यह ब्रॉडबैंड कनेक्शन का एक प्रकार है, जो इंटरनेट सेवा हेतु साधारण टेलीफोन लाइन का उपयोग करता है।
- ADSL, SDSL, HDSL, VDSL आदि विभिन्न प्रकार की DSL तकनीक हैं, जिनकी डाटा ट्रांसफर रेट, डाउनलोड एवं अपलोड स्पीड अलग-अलग है।
- संतृप्त वायु (Saturated Air)- वायुमंडल की जलवाष्प धारण करने की क्षमता पूर्णतः तापमान पर निर्भर करती है। एक निश्चित ताप पर वायु, जलवाष्प की निश्चित मात्रा ही ग्रहण कर सकती है। अतः एक निश्चित ताप पर अधिकतम जलवाष्प से युक्त वायु ‘संतृप्त वायु’ तथा यह अवस्था वायु की ‘संतृप्त अवस्था’ कहलाती है।
- आर्द्रता (Humidity)- वायुमंडल में प्रति इकाई आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वायुमंडल में प्रत्येक स्थान पर जलवाष्प की मात्रा सामान नहीं होती। समुद्री स्थानों पर वायुमंडल में जलवाष्प अधिक होता है अर्थात् अधिक होती है। वहीं सूखे और गर्म स्थानों पर आर्द्रता कम होती है।
- सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity)- एक निश्चित ताप पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी ताप पर समान आयतन की वायु को संतृप्त करने के लिये जलवाष्प की आवश्यक मात्रा के अनुपात को ‘सापेक्षिक आर्द्रता’ कहते हैं। सापेक्षिक आर्द्रता तुलनात्मक भौतिक राशि है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। सापेक्षिक आर्द्रता मापने के लिये ‘हाइग्रोमीटर’ का प्रयोग करते हैं।
- भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया एक प्रख्यात इंजीनियर और राजनेता थे। उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उनके योगदान को देखते हुए उन्हें वर्ष 1955 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया था। भारत में उनका जन्मदिन (15 सितंबर) ‘अभियंता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
- उन्होंने दक्षिण भारत में एक जटिल सिंचाई व्यवस्था को कार्यान्वित किया।
- संसाधनों और उच्च तकनीक के अभाव में भी उन्होंने कई परियोजनाओं को सफल बनाया। इनमें प्रमुख थे- कृष्णराज सागर बाँध, मैसूर आयरन एंड स्टील वर्क्स (अब ‘विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील लिमिटेड’ के नाम से जाना जाता है), फेडरेशन ऑफ कर्नाटक चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, मैसूर सैंडल ऑयल एंड सोप फैक्ट्री, मैसूर पेपर मिल्स और स्टेट बैंक ऑफ मैसूर।
- उन्होंने मैसूर के दीवान के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उद्योग में निजी निवेश को प्रोत्साहित किया।
- ध्यातव्य है कि ब्रिटिश सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिये एक समिति बनाई। उनको इस समिति का सदस्य बनाया गया। इसके लिये उन्होंने एक नई ब्लॉक प्रणाली का आविष्कार किया। इसके अंतर्गत उन्होंने स्टील के दरवाज़े बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करते थे। उनकी इस प्रणाली की बहुत तारीफ हुई और आज भी यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है।
- तिरुमला और तिरुपति के बीच सड़क निर्माण के लिये योजना तैयार करने में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
- उन्हें ‘आधुनिक मैसूर राज्य का पिता’ कहा जाता है। उन्होंने ‘भारत का पुनर्निर्माण’ (1920), ‘प्लांड इकॉनमी फॉर इंडिया’ (1934) नामक पुस्तकें लिखीं और भारत के आर्थिक विकास का मार्गदर्शन किया।
प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का ज़मीन या जल में इकट्ठा होना प्लास्टिक प्रदूषण कहलाता है। इससे वन्य जंतुओं या मानवों के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
प्लास्टिक के प्रकार (Types of Plastic)
1. सूक्ष्म प्लास्टिक अथवा माइक्रोबीड्स (Micro Plastic or Microbeads)
- 5 मिमी. या उससे कम आकार की प्लास्टिक के अंश या रेशे सूक्ष्म प्लास्टिक या माइक्रोबीड्स कहलाते हैं।
- इनका निर्माण पॉलिथीन, पॉली प्रोपीलीन, पॉलिथिलीन टेरेफ्थेलेट और नायलॉन से होता है।
- इनका प्रयोग फेशवॉश, बॉडीलोशन, टूथपेस्ट, साबुन, स्क्रब जैसे उत्पादों में होता है। ये अजैवनिम्नीकरणीय होते हैं।
- ये सीवर से बहकर सागरों एवं महासागरों में पहुँच जाते हैं जिससे समुद्री पारितंत्र को खतरा उत्पन्न हो जाता है।
2. दीर्घ प्लास्टिक (Macro Plastic)
- 5 मिली. से अधिक तथा 20 मिली. से कम आकार की प्लास्टिक के अंश दीर्घ प्लास्टिक कहलाते हैं।
- दीर्घ प्लास्टिक के अंश भी समुद्री पारितंत्र के लिये अत्यधिक हानिकारक हैं।
भारत में प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution in India)
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, “हम प्लास्टिक के बम पर बैठे हुए हैं।” ऐसा उच्चतम न्यायलय ने CPCB (Central Pollution Control Board) की रिपोर्ट के आधार पर कहा, जिसमें बताया गया है कि भारत प्रत्येक वर्ष 56 लाख टन प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न करता है जिसमें भारत की राजधानी दिल्ली अकेले 689.5 टन प्लास्टिक उत्पादन के लिये ज़िम्मेदार है।
प्लास्टिक के स्रोत (Sources of Plastic)
- Chips & Confectionary Bags- 18.6%
- Bottles/Caps Lids- 11.9%
- PET Beads- 10%
- Supermarket/Retail Bags- 7.4%
- Straws- 7.0%
- Garbage Bags- 6.7%
- Packaging- 6.7%
- Food Bags- 5.2%
- Cling Wrap- 4.0%
- Fruit Juice Bottles- 3.4%
- Water/Soft Drink Bottles- 2.6%
- Cups/Utensils- 2.2%
- Food Containers- 1.7%
- Milk Bottles- 1.6%
- 6 Pack Rings- 1.4%
- Cigarette- 1.2%
प्लास्टिक प्रदूषण के प्रभाव
प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव मानव, जलीय जीव, भूमि तथा पर्यावरण पर पड़ता है। प्लास्टिक प्रदूषण एक विकत समस्या का रूप धारण करता जा रहा है। समुद्र में प्लास्टिक प्रदूषण के कारण बहुत से जानवरों की मृत्यु हो रही है तथा बहुत-सी प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो रहा है। प्लास्टिक को जलाने पर हानिकारक गैस वातावरण में फैलती हैं।
- पर्यावरण पर प्रभाव- प्लास्टिक मलबा हवा, समुद्री तरंग, व्यापर मार्ग, शहरी क्षेत्र आदि के कारण अत्यधिक बढ़ रहा है।
- भूमि पर प्रभाव- प्लास्टिक प्रदूषण भूमि पर रासायनिक एवं भौतिक दोनों कारणों से होता है। प्लास्टिक भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी करता है क्योंकि यह खनिज, जल, पोषक तत्त्वों के अवशोषण में अवरोधक का कार्य करता है।
- जल एवं वायु पर प्रभाव- प्लास्टिक के दहन से बहुत सी ज़हरीली गैसें वायुमंडल में पहुँचती हैं, जैसे- कार्बन मोनोऑक्साइड, डाइऑक्सीन (Dioxin), हाइड्रोजन साइनाइड। प्रदूषित वायु श्वसन, तंत्रिका-तंत्र तथा इम्यून क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। पानी में प्लास्टिक युक्त कचरा डालने पर यह आसानी से मनुष्य के खाद्यजाल में पहुँच जाता है और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है।
- समुद्री पर्यावरण पर प्रभाव- प्लास्टिक मलबे का प्रभाव समुद्री पारितंत्र पर भी पड़ता है। बहुत से जलीय पक्षी व जंतु प्लास्टिक के अंतर्ग्रहण से मर जाते हैं। पक्षी, कछुए, सील एवं व्हेल आदि द्वारा प्लास्टिक को भोजन समझकर खा लिया जाता है जिससे यह उनके शरीर में अटक जाता है और विषैला प्रभाव डालता है।
- 27 अगस्त, 1947 को प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) को रजिस्टर्ड किया गया तथा 1 फरवरी, 1949 को इसने कार्य करना शुरू किया। यह भारत की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी है।
- इसका मुख्यालय दिल्ली में है। यह अपने इनसेट उपग्रह पर एक ट्रांसपोंडर के ज़रिये समाचार सीधे ग्राहक तक पहुँचाती है और इंटरनेट के माध्यम से अपने ग्राहकों से जुड़ी है।
- यह भारत की गैर-मुनाफे वाली सबसे बड़ी सहकारी संस्था है, जो देश के अख़बारों द्वारा चलाई जाती है। पीटीआई अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी समाचार सेवा भी देती है, जिसे ‘भाषा’ नाम दिया गया है।
- वर्तमान में ज़्यादा-से-ज़्यादा ग्राहक सैटेलाइट के ज़रिये पीटीआई की सेवाएँ प्राप्त कर रहे हैं। देश के कोने-कोने में पीटीआई के लगभग 400 पत्रकार और लगभग 500 स्टिंगर्स प्रत्येक ज़िले एवं छोटे शहर में मौजूद हैं, जो अलग-अलग श्रेणियों में 2000 से ज़्यादा ख़बरें और 200 से ज़्यादा फोटोग्राफ प्रतिदिन प्रदान करते हैं। वर्तमान में भारत में समाचार एजेंसी बाज़ार के 90% हिस्से पर पीटीआई का कब्ज़ा है।
- यह समाचार एजेंसी एशिया के समाचार को पहला स्थान देती है। यह संस्था रॉयटर्स (Reuters), यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल (UPI) और आजांस फ्रांस प्रेस (AFP) के साथ समाचारों का लेन-देन करती है। टेली प्रिंटर सर्विस के अलावा यह एजेंसी कंप्यूटर संगणक की सहायता से भी समाचार देती है।
- पीटीआई ने भारत में समाचार सेवा प्रदान करने के लिये 100 से अधिक देशी एवं विदेशी समाचार एजेंसियों के साथ करार किया है। एशियाई देशों में आर्थिक विकास और व्यापारिक अवसरों के बारे में ऑनलाइन डाटा बैंक के लिये, सूचनाएँ एकत्र करने के लिये पीटीआई और पांच अन्य एशियाई मीडिया संगठनों ने सिंगापुर में ‘एशिया पल्स इंटरनेशनल’ नाम की कंपनी स्थापित की है।
- एशिया-प्रशांत क्षेत्र की 12 समाचार एजेंसियों ने एक सहकारी व्यवस्था बनाई है, जिसका नाम ‘एशियानेट’ है। पीटीआई एक संस्था में सहभागी अंग है।
- मृदामंडल में उपस्थित जल की मात्रा तथा उसकी गुणवत्ता उसमें रहने वाले पौधों तथा जंतुओं को प्रभावित करती है। यह मृदा में स्थित पोषक तत्त्वों को घोलकर मृदा घोल (Soil Solution) बनाने में मदद करता है।
- मृदा में स्थित जल की मात्रा का निर्धारण, जलवर्षा तथा हिमद्रवित जल के मृदा में अंतःसंचरण (Infiltration) की दर तथा मृदा की जलधारण करने की क्षमता (Water Retention Capacity) के आधार पर किया जाता है।
- मृदा के आयतन के संदर्भ में स्थित जल की मात्रा के आधार पर मृदा में ठोस पदार्थों, जल तथा वायु के अनुपातों की तीन दशाओं का निर्धारण इस प्रकार किया गया है-
- संतृप्त अवस्था (Saturated Stage)- इस अवस्था में मृदा में स्थित खाली स्थान जल से भरे होते हैं एवं ऐसी मिट्टी अतिरिक्त जल की मात्रा नहीं सोख पाती है।
- भूमि क्षमता अवस्था (Field Capacity Stage)- जब मृदा में स्थित कुल खाली स्थानों का 50% जल द्वारा तथा शेष 50% भाग वायु द्वारा भरा होता है तो यह भूमि क्षमता अवस्था कहलाती है।
- म्लान अवस्था (Wilting Stage)- जब मृदा में वाष्पीकरण एवं पौधों द्वारा मृदा-जल को ग्रहण करने के बाद जल का अभाव हो जाता है तो यह म्लान अवस्था कहलाती है। इस अवस्था में पौधे जल के अभाव में मुरझा जाते हैं।
- संयुक्त अवस्था एवं म्लान अवस्था दोनों ही मृदा जीवों तथा पौधों के लिये प्रतिकूल होती हैं। इस प्रकार भूमि क्षमता अवस्था तथा म्लान अवस्था के बीच की स्थिति मृदा स्थित पौधों तथा जंतुओं के लिये सर्वाधिक अनुकूल होती है।
- मृदा में पाया जाने वाला जल निम्नलिखित प्रकार का होता है-
- गुरुत्वीय जल (Gravitational Water)- वर्षा के बाद मृदा के धरातलीय परत के तात्कालिक रूप से संतृप्त होने के पश्चात् यह जल गुरुत्वाकर्षण के कारण काफी गहराई अथवा भूमि जल स्तर तक पहुँच जाता है, इसे गुरुत्वीय जल कहते हैं। इस जल को पौधे अपनी जड़ों द्वारा प्राप्त नहीं कर पाते।
- केशिका जल (Capillary Water)- जब धरातलीय जल मृदा की ऊपरी सतह से रिस कर नीचे आता है तब वह पीछे पर्याप्त मात्रा में मिट्टी के कणों के बीच के रिक्त स्थानों में नमी छोड़ आता है, जो केशिका जल कहलाता है। यह पृष्ठ तनाव बलों (Surface Tension Forces) द्वारा बरकरार बने रहता है तथा गुरुत्व खिंचाव से प्रभावित नहीं होता। यह जल पौधों की जड़ों द्वारा आसानी से अवशोषण हेतु उपलब्ध होता है।
- आर्द्रता जल (Hygroscopic Water)- मिट्टी कणों के चारों तरफ पतली वाष्पीय परत के रूप में मृदा द्वारा कसकर पकड़े हुए जल को आर्द्रता जल कहते हैं। इस जल को भी पौधे जड़ों द्वारा अवशोषित नहीं करते।
- रसायन युक्त या रवे का जल (Chemically or Crystalline Combined Water)- जो जल मृदा खनिजों की संरचना में रासायनिक रूप से संबद्ध रहता है उसे रसायन युक्त या रवे का जल कहते हैं। यह जल भी पौधों को प्राप्त नहीं हो पाता है।
ये दोनों तरह के कार्बन, कार्बन सिंक की भूमिका निभाते हैं। काले एवं भूरे कार्बन से अलग ग्रीन एवं ब्लू कार्बन वातावरण से हरित गृह गैसों के अधिग्रहण (Sequestration) का कार्य करते हैं।
- ग्रीन कार्बन (Green Carbon)- प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा वातावरण के CO2 से जो कार्बन निकलकर पौधों एवं मिट्टी में संगृहीत हो जाता है, ग्रीन कार्बन कहलाता है। यह वैश्विक कार्बन चक्र का जीवंत भाग है। पौधों एवं फसलों में यह कार्बन लघु जीवन अवधि के कारण थोड़े समय के लिये रहता है एवं कुछ समय बाद वे इस कार्बन को मुक्त कर देते हैं परंतु वन के बायोमास इस कार्बन को कई सदियों तक संचित किये रहते हैं।
- ब्लू कार्बन (Blue Carbon)- वायुमंडलीय कार्बन जब तटीय एवं समुद्री पारितंत्रों के मैंग्रोव वन, समुद्री घास बेडों एवं अंतर्ज्वारीय लवण दलदलों में जमा हो जाते हैं तो वह कार्बन, ब्लू कार्बन कहलाने लगता है। ये बहुमूल्य पारितंत्र एक जटिल कार्बन भंडार को एकत्रित किये रहते हैं। वे वातावरणीय CO2 को प्राथमिक उत्पादक के द्वारा अधिग्रहीत कर फिर उन्हें अवसादों में जमा कर देते हैं।
- UNEP द्वारा वर्ष 2009 में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 55% वातावरणीय कार्बन को समुद्र के द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। इसका 50-71% समुद्री वनस्पति द्वारा ग्रहण किया जाता है। ये समुद्री वनस्पति ही ब्लू कार्बन आवास (Blue Carbon Habitat) कहलाए, जिनमें मैंग्रोव, लवणीय दलदल (Salt Marshes), समुद्री घास (Sea Grass) एवं समुद्री खरपतवार (Sea Weeds) आते हैं, जो कि समुद्र नितल (Sea Bed) का 0.5% से भी कम आच्छादन करते हैं एवं ये विश्व के जलवायु परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। UNEP की इस रिपोर्ट के बाद IUCN, विश्व बैंक जैसे संस्थानों की भी इससे संबंधित रिपोर्ट आई। उसके बाद UNEP की पहल से ब्लू कार्बन पहल (Blue Carbon Initiative) शुरू की गई।
- ध्वनि की चाल (Speedof Sound) वह गति है जिससे ध्वनि किसी माध्यम में संचरित होती है। यह माध्यम की प्रकृति, तापमान तथा अन्य भौतिक गुणों पर निर्भर करती है।
- मैक संख्या (MachNumber) किसी पिंड की चाल तथा उसी माध्यम में ध्वनि की चाल के अनुपात को दर्शाती है।
- मैक संख्या का नामऑस्ट्रियाईभौतिक विज्ञानी एर्न्स्ट मैक (Ernst Mach) के सम्मान में रखा गया है।
- मैक संख्या का सूत्र है—
मैक संख्या = पिंड की चाल ÷ माध्यम में ध्वनि की चाल - यदि किसी पिंड की चाल1मैक से कम होती है, तो उसे उपध्वनिक चाल (Subsonic Speed) कहा जाता है।
- जब किसी पिंड की चाल1मैक के बराबर होती है, तो उसे ध्वनिक चाल (Sonic Speed) कहा जाता है।
- यदि किसी पिंड की चाल1मैक से अधिक होती है, तो उसे पराध्वनिक चाल (Supersonic Speed) कहा जाता है। लड़ाकू विमान एवं कुछ मिसाइलें इसका उदाहरण हैं।
- जब किसी पिंड की चाल5मैक या उससे अधिक होती है, तो उसे अति-पराध्वनिक चाल (Hypersonic Speed) कहा जाता है। हाइपरसोनिक मिसाइलें तथा वायुमंडल में प्रवेश करते अंतरिक्ष यान इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- पराध्वनिकगति से गतिमान पिंड अपने आगे वायु को तीव्रता से संपीड़ित करता है, जिससे प्रघाती तरंगें (Shock Waves) उत्पन्न होती हैं।
- प्रघातीतरंगें उच्च दाब एवं उच्च ऊर्जा वाली तरंगें होती हैं, जिनमें वायु के दाब एवं घनत्व में अचानक परिवर्तन होता है।
- जब कोई पिंड ध्वनि की चाल को पार करता है, तो उत्पन्न तीव्र ध्वनि कोध्वनिबूम (Sonic Boom) कहा जाता है। यह विस्फोट जैसी तेज आवाज़ के रूप में सुनाई देती है।
- ध्वनिबूमके कारण इमारतों के काँच टूट सकते हैं, कंपन उत्पन्न हो सकते हैं तथा आसपास के वातावरण पर प्रभाव पड़ सकता है।
- मैक संख्या का उपयोग वायुयान, मिसाइल, रॉकेट तथा अंतरिक्ष यानों की गति एवं प्रदर्शन का अध्ययन करने में किया जाता है।
- वायुगतिकी(Aerodynamics) में मैक संख्या एवं प्रघाती तरंगों का अध्ययन तेज गति वाले यानों के सुरक्षित एवं दक्ष डिजाइन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- ध्वनि की चाल, मैक संख्या तथाप्रघातीतरंगें आधुनिक भौतिकी, विमानन विज्ञान, रक्षा प्रौद्योगिकी एवं अंतरिक्ष विज्ञान के महत्वपूर्ण विषय हैं।
पृथ्वी के धरातल पर समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन बाह्य बलों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के परस्पर प्रभाव को समझने का अवसर प्रदान करता है। बाह्य या बहिर्जात बल, जो मुख्य रूप से जल, वायु, हिम और भूमिगत जल द्वारा संचालित होते हैं, परिदृश्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये बल सौर ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण द्वारा प्रेरित होते हैं और अपरदन, परिवहन, एवं निक्षेपण के माध्यम से सतह को निरंतर बदलते रहते हैं। इन प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से समझने के लिये, हम उन्हें दो भागों में बाँट सकते हैं : अपरदनात्मक स्थलरूप और निक्षेपात्मक स्थलरूप :
- अपरदनात्मक स्थलरूप
अपरदनात्मक बल पृथ्वी की सतह से सामग्री को हटाने के लिये अपघर्षण, घुलन, सन्निघर्षण और उत्पाटन जैसी प्रक्रियाओं का उपयोग करते हैं। विभिन्न अपरदन कारकों द्वारा निर्मित स्थलरूप इस प्रकार हैं :
- बहता हुआ जल :
- ‘V’ आकार की घाटियाँ : नदियों के युवा चरण में निर्मित।
- गॉर्ज और कैनयन : निरंतर नदी अपरदन से निर्मित गहरी घाटियाँ।
- जलप्रपात एवं क्षिप्रिका : चट्टानों की भिन्न कठोरता के कारण बनते हैं।
- हिमानी (ग्लेशियर) :
- ‘U’ आकार की घाटियाँ : ग्लेशियरों द्वारा निर्मित चौड़ी घाटियाँ।
- लटकती घाटियाँ : सहायक ग्लेशियरों द्वारा निर्मित।
- सर्क : हिमानी सिरों पर निर्मित कटोरे जैसी आकृतियाँ।
- पवन :
- इंसेलबर्ग : शुष्क क्षेत्रों में स्थित एकल चट्टानें।
- मशरूम रॉक : पवन अपरदन से बनी छत्रक शिलाएं।
- यारडांग : रेगिस्तानी पवन द्वारा निर्मित समांतर शैल संरचनाएं।
- सागरीय जल :
- तटीय चट्टानें : लहरों के अपरदन से निर्मित।
- सागरीय कंदराएँ एवं मेहराब : निरंतर जल क्रिया से निर्मित।
- भूमिगत जल :
- डोलाइन : घुलन प्रक्रिया से बनी गड्ढेनुमा संरचनाएं।
- कार्स्ट घाटियाँ : चूना पत्थर क्षेत्रों में भूमिगत जल द्वारा निर्मित स्थलरूप।
बाह्य बलों की गतिविधियां धरातल के सतत परिवर्तन का सशक्त प्रमाण हैं। अपरदनात्मक प्रक्रियाएँ स्थलस्वरूपों का क्षरण करती हैं, जबकि निक्षेपात्मक प्रक्रियाएँ नई आकृतियाँ निर्मित करती हैं। इन गतिशील बलों का अध्ययन पृथ्वी की प्राकृतिक सुंदरता और जटिलता को समझने में सहायक है।
- तारे का जन्म नेबुला (जो कि गैस एवं धूल कणों के विशाल बादल होते हैं) से होता है।
- नेबुला में उपस्थित गैसें एवं धूल कण परस्पर गुरुत्वाकर्षण के कारण संकेंद्रित होकर तीव्र गति से केंद्र के परित घूमने लगते हैं। परिणामस्वरूप अत्यधिक दाब एवं ताप उत्पन्न होता है जिससे नाभिकीय संलयन की अभिक्रिया शुरू हो जाती है तथा तारे का जन्म होता है।
- जब तारे के केंद्र में हाइड्रोजन समाप्त होने लगता है तो कोर में मौजूद पदार्थ संकुचित होता है जिससे तापमान एवं दबाव में अत्यधिक वृद्धि होती है। यह दबाव तारे के बाह्य आवरण पर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव को कम कर देता है। परिणामस्वरूप तारे का बाह्य आवरण अत्यधिक फैल जाता है तथा संपूर्ण तारा अत्यधिक विशाल तथा लाल रंग का दिखाई देने लगता है, जिसे लाल दानव (Red Giant) कहते हैं।
- कम द्रव्यमान के तारे (जैसा कि सूर्य है) के कोर में मौजूद हीलियम, कार्बन में परिवर्तित होने लगता है तथा कोर सिकुड़कर छोटा हो जाता है। जबकि तारे का बाह्य आवरण बाहर की ओर धकेल दिया जाता है। तारे का कोर अपनी नाभिकीय ऊर्जा को खोकर श्वेत वामन (White Dwarf) में तथा श्वेत वामन धीरे-धीरे ठंडा होकर काला वामन (Black Dwarf) में बदल जाता है।
- ऐसे तारों के केंद्र में जिनका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के पांच गुना या उससे भी अधिक होता है, जब हाइड्रोजन समाप्त हो जाती है तो वे लाल महादानव तारों में बदल जाते हैं।
- इन विशाल लाल महादानव तारों के कोर में इतना अधिक दबाव होता है कि इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन मिलकर न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं तथा अति सघन कोर को जन्म देते हैं। सुपरनोवा विस्फोट के बाद भी ये कोर बचे रह जाते हैं और न्यूट्रॉन तारे के रूप में जाने जाते हैं।
- कुछ न्यूट्रॉन तारे तीव्र गति से घूर्णन करते हैं तथा X-किरणों एवं गामा किरणों का उत्सर्जन करते हैं। इन न्यूट्रॉन तारों को ‘पल्सर’ कहते हैं।
- यदि आरंभिक तारा अत्यधिक विशाल (सूर्य के द्रव्यमान अर्थात् Ms का लगभग 15 गुना से अधिक) हो तो यह न्यूट्रॉन तारा भी स्थिर नहीं रह पाता तथा ‘ब्लैक होल’ को जन्म देता है। सुपरनोवा विस्फोट के बाद यदि शेष बचे तारों (कोर) का द्रव्यमान 1.4Ms से 3Ms के बीच हो तो ये न्यूट्रॉन तारे की अवस्था में रहेंगे परंतु यदि इनका द्रव्यमान 3Ms से अधिक हो तो ये न्यूट्रॉन तारे भी स्थायी नहीं रहेंगे। अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण के कारण कोर अपने ही गुरुत्व द्वारा निगल लिया जाता है तथा ब्लैक होल का जन्म होता है।
- 1.4Ms अर्थात् सूर्य के द्रव्यमान के लगभग 1.4 गुना द्रव्यमान को चंद्रशेखर सीमा कहते हैं। यह किसी भी स्थायी श्वेत बौने तारे के द्रव्यमान की अधिकतम संभावित सीमा है।
यहाँ भारत में विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित प्रथम पुरुष व्यक्तित्वों की सूची दी गई है। इन महान व्यक्तियों ने भारतीय प्रशासन, राजनीति, न्यायपालिका, सैन्य और लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव रखी और देश के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई।
- भारत में प्रथम (पुरुष) – तथ्यात्मक जानकारी
- भारत का प्रथम मुख्य न्यायाधीश – जस्टिस हीरालाल जे. कानिया
- स्वतंत्र भारत में जन्मे प्रथम मुख्य न्यायाधीश (29 सितम्बर, 1947) – न्यायमूर्ति सरोश होमी
- अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में प्रथम भारतीय न्यायाधीश – डॉ. नागेन्द्र सिंह
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष – व्योमेशचन्द्र बनर्जी
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष – बदरुद्दीन तैयबजी
- कांग्रेस के अधिवेशन में स्वतंत्रता का प्रस्ताव पेश करने वाले प्रथम व्यक्ति – हसरत मोहानी
- नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय – रवीन्द्रनाथ ठाकुर
- भारत के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक (भौतिकी) – सी. वी. रमन
- रैमॉन मैग्सेसे पुरस्कार पाने वाले प्रथम भारतीय – आचार्य विनोबा भावे
- स्टालिन पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय – सैफुद्दीन किचलू
- गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड जीतने वाले प्रथम भारतीय – ए. आर. रहमान
- भारत रत्न से सम्मानित होने वाले प्रथम भारतीय – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
- भारत रत्न से सम्मानित प्रथम विदेशी नागरिक – खान अब्दुल गफ्फार खान
- ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रथम व्यक्ति – श्रीशंकर कुरुप
- आई.सी.एस. में सफल होने वाले प्रथम भारतीय – सत्येन्द्र नाथ टैगोर
- अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय – राकेश शर्मा
- इंग्लिश चैनल पार करने वाले प्रथम भारतीय – मिहिर सेन
- पाक स्ट्रेट तैराकी प्रतियोगिता जीतने वाले प्रथम भारतीय – वैधनाथ
- बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचने वाले प्रथम भारतीय – शेरपा अंग दोरजी
- भारत का भ्रमण करने वाले प्रथम चीनी यात्री – फाहियान
ये सभी महान व्यक्तित्व भारतीय लोकतंत्र, प्रशासन, न्यायपालिका और सैन्य संरचना की नींव रखने वाले स्तंभ रहे हैं। इन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाकर राष्ट्र की दिशा और दशा तय की। इनकी जानकारी न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिये आवश्यक है, बल्कि यह भारत के गौरवशाली इतिहास, संवैधानिक विकास और राष्ट्र निर्माण की गहरी समझ प्रदान करती है। ऐसे प्रेरक उदाहरण हमें देशभक्ति, नेतृत्व और उत्तरदायित्व की भावना से ओत-प्रोत करते हैं।
यहाँ भारत में विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित प्रथम पुरुष व्यक्तित्वों की सूची दी गई है। इन महान व्यक्तियों ने भारतीय प्रशासन, राजनीति, न्यायपालिका, सैन्य और लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव रखी और देश के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई।
- भारत में प्रथम (पुरुष) – तथ्यात्मक जानकारी
- भारत का प्रथम गवर्नर जनरल – लॉर्ड विलियम बेंटिक
- भारत का अंतिम गवर्नर जनरल एवं प्रथम वायसराय – लॉर्ड कैनिंग
- भारत का अंतिम वायसराय – लॉर्ड माउंटबेटन
- स्वतंत्र भारत का प्रथम गवर्नर जनरल – लॉर्ड माउंटबेटन
- भारत का प्रथम (एवं अंतिम भारतीय) गवर्नर जनरल – चक्रवर्ती राजगोपालाचारी
- भारत का प्रथम राष्ट्रपति – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
- भारत का प्रथम मुस्लिम राष्ट्रपति – डॉ. जाकिर हुसैन
- भारत का प्रथम उपराष्ट्रपति – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
- भारत का प्रथम प्रधानमंत्री – पंडित जवाहरलाल नेहरू
- भारत का प्रथम उप-प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री – सरदार वल्लभभाई पटेल
- भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री – मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
- भारत का प्रथम संचार मंत्री एवं विदेशों में रेडियो सेवा देने वाले मंत्री – रणजी राम (1950)
- भारत का प्रथम वकील – राम प्रसाद मुखर्जी
- भारत का प्रथम मुख्य न्यायाधीश (CJI) – न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया
- भारत का प्रथम चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ – जनरल राजेन्द्र सिंहजी
- स्वतंत्र भारत का प्रथम कमांडर-इन-चीफ – जनरल के. एम. करिअप्पा
- भारत का प्रथम फील्ड मार्शल – फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ
- भारत का प्रथम विदेश मंत्री – पंडित जवाहरलाल नेहरू
- भारत की प्रथम लोकसभा के अध्यक्ष – गणेश वासुदेव मावलंकर
- भारत का प्रथम मुख्य चुनाव आयुक्त – सुकुमार सेन
ये सभी महान व्यक्तित्व भारतीय लोकतंत्र, प्रशासन, न्यायपालिका और सैन्य संरचना की नींव रखने वाले स्तंभ रहे हैं। इन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाकर राष्ट्र की दिशा और दशा तय की। इनकी जानकारी न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिये आवश्यक है, बल्कि यह भारत के गौरवशाली इतिहास, संवैधानिक विकास और राष्ट्र निर्माण की गहरी समझ प्रदान करती है। ऐसे प्रेरक उदाहरण हमें देशभक्ति, नेतृत्व और उत्तरदायित्व की भावना से ओत-प्रोत करते हैं।
- किसानों के मित्र कहे जाने वाले केंचुए की एक प्रजाति लाल केंचुए/लाल कृमि (Red Worm) की सहायता से कंपोस्ट बनाने की विधि ‘वर्मीकंपोस्टिंग’ कहलाती है।
- मिट्टी में गड्ढे खोदकर अथवा लकड़ी के बक्से में वर्मीकंपोस्ट तैयार किया जा सकता है।
- गड्ढे अथवा बक्से की तली में एक जाल अथवा 1-2 सेमी. रेत बिछाकर उस पर सब्ज़ियों या फलों का अपशिष्ट बिछाया जाता है। विकल्प के तौर पर जाल अथवा रेत पर हरी पत्तियां, पौधों की सूखी डंडियों के टुकड़े, भूसा अथवा समाचार पत्र/गत्ते की 1 इंच चौड़ी पट्टियाँ अथवा सूखा गोबर भी बिछाया जा सकता है।
- थोड़ा जल छिड़क कर अपशिष्ट की परत को नम कर लिया जाता है। अब वहां कुछ लाल केंचुए डालकर उनके ऊपर जूट की बोरी, पुरानी चादर अथवा घासें डाल दी जाती हैं।
- तत्पश्चात् केंचुए के भोजन के लिये सब्ज़ियों या फलों का अपशिष्ट, चाय छानने के बाद बची हुई पत्तियों एवं खरपतवार की 2-3 सेमी. परत बिछाई जाती है।
- केंचुए को रोगकारक जीव उत्पन्न करने वाले नमक, अचार, तेल, सिरका, मांस एवं दूध से निर्मित अपशिष्ट पदार्थ भोजन के रूप में नहीं देना चाहिये। कुछ दिनों के अंतराल पर गड्ढे के पदार्थों को धीरे-धीरे मिलाते रहना चाहिये।
- लाल केंचुए में ‘गिजर्ड’ नामक संरचना भोजन को पीसने में इनकी सहायता करती है। अतः अंडे के छिलके अथवा समुद्री शंख या सीपी का चूरा आहार में मिला देने पर यह केंचुए के गिजर्ड में जाकर भोजन को पीसने में उसकी सहायता करता है।
- लाल केंचुआ एक दिन में अपने शरीर के भार के के बराबर आहार खा सकते हैं। ये बहुत गर्म अथवा अति ठंडे वातावरण में जीवित नहीं रहते। एक मास में इनकी संख्या दुगनी हो जाती है।
- अब गड्ढे में मिट्टी जैसा दिखने वाला पोला पदार्थ वर्मीकंपोस्ट के रूप में तैयार है जिसे निकाल कर कुछ घंटों तक इसे धूप में सुखा लिया जाता है।
- गड्ढे से वर्मीकंपोस्ट निकालने से पूर्व गड्ढे के एक किनारे पर कुछ आहार डाल देते हैं ताकि सभी लाल केंचुए इस भाग में स्थानांतरित हो जाएँ और उनसे पुनः खाद बनाने का कार्य करवाया जा सके।
मैंग्रोव वनों के भौगोलिक वितरण को नियंत्रित करने वाला मुख्य कारक वहां का तापमान है। विषुवत रेखा के आस-पास के क्षेत्रों में जहाँ जलवायु गर्म और नम होती है, वहां मैंग्रोव वनस्पतियों की लगभग सभी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। मैंग्रोव वनस्पति विश्व के लगभग 123 देशों में पाई जाती है, जिनमें से अधिकतर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में स्थित हैं। विश्व का लगभग 40% मैंग्रोव कवर दक्षिण-पूर्व एशिया व दक्षिण एशिया में मौजूद है। विश्व में पाए जाने वाले 4 मुख्य प्रकार के मैंग्रोव पौधों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
- लाल मैंग्रोव (Red Mangroves)- लाल मैंग्रोव की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जो बहुत अधिक खारे पानी को सहन करने की क्षमता रखते हैं तथा समुद्र के नज़दीक उगते हैं। इनमें भी अन्य मैंग्रोव पौधों की तरह विशेष रूपांतरित जड़ें होती हैं जो तने के निचले भाग से निकलकर धरती तक पहुँचती हैं और पौधे को स्थिरता प्रदान करती हैं। इसलिये इन्हें स्थिर जड़ें कहते हैं। ये जड़ें पौधे को ऐसे स्थान पर उगने की क्षमता प्रदान करती हैं जहाँ भूमि में ऑक्सीजन कम होती है। इन्हीं जड़ों से पौधे वातावरण से हवा का आदान-प्रदान व भूमि से पोषक तत्त्वों को प्राप्त करते हैं।
- काले मैंग्रोव (Black Mangroves)- काले मैंग्रोव वनस्पति (कच्छ वनस्पति) की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जिनकी खारे पानी को सहने की क्षमता अधिक होती है। इन पौधों में विशेष प्रकार की श्वसन जड़ें पाई जाती हैं जो दलदल में उगने वाले पौधों में देखी जाती हैं। इन जड़ों में गैसों के आदान-प्रदान के लिये विशेष प्रकार की संरचनाएँ होती हैं जिन्हें वातरंध्र (लैंटिकल्स) कहते हैं। इनमें हवा का प्रवेश वायवमूलों (न्यूमेटोफोर्स) से होता है।
- सफेद मैंग्रोव (White Mangroves)- सफेद मैंग्रोव का नाम इनकी चिकनी सफेद छाल के कारण पड़ा है। इन पौधों को इनकी जड़ों तथा पत्तियों की विशेष प्रकार की बनावट के कारण अलग से पहचाना जाता है।
- बटनवुड मैंग्रोव (Buttonwood Mangroves)- ये झाड़ी के आकार के पौधे होते हैं तथा इनका यह नाम इनके लाल-भूरे रंग के तिकोने फलों के कारण है। यह सफेद मैंग्रोव के परिवार के ही अंग हैं एवं कुछ वैज्ञानिक इसे वास्तविक मैंग्रोव नहीं मानते।
तेभागा आंदोलन बंगाल प्रांत में 1946–47 के दौरान चला एक महत्त्वपूर्ण किसान आंदोलन था, जिसका नेतृत्व बंगाल प्रांतीय कृषक सभा के कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने किया था। यह आंदोलन बटाईदार किसानों (बरगादारों) द्वारा भूमि उपज में अपने हिस्से को बढ़ाने की माँग के लिये प्रारंभ किया गया था।
मांग और पृष्ठभूमि:
परंपरागत रूप से, बंगाल के बटाईदार किसान भूमि की उपज का आधा हिस्सा (पचास प्रतिशत) जमींदारों को देते थे। किंतु आंदोलन का मुख्य उद्देश्य यह था कि बटाईदारों को उपज का दो-तिहाई (2/3) हिस्सा मिले और जमींदारों को केवल एक-तिहाई (1/3) हिस्सा दिया जाये। ‘तेभागा’ शब्द का अर्थ ही है – फसल के तीन हिस्से। इस आंदोलन के नेता कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) से जुड़े कार्यकर्ता थे, जिनमें किरण शंकर रॉय, हेमंत घोष, इला मित्रा जैसे नाम प्रमुख थे।
आंदोलन का स्वरूप:
तेभागा आंदोलन पूरी तरह संगठित और जन-आधारित था। इसमें किसानों ने जमींदारों के गोदामों से अनाज निकालकर अपने घरों में रख लिया और सरकारी दमन का विरोध किया। उन्होंने नारा दिया – “जमींदारी प्रथा का पूर्ण उन्मूलन हो।” आंदोलन ने ग्रामीण बंगाल में व्यापक सामाजिक जागरूकता फैलाई और जमींदारी विरोधी चेतना को बल दिया।
परिणाम और प्रभाव:
सरकारी दमन और पुलिस कार्रवाई के बावजूद आंदोलन का प्रभाव उल्लेखनीय रहा। अनुमानतः लगभग 40% बटाईदार किसानों को भूस्वामियों द्वारा स्वेच्छा से तेभागा अधिकार प्राप्त हुए। इससे अन्यायपूर्ण वसूली और जमींदारों की मनमानी में कमी आई। हालाँकि, पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के जिलों में इसकी सफलता सीमित रही, लेकिन आंदोलन ने आगे चलकर भूमि सुधार नीतियों और कृषक अधिकारों की नींव रखी।
तथ्य: तेभागा आंदोलन की स्मृति में 1947 में बंगाल सरकार ने “बर्गा कानून” लागू करने की सिफारिश की थी, जो बाद में भूमि सुधार नीतियों का आधार बना।
खेड़ा सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर था। यह आंदोलन 1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में हुआ था। उस समय क्षेत्र में लगातार सूखा और फसल की बर्बादी हुई थी। 1917-18 की खराब फसल के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो गयी थी। इसके बावजूद ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने करों में कोई छूट नहीं दी और पूर्ण राजस्व वसूली पर अड़ी रही।
महात्मा गांधी, जिन्होंने पहले ही चंपारण आंदोलन के माध्यम से किसानों की आवाज़ बुलंद की थी, ने गुजरात सभा के मंच से किसानों की समस्या को उठाया। जब सरकार ने कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया, तब गांधीजी ने सत्याग्रह का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया। मोहनलाल कामेश्वर पंड्या, सरदार वल्लभभाई पटेल, नरहरि परिख, इंद्रलाल यादव और रविशंकर व्यास जैसे स्थानीय नेताओं ने इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
सत्याग्रह का उद्देश्य यह था कि किसान कर न चुकाएँ जब तक सरकार फसल की विफलता को स्वीकार कर राहत न दे। आंदोलन मुख्यतः अहिंसक था, परंतु कुछ स्थानों पर हिंसा की घटनाएँ भी हुईं। गांधीजी ने तुरंत किसानों को संयम बरतने का संदेश दिया।
ब्रिटिश सरकार ने प्रारंभ में कठोर रुख अपनाया और अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। किंतु अंततः जब आंदोलन की व्यापकता और किसानों की एकजुटता सामने आई, तो सरकार को झुकना पड़ा। उसने राजस्व वसूली में ढील देने और भूमि की जब्ती रोकने के आदेश दिये।
खेड़ा सत्याग्रह ने भारतीय किसानों को आत्मसम्मान और अधिकारों के लिये संघर्ष का मार्ग दिखाया। यह गांधीजी की सत्य और अहिंसा पर आधारित नीति की एक बड़ी सफलता थी, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की नींव और अधिक सुदृढ़ की।
मौसम में परिवर्तन एवं प्रतिकूल दशाओं (Adverse Condition) के कारण पक्षी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं। कुछ पक्षियों की यह प्रवृत्ति होती है कि प्रतिकूल स्थिति में वे अपना स्थान बदलकर अनुकूल स्थिति वाले क्षेत्रों में पलायन कर जाते हैं और स्थिति के ठीक होने पर मूल स्थान पर लौट आते हैं। ये हज़ारों किमी. दूर तक प्रवास कर जाते हैं। कुछ पक्षी ग्रीष्म ऋतु में तो कुछ शीत ऋतु में प्रवास करते हैं।
प्रवास के कारण (Reasons for Migration)
- प्रतिकूल जलवायु दशाओं के कारण।
- भोजन तथा पानी में कमी होने पर उसकी पूर्ति के लिये आवास परिवर्तन।
- प्रजनन तथा स्वास्थ्य दशाओं के लिये।
- घोंसलों को अतिक्रमणकारी जंतुओं से बचाने के लिये।
शीत ऋतु में प्रवास करने वाले पक्षी
साइबेरियन क्रेन (Siberian Crane), ग्रेटर फ्लेमिंगो (Greater Flamingo), यूरेशियन टील (Eurasian Teal), पीली वागटेल (Yellow Wagtail), सफेद वागटेल (White Wagtail), उत्तरी शॉवेलर (Northern Shoveler), रोज़ी पेलिकन (Rosy Pelican), वुड सैंडपाइपर (Wood Sandpiper), चित्तीदार सैंडपाइपर (Spotted Sandpiper), यूरेशियन कबूतर (Eurasian Pigeon)।
ग्रीष्म ऋतु में प्रवास करने वाले पक्षी
एशियाई कोयल, यूरोपियन सुनहरी ओरियोल, कॉम्ब डक (Comb Duck), कूकूस (Cuckoos), नीली पूँछ वाली मक्खी भक्षी (Blue Tail Bee-eater)।
- कोई भी चीज जिसे डिजिटल रूप में बदला जा सकता है वह NFTs हो सकती हैं।
- ड्राइंग, फोटो, वीडियो, GIF, संगीत, इन-गेम आइटम, सेल्फी और यहाँ तक कि एक ट्वीट, सबकुछ एक NFT में बदला जा सकता है, जिससे बाद में क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग करके ऑनलाइन कारोबार किया जा सकता है।
- अगर कोई व्यक्ति अपनी डिजिटल संपत्ति को NFTs में परिवर्तित करता है, तो उसे ब्लॉकचैन द्वारा संचालित स्वामित्व का प्रमाण मिलेगा।
- NFTs नॉन-फंजिबल टोकेंस हैं, जिसका अर्थ है कि एक NFT का मूल्य दूसरे के बराबर नहीं है।
- नॉन-फंजिबल का अर्थ है कि NFT परस्पर विनिमेय नहीं हैं। प्रत्येक NFT की UNIQUE पहचान होती है, जो इसे नॉन-फंजिबल और अद्वितीय बनाती है।
प्रकाश के स्रोतों को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त किया गया है-
प्रकाश के प्राकृतिक स्रोत (Natural Sources of Light)
प्रकाश के प्राकृतिक स्रोतों में प्रकृति प्रदत्त वैसी वस्तुएँ आती हैं जिनसे प्रकाश स्वतः स्फूर्त होता है। नीचे प्रकाश के कुछ प्रमुख प्राकृतिक स्रोतों का वर्णन किया जा रहा है-
- सूर्य (Sun)- सूर्य प्रकाश का प्राथमिक स्रोत है। यह परमाणु संलयन के माध्यम से बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करता है, जिसके परिणामस्वरूप हमें ऊष्मा और प्रकाश की प्राप्ति होती है।
- तारे (Stars)- तारों में अपना प्रकाश होता है किंतु पृथ्वी से अत्यधिक दूर होने के कारण हमें ये प्रकाश बिंदु स्रोत के रूप में टिमटिमाते हुए दिखाई देते हैं। हालाँकि सूर्य भी एक तारा ही है पर पृथ्वी से अपेक्षाकृत नज़दीक होने के कारण हमें यह बड़ा नज़र आता है।
- चंद्रमा (Moon)- यह पृथ्वी का एक उपग्रह है। इसमें अपना प्रकाश नहीं होता और यह सूर्य के प्रकाश से चमकता है।
- तड़ित और ज्वालामुखी विस्फोट (Lightning and Volcanic Eruptions)- तड़ित या आकाशीय बिजली और ज्वालामुखी विस्फोट जैसी प्राकृतिक परिघटनाओं से भी ऊर्जा और प्रकाश का उत्सर्जन होता है।
- जैव प्रकाश (Bioluminescence)- कुछ जीव अपने शरीर के अंदर होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं के द्वारा प्रकाश का उत्सर्जन करते हैं, जैसे- जुगनू, जेलीफिश तथा कुछ चमकने वाले कीड़े।
प्रकाश के कृत्रिम स्रोत (Artificial Sources of Light)
कृत्रिम प्रकाश स्रोतों को निम्नलिखित भागों में विभक्त किया जा सकता है-
- तापदीप्त स्रोत (Incandescent Sources)- प्रकाश के ऐसे कृत्रिम स्रोतों को अग्नि प्रज्वलित करके अथवा विद्युत से जोड़कर उस तापमान तक गर्म किया जाता है जिस पर वे प्रकाश उत्पन्न करने लगें। इन्हें गर्म करने पर इनके सभी परमाणुओं में कंपन होता है और ये गर्म होकर विद्युत चुंबकीय विकिरण उत्सर्जित करते हैं। ये कम तापमान पर फोटॉन के रूप में अवरक्त विकिरण और अधिक तापमान पर दृश्य प्रकाश उत्पन्न करते हैं। अग्नि प्रज्वलित लकड़ियाँ, जलती मोमबत्तियां, प्रकाश बल्ब आदि इनके उदाहरण हैं।
- प्रकाशमान स्रोत (Luminous Sources)- प्रकाश के तापदीप्त स्रोत से अलग इसमें सभी परमाणुओं की जगह सिर्फ इलेक्ट्रॉन प्रभावी होकर विद्युत चुंबकीय विकिरण के रूप में प्रकाशित होते हैं। नियॉन लाइट, फ्लोरोसेंट लाइट आदि इनके उदाहरण हैं।
- गैस डिस्चार्ज स्रोत (Gas Discharge Sources)- ऐसे स्रोतों से प्रकाश उत्पन्न करने के लिये विद्युत धारा को डिस्चार्ज ट्यूब में विद्यमान आयनित गैस से गुज़ारा जाता है जिससे प्रकाश उत्सर्जित होता है। ये स्रोत तापदीप्त प्रकाश स्रोतों की तुलना में दृश्यमान प्रकाश पैदा करने में कहीं अधिक ऊर्जा कुशल होते हैं क्योंकि तापदीप्त प्रकाश स्रोतों में अवरक्त किरणों के रूप में अत्यधिक प्रकाश बर्बाद हो जाता है। फ्लोरोसेंट, नियॉन लैंप, सोडियम लैंप जैसे गैस डिस्चार्ज लैंप सफ़ेद और कुछ रंगीन प्रकाश के भी अच्छे स्रोत हैं।
यूनिकॉर्न एक ऐसा निजी स्वामित्व वाला स्टार्टअप है, जिसकी बाजार मूल्यांकन (Valuation) 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो जाता है। यह नाम इस तरह के स्टार्टअप की दुर्लभता और उनके तीव्र विकास को दर्शाता है।
भारतीय यूनिकॉर्न का महत्त्व
भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम में पिछले एक दशक में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2014 में जहाँ देश में केवल 4 यूनिकॉर्न थे, वहीं 2025 के मध्य तक यह संख्या बढ़कर 118 हो गई है। यह वृद्धि भारत के नवाचार, उद्यमिता और आर्थिक विकास की कहानी को दर्शाती है। भारतीय यूनिकॉर्न, जैसे कि जोमैटो, फोनपे, रेज़रपे, ओला, मीशो और डेल्हीवरी, न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बना रहे हैं। ये कंपनियाँ घरेलू चुनौतियों का समाधान करने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी पहुँच रही हैं।
- रोज़गार सृजन : इन स्टार्टअप्स ने बड़ी संख्या में रोज़गार के अवसर पैदा किये हैं, जिससे लाखों लोगों को सीधे और परोक्ष रूप से लाभ हुआ है।
- आर्थिक विकास में योगदान : ये कंपनियाँ देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं और भारत को एक प्रमुख तकनीकी शक्ति के रूप में स्थापित कर रही हैं।
- नवाचार और तकनीकी प्रगति : ये यूनिकॉर्न नई तकनीकों और व्यावसायिक मॉडलों को पेश कर रहे हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा मिल रहा है।
यह वृद्धि सरकार की नीतियों, बढ़ते डिजिटल उपयोग, और मजबूत निवेशक विश्वास का परिणाम है, जो भारत को दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक बना रहा है।
डिफेंसटेक (DefenseTech) का तात्पर्य रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में उपयोग होने वाली उन्नत प्रौद्योगिकियों से है। भारत में, यह क्षेत्र नवाचार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिये एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया है। सरकार की "मेक इन इंडिया" पहल और निजी क्षेत्र की भागीदारी ने भारतीय रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है।
भारत में डिफेंसटेक का विकास
भारत में डिफेंसटेक के विकास के प्रमुख बिंदुओं में शामिल हैं :
- आत्मनिर्भरता : भारत का लक्ष्य रक्षा उपकरणों और प्रौद्योगिकियों के लिये आयात पर निर्भरता को कम करना है। इसके लिये, स्वदेशी अनुसंधान और विकास पर जोर दिया जा रहा है।
- निजी क्षेत्र की भूमिका : सरकार ने रक्षा क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिये खोल दिया है, जिससे स्टार्टअप्स और एमएसएमई (MSMEs) को नवाचार करने का अवसर मिला है। iDEX (Innovations for Defence Excellence) और ADITI (Aiding Development of Innovative Technologies for Defence Excellence) जैसी योजनाओं के अंतर्गत, 600 से अधिक स्टार्टअप रक्षा निर्माण में स्वदेशीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं।
- प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ : भारतीय डिफेंसटेक में कई प्रमुख प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं, जैसे :
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और मशीन लर्निंग : निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने और स्वचालित प्रणालियों को विकसित करने के लिये।
- ड्रोन और मानवरहित वाहन : निगरानी, जासूसी और युद्धक उद्देश्यों के लिये।
- साइबर सुरक्षा : सैन्य नेटवर्क और डेटा को सुरक्षित रखने के लिये।
डिफेंसटेक का विकास न केवल भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत कर रहा है, बल्कि यह आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन में भी योगदान दे रहा है।
एपिजेनेटिक्स जीव विज्ञान की वह शाखा है जो जीन के अनुक्रम (DNA sequence) में बिना किसी बदलाव के जीन की अभिव्यक्ति (gene expression) में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन करती है। यह इस बात पर ध्यान केंद्रित करता है कि कैसे कुछ जीन 'ऑन' या 'ऑफ' होते हैं, जिससे यह निर्धारित होता है कि कौन से प्रोटीन कब और कहाँ बनेंगे।
मुख्य बिंदु
एपिजेनेटिक परिवर्तन डीएनए पर रासायनिक टैग जुड़ने से होते हैं, जिन्हें एपिजेनेटिक टैग कहा जाता है। ये टैग डीएनए को कसकर लपेट सकते हैं या ढीला कर सकते हैं, जिससे कुछ जीनों को पढ़ने में आसानी या कठिनाई होती है। यह प्रक्रिया यह नियंत्रित करती है कि जीन कब और कैसे सक्रिय होंगे।
- पर्यावरण और जीवनशैली का प्रभाव : एपिजेनेटिक टैग कई बाहरी कारकों से प्रभावित हो सकते हैं, जैसे आहार, तनाव, धूम्रपान और पर्यावरणीय रसायन। ये कारक इन टैगों को बदल सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ते हैं, जैसे कि कुछ बीमारियों का जोखिम बढ़ना या कम होना।
- वंशानुगतता : कुछ एपिजेनेटिक परिवर्तन अगली पीढ़ी में भी जा सकते हैं। इसका मतलब है कि माता-पिता के जीवन के अनुभव उनके बच्चों के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डाल सकते हैं, भले ही डीएनए कोड में कोई बदलाव न हुआ हो।
एपिजेनेटिक्स का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि क्यों समान आनुवंशिक संरचना वाले व्यक्ति (जैसे जुड़वाँ बच्चे) अलग-अलग स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर सकते हैं। यह चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा में एक क्रांतिकारी क्षेत्र है।
विश्व बैंक की स्थापना 1944 में अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (IBRD) के रूप में हुई थी। यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषीकृत एजेंसी है जिसका मुख्य उद्देश्य गरीबी घटाना और सतत समाधान अपनाकर साझा समृद्धि को बढ़ावा देना है।
संरचना : पाँच प्रमुख स्तंभ
विश्व बैंक समूह पाँच संस्थानों की एक अनूठी साझेदारी है, जो मिलकर कार्य करते हैं:
- IBRD – International Bank for Reconstruction and Development मध्यम-आय वाले और ऋण-योग्य गरीब देशों को दीर्घकालिक ऋण और विश्लेषणात्मक सेवाएँ देता है।
- IDA – International Development Association दुनिया के सबसे गरीब देशों को ब्याज-मुक्त ऋण (क्रेडिट) और अनुदान प्रदान करता है।
- IFC – International Finance Corporation विकासशील देशों में निजी क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित करता है।
- MIGA – Multilateral Investment Guarantee Agency निवेश को बढ़ावा देने के लिये राजनीतिक जोखिमों के खिलाफ बीमा उपलब्ध कराता है।
- ICSID – International Centre for Settlement of Investment Disputes निवेशक और राज्य के बीच विवादों का समाधान करता है। (नोट : भारत इसका सदस्य नहीं है।)
सदस्यता और वोटिंग अधिकार
विश्व बैंक के 189 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। वोटिंग अधिकार सदस्य देशों की शेयरधारिता पर निर्भर करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ा एकल शेयरधारक है, जिसके पास 16.41% वोट हैं।
प्रमुख रिपोर्टें
विश्व बैंक कई प्रभावशाली रिपोर्टें प्रकाशित करता है जो वैश्विक विकास को ट्रैक करती हैं, जैसे:
- मानव पूंजी सूचकांक
- विश्व विकास रिपोर्ट (World Development Report)
(पहले यह Ease of Doing Business Report भी प्रकाशित करता था, जिसे अब बंद कर दिया गया है।)
शिक्षाविदों एवं मनोवैज्ञानिकों के द्वारा कई ऐसे सुझाव प्रस्तुत किये गए हैं जिनके माध्यम से शिक्षक बच्चों में सृजनात्मकता का विकास कर सकते हैं। इन सुझावों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
- शिक्षक को शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में बच्चों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिये प्रेरित करना चाहिये।
- शिक्षक को बच्चों की अधूरी जानकारी एवं भ्रांतियों का पता लगाते हुए उन्हें दूर करने के लिये बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिये।
- बच्चों के कल्पनात्मक विचारों का सम्मान करते हुए उन्हें अपने विचारों का अन्वेषण करने और नवीन तथ्यों की खोज के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये।
- किसी विषय पर चर्चा में बच्चों को चित्रकारी, काल्पनिक कथाओं आदि के प्रयोग के माध्यम से विस्तारपूर्वक वर्णन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- बच्चों को दूसरों के विचारों, किसी कहानी या अवधारणा को नए तरीकों से पुनर्गठित करने और पुन: प्रस्तुति हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- शिक्षक के द्वारा कक्षा में समस्या प्रस्तुत करते हुए बच्चों को समस्या-समाधान में शामिल करके उनसे समाधान हेतु सुझाव मांगने चाहिये।
- कक्षा में विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों जैसे शब्द निर्माण, वाक्य को पूरा करना, पर्यायवाची और विलोम आदि का प्रयोग करना चाहिये।
- बच्चों को पाठ्यक्रम से संबंधित जटिल प्रश्नों और स्थितियों के समाधान ढूँढ़ने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये।
- विद्यार्थियों को उद्दीपन प्रदान करने वाले प्रश्न पूछना चाहिये जिससे वे किसी विषयवस्तु के बारे में विभिन्न और नए तरीकों से जाँच करने के लिये प्रोत्साहित हों।
- बच्चों के कठिन, जटिल और असामान्य प्रश्नों का सम्मान करना चाहिये और ऐसे बच्चों पर ध्यान देना चाहिये।
- कलात्मक विचारों, बच्चों की कल्पना और उनकी जिज्ञासा का सम्मान करते हुए बच्चों में जिज्ञासा, पूछताछ और प्रयोग जैसे उपागमों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- ऐसे विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये जो समस्या-समाधान, जटिल प्रश्नों और चुनौतियों का सामना करने में रुचि दिखाते हैं।
- एशिया महाद्वीप में शीत ऋतु में स्थल पर उच्च वायुदाब के फलस्वरूप पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं।
- ये पवनें शुष्क होने के कारण वर्षा नहीं करतीं, किंतु जब ये समुद्र से नमी ग्रहण कर लेती हैं तो कुछ क्षेत्रों में वर्षा करती हैं, जैसे- जापान, फिलीपींस आदि।
- एशिया में अधिकांश वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है क्योंकि इस समय स्थलखंड पर निम्न वायुदाब, जबकि समुद्री सतह पर उच्च वायुदाब का विकास हो जाता है।
- भारत का ‘मॉसिनराम’ विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र है। यहाँ वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसूनी पवनों के द्वारा होती है।
- एशिया के पश्चिमी भाग में कम वर्षा के फलस्वरूप यहाँ शुष्क क्षेत्र का विकास हुआ है।
- अधिकांश समय बर्फ के जमे रहने के कारण एशिया के उत्तरी क्षेत्र को ‘पृथ्वी का शीत ध्रुव’ कहा जाता है। इसी उत्तरी क्षेत्र में विश्व का सबसे ठंडा क्षेत्र ‘वर्खोयांस्क’ स्थित है।
- एशिया के उत्तरी भाग में ‘टुंड्रा वनस्पति’ के रूप में काई व लाइकेन पाई जाती है।
- टुंड्रा वनस्पति के दक्षिण में शंकुधारी वनों का विस्तृत क्षेत्र पाया जाता है, जिसे ‘टैगा वनस्पति’ कहते हैं।
- टैगा वनस्पति वाले क्षेत्र में वृक्षों के रूप में चीड़, फर, स्प्रूस इत्यादि पाए जाते हैं। टैगा के दक्षिण में शीतोष्ण घास के मैदान को ‘स्टेपीज़’ कहा जाता है। यहाँ वनस्पतियों के रूप में घास ही प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
- दक्षिणी-पश्चिमी व मध्य एशियाई क्षेत्रों में मरुस्थलीय विस्तार होने के कारण यहाँ ‘मरुस्थलीय वनस्पतियों’ का विकास हुआ है।
- दक्षिण, दक्षिण-पूर्व व पूर्वी एशिया के क्षेत्रों में ‘मानसूनी वनों’ का विस्तार पाया जाता है।
- मानसूनी वनों में सागौन (Teak), साल, चंदन इत्यादि के वृक्ष प्रमुख रूप से पाए जाते हैं।
- यह पशुपालन के अंतर्गत एक उपभोग है, जिसमें मांस व अंडों के लिये मुर्गी, पीरू, बत्तख इत्यादि का पालन-पोषण किया जाता है।
- भारत में मुर्गीपालन सिंधु सभ्यता से चला आ रहा है। इसमें कम पूँजी की आवश्यकता होती है।
- कुक्कुट उत्पादन के विश्व व्यापार में भारत की भागीदारी कम है लेकिन हाल के वर्षों में तेज़ी से इसका विकास किया जा रहा है। परिणामतः भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा अंडा उत्पादक देश बन गया है।
- भारत में कुक्कुटों की सबसे अधिक संख्या आंध्र प्रदेश में है, इसके बाद तमिलनाडु का स्थान आता है।
- एक मुर्गी प्रतिवर्ष औसतन 180-200 अंडे देती है।
- भारत में केंद्रीय कुक्कुट विकास संगठन अपने क्षेत्रीय कार्यालयों के सहयोग से कुक्कुट उत्पादन में सुधार हेतु कार्य करता है।
- ‘ग्रामीण बैकयार्ड कुक्कुट विकास कार्यक्रम’ के तहत घर के आंगन में ही मुर्गीपालन करने वाले BPL परिवारों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
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स्थल |
वर्ष |
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ताज महल (आगरा, उ०प्र०) |
1983 |
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आगरा का किला (आगरा, उ०प्र०) |
1983 |
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अजंता की गुफाएँ (औरंगाबाद, महाराष्ट्र) |
1983 |
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एलोरा की गुफाएँ (औरंगाबाद, महाराष्ट्र) |
1983 |
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कोणार्क का सूर्य मंदिर (पुरी, ओडिशा) |
1984 |
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महाबलीपुरम् के स्मारक समूह (तमिलनाडु) |
1984 |
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गोवा के चर्च एवं कॉन्वेंट (गोवा) |
1986 |
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हंपी के स्मारक समूह (बेल्लारी, कर्नाटक) |
1986 |
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खजुराहो के स्मारक समूह (छतरपुर, म०प्र०) |
1986 |
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फतेहपुर सीकरी स्मारक समूह (आगरा, उ०प्र०) |
1986 |
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ग्रेट लिविंग चोल टेंपल्स (तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, गंगैकोंडचोलपुरम् का बृहदेश्वर मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर) |
1987-2004 |
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पट्टदकल के स्मारक समूह (कर्नाटक) |
1987 |
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एलिफेंटा की गुफाएँ (महाराष्ट्र) |
1987 |
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साँची के बौद्ध स्मारक (म०प्र०) |
1989 |
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क़ुतुब मीनार एवं संबद्ध स्मारक (दिल्ली) |
1993 |
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हुमायूँ का मकबरा (दिल्ली) |
1993 |
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पर्वतीय रेलवे [दार्जिलिंग हिमालय रेलवे (1999), नीलगिरि माउंटेन (2005) एवं कालका-शिमला रेलवे (2008)] |
1999, 2005, 2008 |
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महाबोधि मंदिर परिसर (बोधगया, बिहार) |
2002 |
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भीमबेटका गुफाएँ (म०प्र०) |
2003 |
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चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्त्व पार्क (गुजरात) |
2004 |
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छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (मुंबई, महाराष्ट्र) |
2004 |
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दिल्ली का लाल किला |
2007 |
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जंतर-मंतर (जयपुर, राजस्थान) |
2010 |
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राजस्थान के पर्वतीय किले |
2013 |
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रानी की बावड़ी (पाटन, गुजरात) |
2014 |
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नालंदा विश्वविद्यालय (नालंदा, बिहार) |
2016 |
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ली कॉर्बूज़ियर के स्थापत्य कार्य |
2016 |
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अहमदाबाद का ऐतिहासिक शहर |
2017 |
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विक्टोरियन गॉथिक और आर्ट डैको (मुंबई) |
2018 |
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जयपुर शहर |
2019 |
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काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर, तेलंगाना |
2021 |
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धौलावीरा (एक हड़प्पाई शहर) |
2021 |
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होयसल के पवित्र समूह (कर्नाटक) |
2023 |
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शांति निकेतन (पश्चिम बंगाल) |
2023 |
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चराईदेव मोईदाम (असम) |
2024 |
नोट-
- यूनेस्को ने भारत के 43 स्थलों को अतुलनीय सार्वभौम महत्त्व का स्थल मानते हुए उन्हें संरक्षण दिया है। विश्व विरासत स्थलों के संरक्षण एवं देखभाल के लिये वार्षिक5 मिलियन अमेरिकी डॉलर उपलब्ध कराए जाते हैं।
- उपर्युक्त सूची में प्राकृतिक वर्ग के 7 स्थलों को एवं मिश्रित वर्ग के 1 स्थल को नहीं लिखा गया है।
- उत्तर अमेरिका महाद्वीप क्षेत्रफल की दृष्टि से एशिया व अफ्रीका के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है।
- इसे दो भागों- एंग्लो अमेरिका व मध्य अमेरिका में वर्गीकृत किया जा सकता है।
- एंग्लो अमेरिका के अंतर्गत कनाडा व संयुक्त राज्य अमेरिका को शामिल किया जाता है, वहीं मध्य अमेरिका के अंतर्गत ग्वाटेमाला, कोस्टारिका, निकारागुआ, पनामा, बेलिज़, अलसल्वाडोर, होंडुरास जैसे देश शामिल हैं।
- इस महाद्वीप का क्षेत्रफल लगभग 24,256,000 वर्ग किमी. है।
- वेस्टइंडीज द्वीप समूह, जिसमें कुछ स्वतंत्र देश- बहामास, क्यूबा, हैती, डोमिनिकन गणतंत्र, एंटीगुआ, बरमूडा, बारबडोस, जमैका, ग्रेनाडा, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, प्यूर्टो रिको आदि आते हैं।
- उत्तर अमेरिका एकमात्र ऐसा महाद्वीप है, जहाँ कोई भी देश स्थलरुद्ध नहीं है।
- उत्तर अमेरिका के पूर्व दिशा में अटलांटिक महासागर, दक्षिण में मेक्सिको की खाड़ी, पश्चिम में प्रशांत महासागर तथा उत्तर में आर्कटिक महासागर अवस्थित है। उत्तर की ओर साइबेरिया के पूर्वी भाग से यह बेरिंग जलडमरूमध्य द्वारा अलग होता है।
- इस महाद्वीप का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड है जो प्राकृतिक रूप से उत्तर अमेरिका के अंतर्गत व राजनीतिक रूप से यूरोप के डेनमार्क के अधिकार क्षेत्र में आता है।
- उत्तर अमेरिका में सबसे अधिक वर्षा हेंडर्सन झील (कनाडा) में होती है और यहाँ का सबसे शुष्क स्थान बाटाज्येस (मेक्सिको) है।
- 100० पश्चिमी देशांतर रेखा उत्तर अमेरिका को लगभग दो भागों में बांटती है।
- बिंबिसार हर्यक वंश का संस्थापक एवं एक शक्तिशाली राजा था।
- 15 वर्ष में मगध साम्राज्य की बागड़ोर सँभालने वाले बिंबिसार ने लगभग 52 वर्षों तक शासन किया।
- इसका अन्य नाम ‘श्रेणिक’ था (जैन साहित्य में)। हर्यक वंशी राजा श्रेणिक और क्षेत्रोजस उपाधि लगाते थे।
- इसके शासनकाल में मगध ने विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। तब मगध की राजधानी राजगृह थी।
- बिंबिसार ने अपने राज्य की नींव विभिन्न वैवाहिक संबंधों के फलस्वरूप रखी और उसका विस्तार किया। उसने तीन विवाह किये-
- प्रथम पत्नी महाकोशला देवी थी, जो कोशलराज की पुत्री और प्रसेनजित की बहन थी। इसके साथ दहेज में काशी प्रांत मिला, जिससे एक लाख की वार्षिक आय होती थी।
- दूसरी पत्नी वैशाली की लिच्छवी राजकुमारी चेलना (छलना) थी, जिससे अजातशत्रु का जन्म हुआ।
- तीसरी पत्नी क्षेमा पंजाब के मद्र कुल की राजकुमारी थी।
- बिंबिसार को वैवाहिक संबंधों से बड़ी राजनीतिक प्रतिष्ठा मिली और मगध को पश्चिम एवं उत्तर की ओर विस्तारित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- बौद्ध ग्रंथ महावग्ग के अनुसार बिंबिसार की 500 पत्नियाँ थीं।
- बिंबिसार ने अंग राज्य को जीतकर उसे मगध में मिला लिया तथा अपने पुत्र अजातशत्रु को वहाँ का शासक नियुक्त किया था।
- बिंबिसार ने अवंति के शासक चंडप्रद्योत से मित्रता कर ली तथा अपने राज्य वैद्य जीवक को उसके इलाज के लिये भेजा।
- बिंबिसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने कर दी और वह 492 ई.पू. में मगध की राजगद्दी पर बैठा।
- प्रमुख पदाधिकारी-
- सब्बत्थक महामात्र (सर्वाथक महामात्र)- सामान्य प्रशासन
- व्यावहारिक महामात्र- प्रधान न्यायाधीश
- सेनानायक महामात्र- सेना का प्रधान अधिकारी
- ‘अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ’ विश्व बैंक समूह की महत्त्वपूर्ण संस्था है, जिसकी स्थापना 24 सितंबर, 1960 को संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन में की गई।
- अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ की स्थापना के समय 15 सदस्यों ने करार पत्र पर हस्ताक्षर किये थे। वर्तमान में इसके 174 सदस्य देश हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ द्वारा सदस्य देशों को प्रदान की जाने वाली आर्थिक सहायता एवं ऋण का वित्तीयन इसके सदस्य देशों द्वारा ही किया जाता है। इसके लिये प्रत्येक तीन वर्षों में सदस्य देशों की एक विशेष बैठक होती है, जिसे पुनःपूर्ति (Replenishment) के नाम से जाना जाता है। इसके माध्यम से अमीर सदस्य देश संघ के कोष में अनुदान करते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ मुख्यतः निर्धन देशों को ऋण या अनुदान प्रदान करता है। संघ द्वारा प्रायः इन देशों को 25-40 वर्षों तक का अनुदान प्रदान किया जाता है, जिसके बदले में सदस्य देशों को केवल 0.75% की दर से सेवा शुल्क (Service Charge) का भुगतान करना पड़ता है। इसी कारण अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ को विश्व बैंक की रियायती ऋण देने वाली खिड़की अथवा उदार ऋण खिड़की (Soft Loan Window) कहा जाता है।
रेडियोसक्रियता एक नाभिकीय प्रक्रिया है, जिसमें अस्थिर नाभिक स्वतः क्षयित होकर ऊर्जा और कणों का उत्सर्जन करता है। इसे रेडियोसक्रिय क्षय (Radioactive Decay) कहते हैं। इस घटना की खोज 1896 में हेनरी बैकेरल ने की थी, जिसके बाद मैरी और पियरे क्यूरी ने इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
- रेडियोसक्रिय क्षय के प्रकार
- α-क्षय (Alpha Decay) :
- इसमें नाभिक से हीलियम नाभिक (α-कण) उत्सर्जित होता है, जिससे नाभिक की द्रव्यमान संख्या 4 और परमाणु संख्या 2 घट जाती है। इसे कागज की शीट से भी रोका जा सकता है।
- β-क्षय (Beta Decay) :
- β⁻ क्षय : न्यूट्रॉन प्रोटॉन में बदलकर इलेक्ट्रॉन (β⁻) उत्सर्जित करता है।
- β⁺ क्षय : प्रोटॉन न्यूट्रॉन में बदलकर पाजिट्रॉन (β⁺) उत्सर्जित करता है।
ये कण धातु की पतली परत से रोके जा सकते हैं।
- γ-क्षय (Gamma Decay) :
- इसमें उच्च-ऊर्जा γ-किरणें उत्सर्जित होती हैं, जो सीसे या मोटे कंक्रीट द्वारा अवरुद्ध की जा सकती हैं।
- α-क्षय (Alpha Decay) :
- अनुप्रयोग
- चिकित्सा : कैंसर उपचार में रेडियोथेरेपी, थायरॉइड विकार के लिये आयोडीन-131।
- पुरातत्त्व : कार्बन-14 डेटिंग द्वारा प्राचीन वस्तुओं की आयु निर्धारण।
- ऊर्जा उत्पादन : परमाणु संयंत्रों में यूरेनियम-235 का उपयोग।
- औद्योगिक अनुसंधान : रेडियोधर्मी ट्रेसर का प्रयोग।
रेडियोसक्रियता विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में लाभदायक है, लेकिन इसके सुरक्षित उपयोग और नियंत्रित संचालन की आवश्यकता होती है।
शिक्षण अधिगम में शासन प्रणाली के आधार पर शिक्षण व्यवस्था को तीन भागों में विभाजित किया जाता है। इसका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
- एकतंत्रीय शिक्षण (Autocratic Teaching): शिक्षण की एकतंत्रीय या निरंकुश प्रणाली में शिक्षक को प्राथमिक स्थान दिया जाता है और विद्यार्थियों को द्वितीयक। यहाँ शिक्षक स्वयं को आदर्श मानते हुए अपनी इच्छा के अनुसार ज्ञान प्रदान करता है एवं विद्यार्थियों की तुलना में सक्रिय रहता है।
- लोकतंत्र शिक्षण (Democracy Teaching): इस शिक्षण प्रणाली में विद्यार्थियों को प्राथमिक तथा शिक्षक को द्वितीयक स्थान दिया जाता है। शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच स्वतंत्र अंत:क्रिया होती है।
- हस्तक्षेप-रहित शिक्षण (Laissez-faire Teaching): शिक्षण की इस पद्धति में शिक्षक मित्र के समान होता है। यहाँ शिक्षक विद्यार्थियों को उनकी समस्याओं को हल करने का समुचित अवसर प्रदान करता है। वह उनकी गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं करता है।
प्रधानमंत्री ने WAVES 2025 (वर्ल्ड ऑडियो-विज़ुअल एंड एंटरटेनमेंट समिट) में भारत की वैश्विक रचनात्मक अर्थव्यवस्था में बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हुए “ऑरेंज इकोनॉमी” की अवधारणा पर बल दिया—जो रचनात्मकता, संस्कृति तथा बौद्धिक संपदा पर आधारित होती है।
- ऑरेंज इकोनॉमी क्या है?
ऑरेंज इकोनॉमी, अथवा रचनात्मक अर्थव्यवस्था, उन ज्ञान-आधारित गतिविधियों को शामिल करती है जो संस्कृति, सृजनात्मकता, प्रौद्योगिकी और बौद्धिक संपदा को मिलाकर आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को गति प्रदान करती हैं। यह अर्थव्यवस्था वैज्ञानिक और तार्किक विचारों, कला और डिजिटल इनोवेशन जैसे अमूर्त संसाधनों के मूल्य को पहचानती है और सतत् विकास लक्ष्यों के प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
- भारत की वृद्धि दर
अर्न्स्ट एंड यंग के अनुमानों के अनुसार, भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था आगामी वर्षों में 18% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ेगी, जो 2023 में 19 अरब रुपए से बढ़कर 2026 तक 34 अरब रुपए हो जाएगी।
- WAVES 2025 के मुख्य आकर्षण
- उद्देश्य: भारत को मीडिया एवं मनोरंजन, बौद्धिक संपदा, और तकनीकी नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना।
- प्रदर्शित क्षेत्र: प्रसारण, फिल्म, एनीमेशन, गेमिंग, डिजिटल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में भारत की सामग्री निर्माण क्षमता और तकनीकी नवाचार की ताकत।
- WAVES मार्केट: एक डिजिटल बाज़ार, जहाँ रचनाकार सीधे वैश्विक खरीदारों और निवेशकों से जुड़ सकते हैं, जिससे सहयोग और सौदेबाज़ी के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
WAVES 2025 और ऑरेंज इकोनॉमी के विस्तार के माध्यम से भारत न केवल घरेलू रचनात्मक उद्योगों को प्रोत्साहित कर रहा है, बल्कि विश्व स्तर पर अपनी नेतृत्व क्षमता भी प्रदर्शित कर रहा है।
शासकों की उपाधियाँ और उनका सांस्कृतिक महत्व
गुप्त साम्राज्य के शासक अपने शासनकाल में विभिन्न उपाधियाँ धारण करते थे, जो उनकी शक्ति, सामर्थ्य और धार्मिक आस्थाओं को दर्शाती हैं। गुप्त राजाओं की उपाधियाँ उनके साम्राज्य के ऐश्वर्य और राजनीतिक तथा धार्मिक प्रभाव को दर्शाती हैं। यहाँ प्रमुख गुप्त शासकों और उनकी उपाधियों की चर्चा की गई है :
- श्रीगुप्त
- उपाधि : महाराज
- विवरण : गुप्त वंश के संस्थापक, जिन्होंने साम्राज्य की नींव रखी।
- घटोत्कच
- उपाधि : महाराज
- विवरण : श्रीगुप्त के उत्तराधिकारी, जिन्होंने साम्राज्य का विस्तार किया।
- चन्द्रगुप्त I
- उपाधि : महाराजाधिराज
- विवरण : गुप्त साम्राज्य के पहले सम्राट जिन्होंने साम्राज्य को एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया।
- समुद्रगुप्त
- उपाधियाँ :
- कविराज (प्रयाग प्रशस्ति)
- अश्वमेघ – पराक्रम विक्रम vfg अश्वमेघ यज्ञ के आयोजनकर्ता और वीरता के प्रतीक।
- परम भागवत (नालन्दा ताम्र पत्र) : महान भक्ति और धार्मिक व्यक्ति।
- सर्व-राज-उच्च श्रेष्ठ : सभी राजाओं से उच्च दर्जा, सिक्कों पर इस उपाधि के साथ एकमात्र शासक।
- धर्म-प्रचार बन्धु (इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख) : ब्राह्मण धर्म का संरक्षक और प्रचारक।
- उपाधियाँ :
- चन्द्रगुप्त II
- उपाधियाँ :
- विक्रमादित्य : महान और सशक्त शासक के रूप में प्रसिद्ध।
- देवगुप्त/देवश्री/देवराज : देवताओं के समान और राजसी स्थिति को दर्शाने वाली उपाधियाँ।
- नरेन्द्र चन्द्र सिंह विक्रम
- परम भट्टारक : अत्यधिक प्रतिष्ठित और सम्मानित राजा।
- उपाधियाँ :
- कुमारगुप्त
- उपाधि : महेन्द्रादित्य
- विवरण : कुमारगुप्त ने भी गुप्त साम्राज्य की प्रतिष्ठा को बनाए रखा।
- स्कन्दगुप्त
- उपाधियाँ :
- विक्रमादित्य : वीरता और शक्ति का प्रतीक।
- क्रमादित्य : नियमित और क्रमिक शक्ति के प्रतीक।
- परम भागवत : उच्च धार्मिक आदर्श और भक्ति के प्रतीक।
- शक्रोपम : भगवान इंद्र के समान शक्ति और वैभव के प्रतीक।
- देवराज : देवताओं के राजा के रूप में सम्मानित।
- उपाधियाँ :
गुप्त शासक अपनी उपाधियों के माध्यम से न केवल अपनी शक्ति और वैभव को दर्शाते थे बल्कि ब्राह्मणों और अन्य धार्मिक व्यक्तियों को सम्मानित भी करते थे। इन उपाधियों से यह भी पता चलता है कि गुप्त काल में धार्मिक और सांस्कृतिक आदर्शों का कितना महत्व था।
मुद्रा आपूर्ति (money supply) किसी अर्थव्यवस्था में किसी समय पर उपलब्ध कुल मुद्रा की मात्रा होती है। भारत में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रा आपूर्ति को मापने और प्रकाशित करने के लिये एक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाया है। यहाँ हम इस ढाँचे और इसके ऐतिहासिक विकास पर विस्तृत चर्चा करेंगे ।
1992 से पहले की स्थिति
- 1977 में, दूसरी कार्यकारी समिति (SWG) तथा 1985 में सुखमय चक्रवर्ती कमेटी ने सिफारिश की कि RBI चार मुद्रा सांख्यिकीय मानक—M1, M2, M3, और M4—के साथ आरक्षित मुद्रा को प्रकाशित करे, जिसे RBI ने स्वीकार किया। इनमें से M1 और M3 का व्यापक उपयोग नीतिगत निर्धारण और अकादमिक विश्लेषण के लिये किया जाता है।
- M1 में जनता के पास मौजूद मुद्रा और बैंकों के साथ RBI के पास गैर-ब्याज जमा शामिल होते हैं।
- M3 बैंकिंग क्षेत्र के संपूर्ण बैलेंस शीट को दर्शाता है, जिसमें मांग और मियादी(time) दोनों जमा शामिल होते हैं।
हालाँकि M2 और M4 में डाकघर की बचत बैंक जमा शामिल होती हैं, ये सामान्यतः कम उपयोग की जाती हैं। आरक्षित मुद्रा और M3 सांख्यिकी दोनों को घटकों (दायित्व) और स्रोतों (संपत्तियों) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। RBI सप्ताहिक बैलेंस शीट डेटा का उपयोग आरक्षित मुद्रा को संकलित करने के लिये करता है, जबकि M3 को बैंकिंग क्षेत्र की पूरी बैलेंस शीट के आधार पर पाक्षिक(Fortnightly) आधार पर गणना की जाती है।
RBI वर्तमान मुद्रा डेटा को अपनी साप्ताहिक सांख्यिकीय पूरक (WSS) में प्रकाशित करता है। दीर्घकालिक डेटा के लिये, इसे मासिक बुलेटिन, वार्षिक रिपोर्ट, और भारतीय अर्थव्यवस्था पर सांख्यिकी की हैंडबुक के माध्यम से वितरित किया जाता है।
- नए मुद्रा मानक
वर्ष 1992 के बाद से वित्तीय क्षेत्र में अनेक परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों के संदर्भ में तथा मौद्रिक समुच्चयों पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या के लिये वर्ष 1997 में डॉ. वाई. वी. रेड्डी की अध्यक्षता में गठित कार्यकारी समूह ने वर्ष 1998 में मुद्रा आपूर्ति, विश्लेषण और संकलन की विधि पर नए मुद्रा मानकों की सिफारिश की। इनमें M0, M1, M2, और M3 शामिल हैं, जो बैंकिंग क्षेत्र के बैलेंस शीट के आधार पर प्रगतिशील तरलता मानदंडों के अनुसार परिभाषित किये गए हैं। जिसे RBI ने स्वीकार कर लिया है। - मुद्रा मानक :
- M0 (प्रारक्षित मुद्रा/ उच्च शक्ति मुद्रा) = चलन में मुद्रा (जनता के पास)+ RBI के पास बैंकरों के जमा + RBI के पास 'अन्य' जमाएँ
- M1 (संकीर्ण मुद्रा) = जनता के पास मुद्रा + बैंकिंग प्रणाली में मांग जमाएँ + RBI के पास 'अन्य' जमाएँ
- M2 = M1 + बैंकिंग प्रणाली में बचत जमा की समय दायित्व वाली राशि + बैंकों द्वारा जारी किये गए प्रमाण पत्र + एक वर्ष तक की परिपक्वता वाली निवासियों की सावधि जमा
- M3 (वृहद् मुद्रा) = M2 + एक वर्ष से अधिक समय वाली निवासियों की आवधिक जमा(दीर्घकालीन जमा) + गैर-डिपोजिटरी वित्तीय कंपनियों से बैंकों द्वारा की गई याचना(call)/ आवधिक वित्तीयन
नोट : *'अन्य' जमा में मुख्य रूप से शामिल हैं : (i) अर्ध-सरकारी और अन्य वित्तीय संस्थानों के जमा, (ii) विदेशी केंद्रीय बैंकों और सरकारों के खाते, (iii) अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों जैसे IMF के खाते।
- परिभाषा और निवासिता मानदंड में बदलाव
नए मानकों के तहत, डाकघर की जमा राशि को अब मुद्रा आपूर्ति में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि यह बैंकिंग क्षेत्र का हिस्सा नहीं है। इसके अतिरिक्त, मुद्रा मानकों के संकलन के लिये निवासिता मानदंड को लागू किया गया है। निवासिता का तात्पर्य उस देश से है जहाँ धारक का आर्थिक हित केंद्रित होता है।
गैर-निवासी द्वारा रखी गई मुद्रा और जमा अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन का हिस्सा होते हैं और इन्हें घरेलू मुद्रा परिसंचरण से बाहर माना जाता है। हालाँकि, भारत जैसे विकासशील देशों में, जहाँ प्रवासी श्रमिक अपनी बचत जमा के रूप में भेजते हैं, इन गैर-निवासी रुपये की जमा राशि को घरेलू वित्तीय प्रणाली में समाहित माना जाता है। इसलिये, केवल गैर-निवासी प्रत्यार्पित विदेशी मुद्रा निश्चित जमा को बाहरी दायित्वों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस प्रकार, वर्तमान में केवल विदेशी मुद्रा गैर-निवासी खाते (बैंकों) [FCNR(B)] को बाहरी दायित्वों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है और घरेलू मुद्रा स्टॉक से बाहर रखा जाता है। FCNR(B) जमा की अधिकतर राशि विदेशी बैंकों में रखी जाती है, और इन जमा में परिवर्तन का मौद्रिक प्रभाव वाणिज्यिक बैंकों के शुद्ध विदेशी मुद्रा संपत्तियों में परिवर्तित होता है।
स्थापना, मुख्यालय और प्रमुख भूमिकाएँ
- अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU)
- स्थापना वर्ष: 1865 ई.
- मुख्यालय: जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड)
- भूमिका: दूरसंचार के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)
- स्थापना वर्ष: 1919 ई.
- मुख्यालय: जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड)
- भूमिका: श्रमिकों की स्थिति में सुधार और उनके जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना; 1969 में संगठन को उसकी 50वीं वर्षगाँठ पर नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
- विश्व पर्यटन संगठन (UNWTO)
- स्थापना वर्ष: 1975 ई.
- मुख्यालय: मैड्रिड (स्पेन)
- भूमिका: पर्यटन के माध्यम से आर्थिक वृद्धि और रोजगार के अवसर पैदा करना, पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन के विरासत स्थलों को प्रोत्साहित करना।
- अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन संगठन (ICAO)
- स्थापना वर्ष: 1944 ई.
- मुख्यालय: मॉन्ट्रियल (कनाडा)
- भूमिका: अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन के मानदंड और नियम निर्धारित करना, नागर विमानन की समस्याओं का अध्ययन और समाधान प्रस्तुत करना।
- संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO)
- स्थापना वर्ष: 1945 ई.
- मुख्यालय: रोम (इटली)
- भूमिका: विश्वभर में कृषि और पोषण स्तर में सुधार लाकर जीवन-स्तर को ऊँचा उठाना।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)
- स्थापना वर्ष: 1945 ई.
- मुख्यालय: वाशिंगटन डी.सी. (संयुक्त राज्य अमेरिका)
- भूमिका: सदस्य देशों को विदेशी विनिमय में सुविधा, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और भुगतान को प्रोत्साहन, और आर्थिक उन्नति में मदद के लिये अंतर्राष्ट्रीय तंत्र को मजबूत करना।
- विश्व बैंक (World Bank)
- स्थापना वर्ष: 1944 ई.
- मुख्यालय: वाशिंगटन डी.सी. (संयुक्त राज्य अमेरिका)
- भूमिका: उत्पादन और विकास प्रयोजनों के लिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूंजी का विनिमय प्रोत्साहित करना।
- यूनेस्को (UNESCO)
- स्थापना वर्ष: 1945 ई.
- मुख्यालय: पेरिस (फ्रांस)
- भूमिका: विश्वभर में शांति के लिये शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्रों में सक्रिय योगदान, और राष्ट्रों के बीच निकटता की भावना का निर्माण।
- अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO)
- स्थापना वर्ष: 1948 ई.
- मुख्यालय: लंदन (ब्रिटेन)
- भूमिका: नौ-परिवहन के क्षेत्र में सुरक्षा नियमों का निर्धारण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
- स्थापना वर्ष: 1948 ई.
- मुख्यालय: जिनेवा (स्विट्जरलैंड)
- भूमिका: विश्व में सभी लोगों के स्वास्थ्य की उच्चतम संभव दशा को प्राप्त करना।
- विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO)
- स्थापना वर्ष: 1950 ई.
- मुख्यालय: जिनेवा (स्विट्जरलैंड)
- भूमिका: मौसम विज्ञान के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना, प्राकृतिक आपदाओं को कम करने में मौसम विज्ञान का प्रयोग, और शोध में प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करना।
- अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण (IAEA)
- स्थापना वर्ष: 1957 ई.
- मुख्यालय: वियना (ऑस्ट्रिया)
- भूमिका: परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना।
- संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO)
- स्थापना वर्ष: नवंबर, 1966 ई.
- मुख्यालय: वियना (ऑस्ट्रिया)
- भूमिका: विश्वभर में समृद्धि, आर्थिक मजबूती और जीवन-स्तर में सुधार के लिये औद्योगिक आधार तैयार करना।
- विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO)
- स्थापना वर्ष: 1967 ई.
- मुख्यालय: जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड)
- भूमिका: बौद्धिक संपदा के सम्मान को बढ़ाना, बौद्धिक संपदा के संरक्षण और उपयोग में तेजी लाना।
- अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD)
- स्थापना वर्ष: 1977 ई.
- मुख्यालय: रोम (इटली)
- भूमिका: विकासशील देशों में निम्न वर्गों को खाद्य उत्पादन और पोषाहार के साधन जुटाने में मदद करना।
- व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि संगठन (CTBTO)
- स्थापना वर्ष: 1996 ई.
- मुख्यालय: वियना (ऑस्ट्रिया)
- भूमिका: सी.टी.बी.टी. के प्रावधानों का वैश्विक स्तर पर प्रमाणीकरण।
- रासायनिक हथियार निषेध संगठन (OPCW)
- स्थापना वर्ष: 1997 ई.
- मुख्यालय: द हेग (नीदरलैंड)
- भूमिका: रसायन विज्ञान के शांतिपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करना, और रासायनिक हथियारों के विकास, निर्माण, भंडारण और प्रयोग को रोकना।
प्रायद्वीपीय पठार, उत्तर की पर्वत माला और मैदानी भाग
भारत की भू-गर्भिक संरचना को तीन मुख्य भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है : दक्षिण का प्रायद्वीपीय पठार, उत्तर की विशाल पर्वत माला, और उत्तर भारत का विशाल मैदानी भाग। इन क्षेत्रों का विवरण निम्नलिखित है :
1. दक्षिण का प्रायद्वीपीय पठार
- भौगोलिक विशेषताएँ :
- स्थान : भारत का प्रायद्वीपीय पठार दक्षिणी भारत का एक विस्तृत भू-भाग है। यह नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है और इसका विस्तार दक्षिण में कन्याकुमारी तक है।
- चट्टानें : यह क्षेत्र प्राचीन आर्कियन चट्टानों से बना है, जिसमें मुख्यतः ग्रेनाइट और नीस चट्टानें पाई जाती हैं। ये चट्टानें भारतीय भू-भाग की सबसे पुरानी चट्टानें मानी जाती हैं।
- क्षेत्रफल : इस पठार का क्षेत्रफल लगभग 16 लाख वर्ग किलोमीटर है।
- उप-पठार :
- दक्कन का पठार : यह मुख्य रूप से बेसाल्ट चट्टानों से बना है और यह लावा के विस्तार से निर्मित हुआ है, जिसे 'दक्कन ट्रैप्स' कहा जाता है।
- छोटा नागपुर का पठार : यह झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कुछ हिस्सों में फैला है। इस क्षेत्र में कोयला, लौह अयस्क और अभ्रक जैसे खनिज पाए जाते हैं।
- मालवा का पठार : मध्य प्रदेश में स्थित, यह पठार नर्मदा और ताप्ती नदियों के बीच स्थित है और कृषि के लिए महत्वपूर्ण है।
- प्राकृतिक संसाधन :
- खनिज संपदा : प्रायद्वीपीय पठार खनिजों में समृद्ध है। यहाँ कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, अभ्रक और चूना पत्थर जैसे खनिज पाए जाते हैं।
- जल संसाधन : यह क्षेत्र गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी जैसी कई महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम स्थान है।
2. उत्तर की विशाल पर्वत माला
- भौगोलिक विशेषताएँ :
- स्थान : यह क्षेत्र भारत के उत्तरी भाग में स्थित है और इसमें मुख्यतः हिमालय पर्वत श्रेणी शामिल है।
- उत्पत्ति : हिमालय का निर्माण टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से हुआ है। लगभग 50 मिलियन वर्ष पहले भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराने से यह पर्वत श्रृंखला बनी।
- उप-विभाजन :
- शिवालिक पर्वत : यह हिमालय की सबसे बाहरी श्रेणी है, जो तलछटी चट्टानों से बनी है।
- मध्य हिमालय : यह हिमालय की मध्यम ऊँचाई वाली श्रेणी है, जिसमें प्रमुख पर्यटन स्थल जैसे शिमला, मसूरी और नैनीताल स्थित हैं।
- महान हिमालय : यह सबसे ऊँची और विशाल श्रेणी है, जिसमें विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत शिखर, माउंट एवरेस्ट, स्थित है। भारत में इस श्रेणी के अंतर्गत कंचनजंघा और नंदा देवी जैसे शिखर आते हैं।
- महत्व :
- जलवायु प्रभाव : हिमालय भारत की जलवायु को प्रभावित करता है। यह उत्तर भारत में शीतल हवाओं को रोकता है और मानसून के आगमन में मदद करता है।
- जल संसाधन : हिमालय कई महत्वपूर्ण नदियों जैसे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थल है। ये नदियाँ सिंचाई और जल विद्युत उत्पादन में सहायक हैं।
3. उत्तर भारत का विशाल मैदानी भाग
- भौगोलिक विशेषताएँ :
- स्थान : यह क्षेत्र हिमालय पर्वत के दक्षिण में और प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर में स्थित है। यह पश्चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैला है।
- उत्पत्ति : इस मैदान का निर्माण हिमालय से निकलने वाली नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के जमा होने से हुआ है।
- उप-विभाजन :
- पश्चिमी मैदान : यह क्षेत्र पंजाब और हरियाणा में स्थित है, जहाँ सतलज, रावी, ब्यास, चिनाब और झेलम नदियों का जलभराव होता है।
- मध्य मैदान : यह क्षेत्र गंगा और यमुना नदियों का मैदान है, जो उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों को सम्मिलित करता है।
- पूर्वी मैदान : यह क्षेत्र ब्रह्मपुत्र नदी का मैदान है, जो असम और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
- महत्व :
- कृषि : यह क्षेत्र अत्यंत उपजाऊ है और इसे भारत का 'खाद्यान्न भंडार' कहा जाता है। यहाँ चावल, गेहूं, गन्ना और दलहन की खेती प्रमुखता से होती है।
- जनसंख्या : यह क्षेत्र भारत का सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र है, जहाँ कई प्रमुख शहर जैसे दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ, पटना स्थित हैं।
- जल संसाधन : गंगा, यमुना और उनकी सहायक नदियाँ इस क्षेत्र की सिंचाई और जलापूर्ति का मुख्य स्रोत हैं।
इन तीन प्रमुख भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर, भारत की भू-गर्भिक संरचना अत्यंत विविधतापूर्ण और समृद्ध है। ये क्षेत्र न केवल भू-वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता को दर्शाते हैं।
चट्टानों का निर्माण, विशेषताएँ, और उपयोग
चट्टानें प्राकृतिक ठोस पदार्थ हैं जो एक या अधिक खनिजों के संयोजन से बनी होती हैं। इन्हें उनके निर्माण प्रक्रिया के आधार पर तीन प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है : आग्नेय चट्टानें, अवसादी चट्टानें, और रूपांतरित चट्टानें।
- चट्टानों के प्रकार
- आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)
- निर्माण : तप्त और तरल मैग्मा के शीतल होने से।
- विशेषताएँ :
- रवादार, परतविहीन, कठोर।
- जीवाश्मों का अभाव।
- धात्विक और अधात्विक खनिजों की प्रधानता।
- उदाहरण :
- ग्रेनाइट : इमारतों और स्मारकों में उपयोग।
- गैब्रो : सजावटी पत्थरों और निर्माण सामग्री में उपयोग।
- बेसाल्ट : ज्वालामुखी क्षेत्रों में पाई जाती है।
- महत्व : भू-पर्पटी का 90% भाग आग्नेय चट्टानों से बना है।
- अवसादी चट्टानें (Sedimentary Rocks)
- निर्माण : मिट्टी, रेत और अन्य अवसादों के जमने से।
- विशेषताएँ :
- व्यवस्थित परतें।
- जीवाश्म मिल सकते हैं।
- धात्विक खनिजों का अभाव।
- खनिज तेल इन्हीं चट्टानों से प्राप्त होते हैं।
- उदाहरण :
- बलुआ पत्थर : निर्माण और सजावट में उपयोग।
- कांग्लोमेरेट।
- चूना पत्थर : सीमेंट और कृषि में उपयोग।
- डोलोमाइट।
- शेल।
- कोयला : ऊर्जा उत्पादन में उपयोग।
- रूपांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks)
- निर्माण : अत्यधिक ताप और दाब के प्रभाव से मौजूदा चट्टानों के रूपांतरण से।
- विशेषताएँ :
- घनत्व, कठोरता, बनावट, रंग और खनिज संरचना में परिवर्तन।
- उदाहरण :
- ग्रेनाइट -> नाइस।
- बेसाल्ट -> ऐम्फीबोलाइट।
- बलुआ पत्थर -> क्वार्टजाइट।
- चूना पत्थर -> संगमरमर : मूर्तियों और भवन निर्माण में उपयोग।
- कोयला -> ग्रेफाइट : पेंसिल की नोक बनाने में उपयोग।
- शेल -> स्लेट।
- आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks)
- चट्टानों में रूपांतरण
- आग्नेय चट्टानें :
- ग्रेनाइट -> नाइस।
- बेसाल्ट -> ऐम्फीबोलाइट।
- गैब्रो -> ग्रीन स्टोन।
- अवसादी चट्टानें :
- बलुआ पत्थर -> क्वार्टजाइट।
- चूना पत्थर -> संगमरमर।
- कोयला -> ग्रेफाइट।
- शेल -> स्लेट।
- आग्नेय चट्टानें :
इस प्रकार, विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से चट्टानों का रूपांतरण हमें विविध प्रकार की नई चट्टानें प्रदान करता है, जिनका उपयोग विभिन्न उद्योगों जैसे निर्माण, सजावट, ऊर्जा उत्पादन, और अन्य में होता है।
परिचय
- जीवाश्म ईंधन ऐसे प्राकृतिक ऊर्जा स्रोत हैं जो मृत पौधों और प्राणियों के अवशेषों से पृथ्वी की परतों के नीचे लाखों वर्ष पूर्व बने हैं।
- अत्यधिक दबाव और ताप के कारण इन अवशेषों में रासायनिक परिवर्तन हुआ, जिससे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का निर्माण हुआ।
- इन्हें “जीवाश्म ईंधन” कहा जाता है क्योंकि ये जीवाश्मित (फॉसिलाइज़्ड) जैव पदार्थों से बने होते हैं।
जीवाश्म ईंधनों के प्रकार
- कोयला (Coal)
- प्राचीन पौधों के अवशेषों से निर्मित, जो मिट्टी और चट्टानों के नीचे दबे रहते हैं।
- कार्बन की मात्रा के अनुसार चार प्रकार – पीट, लिग्नाइट, बिटुमिनस और एंथ्रासाइट।
- उपयोग – विद्युत उत्पादन, इस्पात निर्माण और औद्योगिक ऊर्जा के लिये।
- पेट्रोलियम (Petroleum / Crude Oil)
- समुद्री पौधों और जीवों के अवशेषों से बना जो समुद्र तल के नीचे दबे रहे।
- ड्रिलिंग द्वारा निकाला जाता है और शोधन (Refining) के बाद पेट्रोल, डीज़ल, केरोसिन, एलपीजी आदि में परिवर्तित किया जाता है।
- प्रमुख उपयोग – परिवहन ईंधन और रासायनिक उद्योग में।
- प्राकृतिक गैस (Natural Gas)
- पेट्रोलियम के साथ या स्वतंत्र रूप से गैस भंडारों में पाई जाती है।
- इसका मुख्य घटक मीथेन (CH₄) होता है।
- उपयोग – खाना पकाने, विद्युत उत्पादन और औद्योगिक ईंधन के रूप में।
निर्माण प्रक्रिया (Formation Process)
- मृत जीव-जंतु और पौधे → मिट्टी व अवसाद की परतों के नीचे दबे → ऊष्मा और दबाव के प्रभाव से → लाखों वर्षों में कार्बन युक्त ईंधन में परिवर्तित हो गए।
- इस प्रक्रिया को जीवाश्मीकरण (Fossilization) कहा जाता है।
लाभ (Advantages)
- उच्च ऊर्जा क्षमता और विश्वसनीय उपलब्धता।
- औद्योगिक विकास और आर्थिक प्रगति का आधार।
- परिवहन, उत्पादन और विद्युत क्षेत्रों में प्रमुख ऊर्जा स्रोत।
हानियाँ (Disadvantages)
- अनवीकरणीय (Non-renewable) — बनने में लाखों वर्ष लगते हैं।
- इनके दहन से कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जित होते हैं, जिससे प्रदूषण और वैश्विक तापमान वृद्धि होती है।
- उत्खनन और परिवहन से तेल रिसाव, भूमि क्षरण और वनों की कटाई जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
संरक्षण एवं विकल्प (Conservation and Alternatives)
- ऊर्जा संरक्षण और ईंधन का दक्ष उपयोग आवश्यक है।
- सौर, पवन, जलविद्युत एवं बायोमास जैसे नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देना चाहिए।
- स्वच्छ तकनीकों जैसे सीएनजी और विद्युत वाहनों का प्रयोग प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
- जीवाश्म ईंधनों ने मानव सभ्यता को ऊर्जा दी परंतु इनका अत्यधिक उपयोग पर्यावरण और स्थिरता के लिये चुनौती बन गया है। इसलिए, स्वच्छ एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण और जिम्मेदार उपभोग ही भविष्य का सही मार्ग है।
शिक्षण अधिगम में शासन प्रणाली के आधार पर शिक्षण व्यवस्था को तीन भागों में विभाजित किया जाता है। इसका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
- एकतंत्रीय शिक्षण (Autocratic Teaching): शिक्षण की एकतंत्रीय या निरंकुश प्रणाली में शिक्षक को प्राथमिक स्थान दिया जाता है और विद्यार्थियों को द्वितीयक। यहाँ शिक्षक स्वयं को आदर्श मानते हुए अपनी इच्छा के अनुसार ज्ञान प्रदान करता है एवं विद्यार्थियों की तुलना में सक्रिय रहता है।
- लोकतंत्र शिक्षण (Democracy Teaching): इस शिक्षण प्रणाली में विद्यार्थियों को प्राथमिक तथा शिक्षक को द्वितीयक स्थान दिया जाता है। शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच स्वतंत्र अंत:क्रिया होती है।
- हस्तक्षेप-रहित शिक्षण (Laissez-faire Teaching): शिक्षण की इस पद्धति में शिक्षक मित्र के समान होता है। यहाँ शिक्षक विद्यार्थियों को उनकी समस्याओं को हल करने का समुचित अवसर प्रदान करता है। वह उनकी गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं करता है।
पोषण की आवश्यकता, स्रोत और उनके लाभ
पोषण मानव शरीर के संचालन और स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण है। यह शरीर को आवश्यक ऊर्जा, विकास, मरम्मत, और रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है। पोषण की आवश्यकता को संतुलित आहार के माध्यम से पूरा किया जा सकता है, जिसमें विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। पोषण की प्रमुख आवश्यकताएँ निम्नलिखित हैं :
कार्बोहाइड्रेट्स :
- ऊर्जा का मुख्य स्रोत
- स्रोत : अनाज, फल, सब्जियाँ, दालें
प्रोटीन :
- शरीर की वृद्धि, मरम्मत, एंजाइम व हार्मोन के उत्पादन में सहायक
- स्रोत : दालें, बीन्स, मांस, मछली, अंडे, डेयरी उत्पाद
वसा :
- ऊर्जा का प्रमुख स्रोत, शरीर के अंगों की सुरक्षा में सहायक
- स्रोत : तेल, घी, मक्खन, नट्स, बीज
विटामिन्स :
- शरीर के विभिन्न कार्यों के लिये आवश्यक कार्बनिक यौगिक
- स्रोत : फल, सब्जियाँ, डेयरी उत्पाद, अनाज
मिनरल्स :
- हड्डियों, दाँतों, और कोशिकाओं के सही संचालन के लिये आवश्यक
- स्रोत : डेयरी उत्पाद, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, मीट, अनाज
पानी :
- शरीर के प्रत्येक कोशिका, ऊतक, और अंग के सही कार्य के लिये आवश्यक
- भूमिका : शरीर को हाइड्रेटेड रखना, जैविक प्रक्रियाओं में शामिल
फाइबर :
- पाचन तंत्र के सही संचालन और कब्ज की समस्या को दूर करने में सहायक
- स्रोत : साबुत अनाज, फल, सब्जियाँ, दालें
संतुलित आहार के माध्यम से इन सभी पोषक तत्वों की पूर्ति करना आवश्यक है ताकि शरीर स्वस्थ रहे और सभी जैविक प्रक्रियाएँ सही ढंग से संचालित हो सकें। उचित पोषण से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा तंत्र भी मजबूत होता है।
इतिहास के दौरान पृथ्वी की उत्पत्ति और आयु के बारे में विभिन्न विद्वानों तथा संस्थानों ने अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। प्रारंभ में धार्मिक मान्यताएँ इस विषय पर प्रमुख रूप से प्रभावी थीं। लेकिन 1749 ई. में फ्रांसीसी वैज्ञानिक जॉर्ज-लुई लेक्लेर, कॉम्ट दे बफॉन ने एक तर्कसंगत परिकल्पना प्रस्तुत की, जिससे इस विषय पर वैज्ञानिक अध्ययन की नींव पड़ी। वर्तमान में पृथ्वी तथा अन्य खगोलीय पिंडों की उत्पत्ति को समझाने के लिये दो प्रमुख वैज्ञानिक दृष्टिकोण माने जाते हैं।
एकवादी अवधारणा (Monistic Concept)
इस दृष्टिकोण को प्रायः “मातृ सिद्धांत” (Parental Hypothesis) कहा जाता है। इसके अनुसार पृथ्वी सहित सभी ग्रह किसी एक ही मूल इकाई, अर्थात् एक तारे या निहारिका, से उत्पन्न हुए हैं। इस विचारधारा में दो महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिकों के योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—इमानुएल कांट और पियरे-साइमोन लाप्लास।
कांट का गैसीय परिकल्पना सिद्धांत
1755 ई. में जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियमों के आधार पर गैसीय परिकल्पना (Gaseous Hypothesis) प्रस्तुत की। उनके अनुसार एक अत्यधिक गर्म और गतिशील निहारिका से कई गोलाकार छल्ले बने। समय के साथ ये छल्ले ठंडे होकर पृथ्वी सहित सौरमंडल के विभिन्न ग्रहों में परिवर्तित हो गये।
हालाँकि कांट के सिद्धांत की आलोचना भी हुई, क्योंकि इसमें प्रयुक्त गणितीय सिद्धांत कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के अनुरूप नहीं थे।
लाप्लास का निहारिका सिद्धांत
1796 ई. में फ्रांसीसी गणितज्ञ पियरे-साइमोन लाप्लास ने कांट के विचार को संशोधित करते हुए निहारिका सिद्धांत (Nebular Hypothesis) प्रस्तुत किया। उन्होंने माना कि प्रारंभ में एक विशाल गर्म निहारिका से एक बड़ा छल्ला निकला, जो बाद में कई छल्लों में विभाजित हो गया। ये छल्ले अपने मूल द्रव्यमान के चारों ओर एक समान दिशा में घूमने लगे और धीरे धीरे पृथ्वी सहित विभिन्न ग्रहों का निर्माण हुआ।
लेकिन इस सिद्धांत के अनुसार सभी उपग्रहों को अपने ग्रहों की ही दिशा में परिक्रमा करनी चाहिये। वास्तविकता में शनि और बृहस्पति के कुछ उपग्रह विपरीत दिशा में घूमते हैं, जो इस सिद्धांत के लिये चुनौती प्रस्तुत करता है।
महत्त्व
ये वैज्ञानिक सिद्धांत पृथ्वी और अन्य खगोलीय पिंडों की उत्पत्ति के बारे में समृद्ध और रोचक विचार प्रस्तुत करते हैं। ये न केवल पृथ्वी की आयु और संरचना को समझने में सहायता करते हैं, बल्कि सौरमंडल के विकास की प्रक्रियाओं पर भी प्रकाश डालते हैं। इन सिद्धांतों के अध्ययन से हमें अपने ब्रह्मांडीय इतिहास और पृथ्वी के निर्माण की जटिल प्रक्रियाओं की गहरी समझ प्राप्त होती है। अंततः, पृथ्वी की उत्पत्ति और आयु का अध्ययन मानवता की उस निरंतर जिज्ञासा को दर्शाता है, जिसके माध्यम से वह ब्रह्मांड में अपने स्थान को समझने का प्रयास करती है।
भारत में बैंकिंग प्रणाली देश के आर्थिक विकास की नींव है। पिछले कुछ वर्षों में, प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ बैंकिंग प्रणाली और प्रबंधन में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। भारत में बैंकिंग का इतिहास 1947 में स्वतंत्रता मिलने से पहले का है और यहाँ हम भारत में बैंकिंग क्षेत्र के विकास के तीन प्रमुख चरणों पर चर्चा करेंगे।
- चरण II: स्वतंत्रता के बाद का काल (1947-1991)
भारत को स्वतंत्रता मिलने के समय देश के सभी प्रमुख बैंक निजी हाथों में थे। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग वित्तीय सहायता के लिये साहूकारों पर निर्भर थे, जिसे ध्यान में रखते हुए तत्कालीन
सरकार ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का निर्णय लिया। यह राष्ट्रीयकरण बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के तहत किया गया।
1955 में भारतीय स्टेट बैंक का गठन हुआ, और 1969 से 1991 के बीच 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इन बैंकों की राष्ट्रीय जमाराशि 50 करोड़ रुपये से अधिक थी:- इलाहाबाद बैंक
- बैंक ऑफ इंडिया
- बैंक ऑफ बड़ौदा
- बैंक ऑफ महाराष्ट्र
- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
- केनरा बैंक
- देना बैंक
- इंडियन ओवरसीज बैंक
- इंडियन बैंक
- पंजाब नेशनल बैंक
- सिंडिकेट बैंक
- यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
- यूनाइटेड बैंक
- यूको बैंक
- 1980 में 6 अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिससे कुल बैंकों की संख्या 20 हो गई:
- आंध्रा बैंक
- कॉर्पोरेशन बैंक
- न्यू बैंक ऑफ इंडिया
- ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स
- पंजाब और सिंध बैंक
- विजय बैंक
- इसके अलावा, भारतीय स्टेट बैंक की सात सहायक कंपनियों का राष्ट्रीयकरण 1959 में हुआ:
- स्टेट बैंक ऑफ पटियाला
- स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद
- स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर
- स्टेट बैंक ऑफ मैसूर
- स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर
- स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र
- स्टेट बैंक ऑफ इंदौर
- इन सभी बैंकों का भारतीय स्टेट बैंक में विलय 2017 में किया गया, सिवाय स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र और स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के, जिनका विलय क्रमशः 2008 और 2010 में हुआ था।
पृथ्वी का अपने अक्ष पर झुकाव और परिक्रमण का प्रभाव
दिन और रात की अवधि में अंतर पृथ्वी के अपनी धुरी पर झुके होने और सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने के कारण होता है। यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर झुकी हुई न होती, तो प्रत्येक स्थान पर दिन और रात बराबर होते। इसके अलावा, यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती, तो एक गोलार्द्ध में हमेशा लंबे दिन और छोटी रातें होतीं, जबकि दूसरे गोलार्द्ध में लंबी रातें और छोटे दिन होते।
परंतु, विषुवत रेखा (equator) को छोड़कर दुनिया के बाकी हिस्सों में दिन और रात की अवधि में विभिन्न ऋतुओं के दौरान अंतर पाया जाता है। विषुवत रेखा पर दिन और रात हमेशा बराबर रहते हैं, क्योंकि प्रकाश वृत्त इसे हमेशा दो बराबर भागों में विभाजित करता है, जिससे इसका आधा हिस्सा हर समय प्रकाशमय रहता है।
- पृथ्वी पर दिन और रात का चक्र
- 21 मार्च से 23 सितम्बर (उत्तरी गोलार्द्ध): इस अवधि के दौरान उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की रोशनी 12 घंटे या उससे अधिक समय तक मिलती है। इस कारण यहाँ दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। जैसे-जैसे हम उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। उत्तरी ध्रुव पर दिन की अवधि छह महीने की होती है।
- 23 सितम्बर से 21 मार्च (दक्षिणी गोलार्द्ध): इस अवधि में सूर्य की रोशनी दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या उससे अधिक समय तक मिलती है। जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं, दिन की अवधि बढ़ती जाती है। इस कारण दक्षिणी ध्रुव पर भी दिन की अवधि छह महीने तक होती है।
- ध्रुवों पर दिन और रात
- पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर दिन और रात का चक्र अत्यधिक लंबा होता है। पृथ्वी की धुरी के झुके होने के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों में छह महीने तक लगातार दिन और छह महीने तक रात होती है। जब एक ध्रुव पर दिन होता है, तो दूसरे ध्रुव पर रात होती है।
- विषुवत रेखा पर बराबर दिन-रातविषुवत रेखा पर साल भर दिन और रात बराबर होते हैं। क्योंकि प्रकाशवृत्त हमेशा इस क्षेत्र को दो बराबर हिस्सों में बाँटता है, जिससे यहाँ हर समय दिन और रात की अवधि समान रहती है, चाहे मौसम कोई भी हो।
चंद्रमा की विशेषताएँ, तथ्य और माप
उपग्रह वे आकाशीय पिंड हैं जो अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं और साथ ही सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं। इनकी खुद की कोई चमक नहीं होती; ये सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं। उपग्रहों की कक्षा परवलयाकार होती है। पृथ्वी का एकमात्र उपग्रह चंद्रमा है।
- बुध और शुक्र: इन ग्रहों के पास कोई उपग्रह नहीं है।
- सर्वाधिक उपग्रह: बृहस्पति के पास सबसे अधिक उपग्रह हैं।
- सुपर मून: चंद्रमा की पृथ्वी से औसतन दूरी 3,84,000 किमी है। चंद्रमा की परवलयाकार कक्षा के कारण यह दूरी बदलती रहती है। 'सुपर मून' तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है, जिसे 'पेरिजी फुल मून' भी कहा जाता है।
- चंद्रमा से संबंधित कुछ विशिष्ट तथ्य :
- पृथ्वी से माध्य दूरी: 384,365 किमी
- पृथ्वी से अधिकतम दूरी (अप-भू दूरी): 406,000 किमी
- पृथ्वी से न्यूनतम दूरी (उप-भू दूरी): 364,000 किमी
- पृथ्वी के चारों ओर घूमने की अवधि: 27 दिन, 7 घंटे, 43 मिनट, और 11.47 सेकंड
- चंद्रमा की घूर्णन अवधि (अपने अक्ष पर): 27 दिन, 7 घंटे, 43 मिनट, और 11.47 सेकंड
- वायुमंडल: चंद्रमा पर कोई वायुमंडल नहीं है
- चंद्रमा का व्यास: 3,476 किमी
- द्रव्यमान का पृथ्वी के द्रव्यमान के अनुपात में: 1:81.30
- घनत्व (पानी के सापेक्ष): 3.34
- घनत्व (पृथ्वी के सापेक्ष): 0.6058
- चंद्रमा की सतह का अदृश्य भाग: 41%
- चंद्रमा के उच्चतम पर्वत की ऊँचाई: 35,000 फीट, लीबनिट्ज पर्वत (चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित)
महत्त्वपूर्ण तथ्य और पृथ्वी के साथ इसका संबंध
सूर्य, एक विशाल गैसीय तारा है जो, हमारे सौर मंडल का केंद्र है। इसके आकार, तापमान और संघटन जैसे मुख्य पहलुओं के विषय में जानकारी से हमें पृथ्वी के मौसम, जलवायु, और जीवन की स्थिरता पर इसके प्रभाव को समझने में मदद मिलती है।
- सूर्य का व्यास : 13,92,000 किमी.
- सूर्य की आयु : लगभग 5 बिलियन वर्ष (लगभग)
- सूर्य का आयतन : पृथ्वी से 13 लाख गुना
- सूर्य का द्रव्यमान : पृथ्वी से 3.32 लाख गुना
- तलीय गुरुत्व : पृथ्वी से 28 गुना
- सूर्य से पृथ्वी तक प्रकाश पहुँचने का समय : 8 मिनट, 20 सेकेंड
- सूर्य के प्रकाश की चाल : 3 लाख किमी./सेकंड
- घूर्णन अवधि :
- भूमध्य रेखा के सापेक्ष : 25.38 दिन
- ध्रुवों के सापेक्ष : 33 दिन
- सूर्य का केन्द्रीय घनत्व : 100 ग्राम प्रति घन सेमी
- सूर्य का रासायनिक संघटन :
- हाइड्रोजन : 71%
- हीलियम : 26.5%
- अन्य तत्व : 2.5%
- फोटोस्फेयर ताप (सतह का ताप) : 6000°C
- सूर्य धब्बों का ताप : 1500°C
- केन्द्र का ताप : 15 मिलियन °C
- सूर्य का ऊर्जा उत्सर्जन : 1026 जूल/सेकंड (1026 J/s)
- केन्द्रीय दबाव : 1 अरब एटमोस्फेयर
- सूर्य से पृथ्वी की न्यूनतम दूरी : 14.70 करोड़ किमी.
- पृथ्वी से माध्य दूरी : 14.98 करोड़ किमी.
- पृथ्वी से अधिकतम दूरी : 15.21 करोड़ किमी.
- 1 प्रकाश वर्ष : 9.45 × 10¹2 किमी.
- 1 पारसेक : 3.6 प्रकाश वर्ष
उपर्युक्त सभी तथ्य सूर्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं, जिससे उसकी संरचना, ऊर्जा उत्पादन, और अन्य भौतिक गुणों के बारे में हमें अपने ज्ञान का विस्तार करने में मदद मिलती है।
प्रमुख संगीतियाँ और उनके प्रभाव का विश्लेषण
बौद्ध धर्म के इतिहास में चार प्रमुख बौद्ध संगीति (धार्मिक सभाएँ) आयोजित की गईं, जिनका बौद्ध विचारधारा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन संगीति के माध्यम से बौद्ध धर्म के ग्रंथों का संकलन, मतभेदों का समाधान और विचारधाराओं का विस्तार हुआ।
- प्रथम बौद्ध संगीति
प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन 483 ई.पू. में राजगृह में राजा अजातशत्रु के शासनकाल में हुआ। इस संगीति की अध्यक्षता महाकस्सप ने की थी। इसमें दो प्रमुख ग्रंथों का संकलन किया गया: आनंद ने सुत्तपिटक और उपालि ने विनयपिटक का संकलन किया। इस संगीति का उद्देश्य महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन और संरक्षण करना था, ताकि उनके निर्वाण के बाद उनकी शिक्षाओं को संरक्षित रखा जा सके। - द्वितीय बौद्ध संगीति
द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई.पू. में वैशाली में आयोजित हुई, जब कालाशोक का शासन था। इसकी अध्यक्षता साबकमीर (सुबुकामी) ने की थी। इस संगीति में मठ संबंधी नियमों पर मतभेद उभरे, जिसके परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म दो शाखाओं में विभाजित हो गया: स्थविरवादी/थेरवादी और महासंघिक। - तृतीय बौद्ध संगीति
तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन सम्राट अशोक के शासनकाल में 250 ई.पू. में पाटलिपुत्र में हुआ। इस संगीति की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त-तिस्स ने की थी। इस सभा में अभिधम्मपिटक का संकलन किया गया। इस संगीति का उद्देश्य बौद्ध धर्म की एकता को सुनिश्चित करना और उसकी शिक्षाओं का प्रसार करना था। - चतुर्थ बौद्ध संगीति
चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन प्रथम शताब्दी ईस्वी में कश्मीर के कुंडलवन में किया गया, जब कनिष्क का शासन था। वसुमित्र ने इस सभा की अध्यक्षता की, और अश्वघोष उपाध्यक्ष थे। इस संगीति के दौरान बौद्ध धर्म दो प्रमुख शाखाओं में विभाजित हो गया: महायान और हीनयान। इस विभाजन का मुख्य कारण बोधिसत्व की अवधारणा थी, जो महायान संप्रदाय से संबंधित है।
बौद्ध धर्म से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण पहलू
- मिलिन्दपण्हो, नागसेन द्वारा रचित, पालि भाषा में एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
- अश्वघोष द्वारा रचित बुद्धचरित और सौन्दरानंद संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं।
- 483 ई.पू. में कुशीनगर में महात्मा बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) हुई।
- बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गांधार और मथुरा शैलियों में किया गया, जिसमें गांधार शैली विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
- गौतम बुद्ध को "एशिया का ज्योतिपुंज" (Light of Asia) कहा जाता है।
बौद्ध संगीति बौद्ध धर्म के विकास और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। इन संगीति के माध्यम से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को संरक्षित और प्रसारित किया गया, जिसके कारण बौद्ध धर्म का प्रसार विश्व भर में हुआ।
1945 में आए कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के आधार पर भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके तहत 2 सितम्बर 1946 को एक अंतरिम मंत्रिमंडल (Interim Government) का गठन किया गया। इसका उद्देश्य था — पूर्ण स्वतंत्रता से पहले भारतीय नेताओं को प्रशासनिक अनुभव देना और सत्ता का क्रमिक हस्तांतरण करना। यह मंत्रिमंडल कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के प्रतिनिधियों को शामिल करने वाला था, जिससे सत्ता में साझेदारी और एक संक्रमणकालीन सरकार का निर्माण हो सके।
मंत्रियों की सूची एवं विभाग
- कांग्रेस के सदस्य
- जवाहर लाल नेहरू – कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष, विदेशी मामले एवं राष्ट्रमंडल
- वल्लभ भाई पटेल – गृह, सूचना एवं प्रसारण
- बलदेव सिंह – रक्षा
- जान मथाई – उद्योग एवं आपूर्ति
- सी. राजगोपालाचारी – शिक्षा
- सी.एच. भाभा – कार्य, खान एवं बन्दरगाह
- राजेन्द्र प्रसाद – खाद्य एवं कृषि
- आसफ अली – रेलवे
- जगजीवन राम – श्रम
- मुस्लिम लीग के सदस्य
- लियाकत अली खाँ – वित्त
- आई.आई. चुन्दरीगर – वाणिज्य
- अब्दुल रब नश्तर – संचार
- जोगेन्द्र नाथ मंडल – विधि
- गजान्तर अली खाँ – स्वास्थ्य
महत्त्व
- यह ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र भारत की ओर पहला बड़ा प्रशासनिक कदम था।
- इसने विभाजन से पहले की राजनीतिक खींचतान और सहयोग दोनों को दर्शाया।
- यही मंत्रिमंडल आगे चलकर सत्ता हस्तांतरण (15 अगस्त 1947) की प्रक्रिया का आधार बना।
किसी भी भौतिक राशि को मापने के लिये जिस मानक परिभाषित परिमाण को अपनाया जाता है, उसे मात्रक (Unit) कहते हैं। मात्रक का प्रयोग मापन में एकरूपता (uniformity), सटीकता (accuracy) और सुव्यवस्था (consistency) लाने के लिये किया जाता है।
मात्रकों के मुख्य प्रकार
- मूल मात्रक (Fundamental Units)
- ये ऐसे मात्रक हैं जो किसी अन्य मात्रक पर निर्भर नहीं होते।
- उदाहरण : मीटर (m), किलोग्राम (kg), सेकंड (s) इत्यादि।
- व्युत्पन्न मात्रक (Derived Units)
- ये मूल मात्रकों के संयोजन से बनते हैं।
- उदाहरण : वेग (m/s), बल (kg·m/s²), दाब (N/m²) आदि।
S.I. पद्धति (SI System)
- पूरा नाम : Système International d’Unités (अंतर्राष्ट्रीय मात्रक प्रणाली)
- स्वीकृति वर्ष : 1960 (अंतर्राष्ट्रीय भार एवं माप सम्मेलन द्वारा)
- विशेषताएँ :
- विश्वभर में मान्य
- माप में सरलता और एकरूपता
- सभी विज्ञान और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में उपयोग
S.I. के 7 मूल मात्रक
|
क्रम |
भौतिक राशि |
मात्रक (हिंदी) |
मात्रक (अंग्रेज़ी) |
संकेत |
|
1 |
लंबाई |
मीटर |
metre |
m |
|
2 |
द्रव्यमान |
किलोग्राम |
kilogram |
kg |
|
3 |
समय |
सेकण्ड |
second |
s |
|
4 |
तापमान |
केल्विन |
kelvin |
K |
|
5 |
विद्युत धारा |
ऐम्पियर |
ampere |
A |
|
6 |
ज्योति-तीव्रता |
कैण्डेला |
candela |
cd |
|
7 |
पदार्थ का परिमाण |
मोल |
mole |
mol |
पूरक मात्रक (Supplementary Units)
|
भौतिक राशि |
मात्रक |
संकेत |
|
समतल कोण |
रेडियन |
rad |
|
घन कोण |
स्टेरेडियन |
sr |
पुराने मात्रकों के नए नाम (S.I. पद्धति में)
|
भौतिक राशि |
पुराना नाम / संकेत |
नया नाम / संकेत |
|
तापमान |
डिग्री सेण्टीग्रेड (°C) |
डिग्री सेल्सियस (°C) |
|
आवृत्ति |
कंपन प्रति सेकण्ड (cps) |
हर्ट्ज़ (Hz) |
|
ज्योति-तीव्रता |
कैण्डिल शक्ति (C.P.) |
कैण्डेला (cd) |
जीव विज्ञान (Biology) जीवन और जीवित प्राणियों के अध्ययन की विज्ञान शाखा है। यह न केवल उनके संरचना, कार्य, विकास और अनुवांशिकी का विश्लेषण करती है, बल्कि विभिन्न जीवों, पौधों, सूक्ष्मजीवों और उनके पारस्परिक संबंधों का भी अध्ययन करती है। समय के साथ, जीव विज्ञान ने कई उप-शाखाओं (sub-branches) में विस्तार किया है, ताकि किसी विशेष समूह, विशेषता या क्रिया पर केंद्रित गहन अध्ययन किया जा सके। नीचे दी गई तालिका में इन प्रमुख शाखाओं के नाम और उनके अध्ययन के विषय दिये गए हैं —
|
क्रम |
शाखा का नाम |
Branch Name |
अध्ययन का विषय |
|
1 |
एपीकल्चर |
Apiculture |
मधुमक्खी पालन का अध्ययन |
|
2 |
सेरीकल्चर |
Sericulture |
रेशम कीट पालन का अध्ययन |
|
3 |
पीसीकल्चर |
Pisciculture |
मत्स्य पालन का अध्ययन |
|
4 |
माइकोलॉजी |
Mycology |
कवकों (Fungi) का अध्ययन |
|
5 |
फाइकोलॉजी |
Phycology |
शैवालों (Algae) का अध्ययन |
|
6 |
एंथोलॉजी |
Anthology |
पुष्पों का अध्ययन |
|
7 |
पोमोलॉजी |
Pomology |
फलों का अध्ययन |
|
8 |
ऑर्निथोलॉजी |
Ornithology |
पक्षियों का अध्ययन |
|
9 |
इक्थ्योलॉजी |
Ichthyology |
मछलियों का अध्ययन |
|
10 |
एण्टोमोलॉजी |
Entomology |
कीटों का अध्ययन |
|
11 |
डेन्ड्रोलॉजी |
Dendrology |
वृक्षों एवं झाड़ियों का अध्ययन |
|
12 |
ओफियोलॉजी |
Ophiology |
सर्पों (Snakes) का अध्ययन |
|
13 |
सॉरोलॉजी |
Saurology |
छिपकलियों का अध्ययन |
|
14 |
सिल्विकल्चर |
Silviculture |
काष्ठीय पेड़ों का संवर्धन (Cultivation of forest trees) |
भारत ने रोग उन्मूलन के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक सफलताएँ प्राप्त की हैं। अब तक देश से निम्नलिखित रोग पूर्णतः समाप्त किये जा चुके हैं —
- चेचक (Smallpox) – 1980 में
- पोलियो (Polio) – 2014 में
- प्लेग (Plague) – 2 दशक से अधिक समय से कोई केस नहीं
- रिंडरपेस्ट (Rinderpest – मवेशी प्लेग) – पूर्णतः समाप्त
- यॉज (Yaws) – पूर्णतः समाप्त
- मातृ एवं नवजात टेटनस (Maternal & Neonatal Tetanus) – 2015 में
- ट्रेकोमा (Trachoma) – 2024 में
साथ ही, भारत को वर्ष 2000 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा गिनी कृमि रोग मुक्त देश का प्रमाणन प्राप्त हुआ।
भारत में उन्मूलन के लिये लक्षित रोग
1. मलेरिया (Malaria) – वर्ष 2030 तक देश में स्थानीय संक्रमण के शून्य मामले दर्ज करना।
2. लिंफैटिक फाइलेरियासिस (Lymphatic Filariasis – LF) – स्थानिक क्षेत्रों में <1% माइक्रोफाइलेरिया दर प्राप्त करना; 2030 तक पूर्ण उन्मूलन लक्ष्य।
3. कालाज़ार (Kala-azar) – ब्लॉक स्तर पर प्रति 10,000 जनसंख्या में 1 से कम वार्षिक मामले दर्ज करना।
4. टीबी (Tuberculosis) – राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) के तहत वर्ष 2025 तक देश को टीबी मुक्त करना।
नोट : किसी रोग के अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन हेतु आवश्यक है कि संबंधित रोग के कम-से-कम 3 वर्ष तक निरंतर निष्कासन की स्थिति बनी रहे।
भारत के राज्यों का गठन मुख्यतः States Reorganisation Act, 1956 और बाद के संवैधानिक संशोधनों के तहत हुआ। कई राज्यों का निर्माण भाषायी, सांस्कृतिक या प्रशासनिक आधार पर किया गया।
वर्षवार राज्यों के गठन
|
वर्ष |
राज्य/राज्य समूह |
टिप्पणी |
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1953 |
आंध्र प्रदेश |
मद्रास राज्य से तेलुगु भाषी क्षेत्र अलग कर बनाया गया – भारत का पहला भाषाई राज्य |
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1956 |
केरल, कर्नाटक (तब मैसूर), आंध्र प्रदेश का पुनर्गठन, मध्य प्रदेश, पंजाब आदि |
राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन (States Reorganisation Act) |
|
1960 |
महाराष्ट्र, गुजरात |
बंबई राज्य का विभाजन |
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1963 |
नागालैंड |
16वाँ राज्य, नगा हिल्स और तुएनसांग क्षेत्र से बना |
|
1966 |
हरियाणा, पंजाब का पुनर्गठन |
पंजाबी-भाषी और हिंदी-भाषी क्षेत्रों का विभाजन |
|
1971 |
हिमाचल प्रदेश |
केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य का दर्जा |
|
1972 |
मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा |
पूर्वोत्तर राज्यों का गठन; मणिपुर व त्रिपुरा पहले केंद्रशासित प्रदेश थे |
|
1975 |
सिक्किम |
22वाँ राज्य, भारत में विलय |
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1987 |
मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा |
तीनों को राज्य का दर्जा मिला; गोवा पहले केंद्रशासित प्रदेश था |
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2000 |
छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश से), उत्तराखंड (तब उत्तरांचल – उत्तर प्रदेश से), झारखंड (बिहार से) |
तीन नए राज्यों का गठन |
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2014 |
तेलंगाना |
आंध्र प्रदेश से अलग कर 29वाँ राज्य बनाया गया |
मुख्य तथ्य
- सबसे पहला भाषायी राज्य : आंध्र प्रदेश (1953)
- सबसे नया राज्य : तेलंगाना (2014)
- एक ही वर्ष में बने अधिकतम राज्य : 1972 (मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा) और 2000 (छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, झारखंड)
- भौगोलिक दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य : राजस्थान (1956 पुनर्गठन के बाद)
- सबसे छोटा राज्य (क्षेत्रफल) : गोवा (1987 से राज्य)
मृद्भांड संस्कृति का संबंध विशिष्ट पात्र परंपरा से है। अलग-अलग पात्र परंपराओं के आधार पर मृद्भांड संस्कृतियों को निम्नलिखित भागों में बांटा गया है-
गैरिक मृद्भांड संस्कृति (2000 से 1500 ई.पू.)
ताम्र निधियों और गैरिक मृद्भांड की समकालीनता तथा दोनों के परस्पर संबद्ध होने की संभावना स्वीकार की जा सकती है। ये गेरुए रंग के बर्तन हाथ लगाने मात्र से टूट कर बिखरने लगते हैं, इसलिये इन्हें गैरिक मृद्भांड कहा जाता है-
- प्रमुख स्थल- अतरंजीखेड़ा, अहिच्छत्र , सैफई, बिसौली, राजपुर, परसू, लालकिला, नसीरपुर इत्यादि।
- सर्वप्रथम 1822 में उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित ‘बिठूर’ नामक स्थान से ताम्र उपकरण प्राप्त हुए थे।
- उत्तर प्रदेश के इटावा स्थित ‘सैफई’ पुरास्थल से ‘मत्स्यभाला’ प्राप्त हुआ है।
- सैफई (इटावा) तथा लालकिला (बुलंदशहर) से पशुओं की कुछ अस्थियाँ प्राप्त हुई हैं। लालकिला से प्राप्त पात्र पर वृषभ का चित्र भी मिला है।
- हस्तिनापुर, श्रृंगवेरपुर एवं नोह से गैरिक मृद्भांड के साक्ष्य मिले हैं।
- अतरंजीखेड़ा तथा जयपुर स्थित जोधपुर नामक स्थल से गैरिक मृद्भांडों की प्राप्ति हुई है।
- हस्तिनापुर की खुदाई में संस्कृतियों के पांच चरण प्रकाश में आए हैं- गैरिक मृद्भांड, चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति, उत्तरी काले चमकीले मृद्भांड संस्कृति और कुषाण संस्कृति एवं मध्यकालीन संस्कृति।
- मध्य प्रदेश के गुंगेरिया से सबसे बड़ी ताम्र निधि प्राप्त हुई है, जिसमें तांबे के 424 उपकरण शामिल हैं।
लाल एवं काले मृद्भांड संस्कृति (2000 से 200 ई.पू.)
- काले एवं लाल मृद्भांड संस्कृति के अंतर्गत लघु पाषाणोपकरणों की प्रधानता थी।
- काले एवं लाल मृद्भांड संस्कृति के साक्ष्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों एवं संस्कृतियों से प्राप्त हुए हैं- जो इस प्रकार हैं- गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र स्थित रंगपुर एवं लोथल में हड़प्पाकालीन संस्कृति, पंजाब एवं हरियाणा में चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति, उत्तर प्रदेश के अतरंजीखेड़ा और राजस्थान के नोह स्थित गैरिक एवं चित्रित धूसर मृद्भांडों की संस्कृतियाँ, मध्य प्रदेश के उज्जैन एवं माहेश्वर से प्राप्त उत्तरी काले चमकीले मृद्भांड संस्कृति तथा दक्षिण भारत एवं बिहार से प्राप्त काले एवं लाल मृद्भांड संस्कृति।
चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति (1000 से 600 ई.पू.)
उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले में रामनगर के पास स्थित ‘अहिच्छत्र’ नामक टीले से वर्ष 1940-44 के दौरान हुए उत्खनन से सर्वप्रथम चित्रित धूसर मृद्भांड की जानकारी मिलती है। इस धूसर अथवा स्लेटी मृद्भांड परंपरा का प्रसार पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान और ऊपरी गंगाघाटी में मिलता है।
- हस्तिनापुर चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) परंपरा का महत्त्वपूर्ण स्थल है।
- हरियाणा का भगवानपुरा एवं अतरंजीखेड़ा (उत्तर प्रदेश) से धूसर पात्र के साथ लौह उपकरण भी मिले हैं।
उत्तरी काले चमकीले मृद्भांड संस्कृति (800 से 100 ई.पू.)
उत्तरी काले चमकीले मृद्भांडों (Northern Black Polished Ware) का निर्माण अच्छी प्रकार से गुंथी एवं मर्दित मिट्टी से हुआ है। इस परंपरा के पात्र चाक पर निर्मित प्रतीत होते हैं। ये बर्तन अत्यंत पतले तथा हल्के हैं।
- मेरठ ज़िले की मवाना तहसील में स्थित हस्तिनापुर से NBPW के साक्ष्य मिले हैं।
- उत्तरी काले चमकीले मृद्भांड संस्कृति प्राचीन भारतीय इतिहास में भू-चिह्न के रूप में उभर कर सामने आती हैं, जिसे द्वितीय नगरीय क्रांति की संज्ञा दी जाती है जिसका संबंध लौह तकनीक के विकास से है।
भारत सरकार ने वर्ष 1993 में सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (Member of Parliament Local Area Development Scheme – MPLADS) शुरू की थी, ताकि संसद सदस्य अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों की सिफारिश कर सकें। यह योजना स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप सतत् सामुदायिक परिसंपत्तियों के निर्माण पर केंद्रित है। हाल ही में सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के राज्य मंत्री ने इसके प्रभावी कार्यान्वयन हेतु संशोधित दिशा-निर्देश 2023 जारी किये हैं।
योजना की प्रमुख विशेषताएँ
|
पहलू |
विवरण |
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प्रारंभ |
वर्ष 1993, केंद्रीय क्षेत्र की योजना |
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सिफारिश का अधिकार |
लोकसभा सांसद – अपने निर्वाचन क्षेत्र में, राज्यसभा सांसद – अपने राज्य के किसी भी जिले में, मनोनीत सांसद – देश के किसी भी राज्य/जिले में |
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कार्यान्वयन एजेंसी |
राज्य का नोडल विभाग योजना की निगरानी करता है; जिला प्राधिकरण परियोजना स्वीकृति, निधि आवंटन और कार्यान्वयन के लिये जिम्मेदार |
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वित्त पोषण |
प्रत्येक सांसद को प्रति वर्ष ₹5 करोड़, दो किस्तों में (₹2.5 करोड़ प्रत्येक) MoSPI द्वारा जिला प्राधिकारियों को जारी |
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निधि की प्रकृति |
Non-lapsable (यदि राशि का उपयोग नहीं होता तो अगले वर्ष तक आगे बढ़ाई जा सकती है) |
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SC/ST आवंटन |
कम-से-कम 15% – अनुसूचित जाति के लिये, और 7.5% – अनुसूचित जनजाति के लिये परिसंपत्ति निर्माण |
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विशेष प्रावधान |
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अन्य योजनाओं के साथ अभिसरण
- स्वच्छ भारत मिशन (SBM)
- MGNREGS (परिसंपत्ति निर्माण हेतु)
- खेलो इंडिया (खेल अवसंरचना हेतु)
पात्र कार्य
- सरकारी भूमि पर अचल संपत्ति निर्माण।
- सरकारी स्वामित्व/नियंत्रण या अनुदान प्राप्त संस्थानों के लिए चल संपत्ति।
- पंजीकृत सामाजिक कल्याण सोसाइटी की भूमि (≥3 वर्ष) पर निर्माण (सांसद/परिवार की भागीदारी वर्जित)।
- न्यायालय परिसर में बार एसोसिएशन भवन (आवर्ती व्यय नहीं)।
महत्त्व
- विकास का विकेंद्रीकरण – सांसद सीधे स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं।
- सामुदायिक सहभागिता – स्थानीय स्तर पर स्थायी संपत्तियों का निर्माण।
- आपदा राहत एवं राष्ट्रीय एकता – संकट के समय तेज़ और लक्षित सहायता।
MPLADS स्थानीय विकास का एक सशक्त साधन है, जो सांसदों को सीधे अपने मतदाताओं की ज़रूरतों के अनुरूप परियोजनाएँ शुरू करने का अवसर देता है। संशोधित दिशा-निर्देश 2023 ने इसे और पारदर्शी, लचीला और परिणामोन्मुख बनाया है, जिससे योजना का लाभ देश के हर हिस्से तक प्रभावी रूप से पहुँच सके।
- इनामगाँव महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में घोड़ नदी के किनारे स्थित एक प्रमुख पुरातात्त्विक स्थल है। यह स्थल लगभग 1600 ई.पू. से 700 ई.पू. तक के उत्तर जोरवे संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।
- यहाँ से कृषिप्रधान समाज, मकानों, अनाज के भंडार, शवाधान, मिट्टी के बर्तन, औज़ार और आभूषणों के प्रमाण मिले हैं। इनामगाँव हमें प्रागैतिहासिक भारत के ग्रामीण जीवन, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विकास को समझने का महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।
- लगभग 5 हेक्टेयर में फैला यह स्थल 1600-1700 वर्ष ई.पू. में बसावट में था। इसकी सबसे पहली बसावट मालवा चरण (1600-1400 वर्ष ई.पू.) में, उसके बाद प्रारंभिक जोरवे चरण (1400-1000 वर्ष ई.पू.) और अंत में परवर्ती जोरवे चरण (1000-700 वर्ष ई.पू.) में रही।
- इनामगाँव में सार्वजनिक स्थापत्य भी मौजूद है। यहाँ दुर्ग की दीवार, पूरे स्थल के चारों ओर खाई, सिंचाई के लिये नहर और विशालकाय बाँध आदि देखे जा सकते हैं। यह निर्माण प्रारंभिक जोरवे चरण में हुए प्रतीत होते हैं।
- इस विशालकाय ढांचे से मानव आवास का कोई प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है, परंतु गड्ढानुमा अनाज भंडार और मिट्टी के गोल चबूतरों वाली एक खत्ती पाई गई है। दो बड़े अग्निकुंड भी खत्ती में मिले हैं।
- यह प्रमुख ढांचा क्षेत्र के बीच में स्थित है और इसके ठीक बगल में इनामगाँव का सबसे बड़ा घर भी मौजूद है। यह घर 5 कमरों वाला है।
- इस मकान के आंगन में चार पैरों वाला एक मर्तबान भी मिला है, जिसके अंदर एक वयस्क पुरुष का कंकाल पालथी मारे मिला है। जिसके पाँव सही सलामत हैं। इस अंतिम विशेषता की तुलना में इनामगाँव के अन्य शवाधानों से की गई है, जहाँ शवों को पांवों के बिना दफनाया गया है।
- थोड़े-से पूर्ववर्ती स्तर में मिले चार पैरों वाले एक मर्तबान को प्रतीकात्मक शवाधान का नमूना माना गया है क्योंकि इसमें कोई भी मानव कंकाल नहीं है। इसमें केवल पशु की एक हड्डी थी और मर्तबान चूड़ीदार ढक्कन से ढका हुआ था।
- एक और शवाधान मिला है, जिसमें मिट्टी के दो मर्तबान एक-दूसरे के अंदर मिले हैं। इन मर्तबानों के अंदर दो वर्ष की एक बच्ची का कंकाल था, जिसके गले में एक सूर्यकांत मणि तो एक तांबे के मनके के काम वाली माला पड़ी है। इससे आरोपित अथवा वंशानुगत प्रस्थिति का उदाहरण प्रस्तुत होता है।
- परवर्ती जोरवे चरण में अधिकांश गोल झोपड़ियाँ मिली हैं। चार कक्षों वाला एक आयताकार ढांचा बस्ती के पूर्वी सीमांत में मिला है। इस ढांचे में एक दोहरा शवाधान (एक पुरुष और एक स्त्री) मिला है जिनके पांव सही-सलामत हैं।
तकनीकी शिक्षा को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उद्देश्यों को साकार करने के लिए केंद्र सरकार ने MERITE योजना को लागू करने की मंज़ूरी दी है। यह योजना देशभर के 275 तकनीकी संस्थानों में शैक्षिक गुणवत्ता, अनुसंधान क्षमता और रोजगार योग्यता में व्यापक सुधार लाने पर केंद्रित है। MERITE के माध्यम से डिजिटल शिक्षा, बहु-विषयक कार्यक्रम, अनुसंधान सुदृढ़ीकरण और गुणवत्ता आश्वासन जैसे उपायों को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे आने वाले वर्षों में लगभग 7.5 लाख विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिलेगा।
- मुख्य तथ्य
- पूरा नाम : Multidisciplinary Education and Research Improvement in Technical Education (MERITE)
- योजना का प्रकार : केंद्रीय क्षेत्रक योजना
- अवधि : 2025–26 से 2029–30
- कुल बजट : ₹4200 करोड़
- इसमें ₹2100 करोड़ की विश्व बैंक ऋण सहायता शामिल है।
- लाभार्थी संस्थान :
- राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NITs)
- राज्य इंजीनियरिंग संस्थान
- संबद्ध तकनीकी विश्वविद्यालय
- इंजीनियरिंग कॉलेज और पॉलीटेक्निक संस्थान
- लक्षित लाभार्थी : लगभग 7.5 लाख विद्यार्थी (सभी राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश)
- क्रियान्वयन ढाँचा
- सहयोगी संस्थान :
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs)
- भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIMs)
- अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE)
- राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (NBA)
- कार्यान्वयन फोकस :
- शिक्षा का डिजिटलीकरण
- बहु-विषयक कार्यक्रमों का विकास
- रोज़गार योग्यता और कौशल विकास
- अनुसंधान व नवाचार को प्रोत्साहन
- गुणवत्ता आश्वासन और प्रत्यायन (Accreditation) में सुधार
- श्रम-बाज़ार आधारित पाठ्यक्रम तैयार करना
- भावी शैक्षणिक नेतृत्व, विशेषकर महिलाओं, को बढ़ावा देना
- सहयोगी संस्थान :
- महत्त्व
- तकनीकी शिक्षा में वैश्विक मानकों के अनुरूप सुधार।
- छात्रों को 21वीं सदी के कौशल से लैस करना।
- इंडस्ट्री–अकादमिक गैप को कम करना और रोजगार के अवसर बढ़ाना।
कलकत्ता की मोहम्मडन लिटरेरी सोसाइटी की स्थापना सन् 1863 में नवाब अब्दुल लतीफ द्वारा की गयी थी। यह भारत में मुस्लिम समाज के बौद्धिक और सामाजिक उत्थान की दिशा में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कदम था। उस समय बंगाल में अंग्रेज़ी शिक्षा का प्रसार तो हो रहा था, किन्तु मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग आधुनिक शिक्षा से दूर था। अब्दुल लतीफ ने इस सोसाइटी के माध्यम से मुस्लिम युवाओं को अंग्रेज़ी, विज्ञान और आधुनिक विषयों की ओर प्रेरित किया।
इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा का प्रसार करना, सामाजिक कुरीतियों जैसे बहुविवाह, पर्दा प्रथा तथा कट्टरता को समाप्त करना था। इस संगठन ने मुस्लिम समाज को आधुनिक सोच अपनाने, पश्चिमी शिक्षा को स्वीकार करने और अंग्रेज़ी शासन के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने के लिये प्रेरित किया। सोसाइटी ने यह भी माना कि समाज का विकास केवल धार्मिक शिक्षा से नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा से भी सम्भव है।
अब्दुल लतीफ स्वयं अलीगढ़ आंदोलन के पूर्वगामी माने जाते हैं। उनकी इस पहल ने आगे चलकर सर सैयद अहमद ख़ान के शैक्षिक सुधार आंदोलन को प्रेरणा दी। यह संस्था हिंदू-मुस्लिम एकता को भी आगे बढ़ाने में सहायक बनी, क्योंकि इसका उद्देश्य केवल मुसलमानों तक सीमित न रहकर भारत में सभी समुदायों को शिक्षित और जागरूक बनाना था।
मोहम्मडन लिटरेरी सोसाइटी ने अपने समय में आधुनिक विचारधारा के प्रसार, शिक्षा में समान अवसर और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में एक मजबूत बौद्धिक मंच प्रदान किया। इस संस्था ने भारत में मुस्लिम पुनर्जागरण की नींव रखने में निर्णायक भूमिका निभाई।
ज्योतिबा फुले उन्नीसवीं सदी के भारत के एक प्रमुख समाज सुधारक, चिंतक और मानवतावादी थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज में फैली असमानता, जातिगत भेदभाव और लैंगिक विषमता के विरुद्ध संघर्ष करने में समर्पित कर दिया। उनका लक्ष्य था – समाज के वंचित वर्गों को शिक्षित कर उनके जीवन में सम्मान और अधिकार की भावना जगाना।
फुले का मानना था कि ज्ञान ही मुक्ति का सबसे बड़ा साधन है। उन्होंने 1851 में अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला, जो महिला शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक कदम था। बाद में उन्होंने निचली जातियों के बच्चों और गरीब वर्ग के लिये भी विद्यालय स्थापित किये। 1854 में उन्होंने विधवाओं और परित्यक्त महिलाओं की सहायता के लिये एक अनाथालय खोला।
महिलाओं की स्थिति सुधारने हेतु उन्होंने विधवा पुनर्विवाह की वकालत की और समाज के पितृसत्तात्मक ढाँचे का विरोध किया। वे लैंगिक समानता में विश्वास करते थे और अपने सभी सामाजिक कार्यों में सावित्रीबाई को बराबर का स्थान देते थे।
1873 में उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जातिगत भेदभाव को समाप्त करना और समाज में समानता स्थापित करना था। उन्होंने “दलित” शब्द का प्रयोग उन वर्गों के लिये किया जिन्हें समाज ने अछूत मान लिया था।
फुले ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भी सामाजिक परिवर्तन का संदेश दिया। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ ‘गुलामगिरी’ और ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ हैं। इनमें उन्होंने ब्राह्मणवादी वर्चस्व, सामाजिक अन्याय और उपनिवेशी दमन की तीखी आलोचना की।
ज्योतिबा फुले न केवल समाज सुधारक थे, बल्कि भारत में समानता, शिक्षा और मानवाधिकारों के अग्रदूत भी थे। उनके विचार आज भी सामाजिक न्याय और समानता के पथप्रदर्शक बने हुए हैं।
मत्स्य अथवा मच्छ महाजनपद प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में से एक महत्त्वपूर्ण राज्य था। इसकी राजधानी विराटनगर थी, जिसका नाम इसके प्रतिष्ठित संस्थापक राजा विराट के नाम पर पड़ा। विराटनगर की पहचान न केवल प्रशासनिक केन्द्र के रूप में थी, बल्कि यह सांस्कृतिक, आर्थिक और सैन्य दृष्टि से भी एक सुदृढ़ और विकसित नगर था। आधुनिक काल में इसे राजस्थान के जयपुर, अलवर तथा भरतपुर क्षेत्रों से सम्बद्ध माना जाता है। प्राचीन साहित्य में मत्स्य राज्य का भू-भाग काफी विस्तृत था, जिसमें राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र से लेकर हरियाणा के दक्षिणी हिस्सों तक का क्षेत्र समाहित था।
महाभारत में मत्स्य राज्य की महत्ता अत्यन्त उभरकर सामने आती है। जब पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान गुप्त रूप से रहे, तो उन्होंने आश्रय राजा विराट के दरबार में लिया था। इसी काल में भीम ने किचक का वध किया तथा अर्जुन ने बृहन्नला के रूप में राजकुमारी उत्तरा को नृत्य तथा संगीत की शिक्षा दिये। राजा विराट की पुत्री उत्तरा का विवाह अभिमन्यु से हुआ, जो आगे चलकर कुरु–वंश की अगली पीढ़ी को जन्म देते हैं। इससे स्पष्ट है कि मत्स्य राज्य ने महाभारत के राजनीतिक परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
बौद्ध साहित्य तथा जैन परम्पराओं में भी मत्स्य राज्य का उल्लेख मिलता है। यह क्षेत्र कृषि, गौ–पालन, घुड़सवारी तथा व्यापारिक गतिविधियों के लिये प्रसिद्ध था। अरावली पर्वतमाला और उपजाऊ मैदानों के कारण यहाँ उत्पादन समृद्ध था और कई व्यापारिक मार्ग इस क्षेत्र से होकर गुजरते थे। मत्स्य राज्य का सैन्य बल भी प्रभावशाली था, और इसे समीपवर्ती पाँचाल, कुरु तथा सुरसेन राज्यों के साथ गठबंधन और संपर्क बनाये रखने में विशेषता प्राप्त थी।
समग्र रूप से, मत्स्य महाजनपद राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक विकसित और सशक्त राज्य था, जिसने प्राचीन भारतीय इतिहास में अपनी विशिष्ट पहचान बनायी।
महापद्मनंद प्राचीन भारत के नंद वंश का संस्थापक तथा मगध का अत्यंत शक्तिशाली शासक था। पुराणों के अनुसार महापद्मनंद एक शूद्र था, जिसने शिशुनाग वंश के अंतिम शासकों का अंत कर मगध की सत्ता अपने हाथों में ले ली। उसकी इस सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण भारतीय इतिहास में उसका स्थान विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि उसने परंपरागत क्षत्रिय शासन को समाप्त कर एक नए वंश की स्थापना की।
पुराणों में महापद्मनंद को ‘सर्वक्षत्रांतक’ कहा गया है, जिसका अर्थ है— क्षत्रियों का संहार करने वाला। इससे स्पष्ट होता है कि उसने अनेक क्षत्रिय राजवंशों को पराजित कर मगध साम्राज्य का व्यापक विस्तार किया। उसे ‘भार्गव’ भी कहा गया है, अर्थात् दूसरे परशुराम का अवतार, जो इस तथ्य को दर्शाता है कि जैसे परशुराम ने क्षत्रियों का नाश किया था, वैसे ही महापद्मनंद ने भी तत्कालीन क्षत्रिय शासकों को पराजित किया।
महापद्मनंद के शासनकाल में मगध साम्राज्य अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँच गया। उसने उत्तर भारत के अनेक राज्यों—जैसे कलिंग, अवंति, कोशल तथा वत्स—पर प्रभाव स्थापित किया। उसकी शक्ति इतनी व्यापक थी कि उसे “एकछत्र सम्राट” माना जाता है। उसकी विशाल सेना, विशेष रूप से पैदल सेना, प्राचीन भारत की सबसे बड़ी सेनाओं में गिनी जाती थी।
महापद्मनंद एक कुशल प्रशासक और कठोर शासक था। उसने राज्य की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया तथा कर व्यवस्था को संगठित रूप दिया। यूनानी इतिहासकारों ने भी नंदों की अपार संपत्ति और शक्ति का उल्लेख किया है।
महापद्मनंद के बाद उसके आठ पुत्रों ने शासन किया, जिन्हें सामूहिक रूप से नव नंद कहा जाता है। अंततः नंद वंश का पतन चंद्रगुप्त मौर्य के हाथों हुआ, जिसने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। इस प्रकार महापद्मनंद का शासन भारतीय इतिहास में एक संक्रमण काल का प्रतीक माना जाता है।
बिंबिसार प्राचीन भारत के हर्यंक वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक था और उसे मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उसने मात्र 15 वर्ष की आयु में मगध की सत्ता सँभाली और लगभग 52 वर्षों तक शासन किया। उसके दीर्घ और सुदृढ़ शासनकाल में मगध ने राजनीतिक, आर्थिक तथा सैनिक दृष्टि से विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। जैन साहित्य में बिंबिसार को ‘श्रेणिक’ नाम से भी जाना जाता है।
बिंबिसार की सबसे बड़ी विशेषता उसकी कूटनीतिक और वैवाहिक नीति थी। उसने अपने राज्य की नींव और विस्तार वैवाहिक संबंधों के माध्यम से सुदृढ़ किया। उसने तीन विवाह किये। उसकी प्रथम पत्नी महाकोशला देवी थीं, जो कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन थीं। इस विवाह के फलस्वरूप बिंबिसार को काशी प्रांत दहेज में मिला, जिससे मगध को लगभग एक लाख की वार्षिक आय प्राप्त होती थी।
दूसरी पत्नी वैशाली की लिच्छवि राजकुमारी चेलना (छलना) थीं, जिनसे अजातशत्रु का जन्म हुआ। इस विवाह से मगध और वज्जि संघ के बीच संबंध प्रगाढ़ हुए। तीसरी पत्नी क्षेमा थीं, जो पंजाब के मद्र कुल की राजकुमारी थीं। इन वैवाहिक संबंधों के कारण मगध को उत्तर और पश्चिम की ओर विस्तार का अवसर मिला।
सैन्य दृष्टि से भी बिंबिसार एक सक्षम शासक था। उसने अंग राज्य को जीतकर उसे मगध में मिला लिया और वहाँ अपने पुत्र अजातशत्रु को शासक नियुक्त किया। इसके अतिरिक्त उसने अवंति के शासक चंडप्रद्योत से मित्रता की नीति अपनायी और अपने राजवैद्य जीवक को उसके उपचार के लिये भेजा।
इस प्रकार बिंबिसार ने युद्ध, कूटनीति और वैवाहिक नीति के माध्यम से मगध को एक शक्तिशाली राज्य में परिवर्तित किया।
कुशीनारा के मल्ल प्राचीन भारत के प्रसिद्ध गणराज्यात्मक समुदाय थे, जिनका उल्लेख रामायण, बौद्ध तथा जैन साहित्य में मिलता है। मल्ल गणराज्य दो प्रमुख केन्द्रों में विभक्त था— कुशीनारा और पावा। इनमें कुशीनारा का विशेष ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व रहा। वाल्मीकि रामायण के अनुसार मल्लों को लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकेतुमल्ल का वंशज बताया गया है, जिससे उनका सम्बन्ध सूर्यवंशी परम्परा से जोड़ा जाता है। यह वंशगत गौरव मल्लों की सामाजिक प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
राजनीतिक दृष्टि से मल्ल एक गणतंत्रात्मक राज्य था। यहाँ शासन किसी एक राजा के हाथों में न होकर गणसभा द्वारा संचालित किया जाता था। राज्य के महत्त्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिये जाते थे। मल्लों की प्रशासनिक व्यवस्था संगठित और अनुशासित थी, जिससे यह गणराज्य दीर्घकाल तक स्वतंत्र बना रहा। मल्ल लोग साहसी, युद्धकला में निपुण तथा स्वतंत्रता-प्रिय माने जाते थे।
कुशीनारा का सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण से जुड़ा हुआ है। यही वह स्थान है जहाँ बुद्ध ने अपना अंतिम उपदेश दिया और निर्वाण को प्राप्त हुए। इस कारण कुशीनारा बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात मल्लों ने उनके अस्थि-अवशेषों को सम्मानपूर्वक सुरक्षित रखा और उन पर स्तूप का निर्माण करवाया। इससे मल्लों की बौद्ध धर्म के प्रति आस्था और सम्मान का पता चलता है।
सामाजिक दृष्टि से मल्ल गण एक संगठित और अनुशासित समाज था। यहाँ कृषि, पशुपालन और व्यापार का विकास हुआ था। गंगा और उसकी सहायक नदियों के समीप स्थित होने के कारण यह क्षेत्र आर्थिक रूप से भी सुदृढ़ था।
इस प्रकार, कुशीनारा के मल्ल वंशगत गौरव, गणतंत्रात्मक शासन और बौद्ध इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका के कारण प्राचीन भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।
कपिलवस्तु के शाक्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणराज्यात्मक समुदाय थे। इनकी राजधानी कपिलवस्तु थी, जिसकी स्थापना शाक्यवंशीय शासक सुकीर्ति द्वारा करवायी गयी थी। शाक्य जनपद हिमालय की तराई क्षेत्र में स्थित था और राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक दृष्टियों से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता था। यह गणराज्य सोलह महाजनपदों के काल में विद्यमान था और अपनी स्वतंत्र प्रशासनिक व्यवस्था के लिये जाना जाता था।
कपिलवस्तु केवल एक नगर नहीं था, बल्कि शाक्य गणराज्य के अंतर्गत अनेक अन्य नगर भी सम्मिलित थे। इनमें चातुमा, सामगाम, खोमदुस्स, सिलावती, नगरक तथा देवदह प्रमुख थे। इन नगरों के प्रतिनिधि मिलकर गणसभा में राज्य के निर्णय लिया करते थे। शाक्यों की शासन-प्रणाली में राजा का स्थान सीमित था और वास्तविक शक्ति गणसभा के पास होती थी, जो इस राज्य के गणतंत्रात्मक स्वरूप को दर्शाती है।
शाक्य समाज की एक विशेष सामाजिक परम्परा थी कि वे अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं करते थे। इस कारण उनका सामाजिक ढाँचा अत्यंत सुदृढ़ और संगठित बना रहा। शाक्य लोग क्षत्रिय कहलाते थे और युद्ध, प्रशासन तथा राजनीति में निपुण थे। उनकी सैन्य शक्ति भी उल्लेखनीय थी, यद्यपि वे शांति-प्रिय माने जाते थे।
शाक्य गणराज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान यह है कि गौतम बुद्ध का जन्म इसी गणराज्य में लुम्बिनी में हुआ था। बुद्ध के विचारों ने आगे चलकर पूरे एशिया को प्रभावित किया। परन्तु शाक्य गणराज्य का अंत दुखद रहा। कोसल के नरेश विडूडभ ने कपिलवस्तु पर आक्रमण कर शाक्य राज्य का विनाश कर दिया। इस प्रकार, कपिलवस्तु के शाक्य राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक इतिहास में एक अमर स्थान रखते हैं।
विकास के कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों को निम्नलिखित रूप में वर्णित किया जा सकता है-
- विकास का प्रतिरूप- विकास का एक निश्चित प्रतिरूप होता है। मनुष्य का शारीरिक विकास दो दिशाओं, मस्तकाधोमुखी दिशा तथा निकट से दूर दिशा में होता है। प्रथम प्रकार की दिशा में शारीरिक विकास ‘सिर से पैर की ओर’ होता था। वहीं दूसरे प्रकार की दिशा में शारीरिक विकास पहले केंद्रीय भागों में प्रारंभ होता है उसके पश्चात् केंद्र से दूर के भागों में होता है।
- विकास की दिशा- विकास सामान्य से विशेष की ओर होता है। कोई भी बालक विकासक्रम में पहले सामान्य क्रियाएँ संपादित करता है उसके बाद विशेष क्रियाओं की तरफ जाता है। विकास का यह नियम शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक तथा सामाजिक सभी प्रकार के विकास पर लागू होता है।
- विकास अवस्थाओं का पालन- विकास अवस्थाओं के अनुसार होता है। बालक को सामान्य रूप से देखने पर ऐसा मालूम पड़ता है कि उसका विकास रुक-रुक कर हो रहा है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता है। उदाहरण के रूप में जब बालक के दूध के दाँत निकलते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि दाँत एकाएक निकल आए, परंतु इसकी नींव गर्भावस्था के पाँचवे महीने में पड़ जाती है और ये जन्म के बाद 5-6 महीने में आते हैं।
- विकास में व्यक्तिगत विभेद- विकास में व्यक्तिगत विभेद हमेशा स्थिर होते हैं। जिस बालक में शारीरिक क्रियाएँ जल्दी उत्पन्न होती हैं वह शीघ्रता से बोलने भी लगता है, जिससे उसके भीतर सामाजिकता का विकास तेज़ी से होता है। इसके उलट जिन बालकों के शारीरिक विकास की गति धीमी होती है उनमें मानसिक और अन्य प्रकार का विकास भी विलंब से होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रत्येक बालक में शारीरिक व मानसिक योग्यताओं की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है। इस कारण समान आयु के दो बालक व्यवहार में समानता नहीं रखते हैं।
- विकास की गति में विभिन्नता- विकास की गति में तीव्रता और मंदता विद्यमान होती है। व्यक्ति का विकास सदैव एक ही गति से नहीं होता बल्कि उसमें निरंतर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। उदाहरण के लिये विकास की अवस्था में यह गति तीव्र रहती है उसके पश्चात् मंद पड़ जाती है।
- परिपक्वता और शिक्षण का परिणाम- बालक का विकास परिपक्वता और शिक्षण का परिणाम होता है। परिपक्वता का अर्थ व्यक्ति के वंशानुक्रम द्वारा शारीरिक गुणों का विकास है। बालक के अंदर स्वतंत्र रूप से एक ऐसी क्रिया चलती रहती है, जिसके परिणामस्वरूप उसके शारीरिक अंग अपने-आप परिपक्व हो जाते हैं। उसके लिये उसे वातावरण से मदद नहीं लेनी पड़ती है। वहीं शिक्षण और अभ्यास परिपक्वता के विकास में मदद प्रदान करते हैं। ये सीखने के लिये परिपक्व आधार तैयार करते हैं और सीखने के द्वारा बालक के व्यवहार में प्रगतिशील परिवर्तन आते हैं।
- विकास की प्रक्रिया- विकास एक अविराम प्रक्रिया है। यह निरंतर चलती रहती है। उदाहरण के रूप में शारीरिक विकास गर्भावस्था से लेकर परिपक्वावस्था तक चलता रहता है, लेकिन कालांतर में वह उठने-बैठने, चलने-फिरने और दौड़ने-भागने की क्रियाएँ करने लगता है।
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में उरुग्वे दौर (1986–94) की वार्ताओं के बाद मारकेश समझौते के तहत हुई थी। इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में स्थित है। WTO एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो वैश्विक व्यापार को अधिक उदार, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने का कार्य करती है। इसने 1948 से सक्रिय GATT (General Agreement on Tariffs and Trade) का स्थान लिया।
मुख्य कार्य
- सरकारों को व्यापार समझौते करने के लिये मंच प्रदान करना
- व्यापार विवादों का समाधान करना
- व्यापार नियमों की निगरानी करना
- व्यापार बाधाओं को कम कर वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देना
विस्तृत क्षेत्र
GATT केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित था, जबकि WTO वस्तुओं, सेवाओं और बौद्धिक संपदा (जैसे डिज़ाइन, पेटेंट, आविष्कार) में व्यापार को शामिल करता है।
सदस्यता
- वर्तमान में WTO के 166 सदस्य हैं जो विश्व व्यापार के 98% का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- भारत वर्ष 1995 से WTO का सदस्य है और 1948 से GATT का हिस्सा रहा है।
- सदस्यता पारस्परिक वार्ताओं के आधार पर दी जाती है, जिससे सभी देशों के अधिकार और दायित्व संतुलित रहते हैं।
प्रमुख समझौते
- TRIMS: व्यापार-संबंधित निवेश उपाय
- TRIPS: बौद्धिक संपदा अधिकार
- AoA: कृषि पर समझौता
प्रमुख रिपोर्टें
- वर्ल्ड ट्रेड रिपोर्ट
- ग्लोबल ट्रेड आउटलुक एंड स्टैटिस्टिक्स
WTO का महत्त्व
- 1995 के बाद से विश्व व्यापार की वास्तविक मात्रा 2.7 गुना बढ़ी है।
- औसत टैरिफ दर 10.5% से घटकर 6.4% रह गई है।
- वैश्विक व्यापार का कुल मूल्य लगभग चार गुना बढ़ा है।
- WTO ने पूर्वानुमानित बाजार परिस्थितियों को बढ़ावा दिया, जिससे ग्लोबल वैल्यू चेन (GVC) का विकास हुआ, जो आज 70% वस्तु व्यापार में योगदान देता है।
- गरीबी उन्मूलन में सहायता करते हुए, 1995 में 33% रही अत्यधिक गरीबी की दर 2020 तक 10% से नीचे आ गई है।
आज के वैश्विक तनावों के बावजूद WTO व्यापार नियमों के लिये एक विश्वसनीय और केंद्रीय संस्थान बना हुआ है। यह ग्लोबल साउथ जैसे विकासशील देशों को समान मतदान अधिकार और विवाद समाधान तक पहुँच प्रदान कर, उन्हें वैश्विक व्यापार वार्ताओं में भागीदारी सुनिश्चित कराता है।
- केंद्रीय विद्यालय परियोजना- यह परियोजना भारत की केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिये शुरू की गई थी जो पूरे देश में प्रभावी है। भारत सरकार के द्वितीय वेतन आयोग की सिफारिश पर नवंबर 1962 में केंद्रीय विद्यालय परियोजना को सहमति प्रदान की गई तथा वर्ष 1963 में इसे शुरू किया गया। इसमें कर्मचारियों के परिवारों को स्थानांतरित किये जाने के स्थान पर समान गति से समान पाठ्यक्रम का पालन करने वाली संस्थाओं में समान शिक्षा प्रदान करने के लिये व्यवस्था की गई।
- नवोदय विद्यालय- राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 ने सुझाव दिया कि बुद्धिमान ग्रामीण विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा का अवसर देने के लिये प्रत्येक ज़िला मुख्यालय में कम-से-कम एक नए नवोदय विद्यालय की स्थापना की जाए। ग्रामीण प्रतिभा का समुचित पोषण करना इन विद्यालयों का उद्देश्य है।
- ओपन स्कूल- मुक्त शिक्षा प्रणाली उन लोगों की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये लाई गई जो विभिन्न कारणों से बहुत व्यवस्थित तरीके से शैक्षिक मिशन को पूरा नहीं कर सकते। शिक्षा के उच्च या तृतीयक स्तर की तरह, विद्यालय स्तर में भी शिक्षा की ओपन व्यवस्था में आम लोगों को शैक्षिक अवसर प्रदान करने का प्रावधान है। ओपन सिस्टम की अवधारणा और दूरस्थ शिक्षा ने इस नई अवधारणा को विकसित किया है। जब भी पत्राचार पाठ्यक्रमों के माध्यम से स्कूली शिक्षा ज़रूरतमंद व्यक्तियों को प्रदान की जाती है तो उसे ओपन स्कूल कहा जाता है। NIOS इस तरह के विद्यालयों को संचालन करता है।
रुधिर या रक्त हमारे शरीर में विद्यमान एक तरल पदार्थ है जो पाचित भोज्य पदार्थों को क्षुद्रांत से शरीर के अन्य भागों तक, ऑक्सीजन को फेफड़ों से शरीर की कोशिकाओं तक, साथ ही शरीर के अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के लिये उनका परिवहन करता है। रक्त, प्लाज़्मा (Plasma) नामक तरल से बना है। यह रक्त प्रोटीनों से निर्मित हल्का पीला द्रव है। प्लाज़्मा में तीन प्रकार की कोशिकाएँ विद्यमान रहती हैं- लाल रक्त कणिकाएँ/कोशिकाएँ (Erythrocytes), श्वेत रक्त कणिकाएँ/कोशिकाएँ (Leukocytes) एवं पट्टिकाणु (Platelets)। ये रुधिर कोशिकाएँ अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में बनती हैं।
- लाल रक्त कोशिकाएँ (Red Blood Cells- RBC) : आरबीसी अत्यंत छोटी कोशिका है जो रक्त में तैरती है, इसीलिये इसे कणिकाएँ (Corpuscles) भी कहते हैं। आरबीसी में लाल रंग का एक वर्णक होता है जिसे हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) कहते हैं। हीमोग्लोबिन के कारण ही रक्त लाल होता है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को स्वयं से जोड़कर शरीर के सभी अंगों तक और अंततः कोशिकाओं तक पहुंचाता है। हीमोग्लोबिन की कमी में सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन ठीक से नहीं पहुँच पाती।
- श्वेत रक्त कोशिकाएँ (White Blood Cells- WBC) : वर्णक रहित ये रंगहीन कोशिकाएँ एंटीबॉडी का निर्माण कर हमारे शरीर में प्रवेश करने वाले रोगाणुओं को नष्ट कर हमें संक्रमण से बचाती हैं।
- पट्टिकाणु (Platelets) : पट्टिकाणु या प्लेटलेट्स नामक कोशिका खंड रक्त का स्कंदन या थक्का बनाने में मददगार होता है जिससे शरीर से रक्त निकलना बंद हो जाता है।
- यह पशुपालन के अंतर्गत एक उपभोग है, जिसमें मांस व अंडों के लिये मुर्गी, पीरू, बत्तख इत्यादि का पालन-पोषण किया जाता है।
- भारत में मुर्गीपालन सिंधु सभ्यता से चला आ रहा है। इसमें कम पूँजी की आवश्यकता होती है।
- कुक्कुट उत्पादन के विश्व व्यापार में भारत की भागीदारी कम है लेकिन हाल के वर्षों में तेज़ी से इसका विकास किया जा रहा है। परिणामतः भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा अंडा उत्पादक देश बन गया है।
- भारत में कुक्कुटों की सबसे अधिक संख्या आंध्र प्रदेश में है, इसके बाद तमिलनाडु का स्थान आता है।
- एक मुर्गी प्रतिवर्ष औसतन 180-200 अंडे देती है।
- भारत में केंद्रीय कुक्कुट विकास संगठन अपने क्षेत्रीय कार्यालयों के सहयोग से कुक्कुट उत्पादन में सुधार हेतु कार्य करता है।
- ‘ग्रामीण बैकयार्ड कुक्कुट विकास कार्यक्रम’ के तहत घर के आंगन में ही मुर्गीपालन करने वाले BPL परिवारों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
भारत निर्वाचन आयोग ने ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से एक ‘राजनीतिक दल पंजीकरण ट्रैकिंग प्रबंधन प्रणाली’ प्रारंभ की है।
प्रमुख बिंदु (Major Points)
- भारत निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों के पंजीकरण की प्रणाली तथा प्रक्रिया की समीक्षा की। इस समीक्षा के आधार पर ही भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के पंजीकरण की प्रणाली और प्रक्रिया को सरल बनाने के लिये एक ‘राजनीतिक दल पंजीकरण ट्रैकिंग प्रबंधन प्रणाली’ (Political Parties Registration Tracking Management System) लागू की गई है।
- इस पोर्टल के माध्यम से आवेदक दलों के पंजीकरण संबंधी आवेदनों की स्थिति का ऑनलाइन माध्यम से पता लगाया जा सकेगा।
- PPRTMS के माध्यम से 1 जनवरी, 2020 से राजनीतिक दल के पंजीकरण हेतु आवेदन करने वाले आवेदक दल ही अपने आवेदनों की स्थिति का पता लगा सकेंगे।
- आवेदक को अपने आवेदन में दल/आवेदक का मोबाइल नंबर और ई-मेल पता दर्ज करना होगा, जिसके माध्यम से वह अपने आवेदन की अद्यतन स्थिति से SMS एवं ई-मेल के माध्यम से अवगत हो सके।
आवेदन की प्रक्रिया (Application Process)
- राजनीतिक दलों का पंजीकरण जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के प्रावधानों के अंतर्गत होता है।
- उपर्युक्त धारा के तहत भारत निर्वाचन आयोग में पंजीकरण के लिये इच्छुक दल को अपने गठन की तिथि के 30 दिनों के बाद की अवधि में अपने नाम, पता, विभिन्न इकाइयों की सदस्यता का विवरण, पदाधिकारियों के नाम आदि मूलभूत विवरण सहित निर्धारित प्रारूप में आयोग के पास एक आवेदन करना होता है।
पत्थर जैसे कठोर काले रंग के इस पदार्थ का उपयोग खाना पकाने के ईंधन, रेल इंजनों को चलाने के लिये भाप उत्पादन, तापीय शक्ति संयंत्रों में विद्युत उत्पादन और विभिन्न उद्योगों में ईंधन के रूप में किया जाता है।
- बाढ़ आदि प्राकृतिक प्रक्रमों के कारण लगभग 300 मिलियन वर्ष पूर्व वन, मृदा के नीचे दब गए और अधिक मृदा के भार से संपीडित (Compressed) हो गए। पृथ्वी की गहराई में जाकर वन के पेड़-पौधे मृत होकर धीरे-धीरे कोयले में रूपांतरित हो गए। कोयले में मुख्यतः कार्बन के होने तथा मंद प्रक्रम द्वारा मृत वनस्पतियों का कोयले में रूपांतरण कार्बनीकरण (Carbonisation) कहलाया।
- वायु में गर्म करने पर कोयला जलता है जिसमें मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड गैस मुक्त होती है।
- कोयले के औद्योगिक प्रक्रमण (Industrial Processing) द्वारा कोक, कोलतार एवं कोयला गैस जैसे उपयोगी उत्पाद प्राप्त होते हैं-
- कोक (Coke) : यह कठोर, सरंध्र और काला पदार्थ है जो कार्बन का लगभग शुद्ध रूप है। यह इस्पात के औद्योगिक निर्माण एवं धातुओं के निष्कर्षण में उपयोगी है।
- कोलतार (Coal Tar) : यह लगभग दो सौ पदार्थों के मिश्रण से बना अप्रिय गंध वाला काला गाढ़ा द्रव है जिसका संश्लेषित रंग, औषधि, सुगंध, विस्फोटक, प्लास्टिक, पेंट, फोटोग्राफिक सामग्री, सड़क एवं छत निर्माण सामग्री इत्यादि में होता है। आज-कल कोलतार की जगह सड़क निर्माण में बिटुमेन जैसे पेट्रोलियम उत्पाद प्रयोग में लाए जाते हैं। मॉथ एवं अन्य कीटों को भगाने में प्रयुक्त नैफ्थलीन की गोलियां कोलतार से प्राप्त की जाती हैं।
- कोयला गैस (Coal Gas) : कोयले के प्रक्रमण द्वारा कोक बनाते समय प्राप्त होने वाली कोयला गैस का उपयोग कोयला प्रक्रमण संयंत्रों के निकट स्थापित उद्योगों में ईंधन के रूप में किया जाता है। लंदन में 1810 में एवं न्यूयॉर्क में 1820 के आस-पास इसका उपयोग पहली बार सड़कों को प्रकाशित करने के लिये किया गया था किंतु आज यह ऊष्मा के स्रोत के रूप में ज़्यादा प्रयुक्त है।
वायु प्रदूषण आधुनिक युग की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। यह न केवल पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित करता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। औद्योगीकरण, शहरीकरण और बढ़ते यातायात के कारण वायुमंडल में हानिकारक गैसों और सूक्ष्म कणों की मात्रा लगातार बढ़ रही है। यहाँ कुछ प्रमुख वायु प्रदूषकों के स्रोतों, उनके प्रभावों और उनसे बचाव के उपायों का विवरण दिया गया है।
1. सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂)
स्रोत: यह गैस जीवाश्म ईंधनों जैसे कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस के जलने से उत्पन्न होती है।
प्रभाव: जल वाष्प से प्रतिक्रिया कर यह अम्लीय वर्षा का कारण बनती है। यह अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य श्वसन रोगों को बढ़ा सकती है।
2. ओजोन (O₃)
स्रोत: यह द्वितीयक प्रदूषक सूर्य के प्रकाश में नाइट्रोजन ऑक्साइड्स और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों की अभिक्रिया से बनता है।
प्रभाव: आँखों और श्वसन तंत्र में जलन, श्वसन में तकलीफ और अस्थमा के दौरे हो सकते हैं।
3. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂)
स्रोत: नाइट्रिक ऑक्साइड व अन्य नाइट्रोजन यौगिकों की वायुमंडलीय रासायनिक प्रतिक्रियाओं से निर्मित।
प्रभाव: यह श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है और अस्थमा के लक्षणों को गंभीर बना सकता है।
4. कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
स्रोत: यह कार्बन युक्त ईंधनों के अधूरे दहन से उत्पन्न होती है।
प्रभाव: यह रक्त में ऑक्सीजन की आपूर्ति को बाधित करती है, जिससे थकान, सिर दर्द, चक्कर आना और गंभीर मामलों में मृत्यु तक हो सकती है।
5. अमोनिया (NH₃)
स्रोत: जैविक पदार्थों (जैसे अमीनो एसिड) के विघटन से उत्पन्न होता है।
प्रभाव: यह आँख, नाक, गले और फेफड़ों में जलन पैदा करता है। लंबे समय तक संपर्क होने पर अंधापन और फेफड़ों को स्थायी क्षति भी संभव है।
6. कणिका पदार्थ (पार्टिकुलेटमैटर - PM)
PM10: व्यास 10 माइक्रोन या उससे कम;
PM2.5: व्यास 2.5 माइक्रोन या उससे कम – ये अधिक खतरनाक होते हैं।
स्रोत: निर्माण स्थल, कच्ची सड़कों की धूल, खेतों की आग, वाहन उत्सर्जन आदि।
प्रभाव: ये कण फेफड़ों में जाकर अस्थमा, हृदय रोग और श्वसन क्षमता में कमी का कारण बन सकते हैं।
7. सीसा (लेड- Pb)
स्रोत: यह धातु चांदी, प्लैटिनम और लोहे जैसी धातुओं के निष्कर्षण से निकलती है।
प्रभाव: इससे एनीमिया, मांसपेशियों में कमजोरी, मस्तिष्क और गुर्दों को गंभीर क्षति हो सकती है।
वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिये एक गंभीर संकट है। भारत सरकार द्वारा वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के माध्यम से इन प्रदूषकों पर निगरानी रखी जाती है और उनके लिये मानक निर्धारित किये गए हैं। हालाँकि, इन उपायों के साथ-साथ आम जनता की सहभागिता, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग, और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।
- राष्ट्रकूट चालुक्यों के सामंत थे। राष्ट्रकूट वंश की स्थापना दंतिदुर्ग ने की थी।
- राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेत (गुलबर्गा, कर्नाटक) थी।
- दंतिदुर्ग ने मालवा का अभियान किया और हिरण्यगर्भदान यज्ञ किया जिसमें प्रतिहारों ने द्वारपाल की भूमिका निभाई थी।
- एलोरा के कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण-I ने करवाया था।
- ध्रुव त्रिपक्षीय संघर्ष में भागीदारी करने वाला प्रथम राष्ट्रकूट शासक था।
- अमोघवर्ष ने ‘कविराज मार्ग’ ग्रंथ की रचना कन्नड़ भाषा में की।
- इंद्र-III के समय अल-मसूदी भारत आया था।
- तक्कोलम की लड़ाई (949 ई.) राष्ट्रकूट शासक कृष्ण-III और चोल शासक परांतक-I ने भाग लिया जिसमें चोल शासक पराजित हुआ।
- पोन्न, कृष्ण-III के दरबार में रहते थे जिन्होंने शांतिपुराण की रचना की।
- राष्ट्रकूट राजा कर्क-II को तैलप-II ने पराजित किया और उत्तरवर्ती चालुक्यों की स्थापना की। उत्तरवर्ती के चालुक्य कल्याणी के चालुक्यों को कहते हैं।
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देश |
गुप्तचर संस्थाएँ |
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चीन |
Ministry of State Security – MSS (पूर्व में सेंट्रल एक्सटर्नल लेंजा डिपार्टमेंट) |
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रूस |
के.जी.बी./जी.आर.यू. |
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दक्षिण अफ्रीका |
State Security Agency- SSA (पूर्व में ब्यूरो ऑफ स्टेट सिक्यूरिटी) |
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यू.के. |
एम.आई. (मिलिट्री इंटेलीजेंस)- 5 एवं 6, ज्वाइंट इंटेलीजेंस आर्गेनाइजेशन |
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पाकिस्तान |
इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस (आई.एस.आई.) |
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भारत |
रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW), इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) |
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यू.एस.ए. |
सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (CIA), फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) |
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इज़राइल |
मोसाद |
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मिस्र |
जनरल इंटेलिजेंस डायरेक्टरेट (मुखबरात) |
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जापान |
नाइचो |
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ईरान |
सावाक |
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इराक |
अल मुखबरात |
- बलबन इल्तुतमिश का तुर्की दास था, जिसे उसने ग्वालियर विजय के बाद खरीदा था।
- बलबन का वास्तविक नाम बहाउद्दीन था। नासिरुद्दीन महमूद ने बलबन को उलूग खां की उपाधि प्रदान की।
- बलबन ने ‘तुर्क-ए-चहलगानी’ को समाप्त कर दिया।
- बलबन ने राजत्व के सिद्धांत का प्रतिपादन किया तथा नियामत-ए-ख़ुदाई (ईश्वर का प्रतिनिधि) और ‘ज़िल्लेइलाही’ (ईश्वर की छाया) की उपाधि ली।
- इसने दरबार में सिज़दा एवं पाबोस (कदम चूमना) जैसी ईरानी पद्धतियों को लागू किया। नौरोज उत्सव को आरंभ करवाया।
- इसने रक्त की शुद्धता पर बल दिया। बलबन अपने को ईरान के पौराणिक योद्धा ‘अफरासियाब’ के वंश से जोड़ता था।
- बलबन ने स्वयं बंगाल का अभियान किया जो उसका प्रथम और आखिरी अभियान था।
- बलबन ने एक सैन्य विभाग ‘दीवान-ए-अर्ज़’ तथा गुप्तचर विभाग की स्थापना की।
- फारसी के प्रसिद्ध कवि अमीर हसन और अमीर खुसरो बलबन के दरबार में रहते थे।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
- जन्म तिथि: 20 मार्च, 1782
- जन्म स्थान: इस्लिंग्टन, लंदन, इंग्लैंड
- कर्नल जेम्स टॉड ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में एक कैडेट के रूप में सेवा शुरू की और बाद में अपने सेवा कार्य और शैक्षणिक रुचियों के कारण उच्च पदों तक पहुँचे।
राजस्थान के इतिहास में योगदान
- टॉड ने 1817 से 1822 तक पश्चिमी राजस्थान के पॉलिटिकल एजेंट के रूप में कार्य किया।
- इस दौरान उनकी राजस्थानी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं में गहरी रुचि विकसित हो गई।
- वे अपने प्रसिद्ध ग्रंथ Annals and Antiquities of Rajasthan के लिये प्रसिद्ध हैं, जिसमें उन्होंने राजस्थान के इतिहास, भूगोल, परंपराओं और राजवंशों का विस्तृत वर्णन किया।
- उन्होंने राजपूतों की वीरता और शौर्य की सराहना की और उन्हें प्राचीन राजवंशों का सच्चा उत्तराधिकारी बताया।
- उन्होंने राजस्थान के इतिहास को गौरवपूर्ण और रोमांचक रूप में प्रस्तुत किया है।
मानचित्र और वंशावलियाँ
- टॉड ने राजपूत कुलों की वंशावलियाँ और मानचित्र तैयार किये, जिन्हें आज भी इतिहासकार महत्त्वपूर्ण स्रोत मानते हैं।
- नवंबर 1835 में लंदन में उनकी मृत्यु हो गयी। कर्नल जेम्स टॉड को राजस्थान का प्रथम वास्तविक इतिहासकार माना जाता है, जिनके कार्य ने राजस्थानी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने में एक अमिट भूमिका निभाई।
- इल्तुतमिश ही दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक था।
- वस्तुतः दिल्ली का पहला सुल्तान इल्तुतमिश था, क्योंकि 1229 में उसे बगदाद के अब्बासी ख़लीफा से मान्यता प्राप्त हुई, जिससे सुल्तान के रूप में उसकी स्वतंत्र स्थिति एवं दिल्ली सल्तनत को औपचारिक मान्यता प्राप्त हुई।
- इल्तुतमिश ने राजधानी लाहौर से दिल्ली स्थानांतरित की।
- तराइन की तीसरी लड़ाई (1215) इल्तुतमिश और याल्दौज के बीच हुई जिसमें याल्दौज पराजित हुआ।
- इल्तुतमिश ने ‘तुर्क-ए-चहलगानी’ (चालीसा दल) नामक संगठन की स्थापना की जिसमें उसके विश्वसनीय लोग थे।
- उसने इक्ता व्यवस्था को संगठित रूप दिया जिसे मुहम्मद गौरी ने प्रारंभ किया था।
- मुद्रा व्यवस्था में सुधार करते हुए चांदी का टंका एवं तांबे का जीतल चलाया।
- इसने दरबार में ‘न्याय का घंटा’ लगवाया।
- इसने रज़िया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था।
- चंगेज़ खान से बचने के लिये इल्तुतमिश ने ख्वारिज्म के शासक जलालुद्दीन मंगबरनी को अपने यहाँ शरण नहीं दी।
- इल्तुतमिश को ‘गुलाम का गुलाम’ कहा गया है।
- कोई भी चीज जिसे डिजिटल रूप में बदला जा सकता है वह NFTs हो सकती हैं।
- ड्राइंग, फोटो, वीडियो, GIF, संगीत, इन-गेम आइटम, सेल्फी और यहाँ तक कि एक ट्वीट, सबकुछ एक NFT में बदला जा सकता है, जिससे बाद में क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग करके ऑनलाइन कारोबार किया जा सकता है।
- अगर कोई व्यक्ति अपनी डिजिटल संपत्ति को NFTs में परिवर्तित करता है, तो उसे ब्लॉकचैन द्वारा संचालित स्वामित्व का प्रमाण मिलेगा।
- NFTs नॉन-फंजिबल टोकेंस हैं, जिसका अर्थ है कि एक NFT का मूल्य दूसरे के बराबर नहीं है।
- नॉन-फंजिबल का अर्थ है कि NFT परस्पर विनिमेय नहीं हैं। प्रत्येक NFT की UNIQUE पहचान होती है, जो इसे नॉन-फंजिबल और अद्वितीय बनाती है।
माइक्रोवेव ओवन एक रसोईघर उपकरण है, जो कि खाना पकाने और खाना गर्म करने के काम आता है।
सिद्धांत (Principle)
- माइक्रोवेव गैर-आयनित विकिरण होता है, जो विद्युत-चुंबकीय तरंगों के रूप में संचारित होता है। माइक्रोवेव ओवन में मैग्नेट्रॉन नाम की एक वैक्यूम ट्यूब होती है। इस ट्यूब से लगभग 2.45 गीगाहर्ट्ज (GHz) आवृत्ति की माइक्रोवेव निकलती हैं।
- जब माइक्रोवेव्स किसी पोलर मॉलीक्यूल (जैसे- जल, वसा या शुगर) के संपर्क में आती हैं तो अणुओं में घूर्णन होता है, जिस कारण वे एक-दूसरे से टकराते हैं। चूँकि तापमान गतिज ऊर्जा से संबंधित है इसलिये उसमें वृद्धि होती है। अतः माइक्रोवेव ओवन में खाना पकाने या गर्म करने हेतु इन पोलर मॉलीक्यूल का होना आवश्यक है।
माइक्रोवेव ओवन के लाभ (Advantages of Microwave Oven)
- माइक्रोवेव ओवन केवल खाने को ही गर्म करता है, कंटेनर और आस-पास की हवा को नहीं।
- माइक्रोवेव एक गैस स्टोव की तुलना में खाना गर्म करने के लिये बहुत कम समय लेता है।
- अमेरिकी ऊर्जा दक्षता एजेंसी ने एक शोध में पाया है कि माइक्रोवेव ओवन गैस स्टोव की तुलना में ऊर्जा का प्रयोग करने में तो निश्चित रूप से बेहतर होते हैं, हालाँकि इलेक्ट्रिक हीटिंग या इंडक्शन कुकिंग की तुलना में यह उतने कुशल नहीं हैं।
Polymer शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों ‘पॉली’ अर्थात् अनेक और ‘मर’ अर्थात् इकाई अथवा भाग से हुई है। बहुलकों के बहुत वृहत् अणु की तरह परिभाषित किया जा सकता है जिनका द्रव्यमान अतिउच्च होता है। इन्हें बृहदणु भी कहा जाता है, जो कि पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयों के बृहद् पैमाने पर जुड़ने से बनते हैं। पुनरावृत्त संरचनात्मक इकाइयाँ कुछ सरल और क्रियाशील अणुओं से प्राप्त होती हैं जो एकलक कहलाती हैं। यह इकाइयाँ एक-दूसरे के साथ सहसंयोजक बंधों द्वारा जुड़ी होती हैं। बहुलकों के संबंधित एकलकों से विरचन के प्रक्रम को बहुलकन कहते हैं।
स्रोत के आधार पर बहुलकों का वर्गीकरण
- प्राकृतिक बहुलक (Natural Polymers)- यह बहुलक पादपों तथा जंतुओं में पाए जाते हैं। उदाहरण के लिये प्रोटीन, सेलुलोज, स्टार्च, कुछ रेजिन और रबर।
- अर्द्ध-संश्लेषित बहुलक (Semi-Synthetic Polymers)- सेलुलोज व्युत्पन्न जैसे सेलुलोज एसीटेट (रेयॉन) और सेलुलोज नाइट्रेट आदि इस उपसंवर्ग के उदाहरण हैं।
- संश्लेषित बहुलक (Synthetic Polymers)- विभिन्न प्रकार के संश्लेषित बहुलक जैसे- प्लास्टिक (पॉलिथीन), संश्लेषित रेशे (नाइलॉन 6,6) और संश्लेषित रबर (ब्यूना-S) मानवनिर्मित बहुलकों के उदाहरण हैं, जो विस्तृत रूप से दैनिक जीवन एवं उद्योगों में प्रयुक्त होते हैं।
बहुलकों को उनकी संरचना, आणविक बलों अथवा बहुलकन की विधि के आधार पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है।
14वीं सदी में तिरहुत क्षेत्र में एक नए राजवंश का उदय हुआ, जिसे वैनवार (ओइनवार) वंश के नाम से जाना जाता है। इस वंश ने मिथिला के राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन को नई दिशा प्रदान की। कर्नाट वंश के पतन के बाद तिरहुत में जिस स्थानीय शक्ति ने स्थिर शासन स्थापित किया, वह वैनवार वंश ही था।
वैनवार वंश के शासकों में महाराज शिव सिंह अत्यंत प्रसिद्ध हुए। उनके शासनकाल में मिथिला की सांस्कृतिक उन्नति चरम पर पहुँची। महाराज शिव सिंह के दरबार में महान् मैथिली कवि विद्यापति निवास करते थे। विद्यापति ने अपने अनेक काव्य-ग्रंथों की रचना इसी काल में की, जिससे मिथिला की साहित्यिक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। इस कारण शिव सिंह का शासनकाल मिथिला के सांस्कृतिक स्वर्णयुग के रूप में जाना जाता है।
वैनवार वंश की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले महेश ठाकुर अत्यंत विद्वान् एवं कुशल प्रशासक थे। उनके द्वारा स्थापित वंश को आगे चलकर दरभंगा राजवंश के नाम से जाना गया। मुगल सम्राट अकबर महेश ठाकुर की विद्वत्ता और प्रशासनिक क्षमता से अत्यंत प्रभावित हुआ और पुरस्कारस्वरूप उन्हें मिथिला का राज्य प्रदान किया। इसके बाद दरभंगा राजवंश ने आधुनिक युग तक मिथिला के सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास का मार्गदर्शन किया।
इस वंश के एक महत्त्वपूर्ण विद्वान् चंद्रेश्वर माने जाते हैं, जिनका काल 14वीं सदी तक माना जाता है। चंद्रेश्वर ने प्रसिद्ध धर्मशास्त्रीय ग्रंथ ‘कृत्यरत्नाकर’ का संकलन किया। इस ग्रंथ से ज्ञात होता है कि 13वीं–14वीं सदी में मिथिला के लोग मुख्यतः विष्णु (हरि) तथा शिव के उपासक थे। इससे स्पष्ट होता है कि वैनवार वंश के काल में धार्मिक सहिष्णुता एवं सांस्कृतिक समन्वय विद्यमान था।
पारसी धर्म एक प्राचीन ईरानी धर्म है, जिसके प्रवर्तक जरथुस्त्र (Zoroaster) माने जाते हैं। यह धर्म ईरान में उत्पन्न हुआ और बाद में इसके अनुयायी भारत सहित अन्य क्षेत्रों में फैल गए। भारत में पारसी समुदाय मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र में निवास करता है। पारसी धर्म को जरथुस्त्री धर्म भी कहा जाता है।
पारसियों का पवित्र धार्मिक ग्रंथ ‘जेंद अवेस्ता’ है, जिसमें जरथुस्त्र द्वारा दिये गए उपदेशों और धार्मिक सिद्धांतों का संकलन मिलता है। इस धर्म की मूल शिक्षा सत्य, नैतिकता और सदाचार पर आधारित है। पारसी धर्म में मानव जीवन का उद्देश्य अच्छे विचार, अच्छे शब्द और अच्छे कर्म (Good Thoughts, Good Words, Good Deeds) को अपनाना बताया गया है।
पारसी धर्म को एकैकाधिदेववादी धर्म कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि पारसी लोग एक सर्वोच्च ईश्वर ‘अहुर मज्दा’ में आस्था रखते हैं, परंतु अन्य देव शक्तियों के अस्तित्व को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करते। अहुर मज्दा सत्य, प्रकाश और कल्याण के प्रतीक हैं। इसके विपरीत अंग्र मेन्यु (अहिरिमन) को बुराई और अंधकार का प्रतीक माना गया है। इस प्रकार यह धर्म सत्य और असत्य के संघर्ष की अवधारणा प्रस्तुत करता है।
पारसी धर्म में अग्नि को अत्यंत पवित्र माना जाता है। अग्नि स्वयं ईश्वर नहीं है, बल्कि अहुर मज्दा की पवित्रता और प्रकाश का प्रतीक है। इसी कारण पारसी अग्नि मंदिरों में अग्नि की पूजा की जाती है।
पारसियों का प्रमुख त्योहार नौरोज है, जो नववर्ष और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है। पारसी समाज में मृतकों की अंत्येष्टि एक विशिष्ट विधि से की जाती है। शव को दाख्मा (Tower of Silence) में खुले आकाश के नीचे रखा जाता है, ताकि चील-गिद्ध उसे खा सकें। ऐसा करने का उद्देश्य पृथ्वी, जल और अग्नि की शुद्धता को बनाए रखना है। यह परंपरा पारसी धर्म की पर्यावरणीय चेतना को भी दर्शाती है।
बाला मापारी गोवा के साहसी एवं समर्पित स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका जन्म 8 जनवरी, 1929 को गोवा के अस्सोनोरा गाँव में हुआ था। उनके पिता श्रीराम मापारी एक कृषक थे, जिनसे बाला को मेहनत, सादगी और मातृभूमि के प्रति प्रेम की प्रेरणा मिली। जिस समय गोवा पुर्तगाल के दमनकारी शासन में था, तब वहाँ के युवाओं में स्वतंत्रता की तीव्र चाह जाग उठी थी। इसी वातावरण में गोवा के क्रांतिकारियों ने “गोमांतक दल” नामक एक गुप्त संगठन बनाया, जो पुर्तगाली शासन को उखाड़ फेंकने के लिये निरंतर संघर्ष करता था। बाला मापारी इस दल के सक्रिय एवं निष्ठावान सदस्य थे।
गोमांतक दल ने एक साहसिक योजना के तहत अस्सोनोरा पुलिस चौकी पर धावा बोल दिया। इस आक्रमण में क्रांतिकारियों ने न केवल चौकी पर अधिकार कर लिया, बल्कि वहाँ के विशाल शस्त्रागार पर भी कब्जा कर लिया। यह घटना पुर्तगाली शासन के लिये अत्यधिक अपमानजनक थी। परिणामस्वरूप, भारी संख्या में पुलिस बल भेजकर क्रांतिकारियों पर हमला कराया गया। इसी दौरान बाला मापारी गिरफ्तार कर लिये गये।
गिरफ्तारी के पश्चात् पुर्तगाली पुलिस ने उनसे उनके अन्य क्रांतिकारी साथियों के नाम और ठिकाने बताने का दबाव बनाया; परन्तु बाला मापारी ने अटूट साहस दिखाते हुए कुछ भी बताने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। उन पर अमानवीय अत्याचार किये गये, कठोर यातनाएँ दी गयीं, पर उनकी दृढ़ता और देशभक्ति नहीं डगमगायी। अंततः 18 फरवरी, 1955 को इन अत्याचारों के कारण उनकी मृत्यु हो गयी।
बाला मापारी उन वीर योद्धाओं में से थे जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर गोवा की स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया। उनका बलिदान हमेशा गोवा और भारत की स्वतंत्रता-गाथा में उज्ज्वल अक्षरों में अंकित रहेगा।
16वीं सदी के उत्तरार्ध में जब समुद्री अन्वेषणों का युग तेज़ी से बढ़ रहा था, तब यूरोपीय राष्ट्र भारत और पूर्वी द्वीपों के मसालों के व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्द्धा में लग गये। इन्हीं देशों में हालैण्ड (डच) भी शामिल था। मसाले—विशेषकर लौंग, जायफल, दालचीनी और काली मिर्च—उस समय यूरोप में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माने जाते थे और इन्हें सुनहरे व्यापार का प्रतीक समझा जाता था।
भारतीय उपमहाद्वीप तथा इंडोनेशिया के द्वीपों की समृद्धि के बारे में सुनकर 1595 ई. में कॉर्नेलिस डी हॉउटमैन एशिया पहुँचा। यही वह यात्रा थी जिसने डचों को एशिया में सक्रिय व्यापारिक शक्ति बनने की दिशा में प्रेरित किया। इसके बाद डच व्यापारियों ने संगठित रूप से व्यापार करने के लिये एक बड़ी कम्पनी बनाने का निश्चय किया।
1602 ई. में डच ईस्ट इंडिया कम्पनी (VOC – Vereenigde Oost-Indische Compagnie) की स्थापना हुई। यह कम्पनी उस समय की सबसे शक्तिशाली व्यापारिक कम्पनियों में से एक बन गयी। इसे एशिया में व्यापार करने, किले बनाने, सैनिक रखने और स्थानीय शासकों से संधि करने का अधिकार दिया गया था।
NCERT के अनुसार डचों का मुख्य उद्देश्य “पूर्वी द्वीपों और भारत में मसालों के व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करना” था। डचों ने भारत के कई तटीय क्षेत्रों में अपने व्यापारिक केंद्र (कारखाने) बनाये। इनमें सूरत, मासुलीपट्टनम, पुलिकट तथा नागपट्टिनम प्रमुख थे। दक्षिण भारत में विशेष रूप से उनकी गतिविधि बहुत तीव्र थी क्योंकि मसालों का बड़ा भाग वहीं से व्यापार होता था।
डचों ने प्रारम्भिक वर्षों में पुर्तग़ालियों को चुनौती दी और मसाला व्यापार पर काफ़ी हद तक नियन्त्रण स्थापित कर लिया। हालाँकि, समय के साथ भारत में उनका प्रभाव कमजोर होता गया और 18वीं सदी के मध्य तक वे धीरे-धीरे ब्रिटिश शक्ति के बढ़ते प्रभाव के सामने पीछे हटने लगे। फिर भी भारतीय व्यापारिक इतिहास में डचों का आगमन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसने भारत में यूरोपीय प्रतियोगिता को नया रूप दिया।
बटुकेश्वर दत्त भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन साहसी क्रांतिकारियों में से थे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनका जन्म नवम्बर 1908 में कलकत्ता में एक मध्यवर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद ही उनके मन में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष की चिंगारी प्रज्वलित होने लगी। सन् 1925 में हाई स्कूल उत्तीर्ण करने के पश्चात वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट क्रांतिकारी पार्टी से जुड़ गये और भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे महान क्रांतिकारियों के साथ कार्य करने लगे।
8 अप्रैल 1929 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। इसी दिन बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ने केंद्रीय विधान सभा, दिल्ली में बम फेंककर अंग्रेज़ी शासन को यह संदेश दिया कि भारतवासी अब दमन को सहने वाले नहीं हैं। उनका उद्देश्य किसी को हानि पहुँचाना नहीं बल्कि ‘बहरों को सुनाने के लिये’ एक शक्तिशाली चेतावनी देना था। घटना के बाद दोनों ने आत्मसमर्पण कर दिया और गिरफ्तार कर लिये गये। बाद में उन पर लाहौर षड्यन्त्र मामले में भी आरोप लगाया गया, परंतु सबूतों के अभाव तथा भगत सिंह की टिप्पणी के आधार पर बटुकेश्वर दत्त को रिहा कर दिया गया।
1930 से 1937 तक उन्होंने अंडमान की सेल्युलर जेल में कठोर यातनाएँ झेली। 1938 में गांधीजी के हस्तक्षेप से उनके खराब स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें रिहा किया गया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें फिर से गिरफ्तार किया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि वे जीवन भर संघर्षरत रहे।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बटुकेश्वर दत्त ने शांत जीवन व्यतीत किया, परंतु स्वास्थ्य समस्याएँ उन्हें लगातार परेशान करती रहीं। जुलाई 1965 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। यद्यपि उनका जीवन अपेक्षाकृत शांतिपूर्वक समाप्त हुआ, परंतु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अमिट और अविस्मरणीय है।
जलमार्गों के किनारे स्थित नगरों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता
भारत के कई महत्वपूर्ण नगर नदियों के किनारे बसे हुए हैं, और इनका विकास ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, और व्यापारिक दृष्टि से हुआ है। नदियों के किनारे बसे ये नगर न केवल जल संसाधन और परिवहन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे हैं, बल्कि ये सदियों से सभ्यता और संस्कृति के केंद्र भी बने हुए हैं। यहाँ हम ऐसे प्रमुख नगरों और उनसे संबंधित नदियों के बारे में जानेंगे :
- आगरा – उत्तर प्रदेश का यह ऐतिहासिक नगर यमुना नदी के किनारे स्थित है। ताजमहल, जो दुनिया के सात अजूबों में शामिल है, इसी नदी के तट पर बना हुआ है।
- अहमदाबाद – गुजरात का यह प्रमुख औद्योगिक शहर साबरमती नदी के किनारे बसा है। यह महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम के लिये भी प्रसिद्ध है, जहाँ से दांडी मार्च की शुरुआत हुई थी।
- प्रयागराज (इलाहाबाद) – गंगा और यमुना नदियों के संगम पर स्थित यह नगर हिंदू धर्म में अत्यधिक पवित्र माना जाता है। संगम स्थल पर कुंभ मेले का आयोजन होता है, जो विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला है।
- कोलकाता – पश्चिम बंगाल की राजधानी हुगली नदी के किनारे स्थित है। ब्रिटिश काल में यह भारत की राजधानी थी, और आज भी यह पूर्वी भारत का मुख्य वाणिज्यिक केंद्र है।
- गुवाहाटी – असम का यह प्रमुख नगर ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे स्थित है। यह कामाख्या मंदिर के लिये प्रसिद्ध है, जो शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र है।
- हरिद्वार – गंगा नदी के तट पर स्थित यह नगर हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिये विशेष धार्मिक महत्व रखता है। यहाँ हर 12 साल में कुंभ मेले का आयोजन होता है, जो श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
- मदुरै – तमिलनाडु का यह प्राचीन नगर वैगई नदी के किनारे बसा है। मीनाक्षी मंदिर, जो वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है, इसी नगर में स्थित है।
- नासिक – महाराष्ट्र का यह नगर गोदावरी नदी के किनारे स्थित है। यह कुंभ मेले के आयोजन के लिये भी प्रसिद्ध है और भगवान राम के वनवास का स्थल माना जाता है।
- पणजी – गोवा की राजधानी मांडवी नदी के किनारे स्थित है। यह नगर अपनी खूबसूरत तटरेखाओं और पुर्तगाली विरासत के लिये प्रसिद्ध है।
- उज्जैन – क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित यह नगर मध्य प्रदेश का प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहाँ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है, जो हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है।
- श्रीनगर – जम्मू और कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी झेलम नदी के किनारे स्थित है। यह नगर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और डल झील के लिये प्रसिद्ध है।
- सूरत – ताप्ती/तापी नदी के किनारे स्थित यह गुजरात का एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक नगर है। यह नगर अपने कपड़ा और हीरा उद्योग के लिये प्रसिद्ध है।
- अयोध्या – सरयू (घाघरा) नदी के तट पर बसा यह नगर हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह भगवान राम की जन्मभूमि है और यहां स्थित राम मंदिर विश्वभर में प्रसिद्ध है।
- पंढरपुर – भीमा नदी के किनारे स्थित यह महाराष्ट्र का एक धार्मिक नगर है, जो भगवान विट्ठल के मंदिर के लिये प्रसिद्ध है।
- डिब्रूगढ़ – असम का यह नगर ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा है और यह राज्य का एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक और औद्योगिक केंद्र है।
- श्रीरंगपट्टनम – कावेरी नदी के किनारे स्थित यह कर्नाटक का ऐतिहासिक नगर है, जो टीपू सुल्तान की राजधानी के रूप में जाना जाता है।
- विजयवाड़ा – आंध्र प्रदेश का यह नगर कृष्णा नदी के किनारे स्थित है। यह नगर धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में जाना जाता है, जहां कनक दुर्गा मंदिर स्थित है।
- दिल्ली – भारत की राजधानी यमुना नदी के किनारे स्थित है। यह नगर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- बद्रीनाथ – उत्तराखंड का यह पवित्र तीर्थस्थल अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है और यह बद्रीनाथ धाम के लिये प्रसिद्ध है।
- लखनऊ – उत्तर प्रदेश की राजधानी गोमती नदी के किनारे स्थित है। यह नगर अपने ऐतिहासिक स्मारकों और नवाबी संस्कृति के लिये प्रसिद्ध है।
- वाराणसी – गंगा नदी के तट पर बसा यह नगर हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। यह नगर अपने घाटों और विश्वनाथ मंदिर के लिये जाना जाता है।
- अजमेर – राजस्थान का यह ऐतिहासिक नगर लूनी नदी के किनारे स्थित है और यहाँ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह स्थित है, जो सूफी संतों का प्रमुख केंद्र है।
भारत के ये नगर न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि कैसे नदियाँ मानव सभ्यता की धरोहर और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनी रही हैं।
प्रमुख अवधारणाएँ और उनका विवरण
पारितंत्र (Ecosystem):
एक पारितंत्र जीवों (पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव) का एक समुदाय होता है जो एक-दूसरे और उनके निर्जीव पर्यावरण (जैसे वायु, जल और खनिज मिट्टी) के साथ परस्पर क्रिया करता है। ये पारस्परिक क्रियाएँ एक ऐसा नेटवर्क तैयार करती हैं जो एक कार्यशील तंत्र का निर्माण करती हैं। पारितंत्र आकार में बहुत भिन्न हो सकते हैं, जैसे एक छोटा तालाब या एक बड़ा महासागर।
पारिस्थितिकी (Ecology):
पारिस्थितिकी जीवविज्ञान की वह शाखा है जिसमें जीवों और उनके भौतिक पर्यावरण के बीच के संबंधों का अध्ययन किया जाता है। यह जीवों के बीच और उनके पर्यावरण (जिसमें जैविक और अजैविक दोनों घटक शामिल होते हैं) के साथ उनकी अंतर्क्रिया का अध्ययन करती है। 'पारिस्थितिकी' शब्द का पहली बार जर्मन जीवविज्ञानी अर्नेस्ट हेकेल ने 1866 में प्रयोग किया था।
पर्यावरण (Environment):
पर्यावरण उन सभी बाह्य कारकों को संदर्भित करता है जो किसी जीव के चारों ओर विद्यमान होते हैं, जिसमें भौतिक, रासायनिक और जैविक कारक सम्मिलित होते हैं जो उसके जीवन को प्रभावित करते हैं। पर्यावरण गतिशील होता है और प्राकृतिक प्रक्रियाओं तथा मानवीय गतिविधियों के कारण लगातार बदलता रहता है। पर्यावरण में जैविक घटक (जैसे पौधे और जानवर) और अजैविक घटक (जैसे जलवायु और मिट्टी) दोनों शामिल होते हैं। विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाता है ताकि पर्यावरण संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाई जा सके और इसे सुरक्षित रखने के लिये कार्यवाही को प्रोत्साहित किया जा सके।
जैविक समुदाय (Biotic Community):
एक जैविक समुदाय में सभी जीवित जीव (पौधे, जानवर, कवक और सूक्ष्मजीव आदि) सम्मिलित होते हैं जो किसी विशेष क्षेत्र में रहते हैं और एक-दूसरे के साथ परस्पर क्रिया करते हैं, जिसमें शिकार, प्रतिस्पर्धा, सहजीवन जैसी विभिन्न प्रकार की संबंध प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। जैविक समुदाय किसी भी पारितंत्र का एक महत्वपूर्ण घटक होता है और इसका प्रभाव उसके ढाँचे और कार्य पर पड़ता है। किसी भी पारितंत्र का विकास और स्थायित्व उसके जैविक और अजैविक घटकों के बीच की जटिल अंतर्क्रियाओं पर निर्भर करता है।
बायोम (Biome):
एक बायोम पृथ्वी की सतह पर एक बड़ा पारिस्थितिक क्षेत्र होता है, जिसमें उस क्षेत्र के पर्यावरण के अनुकूल पौधे और जीव होते हैं। बायोम को आमतौर पर जलवायु, मिट्टी और वनस्पति जैसे कारकों द्वारा परिभाषित किया जाता है। उदाहरण के लिये टुंड्रा, समशीतोष्ण वन, उष्णकटिबंधीय वर्षावन, घास के मैदान, मरुस्थल और जलीय पर्यावरण आदि। बायोम एक प्रमुख पारिस्थितिक समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है।
जैवमंडल (Biosphere):
जैवमंडल सभी पारितंत्रों का वैश्विक योग होता है। इसमें पृथ्वी पर सभी जीवन और ग्रह के जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) घटकों के बीच की अंतर्क्रियाएँ शामिल होती हैं। जैवमंडल में स्थलमंडल (भूमि), जलमंडल (जल), और वायुमंडल (वायु) आदि से संबद्ध सभी तत्व सम्मिलित होते हैं। जैवमंडल एक जटिल, परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र है जिसमें जीवित जीव एक-दूसरे और उनके पर्यावरण के साथ अंतर्क्रिया करते हैं।
निकेत (Niche):
निकेत एक प्रजाति की पारिस्थितिकी तंत्र में भूमिका या कार्य को संदर्भित करता है, जिसमें उसका निवास स्थान, व्यवहार, आहार और अन्य प्रजातियों के साथ अंतर्क्रिया शामिल होती है। निकेत में वे पर्यावरणीय दशाएँ और संसाधन शामिल होते हैं जो किसी प्रजाति के जीवित रहने और प्रजनन के लिये आवश्यक होते हैं। प्रत्येक प्रजाति एक विशिष्ट निकेत होता है, जो प्रतिस्पर्धा को कम करता है क्योंकि दो भिन्न प्रजातियों के निकेत समान नहीं होते। निकेत की अवधारणा यह समझने में महत्वपूर्ण है कि प्रजातियाँ पारिस्थितिकी तंत्र में कैसे सहअस्तित्व रखती हैं और अपने पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों के अनुकूल कैसे होती हैं।
भारतीय खेलों से संबंधित प्रमुख चैंपियनशिप और पुरस्कार
बैडमिंटन
- सैयद मोदी इंटरराष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियनशिप : एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट।
- राष्ट्रीय बैडमिंटन चैंपियनशिप : शीर्ष राष्ट्रीय प्रतियोगिता।
बोट रेसिंग
- नेहरू ट्रॉफी (1952) : भारत के केरल राज्य का प्रमुख बोट रेसिंग इवेंट।
क्रिकेट
- रणजी ट्रॉफी (1934) : शीर्ष राष्ट्रीय प्रथम श्रेणी क्रिकेट चैंपियनशिप।
- दिलीप ट्रॉफी (1961) : प्रमुख घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट।
- देवधर ट्रॉफी (1973) : महत्वपूर्ण एक दिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिता।
- विजय हज़ारे ट्रॉफी (2002-03) : प्रमुख घरेलू एक दिवसीय टूर्नामेंट।
- ईरानी ट्रॉफी (1959) : प्रमुख घरेलू क्रिकेट ट्रॉफी।
- शीश महल ट्रॉफी (1951) : ऐतिहासिक घरेलू ग्रीष्मकालीन क्रिकेट प्रतियोगिता।
फुटबॉल
- डूरंड कप (1888) : ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित फुटबॉल टूर्नामेंट।
- संतोष ट्रॉफी (1941) : प्रमुख राष्ट्रीय फुटबॉल चैंपियनशिप।
- सुब्रतो कप (1960) : प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय विद्यालय-स्तरीय फुटबॉल प्रतियोगिता।
- बी. सी. रॉय ट्रॉफी (1962) : राष्ट्रीय जूनियर फुटबॉल चैंपियनशिप।
- विट्टल ट्रॉफी : उल्लेखनीय फुटबॉल पुरस्कार।
हॉकी
- बेटन कप (1895) : प्रसिद्ध हॉकी टूर्नामेंट।
- रंगास्वामी कप (1928) : महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हॉकी चैंपियनशिप।
- मुरुगप्पा गोल्ड कप (1901) : महत्वपूर्ण हॉकी प्रतियोगिता।
- महाराजा रणजीत सिंह गोल्ड कप (1978) : प्रमुख राष्ट्रीय हॉकी टूर्नामेंट।
- गुरु नानक देव गोल्ड कप (1979) : प्रतिष्ठित हॉकी इवेंट।
- यादविंद्र कप : ऐतिहासिक हॉकी ट्रॉफी।
हॉर्स रेसिंग
- निज़ाम गोल्ड कप (1886) : प्रमुख हॉर्स रेसिंग इवेंट।
पोलो
- एज़रा कप (1880) : भारत का प्रमुख पोलो टूर्नामेंट।
लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड
- ध्यान चंद लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड (2002) : भारतीय खेलों में आजीवन योगदान देने की उपलब्धि का सम्मान।
प्रमुख संगीति और उनका प्रभाव
बौद्ध धर्म के इतिहास में चार प्रमुख बौद्ध संगीति (धार्मिक सभाएँ) आयोजित की गईं, जिनका बौद्ध विचारधारा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इन संगीति के माध्यम से बौद्ध धर्म के ग्रंथों का संकलन, मतभेदों का समाधान और विचारधाराओं का विस्तार हुआ।
प्रथम बौद्ध संगीति
- प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन 483 ई.पू. में राजगृह में राजा अजातशत्रु के शासनकाल में हुआ। इस संगीति की अध्यक्षता महाकस्सप ने की थी। इसमें दो प्रमुख ग्रंथों का संकलन किया गया: आनंद ने सुत्तपिटक और उपालि ने विनयपिटक का संकलन किया। इस संगीति का उद्देश्य महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन और संरक्षण करना था, ताकि उनके निर्वाण के बाद उनकी शिक्षाओं को संरक्षित रखा जा सके।
द्वितीय बौद्ध संगीति
- द्वितीय बौद्ध संगीति 383 ई.पू. में वैशाली में आयोजित हुई, जब कालाशोक का शासन था। इसकी अध्यक्षता साबकमीर (सुबुकामी) ने की थी। इस संगीति में मठ संबंधी नियमों पर मतभेद उभरे, जिसके परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म दो शाखाओं में विभाजित हो गया: स्थविरवादी/थेरवादी और महासंघिक।
तृतीय बौद्ध संगीति
- तीसरी बौद्ध संगीति का आयोजन सम्राट अशोक के शासनकाल में 250 ई.पू. में पाटलिपुत्र में हुआ। इस संगीति की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त-तिस्स ने की थी। इस सभा में अभिधम्मपिटक का संकलन किया गया। इस संगीति का उद्देश्य बौद्ध धर्म की एकता को सुनिश्चित करना और उसकी शिक्षाओं का प्रसार करना था।
चतुर्थ बौद्ध संगीति
- चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन प्रथम शताब्दी ईस्वी में कश्मीर के कुंडलवन में किया गया, जब कनिष्क का शासन था। वसुमित्र ने इस सभा की अध्यक्षता की, और अश्वघोष उपाध्यक्ष थे। इस संगीति के दौरान बौद्ध धर्म दो प्रमुख शाखाओं में विभाजित हो गया: महायान और हीनयान। इस विभाजन का मुख्य कारण बोधिसत्व की अवधारणा थी, जो महायान संप्रदाय से संबंधित है।
बौद्ध धर्म से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण पहलू
- मिलिन्दपण्हो, नागसेन द्वारा रचित, पालि भाषा में एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
- अश्वघोष द्वारा रचित बुद्धचरित और सौन्दरानंद संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं।
- 483 ई.पू. में कुशीनगर में महात्मा बुद्ध की मृत्यु (महापरिनिर्वाण) हुई।
- बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गांधार और मथुरा शैलियों में किया गया, जिसमें गांधार शैली विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
- गौतम बुद्ध को "एशिया का ज्योतिपुंज" (Light of Asia) कहा जाता है।
बौद्ध संगीति बौद्ध धर्म के विकास और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। इन संगीति के माध्यम से बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को संरक्षित और प्रसारित किया गया, जिसके कारण बौद्ध धर्म का प्रसार विश्व भर में हुआ।
निम्न भू-कक्षा (LEO – Low Earth Orbit) :
- ऊँचाई : 160 किमी से 2000 किमी तक।
- विशेषताएँ : उपग्रह पृथ्वी के ध्रुवों से होकर गुज़रते हैं और इनका परिक्रमण काल 80 से 130 मिनट तक होता है।
- उपयोग : सुदूर संवेदन, मैपिंग, निगरानी, और पर्यावरणीय अध्ययन।
- उदाहरण : इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS), हबल टेलीस्कोप, ऐस्ट्रोसैट, और निगरानी उपग्रह।
मध्य भू-कक्षा (MEO – Medium Earth Orbit) :
- ऊँचाई : 2000 किमी से 35780 किमी तक।
- विशेषताएँ : उपग्रह 12 घंटे में परिक्रमण पूरा करते हैं और इसका परिक्रमण काल 2 घंटे से 24 घंटे तक हो सकता है।
- उपयोग : नेविगेशन, संचार, और अंतरिक्ष अनुसंधान।
- उदाहरण : GPS, GLONASS, GALILEO, Telstar।
भू-तुल्यकालिक कक्षा (GSO – Geosynchronous Orbit) :
- विशेषताएँ : उपग्रह का आवर्तकाल एक सिडेरियल दिन (23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड) के बराबर होता है और यह पृथ्वी के सापेक्ष स्थिर रहता है।
- उपयोग : संचार और मौसम संबंधित उपग्रह।
भू-स्थिर कक्षा (Geostationary Earth Orbit) :
- विशेषताएँ : जियोसिंक्रोनस कक्षा का विशेष प्रकार, जिसमें उपग्रह को विषुवत रेखा पर स्थापित किया जाता है। इसकी त्रिज्या लगभग 36000 किमी और झुकाव शून्य डिग्री होता है।
- उपयोग : संचार और मौसम संबंधित उपग्रह।
ध्रुवीय कक्षा (Polar Orbit) :
- विशेषताएँ : भूमध्य रेखा से 90° का झुकाव होता है। उपग्रह पृथ्वी के संपूर्ण पृष्ठ क्षेत्र को स्कैन कर सकते हैं।
- उपयोग : पृथ्वी का मानचित्रण, अवलोकन, जासूसी, और मौसम प्रेक्षण।
सूर्य तुल्यकालिक कक्षा (Sun–Synchronous Orbit) :
- विशेषताएँ : ऊँचाई और झुकाव इस प्रकार समायोजित किया जाता है कि उपग्रह एक निश्चित भाग के ऊपर दिन के समान समय पर गुज़रे।
- उपयोग : सुदूर संवेदी उपग्रह जो दृश्य और अवरक्त प्रकाश का उपयोग कर पृथ्वी की सतह की इमेजिंग करते हैं।
भू-स्थानांतरण कक्षा (Geo–Transfer Orbit : GTO) :
- विशेषताएँ : यह कक्षा उपग्रह को भू-स्थिर कक्षा में स्थापित करने के लिये उपयोग की जाती है। यह अतिदीर्घ वृत्ताकार कक्षा होती है।
- उपयोग : उपग्रह को भू-स्थिर कक्षा में स्थापित करने की प्रक्रिया में प्रारंभिक कक्षा के रूप में उपयोग की जाती है।
पर्वत पृथ्वी की सतह पर विभिन्न निर्माण प्रक्रियाओं और भूगर्भीय संरचनाओं के आधार पर वर्गीकृत होते हैं। इन वर्गीकरणों से पृथ्वी की गतिशील प्रक्रियाओं तथा वे कैसे परिदृश्य को आकार देती हैं, इसके बारे में जानकारी मिलती है। नीचे पर्वतों के प्रमुख प्रकार दिये गए हैं:
- मोड़दार पर्वत (Fold Mountains)
- निर्माण: ये पर्वत संपीडन बलों द्वारा पृथ्वी की क्रस्ट में मोड़ उत्पन्न होने से बनते हैं।
- विशेषताएँ: ये पर्वत सबसे ऊँचे और सबसे विस्तृत होते हैं, जिनमें लहरदार संरचनाएँ होती हैं, जिनमें एंटीक्लाइन (ऊपर की ओर मुड़े हुए) और सिंक्लाइन (नीचे की ओर मुड़े हुए) शामिल होते हैं।
- उदाहरण: हिमालय, आल्प्स, रॉकी, एंडीज, और एटलस पर्वत।
- अवरोधी पर्वत (Block Mountains)
- निर्माण: ये पर्वत खिंचाव बलों द्वारा उत्पन्न भ्रंशों या दरारों के कारण बनते हैं, जिससे कुछ भाग ऊपर उठता है और कुछ भाग नीचे चला जाता है।
- उदाहरण: सिएरा नेवाडा (USA) – सबसे बड़ा अवरोधी पर्वत, वासाच रेंज (USA), वॉसज और ब्लैक फॉरेस्ट (यूरोप), और साल्ट रेंज (पाकिस्तान)।
- गुम्बदाकारपर्वत (Dome Mountains)
- निर्माण: ये पर्वत मैगमैटिक गतिविधि के कारण बनते हैं, जब पृथ्वी की सतह के नीचे मैग्मा के प्रभाव से भूमि का उभार होता है।
- उदाहरण: ब्लैक हिल्स और सिनसिनाती आर्च (USA)।
- ज्वालामुखीय पर्वत (Volcanic Mountains)
- निर्माण: ये पर्वत ज्वालामुखीय सामग्री जैसे लावा, राख और मलबे के जमा होने से बनते हैं।
- उदाहरण: माउंट फूजी (जापान) और कोटोपैक्सी (इक्वाडोर) ।
- अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains)
- निर्माण: ये पर्वत पुरानी और उच्च पर्वतों के अपरदन के परिणामस्वरूप बची हुई संरचनाएँ होती हैं।
- उदाहरण: अरावली, विंध्याचल, सतपुड़ा, पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट (भारत)।
- जटिल पर्वत (Complex Mountains)
- निर्माण: ये पर्वत विभिन्न भूगर्भीय प्रक्रियाओं के संयोजन से बनते हैं, जिनमें जटिल संरचनाएँ और विविध प्रकार की चट्टानें पाई जाती हैं।
- उदाहरण: सिएरा नेवाडा (USA) और एनाकोंडा रेंज (USA)।
पर्वतों का वर्गीकरण पृथ्वी की सतह के विकास के विभिन्न तरीकों को उजागर करता है। प्रत्येक पर्वत प्रकार विशिष्ट भूगर्भीय प्रक्रियाओं को दर्शाता है, जो पृथ्वी के भौतिक और पारिस्थितिकी तंत्र के विविधता में योगदान करता है। इन प्रकारों को समझने से पृथ्वी के इतिहास और इसके निरंतर परिवर्तन को समझने में मदद मिलती है।
1990 के आर्थिक संकट से उबरने के लिये भारत सरकार ने व्यापक आर्थिक सुधार कार्यक्रमों की शुरुआत की, जिसे नई आर्थिक नीति के रूप में जाना जाता है। इस नीति की घोषणा 24 जुलाई, 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने की। इस नई औद्योगिक नीति ने देश में आर्थिक सुधारों की एक नई दिशा तय की। इस नीति के तीन मुख्य स्तंभ थे:
उदारीकरण (Liberalization)
उदारीकरण का अर्थ है अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रणों और प्रतिबंधों से मुक्त करना। इसका उद्देश्य उद्योगों और आर्थिक गतिविधियों पर सरकारी हस्तक्षेप को समाप्त करना या न्यूनतम स्तर पर लाना था। उदारीकरण ने उद्यमों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने, उत्पादन बढ़ाने, और बाजार-आधारित निर्णय लेने की अनुमति दी। यह नीति औद्योगिक विकास को तेज करने और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने का एक प्रमुख माध्यम बनी।
निजीकरण (Privatization)
निजीकरण उस प्रक्रिया को कहते हैं, जिसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का स्वामित्व और प्रबंधन आंशिक या पूर्ण रूप से निजी क्षेत्र को सौंपा जाता है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र की कार्यक्षमता में सुधार लाना, निजी निवेश को प्रोत्साहित करना, और आर्थिक संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना था। निजीकरण के माध्यम से सरकार ने गैर-जरूरी क्षेत्रों में अपने स्वामित्व को कम किया और निजी क्षेत्र को अधिक भागीदारी का अवसर दिया।
वैश्वीकरण (Globalization)
वैश्वीकरण का तात्पर्य देश की अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ने से है। इसके अंतर्गत व्यापार, पूंजी, और प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया गया। वैश्वीकरण ने भारतीय बाजार को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिये खोल दिया, जिससे विदेशी निवेश और तकनीकी उन्नति को गति मिली।
1991 की औद्योगिक नीति के तहत सबसे अधिक परिवर्तन औद्योगिक क्षेत्र में ही किये गए। उदारीकरण, निजीकरण, और वैश्वीकरण, जो इस नीति के मुख्य आधार थे, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े हुए थे। इस नीति ने न केवल उद्योगों को नई दिशा दी, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अवधि, चुनाव और वित्त
भारत में पंचायती राज व्यवस्था स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243E से 243K तक पंचायतों की अवधि, चुनाव, वित्त आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग के बारे में प्रावधान किये गए हैं। ये प्रावधान पंचायत शासन में पारदर्शिता, नियमित चुनाव और वित्तीय जवाबदेही बनाए रखने के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- पंचायतों की अवधि (अनुच्छेद 243 E) : प्रत्येक पंचायत का नियत कार्यकाल पाँच वर्षों का होगा, जो इसके पहले अधिवेशन की तारीख से शुरू होगा। यदि किसी पंचायत को इसके कार्यकाल समाप्त होने से पहले विघटित कर दिया जाता है, तो पुनः चुनाव 6 माह के भीतर करवाए जाएंगे। यह प्रावधान स्थानीय स्तर पर शासन की निरंतरता को सुनिश्चित करता है।
- राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243 I) : पंचायतों के वित्तीय स्वायत्तता को सुनिश्चित करने के लिये, प्रत्येक राज्य का राज्यपाल हर पाँच वर्षों में एक राज्य वित्त आयोग का गठन करेगा। यह आयोग पंचायतों की वित्तीय आवश्यकताओं का मूल्यांकन करेगा और धन आवंटन के लिये सिफारिशें करेगा। इसके बाद राज्यपाल आयोग की रिपोर्ट को राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत करेंगे, ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
- राज्य निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 243 K) : राज्य निर्वाचन आयोग सभी पंचायत चुनावों का संचालन और निगरानी करेगा। यह आयोग स्थानीय स्तर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करेगा। राज्य निर्वाचन आयुक्त को राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाता है, और उसे उच्च न्यायालय के न्यायधीश के समान सुरक्षा प्राप्त होती है।
पंचायती राज प्रणाली की प्रभावशीलता नियमित चुनावों, वित्तीय स्वायत्तता, और स्वतंत्र चुनाव आयोगों पर निर्भर करती है। अनुच्छेद 243E से 243K के माध्यम से संविधान पंचायतों के सुगम संचालन को सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक ढाँचा प्रदान करता है, जो लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और भारत में स्थानीय विकास को बढ़ावा देता है।
- LED (Light Emitting Diodes) की खोज को लगभग 50 से अधिक वर्षों का समय हो गया था, लेकिन ये LED प्रकृति में केवल एक रंग (मोनोक्रोमेटिक) यानी केवल लाल और हरे रंग की LED में उपलब्ध थीं, नीले रंग की LED का आविष्कार नहीं किया गया था, जिसके कारण सफेद LED का निर्माण संभव नहीं था। चूँकि सफेद LED केवल तीन प्राथमिक रंगों लाल, हरे और नीले के संयोजन से ही बनाई जा सकती है। इसलिये, नीली LED के निर्माण के लिये नोबेल वैज्ञानिकों द्वारा गैलियम नाइट्राइड का उपयोग किया जाना एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हुआ। अतः नीली LED के आविष्कार ने कई अनुप्रयोगों के लिये रास्ते खोल दिये।
- LED ने पारंपरिक बल्ब का स्थान ले लिया, जो विभिन्न रंगों और दक्ष ऊर्जा में उपलब्ध हैं। LED में अधिक स्थायित्व होता है, जो तापदीप्त बल्बों की तुलना में 10 गुना अधिक होता है।
- LED डिजिटल स्क्रीन में एक आवश्यक घटक बन गया है, क्योंकि वे अपनी पूर्ववर्ती तकनीकों की तुलना में उच्च कंट्रास्ट प्रदान करते हैं और इनकी ऊर्जा दक्षता भी अधिक होती है।
- LED में हालिया विकास O-LED या आर्गेनिक-LED है, जो स्क्रीन को आकार देने में लचीलापन प्रदान करता है। O-LED अब व्यापक रूप से पहनने योग्य उपकरणों, स्मार्टफोन आदि में उपयोग किया जाता है।
- LED आकार में बहुत भिन्नता प्रदान करता है, इनका आकार कुछ मिमी. से लेकर कई फुट तक होता है। यह सर्किट बोर्ड से लेकर होम लाइटिंग तक विस्तृत रेंज के अनुप्रयोगों को अनुकूल बनाता है।
- इस दिशा में सरकार ने भी ऊर्जा संरक्षण में LED के महत्त्व को महसूस करते हुए विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों; जैसे- उजाला (सभी के लिये सस्ती LED द्वारा उन्नत ज्योति) और स्ट्रीट लाइट राष्ट्रीय कार्यक्रम जैसी कई योजनाओं द्वारा उनके उपयोग को प्रोत्साहित किया है।
- इस प्रकार, यह कहना उचित ही होगा कि LED ने हमारे दैनंदिन जीवन में क्रांति ला दी है।
22 मार्च, 1945 ई. को काहिरा में अरब राष्ट्रों ने एक संधि पर हस्ताक्षर कर एक संघ का निर्माण किया, जिसे ‘अरब लीग’ नाम दिया गया जिसका उद्देश्य अरब एकता को बनाए रखना था। आरंभ में इस संघ में सात राज्य सम्मिलित हुए- मिस्र, इराक, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान, यमन और सऊदी अरब। इसके अंतर्गत प्रत्येक राज्य प्रभुता संपन्न था और संघ के निर्णय को मानने के लिये बाध्य नहीं था। बाद में इस संघ में लीबिया, सूडान, मोरक्को, अल्जीरिया आदि भी सम्मिलित हुए। वर्तमान में अरब लीग के 22 सदस्य हैं।
अरब लीग का मुख्य उद्देश्य सदस्य राष्ट्रों के बीच हुए समझौतों को क्रियात्मक स्वरूप देना, उनके आपसी संबंधों को सुदृढ़ बनाना, समय-समय पर इसकी बैठकें आयोजित करना, राजनीतिक क्षेत्र में सहयोग, सदस्य राष्ट्रों की स्वाधीनता तथा प्रभुसत्ता की रक्षा करना, अरब राष्ट्रों से संबंधित कार्यों पर विचार-विमर्श करना तथा आर्थिक, सामाजिक एवं परिवहन संबंधी क्षेत्रों में परस्पर सहयोग करना था। किंतु अरब जगत में एकता की संभावना उसकी मरुभूमि में मृगमरीचिका की भांति थी। अरब लीग अपने सदस्य राष्ट्रों के आपसी झगड़े, वैमनस्यता तथा कटुता के कारण कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाई। लीग की असफलता के लिये निम्नलिखित कारण ज़िम्मेदार थे-
- अरब लीग के नेतृत्व के प्रश्न पर सदस्य राष्ट्र सहमत नहीं थे। मिस्र अरब राष्ट्रों में सबसे विकसित होने के कारण अरब जगत का नेतृत्व स्वाभाविक रूप से अपने हाथ में रखना चाहता था, किंतु मक्का और मदीना जैसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थलों के सऊदी अरब में होने के कारण सऊदी अरब स्वयं को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण समझता था।
- कुछ अरब राष्ट्राध्यक्षों में परंपरागत वंश शत्रुता विद्यमान थी। जॉर्डन के ‘शाह हुसैन’ और सऊदी अरब के ‘शाह फैसल’ एक-दूसरे के वंशानुगत शत्रु थे।
- अरब राष्ट्र आपसी फूट, कलह और गुटबंदी के शिकार थे। कुछ अवसरों पर तो ‘अरब लीग’ की बैठकों को आयोजित करने के स्थान और विषय-सूची को लेकर ही सदस्य राष्ट्रों में झगड़ा हो जाता था।
- पश्चिमी शक्तियों द्वारा अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये अरब राष्ट्रों के बीच फूट डालने का कार्य भी अरब लीग की असफलता का एक कारण बना।
उपर्युक्त कमियों के बावजूद ‘अरब लीग’ एक महत्त्वपूर्ण प्रादेशिक संगठन है। संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अफ्रीकी-एशियाई समुदाय की सहायता से अरब लीग ने अपने उपनिवेशवाद विरोधी अभियान द्वारा अनेक अरब देशों को औपनिवेशिक शक्तियों के चंगुल से मुक्ति दिलाने में सफलता अर्जित की। उसने इज़राइल के खिलाफ फिलिस्तीन के मामले में विश्व समाज के एक बहुत बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त किया। उसने ‘तेल कूटनीति’ अर्थात् अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तेल को राजनीतिक हथियार के रूप में अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल कर उनको झुकने पर मजबूर किया, जिसके फलस्वरूप अनेक शक्तिशाली देशों ने अरबों के प्रति अपनी नीति में व्यापक परिवर्तन किये।
- रामानुजन अद्वितीय गणितीय प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। उन्होंने सिर्फ 33 वर्ष के अल्पकाल में विश्व को अपनी गणित की समझ और शोधों से न केवल आश्चर्यचकित किया, अपितु भारत का सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ होने का गौरव भी प्राप्त किया।
- किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा न लेने के बावजूद रामानुजन ने उच्च गणित के क्षेत्र में ऐसी विलक्षण खोजें कीं, कि इस क्षेत्र में उनका नाम अमर हो गया। उन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवन भर में गणित की लगभग 3900 प्रमेयों का संकलन किया।
- इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। हाल ही में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है।
- रामानुजन एक शांत-चित्त और सात्विक प्रवृत्ति वाले आध्यात्मिक पुरुष थे। जीवन के कठिन दौर में भी उन्होंने कभी गणित को नहीं छोड़ा।
- 1911 में उन्होंने ‘जर्नल ऑफ द इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी’ में ‘बरनौली संख्याओं के कुछ गुण’ विषय पर एक शोध-पत्र प्रकाशित किया। इस पत्र से उन्हें मद्रास के शिष्टजनों के मध्य एक गणित विषयक विशिष्ट प्रतिभा के रूप में विशेष पहचान मिली।
- विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश गणितज्ञ जी.एच. हार्डी ने उनकी प्रतिभा को पहचान कर उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय बुला लिया। उन्होंने हार्डी और जे.ई. लिटिलवुड के साथ मिलकर गणित में शोध किया और गणित जगत को आश्चर्यजनक परिणाम दिये।
- उन्होंने लंदन में अनेक शोध-पत्र जारी किये। वह लंदन की ‘रॉयल सोसायटी’ के फेलो चुने जाने वाले दूसरे और ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो चुने जाने वाले प्रथम भारतीय थे।
- उनका जन्मदिवस 22 दिसंबर को भारत में ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
- इसे गुलाम वंश या ममलूक वंश का संस्थापक माना जाता है।
- कुतुबुद्दीन ऐबक ने सिंहासन पर बैठने के बाद सुल्तान की उपाधि ग्रहण नहीं की बल्कि केवल ‘मलिक’ एवं ‘सिपहसालार’ की पदवियों से संतुष्ट रहा।
- ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर में बनाई।
- ऐबक की उदारता के कारण उसे ‘लालबख्श’ कहा गया।
- 1210 में चौगान (पोलो) खेलते समय अचानक घोड़े से गिर जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।
- ऐबक ने प्रसिद्ध सूफी संत ख्वाज़ा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर दिल्ली में कुतुबमीनार की नींव रखी। बाद में उसके दामाद इल्तुतमिश ने इसे पूर्ण कराया। तूफान के कारण क्षतिग्रस्त हुई मीनार के कुछ भागों की मरम्मत बाद में फिरोज़शाह तुगलक ने करवाई थी।
- नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने वाला बख्तियार खिलज़ी, ऐबक का सेनानायक था।
- कुछ इतिहासकारों के अनुसार ऐबक के पश्चात् आरामशाह (1210) सुल्तान बना।
बिहार का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर है। वर्ष 2023 के अनुसार बिहार में कुल वनाच्छादन 7,532.45 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 8.0 प्रतिशत है। यह प्रतिशत भारत के औसत वनाच्छादन (21.76 प्रतिशत) की तुलना में काफी कम है। राज्यों में जहाँ सर्वाधिक वन क्षेत्र मिजोरम (85.34 प्रतिशत) में पाया जाता है, वहीं हरियाणा में यह सबसे कम (3.63 प्रतिशत) है। 2021 की रिपोर्ट की तुलना में बिहार के वन क्षेत्र में 151.66 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है, जो लगभग 2.01 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है।
भौगोलिक दृष्टि से बिहार उपोष्ण जलवायु क्षेत्र में स्थित है। राज्य में प्राकृतिक वन मुख्यतः पश्चिम चंपारण, कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, नवादा, नालंदा, मुंगेर, बाँका तथा जमुई जिलों में फैले हुए हैं। उत्तर बिहार का अधिकांश भाग प्राकृतिक वनों से रहित है, केवल पश्चिम चंपारण जिला इसका अपवाद है। शिवालिक श्रेणी के तराई क्षेत्र में स्थित पश्चिम चंपारण में प्राकृतिक साल के वन पाए जाते हैं।
दक्षिण बिहार के पठारी एवं पहाड़ी भागों—विशेषकर कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद, गया, जमुई, मुंगेर और बाँका जिलों—में भी साल के वन पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। बिहार की प्राकृतिक वनस्पति में पर्णपाती वनों की प्रधानता है। वर्षा की असमानता के कारण यहाँ आर्द्र पर्णपाती तथा शुष्क पर्णपाती दोनों प्रकार के वन पाए जाते हैं।
वनों के प्रकार के आधार पर बिहार में वनों का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है—
- आर्द्र पर्णपाती वन
- शुष्क पर्णपाती वन
- झाड़ीदार एवं विरल वन
कुल मिलाकर, सीमित वन क्षेत्र होने के बावजूद बिहार में वन संरक्षण एवं वृक्षारोपण कार्यक्रमों के माध्यम से वन क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं।
बूढ़ी गंडक नदी उत्तर बिहार की एक महत्त्वपूर्ण नदी है, जिसे सामान्यतः गंडक नदी की परित्यक्त (Abandoned) धारा माना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से यह नदी गंडक के पुराने प्रवाह पथ का प्रतिनिधित्व करती है, जो कालांतर में अपना मार्ग बदलने के कारण स्वतंत्र नदी के रूप में विकसित हो गई।
बूढ़ी गंडक नदी की उत्पत्ति चउतरवा चौर (विश्रामपुर), पश्चिमी चंपारण से मानी जाती है। यह नदी बिहार के मैदानी भागों में अपेक्षाकृत धीमी गति से बहती है और अधिक गाद वहन करती है, जिसके कारण इसके तटवर्ती क्षेत्रों में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है।
यह नदी पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय तथा खगड़िया जिलों से होकर प्रवाहित होती हुई अंततः गंगा नदी में मिल जाती है। इस प्रकार यह गंगा नदी की एक महत्त्वपूर्ण सहायक नदी है। बूढ़ी गंडक को उत्तर बिहार की सबसे लंबी नदी के रूप में भी जाना जाता है, जो क्षेत्रीय जल निकासी व्यवस्था में प्रमुख भूमिका निभाती है।
बूढ़ी गंडक की अनेक सहायक नदियाँ हैं, जिनमें मसान, बालोर, पंडई, डंडा, सिकटा, तिऊर, धनौत, कोहरा, तिलावे तथा अंजानकोटे प्रमुख हैं। इनमें से बागमती नदी इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सहायक नदी मानी जाती है, जो इसके जलप्रवाह और बाढ़ की तीव्रता को प्रभावित करती है।
मानसून के समय बूढ़ी गंडक नदी में जलस्तर अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे इसके किनारे बसे क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसके बावजूद यह नदी कृषि, विशेषकर धान, गेहूँ और गन्ने की खेती के लिये अत्यंत उपयोगी है।
इस प्रकार बूढ़ी गंडक नदी उत्तर बिहार की कृषि, जल संसाधन और भौगोलिक संरचना में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
- विद्युत सेल के एक टर्मिनल को तार द्वार बल्ब से होते हुए विद्युत सेल के दूसरे टर्मिनल से जोड़ने पर विद्युत परिपथ पूर्ण हो जाता है और बल्ब दीप्त हो उठता है।
- विद्युत परिपथ, विद्युत सेल के दो टर्मिनलों के मध्य विद्युत प्रवाह (विद्युत धारा) के संपूर्ण पथ को दर्शाता है।
- बल्ब के दीप्त होने के लिये परिपथ में विद्युत धारा प्रवाहित होना आवश्यक है। विद्युत धारा की दिशा हमेशा विद्युत सेल के धन टर्मिनल से ऋण टर्मिनल की ओर होती है।
- किन्हीं कारणों से बल्ब के तंतु के टूट जाने यानी बल्ब के फ्यूज हो जाने पर परिपथ से विद्युत धारा का प्रवाह बंद हो जाता है और बल्ब दीप्तिमान नहीं हो पाता।
- विद्युत धारा में मान और दिशा दोनों होते हैं; किंतु सदिशों के योग के नियम का अनुकरण नहीं करने के कारण यह अदिश राशि है।
- संतृप्त वायु (Saturated Air)- वायुमंडल की जलवाष्प धारण करने की क्षमता पूर्णतः तापमान पर निर्भर करती है। एक निश्चित ताप पर वायु, जलवाष्प की निश्चित मात्रा ही ग्रहण कर सकती है। अतः एक निश्चित ताप पर अधिकतम जलवाष्प से युक्त वायु ‘संतृप्त वायु’ तथा यह अवस्था वायु की ‘संतृप्त अवस्था’ कहलाती है।
- आर्द्रता (Humidity)- वायुमंडल में प्रति इकाई आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। वायुमंडल में प्रत्येक स्थान पर जलवाष्प की मात्रा सामान नहीं होती। समुद्री स्थानों पर वायुमंडल में जलवाष्प अधिक होता है अर्थात् अधिक होती है। वहीं सूखे और गर्म स्थानों पर आर्द्रता कम होती है।
- सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity)- एक निश्चित ताप पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी ताप पर समान आयतन की वायु को संतृप्त करने के लिये जलवाष्प की आवश्यक मात्रा के अनुपात को ‘सापेक्षिक आर्द्रता’ कहते हैं। सापेक्षिक आर्द्रता तुलनात्मक भौतिक राशि है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। सापेक्षिक आर्द्रता मापने के लिये ‘हाइग्रोमीटर’ का प्रयोग करते हैं।
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पुस्तक |
लेखक |
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द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857 |
विनायक दामोदर सावरकर |
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द पीजेंट एंड द राज |
एरिक थॉमस स्टोक्स |
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1857: द ग्रेट रिवोल्ट |
अशोक मेहता |
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द सिपॉय म्यूटिनी एंड रिवोल्ट ऑफ 1857 |
आर.सी. मजूमदार |
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सिविल रिबेलियन इन इंडियन म्यूटिनीस, 1857-1859 |
शशि भूषण चौधरी |
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द हिस्ट्री ऑफ द सिपॉय वॉर इन इंडिया |
जॉन विलियम काये |
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द फर्स्ट इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, 1857-1859 |
कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स |
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द कॉजेज ऑफ द इंडियन रिवोल्ट (1858) |
सर सैय्यद अहमद खां |
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द सिपॉय म्यूटिनी ऑफ 1857: ए सोशल एनालिसिस |
एच.पी. चट्टोपाध्याय |
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1857 |
एस.एन. सेन |
जटिल कार्बोहाइड्रेट शर्करा (Sugar) के लंबे श्रृंखलाओं से बने होते हैं, जिन्हें पॉलीसैकराइड्स कहा जाता है। सरल कार्बोहाइड्रेट के विपरीत, जो जल्दी पच जाते हैं और रक्त शर्करा में तेजी से वृद्धि करते हैं, जटिल कार्बोहाइड्रेट शरीर को धीरे-धीरे और लंबे समय तक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
1. संरचना और संघटन:
- लंबी शर्करा श्रृंखलाएँ: जटिल कार्बोहाइड्रेट कई शर्करा इकाइयों से मिलकर बने होते हैं।
- ये मुख्यतः स्टार्च (पचने योग्य) और फाइबर (अपचनीय) से मिलकर बने होते हैं।
2. प्रकार:
- स्टार्च: ऊर्जा प्रदान करता है और अनाज तथा सब्जियों में पाया जाता है।
- फाइबर: पाचन में सहायता करता है और आंतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।
3. जटिल कार्बोहाइड्रेट के स्रोत:
- साबुत अनाज: ब्राउन राइस, ओट्स, क्विनोआ, जौ, गेहूं की ब्रेड
- दालें (Legumes): बीन्स, मसूर, चना, मटर
- सब्जियाँ: शकरकंद, गाजर, मक्का
- फल: सेब, केला, बेरी
- मेवे और बीज: बादाम, अखरोट, अलसी के बीज, चिया सीड्स
4. स्वास्थ्य लाभ:
- धीमी ऊर्जा प्रदान करना: धीरे-धीरे पाचन के कारण दिनभर स्थिर ऊर्जा मिलती है।
- बेहतर पाचन: फाइबर पाचन क्रिया को सुधारता है और मल त्याग को नियंत्रित करता है।
- वजन प्रबंधन: फाइबर लंबे समय तक पेट भरा रखता है, जिससे वजन नियंत्रित रहता है।
- रक्त शर्करा नियंत्रण: यह ब्लड शुगर के अचानक बढ़ने और गिरने को रोकता है।
5. पोषण संबंधी लाभ:
- पोषक तत्वों से भरपूर: इनमें विटामिन (विशेषकर B-विटामिन) और खनिज (जैसे आयरन, मैग्नीशियम) प्रचुर मात्रा में होते हैं।
- निम्न ग्लाइसेमिक इंडेक्स: ये रक्त शर्करा को धीरे-धीरे बढ़ाते हैं, जबकि सरल कार्बोहाइड्रेट तेजी से बढ़ाते हैं।
निष्कर्ष:
जटिल कार्बोहाइड्रेट एक संतुलित और स्वस्थ आहार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं, पाचन सुधारते हैं, वजन नियंत्रित रखते हैं और रक्त शर्करा को स्थिर बनाए रखते हैं। साबुत खाद्य पदार्थों में मौजूद जटिल कार्बोहाइड्रेट का नियमित सेवन दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिये अत्यंत लाभकारी है।
प्रयोगशाला पद्धति शिक्षण की एक आधुनिक, क्रियाशील और अनुभव-आधारित पद्धति है। कुछ समय पहले तक प्रयोगशाला को केवल विज्ञान विषयों की शिक्षा तक सीमित समझा जाता था, परंतु वैज्ञानिक प्रवृत्ति और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के साथ अब यह स्पष्ट हो गया है कि प्रत्येक विषय की प्रभावी शिक्षा के लिये प्रयोगशाला आवश्यक है। विशेष रूप से सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों में, जहाँ प्रत्यक्ष अनुभव, अवलोकन और विश्लेषण का विशेष महत्त्व होता है, वहाँ प्रयोगशाला पद्धति अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।
पाश्चात्य देशों में सामाजिक विज्ञान के शिक्षण हेतु प्रयोगशालाओं का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा रह है। भारत में भी शिक्षालयों में इन विषयों के लिये प्रयोगशालाओं की स्थापना की ओर ध्यान दिया जाने लगा है, किंतु अभी उनकी व्यवस्था पूरी तरह से संतोषजनक नहीं है। इसके बावजूद यह पद्धति सामाजिक विज्ञान की शिक्षा को अधिक रोचक, व्यावहारिक और स्थायी बनाने में सहायक है।
इस पद्धति में शिक्षक विद्यार्थियों के लिये कुछ निश्चित कार्य निर्धारित करता है तथा उनसे संबंधित सामग्री प्राप्त करने के स्रोतों की जानकारी देता है। इसके बाद विद्यार्थी अपने-अपने कार्य को वैयक्तिक रूप से पूरा करते हैं। यह कार्य दो प्रकार का हो सकता है— निरीक्षित तथा अनिरीक्षित। निरीक्षित कार्य में शिक्षक निरंतर विद्यार्थियों के कार्य का निरीक्षण करता है और आवश्यकता पड़ने पर उनकी कठिनाइयों का समाधान करते हुए मार्गदर्शन प्रदान करता है। अनिरीक्षित कार्य में शिक्षक प्रत्यक्ष निरीक्षण नहीं करता, बल्कि विद्यार्थी स्वयं अपनी योग्यता, रुचि और क्षमता के आधार पर कार्य संपन्न करते हैं। इससे उनमें आत्मनिर्भरता, शोध प्रवृत्ति और समस्या-समाधान की क्षमता का विकास होता है।
प्रो. जे. डब्ल्यू. वाल्डविन के अनुसार सामाजिक विज्ञान की प्रयोगशाला के लिये उपयुक्त भौतिक एवं शैक्षिक सामग्री आवश्यक है। इसमें बैठने के लिये सामान्य कक्ष से बड़ा कक्ष, मेज-कुर्सियाँ, श्यामपट, सूचनापट, पाठ्य-पुस्तकें, सहायक संदर्भ ग्रंथ, शब्दकोश, चार्ट, मानचित्र, ग्राफ, चित्र, ग्लोब, पत्र-पत्रिकाएं, विविध प्रतिवेदन, फिल्म, स्लाइड्स, प्रोजेक्ट तथा स्क्रीन जैसी सामग्रियाँ सम्मिलित हैं। ये सभी तत्व सामाजिक विज्ञान की प्रयोगशाला को प्रभावी और उपयोगी बनाते हैं।
मैग्नेटिक टेप एक प्रकार की सेकेंडरी स्टोरेज डिवाइस है जिसका उपयोग बहुत बड़ी मात्रा में डेटा को स्टोर करने के लिये किया जाता है। यह डेटा स्टोरेज की सबसे पुरानी तकनीकों में से एक मानी जाती है। मैग्नेटिक टेप में डेटा को स्टोर करने के लिये एक पतले प्लास्टिक के रिबन का उपयोग किया जाता है, जिसकी सतह पर चुम्बकीय पदार्थ की परत चढ़ी होती है।
सरल शब्दों में कहें तो, मैग्नेटिक टेप एक ऐसी स्टोरेज डिवाइस है जिसमें डेटा को चुम्बकीय रूप में सुरक्षित किया जाता है। यह एक Non-Volatile मेमोरी होती है, अर्थात् बिजली चले जाने या कंप्यूटर बंद होने पर भी इसमें स्टोर किया गया डेटा नष्ट नहीं होता। इसी कारण इसका उपयोग लंबे समय तक डेटा को सुरक्षित रखने के लिये किया जाता रहा है।
मैग्नेटिक टेप अन्य स्टोरेज डिवाइस की तुलना में काफी सस्ती होती है और इसका रख-रखाव भी आसान होता है। पुराने समय में इसका उपयोग ऑडियो रिकॉर्डिंग, वीडियो स्टोरेज, बैकअप डेटा और बाइनरी डेटा को स्टोर करने के लिये बड़े पैमाने पर किया जाता था। बैंक, सरकारी संस्थान और बड़े संगठन इसका उपयोग डेटा बैकअप के लिये करते थे।
हालांकि मैग्नेटिक टेप की सबसे बड़ी कमी इसकी धीमी गति है। यह डेटा को सीधे (Direct Access) एक्सेस नहीं कर पाती, बल्कि क्रमवार (Sequential) तरीके से डेटा को पढ़ती और लिखती है। इसी कारण डेटा को खोजने और ट्रांसफर करने में अधिक समय लगता है।
आज के समय में पेन ड्राइव, हार्ड डिस्क और SSD जैसी आधुनिक स्टोरेज डिवाइस उपलब्ध होने के कारण मैग्नेटिक टेप का उपयोग बहुत कम हो गया है। फिर भी, कम लागत और बड़ी स्टोरेज क्षमता के कारण कुछ क्षेत्रों में इसका उपयोग आज भी किया जाता है। मैग्नेटिक टेप का अविष्कार सन् 1928 में Fritz Pfleumer द्वारा किया गया था।
सभी जीव कोशिकाओं से बने होते हैं। कोशिकाओं को उनकी संरचना और संगठन के आधार पर दो वर्गों में बाँटा गया है – प्रोकैरियोटिक कोशिका और यूकैरियोटिक कोशिका।
- प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ सबसे प्राचीन, सरल एवं विशिष्ट प्रकार की कोशिकाएँ हैं। इनमें केंद्रक झिल्ली व झिल्ली-बद्ध कोशिकांग नहीं पाए जाते। उदाहरण : बैक्टीरिया, सायनोबैक्टीरिया (नील-हरित शैवाल)।
- यूकैरियोटिक कोशिकाएँ अधिक जटिल और विकसित होती हैं। इनमें वास्तविक केंद्रक तथा सभी प्रमुख अंगक मौजूद रहते हैं। उदाहरण : पादप, जन्तु, कवक, प्रोटिस्टा।
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं की विशेषताएँ
- कोशिका भित्ति – प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट से निर्मित।
- अंगक – माइटोकॉन्ड्रिया, ई.आर., गॉल्जीकाय, लाइसोसोम, केंद्रिका और सेंट्रियोल अनुपस्थित।
- राइबोसोम – छोटे आकार के, 70S प्रकार।
- डीएनए – एकल सूत्रीय, वृत्ताकार (प्लाज़्मिड भी उपस्थित हो सकता है)।
- कशाभिका – साधारण, एकल तंतु वाली।
- श्वसन – प्लाज्मा झिल्ली द्वारा।
- प्रजनन – केवल अलैंगिक (Binary fission), लैंगिक प्रजनन नहीं।
- प्रकाश संश्लेषण – थायलाकोइड में (सायनोबैक्टीरिया)।
- कोशिका विभाजन – अर्धसूत्री (Amitosis)।
यूकैरियोटिक कोशिकाओं की विशेषताएँ
- कोशिका भित्ति – पादपों में सेलुलोज से बनी, जंतुओं में अनुपस्थित।
- अंगक – सभी प्रमुख अंगक उपस्थित (माइटोकॉन्ड्रिया, ई.आर., गॉल्जीकाय, लाइसोसोम, केंद्रिका और सेंट्रियोल)।
- राइबोसोम – बड़े आकार के, 80S प्रकार।
- डीएनए – पूर्ण विकसित, दोहरे सूत्रीय, केंद्रक झिल्ली के भीतर।
- कशाभिका – जटिल संरचना, 9+2 व्यवस्था के साथ 11 तंतु।
- श्वसन – माइटोकॉन्ड्रिया द्वारा।
- प्रजनन – लैंगिक और अलैंगिक दोनों प्रकार।
- प्रकाश संश्लेषण – पादप कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट द्वारा।
- कोशिका विभाजन – अर्धसूत्री (Mitosis) और समसूत्री (Meiosis)।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि प्रोकैरियोटिक कोशिकाएँ आकार में छोटी, संरचना में सरल होती हैं तथा इनमें केंद्रक झिल्ली का अभाव होता है, इसलिये ये केवल आदिम जीवों जैसे बैक्टीरिया और सायनोबैक्टीरिया में पाई जाती हैं। इसके विपरीत, यूकैरियोटिक कोशिकाएँ आकार में बड़ी, संरचना में जटिल होती हैं और इनमें वास्तविक केंद्रक के साथ सभी प्रमुख अंगक उपस्थित रहते हैं, जिसके कारण ये उच्च श्रेणी के जीवों जैसे पादप, जन्तु और कवक में पाई जाती हैं।
जब प्रकाश के मार्ग में कोई अवरोध या संकीर्ण छिद्र रखा जाता है, तो प्रकाश सीधी रेखा में चलने के बजाय उस अवरोध या छिद्र के किनारों से मुड़कर आगे बढ़ता है। प्रकाश के इस गुण को प्रकाश का विवर्तन कहते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में प्रकाश सीधी रेखा में संचरित होता प्रतीत होता है, परंतु वास्तव में यह तरंग के रूप में व्यवहार करता है। जब अवरोध का आकार प्रकाश की तरंगदैर्ध्य (Wavelength) की तुलना में बहुत बड़ा होता है, तब विवर्तन का प्रभाव अत्यंत कम या नगण्य होता है। लेकिन यदि अवरोध या छिद्र का आकार प्रकाश की तरंगदैर्ध्य की कोटि (Order of Wavelength) का हो, तो विवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
विवर्तन के कारण अवरोध के पीछे पूर्ण अंधकार के स्थान पर प्रकाश और अंधकार की वैकल्पिक धारियाँ (Fringes) बनती हैं। यह घटना प्रकाश के तरंग स्वरूप का महत्वपूर्ण प्रमाण है।
इस प्रकार, प्रकाश का विवर्तन यह सिद्ध करता है कि प्रकाश केवल कण (Particle) ही नहीं, बल्कि तरंग (Wave) की तरह भी व्यवहार करता है। यही कारण है कि विवर्तन की घटना प्रकाश की तरंग प्रवृत्ति (Wave Nature) की पुष्टि करती है।
- घर्षण बल वह बल है जो संपर्क में रखे दो पृष्ठों (सतहों) के बीच होने वाली सापेक्ष गति (Relative Motion) का विरोध करता है।
- यह बल उन दोनों पृष्ठों की प्रकृति (Nature) पर निर्भर करता है, जिनके बीच गति उत्पन्न करने का प्रयास किया जाता है।
- यदि पृष्ठ खुरदरे (Rough) हों तो घर्षण अधिक होता है, और यदि पृष्ठ चिकने (Smooth) हों तो घर्षण कम होता है।
- किसी स्थिर वस्तु को गति देना, उसे गतिमान बनाए रखने की अपेक्षा अधिक कठिन होता है।
- इसका कारण यह है कि स्थैतिक घर्षण बल (Static Friction), सर्पी या गतिज घर्षण बल (Kinetic Friction) से अधिक होता है।
- स्थैतिक घर्षण वह है जो स्थिर वस्तु में गति प्रारंभ होने से पहले कार्य करता है, जबकि गतिज घर्षण वस्तु के चलने पर कार्य करता है।
- दैनिक जीवन में लगभग सभी क्रियाएँ घर्षण के कारण ही संभव हैं।
- उदाहरण के लिये, हाथ से वस्तु पकड़ना, वाहनों का सड़क पर चलना, चलते समय पैर का जमीन पर टिकना आदि घर्षण बल के कारण संभव है।
- यदि घर्षण न हो तो हम ठीक से चल भी नहीं सकते।
- कई बार घर्षण उपयोगी होता है, परंतु मशीनों में यह ऊर्जा की हानि का कारण बनता है।
- घर्षण को कम करने के लिये पृष्ठों को चिकना बनाया जाता है या स्नेहक (Lubricants) जैसे तेल और ग्रीस का प्रयोग किया जाता है।
- बरसात में सड़कों पर फिसलन का कारण घर्षण बल में कमी है।
- बर्फ की सतह पर चलना कठिन होता है क्योंकि वहाँ आवश्यक घर्षण बल का अभाव होता है।
परशुराम आचार्य गोवा के उन साहसी क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने पुर्तगाली दमन के सामने कभी झुकना स्वीकार नहीं किया। वे गोवा के प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन गोमांतक दल के सक्रिय सदस्य थे। यह संगठन गोवा को पुर्तगाल के चंगुल से मुक्त कराने के लिये गोपनीय और साहसिक योजनाएँ बनाकर उन्हें क्रियान्वित करता था। गोमांतक दल और पुर्तगाली पुलिस के बीच लगातार झड़पें होती रहती थीं, जिससे परशुराम आचार्य जैसे क्रांतिकारी सदैव पुलिस की नज़र में रहते थे।
19 सितंबर, 1956 को पुर्तगाली पुलिस ने उन्हें अचानक गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उन पर अत्यन्त क्रूरता से डंडों और लोहे की सरियों से प्रहार किये गये। उन पर की गई यातनाएँ इतनी भयानक थीं कि उसी दिन परशुराम आचार्य ने दम तोड़ दिया। यह घटना गोवा के स्वतंत्रता आंदोलन में पुर्तगाली हिंसा का एक अत्यन्त दर्दनाक उदाहरण मानी जाती है।
परशुराम आचार्य का जन्म सन् 1918 में गोवा के परतागले ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री श्रीनिवास आचार्य था। साधारण किसान परिवार में जन्मे परशुराम ने कम उम्र से ही अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस विकसित कर लिया था।
उसी घटना में उनके साथी केशव भट भी पुलिस की यातनाओं से शहीद हो गये। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था—उनके पिता का नाम श्री सदाशिव भट था।
परशुराम आचार्य और केशव भट के साथ एक अन्य साथी केशव टेंगशे को भी पुलिस ने अमानवीय यातनाएँ दीं। इन घोर यातनाओं के परिणामस्वरूप उनकी भी मृत्यु हो गई। केशव टेंगशे का जन्म सन् 1926 में पेंगुइनिम में हुआ था। उनके पिता भट टेंगशे एक मंदिर के पुजारी थे।
इन तीनों क्रांतिकारियों का बलिदान गोवा के स्वातंत्र्य संग्राम का एक अमिट अध्याय है।
- वायु परिवहन यातायात का सबसे तीव्र, सुरक्षित और आधुनिक साधन माना जाता है। यह लंबी दूरी को कम समय में तय करने के कारण आधुनिक परिवहन प्रणाली का महत्त्वपूर्ण भाग बन चुका है।
- भारत में वायु परिवहन की शुरुआत 1911 ई. में हुई, जब इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) से नैनी तक पहली बार वायुयान के माध्यम से डाक भेजी गई।
- दिसंबर 1912 में ब्रिटेन की इंपीरियल एयरवेज के सहयोग से इंडियन स्टेट एयरलाइंस ने लंदन–कराची–दिल्ली मार्ग पर उड़ान सेवा शुरू की, जो भारत की पहली अंतर्राष्ट्रीय विमान सेवा मानी जाती है।
- 1915 ई. में टाटा सन्स लिमिटेड ने कराची और मद्रास के बीच नियमित एयर मेल सेवा की शुरुआत की, जिससे भारत में वायु परिवहन के विकास को गति मिली।
- 1953 ई. में भारत सरकार ने सभी निजी विमान कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और दो नई कंपनियाँ स्थापित कीं।
- इनमें इंडियन एयरलाइंस को देश के भीतर घरेलू उड़ान सेवाएँ प्रदान करने की जिम्मेदारी दी गई।
- वहीं एयर इंडिया को अंतर्राष्ट्रीय उड़ान सेवाओं के संचालन का दायित्व सौंपा गया।
- बाद में इंडियन एयरलाइंस का एयर इंडिया में विलय कर दिया गया, जिससे देश की विमानन सेवाओं का संचालन अधिक सुव्यवस्थित हो गया।
- पवनहंस हेलीकॉप्टर्स लिमिटेड तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC), ऑयल इंडिया लिमिटेड, निजी संस्थानों तथा राज्य सरकारों को हेलीकॉप्टर सेवाएँ प्रदान करती है।
- कोरोना महामारी के समय लॉकडाउन के बाद विदेशों में फँसे भारतीय नागरिकों को वापस लाने के लिये ‘वंदे भारत मिशन’ चलाया गया।
- भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) का गठन 1 अप्रैल 1995 को किया गया।
- यह प्राधिकरण देश के अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू हवाई अड्डों तथा नागरिक विमान टर्मिनलों के प्रबंधन और विकास का कार्य करता है।
- शीतोष्ण चक्रवात को गर्त चक्र अथवा निम्न दाब क्षेत्र भी कहा जाता है।
- इनकी उत्पत्ति दोनों गोलार्द्धों में 30° से 65° अक्षांशों के मध्य होती है।
- जब इन अक्षांशों में उष्ण वायुराशियाँ (Tropical Air Mass) और शीत ध्रुवीय वायुराशियाँ (Polar Air Mass) आपस में मिलती हैं, तब शीतोष्ण चक्रवात का निर्माण होता है।
- इनका निर्माण मुख्यतः ध्रुवीय वाताग्र (Polar Front) के क्षेत्र में होता है, जहाँ तापमान में तीव्र अंतर पाया जाता है।
- शीत ऋतु में भूमध्य सागर क्षेत्र में ये चक्रवात विशेष रूप से सक्रिय हो जाते हैं।
- इनका प्रभाव दक्षिणी स्पेन, दक्षिणी फ्रांस, इटली, बाल्कन प्रायद्वीप, तुर्किये, इराक, अफगानिस्तान तथा उत्तर-पश्चिमी भारत तक देखा जाता है।
- इन चक्रवातों में दाब प्रवणता अपेक्षाकृत कम होती है तथा समदाब रेखाएँ प्रायः ‘V’ आकार की दिखाई देती हैं।
- ये चक्रवात स्थल और जल दोनों पर विकसित हो सकते हैं तथा इनका विस्तार हजारों किलोमीटर तक हो सकता है।
- इनका वायुवेग उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की तुलना में कम होता है, परंतु इनका प्रभाव व्यापक क्षेत्र में फैलता है।
- इनसे संबंधित वर्षा प्रायः रुक-रुक कर होने वाली तथा कई दिनों तक चलने वाली होती है।
- तीव्र बौछारों के साथ बादल छाए रहते हैं और मौसम परिवर्तनशील बना रहता है।
- इनमें सामान्यतः दो वाताग्र (Warm Front और Cold Front) पाए जाते हैं।
- वाताग्रों के गुजरने पर वायु की दिशा और तापमान में अचानक परिवर्तन हो जाता है।
सामान्यतः वायुमंडल में ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है, परंतु जब इसके विपरीत ऊँचाई के साथ तापमान में कमी के स्थान पर वृद्धि दर्ज की जाती है, तो इस स्थिति को ‘तापमान का व्युत्क्रमण’ या ‘तापीय प्रतिलोमन’ कहा जाता है। इस अवस्था में ठंडी वायु धरातल के निकट फँस जाती है और उसके ऊपर अपेक्षाकृत गर्म वायु की परत स्थित हो जाती है। परिणामस्वरूप वायु का ऊर्ध्वाधर संचलन बाधित हो जाता है।
धरातलीय प्रतिलोमन सामान्यतः मध्य तथा उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में शीत ऋतु की रात्रि में अधिक देखा जाता है। शीतकालीन लंबी रातें, स्वच्छ एवं बादल रहित आकाश, शांत वायुमंडल, शुष्क वायु तथा हिमाच्छादित धरातल इसकी अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। रात्रि में धरातल तीव्र गति से ऊष्मा विकिरित करता है, जिससे सतह की वायु ठंडी हो जाती है और ऊपर की वायु अपेक्षाकृत गर्म बनी रहती है, जिससे व्युत्क्रमण की स्थिति उत्पन्न होती है।
तापीय व्युत्क्रमण के कई महत्त्वपूर्ण प्रभाव देखे जाते हैं। यह घने कुहरे (Fog) को जन्म देता है, जिससे दृश्यता कम हो जाती है और सड़क, रेल तथा वायु परिवहन में बाधा उत्पन्न होती है। औद्योगिक क्षेत्रों में यह धुएँ और प्रदूषकों को धरातल के निकट रोक देता है, जिससे धुंध (Smog) की समस्या बढ़ती है। दूसरी ओर, यह चाय और कहवा जैसी फसलों की खेती के लिये लाभदायक भी हो सकता है, क्योंकि ठंडी वायु ढलानों पर नीचे बह जाती है। यह मौसमी स्थिरता को बढ़ाकर वर्षण की संभावना को कम करता है तथा हिम वर्षा (Freezing Rain) की स्थिति के लिये भी उत्तरदायी होता है।
बालाजी विश्वनाथ मराठा साम्राज्य के प्रथम शक्तिशाली पेशवा माने जाते हैं। उन्होंने संघर्ष के समय मराठा शासक Shahu I (शाहू) का पूरा साथ दिया। उनकी निष्ठा और प्रशासनिक क्षमता से प्रभावित होकर शाहू ने 1713 में उन्हें पेशवा नियुक्त किया। इस नियुक्ति के साथ ही पेशवा पद की शक्ति और प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
बालाजी विश्वनाथ ने मराठा प्रशासन को संगठित और सुदृढ़ किया। उन्होंने विभिन्न मराठा सरदारों को एकजुट करने का प्रयास किया और राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाया। उनके कार्यकाल में पेशवा पद केवल एक मंत्री पद न रहकर वास्तविक सत्ता का केंद्र बन गया। परिणामस्वरूप, बालाजी विश्वनाथ और उनके उत्तराधिकारी राज्य के वास्तविक शासक बन गये, जबकि छत्रपति शाहू नाममात्र के शासक रह गये। इस परिवर्तन ने मराठा शासन व्यवस्था की संरचना को स्थायी रूप से बदल दिया।
1719 में बालाजी विश्वनाथ ने दिल्ली की राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने मुगल सम्राट Farrukhsiyar को गद्दी से हटाने में Sayyid Brothers (सैय्यद बंधुओं) की सहायता की। इस सहयोग के बदले मराठों को मुगल दरबार से महत्वपूर्ण अधिकार और मान्यता प्राप्त हुई, जिससे मराठा शक्ति को वैधानिक आधार मिला।
बालाजी विश्वनाथ का शासनकाल यद्यपि अल्पकालीन था, परंतु उन्होंने मराठा साम्राज्य को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। उनकी नीतियों ने पेशवा पद को सर्वोच्च शक्ति बना दिया और मराठा साम्राज्य के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार वे मराठा इतिहास में एक दूरदर्शी और प्रभावशाली प्रशासक के रूप में स्मरण किये जाते हैं।
1909 का मॉर्ले-मिंटो सुधार, जिसे भारतीय परिषद् अधिनियम 1909 भी कहा जाता है, भारतीय संवैधानिक विकास में एक महत्त्वपूर्ण चरण था। इस सुधार का उद्देश्य भारतीयों को शासन कार्य में सीमित भागीदारी प्रदान करना था।
इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय तथा प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया और उनमें भारतीय सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई। केंद्रीय विधान सभा के भारतीय सदस्यों को अनुपूरक प्रश्न पूछने का अधिकार प्रदान किया गया। इससे उन्हें प्रशासनिक कार्यों पर अधिक प्रभावी ढंग से प्रश्न उठाने का अवसर मिला।
किन्तु इन सदस्यों को विदेशी राज्यों तथा देशी रियासतों के साथ संबंधों, रेलवे पर होने वाले व्यय तथा सार्वजनिक ऋण पर भुगतान किये जाने वाले ब्याज के संबंध में प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं थी। इससे स्पष्ट है कि उनकी शक्तियाँ अभी भी सीमित थीं।
इस अधिनियम का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान मुसलमानों के लिये पृथक् निर्वाचक मंडल (Separate Electorate) की व्यवस्था करना था। इसके अंतर्गत मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को ही चुन सकते थे। इस व्यवस्था ने भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।
इस प्रकार 1909 का मॉर्ले-मिंटो सुधार भारतीयों की शासन में भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक कदम था, किन्तु इसकी सीमाएँ भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
1858 का भारत शासन अधिनियम भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश संसद ने यह कानून पारित किया, जिसके द्वारा भारत पर शासन करने का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर सीधे ब्रिटिश क्राउन को सौंप दिया गया। इस प्रकार कंपनी का शासन समाप्त हो गया और भारत में प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई।
इस अधिनियम के अंतर्गत भारत के प्रशासन का दायित्व ब्रिटिश सरकार के एक मंत्री को सौंपा गया, जिसे ‘भारत का राज्य सचिव’ कहा जाता था। उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद् की नियुक्ति की गई। यह राज्य सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य होता था और ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था। इस व्यवस्था के माध्यम से भारत की शासन व्यवस्था पर ब्रिटिश संसद का प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया।
इस अधिनियम के लागू होने के बाद भारत के गवर्नर जनरल को ‘वायसराय’ कहा जाने लगा। वायसराय ब्रिटिश सम्राट (क्राउन) का प्रतिनिधि बनकर भारत में शासन कार्य करता था। लॉर्ड कैनिंग भारत के पहले वायसराय बने।
इस प्रकार 1858 का भारत शासन अधिनियम भारत में कंपनी शासन के अंत और क्राउन शासन की स्थापना का प्रतीक था। यह अधिनियम प्रशासनिक केंद्रीकरण और ब्रिटिश संसद के प्रत्यक्ष नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।
कालामुख संप्रदाय शैव धर्म का एक अत्यंत उग्र, तांत्रिक तथा रहस्यमय संप्रदाय था। यह संप्रदाय अपने स्वरूप, साधना पद्धति और आचार-विचार में कापालिक संप्रदाय से काफी मिलता-जुलता था, किंतु इसकी प्रवृत्तियाँ कापालिकों की तुलना में अधिक भयावह और कठोर मानी जाती थीं।
‘कालामुख’ शब्द का अर्थ है — काले मुख वाले। इस नाम से ही इस संप्रदाय की उग्रता और तामसी स्वरूप का अनुमान लगाया जा सकता है। कालामुख संप्रदाय के अनुयायी शिव के भैरव स्वरूप की उपासना करते थे और तंत्र-मंत्र आधारित साधनाओं पर विशेष बल देते थे।
इनके धार्मिक आचरण सामान्य सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं से पूर्णतः भिन्न थे। ये लोग नरकपाल (मानव खोपड़ी) में भोजन करते थे, अपने शरीर पर श्मशान की भस्म मलते थे और मदिरा सेवन को साधना का अनिवार्य अंग मानते थे। इनका विश्वास था कि भय, मृत्यु और निषिद्ध कर्मों को स्वीकार कर ही आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
कालामुख संप्रदाय के अनुयायी कठोर तपस्या और तथाकथित ‘महाव्रत’ का पालन करते थे। इसी कारण शिव पुराण में इन्हें ‘महाव्रतघर’ कहा गया है। ये लोग श्मशानों और एकांत स्थानों में निवास करते थे तथा सामाजिक नियमों और नैतिक बंधनों को तोड़ना आध्यात्मिक उन्नति का साधन मानते थे।
हालाँकि समय के साथ इस संप्रदाय की अत्यधिक उग्र, असामाजिक और तामसी गतिविधियों के कारण समाज में इसके प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण उत्पन्न हो गया। वैदिक और भक्ति परंपराओं के उदय के साथ-साथ कालामुख संप्रदाय का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता चला गया और अंततः यह संप्रदाय लुप्त हो गया।
इस प्रकार कालामुख संप्रदाय प्राचीन भारत में शैव धर्म के तांत्रिक और उग्र स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है, जो भारतीय धार्मिक विविधता को समझने में सहायक है।
घाघरा नदी उत्तर भारत की एक प्रमुख हिमालयी नदी है, जिसे सरयू एवं करनाली नामों से भी जाना जाता है। इस नदी का उद्गम तिब्बत के पठार पर स्थित मानसरोवर झील के निकट मापचोचुंग हिमनद (ग्लेशियर) से होता है। नेपाल क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद यह करनाली कहलाती है तथा भारत में इसे घाघरा या सरयू के नाम से जाना जाता है। यह नदी हिमालय से निकलने वाली अत्यंत वेगवान और जल-समृद्ध नदियों में से एक है।
घाघरा नदी उत्तर प्रदेश से होते हुए बिहार में दरौली (सिवान जिला) के निकट प्रवेश करती है। बिहार में इस नदी की कुल लंबाई लगभग 83 किलोमीटर है, जो अपेक्षाकृत कम है, फिर भी इसका भौगोलिक एवं आर्थिक महत्त्व अत्यंत अधिक है। यह नदी बिहार के सिवान एवं सारण जिलों से होकर प्रवाहित होती है तथा रिविलगंज (सारण जिला) के पास गंगा नदी में मिल जाती है।
घाघरा नदी हिमालय से भारी मात्रा में जल एवं अवसाद लेकर आती है, जिसके कारण इसके आसपास के क्षेत्रों में भूमि अत्यंत उपजाऊ होती है। किंतु वर्षा ऋतु में यह नदी बार-बार बाढ़ का कारण भी बनती है। विशेषकर उत्तर बिहार के मैदानी क्षेत्रों में घाघरा की बाढ़ से कृषि, जन-जीवन और संपत्ति को व्यापक क्षति पहुँचती है। इसके बावजूद यह नदी सिंचाई, मत्स्य पालन और भूजल पुनर्भरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
धार्मिक दृष्टि से भी सरयू नदी का विशेष महत्त्व है। हिंदू धर्म में इसे पवित्र नदी माना गया है और अयोध्या जैसे धार्मिक नगर इससे जुड़े हुए हैं। इस प्रकार घाघरा (सरयू) नदी बिहार के प्राकृतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
स्रोत-पद्धति शिक्षण की एक महत्वपूर्ण विधि है, जिसमें ज्ञानार्जन के लिये प्रत्यक्ष अनुभव तथा मूल स्रोतों को आधार बनाया जाता है। ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष अनुभव का महत्व प्राचीन काल से स्वीकार किया जाता रहा है, परंतु 19वीं शताब्दी के अंतिम चरण में रटंत विद्या के विरुद्ध आंदोलन शुरू हुआ और स्रोत-अध्ययन पर विशेष बल दिया गया। यह माना गया कि किसी वस्तु या घटना को स्वयं देखकर, परखकर और अनुभव करके जितना सटीक एवं स्थायी ज्ञान प्राप्त होता है, उतना केवल पढ़ने या सुनने से नहीं मिलता। इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव, परोक्ष अनुभव की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली और विश्वसनीय होता है।
सामाजिक विज्ञान और इतिहास जैसे विषयों में स्रोत-पद्धति का विशेष महत्व है। इन विषयों का अध्ययन यदि मूल स्रोतों के आधार पर किया जाए तो विद्यार्थी तथ्यों को अधिक स्पष्टता और प्रमाणिकता के साथ समझ पाते हैं। स्रोतों को सामान्यतः तीन वर्गों में बांटा जाता है—मौखिक स्रोत, लिखित स्रोत तथा सामग्री संबंधी स्रोत। मौखिक स्रोतों में रीति-रिवाज, लोकगीत, दंतकथाएं और पारंपरिक विवरण आते हैं। लिखित स्रोतों में हस्तलेख, रिपोर्ट, डायरी, पत्र और संधियां शामिल होती हैं। सामग्री संबंधी स्रोतों में खंडहर, अस्त्र-शस्त्र, मूर्तियां, सिक्के, पोशाकें आदि आते हैं।
सामाजिक विज्ञान में स्रोतों का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। ग्राम की झील, नदी, मंदिर, ऐतिहासिक स्थल, खंडहर, स्थानीय परंपराएं तथा समुदाय का जीवन भी महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। छोटी कक्षाओं में इस विधि का उपयोग वातावरण निर्माण के लिए किया जाना चाहिए, जबकि उच्च कक्षाओं में विवादास्पद प्रश्नों के समाधान और तथ्यपरक निर्णय के लिए यह विधि अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।
समस्या-पद्धति एक प्रभावशाली तथा मनोवैज्ञानिक शिक्षण-विधि है, जिसमें ज्ञानार्जन को समस्यात्मक स्थिति के माध्यम से कराया जाता है। इस पद्धति का प्रमुख गुण यह है कि यह बालकों में सोचने, तर्क करने तथा समस्या का समाधान खोजने की क्षमता का विकास करती है। यह विधि सीखने के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है, इसलिए इसे ज्ञानार्जन की एक स्वाभाविक पद्धति माना जाता है।
समस्या-पद्धति के प्रयोग से छात्रों में समस्या-समाधान की क्षमता विकसित होती है। वे किसी भी समस्या को तार्किक ढंग से समझना, उससे संबंधित तथ्यों का एकत्रीकरण करना, उनका व्यवस्थापन करना तथा उनका मूल्यांकन करना सीख जाते हैं। इस पद्धति के माध्यम से छात्रों में स्वाध्याय की आदत का निर्माण होता है और वे स्वप्रयत्न द्वारा ज्ञानार्जन करने में सक्षम बनते हैं। इसके अतिरिक्त, यह पद्धति वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास में सहायक होती है, जिससे छात्रों में तर्कसंगत एवं आलोचनात्मक चिंतन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। यह मानसिक अंतरिक्ष को विस्तृत करने में भी सहायक है, क्योंकि इसमें बालक सक्रिय रूप से मानसिक क्रियाओं में संलग्न रहता है।
यद्यपि समस्या-पद्धति के अनेक गुण हैं, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ और दोष भी हैं। यह पद्धति छोटी कक्षाओं के बालकों के लिए व्यावहारिक नहीं मानी जाती, क्योंकि उनके मानसिक स्तर के अनुरूप समस्याओं का चयन कठिन होता है। इसके बार-बार प्रयोग से शिक्षण में यांत्रिकता तथा नीरसता उत्पन्न होने का भय रहता है। इस पद्धति में हमेशा संतोषजनक निष्कर्षों तक पहुँचना संभव नहीं होता। समय की दृष्टि से यह पद्धति व्ययसाध्य है तथा इसके सफल प्रयोग के लिए पर्याप्त निर्देशात्मक सामग्री की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, इसमें बालक की शारीरिक क्रियाओं की अपेक्षा मानसिक क्रियाओं पर अधिक बल दिया जाता है, जिससे शारीरिक सक्रियता की उपेक्षा हो जाती है।
कोली विद्रोह महाराष्ट्र और गुजरात के कोली जनजातीय समुदायों द्वारा ब्रिटिश शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ किए गए संघर्षों की एक शृंखला थी। यह दो प्रमुख चरणों में हुआ—पहला 1822 से 1829 तक महाराष्ट्र के अहमदनगर क्षेत्र में, और दूसरा 1857 में गुजरात के मेहसाणा जिले की तरंगा पहाड़ियों में।
नेतृत्व:
पहले चरण (1822–29) में रामजी भांगरे ने ब्रिटिश सरकार और स्थानीय बनिया साहूकारों के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। वे पहले नायकवारी पुलिस में जमादार थे, लेकिन कर और वेतन विवाद के कारण नौकरी छोड़कर अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लिये।
दूसरे चरण (1857) में तरंगा पहाड़ियों के कोली विद्रोह का नेतृत्व मगनलाल भुखन, द्वारकादास और जेठा माधवजी ने किया।
कारण:
1822–29 के विद्रोह का मुख्य कारण पेशवाओं से पुणे पर अंग्रेजों के कब्जे (1818) के बाद बढ़ती आर्थिक असमानता और स्थानीय साहूकारों द्वारा किसानों का शोषण था।
1857 में कोलियों का विद्रोह मुख्यतः औपनिवेशिक शासन से उत्पन्न असंतोष, नए कानूनों और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण हुआ।
विकास:
रामजी भांगरे ने 500–600 कोली योद्धाओं के साथ अकोला हिल्स में साहूकारों के खातों को जला दिया और ब्रिटिश विरोधी कार्रवाइयाँ कीं। अंततः उन्हें पकड़कर 1830 में नासिक में फांसी दी गई।
1857 के विद्रोह में कोलियों ने सितंबर में हमला किया और दो महीने तक कंपनी के इलाकों में लूटपाट की, परंतु पर्याप्त जनसमर्थन न मिलने के कारण विद्रोह असफल रहा।
प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली भारत की एक महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषता है। यह नदी प्रणाली हिमालयी नदी प्रणाली की तुलना में अधिक प्राचीन मानी जाती है। इन नदियों का विकास भारत के प्रायद्वीपीय पठार पर हुआ है, जो एक स्थिर और कठोर भू-आकृतिक संरचना है। इसी कारण प्रायद्वीपीय नदियों का प्रवाह अपेक्षाकृत निश्चित और स्थायी दिशा में पाया जाता है।
प्रायद्वीपीय नदियों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इनमें मेन्डर्स (घुमावदार मोड़) का अभाव पाया जाता है। ये नदियाँ गहरी घाटियाँ नहीं बनातीं क्योंकि इनका अपरदन कार्य सीमित होता है। अधिकांश प्रायद्वीपीय नदियाँ गैर-बारहमासी होती हैं, अर्थात् इनका जल प्रवाह मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर करता है। ग्रीष्म ऋतु में इन नदियों का जल स्तर काफी कम हो जाता है।
पश्चिमी घाट पर्वत श्रेणी प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली में जल विभाजक (Water Divide) का कार्य करती है। यह पर्वत श्रेणी पश्चिमी और पूर्वी प्रवाहित नदियों के बीच सीमा निर्धारित करती है। पश्चिमी घाट के पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ छोटी, तीव्र प्रवाह वाली और अपेक्षाकृत कम लंबाई की होती हैं, जो सीधे अरब सागर में गिरती हैं।
नर्मदा और तापी को छोड़कर भारत की अधिकांश प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं और अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। नर्मदा और तापी भ्रंश घाटियों से होकर बहती हैं और पश्चिम की ओर प्रवाहित होकर अरब सागर में मिलती हैं।
प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली की अन्य महत्त्वपूर्ण नदियों में महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी शामिल हैं। गोदावरी प्रायद्वीपीय नदियों में सबसे लंबी नदी है। ये नदियाँ कृषि, सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और मानव जीवन के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
DVD का पूरा नाम Digital Video Disk या Digital Versatile Disk है। डीवीडी एक Optical Disk Storage Technology है, जिसका उपयोग बहुत अधिक मात्रा में डेटा को स्टोर करने के लिये किया जाता है। यह CD की तुलना में अधिक उन्नत तकनीक पर आधारित होती है और इसमें ज्यादा डेटा सुरक्षित किया जा सकता है।
डीवीडी का प्रयोग मुख्य रूप से ऑडियो, वीडियो, मूवी, सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर फाइल्स को स्टोर करने के लिये किया जाता है। कुछ डीवीडी विशेष रूप से वीडियो और ऑडियो कंटेंट के लिये बनाई जाती हैं, जबकि कुछ डीवीडी का उपयोग कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, गेम्स और अन्य डिजिटल फाइल्स को संग्रहित करने के लिये किया जाता है।
डीवीडी को वर्ष 1995 में Panasonic, Philips और Toshiba कंपनियों ने मिलकर विकसित किया था। इसका उद्देश्य CD की सीमित स्टोरेज क्षमता को बढ़ाना और बेहतर क्वालिटी में डेटा स्टोरेज उपलब्ध कराना था।
डीवीडी की स्टोरेज क्षमता 4.7 GB से लेकर 17.08 GB तक होती है।
- Single-sided, Single-layer DVD की क्षमता 4.7 GB होती है।
- Single-sided, Double-layer DVD में 8.5 GB तक डेटा स्टोर किया जा सकता है।
- Double-sided, Single-layer DVD की क्षमता 9.4 GB होती है।
- Double-sided, Double-layer DVD में अधिकतम 17.08 GB तक डेटा स्टोर किया जा सकता है।
डीवीडी में CD की तुलना में अधिक डेटा स्टोर किया जा सकता है क्योंकि इसमें MPEG-2 Compression Technology का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक वीडियो और ऑडियो फाइल्स को कम जगह में बेहतर क्वालिटी के साथ स्टोर करने में मदद करती है। इसी कारण डीवीडी लंबे समय तक मूवी और अन्य डिजिटल कंटेंट स्टोरेज के लिये एक लोकप्रिय माध्यम रही है।
कंप्यूटर की चौथी पीढ़ी की शुरुआत लगभग वर्ष 1970 में हुई और इसका विकास 1985 तक माना जाता है। इस पीढ़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें Integrated Circuit (IC) की जगह Microprocessor का उपयोग किया जाने लगा। माइक्रोप्रोसेसर एक ऐसी तकनीक है जिसमें हजारों ट्रांजिस्टर और सर्किट को एक ही चिप में समाहित कर दिया जाता है। इसमें LSI (Large Scale Integration) और बाद में VLSI तकनीक का भी उपयोग हुआ।
चौथी पीढ़ी के आगमन के साथ कंप्यूटर पहले की तुलना में और अधिक आधुनिक, तेज और शक्तिशाली हो गए। इस पीढ़ी में कंप्यूटर का आकार काफी छोटा हो गया, जिससे पर्सनल कंप्यूटर (PC) का विकास संभव हुआ। अब कंप्यूटर को घर, स्कूल और कार्यालयों में आसानी से इस्तेमाल किया जाने लगा।
इस पीढ़ी के कंप्यूटरों की प्रोसेसिंग स्पीड बहुत तेज थी और ये एक समय में कई कार्यों को आसानी से कर सकते थे। ये कंप्यूटर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक विश्वसनीय (reliable) थे और कम मात्रा में बिजली की खपत करते थे। इसके अलावा, ये जल्दी गर्म नहीं होते थे, जिससे इनके रख-रखाव की आवश्यकता भी कम हो गई।
चौथी पीढ़ी के कंप्यूटरों में लगभग सभी आधुनिक फीचर्स शामिल हो चुके थे। इस पीढ़ी में Real Time Operating System, Time Sharing Operating System और Distributed Operating System का उपयोग किया जाने लगा। प्रोग्रामिंग के लिये C और C++ जैसी हाई-लेवल भाषाओं का प्रयोग किया गया।
इस पीढ़ी में सुपरकंप्यूटर का भी विकास हुआ, जो कुछ ही मिलीसेकंड में जटिल गणनाएँ करने में सक्षम थे। कम कीमत, अधिक गति और बेहतर प्रदर्शन के कारण चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर बहुत अधिक लोकप्रिय हुए और आधुनिक कंप्यूटर युग की नींव बने।
कंप्यूटर की पहली पीढ़ी (First Generation of Computers) तकनीकी विकास की प्रारंभिक अवस्था का प्रतिनिधित्व करती है। यद्यपि इस पीढ़ी ने कंप्यूटर तकनीक की नींव रखी, फिर भी इसमें अनेक गंभीर कमियाँ थीं, जिनके कारण आगे की पीढ़ियों का विकास आवश्यक हो गया।
पहली पीढ़ी के कंप्यूटरों का आकार बहुत बड़ा होता था। ये कंप्यूटर इतने विशाल होते थे कि इन्हें स्थापित करने के लिये पूरे कमरे की आवश्यकता पड़ती थी। बड़े आकार के कारण इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना लगभग असंभव था।
इस पीढ़ी के कंप्यूटर काम करते समय बहुत अधिक गर्म हो जाया करते थे। इनमें हजारों की संख्या में वैक्यूम ट्यूब का प्रयोग किया जाता था, जो जल्दी गर्म हो जाती थीं। कंप्यूटर को सही ढंग से कार्यशील रखने के लिये एयर-कंडीशनर (AC) की आवश्यकता पड़ती थी, जिससे संचालन लागत काफी बढ़ जाती थी।
अपने बड़े आकार और वैक्यूम ट्यूब तकनीक के कारण ये कंप्यूटर अधिक मात्रा में बिजली का उपयोग करते थे। इससे न केवल खर्च बढ़ता था, बल्कि बिजली की निरंतर आपूर्ति भी एक बड़ी समस्या बन जाती थी।
पहली पीढ़ी के कंप्यूटरों को मेंटेन करके रखना बहुत कठिन था। वैक्यूम ट्यूब जल्दी खराब हो जाती थीं और बार-बार बदलनी पड़ती थीं, जिससे समय और धन दोनों की हानि होती थी।
इन कंप्यूटरों में केवल मशीन लैंग्वेज का ही उपयोग किया जाता था। मशीन भाषा में प्रोग्रामिंग करना अत्यंत जटिल और समय लेने वाला कार्य था, जिसे केवल प्रशिक्षित विशेषज्ञ ही कर सकते थे।
इन कंप्यूटरों का उपयोग सीमित क्षेत्रों तक ही था, जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान और सरकारी संस्थान। साथ ही, इनमें डेटा स्टोरेज क्षमता बहुत कम थी, जिसके कारण ये बड़ी मात्रा में जानकारी संग्रहित नहीं कर पाते थे।
इन सभी कमियों के कारण पहली पीढ़ी के कंप्यूटरों को धीरे-धीरे उन्नत पीढ़ियों द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
मैग्नेटिक टेप एक पुरानी स्टोरेज तकनीक है, जिसका उपयोग पहले बड़े पैमाने पर डेटा को सुरक्षित रखने के लिये किया जाता था। हालाँकि इसके कुछ लाभ हैं, लेकिन इसके कई ऐसे नुकसान भी हैं जिनके कारण आज के समय में इसका उपयोग बहुत कम हो गया है। मैग्नेटिक टेप का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसमें डेटा को एक्सेस करने में बहुत अधिक समय लगता है। क्योंकि यह डेटा को सीधे एक्सेस नहीं कर सकती, इसलिये यूजर को आवश्यक डेटा तक पहुँचने के लिये पूरा क्रम (sequence) पूरा करना पड़ता है।
मैग्नेटिक टेप की डेटा ट्रांसफर स्पीड बहुत धीमी होती है। आधुनिक स्टोरेज डिवाइस जैसे हार्ड डिस्क और SSD की तुलना में यह काफी कम गति से डेटा को read और write करती है, जिससे समय की अधिक बर्बादी होती है। एक और महत्त्वपूर्ण कमी यह है कि मैग्नेटिक टेप में स्टोर किया गया डेटा मनुष्य सीधे पढ़ नहीं सकता। डेटा को देखने या उपयोग करने के लिये विशेष मशीन या ड्राइव की आवश्यकता होती है।
मैग्नेटिक टेप धूल और मिट्टी से आसानी से खराब हो जाती है। यदि टेप को सही तरीके से सुरक्षित न रखा जाए, तो उस पर जमी धूल डेटा को नुकसान पहुँचा सकती है। इसके अलावा, इस टेप में स्टोर डेटा को अपडेट या चेंज करना आसान नहीं होता। एक बार डेटा स्टोर हो जाने के बाद उसमें बदलाव करना जटिल प्रक्रिया बन जाता है।
मैग्नेटिक टेप में डेटा को केवल क्रमानुसार (sequence) ही एक्सेस किया जा सकता है, जिससे इसकी कार्यक्षमता और भी सीमित हो जाती है। इन्हीं सभी कारणों से आधुनिक समय में मैग्नेटिक टेप की जगह हार्ड डिस्क, पेन ड्राइव और SSD जैसे तेज और उन्नत स्टोरेज डिवाइस ने ले ली है।
मैग्नेटिक टेप एक पुरानी लेकिन महत्त्वपूर्ण सेकेंडरी स्टोरेज डिवाइस है, जिसका उपयोग बड़े स्तर पर डेटा को सुरक्षित रखने के लिये किया जाता रहा है। इसकी संरचना और कार्यप्रणाली इसे अन्य स्टोरेज डिवाइस से अलग बनाती है। मैग्नेटिक टेप मुख्य रूप से एक पतले प्लास्टिक के रिबन से बना होता है, जिसकी सतह पर मैटल ऑक्साइड (Metal Oxide) की एक परत चढ़ाई जाती है। यही परत डेटा को चुम्बकीय रूप में स्टोर करने में सहायक होती है।
मैग्नेटिक टेप की स्टोरेज क्षमता काफी अधिक होती है। सामान्यतः यह 100 MB से लेकर 200 GB या उससे भी अधिक डेटा को स्टोर कर सकती है। इस कारण इसका उपयोग बड़े डेटा बैकअप के लिये किया जाता रहा है। यह एक नॉन-वोलेटाइल मेमोरी है, अर्थात् बिजली के चले जाने पर भी इसमें संग्रहित डेटा सुरक्षित रहता है और डिलीट नहीं होता।
मैग्नेटिक टेप को एक विश्वसनीय (Reliable) स्टोरेज डिवाइस माना जाता है, क्योंकि इसमें डेटा लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसी विशेषता के कारण बैंक, सरकारी संस्थान और बड़े संगठन इसका उपयोग अपने महत्त्वपूर्ण डेटा के बैकअप के लिये करते थे।
हालांकि, मैग्नेटिक टेप की कुछ सीमाएँ भी हैं। इसे सीधे (Direct Access) एक्सेस नहीं किया जा सकता, बल्कि इसमें डेटा को केवल क्रमवार (Sequential) रूप से ही पढ़ा और लिखा जाता है। इसी वजह से डेटा को खोजने और ट्रांसफर करने में अधिक समय लगता है। आधुनिक समय में हार्ड डिस्क, SSD और पेन ड्राइव जैसी तेज़ और सुविधाजनक स्टोरेज डिवाइस उपलब्ध होने के कारण मैग्नेटिक टेप की लोकप्रियता कम हो गई है। फिर भी, कम लागत और बड़ी स्टोरेज क्षमता के कारण इसका उपयोग कुछ विशेष क्षेत्रों में आज भी किया जाता है।
CPU का पूरा नाम Central Processing Unit (सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट) होता है। CPU को कंप्यूटर का दिमाग कहा जाता है, क्योंकि यह कंप्यूटर के सभी कार्यों को नियंत्रित करता है और उन्हें पूरा करता है। CPU को प्रोसेसर या माइक्रोप्रोसेसर के नाम से भी जाना जाता है।
CPU कंप्यूटर की मेमोरी से डेटा और निर्देशों (Instructions) को प्राप्त करता है, उन्हें प्रोसेस करता है और फिर प्राप्त परिणाम को दोबारा मेमोरी में स्टोर कर देता है। कंप्यूटर में होने वाली सभी गणनाएँ, निर्णय और नियंत्रण संबंधी कार्य CPU के द्वारा ही किये जाते हैं।
CPU का कार्य करने का तरीका मुख्य रूप से चार चरणों (Steps) में पूरा होता है, जिसे Instruction Cycle भी कहा जाता है।
🔹 1️⃣ Fetch (फेच)
इस चरण में CPU, कंप्यूटर की मुख्य मेमोरी से निर्देशों को प्राप्त करता है। मेमोरी में अनेक प्रकार के प्रोग्राम और निर्देश स्टोर रहते हैं। CPU में मौजूद Program Counter (PC) अगले निर्देश का address स्टोर करता है और उसी address से निर्देश को फेच करता है।
🔹 2️⃣ Decode (डिकोड)
Fetch किये गये निर्देशों को CPU समझने योग्य बनाने के लिये डिकोड करता है। इस प्रक्रिया में निर्देशों को यह बताया जाता है कि कौन-सा कार्य करना है और किस डेटा पर करना है।
🔹 3️⃣ Execute (एक्ज़िक्यूट)
यह CPU की कार्यविधि का सबसे महत्त्वपूर्ण चरण होता है। इस स्टेप में CPU निर्देशों को execute करता है। यदि निर्देश गणना से संबंधित है तो ALU उसका निष्पादन करता है, और यदि डेटा ट्रांसफर से जुड़ा है तो वह कार्य भी इसी चरण में पूरा होता है।
🔹 4️⃣ Store (स्टोर)
निर्देशों के निष्पादन के बाद प्राप्त परिणाम को CPU फिर से मेमोरी में स्टोर कर देता है, ताकि भविष्य में उसका उपयोग किया जा सके।
इस प्रकार CPU लगातार Fetch, Decode, Execute और Store की प्रक्रिया को दोहराकर कंप्यूटर को सही ढंग से कार्य करने योग्य बनाता है।
कंट्रोल यूनिट (Control Unit – CU) CPU का एक महत्त्वपूर्ण भाग है, जो कंप्यूटर सिस्टम की सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इसका मुख्य कार्य मुख्य मेमोरी (Main Memory) से निर्देशों (Instructions) को प्राप्त करना, उन्हें डिकोड करना और फिर उनके अनुसार कार्यों को निष्पादित (Execute) करवाना होता है। कंट्रोल यूनिट स्वयं कोई गणनात्मक कार्य नहीं करती, बल्कि यह अन्य इकाइयों को निर्देश देती है कि कौन-सा कार्य कब और कैसे करना है।
कंट्रोल यूनिट कंप्यूटर से जुड़ी हुई सभी डिवाइसों और उनके कार्यों को नियंत्रित करती है। यह CPU के अन्य भागों जैसे ALU, मेमोरी और इनपुट/आउटपुट डिवाइसों के बीच तालमेल बनाए रखती है। CU यह सुनिश्चित करती है कि सभी हार्डवेयर इकाइयाँ सही क्रम में और सही समय पर कार्य करें।
कंट्रोल यूनिट का एक प्रमुख कार्य Fetch–Decode–Execute Cycle को पूरा करना है। सबसे पहले यह मुख्य मेमोरी से निर्देशों को fetch करती है, फिर उन्हें decode करती है और अंत में ALU या संबंधित इकाई को execute करने के लिये भेज देती है। इस प्रक्रिया के कारण कंप्यूटर किसी भी प्रोग्राम को सही ढंग से चला पाता है।
कंट्रोल यूनिट इनपुट/आउटपुट डिवाइसों के साथ भी संचार करती है और डेटा के प्रवाह (Data Flow) को नियंत्रित करती है। यह तय करती है कि इनपुट डिवाइस से प्राप्त डेटा किस मेमोरी लोकेशन में जायेगा और आउटपुट किस डिवाइस को भेजा जायेगा।
कंट्रोल यूनिट मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है—
Hardwired Control Unit, जिसमें नियंत्रण सर्किट हार्डवेयर पर आधारित होता है,
और Microprogrammable Control Unit, जिसमें नियंत्रण कार्य माइक्रो-इंस्ट्रक्शन्स द्वारा किये जाते हैं।
इस प्रकार, कंट्रोल यूनिट पूरे कंप्यूटर सिस्टम को एक संगठित और नियंत्रित तरीके से चलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
OCR (Optical Character Reader / Optical Character Recognition) एक महत्त्वपूर्ण इनपुट डिवाइस और तकनीक है, जिसका उपयोग हाथ से लिखे गये टेक्स्ट (handwriting), प्रिंटेड अक्षरों और दस्तावेज़ों को डिजिटल टेक्स्ट में बदलने के लिये किया जाता है। OCR तकनीक आज के डिजिटल युग में कागज़ी जानकारी को इलेक्ट्रॉनिक रूप में बदलने के लिये बहुत उपयोगी मानी जाती है।
OCR का उपयोग मुख्य रूप से documents, books, newspapers और historic documents को electronic files में कन्वर्ट करने के लिये किया जाता है। यह डिवाइस hard copy में मौजूद टेक्स्ट को स्कैन करता है और उसे editable digital text में बदल देता है। इस प्रक्रिया में OCR, scanner की मदद से दस्तावेज़ की image लेता है और फिर image में मौजूद अक्षरों को पहचानकर उन्हें text format में परिवर्तित करता है।
OCR तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पुराने और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखने में मदद करती है। Hard copy दस्तावेज़ समय के साथ खराब हो सकते हैं, लेकिन OCR की सहायता से उन्हें PDF, Word, Excel या eBook जैसे फॉर्मेट में सुरक्षित किया जा सकता है। इससे डेटा को store करना, search करना और share करना आसान हो जाता है।
शिक्षा, बैंकिंग, सरकारी कार्यालयों और लाइब्रेरी में OCR का व्यापक उपयोग किया जाता है। विद्यार्थियों के लिये यह तकनीक नोट्स और किताबों को डिजिटल रूप में बदलने में सहायक होती है। इसके अलावा OCR visually impaired लोगों के लिये भी उपयोगी है, क्योंकि digital text को screen reader के माध्यम से पढ़ा जा सकता है।
Features of OCR in Hindi – OCR की विशेषताएँ
- यह डिवाइस characters और text को identify करने में सक्षम होती है।
- OCR का output Word, Excel, PDF और eBook जैसे विभिन्न file formats में प्राप्त किया जा सकता है।
Scanner (स्कैनर) एक महत्त्वपूर्ण input device है, जिसका उपयोग images और documents को स्कैन करके उन्हें digital format में बदलने के लिये किया जाता है। स्कैनर की सहायता से कागज़ पर मौजूद जानकारी को कंप्यूटर में डिजिटल रूप में सेव किया जा सकता है। स्कैन होने के बाद यह डेटा कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई देता है, जिसे आउटपुट डेटा भी कहा जा सकता है।
स्कैनर मुख्य रूप से Optical Character Recognition (OCR) तकनीक का उपयोग करता है। इस तकनीक की मदद से स्कैन किया गया text और image डिजिटल फॉर्मेट में convert हो जाता है, जिससे उस डेटा को edit, store और share करना आसान हो जाता है। आज के समय में स्कैनर का उपयोग ऑफिस, बैंक, स्कूल, कॉलेज और अन्य संस्थानों में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
स्कैनर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह कागज़ी दस्तावेज़ों को सुरक्षित रूप से डिजिटल रूप में संग्रहित करने में मदद करता है। इससे documents के खराब होने या खो जाने की संभावना कम हो जाती है।
Types of Scanner in Hindi – स्कैनर के प्रकार
स्कैनर मुख्य रूप से निम्नलिखित चार प्रकार के होते हैं—
- Flatbed Scanner
इस स्कैनर में एक glass pane होता है, जिस पर documents या images रखकर स्कैन किया जाता है। इसमें CIS और CCD optical sensors होते हैं, जो प्रकाश (light) की मदद से फाइलों को स्कैन कर डिजिटल फॉर्मेट में बदलते हैं। - Handheld Scanner
यह आकार में छोटा स्कैनर होता है, जिसे हाथ में पकड़कर इमेज या टेक्स्ट स्कैन किया जाता है। स्कैन करते समय हाथ का स्थिर (stable) होना आवश्यक होता है। - Sheetfed Scanner
इस स्कैनर में documents को एक slot में डाला जाता है। यह single-page documents को स्कैन करने के लिये उपयुक्त होता है। - Photo Scanner
इस स्कैनर का उपयोग विशेष रूप से images और photos को स्कैन करने के लिये किया जाता है। इसमें high resolution और color depth होती है।
Features of Scanner in Hindi – स्कैनर की विशेषताएँ
- स्कैनर कम गुणवत्ता (low quality) वाली images को भी स्कैन कर सकता है।
- यह adaptable होता है, जिससे बड़े आकार के documents भी स्कैन किये जा सकते हैं।
- स्कैनर का उपयोग पुरानी तस्वीरों को साफ और सुरक्षित करने के लिये किया जाता है।
Definition (परिभाषा)
Peripheral Device (पेरीफेरल डिवाइस) वह कंप्यूटर डिवाइस होती है जो कंप्यूटर के मुख्य भाग (CPU, Main Memory आदि) का हिस्सा नहीं होती, लेकिन कंप्यूटर के साथ जुड़कर उसे इनपुट (Input) या आउटपुट (Output) सेवाएँ प्रदान करती है। उदाहरण के लिये Keyboard, Mouse, Scanner, Printer आदि पेरीफेरल डिवाइस हैं। इन्हें कंप्यूटर की सहायक (Auxiliary) डिवाइस भी कहा जाता है।
पेरीफेरल डिवाइस में computing करने की क्षमता नहीं होती, अर्थात ये स्वयं डेटा को प्रोसेस नहीं करतीं। इसके बावजूद ये कंप्यूटर के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती हैं क्योंकि इनके बिना यूजर कंप्यूटर से प्रभावी ढंग से इंटरैक्ट नहीं कर सकता। ये डिवाइस कंप्यूटर से विभिन्न I/O Interfaces के माध्यम से जुड़ती हैं, जैसे—USB (Universal Serial Bus), COM Port, Serial Port, Bluetooth आदि।
पेरीफेरल डिवाइस का मुख्य उद्देश्य कंप्यूटर को डेटा देना (Input) या कंप्यूटर से परिणाम प्राप्त करना (Output) होता है। कुछ डिवाइस ऐसी भी होती हैं जो इनपुट और आउटपुट दोनों कार्य करती हैं।
Types of Peripheral Devices in Hindi (पेरीफेरल डिवाइस के प्रकार)
पेरीफेरल डिवाइस को मुख्य रूप से दो आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है—
1. Based on Installation (स्थापना के आधार पर)
- Internal Peripheral Devices – जो कंप्यूटर के अंदर लगे होते हैं, जैसे—Hard Disk, Optical Drive आदि।
- External Peripheral Devices – जो कंप्यूटर के बाहर से जोड़े जाते हैं, जैसे—Keyboard, Mouse, Printer, Scanner आदि।
2. Based on Function (फ़ंक्शन के आधार पर)
- Input Devices – जो कंप्यूटर को डेटा प्रदान करती हैं, जैसे—Keyboard, Mouse, Scanner, Webcam।
- Output Devices – जो कंप्यूटर से परिणाम दिखाती हैं, जैसे—Monitor, Printer, Speaker।
- Input–Output Devices – जो इनपुट और आउटपुट दोनों कार्य करती हैं, जैसे—Touch Screen, Pen Drive।
इस प्रकार, पेरीफेरल डिवाइस कंप्यूटर सिस्टम के कार्य को सरल, तेज़ और उपयोगी बनाती हैं।
CPU (Central Processing Unit) को कंप्यूटर का प्रोसेसर या मस्तिष्क कहा जाता है। CPU का पूरा नाम Central Processing Unit (सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट) है। यह कंप्यूटर का वह मुख्य भाग होता है, जो यूजर द्वारा दिये गये डेटा और निर्देशों को प्रोसेस करता है तथा कंप्यूटर के सभी कार्यों को नियंत्रित करता है। CPU के बिना कंप्यूटर कोई भी कार्य करने में सक्षम नहीं होता।
दूसरे शब्दों में, CPU एक इलेक्ट्रॉनिक यूनिट है, जो इनपुट के रूप में प्राप्त निर्देशों को समझती है, उन पर आवश्यक गणनाएँ करती है और आउटपुट प्रदान करती है। CPU कंप्यूटर के मदरबोर्ड पर स्थित होता है। मदरबोर्ड का मुख्य कार्य कंप्यूटर के सभी हार्डवेयर घटकों को आपस में जोड़ना और उनके बीच संचार स्थापित करना होता है।
CPU का उपयोग अनेक कार्यों के लिये किया जाता है, जैसे—
डेटा को प्रोसेस करना,
यूजर से इनपुट लेकर उसे आउटपुट में बदलना,
निर्देशों का पालन करना,
और संपूर्ण सिस्टम के संचालन को नियंत्रित करना।
CPU इनपुट और आउटपुट डिवाइसों के बीच कम्युनिकेशन स्थापित करने में भी सहायता करता है, जिससे डेटा का सही प्रवाह बना रहता है।
CPU के भीतर लाखों-करोड़ों ट्रांजिस्टर लगे होते हैं, जिनका उपयोग जटिल गणनाओं (complex calculations) को बहुत तेज़ी से हल करने के लिये किया जाता है। आधुनिक CPU में लगभग 10 करोड़ से अधिक ट्रांजिस्टर हो सकते हैं। अधिक कार्य के कारण CPU गर्म हो जाता है, इसलिये इसमें एक छोटा कूलिंग फैन लगाया जाता है, जो CPU को ठंडा रखता है ताकि वह बिना रुके कार्य करता रहे।
पहले CPU का आविष्कार फेडेरिको फागिन (Federico Fagin) द्वारा किया गया था, जिसे वर्ष 1971 में Intel कंपनी ने जारी किया। जिस प्रकार मनुष्य बिना दिमाग के कुछ नहीं कर सकता, उसी प्रकार कंप्यूटर भी बिना CPU के कुछ नहीं कर सकता।
CPU के प्रमुख भाग
- Control Unit (कंट्रोल यूनिट)
- Memory Unit (मेमोरी यूनिट)
- ALU – Arithmetic Logic Unit (ए.एल.यू)
CPU Scheduling ऑपरेटिंग सिस्टम की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत यह निर्णय लिया जाता है कि कौन-सा process और कितनी देर तक CPU का उपयोग करेगा। जब किसी process को CPU दिया जाता है, तो अन्य processes की execution को अस्थायी रूप से hold पर रखा जाता है। ऐसा प्रायः तब होता है, जब कोई resource उपलब्ध नहीं होता या कोई process I/O operation कर रही होती है।
दूसरे शब्दों में, अनेक processes के बीच CPU को switch (बदलने) की प्रक्रिया को ही CPU scheduling कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य CPU का अधिकतम और प्रभावी उपयोग करना तथा सिस्टम की performance को बेहतर बनाना है।
CPU scheduling का कार्य CPU Scheduler करता है, जो ऑपरेटिंग सिस्टम का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होता है। CPU Scheduler ready queue में मौजूद processes में से एक process को चुनता है और उसे CPU प्रदान करता है। इस चयन के लिये विभिन्न scheduling algorithms का उपयोग किया जाता है।
उदाहरण के रूप में, मान लीजिये दो processes A और B हैं। जब process A CPU का उपयोग कर रही होती है, तब process B I/O operation कर रही होती है। इसी प्रकार, जब process B CPU का उपयोग करती है, तब process A I/O operation करती है। इस प्रकार CPU का समय दोनों processes के बीच साझा हो जाता है और सिस्टम idle नहीं रहता।
CPU scheduling मुख्यतः दो प्रकार की होती है—
- Preemptive Scheduling
- Non-Preemptive Scheduling
Preemptive Scheduling में CPU Scheduler किसी running process को बीच में ही interrupt करके CPU उससे छीन सकता है और किसी दूसरे process को CPU दे सकता है। अर्थात, process का operation पूरा होने से पहले भी उसे रोका जा सकता है। यह multitasking सिस्टम में अधिक उपयोगी होती है।
Non-Preemptive Scheduling में process तब तक CPU का नियंत्रण अपने पास रखती है, जब तक उसका कार्य पूरा न हो जाये। इस प्रकार की scheduling में process को बीच में जबरदस्ती interrupt नहीं किया जा सकता।
इस प्रकार, CPU scheduling ऑपरेटिंग सिस्टम की वह प्रक्रिया है, जो CPU के सही उपयोग, multitasking और सिस्टम की efficiency को सुनिश्चित करती है।
वर्कस्टेशन कंप्यूटर एक विशेष प्रकार का उच्च-क्षमता वाला कंप्यूटर होता है, जिसे सामान्य पर्सनल कंप्यूटर की तुलना में अधिक प्रोसेसिंग पावर, बेहतर ग्राफिक्स और अधिक स्टोरेज क्षमता के साथ डिज़ाइन किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे कार्यों को पूरा करना होता है, जो साधारण कंप्यूटर के लिये कठिन या समय-साध्य होते हैं।
वर्कस्टेशन में प्रायः तेज़ माइक्रोप्रोसेसर, बड़ी मात्रा में RAM, और हाई-स्पीड ग्राफिक्स एडॉप्टर लगाया जाता है, जिससे यह कंप्यूटर बहुत तेज़ी और सटीकता के साथ कार्य करता है। यही कारण है कि वर्कस्टेशन का उपयोग उच्च स्तर के वैज्ञानिक, तकनीकी और पेशेवर कार्यों में किया जाता है।
वर्कस्टेशन सामान्यतः सिंगल यूजर कंप्यूटर होता है, अर्थात् इसे एक समय में एक ही उपयोगकर्ता उपयोग करता है। इसका विकास विशेष रूप से वर्कस्टेशन तकनीक, इंजीनियरिंग, वैज्ञानिक अनुसंधान और ग्राफिक्स आधारित अनुप्रयोगों के लिये किया गया था। यह अपने कार्यों को उच्च स्तर की accuracy (सटीकता) के साथ पूरा करता है, जो इसे सामान्य कंप्यूटर से अलग बनाता है।
वर्कस्टेशन का उपयोग वीडियो एडिटिंग, 3D एनीमेशन, CAD/CAM डिज़ाइन, वैज्ञानिक सिमुलेशन, डेटा एनालिसिस, तथा हाई-ग्राफिक्स गेमिंग जैसे जटिल कार्यों के लिये किया जाता है। बड़े फिल्म स्टूडियो, इंजीनियरिंग कंपनियाँ, रिसर्च लैब और आर्किटेक्चर फर्मों में वर्कस्टेशन का उपयोग बहुत आम है।
हालाँकि वर्कस्टेशन की कीमत सामान्य कंप्यूटर की तुलना में अधिक होती है, लेकिन इसकी उच्च कार्यक्षमता, बेहतर ग्राफिक्स और विश्वसनीयता इसे पेशेवर उपयोग के लिये अत्यंत उपयोगी बनाती है। अधिक स्टोरेज क्षमता और तेज़ प्रोसेसिंग के कारण वर्कस्टेशन आज के आधुनिक तकनीकी वातावरण में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
एनालॉग कंप्यूटर एक विशेष प्रकार का कंप्यूटर होता है, जिसका उपयोग एनालॉग डेटा को प्रोसेस करने के लिये किया जाता है। एनालॉग डेटा वह डेटा होता है जो निरंतर (Continuous) रूप में बदलता रहता है, जैसे तापमान, दाब, गति, लंबाई, चौड़ाई, विद्युत प्रवाह, आवृत्ति (Frequency) और प्रतिरोध (Resistance) आदि।
सरल शब्दों में कहा जाए तो, जो कंप्यूटर भौतिक मात्राओं को मापने और उनका विश्लेषण करने का कार्य करता है, उसे एनालॉग कंप्यूटर कहते हैं। यह डिजिटल कंप्यूटर की तरह 0 और 1 पर आधारित नहीं होता, बल्कि वास्तविक मानों (Real Values) के आधार पर कार्य करता है।
एनालॉग कंप्यूटर का प्रयोग दैनिक जीवन में अनेक उपकरणों में किया जाता है। उदाहरण के लिये स्पीडोमीटर, जो वाहन की गति को मापता है; थर्मामीटर, जो मानव शरीर या वातावरण का तापमान बताता है; तथा ऑटो गैसोलिन पंप, जो पेट्रोल या डीज़ल की मात्रा और उसका मूल्य दोनों की गणना करता है। इसके अतिरिक्त, एनालॉग कंप्यूटर का उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयरक्राफ्ट, पनडुब्बियों (Submarines), पेट्रोल पंप, टेलीफोन लाइन, वैज्ञानिक अनुसंधान और इंजीनियरिंग कार्यों में भी किया जाता है।
एनालॉग कंप्यूटर की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह ट्रांसड्यूसर की सहायता के बिना भी गणना कर सकता है। इसमें एक साथ कई मानों की गणना संभव होती है, जिससे यह वास्तविक समय (Real Time) की स्थितियों को समझने में उपयोगी होता है। हालाँकि, इसकी कार्य करने की गति अपेक्षाकृत धीमी होती है और परिणाम पूर्णतः सटीक नहीं होते, बल्कि अनुमानात्मक (Approximate) होते हैं।
अधिकांश एनालॉग कंप्यूटर मैकेनिकल या इलेक्ट्रिकल मशीनें होती हैं, जो जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसे गणितीय कार्य करने में सक्षम होती हैं। आधुनिक समय में डिजिटल कंप्यूटरों के विकास के कारण इनका उपयोग सीमित हो गया है, फिर भी कुछ विशेष क्षेत्रों में इनका महत्त्व आज भी बना हुआ है।
फसल चक्र कृषि की एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक पद्धति है, जिसका मुख्य उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है। इसमें एक ही खेत में एक निश्चित क्रम और समय-चक्र के अनुसार एक के बाद एक विभिन्न फसलें उगाई जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में यह चक्र एक वर्ष में पूरा हो जाता है, जबकि कुछ स्थानों पर इसमें एक वर्ष से अधिक समय भी लग सकता है।
फसल चक्र का सबसे सामान्य उदाहरण यह है कि अनाज की फसलों के बाद दलहनी फसलें उगाई जाती हैं। दलहन फसलों की जड़ों में राइजोबियम नामक जीवाणु पाये जाते हैं, जो वायुमंडल की नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करने की क्षमता रखते हैं। इससे मिट्टी की नाइट्रोजन मात्रा बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
इसी प्रकार गन्ना, तंबाकू जैसी अत्यधिक उर्वरक खपत वाली फसलों को अनाज या दलहनी फसलों के साथ बारी-बारी से बोया जाता है, जिससे मिट्टी पर पोषक तत्त्वों का अत्यधिक दबाव नहीं पड़ता। यदि एक ही फसल को बार-बार उगाया जाये, तो मिट्टी के विशेष पोषक तत्त्व समाप्त हो जाते हैं और भूमि की उत्पादकता घट जाती है।
फसल चक्र से कीट और रोगों का प्रकोप भी कम होता है, क्योंकि कई कीट और रोग विशेष फसलों पर ही निर्भर होते हैं। इसके अलावा, मिट्टी की संरचना में सुधार होता है और मृदा अपरदन की समस्या भी घटती है।
फसल चक्र के लिये फसलों का चयन स्थानीय मिट्टी की प्रकृति, जलवायु, वर्षा की मात्रा और किसानों के अनुभव व समझ पर निर्भर करता है। इस संदर्भ में नाइट्रोजन चक्र को समझना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही चक्र मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस प्रकार, फसल चक्र न केवल उत्पादन बढ़ाने में सहायक है, बल्कि पर्यावरण-संतुलन और दीर्घकालीन कृषि विकास के लिये भी अत्यंत उपयोगी है।
लेटराइट मिट्टी भारत में पाई जाने वाली एक विशिष्ट मृदा है। इसका विस्तार देश में लगभग 1.26 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में है, जो भारत के कुल भूभाग का लगभग 3.7 प्रतिशत भाग है। यह मिट्टी मुख्य रूप से पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्रों में पाई जाती है। लेटराइट मिट्टी का निर्माण अधिक वर्षा एवं उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में चट्टानों के तीव्र अपक्षय और अपरदन की प्रक्रिया से होता है।
भारत में लेटराइट मिट्टी का विस्तार असम, मध्य प्रदेश, सहयाद्री पर्वतमाला, पूर्वी घाट, राजमहल की पहाड़ियां, सतपुड़ा एवं विंध्याचल क्षेत्रों में पाया जाता है। अधिक वर्षा के कारण इस मिट्टी से घुलनशील तत्व बह जाते हैं, जिससे इसमें पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। देखने में यह मिट्टी ईंट के समान लाल या भूरे रंग की होती है। भीगने पर यह बहुत कोमल हो जाती है तथा सूखने पर अत्यंत कठोर हो जाती है।
लेटराइट मिट्टी में लोहा तथा एलुमिनियम की मात्रा अधिक पाई जाती है, जबकि इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की भारी कमी होती है। इसी कारण यह मिट्टी सामान्यतः अनुपजाऊ मानी जाती है। परंतु उचित सिंचाई, उर्वरकों एवं जैविक खाद के प्रयोग से इसकी उर्वरता बढ़ाई जा सकती है।
उपयुक्त सुधारों के बाद लेटराइट मिट्टी में चाय, कहवा, सिनकोना, काजू, नारियल तथा रबर जैसी व्यावसायिक फसलों की खेती सफलतापूर्वक की जाती है। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत में यह मिट्टी बागानी कृषि के लिये विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुई है। इस प्रकार, यद्यपि लेटराइट मिट्टी प्राकृतिक रूप से कम उपजाऊ होती है, फिर भी मानव प्रयासों द्वारा इसे कृषि के लिये उपयोगी बनाया जा सकता है।
मरुस्थलीय वनस्पति उन क्षेत्रों में पाई जाती है जहाँ वार्षिक वर्षा 50 सेंटीमीटर से कम होती है। इन क्षेत्रों की जलवायु अत्यधिक शुष्क तथा तापमान अधिक रहता है, जिसके कारण यहाँ सामान्य वनस्पति का विकास संभव नहीं हो पाता।
मरुस्थलीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पति मुख्यतः काँटेदार झाड़ियाँ तथा मोटी छाल वाले पौधे होते हैं। इन पौधों में पत्तियाँ बहुत कम या पूर्णतः अनुपस्थित होती हैं, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया कम हो जाती है और जल संरक्षण संभव होता है। पौधों की छाल मोटी होने के कारण वे तीव्र गर्मी से अपनी रक्षा कर पाते हैं।
इन वनस्पतियों की जड़ें प्रायः बहुत गहरी होती हैं, जिससे वे भूमिगत जल तक पहुँच बना सकें। मरुस्थलीय वनस्पति जल की कमी के अनुसार स्वयं को अनुकूलित कर लेती है, जिसे अनुकूलन (Adaptation) कहा जाता है।
मरुस्थलीय वनों में प्रमुख रूप से नागफनी, बबूल, आंवला, खजूर तथा करील जैसे पौधे और वृक्ष पाए जाते हैं। ये पौधे न केवल कठोर जलवायु में जीवित रहते हैं, बल्कि स्थानीय जनसंख्या के लिये ईंधन, चारा और औषधीय उपयोग में भी सहायक होते हैं।
भारत में मरुस्थलीय वनस्पति मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश के कुछ भागों तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है।
शुष्क पर्णपाती वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ वार्षिक वर्षा की मात्रा सामान्यतः 70 से 120 सेंटीमीटर के बीच होती है। बिहार में वर्षा का वितरण असमान होने के कारण दक्षिणी एवं दक्षिण-पश्चिमी भागों में इस प्रकार के वनों का विकास हुआ है। ये वन राज्य के कुल वन क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण भाग हैं।
बिहार में शुष्क पर्णपाती वनों का विस्तार मुख्यतः कैमूर, रोहतास, औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, नवादा, नालंदा, मुंगेर, जमुई तथा बाँका जिलों में पाया जाता है। ये क्षेत्र छोटानागपुर पठार के उत्तरी भाग से प्रभावित हैं, जहाँ वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है तथा ग्रीष्म ऋतु में तापमान अधिक रहता है। वर्षा की कमी के कारण इन वनों के वृक्ष वर्ष के शुष्क काल में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, जिससे जल संरक्षण हो सके।
इन वनों में साल प्रमुख वृक्ष प्रजाति है, किंतु आर्द्र पर्णपाती वनों की तुलना में यहाँ साल की सघनता कम पाई जाती है। इसके अतिरिक्त तेंदू, पलाश, महुआ, बहेड़ा, अर्जुन, खैर, शीशम तथा बाँस भी व्यापक रूप से पाए जाते हैं। झाड़ियों एवं घासों की उपस्थिति भी इन वनों की एक प्रमुख विशेषता है।
शुष्क पर्णपाती वन बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन वनों से स्थानीय लोगों को ईंधन, चारा, लकड़ी, तेंदू पत्ता, महुआ फूल एवं अन्य वनोपज प्राप्त होते हैं। साथ ही ये वन मृदा अपरदन को रोकने, जलवायु संतुलन बनाए रखने तथा वन्य जीवों के लिये आवास प्रदान करने में सहायक हैं।
हालाँकि, जनसंख्या वृद्धि, कृषि विस्तार, अवैध कटाई एवं खनन गतिविधियों के कारण शुष्क पर्णपाती वनों पर दबाव बढ़ रहा है। अतः इन वनों के संरक्षण एवं सतत प्रबंधन के लिये प्रभावी वन नीति तथा जन-सहभागिता अत्यंत आवश्यक है।
कमला नदी उत्तर बिहार की एक महत्त्वपूर्ण नदी है, जो कोसी नदी तंत्र का हिस्सा मानी जाती है। इस नदी का उद्गम नेपाल की महाभारत श्रेणी से होता है। पर्वतीय क्षेत्र से निकलकर यह नदी तीव्र वेग के साथ भारत में प्रवेश करती है। बिहार में यह नदी मधुबनी जिले के जयनगर के पास प्रवेश करती है।
बिहार में कमला नदी की कुल लंबाई लगभग 120 किलोमीटर है। यह नदी मधुबनी, दरभंगा, सहरसा तथा खगड़िया जिलों से होकर प्रवाहित होती है। आगे चलकर यह नदी कोसी नदी प्रणाली में सम्मिलित हो जाती है, जिससे उत्तर बिहार की बाढ़ समस्या में इसकी भूमिका और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
कमला नदी वर्षा-आधारित नदी है, अतः मानसून के समय इसमें जल की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। नेपाल के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में भारी वर्षा होने पर कमला नदी अपने तटों को लाँघ जाती है, जिससे मधुबनी एवं दरभंगा क्षेत्र में बार-बार बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इस कारण इसे उत्तर बिहार की बाढ़ग्रस्त नदियों में गिना जाता है।
कमला नदी की प्रमुख सहायक नदियों में सोनी, ढोरी तथा भूतही बलान शामिल हैं। इनमें भूतही बलान नदी विशेष रूप से बाढ़ की तीव्रता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है। ये सहायक नदियाँ कमला नदी के जल प्रवाह को और अधिक विस्तृत बना देती हैं।
यद्यपि कमला नदी बाढ़ के कारण जान-माल की क्षति पहुँचाती है, फिर भी इसके द्वारा लाई गई उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी कृषि के लिये अत्यंत लाभकारी होती है। इसके तटवर्ती क्षेत्रों में धान, मक्का एवं गेहूँ की खेती व्यापक रूप से की जाती है।
इस प्रकार कमला नदी उत्तर बिहार की भौगोलिक संरचना, कृषि व्यवस्था तथा बाढ़ समस्या—तीनों से गहराई से जुड़ी हुई है और राज्य के जल संसाधन अध्ययन में इसका विशेष महत्त्व है।
वैष्णव धर्म, जिसे भागवत धर्म भी कहा जाता है, भारतीय धार्मिक परंपरा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भक्ति-आधारित संप्रदाय है। इस धर्म के प्रारंभिक स्वरूप की जानकारी उपनिषदों में प्राप्त होती है, जबकि इसका व्यवस्थित विकास मौर्योत्तर काल में हुआ। भागवत धर्म का मूल उद्देश्य भगवान की भक्ति द्वारा मोक्ष की प्राप्ति बताया गया है।
भागवत धर्म के संस्थापक वासुदेव कृष्ण माने जाते हैं, जो वृष्णिवंशीय यादव कुल के प्रमुख नेता थे। उनका निवास स्थल मथुरा था, जो इस धर्म का प्रारंभिक केंद्र माना जाता है। छांदोग्य उपनिषद में श्रीकृष्ण का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्हें देवकी पुत्र तथा ऋषि घोर अंगिरस का शिष्य कहा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक काल में कृष्ण को एक महान् आध्यात्मिक गुरु के रूप में देखा जाता था।
वासुदेव कृष्ण का प्रारंभिक अभिलेखीय उल्लेख मध्य प्रदेश के बेसनगर (विदिशा) से प्राप्त गरुड़ स्तंभ अभिलेख में मिलता है, जिसे इंडो-यूनानी शासक हेलियोडोरस ने बनवाया था। यह अभिलेख भागवत धर्म की ऐतिहासिक प्रामाणिकता को पुष्ट करता है।
कुछ विद्वानों के अनुसार भागवत धर्म का संबंध प्रारंभ में सूर्य पूजा से भी रहा है। भागवत धर्म के सिद्धांतों का सर्वाधिक व्यवस्थित रूप ‘भगवद्गीता’ में देखने को मिलता है, जिसमें कर्म, ज्ञान और भक्ति का समन्वय प्रस्तुत किया गया है।
महाभारत काल में श्रीकृष्ण का विष्णु से तादात्म्य स्थापित होने लगा, जिसके परिणामस्वरूप यह धर्म वैष्णव धर्म कहलाया। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने कृष्ण को अपने ग्रंथ में ‘हेराक्लीज’ नाम से उल्लिखित किया है, जिससे उनकी लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है।
इस प्रकार वैष्णव या भागवत धर्म ने भारतीय धार्मिक चिंतन को भक्ति, नैतिकता और लोककल्याण की दिशा में गहराई से प्रभावित किया।
अभिधम्मपिटक बौद्ध त्रिपिटक का तीसरा और दार्शनिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भाग है। इसमें महात्मा बुद्ध के उपदेशों, सिद्धांतों और बौद्ध मतों की तार्किक, विश्लेषणात्मक एवं दार्शनिक व्याख्या की गई है। जहाँ सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेश सरल भाषा में दिये गए हैं और विनयपिटक में संघ का अनुशासन वर्णित है, वहीं अभिधम्मपिटक में उन्हीं उपदेशों का गहन दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
अभिधम्मपिटक का मुख्य उद्देश्य चित्त, चेतना, कर्म, पुनर्जन्म, दुःख, सुख और निर्वाण जैसे विषयों का वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत विवेचन करना है। इसमें मानव मन की प्रवृत्तियों, मानसिक अवस्थाओं और उनके परिणामों का सूक्ष्म अध्ययन किया गया है। इस ग्रंथ के माध्यम से बौद्ध दर्शन को एक व्यवस्थित दार्शनिक स्वरूप प्राप्त हुआ।
अभिधम्मपिटक में यह प्रतिपादित किया गया है कि संसार नश्वर है और प्रत्येक वस्तु क्षणिक है। इसमें कर्मवाद और प्रतीत्यसमुत्पाद की व्याख्या को और अधिक विकसित रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ बौद्ध धर्म को केवल नैतिक उपदेशों तक सीमित न रखकर उसे एक तार्किक दर्शन के रूप में स्थापित करता है।
एक मान्यता के अनुसार अभिधम्मपिटक का संकलन मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में आयोजित तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र) में सम्पन्न हुआ। इस संगीति का नेतृत्व प्रसिद्ध बौद्ध आचार्य मोगलिपुत्त तिस्स ने किया था। उन्होंने बौद्ध धर्म को विधर्मियों से शुद्ध करने तथा उसके सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप देने का कार्य किया।
इस प्रकार अभिधम्मपिटक बौद्ध दर्शन की बौद्धिक ऊँचाई को दर्शाता है और बौद्ध धर्म को एक गहन दार्शनिक परंपरा के रूप में स्थापित करता है।
बौद्ध धर्म के विकास के क्रम में इसके दो प्रमुख संप्रदाय विकसित हुए— हीनयान और महायान। दोनों का लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति था, किंतु उनके दर्शन, साधना-पद्धति और आदर्शों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
हीनयान का अर्थ है “छोटा वाहन”। इस संप्रदाय में बुद्ध को एक महान् मानव, शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार किया गया। हीनयान बौद्धों का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वयं के प्रयास से निर्वाण प्राप्त करना चाहिये। इस संप्रदाय में अर्हत पद को सर्वोच्च आदर्श माना गया। बुद्ध की पूजा मूर्ति रूप में नहीं होती थी, बल्कि उन्हें चिन्हों जैसे बोधिवृक्ष, चरणचिह्न, धर्मचक्र आदि द्वारा दर्शाया जाता था। वैभाषिक और सौत्रांतिक इसके प्रमुख मत थे।
इसके विपरीत महायान का अर्थ है “बड़ा वाहन”। इसमें बुद्ध को केवल महापुरुष नहीं, बल्कि देवता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। महायान में मूर्तिपूजा का आरंभ हुआ। इस संप्रदाय में बोधिसत्त्व आदर्श को महत्त्वपूर्ण माना गया, जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं निर्वाण प्राप्त करने के बजाय पहले सम्पूर्ण मानवता के उद्धार का प्रयास करता है। महायान संप्रदाय में गुणों के स्थानांतरण (पुण्य दान) की अवधारणा विकसित हुई। इसके दो प्रमुख दर्शन हैं— शून्यवाद (माध्यमिक) और विज्ञानवाद (योगाचार)।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि जहाँ हीनयान आत्मकेंद्रित साधना पर बल देता है, वहीं महायान करुणा, परोपकार और सर्वजन मुक्ति की भावना को प्रमुख मानता है।
ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महात्मा बुद्ध ने अपने पूर्व साथी तपस्वियों को उपदेश देने का निर्णय लिया। वे उरुवेला (वर्तमान बोधगया) से चलकर सारनाथ पहुँचे, जिसे प्राचीन काल में ऋषिपत्तनम अथवा मृगदाव कहा जाता था। यहीं पर बुद्ध ने पाँच ब्राह्मण संन्यासियों — कौंडिन्य, वप्प, भद्रेय, महानाम और अस्सजि — को अपना पहला उपदेश दिया। यह प्रथम उपदेश बौद्ध ग्रंथों में धर्मचक्र प्रवर्तन के नाम से प्रसिद्ध है। इसे बौद्ध धर्म की औपचारिक शुरुआत माना जाता है।
धर्मचक्र प्रवर्तन में बुद्ध ने मध्यम मार्ग, चार आर्य सत्य तथा अष्टांगिक मार्ग का प्रतिपादन किया। उन्होंने बताया कि न तो अत्यधिक भोग और न ही कठोर तपस्या मोक्ष का मार्ग है, बल्कि मध्यम मार्ग अपनाकर ही दुःख से मुक्ति संभव है। इस उपदेश के साथ ही बौद्ध संघ की स्थापना हुई और कौंडिन्य बुद्ध के प्रथम भिक्षु बने।
बुद्ध ने सर्वप्रथम तपस्सु और भल्लिक नामक दो शूद्र व्यापारियों को अपना उपासक बनाया, जिन्होंने बुद्ध, धम्म और संघ में श्रद्धा व्यक्त की। इसके बाद बुद्ध राजगृह पहुँचे, जहाँ मगध के शासक बिंबिसार ने उनका स्वागत किया और वेणुवन विहार संघ को दान में दिया। राजगृह में ही सारिपुत्र, महामोद्गलायन, उपालि, अभय आदि बुद्ध के प्रमुख शिष्य बने।
ज्ञान प्राप्ति के आठवें वर्ष, वैशाली के लिच्छवियों ने बुद्ध को आमंत्रित किया और कूटाग्रशाला विहार दान में दिया। यहीं पर आनंद के आग्रह पर बुद्ध ने महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमति दी। प्रजापति गौतमी पहली भिक्षुणी बनीं।
कौशांबी के शासक उदायिन बौद्ध भिक्षु पिंडोला भारद्वाज के प्रभाव से बौद्ध बने और घोषिताराम विहार संघ को प्रदान किया। ज्ञान प्राप्ति के बीसवें वर्ष बुद्ध श्रावस्ती पहुँचे, जहाँ उन्होंने कुख्यात डाकू अंगुलिमाल को उपदेश देकर अपना शिष्य बनाया। यह बुद्ध की करुणा और अहिंसा का सर्वोत्तम उदाहरण है।
जैन धर्म भारत के प्राचीनतम धार्मिक दर्शनों में से एक है। ‘जैन’ शब्द संस्कृत के ‘जिन’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है — विजेता, अर्थात् वह व्यक्ति जिसने अपने मन, वाणी और काया पर विजय प्राप्त कर ली हो। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए, परंतु इनमें से प्रथम 22 तीर्थंकरों की ऐतिहासिकता संदिग्ध मानी जाती है।
जैन परंपरा के अनुसार जैन धर्म की स्थापना का श्रेय प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) को दिया जाता है। माना जाता है कि उन्होंने छठी शताब्दी ई.पू. में जैन आंदोलन का प्रवर्तन किया। ऋग्वेद में ऋषभदेव (प्रथम तीर्थंकर) तथा अरिष्टनेमि (22वें तीर्थंकर) का उल्लेख मिलता है, जिससे जैन परंपरा की प्राचीनता सिद्ध होती है।
जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे, जो काशी के इक्ष्वाकुवंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इनका काल महावीर से लगभग 250 वर्ष पूर्व माना जाता है। उनके अनुयायी ‘निग्रंथ’ कहलाते थे। पार्श्वनाथ ने चार महाव्रतों का प्रतिपादन किया — सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना) और अपरिग्रह (धन संचय का त्याग)। उन्होंने महिलाओं को भी संघ में प्रवेश दिया, जिसका प्रमाण जैन ग्रंथों में वर्णित स्त्री संघ की अध्यक्षा पुष्पचूला से मिलता है। पार्श्वनाथ को सम्मेद पर्वत (गिरिडीह, झारखंड) पर निर्वाण प्राप्त हुआ।
जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी माने जाते हैं। महावीर ने अपने जीवनकाल में ही एक संघ की स्थापना की, जिसमें 11 गणधर सम्मिलित थे। जैन धर्म कर्मवाद और पुनर्जन्म में विश्वास करता है तथा मानता है कि कर्मफल ही जन्म-मृत्यु का मूल कारण है।
उदायिन, जिसे उदयभद्र भी कहा जाता है, मगध के हर्यंक वंश का एक महत्त्वपूर्ण शासक था। उसने लगभग 460 ई.पू. से 455 ई.पू. तक शासन किया। यद्यपि उसका शासनकाल अपेक्षाकृत अल्प था, फिर भी उसका योगदान प्राचीन भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। वह अजातशत्रु का उत्तराधिकारी था और अपने पिता द्वारा स्थापित साम्राज्य को सुदृढ़ रूप देने का प्रयास किया।
पुराणों तथा जैन ग्रंथों के अनुसार उदायिन की सबसे बड़ी उपलब्धि पाटलिपुत्र नगर की स्थापना थी। उसने गंगा और सोन नदियों के संगम तट पर इस नगर की स्थापना की, जिसे प्रारंभ में कुसुमपुर भी कहा जाता था। इस नगर को उसने मगध की राजधानी बनाया। भौगोलिक दृष्टि से यह स्थान अत्यंत अनुकूल था, क्योंकि नदियों के संगम के कारण यह क्षेत्र व्यापार, परिवहन और रक्षा—तीनों के लिये उपयुक्त था।
पाटलिपुत्र की स्थापना ने मगध के राजनीतिक इतिहास को एक नई दिशा दी। यह नगर आगे चलकर नंद, मौर्य तथा गुप्त वंशों की राजधानी बना और प्राचीन भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक एवं प्रशासनिक केंद्र बन गया। इस प्रकार उदायिन की यह उपलब्धि दूरगामी सिद्ध हुई।
धार्मिक दृष्टि से उदायिन जैन मतानुयायी था। उसने जैन धर्म को संरक्षण प्रदान किया और धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनायी। उसके शासनकाल में मगध में विभिन्न धार्मिक परम्पराएँ शांतिपूर्वक फलती-फूलती रहीं।
यद्यपि उदायिन का शासनकाल छोटा था, फिर भी पाटलिपुत्र की स्थापना के कारण उसका नाम भारतीय इतिहास में स्थायी रूप से अंकित हो गया। उसे मगध की प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला और भविष्य के महान् साम्राज्यों की आधारशिला रखने वाला शासक माना जाता है।
पिप्पलिवन के मोरिय प्राचीन भारत के एक महत्त्वपूर्ण गणराज्यात्मक समुदाय थे, जिनका उल्लेख बौद्ध साहित्य में मिलता है। यह गणराज्य हिमालय की तराई क्षेत्र में स्थित था और इसकी राजधानी पिप्पलिवन मानी जाती है। किंवदंती के अनुसार, यह क्षेत्र मोरों से परिपूर्ण था, इसी कारण यहाँ के निवासियों को मोरिय कहा गया। आगे चलकर ‘मोरिय’ शब्द से ही प्रसिद्ध ‘मौर्य’ वंश का नाम विकसित हुआ।
राजनीतिक दृष्टि से मोरिय एक गणतंत्रात्मक व्यवस्था का पालन करते थे। यहाँ शासन किसी एक राजा के अधीन न होकर गणसभा द्वारा संचालित होता था। राज्य से संबंधित महत्त्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिये जाते थे। मोरिय लोग स्वतंत्रता-प्रिय, अनुशासित तथा संगठित समाज के रूप में जाने जाते थे। इनकी शासन प्रणाली बाद में विकसित होने वाले मौर्य प्रशासन की आधारशिला बनी।
धार्मिक दृष्टि से भी मोरिय गण का विशेष महत्त्व था। भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद, उनके अस्थि-अवशेषों के वितरण के समय मोरिय गण ने भी अपना अधिकार जताया था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, मोरियों को बुद्ध के अवशेष प्राप्त हुए और उन्होंने पिप्पलिवन में उन पर स्तूप का निर्माण करवाया। इससे स्पष्ट होता है कि मोरिय लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी और समर्थक थे।
ऐतिहासिक दृष्टि से मोरिय गण का सबसे बड़ा महत्त्व चंद्रगुप्त मौर्य से जुड़ा है। चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म इसी मोरिय वंश में हुआ था, जिसने आगे चलकर भारत के प्रथम विशाल साम्राज्य मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। चाणक्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त ने छोटे-छोटे जनपदों को संगठित कर एक सशक्त केंद्रीकृत राज्य की नींव रखी।
इस प्रकार, पिप्पलिवन के मोरिय न केवल एक महत्त्वपूर्ण गणराज्य थे, बल्कि भारतीय इतिहास को पहला महान् साम्राज्य देने वाले वंश के मूल स्रोत भी थे।
महाराज रणजीत सिंह ने 1799 ई. में लाहौर पर अधिकार कर पंजाब को एक संगठित राज्य में बदल दिया। 1805 ई. में उन्होंने अमृतसर पर नियंत्रण स्थापित किया और 1806 तथा 1807 ई. में पटियाला, नाभा एवं जींद पर आक्रमण किया, जो अंततः ब्रिटिश संरक्षण में आ गए। 1809 ई. में अमृतसर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और रणजीत सिंह के बीच एक सन्धि हुई। इस सन्धि के अनुसार रणजीत सिंह ने सतलज और यमुना के बीच की सिक्ख रियासतों पर ब्रिटिश प्रभाव को स्वीकार किया और उन पर आक्रमण न करने का वचन दिया। वहीं ब्रिटिशों ने सतलज और सिन्धु नदी के बीच रणजीत सिंह के प्रभाव को मान्यता दी और हस्तक्षेप से परहेज किया।
रणजीत सिंह ने झेलम से सिन्धु नदी के मध्य के अनेक राज्यों पर विजय प्राप्त की। उन्होंने कसूर, झंग, कांगड़ा, अटक, मुल्तान, कश्मीर, पेशावर और लद्दाख पर अधिकार किया। 1820 में डेरा गाजी खाँ और 1822 में डेरा इस्माइल खाँ को परास्त कर उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति का परिचय दिया।
27 जून, 1839 ई. को उनकी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु तक वह एक विशाल साम्राज्य छोड़ गए, जो उत्तर में लद्दाख और इस्कार्टु, उत्तर-पश्चिम में सुलेमान पहाड़ियों, दक्षिण-पूर्व में सतलज नदी और दक्षिण-पश्चिम में शिकारपुर-सिन्ध तक विस्तृत था। रणजीत सिंह ने ब्रिटिशों से सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। नाभा, पटियाला, जींद, सिन्ध और शिकारपुर के मामलों में उन्होंने धैर्य दिखाया और अनावश्यक संघर्ष टाला। 1838 ई. में लार्ड आकलैंड ने पंजाब का दौरा किया और अफगानिस्तान में सहयोग हेतु सन्धि की।
रणजीत सिंह ने धार्मिक भेदभाव से परे सभी योग्य व्यक्तियों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया। उनके प्रधानमंत्री डोगरा राजपूत राजा ध्यान सिंह और विदेश मंत्री फकीर अजीजुद्दीन थे। उनकी दूरदर्शिता, सहिष्णुता और राजनीतिक कुशलता ने सिक्ख राज्य को ब्रिटिश नियंत्रण से स्वतंत्र बनाए रखा। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी कमजोर थे और 10 वर्षों में ब्रिटिशों ने उनका राज्य अधिग्रहण कर लिया।
वी. के. मेनन का जन्म 3 मई 1896 को कलकत्ता में एक सम्पन्न नायर परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा तल्लीचरी और कालीकट से प्राप्त की। वर्ष 1918 में उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद वे 1924 में इंग्लैंड गए और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की। उनके प्राध्यापक हरोल्ड लास्की से गहरा प्रभाव पड़ा, और इस दौरान उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से भी निकट संबंध बनाए।
मेनन ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत लंदन से की, जहाँ उनके कई मित्र और सहयोगी थे। उन्होंने ब्रिटिश लेबर पार्टी से जुड़कर सक्रिय भूमिका निभाई और भारत लीग की स्थापना की। वे अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक और राजनीतिक बैठकों में भारत के मुद्दों को उठाने में सक्रिय रहे।
वी. के. मेनन एक दृढ़ राष्ट्रवादी थे और 1924 से 1947 तक स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। उन्हें संवैधानिक प्रणाली में विश्वास था और अंतरराष्ट्रीय मामलों का गहरा ज्ञान था। वे अनेक भारतीय समाचार पत्रों के लंदन संवाददाता थे और ‘पेलिकन शृंखला’ के संपादक के रूप में भी कार्य किया। उनका वक्तृत्व और बौद्धिक क्षमता उन्हें विशेष रूप से प्रभावशाली बनाती थी।
स्वतंत्रता के पश्चात् मेनन ने 1947 से 1952 तक लंदन में भारत के उच्चायुक्त के रूप में सेवा दी। इसके बाद वे बिना मंत्रालय के मंत्री बने और 1957 से 1962 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे। उनके कार्यकाल को 1962 में चीन के साथ युद्ध के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा, और उन्हें मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ा। नेहरू की मृत्यु के बाद उनकी स्थिति और कमजोर हो गई। 1974 से लेकर अपनी मृत्यु तक वे सेवानिवृत्त जीवन जीते रहे।
वी. के. मेनन का जीवन भारतीय राजनीति और स्वतंत्रता संग्राम में बौद्धिक नेतृत्व, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और राष्ट्रवादी प्रतिबद्धता का प्रतीक था।
शरत चंद्र बोस भारत के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी और राजनेता थे। उनका जन्म सितम्बर 1889 को कलकत्ता में हुआ। उनके पिता जानकी नाथ बोस उड़ीसा के कटक में एक प्रतिष्ठित अधिवक्ता थे। शरत चंद्र बोस, सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई थे और दोनों भाइयों के बीच अत्यन्त गहरा स्नेह और आदर था।
शरत चंद्र की प्रारम्भिक शिक्षा कटक और कलकत्ता में सम्पन्न हुई। आगे चलकर वे इंग्लैण्ड गये और वहाँ से कानून की पढ़ाई पूरी की। भारत लौटने के बाद उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में वकालत आरम्भ की। उनकी योग्यताओं और स्पष्ट विचारों के कारण उनकी वकालत शीघ्र ही प्रसिद्ध होने लगी। वे न सिर्फ़ एक सफल अधिवक्ता थे बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी उनका दृष्टिकोण अत्यन्त स्पष्ट था।
शरत चंद्र बोस ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत सी. आर. दास के मार्गदर्शन में की। वे वर्षों तक कलकत्ता निगम के प्रमुख सदस्य रहे और नगर प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। यद्यपि वे अहिंसा में विश्वास रखते थे, फिर भी भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के प्रति उनके मन में सहानुभूति और सम्मान था।
वे कांग्रेस कार्यकारी समिति के सदस्य रहे और बंगाल विधान सभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता भी बने। अगस्त 1946 में उन्हें केंद्र की अंतरिम सरकार में शामिल किया गया, जहाँ उन्होंने राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
शरत चंद्र बोस ने बंगाल के विभाजन का दृढ़ता से विरोध किया। उनका विचार था कि बंगाल को भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य बनाया जाना चाहिये जिससे वहाँ की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता बनी रहे। परन्तु उनका यह प्रयास सफल नहीं हो सका।
सागर ज़िले में 1857 के विद्रोह का इतिहास अत्यन्त प्रेरणादायक है, और इसमें शाहगढ़ के राजा बख्तबली शाह जूदेव की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रही। वे बुंदेलखंड की वीर परम्परा से जुड़े ऐसे साहसी शासक थे जिन्होंने अंग्रेज़ों की बढ़ती हुई दमनकारी नीतियों का डटकर विरोध किया। शाहगढ़ क्षेत्र उस समय राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील था, क्योंकि अंग्रेज़ लगातार स्थानीय रियासतों पर नियंत्रण बढ़ाने के लिये नई-नई नीतियाँ लागू कर रहे थे। इससे जनता और शासकों में गहरा असंतोष पैदा हो रहा था।
राजा बख्तबली शाह जूदेव ने प्रारम्भ से ही अंग्रेज़ों के अन्याय के विरुद्ध स्वर उठाया। जब 1857 का संग्राम सागर, नरसिंहपुर, जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में फैल रहा था, तब शाहगढ़ रियासत क्रांतिकारियों के लिये एक मज़बूत आश्रय बनी। राजा बख्तबली शाह जूदेव ने विद्रोहियों को रणनीतिक सहायता, सैनिक सहयोग और मनोबल प्रदान किया। उनका उद्देश्य केवल अपनी रियासत की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र को अंग्रेज़ी दमन से मुक्त कराना था।
अंग्रेज़ी दस्तावेज़ों में उल्लेख मिलता है कि राजा बख्तबली शाह जूदेव की सक्रियता से ब्रिटिश प्रशासन अत्यन्त चिंतित था। शाहगढ़ को विद्रोह के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा जाने लगा था। अंग्रेज़ों ने उन्हें दबाने के लिये कई सैन्य कार्रवाइयाँ कीं, किन्तु राजा बख्तबली शाह जूदेव ने अपने साहस और नेतृत्व से क्रांति को आगे बढ़ाते हुए अंग्रेज़ी शासन की नींव हिला दी।
1857 के बाद अंग्रेज़ों ने शाहगढ़ रियासत पर कठोर दंडात्मक कार्रवाइयाँ कीं, किन्तु बख्तबली शाह जूदेव का संघर्ष बुंदेलखंड के स्वाधीनता–इतिहास में अमर हो गया। वे उन वीरों में गिने जाते हैं जिन्होंने अपने क्षेत्र, संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा के लिये अदम्य साहस दिखाया।
बेगम हज़रत महल 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम की एक साहसी, दूरदर्शी और प्रभावशाली महिला नायिका थीं। वे अवध के नवाब वाजिद अली शाह की बेगम थीं, लेकिन 1856 में जब अंग्रेजों ने अवध का विलय कर लिया, तब उन्होंने खुलकर ब्रिटिश शासन का विरोध किया। 1857 के विद्रोह के दौरान जब लखनऊ में अंग्रेजी सत्ता कमज़ोर हुई, तो बेगम हज़रत महल ने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस क़द्र को अवध का शासक घोषित कर दिया और स्वयं शासन तथा सैन्य संचालन की कमान सम्भाल ली।
उनका नेतृत्व केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि वे सक्रिय रूप से युद्ध रणनीति बनाती थीं, सैनिकों का मनोबल बढ़ाती थीं और ब्रिटिश सेना के विरुद्ध योजनाएँ तय करती थीं। ब्रिटिश अभिलेख बताते हैं कि वे कई बार हाथी पर सवार होकर युद्धभूमि में पहुँचीं—यह तथ्य उनके अदम्य साहस और निर्णायक नेतृत्व का प्रमाण है।
मार्च 1858 में जब अंग्रेजों ने दोबारा लखनऊ पर कब्ज़ा किया, तब परिस्थितियाँ बहुत प्रतिकूल हो गयीं। अंग्रेजों ने अवध के अधिकांश भाग पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया, लेकिन बेगम हज़रत महल ने आत्मसमर्पण करने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने संघर्ष को जारी रखने का निर्णय लिया और अपने समर्थकों के साथ नेपाल की ओर प्रस्थान किया। नेपाल सरकार ने प्रारम्भ में उन्हें शरण देने में संकोच किया, किन्तु बाद में उन्हें रहने की अनुमति दी गयी। जीवन के शेष वर्षों में वे कभी भारत नहीं लौटीं। 1879 में नेपाल में उनका निधन हो गया।
बेगम हज़रत महल का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि जन-कल्याण, सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा का संघर्ष भी था। वे भारतीय महिलाओं की वीरता का गौरवशाली प्रतीक हैं और 1857 की क्रांति की सबसे प्रेरणादायक नायिकाओं में गिनी जाती हैं।
सत्येन्द्र नारायण सिंह, जिन्हें आमतौर पर "सत्येन्द्र बाबू" के नाम से जाना जाता है, बिहार के प्रख्यात राजनेता और समाजसेवी थे। उनका जन्म जुलाई 1917 को बिहार के भोजपुर ज़िले में हुआ था। वे बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके थे और अपने सादगीपूर्ण जीवन, ईमानदार राजनीति तथा लोकहितैषी विचारों के लिये प्रसिद्ध थे।
सत्येन्द्र नारायण सिंह का राजनीतिक जीवन स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही सक्रिय रहा। उन्होंने छात्र जीवन में ही देशभक्ति और सामाजिक सेवा की भावना के साथ राजनीति में कदम रखा। वे जयप्रकाश नारायण के घनिष्ठ सहयोगी थे और आपातकाल (1975–77) के दौरान जेपी के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिये जेल यातना सहीं, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद वे बिहार के मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने शिक्षा, सिंचाई, सड़क और ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण कार्य किये। सत्येन्द्र बाबू ने राजनीति को जनता की सेवा का माध्यम माना और सदैव स्वच्छ प्रशासन की पैरवी की।
रहनुमाई मजदायसन सभा, जिसे धार्मिक सुधार संघ भी कहा जाता है, की स्थापना 1851 ई. में बम्बई (मुंबई) में की गयी थी। इसके प्रमुख संस्थापक थे नौरोजी फुरदोनजी, दादाभाई नौरोजी, एस. एस. बंगाली और अन्य प्रगतिशील पारसी नेता। यह संस्था पारसी समाज में फैले अंधविश्वास, सामाजिक रूढ़ियों और परम्परागत धार्मिक नियंत्रण के विरोध में स्थापित की गयी थी।
सभा का मुख्य उद्देश्य पारसी समुदाय को शिक्षा, समानता और आधुनिकता के मार्ग पर अग्रसर करना था। इसने पारसी समाज में महिलाओं की शिक्षा, विवाह सुधार, और सामाजिक अधिकारों से जुड़ी अनेक पहलों को आरम्भ किया। संगठन का मानना था कि समाज की उन्नति तभी सम्भव है जब पुरुष और महिलाएँ दोनों शिक्षित हों तथा सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करें।
सभा ने पारसी समुदाय के लिये उत्तराधिकार, विवाह और तलाक के समान कानून बनाने की माँग की। इसके प्रभाव से पारसी समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार, शिक्षा का प्रसार, और पाश्चात्य विचारों का प्रभाव बढ़ा। धीरे-धीरे पारसी भारतीय समाज का सबसे आधुनिक और पश्चिमी दृष्टिकोण वाला समुदाय बन गया।
रहनुमाई मजदायसन सभा ने भारत में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों की नींव रखी। इसके आदर्शों ने आगे चलकर ब्राह्मो समाज, प्रार्थना समाज, और अन्य सुधार आंदोलनों को प्रेरित किया। इस आंदोलन के माध्यम से भारतीय समाज में आधुनिकता, तर्कवाद और समानता के विचारों का प्रसार हुआ
परमहंस मंडली उन्नीसवीं सदी के मध्य में महाराष्ट्र में सामाजिक सुधार की दिशा में उठाया गया एक महत्त्वपूर्ण कदम थी। इसकी स्थापना सन् 1849 में दुर्गाराम मेहताजी और दादोबा पांडुरंग तर्खडकर द्वारा की गई थी। यह मंडली भारत के पहले गुप्त समाजों में से एक थी, जो सामाजिक समानता, धार्मिक सुधार और जातिगत बंधनों को तोड़ने के उद्देश्य से कार्य करती थी।
इस मंडली के सदस्य एक ईश्वर में विश्वास रखते थे और मूर्तिपूजा का विरोध करते थे। वे मानते थे कि सच्चा धर्म मानवता की सेवा में है, न कि अंधविश्वास और बाह्य आडंबरों में। मंडली ने जाति व्यवस्था और छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। इसके सदस्य निम्न जाति के लोगों द्वारा पकाया गया भोजन साथ बैठकर खाते थे, जो उस समय के समाज में एक क्रांतिकारी कदम माना गया।
परमहंस मंडली ने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और सामाजिक समानता का समर्थन किया। इसके माध्यम से महिलाओं की स्थिति सुधारने और उन्हें शिक्षा के अधिकार दिलाने की दिशा में प्रयास किये गये। उस समय जब समाज रूढ़ियों और अंधविश्वास में जकड़ा हुआ था, मंडली ने तर्क और विवेक पर आधारित धार्मिक आचरण की वकालत की।
मंडली की शाखाएँ पूना, सतारा, ठाणे और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में स्थापित की गईं। यद्यपि यह संगठन गुप्त रूप से कार्य करता था, फिर भी इसने आगे चलकर महाराष्ट्र में होने वाले प्रार्थना समाज, सत्यशोधक समाज और ब्रह्म समाज जैसे सुधार आंदोलनों के लिये एक बौद्धिक आधार तैयार किया।
इस प्रकार, परमहंस मंडली ने भारत में सामाजिक और धार्मिक सुधारों की नींव रखी और समाज में समानता, शिक्षा तथा न्याय की भावना फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
देवेन्द्रनाथ टैगोर (1817–1905) बंगाल के प्रसिद्ध समाज सुधारक, चिंतक और ब्रह्म समाज के पुनरुद्धारक थे। वे पारंपरिक भारतीय शिक्षा तथा पश्चिमी आधुनिक विचारों से गहराई से प्रभावित थे। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पाखंड और रूढ़िवादिता को दूर करने के लिये ज्ञान, विवेक और सुधार का मार्ग अपनाया।
उन्होंने वर्ष 1839 में ‘तत्त्वबोधिनी सभा’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य राजा राममोहन राय के उदार और सुधारवादी विचारों का प्रचार करना था। इस सभा ने भारत में तेजी से फैलते ईसाई धर्म के प्रभाव का विरोध किया और वेदांत दर्शन के पुनरुद्धार की वकालत की। सभा के अंतर्गत तत्त्वबोधिनी पत्रिका नामक एक पत्रिका प्रकाशित की गई, जिसमें भारतीय संस्कृति, भाषा और इतिहास पर लेख छपते थे। इस पत्रिका ने बंगाली भाषा में भारत के गौरवशाली अतीत के व्यवस्थित अध्ययन को बढ़ावा दिया और बंगाल के बुद्धिजीवियों के बीच एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया।
देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1843 में ब्रह्म समाज का पुनर्गठन किया और उसमें नई चेतना का संचार किया। उनके नेतृत्व में समाज ने विधवा पुनर्विवाह, बहुविवाह का उन्मूलन, महिला शिक्षा के प्रसार और रैयतों की स्थिति सुधार जैसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक सुधार आंदोलनों का समर्थन किया। उन्होंने संयम और नैतिक जीवन को समाज सुधार का आधार माना।
उन्होंने इस सिद्धांत का दृढ़ता से खंडन किया कि वैदिक शास्त्र अचूक हैं। उनके विचार में धर्म का मूल उद्देश्य सत्य की खोज और मानव कल्याण है। देवेन्द्रनाथ टैगोर ने भारतीय समाज में धार्मिक और नैतिक चेतना का पुनर्जागरण किया। उनके प्रयासों से बंगाल नवजागरण को गहरी वैचारिक दिशा मिली और आगे चलकर उनके पुत्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस परंपरा को और आगे बढ़ाया।
चंपारण आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक अध्याय था, जिसने महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन की भारत में शुरुआत की। यह आंदोलन बिहार के चंपारण जिले में हुआ, जहाँ ब्रिटिश बागान मालिकों ने स्थानीय बटाईदार किसानों को मजबूर किया था कि वे अपनी भूमि के तीन-बीसवें हिस्से (लगभग एक बीघा में से तीन कठिया) पर नील की खेती करें। इस अन्यायी व्यवस्था को “तीन कठिया प्रणाली” कहा जाता था। नील उत्पादकों के लिये यह अत्यंत शोषणकारी थी, क्योंकि नील की खेती से भूमि की उर्वरता घटती थी और किसानों को घाटा उठाना पड़ता था।
1917 में जब किसानों की व्यथा महात्मा गांधी तक पहुँची, तो वे चंपारण पहुँचे। वहाँ उन्हें जे.बी. कृपलानी, बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद और बाबू राजेंद्र प्रसाद जैसे स्थानीय नेताओं का सहयोग मिला। गांधीजी ने यहाँ शांतिपूर्ण सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध किसानों के अधिकारों की आवाज़ उठाई। उन्होंने हिंसा का मार्ग न अपनाते हुए सत्य और अहिंसा के बल पर प्रशासन को झुकने के लिये बाध्य किया।
ब्रिटिश सरकार ने अंततः गांधीजी को बातचीत के लिये बुलाया और उन्हें चंपारण के नील किसानों की स्थिति की जांच करने वाली समिति का सदस्य बनाया। समिति की रिपोर्ट के आधार पर “तीन कठिया” प्रथा को समाप्त कर दिया गया। इससे किसानों को न केवल आर्थिक राहत मिली, बल्कि उनके आत्मसम्मान की भी पुनःस्थापना हुई।
चंपारण आंदोलन ने गांधीजी के नेतृत्व में भारतीय जनता को पहली बार अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति का अनुभव कराया और यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम सफल सत्याग्रह आंदोलन बना, जिसने आगे चलकर असहयोग, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन जैसी जनक्रांतियों की नींव रखी।
चंपारण आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक अध्याय था, जिसने महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन की भारत में शुरुआत की। यह आंदोलन बिहार के चंपारण जिले में हुआ, जहाँ ब्रिटिश बागान मालिकों ने स्थानीय बटाईदार किसानों को मजबूर किया था कि वे अपनी भूमि के तीन-बीसवें हिस्से (लगभग एक बीघा में से तीन कठिया) पर नील की खेती करें। इस अन्यायी व्यवस्था को “तीन कठिया प्रणाली” कहा जाता था। नील उत्पादकों के लिये यह अत्यंत शोषणकारी थी, क्योंकि नील की खेती से भूमि की उर्वरता घटती थी और किसानों को घाटा उठाना पड़ता था।
1917 में जब किसानों की व्यथा महात्मा गांधी तक पहुँची, तो वे चंपारण पहुँचे। वहाँ उन्हें जे.बी. कृपलानी, बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद और बाबू राजेंद्र प्रसाद जैसे स्थानीय नेताओं का सहयोग मिला। गांधीजी ने यहाँ शांतिपूर्ण सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा के माध्यम से ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध किसानों के अधिकारों की आवाज़ उठाई। उन्होंने हिंसा का मार्ग न अपनाते हुए सत्य और अहिंसा के बल पर प्रशासन को झुकने के लिये बाध्य किया।
ब्रिटिश सरकार ने अंततः गांधीजी को बातचीत के लिये बुलाया और उन्हें चंपारण के नील किसानों की स्थिति की जांच करने वाली समिति का सदस्य बनाया। समिति की रिपोर्ट के आधार पर “तीन कठिया” प्रथा को समाप्त कर दिया गया। इससे किसानों को न केवल आर्थिक राहत मिली, बल्कि उनके आत्मसम्मान की भी पुनःस्थापना हुई।
चंपारण आंदोलन ने गांधीजी के नेतृत्व में भारतीय जनता को पहली बार अहिंसक प्रतिरोध की शक्ति का अनुभव कराया और यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम सफल सत्याग्रह आंदोलन बना, जिसने आगे चलकर असहयोग, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन जैसी जनक्रांतियों की नींव रखी।
जैव विविधता सर्वेक्षण (Biodiversity Survey) एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, सूक्ष्मजीवों और पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता का अध्ययन और रिकॉर्ड किया जाता है। यह सर्वेक्षण न केवल प्रजातियों की पहचान में मदद करता है, बल्कि उनके आवास, संख्या, वितरण और पारिस्थितिक भूमिका को समझने में भी महत्त्वपूर्ण होता है।
जैव विविधता पृथ्वी के जीवन तंत्र की आधारशिला है, क्योंकि यह पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखती है और मानव जीवन के लिये आवश्यक संसाधन जैसे भोजन, औषधि, जल और ऑक्सीजन प्रदान करती है। लेकिन वर्तमान समय में प्रदूषण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक शिकार जैसी गतिविधियों से जैव विविधता तेजी से घट रही है। ऐसे में जैव विविधता सर्वेक्षण संरक्षण योजनाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।
भारत में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (Zoological Survey of India) और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (Botanical Survey of India) जैसी संस्थाएँ नियमित रूप से इस प्रकार के सर्वेक्षण करती हैं। इन सर्वेक्षणों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर विलुप्तप्राय प्रजातियों की पहचान की जाती है और उनके संरक्षण के लिए नीतियाँ बनाई जाती हैं।
इस प्रकार, जैव विविधता सर्वेक्षण पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। यह हमें हमारी प्राकृतिक धरोहर की वास्तविक स्थिति का ज्ञान कराता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रकृति को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देता है।
स्थानांतरी कृषि एक पारंपरिक कृषि पद्धति है, जिसमें किसान किसी भूमि पर कुछ वर्षों तक फसल उगाते हैं और फिर मिट्टी की उर्वरता कम होने पर नई भूमि पर खेती करते हैं। यह मुख्यतः उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में प्रचलित है।
मिल्पा प्रणाली मुख्य रूप से मैक्सिको और मध्य अमेरिका में होती है। इसमें मकई, कद्दू और फलियों जैसी मिश्रित फसल उगाई जाती है। किसान जंगल की भूमि को साफ कर, फसल उगाते हैं और कुछ वर्षों के बाद जंगल को पुनः उगने देते हैं।
रोका प्रणाली अमेज़न और दक्षिण अमेरिका में प्रचलित है। इसमें जंगल की झाड़ियों और पेड़ों को काटकर जला दिया जाता है। राख को प्राकृतिक खाद के रूप में इस्तेमाल कर फसल उगाई जाती है। मिट्टी की उर्वरता घटने पर नई भूमि पर स्थानांतरण किया जाता है।
लदांग प्रणाली दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड में होती है। इसमें भी जंगल जलाकर धान, ज्वार और मक्का जैसी फसलें उगाई जाती हैं। कुछ वर्षों के बाद जब मिट्टी की उर्वरता घट जाती है, किसान नई भूमि की ओर चले जाते हैं।
इन तीनों पद्धतियों की समानता यह है कि सभी में जंगल को साफ कर खेती की जाती है और मिट्टी की उर्वरता घटने पर नई भूमि का प्रयोग किया जाता है। अंतर यह है कि मिल्पा में मिश्रित फसल होती है, रोका में आग का उपयोग और लदांग में मुख्यतः धान की खेती होती है।
स्थानांतरी कृषि पर्यावरण और जीवनशैली के अनुरूप विकसित हुई पारंपरिक कृषि पद्धति है।
राइट-टू-रिपेयर एक कानूनी और उपभोक्ता अधिकार आंदोलन है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ता अपने खरीदे गए उत्पादों पर पूर्ण नियंत्रण और स्वामित्व प्राप्त करें।
मुख्य सिद्धांत
- मरम्मत की स्वतंत्रता : उपभोक्ता अपनी वस्तु की मरम्मत स्वयं कर सकते हैं या किसी तीसरे पक्ष (स्वतंत्र दुकान) से करवा सकते हैं।
- पुर्जों और उपकरणों की उपलब्धता : निर्माताओं को मरम्मत के लिये आवश्यक पुर्जे (Spare Parts), उपकरण (Tools) और मैनुअल/दस्तावेज़ (Manuals) उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने होंगे।
- एकाधिकार पर रोक : यह निर्माताओं को उत्पादों को इस तरह से डिज़ाइन करने से रोकता है कि मरम्मत केवल उनकी अधिकृत सर्विसिंग एजेंसियों द्वारा ही की जा सके।
प्रमुख लाभ
- उपभोक्ता सशक्तिकरण : यह मरम्मत की लागत को कम करता है और बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देता है।
- पर्यावरण संरक्षण : यह उपकरणों के जीवन काल को बढ़ाता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक कचरे (e-waste) की मात्रा कम होती है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था : यह मरम्मत और पुन : उपयोग (Reuse) को प्रोत्साहित करके चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के लक्ष्यों को मजबूत करता है।
- आर्थिक विकास : यह स्वतंत्र मरम्मत दुकानों के लिये व्यापार को बढ़ावा देता है और नए रोज़गार के अवसर पैदा करता है।
वैश्विक स्थिति एवं भारतीय पहल
- वैश्विक मान्यता : यह अधिकार यूरोपीय संघ (EU), अमेरिका (US) और ब्रिटेन (UK) सहित कई विकसित देशों में कानूनी रूप से लागू किया गया है।
- भारतीय संदर्भ : भारत सरकार मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं जैसे प्रमुख क्षेत्रों में इसे लागू करने के लिये एक व्यापक नियामक ढाँचा विकसित कर रही है।
संक्षेप में, राइट-टू-रिपेयर उपभोक्ता स्वतंत्रता और पर्यावरणीय संवहनीयता को बढ़ावा देने वाला एक आवश्यक अधिकार है।
भारत का एकमात्र मड ज्वालामुखी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में स्थित है। यह ज्वालामुखी मुख्य रूप से बराटांग द्वीप (Baratang Island) पर पाया जाता है, जो पोर्ट ब्लेयर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मड ज्वालामुखी देश का एक अनोखा भू-वैज्ञानिक चमत्कार है, क्योंकि यहाँ से लावा नहीं बल्कि मिट्टी, गैस और पानी का मिश्रण बाहर निकलता है। इसे “मड वोल्केनो” या “कीचड़ ज्वालामुखी” कहा जाता है।
हाल ही में लगभग 20 साल बाद इसमें फिर से विस्फोट हुआ है, जिससे आसपास के क्षेत्र में हलचल मच गई। इस विस्फोट के दौरान बड़ी मात्रा में मिट्टी, गैस और कीचड़ जमीन की सतह पर फूट पड़ा। वैज्ञानिकों के अनुसार यह ज्वालामुखीय गतिविधि पृथ्वी के अंदर गैस और दबाव के संचय के कारण होती है।
बराटांग का यह मड वोल्केनो भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह पृथ्वी के आंतरिक बदलावों और प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) की गतिविधियों को समझने में मदद करता है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के विशेषज्ञ लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं ताकि संभावित खतरे और भविष्य की गतिविधियों का अनुमान लगाया जा सके।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 (2) भारत के नागरिकों को राज्य के अधीन नियोजन (employment) या किसी भी पद पर नियुक्ति के मामलों में समान अवसर प्रदान करने के सिद्धांत को और मज़बूत करता है। यह अनुच्छेद राज्य को नागरिकों के विरुद्ध भेदभाव करने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है।
अनुच्छेद 16 (2) का मूल पाठ और निहितार्थ
अनुच्छेद 16 (2) के अनुसार, राज्य के अधीन किसी भी पद के संबंध में, निम्नलिखित सात आधारों में से केवल किसी भी आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न ही उससे विभेद किया जाएगा :
- धर्म (Religion)
- मूलवंश (Race)
- जाति (Caste)
- लिंग (Sex)
- उद्भव (Descent)
- जन्मस्थान (Place of Birth)
- निवास (Residence)
मुख्य निहितार्थ (Key Implications) :
- समानता की गारंटी : यह उपबंध सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक रोज़गार के मामलों में सभी नागरिकों को समान रूप से माना जाए और किसी भी व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण अवसर से वंचित न किया जाए।
- समावेशी लोक सेवा : इसका उद्देश्य भारत की लोक सेवाओं को समावेशी बनाना है, जहाँ योग्यता (merit) ही एकमात्र निर्णायक कारक हो, न कि कोई सामाजिक पहचान।
यह अनुच्छेद, जो समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14-18) का हिस्सा है, भारतीय लोकतंत्र की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी प्रकृति को रेखांकित करता है।
प्रकाश प्रदूषण से तात्पर्य रात्रि के समय बढ़ते कृत्रिम प्रकाश से है, जो प्रकाश के अत्यधिक और अनियोजित उपयोग से उत्पन्न होता है। यह एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या है जिसे 'फोटो पॉल्यूशन' या 'लुमिनस पॉल्यूशन' भी कहा जाता है।
कारण और प्रकृति
- एकमात्र कारण : प्रकाश प्रदूषण का एकमात्र कारण कृत्रिम प्रकाश (Artificial Light) है, जिसमें स्ट्रीट लाइट, विज्ञापन बोर्ड, और इमारतों की अनावश्यक रोशनी शामिल है।
- अनियोजित उपयोग : यह तब विकसित होता है जब रोशनी अनुचित ढंग से, अत्यधिक मात्रा में, या अनावश्यक समय के लिये उपयोग की जाती है।
प्रभाव (Impacts)
प्रकाश प्रदूषण के नकारात्मक प्रभाव व्यापक होते हैं, जो न केवल मानव स्वास्थ्य बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करते हैं :
- आकाशीय बाधा (Astronomical Disruption) : यह रात्रि के समय आसमान को धुंधला कर देता है और तारों के प्रकाश को अवरुद्ध करता है, जिससे खगोल विज्ञान संबंधी शोध और अवलोकन प्रभावित होते हैं।
- जैविक चक्र में बाधा (Circadian Disruption) : यह वन्यजीवों और मनुष्यों दोनों के सर्कैडियन चक्र (Circadian Cycle) को बाधित करता है।
- मानव स्वास्थ्य : नींद के पैटर्न और हार्मोन उत्पादन को बाधित कर सकता है।
- वन्यजीव : यह पक्षियों के प्रवासन (Migration) पैटर्न और निशाचर जीवों (Nocturnal Animals) की शिकार एवं प्रजनन गतिविधियों को प्रभावित करता है।
- ऊर्जा अपव्यय (Energy Waste) : अत्यधिक और अनियोजित रोशनी का उपयोग सीधे तौर पर ऊर्जा संसाधनों का अपव्यय है, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है।
- पर्यावरण : यह संपूर्ण पर्यावरण को प्रभावित करता है, विशेषकर उन स्थानों पर जहाँ वन्यजीवों को रात्रि में पूर्ण अंधकार की आवश्यकता होती है।
प्रकाश प्रदूषण एक ऐसा प्रदूषण है जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है, लेकिन इसके गंभीर पर्यावरण, ऊर्जा और स्वास्थ्य संबंधी परिणाम होते हैं।
नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस (NBS) वे रणनीतियाँ हैं जो सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने के लिये प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों और जैव विविधता का संरक्षण, पुनर्स्थापन और सतत उपयोग करती हैं। ये समाधान प्रकृति की शक्ति का लाभ उठाकर समस्याओं का प्रभावी और टिकाऊ हल प्रदान करते हैं।
मुख्य उद्देश्य और अनुप्रयोग
NBS का लक्ष्य केवल पर्यावरण को बचाना नहीं है, बल्कि मानव कल्याण को बढ़ावा देना भी है। इनके प्रमुख अनुप्रयोग और उद्देश्य निम्नलिखित हैं :
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन : तटीय सुरक्षा के लिये मैंग्रोव वनों का पुनर्स्थापन या शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी को कम करने के लिये पेड़ लगाना।
- आपदा जोखिम न्यूनीकरण : बाढ़ के प्रभाव को कम करने के लिये प्राकृतिक आर्द्रभूमि (Wetlands) का संरक्षण करना।
- जैव विविधता संरक्षण : पारिस्थितिक तंत्रों को बहाल करके वन्यजीवों के आवास को सुरक्षित करना।
- प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन : जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये वनों के जलग्रहण क्षेत्रों का प्रबंधन करना।
- खाद्य और जल सुरक्षा : मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और जल की उपलब्धता को बनाए रखना।
संक्षेप में, NBS प्रकृति को एक समस्या के रूप में नहीं, बल्कि समाधान के एक स्रोत के रूप में देखती है, जिससे हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है और प्रकृति तथा मानव समाज दोनों को लाभ होता है।
जल शक्ति मंत्रालय ने विश्व जल दिवस (22 मार्च 2025) के अवसर पर 'जल शक्ति अभियान : कैच द रेन अभियान 2025' का छठा संस्करण लॉन्च किया है। यह अभियान जल संरक्षण और प्रबंधन के लिये देशव्यापी सामूहिक भागीदारी पर ज़ोर देता है।
- अभियान की मुख्य बातें
- थीम (2025) : इस वर्ष की थीम है : "जल संचय जन भागीदारी : जन जागरूकता की ओर"। यह लोगों की भागीदारी (जन भागीदारी) के माध्यम से जल संरक्षण पर केंद्रित है।
- केंद्रित क्षेत्र : सरकार ने 'हर बूँद अनमोल' के सिद्धांत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की है, जिसके तहत जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के लिये पूरे भारत के 148 ज़िलों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है।
- 'जल-जंगल-जन' अभियान : इस अभियान का शुभारंभ वनों, नदियों और झरनों के पारिस्थितिक संबंधों को बहाल करने पर केंद्रित है, जो जल चक्र की स्थिरता के लिये आवश्यक हैं।
- विश्व जल दिवस (World Water Day)
- परिचय : विश्व जल दिवस (हर साल 22 मार्च को मनाया जाता है) का उद्देश्य जल संरक्षण और इसके संधारणीय प्रबंधन के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।
- इतिहास : इसकी संकल्पना वर्ष 1992 के रियो शिखर सम्मेलन में की गई थी और वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) द्वारा इसे आधिकारिक तौर पर प्रतिवर्ष मनाए जाने हेतु अभिहित किया गया।
- SDG के अनुरूप : यह दिवस संयुक्त राष्ट्र SDG-6 के साथ संरेखित है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक सभी के लिये जल और स्वच्छता सुनिश्चित करना है।
- थीम (2025) : विश्व जल दिवस 2025 की थीम 'हिमनद परिरक्षण' (Glacier Preservation) है।
संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क (SDSN) द्वारा जारी 10वीं सतत विकास रिपोर्ट (SDR) 2025 के अनुसार, भारत ने सतत विकास लक्ष्य (SDG) सूचकांक में 167 देशों में से 99वाँ स्थान प्राप्त करके एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह पहली बार है कि भारत ने शीर्ष 100 देशों में जगह बनाई है।
- भारत की स्थिति और रैंकिंग में सुधार
- वर्तमान रैंक (2025) : 99वाँ स्थान।
- स्कोर : 0 से 100 के पैमाने पर 67 स्कोर, जहाँ 100 का अर्थ है सभी 17 SDG लक्ष्यों को प्राप्त कर लेना।
- महत्त्वपूर्ण सुधार : यह वर्ष 2024 में 109वें और वर्ष 2023 में 112वें स्थान की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण उछाल है, जो देश के बुनियादी ढाँचे और बुनियादी सेवाओं में हुई प्रगति को दर्शाता है।
- वैश्विक SDG प्रगति की स्थिति
- रिपोर्ट वैश्विक SDG प्रगति में गंभीर मंदी की ओर इशारा करती है :
- लक्ष्य प्राप्ति की धीमी गति : आकलन बताते हैं कि वर्ष 2030 तक केवल 17% SDG लक्ष्यों को ही पूरा किया जा सकेगा।
- स्थिरता के कारक : यह स्थिरता मुख्य रूप से सशस्त्र संघर्ष, संरचनात्मक कमज़ोरियाँ और सीमित वित्तीय संसाधनों जैसी चुनौतियों के कारण है, जो SDG के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा डाल रही हैं।
- शीर्ष प्रदर्शनकर्त्ता और क्षेत्रीय तुलना
- शीर्ष रैंकिंग : नॉर्डिक देश SDG रैंकिंग में शीर्ष पर हैं, जिनमें फिनलैंड (प्रथम), स्वीडन (द्वितीय) और डेनमार्क (तृतीय) शामिल हैं। विशेष रूप से, शीर्ष 20 देशों में से 19 यूरोपीय हैं।
- क्षेत्रीय प्रगति : पूर्व और दक्षिण एशिया ने वर्ष 2015 के बाद से सबसे त्वरित क्षेत्रीय प्रगति दिखाई है।
- पड़ोसी देशों से तुलना : भारत (99वाँ) ने बांग्लादेश (114वाँ) और पाकिस्तान (140वाँ) से बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन यह भूटान (74वाँ), नेपाल (85वाँ), श्रीलंका (93वाँ) और मालदीव (53वाँ) से पीछे है।
SDG इंडेक्स के शीर्ष 100 में भारत का प्रवेश गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य सेवा और स्वच्छ ऊर्जा में प्रगति को दर्शाता है। हालाँकि संघर्ष, जलवायु वित्त अंतराल एवं महामारी संबंधी असफलताओं जैसी वैश्विक चुनौतियाँ प्रगति को खतरे में डालती हैं। वर्ष 2030 एजेंडा को प्राप्त करने के लिये तत्काल बहुपक्षीय सहयोग, वित्तपोषण सुधार, स्थानीय जुड़ाव तथा केंद्रित कार्यान्वयन रणनीतियों की आवश्यकता है।
विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित वैश्विक नवाचार सूचकांक (GII) किसी भी अर्थव्यवस्था की नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र (Innovation Ecosystem) का आकलन करने वाला एक प्रमुख वैश्विक मानक है। वर्ष 2007 में प्रस्तुत GII को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार (STI) नीतियों को आकार देने के लिये एक प्रामाणिक संदर्भ के रूप में मान्यता मिली है।
भारत की स्थिति और मज़बूत पक्ष
GII 2025 में, भारत 139 अर्थव्यवस्थाओं में 38वें स्थान पर पहुँच गया है, जो वर्ष 2015 के 81वें स्थान से एक उल्लेखनीय उछाल है। भारत न केवल निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में, बल्कि मध्य एवं दक्षिणी एशिया क्षेत्र में भी प्रथम स्थान पर है।
- मज़बूत पक्ष : भारत ने ज्ञान और प्रौद्योगिकी आउटपुट (22) तथा बाज़ार परिपक्वता (38) जैसे क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्रदर्शित की है।
- कमज़ोर पक्ष : भारत को व्यापार परिष्कार (64), बुनियादी ढाँचे (61) और संस्थान (58) जैसे नवाचार इनपुट स्तंभों में सुधार की आवश्यकता है।
शीर्ष रैंकिंग वाली अर्थव्यवस्थाओं में स्विट्जरलैंड (प्रथम), स्वीडन (द्वितीय), और अमेरिका (तृतीय) शामिल हैं, जबकि चीन पहली बार शीर्ष 10 में (10वाँ स्थान) शामिल हुआ है।
नवाचार परिदृश्य की वर्तमान स्थिति
भारत की यह प्रगति केंद्र सरकार के रणनीतिक नीतिगत समर्थन का परिणाम है।
- रणनीतिक समर्थन : स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया, और उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना जैसे कार्यक्रम नवाचार को आधारभूत समर्थन प्रदान करते हैं।
- वित्तीय पहलें : नई 1 लाख करोड़ रुपए की अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) योजना और नेशनल सेमीकंडक्टर मिशन (₹76,000 करोड़) जैसे बड़े निवेश डीपटेक और निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित हैं।
- उभरती शक्ति : भारत अब पेटेंट आवेदनों के मामले में विश्व स्तर पर छठे स्थान पर है और 100 से अधिक यूनिकॉर्न के साथ वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन गया है।
भारत को GII रैंकिंग में और सुधार करने के लिये GERD को बढ़ाना, निजी क्षेत्र के योगदान को दोगुना करना, विश्वविद्यालय-नेतृत्व वाले अनुसंधान को बढ़ावा देना और AI तथा सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक-निजी नवाचार केंद्रों की स्थापना करना आवश्यक है। यह भारत को स्टार्टअप केंद्र से वैश्विक नवाचार नेता बनने में मदद करेगा।
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐतिहासिक और सुधारात्मक कदम था। यह संशोधन 1975-77 के राष्ट्रीय आपातकाल के गंभीर अनुभवों के बाद लागू किया गया, जिसका प्राथमिक उद्देश्य संविधान की मूल भावना की पुनर्स्थापना करना और भविष्य में सत्ता के दुरुपयोग को रोकना था, जिसने नागरिक अधिकारों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरे में डाल दिया था।
न्यायिक समीक्षा की पुनर्स्थापना
इस संशोधन का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव न्यायपालिका की शक्ति पर पड़ा।
- 42वें संशोधन का प्रभाव : 42वें संशोधन अधिनियम (1976) ने अनुच्छेद 31C में बदलाव करके प्रावधान किया था कि यदि कोई कानून राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) को लागू करने के लिये बनाया गया है, तो उसे न्यायिक समीक्षा से छूट मिल सकती है, भले ही वह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो। इस प्रावधान ने न्यायपालिका की भूमिका को गंभीर रूप से सीमित कर दिया था।
- 44वें संशोधन की कार्रवाई : 44वें संशोधन ने इस प्रावधान को वापस लिया और यह सुनिश्चित किया कि:
- न्यायपालिका को मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिये पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हो।
- संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा न्यायालय द्वारा की जा सके।
- संविधान की सर्वोच्चता और नागरिक स्वतंत्रता अक्षुण्ण बनी रहे।
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों—न्याय, स्वतंत्रता और समानता—की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। इसने न्यायिक समीक्षा को बहाल करके लोकतंत्र को सशक्त किया और यह सुनिश्चित किया कि सरकार की शक्ति पर हमेशा संवैधानिक जाँच और संतुलन बना रहे, जिससे भविष्य में तानाशाही प्रवृत्तियों की रोकथाम हो सके।
अनुच्छेद 356 भारतीय संविधान का एक महत्त्वपूर्ण और अक्सर विवादास्पद प्रावधान है, जो केंद्र सरकार को राज्यों के मामलों में हस्तक्षेप करने की असाधारण शक्ति प्रदान करता है। इसे आमतौर पर 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) के रूप में जाना जाता है।
शक्ति का आधार और परिणाम
यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को निम्नलिखित आधारों पर किसी राज्य के प्रशासन को अपने नियंत्रण में लेने का अधिकार देता है :
- आधार : यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य का शासन संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता।
- घोषणा का प्रभाव : एक बार अनुच्छेद 356 लागू हो जाने पर, यह राज्य प्रशासन को संभालने का अधिकार प्रदान करता है और निम्नलिखित परिणाम सामने आते हैं :
- कार्यकारी शक्तियों पर संघ का नियंत्रण : राज्य की कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers) सीधे संघ (केंद्र सरकार) के पास चली जाती हैं। राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त राज्यपाल, राज्य सरकार के कार्यों का संचालन करते हैं।
- विधायी प्राधिकार संसद को : राज्य विधानमंडल (State Legislature) के विधायी प्राधिकार (Legislative Authority) का प्रयोग करने की शक्ति संसद को मिल जाती है। संसद या तो स्वयं राज्य के लिये कानून बनाती है या इस शक्ति को राष्ट्रपति को प्रत्यायोजित (Delegate) कर देती है।
- अन्य संवैधानिक निलंबन : राष्ट्रपति राज्य के किसी भी संवैधानिक निकाय या प्राधिकरण से संबंधित कुछ या सभी प्रावधानों के संचालन को निलंबित कर सकते हैं।
संक्षेप में, अनुच्छेद 356 केंद्र को संघवाद (Federalism) की अवधारणा से हटकर, एकात्मक (Unitary) स्वरूप में कार्य करने की शक्ति देता है, ताकि राज्य में संवैधानिक मशीनरी की विफलता को ठीक किया जा सके।
ऑगमेंटेड रियलिटी (AR) एक आधुनिक तकनीक है, जो वास्तविक दुनिया में कंप्यूटर-निर्मित डिजिटल तत्त्वों को जोड़कर अनुभव को और समृद्ध बनाती है। इसमें डिजिटल जानकारी इस प्रकार वास्तविक परिवेश से मेल खाती है कि यह उपयोगकर्ताओं को एक मिश्रित वास्तविकता (Mixed Reality) का अनुभव प्रदान करती है, जहाँ डिजिटल जानकारी वास्तविक परिवेश के साथ इस तरह से जुड़ जाती है कि वह वास्तविक दुनिया का ही हिस्सा प्रतीत होती है।
AR कैसे काम करता है?
- AR में, स्मार्टफोन, टैबलेट या विशेष AR ग्लास जैसे उपकरण वास्तविक दुनिया के दृश्य को कैप्चर करते हैं और फिर उस पर डिजिटल तत्वों (जैसे 3D मॉडल, टेक्स्ट, एनिमेशन या इंटरैक्टिव जानकारी) को रियल-टाइम (Real-Time) में अध्यारोपित (Overlay) करते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
- वास्तविक-समय इंटरैक्शन- AR डिजिटल सामग्री को सीधे उपयोगकर्ता के वास्तविक परिवेश में और वास्तविक समय में प्रस्तुत करता है।
- परिवेश पर निर्भरता- यह तकनीक वास्तविक दुनिया के दृश्य को प्रतिस्थापित (Replace) नहीं करती, बल्कि उसे बढ़ाती है।
- उपयोग- AR का उपयोग गेमिंग (जैसे Pokémon Go), शिक्षा (3D मॉडल देखना), चिकित्सा (सर्जरी मार्गदर्शन) और ई-कॉमर्स (वर्चुअल ट्राई-ऑन) जैसे क्षेत्रों में तेज़ी से बढ़ रहा है।
AR का लक्ष्य उपयोगकर्ता को भौतिक और आभासी दुनिया के बीच एक seamless (निर्बाध) और प्रासंगिक अनुभव प्रदान करना है।
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का संकल्प लिया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये नवीकरणीय ऊर्जा सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। सरकार ने वर्ष 2047 तक 1,800 गीगावाट और वर्ष 2070 तक 5,000 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह परिवर्तन भारत को जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता से मुक्त कर आत्मनिर्भर और टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था की ओर ले जाएगा।
प्रमुख चुनौतियाँ और समाधान
1. घरेलू सौर विनिर्माण का विकास
- भारत को सौर मॉड्यूल निर्माण के साथ-साथ वेफर्स, इंगोट और पॉलीसिलिकॉन के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर होना होगा।
- इसके लिये ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) को सुदृढ़ बनाना आवश्यक है।
2. भूमि और RoW (Right of Way) अवरोध
- बड़े पैमाने पर नवीकरणीय परियोजनाओं के लिये भूमि अधिग्रहण और ट्रांसमिशन लाइन हेतु RoW संबंधी कठिनाइयाँ प्रमुख बाधा हैं।
- एकीकृत नीति और त्वरित स्वीकृति तंत्र से इन चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।
3. PPA (Power Purchase Agreements) को तेज़ करना
- नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिये समय पर और दीर्घकालिक PPA साइनिंग आवश्यक है।
- इससे निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा और परियोजनाओं का क्रियान्वयन तेज़ होगा।
4. ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता
- घरेलू विनिर्माण और आपूर्ति शृंखला के विकास से भारत आयात पर निर्भरता कम करेगा।
- यह ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में भारत की साख को मजबूत करेगा।
भारत का हरित ऊर्जा परिवर्तन केवल जलवायु प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि यह आर्थिक आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन, तकनीकी नवाचार और वैश्विक सौर नेतृत्व का भी मार्ग है। एक एकीकृत रोडमैप अपनाकर भारत वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो के अपने लक्ष्य को न केवल प्राप्त कर सकता है, बल्कि पूरी दुनिया के लिये एक प्रेरक मॉडल भी बन सकता है।
न्यायालय की अवमानना का अर्थ न्यायालय की गरिमा, अधिकार और न्याय के प्रशासन के प्रति अनादर प्रदर्शित करना है। भारत में, न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 इस अवधारणा को परिभाषित करता है और इसके लिये दंड का प्रावधान करता है।
प्रकार और दंड
अधिनियम के तहत, न्यायालय की अवमानना को दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है :
- सिविल अवमानना (Civil Contempt): यह तब होती है जब कोई व्यक्ति जानबूझकर न्यायालय के किसी निर्णय, आदेश, निर्देश, रिट या डिक्री की अवज्ञा करता है। यह किसी भी व्यक्ति के द्वारा न्यायालय में दिये गए किसी भी वचनबंध का जानबूझकर उल्लंघन करने को भी शामिल करता है।
- आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt): यह तब होती है जब कोई व्यक्ति ऐसे कार्य करता है जो न्याय प्रशासन में बाधा डालते हैं। इसमें शामिल हैं :
- न्यायालय की निंदा करने या उसके अधिकार को कम करने वाले बयान या कार्य।
- किसी भी न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप या बाधा डालना।
- न्याय प्रशासन में किसी भी तरह से बाधा डालना।
दंड और अधिकार
अवमानना का दोषी पाए जाने पर, व्यक्ति को ₹2,000 का जुर्माना या 6 महीने का कारावास या दोनों की सज़ा दी जा सकती है।
यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों सहित सभी न्यायालयों को अपनी अवमानना के लिये दंड देने का अधिकार है। यह शक्ति न्यायालयों को अपनी गरिमा और प्राधिकार को बनाए रखने में सक्षम बनाती है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है।
स्पेसटेक (SpaceTech), यानी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उन सभी तकनीकों और सेवाओं को संदर्भित करती है जो बाहरी अंतरिक्ष के अन्वेषण और उपयोग से संबंधित हैं। भारत में, 2020 के बाद किये गए सुधारों ने इस क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिये खोल दिया है, जिससे नवाचार और वृद्धि की एक नई लहर आई है। इस बदलाव के कारण, अब भारत में 300 से अधिक स्पेस स्टार्टअप मौजूद हैं।
निजी क्षेत्र की भूमिका
निजी कंपनियाँ, जैसे कि स्काईरूट एयरोस्पेस और अग्निकुल कॉसमॉस, इस क्रांति का नेतृत्व कर रही हैं। ये कंपनियाँ छोटे उपग्रहों को लॉन्च करने के लिये किफायती और कुशल समाधान विकसित कर रही हैं, जिससे भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम और अधिक गतिशील बन गया है।
- लागत में कमी : निजी क्षेत्र की भागीदारी से उपग्रह प्रक्षेपण की लागत में कमी आने की उम्मीद है, जिससे अंतरिक्ष सेवाओं तक पहुँच अधिक सुलभ होगी।
- नवाचार को बढ़ावा : ये स्टार्टअप नई तकनीकों और व्यावसायिक मॉडलों को पेश कर रहे हैं, जिससे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में नवाचार को बढ़ावा मिल रहा है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा : निजी कंपनियों के आने से भारत वैश्विक अंतरिक्ष बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्द्धी बन गया है।
यह बदलाव न केवल भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत कर रहा है, बल्कि रोज़गार के अवसर भी पैदा कर रहा है और भारत को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर रहा है।
इनेब्लिंग टेक्नोलॉजी(Enabling Technology) एक ऐसी तकनीक है जो किसी अन्य नई तकनीक, उत्पाद या सेवा के विकास और सफल कार्यान्वयन को संभव बनाती है। यह एक मूलभूत और बुनियादी ढाँचा प्रदान करती है, जिस पर आगे के नवाचार और विकास आधारित होते हैं। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है जो अपने आप में एक पूर्ण समाधान होने के बजाय, अन्य समाधानों के निर्माण के लिये एक प्लेटफॉर्म या उपकरण के रूप में काम करती है।
मुख्य बिंदु
- आधारभूत भूमिका : इनेब्लिंग टेक्नोलॉजी एक बिल्डिंग ब्लॉक की तरह काम करती है। यह सीधे अंतिम उपयोगकर्ता को लाभ पहुँचाने के बजाय, अन्य डेवलपर्स और कंपनियों को बेहतर और अधिक कुशल उत्पाद बनाने की क्षमता देती है।
- नवाचार का उत्प्रेरक : ये प्रौद्योगिकियाँ अक्सर कई अलग-अलग क्षेत्रों में नवाचार को गति प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिये, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग ने स्वास्थ्य सेवा, वित्त, और परिवहन जैसे क्षेत्रों में नए उत्पादों और सेवाओं का मार्ग प्रशस्त किया है।
- उदाहरण :
- इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (IoT) : IoT सेंसर और नेटवर्क कनेक्टिविटी की तकनीक है। यह स्मार्ट होम, औद्योगिक स्वचालन और स्मार्ट शहरों जैसे कई नए उत्पादों को संभव बनाती है।
- 5G तकनीक : 5G केवल तेज़ इंटरनेट ही नहीं है, बल्कि यह स्वायत्त वाहनों, रिमोट सर्जरी, और अत्यधिक संवादात्मक संवर्धित वास्तविकता (augmented reality) जैसी तकनीकों को भी संभव बनाती है, जिन्हें कम विलंबता (low latency) की आवश्यकता होती है।
- क्लाउड कंप्यूटिंग : इसने बड़ी मात्रा में डेटा प्रोसेसिंग और स्टोरेज को सुलभ बना दिया है, जिससे SaaS (Software as a Service) और अन्य डिजिटल सेवाओं का विकास आसान हो गया है।
संक्षेप में, इनेब्लिंग टेक्नोलॉजी सीधे तौर पर न दिखकर भी आधुनिक तकनीकी प्रगति की नींव है।
भारत में DNA साक्ष्य की स्वीकार्यता को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण समय के साथ विकसित हुआ है, जो इसे अपराध और पितृत्व विवाद जैसे मामलों में एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक उपकरण मानता है। विभिन्न अदालती फैसलों और हाल के कानूनों ने इसकी कानूनी वैधता और उपयोग को परिभाषित किया है।
प्रमुख न्यायिक निर्णय और कानूनी प्रावधान
- कुन्हीरामन बनाम मनोज केस (1991): यह मामला भारत में पितृत्व विवाद को सुलझाने के लिये DNA तकनीक का उपयोग करने का पहला उदाहरण था। इस निर्णय ने भविष्य में नागरिक मामलों में DNA साक्ष्य के उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया।
- शारदा बनाम धर्मपाल केस (2003): सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में नागरिक और वैवाहिक विवादों में DNA साक्ष्य की स्वीकार्यता को सुनिश्चित किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि DNA परीक्षण कराना अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) या अनुच्छेद 20(3) (आत्म-अभिशंसन से संरक्षण का अधिकार) का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि यह केवल एक वैज्ञानिक जाँच है, न कि जबरन गवाही।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (धारा 51): यह नया कानून गिरफ्तार किये गए व्यक्ति की चिकित्सा जाँच को कानूनी मान्यता देता है। इसके तहत, एक पंजीकृत चिकित्सक DNA प्रोफाइलिंग और अन्य आवश्यक परीक्षण कर सकता है, जिससे जाँच प्रक्रिया में वैज्ञानिकता और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
- राहुल बनाम दिल्ली राज्य, गृह मंत्रालय (2022): इस मामले में DNA साक्ष्य को अस्वीकार कर दिया गया, क्योंकि नमूना दो महीने तक पुलिस हिरासत में था। न्यायालय ने नमूने के साथ छेड़छाड़ की संभावना को देखते हुए इसकी प्रामाणिकता पर संदेह व्यक्त किया। यह निर्णय DNA साक्ष्य की स्वीकार्यता के लिये संग्रहण और संरक्षण की श्रृंखला (chain of custody) के महत्त्व को रेखांकित करता है।
- देवकर केस (2025): इस हालिया मामले में, DNA साक्ष्य को भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 39 के तहत राय साक्ष्य (opinion evidence) के रूप में वर्गीकृत किया गया। इस निर्णय के अनुसार, DNA साक्ष्य की प्रामाणिकता प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है और इसे अदालत में स्वीकार्य होने के लिये वैज्ञानिक और कानूनी दोनों तरह से मान्यता प्राप्त होना आवश्यक है।
कुल मिलाकर, भारतीय न्यायपालिका ने DNA साक्ष्य को एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में स्वीकार किया है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिये सही वैज्ञानिक प्रक्रियाओं और कानूनी सुरक्षा उपायों पर जोर दिया है।
ब्राउन पॉल्यूशन एक शब्द है जो मुख्यतः औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों से उत्पन्न प्रदूषण को दर्शाता है। इसमें कारखानों से निकलने वाले रासायनिक अपशिष्ट, धुआँ, धूलकण, भारी धातुएँ और ठोस कचरा शामिल होते हैं। यह प्रदूषण हवा, पानी और भूमि को दूषित करता है, जिससे मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
ब्राउन पॉल्यूशन के प्रमुख स्रोत
ब्राउन पॉल्यूशन के मुख्य स्रोत मानवीय गतिविधियाँ हैं, खासकर वे जो औद्योगिक और शहरी विकास से जुड़ी हैं-
- औद्योगिक अपशिष्ट : कारखानों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला जहरीला रासायनिक कचरा, जिसे अक्सर नदियों और जलस्रोतों में छोड़ दिया जाता है।
- वाहन उत्सर्जन : शहरों में चलने वाले वाहनों से निकलने वाला धुआँ और कण, जो हवा को प्रदूषित करते हैं और श्वसन संबंधी बीमारियों का कारण बनते हैं।
- ठोस कचरा : अनुचित तरीके से फेंका गया शहरी और औद्योगिक ठोस कचरा, जो भूमि और जल को दूषित करता है।
- भारी धातुएँ : बैटरी, पेंट और कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाली सीसा, पारा और कैडमियम जैसी भारी धातुएँ, जो मिट्टी और पानी को प्रदूषित करती हैं और स्वास्थ्य के लिये अत्यंत हानिकारक हैं।
प्रभाव और समाधान
ब्राउन पॉल्यूशन के गंभीर परिणाम होते हैं-
- मानव स्वास्थ्य : यह श्वसन संबंधी बीमारियाँ, कैंसर, तंत्रिका तंत्र की समस्याएँ और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों का कारण बनता है।
- पर्यावरणीय क्षति : यह जलस्रोतों को दूषित करके जलीय जीवन को नष्ट करता है, मिट्टी की उर्वरता को कम करता है और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बिगाड़ता है।
- आर्थिक प्रभाव : प्रदूषण के कारण होने वाली स्वास्थ्य संबंधी लागत और पर्यावरणीय क्षति को ठीक करने में भारी खर्च आता है।
ब्राउन पॉल्यूशन को कम करने के लिये सख्त पर्यावरणीय नियम लागू करना, कचरा प्रबंधन की बेहतर प्रणालियाँ अपनाना और प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों का उपयोग करना आवश्यक है। यह एक वैश्विक चुनौती है जिसके लिये औद्योगिक, सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है।
ग्रीन केमिस्ट्री रसायन विज्ञान की एक विशेष शाखा है जो पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित और टिकाऊ रासायनिक प्रक्रियाओं और उत्पादों के विकास पर ध्यान केंद्रित करती है। इसका मुख्य उद्देश्य रासायनिक गतिविधियों से होने वाली पर्यावरणीय क्षति को कम करना, संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित करना और मानव स्वास्थ्य के लिये सुरक्षित उत्पाद बनाना है। यह एक ऐसी सोच है जो रसायन विज्ञान को "साफ-सुथरा" और जिम्मेदार बनाने पर जोर देती है।
ग्रीन केमिस्ट्री के 12 सिद्धांत
अमेरिकी वैज्ञानिक पॉल अनास्तास और जॉन वार्नर ने ग्रीन केमिस्ट्री के 12 सिद्धांतों को प्रतिपादित किया, जो इसके मूल आधार हैं-
- अपशिष्ट निवारण (Waste Prevention): कचरा उत्पन्न करने से बेहतर है कि उसे बनने ही न दिया जाए।
- परमाणु अर्थव्यवस्था (Atom Economy): प्रक्रिया में उपयोग होने वाले सभी परमाणुओं को अंतिम उत्पाद में शामिल करना, ताकि अपशिष्ट कम हो।
- कम जोखिम वाले संश्लेषण (Less Hazardous Synthesis): रासायनिक संश्लेषण में कम विषाक्त या गैर-विषाक्त पदार्थों का उपयोग करना।
- सुरक्षित रसायन (Safer Chemicals): ऐसे उत्पादों का निर्माण करना जो उपयोग के बाद विषैले न हों।
- सुरक्षित विलायक (Safer Solvents): हानिकारक विलायकों और पृथक्करण एजेंटों के उपयोग से बचना।
- ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency): रासायनिक प्रक्रियाओं में ऊर्जा की खपत को कम करना।
- नवीकरणीय कच्चे माल (Renewable Feedstocks): जहाँ तक संभव हो, जीवाश्म ईंधन के बजाय नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग करना।
- व्युत्पन्न में कमी (Reduce Derivatives): अनावश्यक रासायनिक व्युत्पन्न (derivatives) से बचना।
- उत्प्रेरक (Catalysis): प्रतिक्रियाओं को उत्प्रेरित करने के लिये छोटे और प्रभावी मात्रा में उत्प्रेरकों का उपयोग करना।
- जैव-अपघटन योग्य उत्पाद (Degradable Products): ऐसे उत्पाद डिजाइन करना जो उपयोग के बाद पर्यावरण में आसानी से विघटित हो सकें।
- रियल-टाइम विश्लेषण (Real-Time Analysis): प्रदूषण को रोकने के लिये प्रक्रिया के दौरान ही निगरानी और नियंत्रण करना।
- सुरक्षित रसायन (Safer Chemistry): दुर्घटनाओं की संभावना को कम करने के लिये सुरक्षित रसायनों और प्रक्रियाओं का चयन करना।
ग्रीन केमिस्ट्री का महत्त्व केवल पर्यावरण को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी फायदेमंद है। यह अपशिष्ट निपटान की लागत को कम करती है, संसाधनों का कुशल उपयोग करती है और कर्मचारियों के लिये सुरक्षित कामकाजी वातावरण बनाती है। यह फार्मास्यूटिकल्स, प्लास्टिक, पेंट और ऊर्जा जैसे उद्योगों में एक महत्त्वपूर्ण नवाचार है।
औद्योगिक क्रांति 4.0 एक नया औद्योगिक चरण है जो डिजिटल तकनीकों को उत्पादन और सेवाओं में एकीकृत करता है। यह क्रांति कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), रोबोटिक्स, बिग डेटा और साइबर-भौतिक प्रणालियों (Cyber-physical systems) जैसी तकनीकों का उपयोग करके फैक्ट्रियों को 'स्मार्ट फैक्ट्रियों' में बदल रही है।
औद्योगिक क्रांतियों का संक्षिप्त इतिहास
- पहली औद्योगिक क्रांति (1.0) : 18वीं शताब्दी में जल और भाप की शक्ति का उपयोग करके यांत्रिक उत्पादन की शुरुआत हुई।
- दूसरी औद्योगिक क्रांति (2.0) : 19वीं और 20वीं शताब्दी में बिजली के आने से बड़े पैमाने पर उत्पादन और असेंबली लाइनों का विकास हुआ।
- तीसरी औद्योगिक क्रांति (3.0) : 1970 के दशक में कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक्स के उपयोग से स्वचालन (automation) की शुरुआत हुई।
- चौथी औद्योगिक क्रांति (4.0) : वर्तमान युग, जहाँ डिजिटल और भौतिक दुनिया का एकीकरण हो रहा है, जिससे उत्पादन प्रक्रियाएँ और भी बुद्धिमान, कुशल और आत्मनिर्भर बन रही हैं।
औद्योगिक क्रांति 4.0 के प्रमुख घटक
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) : AI उत्पादन प्रक्रियाओं को नियंत्रित और अनुकूलित करने के लिये डेटा का विश्लेषण करता है।
- इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) : मशीनों, उपकरणों और सेंसरों को इंटरनेट से जोड़कर डेटा का आदान-प्रदान और निगरानी की जाती है।
- रोबोटिक्स और स्वचालन : उन्नत रोबोट और स्वचालित प्रणालियाँ उत्पादन में सटीकता और दक्षता को बढ़ाती हैं।
- बिग डेटा : यह उत्पादन से संबंधित विशाल डेटासेट का विश्लेषण करता है, जिससे बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है।
औद्योगिक क्रांति 4.0 का उद्देश्य उत्पादन को अधिक लचीला, कुशल और व्यक्तिगत बनाना है, जिससे लागत कम हो और नवाचार को बढ़ावा मिले। यह सिर्फ मशीनों के बारे में नहीं है, बल्कि यह मानव और मशीन के बीच एक नए सह-अस्तित्व का निर्माण भी है।
ऑनलाइन गेमिंग उन खेलों को संदर्भित करता है जो इंटरनेट या अन्य इलेक्ट्रॉनिक संचार तकनीकों के माध्यम से डिजिटल उपकरणों पर खेले जाते हैं। यह खिलाड़ियों को वास्तविक समय में, उनकी भौगोलिक स्थिति की परवाह किये बिना, एक-दूसरे के साथ बातचीत करने और प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति देता है।
ऑनलाइन गेम्स का वर्गीकरण
ऑनलाइन गेम्स को उनके स्वभाव के आधार पर दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है :
- कौशल-आधारित खेल (Skill-Based Games) : ये ऐसे खेल हैं जहाँ परिणाम मुख्य रूप से खिलाड़ी के कौशल, ज्ञान, और अनुभव पर निर्भर करता है, न कि केवल संयोग पर। ये खेल भारत में कानूनी (legal) हैं।
- उदाहरण : Game 24X7, Dream11, और मोबाइल प्रीमियर लीग (MPL) जैसे फैंटेसी स्पोर्ट्स (Fantasy Sports) प्लेटफॉर्म।
- चांस-आधारित खेल (Games of Chance) : इन खेलों का परिणाम पूरी तरह से या बड़े पैमाने पर भाग्य या संयोग पर निर्भर करता है। ये खेल, विशेष रूप से जब मौद्रिक पुरस्कारों के लिये खेले जाते हैं, भारत में अवैध (illegal) माने जाते हैं।
- उदाहरण : रूलेट (Roulette) और अन्य कैसीनो खेल।
भारत में ऑनलाइन गेमिंग का बाज़ार
भारत में ऑनलाइन गेमिंग का बाज़ार तेजी से बढ़ रहा है और यह दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक बन गया है।
- बाजार का आकार : 2023 में, भारत में 568 मिलियन से अधिक गेमर्स थे और 9.5 बिलियन ऐप डाउनलोड के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा गेमिंग मार्केट बन गया।
- आर्थिक मूल्य : 2023 में इस बाजार का अनुमानित मूल्य 2.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, और यह 2028 तक बढ़कर 8.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है।
यह वृद्धि भारत में ऑनलाइन गेमिंग की लोकप्रियता और आर्थिक क्षमता को दर्शाती है, हालाँकि कौशल-आधारित और चांस-आधारित खेलों के बीच का कानूनी भेद एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16 एक मौलिक अधिकार है जो सरकारी रोज़गार के मामलों में सभी नागरिकों के लिये अवसर की समानता सुनिश्चित करता है। यह राज्य को धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी भी आधार पर किसी नागरिक के साथ कोई भी भेदभाव करने से रोकता है।
- मुख्य प्रावधान
- अनुच्छेद 16(1): यह गारंटी देता है कि राज्य के अधीन किसी भी पद या सरकारी नौकरी में सभी नागरिकों को समान अवसर मिलेंगे।
- अनुच्छेद 16(2): यह प्रावधान राज्य को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान, या निवास के आधार पर सार्वजनिक रोज़गार में किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव करने से स्पष्ट रूप से रोकता है।
- आरक्षण और विशेष प्रावधान
अनुच्छेद 16 में कुछ ऐसे प्रावधान भी शामिल हैं जो ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करने और सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये राज्य को आरक्षण देने की अनुमति देते हैं।- अनुच्छेद 16(4): यह राज्य को नागरिकों के किसी पिछड़े वर्ग के लिये नियुक्तियों या पदों में आरक्षण का प्रावधान करने की शक्ति देता है, यदि राज्य को लगता है कि उस वर्ग का सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
- अनुच्छेद 16(4A): यह विशेष रूप से सरकारी रोज़गार में अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिये पदों के आरक्षण का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 16(4B): यह राज्य को SC और ST के पक्ष में किसी भी श्रेणी के पदों पर पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने की अनुमति देता है।
- अनुच्छेद 16(6): यह राज्य को आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) के नागरिकों के लिये नियुक्तियों या पदों को आरक्षित करने की अनुमति देता है। यह आरक्षण मौजूदा आरक्षण के अतिरिक्त होता है और प्रत्येक श्रेणी में अधिकतम 10% पदों तक सीमित है।
केंद्र शासित प्रदेश (UT) भारत के संविधान में एक विशेष दर्जा प्राप्त क्षेत्र हैं। इनका निर्माण विभिन्न राजनीतिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक कारणों से किया गया था।
संवैधानिक ढाँचा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 भारत को ‘राज्यों के संघ’ के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें केंद्र शासित प्रदेशों को भी शामिल किया गया है। केंद्र शासित प्रदेशों की अवधारणा को सातवें संवैधानिक संशोधन अधिनियम और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 6 के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया था। इन प्रावधानों ने केंद्र सरकार को कुछ क्षेत्रों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करने की अनुमति दी।
केंद्र शासित प्रदेशों के निर्माण के कारण
केंद्र शासित प्रदेशों का गठन कई प्रमुख विचारों पर आधारित है :
- राजनीतिक और प्रशासनिक कारण : दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे क्षेत्रों को उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक संवेदनशीलता के कारण सीधे केंद्र सरकार के शासन के अधीन रखा गया है।
- सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण : पुदुचेरी जैसे क्षेत्रों का गठन उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिये किया गया था।
- रणनीतिक महत्त्व : अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप जैसे रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण स्थानों को सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के लिये सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में रखा गया है।
- लक्षित विकास : मिजोरम और त्रिपुरा जैसे पिछड़े या जनजातीय क्षेत्रों में लक्षित और तेज विकास सुनिश्चित करने के लिये, उन्हें अस्थायी रूप से केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। बाद में, जब वे पर्याप्त रूप से विकसित हो गए, तो उन्हें पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया।
यह व्यवस्था केंद्र सरकार को उन क्षेत्रों पर प्रभावी शासन और नियंत्रण बनाए रखने में मदद करती है जहाँ विशेष ध्यान और सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया (STPI) की स्थापना वर्ष 1991 में सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्था के रूप में की गई थी। यह इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अधीन कार्य करता है। STPI का उद्देश्य आईटी निर्यात को प्रोत्साहित करना, उच्च गुणवत्ता वाला बुनियादी ढाँचा उपलब्ध कराना तथा भारत को वैश्विक डिजिटल हब के रूप में स्थापित करना है। तीन दशकों में, STPI भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का एक मज़बूत स्तंभ बन चुका है।
- STPI के उद्देश्य
- सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क (STP) और इलेक्ट्रॉनिक्स हार्डवेयर टेक्नोलॉजी पार्क (EHTP) योजनाओं का क्रियान्वयन।
- आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग हेतु उच्च स्तरीय बुनियादी ढाँचे की स्थापना और प्रबंधन।
- सॉफ्टवेयर निर्यात को बढ़ावा देना और भारत को वैश्विक आउटसोर्सिंग केंद्र बनाना।
- स्टार्ट-अप्स और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना तथा इनक्यूबेशन सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
- STPI की प्रमुख पहलें
- उद्यमिता केंद्र (Centres of Entrepreneurship - CoE):
- विभिन्न क्षेत्रों जैसे IoT, AI, FinTech और हेल्थकेयर में स्थापित।
- स्टार्ट-अप्स को मेंटॉरशिप, अनुसंधान एवं विकास समर्थन और सहयोगी पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करते हैं।
- नेक्स्ट जनरेशन इनक्यूबेशन स्कीम (NGIS):
- नई पीढ़ी के नवोन्मेषकों और स्टार्ट-अप्स को सक्षम बनाती है।
- इसमें वित्तीय सहायता, इनक्यूबेशन सुविधा और बाज़ार तक पहुँच शामिल है।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म:
- SayujNet: नेटवर्किंग और संसाधन खोज मंच।
- STPI-Workspace: वर्कस्पेस प्रबंधन और सहयोग हेतु पोर्टल।
- उद्यमिता केंद्र (Centres of Entrepreneurship - CoE):
- अनंता : भारत का स्वदेशी हाइपरस्केल क्लाउड
- STPI ने हाल ही में “अनंता” नामक क्लाउड प्रणाली की घोषणा की, जिसे भारतीयों द्वारा भारतीयों के लिये विकसित किया गया है।
- इसमें निम्नलिखित सेवाएँ उपलब्ध होंगी:
- IAAS (Infrastructure as a Service)
- PAAS (Platform as a Service)
- SAAS (Software as a Service)
- GPU आधारित सेवाएँ (उन्नत कंप्यूटिंग हेतु)
- इसका उद्देश्य विदेशी क्लाउड प्रणालियों पर निर्भरता घटाना और डिजिटल संप्रभुता सुनिश्चित करना है।
- डीपटेक नॉलेज रिपोर्ट
- STPI ने “Software Product Nation के रूप में भारत को स्थापित करने” पर आधारित रिपोर्ट जारी की।
- इसमें भारत को डीपटेक नवाचार, अनुसंधान एवं विकास और उत्पाद निर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने की संभावनाओं को रेखांकित किया गया।
- यह रिपोर्ट नीति निर्माण और उद्यमिता रणनीति के लिये एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है।
- STPI का महत्त्व
- आर्थिक योगदान: आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात को बढ़ावा, रोजगार सृजन।
- उद्यमिता: स्टार्ट-अप्स और MSMEs को वैश्विक स्तर पर बढ़ने का अवसर।
- डिजिटल आत्मनिर्भरता: विदेशी तकनीक पर निर्भरता घटाना।
- नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र: सरकार, उद्योग और अकादमिक जगत के बीच सहयोग को प्रोत्साहन।
STPI केवल एक बुनियादी ढाँचा उपलब्ध कराने वाली एजेंसी नहीं है, बल्कि यह डिजिटल इंडिया और आत्मनिर्भर भारत का रणनीतिक आधार है। उद्यमिता, स्वदेशी क्लाउड अवसंरचना और डीपटेक नवाचार को प्रोत्साहन देकर यह भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में रूपांतरित कर रहा है। UGC NET परीक्षार्थियों के लिये STPI अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण विषय है, क्योंकि यह प्रौद्योगिकी, शासन और आर्थिक विकास के संगम को दर्शाता है।
भारत की BioE3 नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिये जैव प्रौद्योगिकी), जो 2024 में लागू हुई, इसका उद्देश्य जैव प्रौद्योगिकी को सतत विकास, नवाचार और रोजगार का प्रमुख माध्यम बनाना है। इसी दृष्टि के तहत विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क की स्थापना की, जिसमें छह प्रमुख संस्थान शामिल हैं। यह नेटवर्क अनुसंधान और उद्योग के बीच पुल का काम करता है, उच्च-मूल्य वाले जैव-उत्पादन को बढ़ावा देता है और स्टार्टअप्स, एसएमई और शोधकर्ताओं के लिये साझा पूर्व-व्यावसायिक और पायलट सुविधाएँ उपलब्ध कराता है। यह पहल भारत के हरित विकास लक्ष्यों और पर्यावरण के लिये जीवनशैली (LiFE) के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
- राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क :
- इस नेटवर्क के अंतर्गत कुल छह संस्थान जो प्रयोगशाला से उद्योग तक नवाचार को बढ़ाते हैं
- स्टार्टअप्स, SMEs और शोधकर्ताओं के लिये साझा सुविधाएँ और समर्थन
- बायोइकॉनमी (जैव अर्थव्यवस्था)
- बायोइकॉनमी का उद्देश्य जैविक संसाधनों का उत्पादन, संरक्षण और उपयोग विज्ञान और नवाचार के माध्यम से करना है, ताकि सभी आर्थिक क्षेत्रों में उत्पाद, प्रक्रियाएँ और सेवाएँ सतत और प्रभावी ढंग से उपलब्ध हों। भारत की बायोइकॉनमी ने 2014 में USD 10 अरब से 2024 में USD 165.7 अरब तक का विकास किया है, और इसका लक्ष्य 2030 तक USD 300 अरब तक पहुँचाना है।
- महत्त्व :
- जैव-कृषि : जलवायु-स्मार्ट फसलें, जैव-उर्वरक, जैव-कीटनाशक और परिशुद्ध खेती को प्रोत्साहन; कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा में वृद्धि।
- ऊर्जा सुरक्षा : इथेनॉल मिश्रण 20% (2025) → कच्चे तेल के आयात में कमी और CO₂ उत्सर्जन में घटाव; ₹1.36 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत।
- उद्यमिता : बायोटेक स्टार्टअप्स संख्या 50 → 10,000+; नवाचार, रोजगार और क्षेत्रीय विकास को प्रोत्साहन।
- BioE3 नीति – मुख्य बिंदु :
- उन्नत जैव-उत्पादन और उच्च-मूल्य वाले जैव-उत्पादों को बढ़ावा।
- BioEnablers: AI हब, बायोफाउंड्री और बायोमैन्युफैक्चरिंग हब की स्थापना, प्रयोगशाला से उद्योग तक नवाचार का समर्थन।
- अंतःविषयक प्रशिक्षण और कुशल मानव संसाधन विकास, ताकि उद्योग की आवश्यकताओं के अनुसार विशेषज्ञ तैयार हों।
- प्रमुख प्रभाव क्षेत्र :
- बायोफार्मा : टीकों और दवा उत्पादन में वैश्विक योगदान और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना।
- जैव-कृषि : Biotech-KISAN नेटवर्क के माध्यम से जलवायु-स्मार्ट फसलें और किसान आय में सुधार।
- जैवऊर्जा : इथेनॉल मिश्रण से ग्रामीण आय बढ़ाना, तेल आयात कम करना और पर्यावरणीय लाभ सुनिश्चित करना।
- चुनौतियाँ :
- वित्तीय और निवेश सीमाएँ, उच्च प्रारंभिक लागत
- नियामक, नैतिक और पर्यावरणीय चिंताएँ
- जैव-प्रौद्योगिकी में कौशल की कमी
- सुझाव :
- सरल नियामक, निजी निवेश और PPP को बढ़ावा
- नवाचार और व्यावसायीकरण को तेज़ करना
- मानव पूँजी और विशेषज्ञता का सृजन
BioE3 नीति और राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क भारत की सतत और नवाचार-संचालित बायोइकॉनमी के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। अनुसंधान, व्यावसायीकरण, हरित प्रौद्योगिकी और उद्यमिता को बढ़ावा देकर यह पहल न केवल वैश्विक स्तर पर भारत की बायोटेक उपस्थिति को सुदृढ़ करेगी, बल्कि आर्थिक वृद्धि, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन के साथ समावेशी विकास के अवसर भी सुनिश्चित करेगी।
PM ई-विद्या भारत सरकार द्वारा प्रारंभ की गई एक समग्र डिजिटल शिक्षा पहल है, जिसका उद्देश्य “One Nation, One Digital Platform” की भावना को साकार करना है। यह पहल विद्यार्थियों, शिक्षकों और विद्यालयों को एकीकृत मंच पर जोड़ती है और शिक्षा को डिजिटल, समावेशी, सुलभ व बहुभाषी बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है। इसके माध्यम से शिक्षा का लोकतंत्रीकरण (Democratization of Education) संभव हुआ है, जहाँ सभी वर्गों और क्षमताओं के विद्यार्थी गुणवत्तापूर्ण सामग्री तक पहुँच सकते हैं।
- प्रमुख घटक
- DIKSHA (Digital Infrastructure for Knowledge Sharing)
- राष्ट्रीय स्तर पर साझा डिजिटल बुनियादी ढाँचा।
- कक्षा 1–12 हेतु गुणवत्तापूर्ण ई-सामग्री, क्यूआर कोड आधारित पाठ्यपुस्तकें।
- शिक्षकों के लिये प्रशिक्षण और इंटरैक्टिव संसाधन भी उपलब्ध।
- DIKSHA पोर्टल और मोबाइल ऐप
- एक ई-लाइब्रेरी के रूप में कार्यरत।
- राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों और राष्ट्रीय संगठनों द्वारा अपलोड की गई सामग्री।
- PM e-VIDYA DTH टीवी चैनल
- प्रारंभिक 12 चैनल अब बढ़कर 200 चैनल।
- कक्षा 1 से 12 तक की शिक्षा।
- विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रसारण से भाषाई विविधता को सम्मान।
- CBSE पॉडकास्ट – “शिक्षा वाणी”
- रेडियो + कम्युनिटी रेडियो + पॉडकास्ट के माध्यम से ज्ञान का प्रसार।
- शिक्षण-सामग्री, परीक्षा टिप्स और विद्यार्थियों के लिये इंटरैक्टिव चर्चाएँ।
- DAISY प्रणाली
- दृष्टिबाधित और श्रवणबाधित विद्यार्थियों के लिये विशेष ई-सामग्री।
- NIOS वेबसाइट और YouTube पर सांकेतिक भाषा सामग्री।
- डिजिटल शिक्षा में समावेशिता (Inclusiveness) सुनिश्चित करती है।
- वर्चुअल लैब्स और स्किल ई-लैब्स
- 750 वर्चुअल लैब्स – विज्ञान और गणित (कक्षा 6–12)।
- 75 स्किल ई-लैब्स – व्यावहारिक कौशल, रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच।
- DIKSHA प्लेटफॉर्म पर अलग वर्टिकल उपलब्ध।
- समग्र शिक्षा योजना (ICT Initiative)
- केंद्र प्रायोजित योजना।
- कक्षा 6–12 तक के सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों को ICT आधारित शिक्षा।
- SATHEE पोर्टल
- IIT कानपुर के सहयोग से विकसित।
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिये सहायक मंच।
PM ई-विद्या पहल का उद्देश्य “One Nation, One Digital Platform for Education” की परिकल्पना को साकार करना है। इसका मुख्य लक्ष्य शिक्षा को डिजिटल, सुलभ, बहुभाषी और समावेशी बनाना है ताकि हर वर्ग के विद्यार्थी समान अवसरों के साथ गुणवत्तापूर्ण सामग्री तक पहुँच सकें। इस योजना के प्रत्यक्ष लाभार्थियों में छात्र, शिक्षक, दृष्टिबाधित एवं श्रवणबाधित विद्यार्थी, साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी शामिल हैं। अंततः यह पहल शिक्षा का लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित करती है और पूरे देश में सभी के लिए उच्च गुणवत्ता वाली शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराती है।
- DIKSHA (Digital Infrastructure for Knowledge Sharing)
ओजोन ऑक्सीजन का एक विशेष रूप है, जिसे त्रिआणविक ऑक्सीजन (O3) भी कहा जाता है। यह वायुमंडल में अत्यंत कम मात्रा में पाई जाती है और मुख्य रूप से अधिक ऊँचाई पर स्थित समतापमंडल (Stratosphere) में केंद्रित होती है।
- ओजोन की विशेषताएँ
- यह गैस 10 किमी. से 50 किमी. की ऊँचाई के बीच ओजोन परत (Ozone Layer) के रूप में पाई जाती है।
- सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों (Ultraviolet Radiations) को यह अवशोषित कर पृथ्वी के जीव-जगत की रक्षा करती है।
- ओजोन परत को अक्सर पृथ्वी का सुरक्षात्मक आवरण (Protective Shield) भी कहा जाता है।
- ओजोन परत में कमी के दुष्परिणाम
- यदि वायुमंडल में ओजोन की मात्रा कम हो जाती है तो अधिक पराबैंगनी विकिरण पृथ्वी की सतह पर पहुँचने लगते हैं।
- इसके परिणामस्वरूप—
- त्वचा कैंसर (Skin Cancer) और आँखों की बीमारियाँ (जैसे मोतियाबिंद) बढ़ जाती हैं।
- पौधों की वृद्धि एवं फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- समुद्री पारिस्थितिकी (Marine Ecosystem), विशेषकर प्लवक (Planktons) को हानि पहुँचती है।
- जलवायु संतुलन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- ओजोन परत की रक्षा
- हानिकारक क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), हैलोन, मिथाइल ब्रोमाइड जैसी गैसों के उपयोग को कम करना।
- पर्यावरण-अनुकूल तकनीक एवं ग्रीन प्रोडक्ट्स का प्रयोग बढ़ाना।
- अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के अंतर्गत मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol, 1987) जैसे समझौते लागू किये गए हैं।
भारतीय संविधान मानव गरिमा, समानता और स्वतंत्रता की सुरक्षा हेतु बंधित श्रम को पूर्णतः निषिद्ध करता है। बंधुआ मज़दूरी न केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करती है बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के भी प्रतिकूल है। इस पर अंकुश हेतु संविधान में प्रत्यक्ष प्रावधान, नीति-निदेशक तत्व तथा विस्तृत विधिक अधिनियम निर्मित किये गए हैं।
- संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार; इसमें गरिमामय जीवन का अधिकार निहित है।
- अनुच्छेद 23 – मानव तस्करी, बंधुआ मज़दूरी (begar) और जबरन श्रम पर स्पष्ट प्रतिबंध।
- अनुच्छेद 24 – 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक उद्योगों व खानों में नियोजन पर रोक।
- नीति-निदेशक सिद्धांत (DPSPs):
- अनुच्छेद 42 – न्यायसंगत एवं मानवीय कार्य-परिस्थितियाँ तथा मातृत्व-राहत।
- अनुच्छेद 43 – निर्वाह योग्य वेतन और सभ्य कार्य-परिस्थितियों का आह्वान।
- अनुच्छेद 46 – अनुसूचित जाति, जनजाति एवं दुर्बल वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों का संवर्द्धन, जिससे वे शोषण से मुक्त हो सकें।
- विधिक प्रावधान
- बंधुआ मज़दूरी पद्धति (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 – बंधुआ श्रम की प्रथा का उन्मूलन, मज़दूरों की मुक्ति तथा ऐसे कृत्यों को दंडनीय अपराध घोषित करता है।
- बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 (संशोधित 2016) –
- 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सभी प्रकार के रोजगार से निषिद्ध करता है।
- किशोर (14–18 वर्ष) को खतरनाक कार्यों से प्रतिबंधित करता है।
- किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 – शोषित व परित्यक्त बालकों के पुनर्वास एवं संरक्षण हेतु।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 – जबरन श्रम व अवैध अनिवार्य श्रम को अपराध की श्रेणी में सम्मिलित कर दंड का प्रावधान।
- अंतर्राष्ट्रीय दायित्व
- संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (CRC), 1989 – अनुच्छेद 32 बच्चों को आर्थिक शोषण एवं खतरनाक कार्यों से संरक्षण प्रदान करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन कन्वेंशन 182 (1999) – बाल श्रम के निकृष्टतम रूपों पर प्रतिबंध; भारत द्वारा अनुमोदित।
- महत्त्व
- यह ढाँचा व्यक्ति की गरिमा और मूल अधिकारों की रक्षा करता है।
- सामाजिक न्याय एवं समावेशी विकास की संवैधानिक परिकल्पना को सुदृढ़ करता है।
- भारत को उसके अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप कार्य करने में सक्षम बनाता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization – WMO) संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषीकृत एजेंसी (Specialized Agency) है, जो मौसम, जलवायु, जल संसाधन और उनसे संबंधित भू-विज्ञानों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग सुनिश्चित करती है। वर्तमान में इसके 192 सदस्य देश और क्षेत्र हैं, जिनमें भारत भी एक सदस्य है।
- उत्पत्ति और विकास
- इसकी उत्पत्ति अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन (International Meteorological Organization – IMO) से हुई, जिसकी स्थापना वर्ष 1873 में वियना अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान कांग्रेस के बाद की गई थी।
- बाद में इस संगठन को आधुनिक और व्यापक रूप देने के लिये 23 मार्च 1950 को WMO कन्वेंशन के अनुसमर्थन द्वारा स्थापित किया गया।
- 1951 में WMO को संयुक्त राष्ट्र प्रणाली की आधिकारिक विशेष एजेंसी का दर्जा प्रदान किया गया।
- संरचना और मुख्यालय
- मुख्यालय – जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड
- संगठन दिवस – 23 मार्च (प्रतिवर्ष इसी दिन को विश्व मौसम विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है)
- मुख्य कार्य और भूमिकाएँ
- मौसम और जलवायु सेवाएँ – वैश्विक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान और जलवायु निगरानी के लिये डेटा व तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराना।
- प्राकृतिक आपदा प्रबंधन – चक्रवात, बाढ़, सूखा और तूफानों जैसी आपदाओं के पूर्वानुमान व उनके दुष्प्रभाव कम करने हेतु सदस्य देशों की सहायता।
- जल संसाधन प्रबंधन – सतत जल संसाधन उपयोग, जल विज्ञान संबंधी अनुसंधान और नीतिगत सुझाव।
- जलवायु परिवर्तन से निपटना – ग्रीनहाउस गैसों की निगरानी, समुद्र स्तर वृद्धि, तापमान परिवर्तन आदि पर वैश्विक शोध और नीति निर्माण।
- वैज्ञानिक सहयोग – सदस्य देशों के बीच डेटा-साझाकरण, अनुसंधान और तकनीकी प्रशिक्षण को बढ़ावा देना।
- महत्त्व
- WMO आधुनिक विश्व में जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन और सतत विकास से जुड़ी सबसे अहम वैश्विक संस्थाओं में से एक है।
- यह सदस्य देशों को जलवायु अनुकूलन, जोखिम न्यूनीकरण और पर्यावरण संरक्षण में सहयोग प्रदान करती है।
- वैश्विक तापमान वृद्धि और चरम मौसमी घटनाओं के दौर में WMO की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो गई है।
WMO न केवल मौसम और जलवायु संबंधी जानकारी का विश्वस्तरीय केंद्र है, बल्कि यह मानवता को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने और सतत विकास की दिशा में मार्गदर्शन देने वाला प्रमुख संगठन है।
हाल ही में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से त्याग पत्र देकर उसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अनुच्छेद 67(a) के अंतर्गत सौंप दिया। भारत के इतिहास में यह केवल तीसरी बार हुआ है जब किसी उपराष्ट्रपति ने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफ़ा दिया है। इससे पहले वी.वी. गिरि (1969) और आर. वेंकटरमन (1987) ने ऐसा किया था।
- संविधान में उपराष्ट्रपति के त्याग पत्र से संबंधित प्रावधान
- त्याग पत्र की प्रक्रिया
- अनुच्छेद 67(a) के अनुसार, उपराष्ट्रपति अपने हस्ताक्षरित पत्र को राष्ट्रपति को संबोधित कर त्याग पत्र दे सकते हैं।
- त्याग पत्र जैसे ही राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाता है, वह तत्काल प्रभाव से मान्य हो जाता है।
- राज्यसभा पर प्रभाव
- उपराष्ट्रपति, राज्यसभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होते हैं।
- उनके त्याग पत्र से राज्यसभा में अध्यक्षीय नेतृत्व का अस्थायी शून्य उत्पन्न होता है।
- ऐसी स्थिति में, राज्यसभा के उपसभापति (Deputy Chairman) सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं।
- कार्यवाहक उपराष्ट्रपति का अभाव
- भारतीय संविधान में कार्यवाहक उपराष्ट्रपति (Acting Vice President) का कोई प्रावधान नहीं है।
- यह व्यवस्था केवल उपसभापति के माध्यम से आंशिक रूप से पूरी की जाती है।
- रिक्त पद की पूर्ति हेतु चुनाव
- राष्ट्रपति पद के विपरीत (जहाँ 6 माह के भीतर चुनाव आवश्यक है), उपराष्ट्रपति के लिये संविधान में कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है।
- केवल यह अपेक्षा की जाती है कि चुनाव ‘जितना शीघ्र हो सके’ कराया जाए।
- चुनाव का संचालन भारत का निर्वाचन आयोग करता है, जो इसे 'राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम, 1952' के प्रावधानों के तहत कराता है।
- परंपरा के अनुसार, संसद के किसी एक सदन के महासचिव को निर्वाचन अधिकारी (Returning Officer) नियुक्त किया जाता है।
- नए उपराष्ट्रपति का कार्यकाल
- नव-निर्वाचित उपराष्ट्रपति को पूर्ण 5 वर्ष का कार्यकाल मिलता है, चाहे पूर्ववर्ती उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में कितना भी समय शेष क्यों न रहा हो।
उपराष्ट्रपति का त्याग पत्र भारतीय संविधान में एक स्पष्ट प्रक्रिया के तहत स्वीकार किया जाता है, लेकिन इसके कारण संसद और कार्यपालिका दोनों में अस्थायी असंतुलन पैदा हो सकता है।
इसलिये शीघ्र चुनाव कराना न केवल संवैधानिक अपेक्षा है, बल्कि लोकतांत्रिक स्थिरता के लिये भी आवश्यक है।
- नव-निर्वाचित उपराष्ट्रपति को पूर्ण 5 वर्ष का कार्यकाल मिलता है, चाहे पूर्ववर्ती उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में कितना भी समय शेष क्यों न रहा हो।
- त्याग पत्र की प्रक्रिया
नगरीय ऊष्मा द्वीप (Urban Heat Island – UHI) उस स्थिति को कहा जाता है जब महानगर या बड़े शहरी क्षेत्र अपने आस-पास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में अधिक गर्म हो जाते हैं। कंक्रीट, डामर और धातु जैसी सतहें दिनभर ऊष्मा को अवशोषित करके रात में धीरे-धीरे छोड़ती हैं, जिससे शहरी तापमान लगातार ऊँचा बना रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव नई दिल्ली, पेरिस, न्यूयॉर्क, लंदन जैसे घनी आबादी वाले शहरों में देखा जाता है। हालिया अध्ययनों में पाया गया है कि जहाँ यह प्रभाव ऊष्मा से जुड़ी मौतें बढ़ाता है, वहीं यह ठंड से होने वाली मौतों को कुछ हद तक कम भी करता है।
- नगरीय ऊष्मा द्वीप के कारण
- अपारगम्य सतहें – डामर, कंक्रीट और स्टील ऊष्मा को अधिक अवशोषित करते हैं और कम एल्बिडो होने के कारण धीरे-धीरे छोड़ते हैं।
- वनस्पति का अभाव – सीमित हरित आवरण से वाष्पोत्सर्जन कम हो जाता है और प्राकृतिक शीतलन बाधित होता है।
- मानवजनित ऊष्मा – वाहनों, औद्योगिक इकाइयों व एयर कंडीशनिंग से अतिरिक्त ऊष्मा का उत्सर्जन।
- वायु प्रदूषण और कालिख – ब्लैक कार्बन व अन्य कण सौर विकिरण को अवशोषित कर वातावरण का तापमान बढ़ाते हैं।
- नगरीय आकृति विज्ञान (Urban Morphology) – ऊँची-घनी इमारतें व संकरी गलियाँ Urban Canyon Effect पैदा करती हैं, जिससे हवा का प्रवाह कम हो जाता है और ऊष्मा फँस जाती है।
- नगरीय ऊष्मा द्वीप के परिणाम
- ऊर्जा की बढ़ती मांग – AC और शीतलन साधनों पर अधिक निर्भरता, जिससे बिजली ग्रिड पर दबाव और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि।
- वायु गुणवत्ता में गिरावट – अधिक तापमान पर ज़मीनी ओज़ोन स्तर बढ़ता है, जिससे धुंध और श्वसन रोग फैलते हैं।
- मानव स्वास्थ्य पर असर – हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण और हृदय-रोग का खतरा, विशेषकर बुजुर्गों और बच्चों में।
- जल संसाधनों पर दबाव – अधिक वाष्पीकरण से जल संकट और शीतलन की बढ़ी हुई आवश्यकता।
- जैवविविधता को खतरा – हरित क्षेत्र घटने और अत्यधिक तापमान से शहरी पारिस्थितिकी व जीव-जंतुओं पर नकारात्मक असर।
- नगरीय ऊष्मा द्वीप शमन रणनीतियाँ
- शहरी क्षेत्रों में हरित आवरण बढ़ाना (पेड़-पौधे, पार्क, ग्रीन रूफ)।
- परावर्तक सतहों का उपयोग (Cool Roofs, Cool Pavements)।
- सतत शहरी नियोजन – कम ऊँचाई वाली इमारतें, वायु प्रवाह सुनिश्चित करना।
- स्मार्ट कूलिंग सिस्टम – ऊर्जा-कुशल AC और जिला शीतलन (District Cooling) मॉडल।
- जन-जागरूकता – हीटवेव से बचाव उपाय, जल संरक्षण और पर्यावरण-हितैषी व्यवहार।
- UHI शमन केस स्टडी
- लॉस एंजिल्स – Cool Roof Initiative, जिसमें नई इमारतों में परावर्तक छतों का अनिवार्य उपयोग।
- दुबई – District Cooling System, जिसमें भूमिगत पाइपों से ठंडा पानी वितरित कर 30–50% ऊर्जा बचत।
- पेरिस – Cool Streets Project, जहाँ डामर हटाकर वृक्षारोपण व पैदल यात्री क्षेत्रों को बढ़ावा दिया गया।
नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव आधुनिक शहरीकरण की एक गंभीर चुनौती है, जो जलवायु परिवर्तन के स्थानीय त्वरक के रूप में कार्य करता है। यह ऊर्जा खपत, मानव स्वास्थ्य, जैवविविधता और पर्यावरण पर गहरा असर डालता है। हालाँकि, ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर, परावर्तक सतहें, सतत शहरी नियोजन और स्मार्ट तकनीक अपनाकर इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सतत शहरी विकास की दिशा में UHI शमन रणनीतियाँ न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से, बल्कि सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक हैं।
भारत में खेल प्रशासन लंबे समय से पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता की चुनौतियों से जूझता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक, 2025 लाया गया है। यह विधेयक खेल संस्थानों की संरचना, अधिकार और जवाबदेही को मजबूत करते हुए खिलाड़ियों के हितों की रक्षा और भारत को वैश्विक खेल शक्ति बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- मुख्य प्रावधान (Key Provisions)
- राष्ट्रीय खेल बोर्ड (NSB) की स्थापना
- केंद्र सरकार को NSB स्थापित करने का अधिकार।
- राष्ट्रीय ओलंपिक समिति, राष्ट्रीय पैरालंपिक समिति और राष्ट्रीय खेल महासंघों का गठन।
- NSB को निम्न अधिकार —
- खेल निकायों (BCCI सहित) को मान्यता प्रदान करना, निलंबित करना या रद्द करना।
- खेल निकायों की जाँच और ऑडिट।
- आचार संहिता एवं सुरक्षित खेल नीति तैयार करना।
- राष्ट्रीय खेल चुनाव पैनल के जरिये चुनावों का नियमन।
- अंतर्राष्ट्रीय मानकों और अनुपालन को सुनिश्चित करना।
- राष्ट्रीय / क्षेत्रीय खेल महासंघ
- सभी महासंघों को निम्न संरचना अपनानी होगी :
- सामान्य सभा।
- 15 सदस्यीय कार्यकारी समिति, जिसमें —
- कम से कम 2 उत्कृष्ट खिलाड़ी।
- कम से कम 4 महिलाएँ।
- समितियाँ : आचार समिति, विवाद समाधान समिति, एथलीट समिति।
- सभी महासंघों को निम्न संरचना अपनानी होगी :
- राष्ट्रीय खेल न्यायाधिकरण
- एक 3 सदस्यीय न्यायाधिकरण का गठन।
- अध्यक्षता : सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान/पूर्व न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
- शक्तियाँ : सिविल न्यायालय जैसी, ताकि विवादों का त्वरित निपटारा हो सके।
- डोपिंग, आंतरिक विवाद और अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के मामले इसके अंतर्गत नहीं आएंगे (इन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील)।
- वित्तीय व प्रशासनिक पारदर्शिता
- मान्यता प्राप्त खेल निकाय सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत आएंगे केवल तभी जब उन्हें सरकारी अनुदान या वित्तीय सहायता प्राप्त हो।
- सभी निकायों को CAG द्वारा लेखापरीक्षित खाते रखना अनिवार्य।
- "भारत" या राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह के उपयोग हेतु पूर्व अनुमोदन आवश्यक।
- केंद्र सरकार के विशेष अधिकार
- नियम बनाने व पात्रता शर्तों में शिथिलता प्रदान करना।
- सुरक्षा, लोक व्यवस्था या जन-सुरक्षा के कारणों से राष्ट्रीय टीमों की विदेशी भागीदारी पर रोक लगाने का अधिकार।
- संवैधानिक संदर्भ
- खेल विषय, भारतीय संविधान की सप्तम अनुसूची (List-II), प्रविष्टि 33 के अंतर्गत राज्य विषय है।
- यह विधेयक राज्यों और केंद्र दोनों के बीच समन्वय को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है।
राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक, 2025 खेल संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और खिलाड़ियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करता है। यह विधेयक न केवल खेल प्रबंधन को अधिक लोकतांत्रिक और पेशेवर बनाएगा, बल्कि भारत को “स्पोर्ट्स सुपरपावर” बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल भी साबित होगा।
- राष्ट्रीय खेल बोर्ड (NSB) की स्थापना
तकनीकी शिक्षा को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उद्देश्यों को साकार करने के लिए केंद्र सरकार ने MERITE योजना को लागू करने की मंज़ूरी दी है। यह योजना देशभर के 275 तकनीकी संस्थानों में शैक्षिक गुणवत्ता, अनुसंधान क्षमता और रोजगार योग्यता में व्यापक सुधार लाने पर केंद्रित है। MERITE के माध्यम से डिजिटल शिक्षा, बहु-विषयक कार्यक्रम, अनुसंधान सुदृढ़ीकरण और गुणवत्ता आश्वासन जैसे उपायों को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे आने वाले वर्षों में लगभग 7.5 लाख विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिलेगा।
- मुख्य तथ्य
- पूरा नाम : Multidisciplinary Education and Research Improvement in Technical Education (MERITE)
- योजना का प्रकार : केंद्रीय क्षेत्रक योजना
- अवधि : 2025–26 से 2029–30
- कुल बजट : ₹4200 करोड़
- इसमें ₹2100 करोड़ की विश्व बैंक ऋण सहायता शामिल है।
- लाभार्थी संस्थान :
- राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NITs)
- राज्य इंजीनियरिंग संस्थान
- संबद्ध तकनीकी विश्वविद्यालय
- इंजीनियरिंग कॉलेज और पॉलीटेक्निक संस्थान
- लक्षित लाभार्थी : लगभग 7.5 लाख विद्यार्थी (सभी राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश)
- क्रियान्वयन ढाँचा
- सहयोगी संस्थान :
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs)
- भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIMs)
- अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE)
- राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (NBA)
- कार्यान्वयन फोकस :
- शिक्षा का डिजिटलीकरण
- बहु-विषयक कार्यक्रमों का विकास
- रोज़गार योग्यता और कौशल विकास
- अनुसंधान व नवाचार को प्रोत्साहन
- गुणवत्ता आश्वासन और प्रत्यायन (Accreditation) में सुधार
- श्रम-बाज़ार आधारित पाठ्यक्रम तैयार करना
- भावी शैक्षणिक नेतृत्व, विशेषकर महिलाओं, को बढ़ावा देना
- महत्त्व
- तकनीकी शिक्षा में वैश्विक मानकों के अनुरूप सुधार।
- छात्रों को 21वीं सदी के कौशल से लैस करना।
- इंडस्ट्री–अकादमिक गैप को कम करना और रोजगार के अवसर बढ़ाना।
- सहयोगी संस्थान :
1945 में आए कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों के आधार पर भारत में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके तहत 2 सितम्बर 1946 को एक अंतरिम मंत्रिमंडल (Interim Government) का गठन किया गया। इसका उद्देश्य था — पूर्ण स्वतंत्रता से पहले भारतीय नेताओं को प्रशासनिक अनुभव देना और सत्ता का क्रमिक हस्तांतरण करना। यह मंत्रिमंडल कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के प्रतिनिधियों को शामिल करने वाला था, जिससे सत्ता में साझेदारी और एक संक्रमणकालीन सरकार का निर्माण हो सके।
- मंत्रियों की सूची एवं विभाग
- कांग्रेस के सदस्य
- जवाहर लाल नेहरू – कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष, विदेशी मामले एवं राष्ट्रमंडल
- वल्लभ भाई पटेल – गृह, सूचना एवं प्रसारण
- बलदेव सिंह – रक्षा
- जान मथाई – उद्योग एवं आपूर्ति
- सी. राजगोपालाचारी – शिक्षा
- सी.एच. भाभा – कार्य, खान एवं बन्दरगाह
- राजेन्द्र प्रसाद – खाद्य एवं कृषि
- आसफ अली – रेलवे
- जगजीवन राम – श्रम
- मुस्लिम लीग के सदस्य
- लियाकत अली खाँ – वित्त
- आई.आई. चुन्दरीगर – वाणिज्य
- अब्दुल रब नश्तर – संचार
- जोगेन्द्र नाथ मंडल – विधि
- गजान्तर अली खाँ – स्वास्थ्य
- कांग्रेस के सदस्य
- महत्त्व
- यह ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र भारत की ओर पहला बड़ा प्रशासनिक कदम था।
- इसने विभाजन से पहले की राजनीतिक खींचतान और सहयोग दोनों को दर्शाया।
- यही मंत्रिमंडल आगे चलकर सत्ता हस्तांतरण (15 अगस्त 1947) की प्रक्रिया का आधार बना।
भारत में कुल 5 क्षेत्रीय परिषदें हैं।
- गठन एवं नेतृत्व : इनका गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
- अध्यक्ष : केंद्रीय गृहमंत्री या राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत कोई केंद्रीय मंत्री।
- उपाध्यक्ष : संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री, जो प्रतिवर्ष बदलते रहते हैं।
- क्षेत्रीय परिषदें और उनके सदस्य राज्य/केंद्रशासित प्रदेश
|
क्र. |
क्षेत्रीय परिषद |
सदस्य राज्य / केंद्रशासित प्रदेश |
|
1 |
उत्तरी क्षेत्रीय परिषद |
पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश; संघ राज्य क्षेत्र – चंडीगढ़, दिल्ली |
|
2 |
मध्य क्षेत्रीय परिषद |
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ |
|
3 |
पूर्वी क्षेत्रीय परिषद |
बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, असम, सिक्किम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम |
|
4 |
पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद |
गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा; संघ राज्य क्षेत्र – दमन एवं दीव, दादरा एवं नगर हवेली |
|
5 |
दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद |
आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु; संघ राज्य क्षेत्र – पुदुचेरी |
- मुख्य तथ्य (परीक्षा हेतु)
- कुल परिषदें : 5
- उद्देश्य : राज्यों के बीच सहयोग, समन्वय एवं विवाद निवारण।
- अध्यक्ष : केंद्रीय गृहमंत्री या राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत केंद्रीय मंत्री।
- उपाध्यक्ष : संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री (प्रतिवर्ष परिवर्तन)।
भारत में ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से झुकाव देखने को मिल रहा है। खासकर, पवन ऊर्जा ने भारत को हरित भविष्य की ओर अग्रसर किया है। 2025 तक भारत की स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 51.3 गीगावॉट तक पहुँच चुकी है, जो दुनिया में चौथे स्थान पर है। परंतु इसके पारिस्थितिकीय प्रभावों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
- प्रमुख पारिस्थितिकीय प्रभाव :
- पक्षियों की मृत्यु दर में वृद्धि : थार रेगिस्तान क्षेत्र में WII के अध्ययन में पाया गया कि पवन टर्बाइनों के चलते प्रति 1,000 वर्ग किमी पर 4,464 पक्षी प्रतिवर्ष मरते हैं।
- ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, जो पहले ही संकटग्रस्त प्रजाति है, टर्बाइनों और बिजली लाइनों से टकराव के कारण तेजी से घट रही है।
- पवन चक्कियों से उत्पन्न ध्वनि और कंपन जंगलों और जैव विविधता के क्षेत्रों में निवास करने वाले जीवों के व्यवहार पर प्रभाव डालते हैं।
- थार रेगिस्तान मध्य एशियाई फ्लाईवे (Central Asian Flyway- CAF) का हिस्सा है, जहाँ प्रवासी पक्षियों की आवाजाही अधिक होती है, जिससे यह क्षेत्र और भी अधिक संवेदनशील बन जाता है।
- अपतटीय (Offshore) पवन ऊर्जा के प्रभाव :
- समुद्र में लगने वाले टर्बाइनों से ध्वनि प्रदूषण डॉल्फ़िन, व्हेल और अन्य समुद्री जीवों की संचार और नेविगेशन क्षमता को नुकसान पहुँचाता है।
- तेल रिसाव, तलछट हटाने, और निर्माण प्रक्रिया समुद्री पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचा सकती है।
- पर्यावरणीय आकलन रिपोर्ट (EIA) कई बार केवल औपचारिकता भर होती है और वास्तविक प्रभावों का आकलन नहीं करती।
- संतुलन की दिशा में समाधान :
- बर्डलाइफ इंटरनेशनल द्वारा विकसित एक ओपन-सोर्स टूल एवियन सेंसिटिविटी टूल फॉर एनर्जी प्लानिंग (AVISTEP) जैसे उपकरणों का उपयोग उन क्षेत्रों की पहचान के लिये किया जा सकता है जहाँ पक्षियों पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है। यह टूल ऊर्जा परियोजनाओं की योजना बनाते समय पक्षी संरक्षण को ध्यान में रखने में मदद करता है।
- सभी पवन परियोजनाओं को पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के दायरे में लाना, ताकि वैज्ञानिक रूप से प्रभावों का मूल्यांकन हो सके।
- ‘शटडाउन ऑन डिमांड’ पद्धति अपनाई जाए, जिससे प्रवासी मौसम में टर्बाइन अस्थायी रूप से बंद किये जा सकें।
- सौर, पवन और बैटरी स्टोरेज को एकीकृत कर ऊर्जा उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाना।
भारत की पवन ऊर्जा यात्रा एक सकारात्मक बदलाव की मिसाल है, पर यह तभी स्थायी कही जा सकती है जब पारिस्थितिकीय संतुलन को प्राथमिकता दी जाए। स्मार्ट योजना, विज्ञान-आधारित नीति, और स्थानीय जैव विविधता के संरक्षण के साथ, यह नवीकरणीय स्रोत भारत को सही मायनों में हरित विकास की ओर ले जा सकता है।
भारतीय वन अधिनियम, 1927 में संशोधन करते हुए गैर-वन क्षेत्रों में उगाए जाने वाले बांस को वृक्ष की परिभाषा के दायरे से बाहर कर दिया गया। परिणामस्वरूप गैर-वन क्षेत्रों में बांस कटाई और परिवहन के लिये अब किसी भी परमिट की आवश्यकता नहीं होगी। बांस किसानों को बड़े पैमाने पर पारिस्थितिक व आर्थिक लाभ तथा आजीविका के अवसर प्रदान कराता है। ध्यातव्य है कि वर्गीकरण विज्ञान (Taxonomy) के तहत बांस को घास के रूप में वर्गीकृत किया गया है, किंतु पूर्ववर्ती अधिनियम में इसे वृक्ष की परिभाषा में शामिल करने से इसके लिये पारगमन परमिट की आवश्यकता होती थी, भले ही यह निजी भूमि पर उगाया जाता हो। वन अधिकार अधिनियम, 2006 में बांस को गैर-इमारती वनोपज के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जबकि वन अधिनियम में इसे इमारती लकड़ी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भारतीय वन संशोधन अधिनियम, 2017 से यह विसंगति दूर हुई है।
प्रमुख बिंदु
- यह अधिनियम बांस के पेड़ों को काटने या इसकी ढुलाई के लिये अनुमति हासिल करने से छूट प्रदान करता है। अधिनियम की धारा 2 की उपधारा से बांस शब्द को हटा दिया गया है।
- इससे गैर-वन भूमि पर बांस के वृक्षारोपण और रोज़गार को बढ़ावा मिलेगा तथा गांवों और छोटे शहरों में लघु व मध्यम उद्योगों के विकास को प्रोत्साहित किया जा सकेगा। इस प्रकार चीन एवं वियतनाम जैसे देशों से आयात पर निर्भरता भी कम होगी।
- वन क्षेत्रों में उगाए गए बांस को वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के प्रावधानों द्वारा प्रशासित किया जाएगा।
- सरकार गैर-वन क्षेत्रों में बांस वृक्षारोपण को प्रोत्साहित कर 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने और देश में हरित आवरण (Green Cover) को बढ़ाने के दोहरे उद्देश्य को प्राप्त करना चाहती है।
- भारत में उपलब्ध खेती योग्य व्यर्थ 12.6 मिलियन हेक्टेयर भूमि में खेती के लिये यह एक व्यवहार्य विकल्प सिद्ध हो सकता है।
कृषि में हरी खाद उस सहायक फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्त्वों को बढ़ाने तथा उसमें जैविक पदार्थों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। प्रायः इस तरह की फसल को इसकी हरियाली की स्थिति में हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। हरी खाद से भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ती है। मृदा के लगातार दोहन से उसमें उपस्थित पौधे की वृद्धि के लिये आवश्यक तत्त्व नष्ट होते जा रहे हैं। इनकी क्षतिपूर्ति हेतु व मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने के लिये हरी खाद एक उत्तम विकल्प है। बिना सड़े-गले हरे पौधे (दलहनी एवं अन्य फसलों अथवा उनके भाग) को जब मृदा की नाइट्रोजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता है तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं। हरी खाद के उपयोग से भूमि में न सिर्फ नाइट्रोजन उपलब्ध होता है बल्कि मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक दशा में भी सुधार होता है। इससे भूमि में न सिर्फ सूक्ष्म तत्त्वों की आपूर्ति होती है बल्कि साथ ही मृदा की उर्वरा शक्ति भी बेहतर हो जाती है।
हरी खाद के लाभ
- हरी खाद केवल नाइट्रोजन व कार्बनिक पदार्थों का ही स्रोत नहीं है बल्कि इससे मृदा को कई अन्य आवश्यक पोषक तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
- हरी खाद के प्रयोग से मृदा भुरभुरी, वायु संचार में अच्छी, जलधारण क्षमता में वृद्धि, अम्लीयता/क्षारीयता में सुधार एवं मृदा क्षरण में भी कमी होती है।
- हरी खाद के प्रयोग से मृदा में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता बढ़ती है तथा मृदा की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है।
- हरी खाद से मृदाजनित रोगों में भी कमी आती है।
- इसके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों में कमी करके भी टिकाऊ खेती कर सकते हैं।
हरी खाद वाली फसलें
हरी खाद के लिये दलहनी फसलों में सनई (सनहेंप) ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग, ग्वार आदि फसलों का उपयोग किया जाता है। इस फसलों की वृद्धि शीघ्र व कम समय में हो जाती है, पत्तियां वज़नदार एवं संख्या में अधिक संख्या में रहती हैं एवं इनको उर्वरक तथा जल की आवश्यकता कम होती है, जिससे कम लागत में अधिक कार्बनिक पदार्थ प्राप्त हो जाता है। दलहनी फसलों की जड़ों में नाइट्रोजन को वातावरण से मृदा में स्थिर करने वाले जीवाणु पाए जाते हैं।
आदर्श हरी खाद फसल के गुण
हरी खाद के मुख्य चार गुण हैं-
- उगाने में न्यूनतम खर्च।
- न्यूनतम सिंचाई, कम से कम पादप संरक्षण।
- खरपतवारों को दबाते हुए जल्दी बढ़त प्राप्त करने तथा विपरीत परिस्थितियों में उगने की क्षमता।
- कम समय में अधिक मात्रा में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है।
जलवायु दबाव, जलवायु तंत्र के अंतर्गत वे कारक होते हैं, जिनकी वृद्धि या कमी से जलवायु तंत्र पर सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जलवायु दबाव द्वारा पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। ये दबाव प्राकृतिक एवं मानव जनित दोनों होते हैं-
प्राकृतिक दबाव
- सूर्य द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा की मात्रा में बदलाव।
- पृथ्वी की कक्षा में बहुत धीमा परिवर्तन।
- ज्वालामुखीय उद्गार।
मानव प्रेरित दबाव
- हरित गृह गैसों का उत्सर्जन।
- जीवाश्म ईंधन के जलने से एरोसॉल का उत्सर्जन।
- भूमि उपयोग में परिवर्तन, जैसे- निर्वनीकरण आदि।
जलवायु दबाव के प्रकार
जलवायु दबाव दो प्रकार के होते हैं-
- सकारात्मक दबाव- सकारात्मक दबाव का प्रयास पृथ्वी को गर्म करना होता है। जैसे- सूर्य के प्रकाश में वृद्धि तथा हरित गृह गैसों के कारण पृथ्वी का गर्म होना।
- नकारात्मक दबाव- नकारात्मक दबाव द्वारा पृथ्वी ठंडी होती है। जैसे- अत्यधिक बड़े ज्वालामुखीय उद्गार उत्सर्जन द्वारा वातावरणीय एरोसॉल एवं जीवाश्म ईंधन के दहन द्वारा उत्सर्जित एरोसॉल से पृथ्वी ठंडी होती है।
जलवायु दबाव को प्रभावित करने वाले कारक
- एरोसॉल (Aerosol)- एरोसॉल वातावरण में सूक्ष्म कण होते हैं, जो जल, बर्फ, राख, खनिज, धूल या अम्लीय बूँदों आदि से बने होते हैं। वातावरणीय एरोसॉल के अंतर्गत ज्वालामुखीय धूल, जीवाश्म ईंधनों के दहन से उत्सर्जित राख एवं वनों के जलने से निर्मित कण आदि सभी आते हैं। एरोसॉल का सामान्य गुण नकारात्मक दबाव (Negative Forcing) वाला होता है परंतु कुछ भारी प्रकार के एरोसॉल सकारात्मक दबाव (Positive Forcing) भी प्रदर्शित करते हैं।
- प्राकृतिक एरोसॉल- ज्वालामुखीय उद्गार द्वारा प्राकृतिक रूप से एरोसॉल का निर्माण होता है जो कि वातावरण को ठंडा करते हैं। कभी-कभी बड़े ज्वालामुखीय उद्गार द्वारा वातावरण के शीतल होने का प्रभाव (1 वर्ष या उससे अधिक भी) तब तक रहता है जब तक कि वातावरण से सल्फेट कण निकलकर नीचे न बैठ जाएँ।
- मानव जनित हरित गृह गैस- मानव जनित हरित गृह गैसें सकारात्मक जलवायु दबाव के अंतर्गत आती हैं। जीवाश्म ईंधन के जलने से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड अकेले जलवायु दबाव का सबसे बड़ा कारक है, जो कि पूर्व-औद्योगिक युग से कुल सकारात्मक दबाव के आधे से अधिक हेतु ज़िम्मेदार है।
- मृदामंडल में उपस्थित जल की मात्रा तथा उसकी गुणवत्ता उसमें रहने वाले पौधों तथा जंतुओं को प्रभावित करती है। यह मृदा में स्थित पोषक तत्त्वों को घोलकर मृदा घोल (Soil Solution) बनाने में मदद करता है।
- मृदा में स्थित जल की मात्रा का निर्धारण, जलवर्षा तथा हिमद्रवित जल के मृदा में अंतःसंचरण (Infiltration) की दर तथा मृदा की जलधारण करने की क्षमता (Water Retention Capacity) के आधार पर किया जाता है।
- मृदा के आयतन के संदर्भ में स्थित जल की मात्रा के आधार पर मृदा में ठोस पदार्थों, जल तथा वायु के अनुपातों की तीन दशाओं का निर्धारण इस प्रकार किया गया है-
- संतृप्त अवस्था (Saturated Stage)- इस अवस्था में मृदा में स्थित खाली स्थान जल से भरे होते हैं एवं ऐसी मिट्टी अतिरिक्त जल की मात्रा नहीं सोख पाती है।
- भूमि क्षमता अवस्था (Field Capacity Stage)- जब मृदा में स्थित कुल खाली स्थानों का 50% जल द्वारा तथा शेष 50% भाग वायु द्वारा भरा होता है तो यह भूमि क्षमता अवस्था कहलाती है।
- म्लान अवस्था (Wilting Stage)- जब मृदा में वाष्पीकरण एवं पौधों द्वारा मृदा-जल को ग्रहण करने के बाद जल का अभाव हो जाता है तो यह म्लान अवस्था कहलाती है। इस अवस्था में पौधे जल के अभाव में मुरझा जाते हैं।
- संयुक्त अवस्था एवं म्लान अवस्था दोनों ही मृदा जीवों तथा पौधों के लिये प्रतिकूल होती हैं। इस प्रकार भूमि क्षमता अवस्था तथा म्लान अवस्था के बीच की स्थिति मृदा स्थित पौधों तथा जंतुओं के लिये सर्वाधिक अनुकूल होती है।
- मृदा में पाया जाने वाला जल निम्नलिखित प्रकार का होता है-
- गुरुत्वीय जल (Gravitational Water)- वर्षा के बाद मृदा के धरातलीय परत के तात्कालिक रूप से संतृप्त होने के पश्चात् यह जल गुरुत्वाकर्षण के कारण काफी गहराई अथवा भूमि जल स्तर तक पहुँच जाता है, इसे गुरुत्वीय जल कहते हैं। इस जल को पौधे अपनी जड़ों द्वारा प्राप्त नहीं कर पाते।
- केशिका जल (Capillary Water)- जब धरातलीय जल मृदा की ऊपरी सतह से रिस कर नीचे आता है तब वह पीछे पर्याप्त मात्रा में मिट्टी के कणों के बीच के रिक्त स्थानों में नमी छोड़ आता है, जो केशिका जल कहलाता है। यह पृष्ठ तनाव बलों (Surface Tension Forces) द्वारा बरकरार बने रहता है तथा गुरुत्व खिंचाव से प्रभावित नहीं होता। यह जल पौधों की जड़ों द्वारा आसानी से अवशोषण हेतु उपलब्ध होता है।
- आर्द्रता जल (Hygroscopic Water)- मिट्टी कणों के चारों तरफ पतली वाष्पीय परत के रूप में मृदा द्वारा कसकर पकड़े हुए जल को आर्द्रता जल कहते हैं। इस जल को भी पौधे जड़ों द्वारा अवशोषित नहीं करते।
- रसायन युक्त या रवे का जल (Chemically or Crystalline Combined Water)- जो जल मृदा खनिजों की संरचना में रासायनिक रूप से संबद्ध रहता है उसे रसायन युक्त या रवे का जल कहते हैं। यह जल भी पौधों को प्राप्त नहीं हो पाता है।
ये दोनों तरह के कार्बन, कार्बन सिंक की भूमिका निभाते हैं। काले एवं भूरे कार्बन से अलग ग्रीन एवं ब्लू कार्बन वातावरण से हरित गृह गैसों के अधिग्रहण (Sequestration) का कार्य करते हैं।
- ग्रीन कार्बन (Green Carbon)- प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा वातावरण के CO2 से जो कार्बन निकलकर पौधों एवं मिट्टी में संगृहीत हो जाता है, ग्रीन कार्बन कहलाता है। यह वैश्विक कार्बन चक्र का जीवंत भाग है। पौधों एवं फसलों में यह कार्बन लघु जीवन अवधि के कारण थोड़े समय के लिये रहता है एवं कुछ समय बाद वे इस कार्बन को मुक्त कर देते हैं परंतु वन के बायोमास इस कार्बन को कई सदियों तक संचित किये रहते हैं।
- ब्लू कार्बन (Blue Carbon)- वायुमंडलीय कार्बन जब तटीय एवं समुद्री पारितंत्रों के मैंग्रोव वन, समुद्री घास बेडों एवं अंतर्ज्वारीय लवण दलदलों में जमा हो जाते हैं तो वह कार्बन, ब्लू कार्बन कहलाने लगता है। ये बहुमूल्य पारितंत्र एक जटिल कार्बन भंडार को एकत्रित किये रहते हैं। वे वातावरणीय CO2 को प्राथमिक उत्पादक के द्वारा अधिग्रहीत कर फिर उन्हें अवसादों में जमा कर देते हैं।
- UNEP द्वारा वर्ष 2009 में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 55% वातावरणीय कार्बन को समुद्र के द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है। इसका 50-71% समुद्री वनस्पति द्वारा ग्रहण किया जाता है। ये समुद्री वनस्पति ही ब्लू कार्बन आवास (Blue Carbon Habitat) कहलाए, जिनमें मैंग्रोव, लवणीय दलदल (Salt Marshes), समुद्री घास (Sea Grass) एवं समुद्री खरपतवार (Sea Weeds) आते हैं, जो कि समुद्र नितल (Sea Bed) का 0.5% से भी कम आच्छादन करते हैं एवं ये विश्व के जलवायु परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। UNEP की इस रिपोर्ट के बाद IUCN, विश्व बैंक जैसे संस्थानों की भी इससे संबंधित रिपोर्ट आई। उसके बाद UNEP की पहल से ब्लू कार्बन पहल (Blue Carbon Initiative) शुरू की गई।
प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का ज़मीन या जल में इकट्ठा होना प्लास्टिक प्रदूषण कहलाता है। इससे वन्य जंतुओं या मानवों के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
प्लास्टिक के प्रकार (Types of Plastic)
1. सूक्ष्म प्लास्टिक अथवा माइक्रोबीड्स (Micro Plastic or Microbeads)
- 5 मिमी. या उससे कम आकार की प्लास्टिक के अंश या रेशे सूक्ष्म प्लास्टिक या माइक्रोबीड्स कहलाते हैं।
- इनका निर्माण पॉलिथीन, पॉली प्रोपीलीन, पॉलिथिलीन टेरेफ्थेलेट और नायलॉन से होता है।
- इनका प्रयोग फेशवॉश, बॉडीलोशन, टूथपेस्ट, साबुन, स्क्रब जैसे उत्पादों में होता है। ये अजैवनिम्नीकरणीय होते हैं।
- ये सीवर से बहकर सागरों एवं महासागरों में पहुँच जाते हैं जिससे समुद्री पारितंत्र को खतरा उत्पन्न हो जाता है।
2. दीर्घ प्लास्टिक (Macro Plastic)
- 5 मिली. से अधिक तथा 20 मिली. से कम आकार की प्लास्टिक के अंश दीर्घ प्लास्टिक कहलाते हैं।
- दीर्घ प्लास्टिक के अंश भी समुद्री पारितंत्र के लिये अत्यधिक हानिकारक हैं।
भारत में प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution in India)
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, “हम प्लास्टिक के बम पर बैठे हुए हैं।” ऐसा उच्चतम न्यायलय ने CPCB (Central Pollution Control Board) की रिपोर्ट के आधार पर कहा, जिसमें बताया गया है कि भारत प्रत्येक वर्ष 56 लाख टन प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न करता है जिसमें भारत की राजधानी दिल्ली अकेले 689.5 टन प्लास्टिक उत्पादन के लिये ज़िम्मेदार है।
प्लास्टिक के स्रोत (Sources of Plastic)
- Chips & Confectionary Bags- 18.6%
- Bottles/Caps Lids- 11.9%
- PET Beads- 10%
- Supermarket/Retail Bags- 7.4%
- Straws- 7.0%
- Garbage Bags- 6.7%
- Packaging- 6.7%
- Food Bags- 5.2%
- Cling Wrap- 4.0%
- Fruit Juice Bottles- 3.4%
- Water/Soft Drink Bottles- 2.6%
- Cups/Utensils- 2.2%
- Food Containers- 1.7%
- Milk Bottles- 1.6%
- 6 Pack Rings- 1.4%
- Cigarette- 1.2%
प्लास्टिक प्रदूषण के प्रभाव
प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव मानव, जलीय जीव, भूमि तथा पर्यावरण पर पड़ता है। प्लास्टिक प्रदूषण एक विकत समस्या का रूप धारण करता जा रहा है। समुद्र में प्लास्टिक प्रदूषण के कारण बहुत से जानवरों की मृत्यु हो रही है तथा बहुत-सी प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो रहा है। प्लास्टिक को जलाने पर हानिकारक गैस वातावरण में फैलती हैं।
- पर्यावरण पर प्रभाव- प्लास्टिक मलबा हवा, समुद्री तरंग, व्यापर मार्ग, शहरी क्षेत्र आदि के कारण अत्यधिक बढ़ रहा है।
- भूमि पर प्रभाव- प्लास्टिक प्रदूषण भूमि पर रासायनिक एवं भौतिक दोनों कारणों से होता है। प्लास्टिक भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी करता है क्योंकि यह खनिज, जल, पोषक तत्त्वों के अवशोषण में अवरोधक का कार्य करता है।
- जल एवं वायु पर प्रभाव- प्लास्टिक के दहन से बहुत सी ज़हरीली गैसें वायुमंडल में पहुँचती हैं, जैसे- कार्बन मोनोऑक्साइड, डाइऑक्सीन (Dioxin), हाइड्रोजन साइनाइड। प्रदूषित वायु श्वसन, तंत्रिका-तंत्र तथा इम्यून क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। पानी में प्लास्टिक युक्त कचरा डालने पर यह आसानी से मनुष्य के खाद्यजाल में पहुँच जाता है और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है।
- समुद्री पर्यावरण पर प्रभाव- प्लास्टिक मलबे का प्रभाव समुद्री पारितंत्र पर भी पड़ता है। बहुत से जलीय पक्षी व जंतु प्लास्टिक के अंतर्ग्रहण से मर जाते हैं। पक्षी, कछुए, सील एवं व्हेल आदि द्वारा प्लास्टिक को भोजन समझकर खा लिया जाता है जिससे यह उनके शरीर में अटक जाता है और विषैला प्रभाव डालता है।
समुद्र पृथ्वी पर विशालतम जलीय निकाय हैं। पिछले कुछ दशकों से मानवीय क्रियाओं के कारण समुद्र गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। मानव द्वारा समुद्र में हानिकारक पदार्थों, जैसे- प्लास्टिक, औद्योगिक एवं कृषि अपशिष्टों, तेल एवं रासायनिक पदार्थों के निक्षेपण से समुद्र प्रदूषित हुए हैं।
समुद्री प्रदूषण के कारण
- नदियों एवं वर्षा जल द्वारा लाया गया सीवेज, कृषि अपशिष्ट, कूड़ा-करकट, कीटनाशक एवं उर्वरक, भारी धातुएं, प्लास्टिक आदि समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित करते हैं।
- समुद्र में तेल एवं पेट्रोलियम पदार्थों का विसर्जन एवं रेडियोएक्टिव अपशिष्टों की डंपिंग से भी समुद्री प्रदूषण में वृद्धि होती है।
- विषाक्त रसायन एवं भारी धातुएँ, जो औद्योगिक अपशिष्टों के साथ आकर समुद्र में मिल जाती हैं, समुद्री पारिस्थितिकी को नष्ट करती हैं।
- वहां गहरे सागर एवं सागर तल में खनन से भारी धातुओं का जमाव हो जाता है। इसके कारण उस स्थान पर विषाक्त प्रभाव पड़ता है एवं सागरीय पारिस्थितिक तंत्र के लिये स्थायी एवं गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाता है।
- वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप अम्ल वर्षा होती है। यह अम्ल वर्षा समुद्र में हो तो समुद्री जीवों की मृत्यु हो जाती है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण सागरीय जल का तापमान भी बढ़ रहा है जिससे सागरीय जल की जैव विविधता का ह्रास हो रहा है।
समुद्री प्रदूषण के प्रभाव
- तेल आप्लाव/तेल रिसाव (Oil Spills) सागरीय जीवों के गिल्स (Gills) एवं पंखों पर आवरण बनाकर उनके श्वसन एवं गति में बाधा उत्पन्न करते हैं।
- तेल रिसाव के कारण सागरीय जीव प्रवाल (Coral) के छिद्र बंद हो जाने से उनकी मृत्यु हो जाती है। प्रवाल भित्ति जैव विविधता से संपन्न होती है, अतः प्रवाल की मृत्यु से वहां की जैव विविधता नष्ट होने लगती है।
- समुद्री प्रदूषकों के अपघटन में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। प्रदूषकों के कारण सागरीय जल में ऑक्सीजन का स्तर गिर जाता है। जिसके परिणामस्वरूप, सागरीय जीवों की संख्या में कमी आती है।
- कुछ विशेष औद्योगिक एवं कृषि कार्य में प्रयुक्त होने वाले कीटनाशक एवं उर्वरक सागरीय जल में पहुंचकर सागरीय जीवों के वसा ऊतकों में संगृहीत होकर उनकी जनन क्षमता पर नकारात्मक असर डालते हैं। इससे उनकी संख्या में तीव्रता से कमी आती है।
- ये प्रदूषक सागरीय जीवों के शरीर में जमा हो जाते हैं। इस प्रकार ये खाद्य शृंखला में प्रवेश कर जाते हैं, जिसके कारण इन जीवों के सेवन से मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
- विषैली धातु, प्रदूषित जल, अपशिष्ट तथा उर्वरकों का अप्रवाह नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस की मात्रा को बढ़ा देता है।
- नाइट्रोजन की अधिक मात्रा शैवाल की तीव्र वृद्धि करती है जो कि सूर्या के प्रकाश को रोकती है जिससे उपयोगी समुद्री घास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
कार्बन के प्रबंधन का एक नया तरीका कार्बन अधिग्रहण (Carbon Sequestration) है जो काफी प्रचलित एवं सक्षम साबित हो रहा है। वैश्विक जलवायु परिवर्तन में कमी लाने हेतु कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) या कार्बन के अन्य रूपों को ग्रहण (Capture) कर उन्हें लंबे समय तक संगृहीत (Store) करके रखना, कार्बन अधिग्रहण कहलाता है। इसे हम CCS (Carbon Capture and Storage) के नाम से भी जानते हैं। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड को भू-अभियांत्रिकी (Geo-Engineering) द्वारा पॉवर स्टेशन, औद्योगिक स्थल एवं यहाँ तक कि सीधे हवा से पकड़कर भूमि के नीचे संगृहीत कर दिया जाता है। इस प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड की बड़ी मात्रा को वायुमंडल में मिलने से रोका जाता है। इस तरह कार्बन डाइऑक्साइड कार्बन सिंक में संगृहीत हो जाती है।
कोई भी चीज को कार्बन को छोड़ने से ज़्यादा उसे अवशोषित करे उसे कार्बन सिंक कहते हैं। यह 2 प्रकार का होता है-
- प्राकृतिक सिंक (Natural Sink): समुद्र, वन, मृदा।
- कृत्रिम सिंक (Artificial Sink): विघटित तेल भंडार (Depleted Oil Reserves), अखननीय खदान।
कार्बन कैप्चरिंग का कार्य कई वर्षों से विभिन्न क्षेत्रों में हो रहा है। तेल एवं गैस उद्योग, तेल एवं गैस की पुनर्प्राप्ति हेतु कई दशकों से कार्बन कैप्चरिंग का प्रयोग करते आ रहे हैं। आजकल इस कार्बन कैप्चरिंग का प्रयोग पर्यावरण संरक्षण के लिये किया जा रहा है, इस कारण यह चर्चा का विषय बन गया है। कार्बन अधिग्रहण में मुख्यतः 3 चरण होते हैं-
- पकड़ना एवं अलग करना (Trapping and Separating): इसमें CO2 को दूसरी गैसों से अलग करते हैं।
- परिवहन (Transportation): इसमें पकड़े गए CO2 को संग्रहण स्थल (Storage Location) तक परिवहित करते हैं।
- संग्रहण (Storage): वातावरण से दूर भूमि के नीचे या समुद्र में कार्बन डाइऑक्साइड को संगृहीत कर देते हैं।
पॉवर प्लांट से कार्बन डाइऑक्साइड को कैप्चर करने के तीन तरीके हैं-
- ईंधन के जलने से पहले (Pre-Combustion)
- यह सबसे जटिल प्रौद्योगिकी है।
- इसमें हाइड्रोजन का उत्पादन, माध्यमिक उत्पाद के तौर पर होता है। इसमें अभी और अधिक विकास की आवश्यकता है।
- ईंधन के जलने के बाद (Post-Combustion)
- यह सबसे महंगी प्रौद्योगिकी है परंतु बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रूप से उपलब्ध है।
- ऑक्सीफ्यूल (Oxyfuel)
- इसमें ईंधन को पर्याप्त ऑक्सीजन में जलाया जाता है एवं परिणामस्वरूप निकली हुई सभी गैसों को जमा किया जाता है।
- यह सबसे सस्ता है।
- प्रतियोगी रूप से काफी अच्छा है एवं कोल के लिये पसंदीदा प्रौद्योगिकी है, परंतु इसमें अभी और विकास की आवश्यकता है।
मौसम में परिवर्तन एवं प्रतिकूल दशाओं (Adverse Condition) के कारण पक्षी एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं। कुछ पक्षियों की यह प्रवृत्ति होती है कि प्रतिकूल स्थिति में वे अपना स्थान बदलकर अनुकूल स्थिति वाले क्षेत्रों में पलायन कर जाते हैं और स्थिति के ठीक होने पर मूल स्थान पर लौट आते हैं। ये हज़ारों किमी. दूर तक प्रवास कर जाते हैं। कुछ पक्षी ग्रीष्म ऋतु में तो कुछ शीत ऋतु में प्रवास करते हैं।
प्रवास के कारण (Reasons for Migration)
- प्रतिकूल जलवायु दशाओं के कारण।
- भोजन तथा पानी में कमी होने पर उसकी पूर्ति के लिये आवास परिवर्तन।
- प्रजनन तथा स्वास्थ्य दशाओं के लिये।
- घोंसलों को अतिक्रमणकारी जंतुओं से बचाने के लिये।
शीत ऋतु में प्रवास करने वाले पक्षी
साइबेरियन क्रेन (Siberian Crane), ग्रेटर फ्लेमिंगो (Greater Flamingo), यूरेशियन टील (Eurasian Teal), पीली वागटेल (Yellow Wagtail), सफेद वागटेल (White Wagtail), उत्तरी शॉवेलर (Northern Shoveler), रोज़ी पेलिकन (Rosy Pelican), वुड सैंडपाइपर (Wood Sandpiper), चित्तीदार सैंडपाइपर (Spotted Sandpiper), यूरेशियन कबूतर (Eurasian Pigeon)।
ग्रीष्म ऋतु में प्रवास करने वाले पक्षी
एशियाई कोयल, यूरोपियन सुनहरी ओरियोल, कॉम्ब डक (Comb Duck), कूकूस (Cuckoos), नीली पूँछ वाली मक्खी भक्षी (Blue Tail Bee-eater)।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 (Solid Waste Management Rules, 2016) ने वर्ष 2000 में अधिसूचित किये गए म्युनिसिपल ठोस अपशिष्ट (प्रबंधन एवं निपटान) नियम का स्थान लिया है।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अनुसार स्रोत पर ही सूखे कचरे और गीले कचरे को अलग करना होगा।
- इस नियम का प्रभाव सभी स्थानीय निकायों एवं नगरीय संकुलों (Urban Agglomerations) पर होगा।
- इसके तहत प्रदूषणकर्त्ता को संपूर्ण अपशिष्ट को तीन प्रकारों यथा- जैव निम्नीकरणीय, गैर-जैव निम्नीकरणीय एवं घरेलू खतरनाक अपशिष्टों के रूप में वर्गीकृत कर इन्हें स्थानीय निकाय द्वारा निर्धारित अपशिष्ट संग्रहकर्त्ता को ही देना होगा।
- स्थानीय निकायों द्वारा निर्धारित यूज़र्स शुल्क का भुगतान प्रदूषणकर्त्ता द्वारा किया जाएगा। ये शुल्क स्थानीय निकायों द्वारा निर्मित विनियमों से निर्धारित किये जाएँगे।
- इसके अतिरिक्त, इस नियम के अंतर्गत विभिन्न पक्षकारों यथा- भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों जैसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय, रसायन उर्वरक मंत्रालय, कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय, ज़िला मजिस्ट्रेट, ग्राम पंचायत, स्थानीय निकाय, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड आदि के कर्त्तव्यों का उल्लेख भी किया गया है।
- स्थानीय निकायों के भी कुछ उत्तरदायित्व जैसे- घर-घर से अपशिष्ट संग्रहण, विनियमन निर्माण, यूज़र्स शुल्क निर्धारण तथा बायोमिथनेशन, माइक्रोबियल कंपोस्टिंग, वर्मी कंपोस्टिंग जैसी तकनीकों को अपनाना निर्धारित किये गए हैं।
- हाइपरलूप विद्युत चुंबकीय शक्ति पर आधारित परिवहन तकनीक है, जिसके तहत मेट्रो की तर्ज़ पर ही बड़े-बड़े खंभों के ऊपर (एलीवेटेड) पारदर्शी ट्यूब बिछाई जाती है। इस ट्यूब के भीतर पॉड में सफ़र किया जाता है। इस तकनीक को हाइपरलूप इसलिये कहा गया क्योंकि इसमें परिवहन एक लूप के माध्यम से होगा जिसकी स्पीड 600-700 मील/घंटा या इससे अधिक होगी। ध्यातव्य है कि इस प्रणाली में प्रयुक्त ट्यूब मोड्यूलर ट्रांसपोर्ट सिस्टम की परिकल्पना पर आधारित है जो लगभग घर्षण से मुक्त होता है।
- परिवहन के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले हाइपरलूप का कॉन्सेप्ट एलन मस्क ने दिया। हाइपरलूप प्रणाली परिवहन के पांचवे मोड (भूमि, जल, वायु, पाइपलाइन एवं हाइपरलूप) के रूप में जानी जा रही है।
- हाल ही में रिचर्ड ब्रानसॉन के नेतृत्व वाले लंदन स्थित वर्जिन ग्रुप ने हाइपरलूप परिवहन प्रणाली के विकास के लिये महाराष्ट्र सरकार के साथ समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं। इसका मूल उद्देश्य औद्योगिक राजधानी मुंबई और पुणे के बीच यातायात की वर्तमान 3 घंटे की अवधि को कम करना है। इस दिशा में हाइपरलूप परिवहन प्रणाली लगभग 20 मिनट में यह दूरी तय कर लेगी।
लाभ (Advantages)
- हाइपरलूप प्रणाली समय और धन की बचत के लिये अति उपयोगी सिद्ध होगी। साथ ही, उत्सर्जन एवं ध्वनि प्रदूषण जैसी समस्याओं से भी निजात मिल जाएगी।
- इस प्रणाली में पॉड की आवृत्ति बढ़ाने से अधिक संख्या में यात्रियों को यात्रा कराई जा सकती है, जो लगभग वर्ष में 150 मिलियन यात्रियों की संख्या हो सकती है।
- इस प्रणाली का जहाँ प्रबंधन करना सरल है, वहीं यह यातायात प्रणाली यातायात जाम से भी निजात दिलाने में सहायक होगी।
- समुद्री जैव प्रौद्योगिकी के अंतर्गत विभिन्न समुद्री जीवों की खोज तथा उनका उपयोग कर मानव उपयोगी उत्पादों को विकसित करना शामिल है। दूसरे शब्दों में, समुद्री जैव प्रौद्योगिकी के तहत वे सभी प्रयास शामिल हैं, जिनमें जैविक समुद्री संसाधनों को जैव प्रौद्योगिकी के स्रोत के रूप में मानव लाभ के लिये उपयोग किया जाता है।
- समुद्री जैव प्रौद्योगिकी और जैव-विविधता ने वैज्ञानिकों को समुद्री जीवों के विकास और उनसे जुड़े महत्त्वपूर्ण पहलुओं को समझने में सुविधा प्रदान की है। चूँकि समुद्री जीव समुद्र के भीतर, प्रकाश की अनुपस्थिति, अधिक तापमान और दबाव में विकसित होते हैं, इसलिये वैज्ञानिकों ने इनकी मदद से विशिष्ट प्रकार की दवाओं और एंजाइमों को तैयार करने में सफलता हासिल की है।
- समुद्री जैव प्रौद्योगिकी पर बढ़ते शोध ने बहुत-सी दवाओं के विकास को संभव बनाया है। कैरिबियाई समुद्री जीवों की मदद से बनाई गई एंटी-वायरल दवाएं, जैसे- Zovirax (Generic Name- Acyclovir), आदि पहले ही काफी सफल साबित हो चुकी हैं।
समुद्री जैव प्रौद्योगिकी के कुछ अनुप्रयोग
- समुद्री जीवों (समुद्री शैवालों, अकशेरुकियों अर्थात् बिना रीढ़ वाले जीव) आदि ने बहुत-सी नई दवाओं के विकास को संभव बनाया है। इससे कैंसर के इलाज में भी कुछ सफलता मिली है।
- मछलियों और अन्य समुद्री जीवों से मिलने वाले एंजाइम खाद्य प्रसंस्करण में उपयोग होने वाले परंपरागत एंजाइमों से ज्यादा प्रभावी और फायदेमंद होते हैं। मछलियों से मिलने वाले Collagens और Gelatin प्रोटीन अपेक्षाकृत कम तापमान पर खाद्य पदार्थों को सुरक्षित रखने में समर्थ होते हैं।
- समुद्र में पाए जाने वाले अतिसूक्ष्म शैवालों से ऐसे बायोपॉलिमर्स का निर्माण संभव है, जो तेल निष्कर्षण की प्रक्रिया में मदद करते हैं।
- हिंद महासागर में पाया जाने वाला Dolastatin ब्रेस्ट कैंसर और अन्य प्रकार के कैंसर के इलाज में बहुत उपयोगी साबित हुआ है।
मैंग्रोव वनों के भौगोलिक वितरण को नियंत्रित करने वाला मुख्य कारक वहां का तापमान है। विषुवत रेखा के आस-पास के क्षेत्रों में जहाँ जलवायु गर्म और नम होती है, वहां मैंग्रोव वनस्पतियों की लगभग सभी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। मैंग्रोव वनस्पति विश्व के लगभग 123 देशों में पाई जाती है, जिनमें से अधिकतर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में स्थित हैं। विश्व का लगभग 40% मैंग्रोव कवर दक्षिण-पूर्व एशिया व दक्षिण एशिया में मौजूद है। विश्व में पाए जाने वाले 4 मुख्य प्रकार के मैंग्रोव पौधों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
- लाल मैंग्रोव (Red Mangroves)- लाल मैंग्रोव की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जो बहुत अधिक खारे पानी को सहन करने की क्षमता रखते हैं तथा समुद्र के नज़दीक उगते हैं। इनमें भी अन्य मैंग्रोव पौधों की तरह विशेष रूपांतरित जड़ें होती हैं जो तने के निचले भाग से निकलकर धरती तक पहुँचती हैं और पौधे को स्थिरता प्रदान करती हैं। इसलिये इन्हें स्थिर जड़ें कहते हैं। ये जड़ें पौधे को ऐसे स्थान पर उगने की क्षमता प्रदान करती हैं जहाँ भूमि में ऑक्सीजन कम होती है। इन्हीं जड़ों से पौधे वातावरण से हवा का आदान-प्रदान व भूमि से पोषक तत्त्वों को प्राप्त करते हैं।
- काले मैंग्रोव (Black Mangroves)- काले मैंग्रोव वनस्पति (कच्छ वनस्पति) की श्रेणी में वे पौधे आते हैं जिनकी खारे पानी को सहने की क्षमता अधिक होती है। इन पौधों में विशेष प्रकार की श्वसन जड़ें पाई जाती हैं जो दलदल में उगने वाले पौधों में देखी जाती हैं। इन जड़ों में गैसों के आदान-प्रदान के लिये विशेष प्रकार की संरचनाएँ होती हैं जिन्हें वातरंध्र (लैंटिकल्स) कहते हैं। इनमें हवा का प्रवेश वायवमूलों (न्यूमेटोफोर्स) से होता है।
- सफेद मैंग्रोव (White Mangroves)- सफेद मैंग्रोव का नाम इनकी चिकनी सफेद छाल के कारण पड़ा है। इन पौधों को इनकी जड़ों तथा पत्तियों की विशेष प्रकार की बनावट के कारण अलग से पहचाना जाता है।
- बटनवुड मैंग्रोव (Buttonwood Mangroves)- ये झाड़ी के आकार के पौधे होते हैं तथा इनका यह नाम इनके लाल-भूरे रंग के तिकोने फलों के कारण है। यह सफेद मैंग्रोव के परिवार के ही अंग हैं एवं कुछ वैज्ञानिक इसे वास्तविक मैंग्रोव नहीं मानते।
कुछ तत्त्वों के नाभिकीय विखंडन के कारण अल्फा, बीटा तथा गामा किरणों का निष्कासन होता है, यही प्रक्रिया रेडियोसक्रियता (Radioactivity) कहलाती है। रेडियम, थोरियम, यूरेनियम जैसे कुछ तत्त्व हैं, जो इस प्रकार का गुण प्रदर्शित करते हैं। ये किरणें जैविक कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाती हैं।
रेडियोएक्टिव प्रदूषण के स्रोत (Sources of Radioactive Pollution)
मुख्यतः इसे दो भागों में विभाजित किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं-
- प्राकृतिक- सोलर, कॉस्मिक एवं पार्थिव
- मानव निर्मित- नाभिकीय परीक्षण, नाभिकीय रिएक्टर, नाभिकीय हथियार एवं यूरेनियम खनन
रेडियोएक्टिव प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Radioactive Pollution)
विकिरण अन्य प्रदूषकों की अपेक्षा जीवों पर अधिक खतरनाक प्रभाव डालते हैं क्योंकि इनके प्रभाव कई पीढ़ियों तक चलते रहते हैं।
- कायिक प्रभाव (Somatic Effect) : विकिरण जीवों के ऊतकों एवं अंगों को क्षति पहुँचाकर उनकी कार्यप्रणाली में बाधा उत्पन्न करते हैं। उच्च तीव्रता के विकिरणी प्रभाव में आने से एनीमिया, रक्तस्राव आदि के कारण प्राणियों की मृत्यु भी हो जाती है।
- आनुवंशिक प्रभाव (Genetic Effect) : विकिरणों के प्रभाव से जीवों के आनुवंशिक गुणों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। उद्योग, अनुसंधान एवं औषधि में रेडियोएक्टिव न्यूक्लाइड का प्रयोग करने वाले लोग अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक प्रभावित होते हैं। ड्रोसेफिला पर किया गया अध्ययन दर्शाता है कि विकिरणों के प्रभाव से उत्परिवर्तन दर (Mutation Rate) उच्च हो जाती है। उच्चवर्गीय प्राणी (जैसे-मानव) निम्नवर्गीय प्राणियों (जैसे-कीट) की अपेक्षा इन विकिरणों से अधिक प्रभावित होते हैं।
- विकिरण के कारण जंतुओं के बाल उड़ना, खाल में जलन, गाँठ पड़ना, त्वचा का रंग उड़ना आदि प्रभाव दिखाई देते हैं। ज़्यादा विकिरण कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाता है तथा मृत्यु का कारण बन सकता है। विकिरण के कारण जंतुओं में उत्परिवर्तन होता है।
- विकिरण का प्रभाव जलीय पारितंत्र, मृदा आदि पर पड़ता है इसके बहुत से नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं।
रेडियोएक्टिव प्रदूषण नियंत्रण के उपाय (Measures to Control Radioactive Pollution)
- परमाणु बम के भूमिगत, वायुमंडल अथवा जलमंडल में परीक्षण पर रोक लगाई जाए।
- मानव उपयोग वाले यंत्रों को रेडियोधर्मिता से मुक्त करना होगा।
- नाभिकीय तत्त्वों के परिवहन में सावधानी।
- परमाणु अस्त्रों पर रोक एवं निशस्त्रीकरण की प्रक्रिया।
- चिकित्सीय व अनुसंधान सामान (रेडियोएक्टिव युक्त) का वैज्ञानिक तरीके से निपटान।
- भारतीय संविधान के भाग-18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकाल से संबंधित उपबंध उल्लिखित हैं।
- भारतीय संविधान सामान्य स्थितियों में संघात्मक स्वरूप के अनुसार कार्य करता है, तो वहीं आपातकालीन परिस्थितियों में यह एकात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेता है।
- इन आपात उपबंधों को संविधान में जोड़ने की मुख्य वजह देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता एवं लोकतांत्रिक-राजनैतिक व्यवस्था को यथावत् सुरक्षित बनाए रखना है।
- आपात उपबंध का प्रावधान भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता है। इसमें आपात उपबंध एवं प्रशासनिक विवरण से संबंधित प्रावधान भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिये गए हैं, जबकि आपातकाल के समय मूल अधिकारों के स्थगन संबंधी प्रावधान जर्मनी के वाइमर संविधान से लिये गए हैं।
- भारतीय संविधान में आपात उपबंधों को तीन भागों में बांटा गया है-
- राष्ट्रीय आपात – अनुच्छेद 352
- राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता/राष्ट्रपति शासन – अनुच्छेद 356
- वित्तीय आपात – अनुच्छेद 360
राष्ट्रीय आपात (National Emergency)
- राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा
- अनुच्छेद 352 में निहित है कि ‘युद्ध’, ‘बाह्य आक्रमण’ या ‘सशस्त्र विद्रोह’ के कारण संपूर्ण भारत या इसके किसी हिस्से की सुरक्षा खतरे में हो तो राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपात की घोषणा कर सकता है।
- मूल संविधान में ‘सशस्त्र विद्रोह’ की जगह ‘आंतरिक अशांति’ शब्द का उल्लेख था।
- 44वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा ‘आंतरिक अशांति’ को हटाकर उस स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह’ को रखा गया है।
- उद्घोषणा की प्रक्रिया एवं अवधि
- अनुच्छेद 352 के आधार पर राष्ट्रपति तब तक राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा नहीं कर सकता, जब तक संघ का मंत्रिमंडल लिखित रूप से ऐसा प्रस्ताव उसे न भेज दे। यह प्रावधान 44वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा जोड़ा गया।
- ऐसी उद्घोषणा का संकल्प संसद के प्रत्येक सदन द्वारा उस सदन की कुल संख्या के बहुमत तथा उपस्थिति व मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 बहुमत द्वारा पारित होना आवश्यक होगा।
- राष्ट्रीय आपात की घोषणा को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाता है तथा एक महीने के अंदर अनुमोदन न मिलने पर प्रवर्तन में नहीं रहता, किंतु एक बार अनुमोदन मिलने पर छः माह के लिये प्रवर्तन में बना रह सकता है।
- प्रभाव
- केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रभाव
- कार्यपालिका पर प्रभाव
- विधानमंडल पर प्रभाव
- वित्त पर प्रभाव
- लोकसभा व विधानसभाओं के कार्यकाल पर प्रभाव
- जब अनुच्छेद 352 प्रभावी होता है तो अनुच्छेद 358 के उपबंध स्वतः प्रभावी हो जाते हैं।
- अनुच्छेद 358 एवं 359 राष्ट्रीय आपातकाल में मूल अधिकार पर प्रभाव का वर्णन करते हैं। अनुच्छेद 358, अनुच्छेद 19 द्वारा दिये गए मूल अधिकारों के निलंबन से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 359 अन्य मूल अधिकार के निलंबन (अनुच्छेद 20 एवं 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छोड़कर) से संबंधित है।
- उद्घोषणा की समाप्ति
- राष्ट्रपति कभी भी ऐसी घोषणा को वापस ले सकता है।
- संसद द्वारा अनुमोदन न किये जाने पर।
- लोकसभा साधारण बहुमत से प्रस्ताव पारित कर घोषणा को वापस ले सकती है।
प्राकृतिक धरोहर स्थल वे स्थल होते हैं जहाँ जैव विविधता की समृद्धि के साथ वैश्विक महत्त्व के जीव-जंतु, स्थान क्षेत्र, वनस्पति आदि पाए जाते हैं।
प्राकृतिक धरोहर स्थल घोषित किये जाने के लिये UNESCO ने विभिन्न मापदंड तय किये हैं-
- पृथ्वी के विशिष्ट जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों की प्रजातियों की उपस्थिति हो एवं आवास क्षेत्रों में दुर्लभ एवं संकटग्रस्त जंतु तथा पादप प्रजातियों की उपस्थिति हो।
- जहाँ पर पारिस्थितिक एवं जैविक प्रक्रियाओं के कारण जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों का उद्भव हो रहा हो।
- पृथ्वी के विकास क्रम में महत्त्वपूर्ण भूगर्भिक प्रक्रियाओं द्वारा स्थलाकृति अथवा भू-आकृतिक परिवर्तन हुए हों।
- वे क्षेत्र जहाँ पर अद्वितीय प्राकृतिक घटनाएँ (Phenomena) हों और प्राकृतिक सुंदरता की दृष्टि से क्षेत्र अत्यधिक महत्त्व रखते हों।
UNESCO के द्वारा भारत के विभिन्न क्षेत्रों को विश्व के प्राकृतिक धरोहर स्थल की सूची में रखा गया है-
- काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (Kaziranga National Park)
- केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Keoladev National Park)
- मानस वन्यजीव अभयारण्य (Manas Wildlife Sanctuary)
- सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (Sundarban National Park)
- नंदादेवी एवं फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान (Nanda Devi and Valley of Flowers National Park)
- पश्चिमी घाट (Western Ghat)
- महान हिमालय राष्ट्रीय उद्यान संरक्षण क्षेत्र (Great Himalayan National Park Conservation Area)
एक जाति में कुल आनुवंशिक विविधता को जीन कोश कहते हैं। वर्तमान में जैव विविधता के ह्रास के कारण विश्व में जीन पूल केंद्रों का निर्माण किया जा रहा है, जिससे समाप्त हो रही जैव विविधता को संरक्षित किया जा सके। ये वे स्थान हैं जहाँ पर फसलों की महत्त्वपूर्ण प्रजातियाँ और स्थानिक जंतुओं की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इसमें कृषि पादप प्रजातियों एवं उष्णकटिबंधीय पौधों के जीन या आनुवंशिक पदार्थों को एकत्रित किया जाता है।
जीन पूल एक निश्चित समय में समष्टि के कुल आनुवंशिक पदार्थों का योग है। आनुवंशिक पदार्थों का एकत्रीकरण कर जीन पूल केंद्रों में रखा जाता है, जो भविष्य में प्रयोग में लाए जाते हैं। जीन पूल केंद्र के अंतर्गत विश्व के महत्त्वपूर्ण जैव विविधता वाले क्षेत्र शामिल हैं।
विश्व के प्रमुख जीन पूल केंद्र इस प्रकार हैं-
- दक्षिण एशिया उष्णकटिबंधीय क्षेत्र, इंडो-चाइना एवं द्वीपीय क्षेत्र जो मलाया द्वीप को शमिल करता है।
- दक्षिण-पश्चिम एशिया क्षेत्र, कॉकेशियन (Caucasian) मध्य-पूर्व एवं उत्तर-पश्चिम भारतीय क्षेत्र
- पूर्वी एशिया, चाइना एवं जापान क्षेत्र
- भूमध्यसागरीय क्षेत्र
- यूरोप क्षेत्र
- दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वत के क्षेत्र
भारत में विभिन्न प्रकार के आर्द्र व अनूप आवास पाए जाते हैं। इसके 70% भाग पर चावल की खेती की जाती है। भारत में लगभग 39 लाख हेक्टेयर भूमि आर्द्र है। ओडिशा में चिल्का और भरतपुर में केवलादेव राष्ट्रीय पार्क अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियों के अधिवेशन (रामसर अधिवेशन) के अंतर्गत रक्षित जलकुक्कुट आवास हैं।
हमारे देश में आर्द्रभूमि को 8 वर्गों में रखा गया है, जो इस प्रकार हैं-
- दक्षिण में दक्कन पठार के जलाशय और दक्षिण-पश्चिमी तटीय क्षेत्र की लैगून व अन्य आर्द्रभूमि।
- राजस्थान, गुजरात और कच्छ की खारे पानी वाली भूमि।
- गुजरात-राजस्थान से पूर्व (केवलादेव) और मध्य प्रदेश की ताज़े पानी वाली झीलें व जलाशय।
- भारत के पूर्वी तट पर डेल्टाई आर्द्रभूमि व लैगून (चिल्का झील आदि)।
- गंगा के मैदान में ताज़ा जल वाले कच्छ क्षेत्र।
- ब्रह्मपुत्र घाटी में बाढ़ के मैदान व उत्तर-पूर्वी भारत और हिमालय गिरिपद के कच्छ एवं मैंग्रोव क्षेत्र।
- कश्मीर और लद्दाख की पर्वतीय झीलें और नदियाँ।
- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के द्वीप चापों के मैंग्रोव वन और दूसरे आर्द्र क्षेत्र।
मैंग्रोव वन लवण, ज्वारीय संकरी खाड़ी, पंक मैदानों और ज्वारनदमुख के तटीय क्षेत्रों पर पाए जाते हैं। इसमें बहुत से लवण से न प्रभावित होने वाले पेड़-पौधे होते हैं। बंधे जल व ज्वारीय प्रवाह की संकरी खाड़ियों से आड़े-तिरछे ये वन विभिन्न किस्म के पक्षियों को आश्रय प्रदान करते हैं। ये वन चक्रवातों से तटीय क्षेत्रों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
भारत में मैंग्रोव वन 4975 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है। ये अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन डेल्टा तथा गुजरात में अत्यधिक विकसित हैं। इसके अलावा ये महानदी, गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टाई भाग में पाए जाते हैं। इन वनों में बढ़ते अतिक्रमण के कारण इनका संरक्षण करना आवश्यक हो गया है।
- मैंग्रोव सामान्यतः वे वृक्ष होते हैं जो उष्णकटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के तटों, ज्वारनदमुखों, ज्वारीय क्रीक, पश्चजल (Backwater), लैगून एवं पंक जमावों में विकसित होते हैं। मैंग्रोव शब्द की उत्पत्ति पुर्तगाली शब्द ‘मैग्यू’ तथा अंग्रेज़ी शब्द ‘ग्रोव’ से मिलकर हुई है। ऐसा समझा जाता है कि मैंग्रोव वनों का सर्वप्रथम उद्गम भारत के मलय क्षेत्र में हुआ और आज भी इस क्षेत्र में विश्व के किसी भी स्थान से अधिक मैंग्रोव प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- यह धारणा कि मैंग्रोव केवल खारे पानी में उग सकते हैं, सही नहीं है। ये ताज़े पानी वाले स्थानों पर भी उग सकते हैं लेकिन तब इनकी वृद्धि सामान्य से कम होती है। किसी मैंग्रोव क्षेत्र में पौधों की प्रजातियों की संख्या तथा उनके घनत्व को नियंत्रित करने वाला मुख्य कारक उस क्षेत्र की वनस्पतियों के खारे पानी को सहन करने की क्षमता तथा तापमान है।
मैंग्रोव की विशेषताएँ (Features of Mangroves)
- मैंग्रोव प्रजातियाँ बहुत अधिक सहनशील होती हैं और प्रतिदिन खारे पानी के बहाव को झेलती हैं।
- सभी मैंग्रोव पौधे अपनी जड़ों से पानी का अवशोषण करते समय नमक की कुछ मात्रा को अलग कर देते हैं, साथ ही ये पौधे दूसरे पौधों की अपेक्षा नमक की अधिक मात्रा अपने ऊतकों में सहन कर सकते हैं। कुछ पौधे अपनी पत्तियों पर पाई जाने वाली विशेष कोशिका से अतिरिक्त नमक को बाहर कर देते हैं।
- मैंग्रोव पौधे अस्थिर भूमि पर उगते हैं। इनकी विलक्षण जड़ें इन्हें न केवल स्थायित्व प्रदान करती हैं बल्कि धाराओं के तेज़ बहाव और तूफानों में भी मज़बूती से खड़ा रखती हैं और श्वसन में सहायता करती हैं। मैंग्रोव पौधों में विशेष श्वसन जड़ों का विकास होता है जिनके माध्यम से ये पौधे ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान करते हैं। इन जड़ों को ‘न्यूमेटोफोर्स’ कहते हैं।
- इन पौधों में पाई जाने वाली वायवीय जड़ें कई रूप ले सकती हैं। एक तीन मीटर लंबे एवीसीनिया वृक्ष पर लगभग 10,000 श्वसन जड़ें पाई जा सकती हैं।
- बहुत-सी प्रजातियों के नव अंकुरित पौधों में पर्याप्त मात्रा में खाद्य पदार्थ संचित होते हैं और पानी पर तैरने के लिये विशेष संरचनाएँ पाई जाती हैं जो उन्हें जीवित रखने में सहायक होती हैं।
- जरायुजता (विविपैरी)- मैंग्रोव की कुछ प्रजातियाँ जैसे एवीसीनिया एल्बा (Avicennia Alba) क्रिप्टोविविपैरी (गूढ़जरायुजता) दर्शाता है। क्रिप्टोविविपैरी प्रक्रिया के अंतर्गत भ्रूण विकास की प्रक्रिया पेड़ से फलों से गिरने से पहले ही प्रारंभ हो जाती है।
- वाष्पोत्सर्जन द्वारा पानी के उत्सर्जन को रोकने के लिये इन पौधों में मोटी चिकनी पत्तियां होती हैं।
- मैंग्रोव पौधों में ऐसी जड़ें पाई जाती हैं जो गुरुत्वाकर्षण के विपरीत बढ़ती हैं और सतह के ऊपर आ जाती हैं।
- जिन स्थानों पर मैंग्रोव उगते हैं वहां ऑक्सीजन की कमी रहती है। इस समस्या से निपटने के लिये मैंग्रोव पौधों में अतिरिक्त जड़ें पाई जाती हैं जो अनुकूलन जड़ें कहलाती हैं।
- मैंग्रोव के बारे में यह सामान्य धारणा है कि ये समुद्री तटों के काले बदबूदार कीचड़ में उगने वाले पौधे हैं। यह धारणा सही नहीं है क्योंकि मैंग्रोव रेतीली भूमि में तथा चट्टानी सतहों पर भी उग सकते हैं।
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- U.N.I. ने ख़बरों के आदान-प्रदान हेतु अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों से समझौते कर रखे हैं, जिनमें- चीन की शिन्हुआ, रूस की रिया नोवोस्ती, बांग्लादेश की यू.एन.बी., तुर्की की अनादोलू, संयुक्त अरब अमीरात की वाम, बहरीन की जी.एन.ए. और कुवैत की कुना इत्यादि शामिल हैं।
- वर्ष 1919 में एक छोटे से सेल के रूप में पत्र सूचना कार्यालय (Press Information Bureau) की स्थापना की गई थी। वर्तमान में PIB के आठ क्षेत्रीय कार्यालय (चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई, चंडीगढ़, गुवाहाटी, लखनऊ, कोलकाता और भोपाल) तथा 34 शाखा कार्यालय स्थित हैं।
- पत्र सूचना कार्यालय सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों, प्रयासों और उपलब्धियों की जानकारी पत्र-पत्रिकाओं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को संप्रेषित करने वाली एक नोडल एजेंसी है।
- पत्र सूचना कार्यालय विभिन्न संचार माध्यमों, जैसे- प्रेस विज्ञप्ति, प्रेस नोट, विशेष लेखों, संदर्भ सामग्री, प्रेस विवरण, फोटोग्राफ, संवाददाता सम्मेलन, साक्षात्कार, PIB की वेबसाइट पर उपलब्ध डाटाबेस, ऑडियो-वीडियो क्लिपिंग्स आदि के ज़रिये सूचनाओं का प्रसार करता है।
- लगभग 8,400 अख़बारों और मीडिया संगठनों के ज़रिये अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू और अन्य 13 क्षेत्रीय भाषाओं में सूचना प्रकाशित की जाती है।
- PIB के अधिकारी न सिर्फ अपने संबद्ध मंत्रालयों को लगातार अपनी सेवाएँ देते हैं बल्कि मीडिया के माध्यम से उन मंत्रालयों के कामकाज का प्रचार भी करते हैं।
- PIB का मुख्यालय नई दिल्ली में है और इसके मुखिया प्रधान महानिदेशक (मीडिया और संचार) हैं, जिनके साथ एक उपमहानिदेशक और आठ अतिरिक्त महानिदेशक होते हैं।
- एक्स और यूट्यूब पर अपनी सेवा देने के पश्चात् पत्र सूचना कार्यालय ने नए प्लेटफार्म, जैसे- फेसबुक, इंस्टाग्राम और वाइन पर अपनी सुविधा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का कार्य किया।
- इस सेवा की मुख्य वेबसाइट हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू, तीनों भाषाओं में उपलब्ध है।
- पत्रकार कल्याणकारी योजना (Journalist Welfare Scheme)- पत्र सूचना कार्यालय द्वारा ‘पत्रकार कल्याणकारी योजना’ लागू की गई है। इस संशोधित योजना में कहा गया है कि पत्रकार तथा उसके परिवार को जरूरत पड़ने पर एक समय के लिये अनुग्रहपूर्वक राहत देने के प्रावधान के साथ पांच लाख रुपये की धनराशि भी प्रदान की जाएगी। परिवार को राहत बहुत कठिनाई या आफत, जैसे- पत्रकार की मृत्यु अथवा स्थायी विकलांगता जैसी स्थिति में ही दी जाएगी। खतरनाक बीमारी, जैसे- कैंसर, ब्रेन हेमरेज इत्यादि तथा दुर्घटना की स्थिति में भी राहत प्रदान की जा सकती है।
- 27 अगस्त, 1947 को प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) को रजिस्टर्ड किया गया तथा 1 फरवरी, 1949 को इसने कार्य करना शुरू किया। यह भारत की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी है।
- इसका मुख्यालय दिल्ली में है। यह अपने इनसेट उपग्रह पर एक ट्रांसपोंडर के ज़रिये समाचार सीधे ग्राहक तक पहुँचाती है और इंटरनेट के माध्यम से अपने ग्राहकों से जुड़ी है।
- यह भारत की गैर-मुनाफे वाली सबसे बड़ी सहकारी संस्था है, जो देश के अख़बारों द्वारा चलाई जाती है। पीटीआई अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी समाचार सेवा भी देती है, जिसे ‘भाषा’ नाम दिया गया है।
- वर्तमान में ज़्यादा-से-ज़्यादा ग्राहक सैटेलाइट के ज़रिये पीटीआई की सेवाएँ प्राप्त कर रहे हैं। देश के कोने-कोने में पीटीआई के लगभग 400 पत्रकार और लगभग 500 स्टिंगर्स प्रत्येक ज़िले एवं छोटे शहर में मौजूद हैं, जो अलग-अलग श्रेणियों में 2000 से ज़्यादा ख़बरें और 200 से ज़्यादा फोटोग्राफ प्रतिदिन प्रदान करते हैं। वर्तमान में भारत में समाचार एजेंसी बाज़ार के 90% हिस्से पर पीटीआई का कब्ज़ा है।
- यह समाचार एजेंसी एशिया के समाचार को पहला स्थान देती है। यह संस्था रॉयटर्स (Reuters), यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल (UPI) और आजांस फ्रांस प्रेस (AFP) के साथ समाचारों का लेन-देन करती है। टेली प्रिंटर सर्विस के अलावा यह एजेंसी कंप्यूटर संगणक की सहायता से भी समाचार देती है।
- पीटीआई ने भारत में समाचार सेवा प्रदान करने के लिये 100 से अधिक देशी एवं विदेशी समाचार एजेंसियों के साथ करार किया है। एशियाई देशों में आर्थिक विकास और व्यापारिक अवसरों के बारे में ऑनलाइन डाटा बैंक के लिये, सूचनाएँ एकत्र करने के लिये पीटीआई और पांच अन्य एशियाई मीडिया संगठनों ने सिंगापुर में ‘एशिया पल्स इंटरनेशनल’ नाम की कंपनी स्थापित की है।
- एशिया-प्रशांत क्षेत्र की 12 समाचार एजेंसियों ने एक सहकारी व्यवस्था बनाई है, जिसका नाम ‘एशियानेट’ है। पीटीआई एक संस्था में सहभागी अंग है।
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नाम |
विशेषता |
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बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (मुंबई) |
जैव विविधता पर पर्यावरण संरक्षण हेतु भारत में सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन, प्रतीक-ग्रेट हार्नबिल। |
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भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (कोलकाता) |
वन्य पादप संसाधनों का वर्गीकरण एवं पुष्प अध्ययन। |
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भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (कोलकाता) |
प्राणिजात संसाधनों का अन्वेषण, सर्वेक्षण एवं प्रलेखीकरण। |
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सलीम अली ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री (कोयंबटूर) |
पक्षी शोध संस्थान। |
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वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर इंडिया |
वैश्विक जैविक विविधता संरक्षण। |
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भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून |
वन्यजीव अनुसंधान व प्रबंधन हेतु प्रशिक्षण व अकादमिक कोर्स। |
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भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून |
वन संसाधनों का मूल्यांकन करना। |
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भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (बल्लभगढ़) |
पशु कल्याण हेतु भारत सरकार का वैधानिक सलाहकार। |
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राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (चेन्नई) |
जैव विविधता अधिनियम 2002 के क्रियान्वयन हेतु। |
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केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (नई दिल्ली) |
वन्यजीवों (विशेषत: चिड़ियाघरों में) का संरक्षण करना। |
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भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट नोएडा |
संकटापन्न प्रजातियों का प्राकृतिक आवास में संरक्षण। |
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राष्ट्रीय वनीकरण और पर्यावरण विकास बोर्ड (नई दिल्ली) |
देश में वनीकरण, वृक्षारोपण, पारिस्थितिकी-विकास को बढ़ावा देना। |
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टेरी (The Energy and Resources Institute) (नई दिल्ली) |
पर्यावरण व ऊर्जा संरक्षण, धारणीय विकास को बढ़ावा देना। |
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प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) |
यह गैर-वन प्रयोग के लिये वन भूमि की हुई क्षति-पूर्ति हेतु पौधरोपण कार्यक्रम है। |
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सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (CSE) |
1980 में स्थापित भारत का अग्रणी पर्यावरणीय गैर-सरकारी संगठन है, जिसके संस्थापक पर्यावरणविद् अनिल कुमार अग्रवाल थे। यह पर्यावरण पत्रिका ‘डाउन-टू-अर्थ’ का प्रकाशन करता है। |
मानव समाज के विकास में प्रौद्योगिकी की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है। पाषाण काल से ही प्रौद्योगिकी आम जनता को आवश्यक न्यूनतम वस्तुओं को सुलभ कराती रही है, किंतु वर्तमान में प्रौद्योगिकी अधिक खतरनाक व विनाशकारी हो गई है क्योंकि तीव्र गति से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ मानव प्रजाति भौतिकवादी प्रवृत्ति तथा उच्च उत्पादन पर अधिक ज़ोर दे रही है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, जैसे निजी जीवन से लेकर कृषि, विज्ञान, परिवहन, उद्योग एवं अन्य क्षेत्रों में तकनीक का व्यापक उपयोग हो रहा है। निश्चित तौर पर तकनीक ने मानव जीवन को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है। किंतु यह भी सत्य है कि आधुनिक प्रौद्योगिकी ने अधिकांश पर्यावरणीय समस्याओं को भी जन्म दिया है।
निम्नलिखित तथ्य आधुनिक प्रौद्योगिकी के अभिशाप को स्पष्ट करते हैं-
- मनुष्य अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से अपने हित के लिये मौसम संबंधी दशाओं में परिवर्तन करने में सक्षम हो गया है। मनुष्य आज मेघ बीजन द्वारा वर्षा कराने तथा ओला-वृष्टि (Hailstorm) को रोकने में सक्षम हो गया है। इस तरह मनुष्य वायुमंडलीय प्रक्रमों में परिवर्तन करने लगा है और इन परिवर्तनों से जीवमंडल प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
- आधुनिक प्रौद्योगिकी की सहायता से मनुष्य नदियों पर बांध तथा जलाशय बनाने में सक्षम हो गया है। इन क्रियाओं के गंभीर दुष्परिणाम पर्यावरण पर पड़ते हैं, जैसे- बड़े बांधों तथा जलाशयों के भार के कारण चट्टानों का संतुलन बिगड़ जाता है जिस कारण विनाशकारी भूकंप का आविर्भाव होता है। डेनेवर, मीड झील, करीबा झील तथा कोयना झील मानव द्वारा विकसित एवं प्रयुक्त प्रौद्योगिकी जनित भूकंपों के कतिपय उदाहरण हैं। इसके अलावा बड़े-बड़े जल भंडारों के कारण प्राकृतिक वन क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं इस कारण प्रभावित क्षेत्र का पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ जाता है। भारत में सरदार सरोवर परियोजना का विरोध इन्हीं आधारों पर हो रहा है।
- आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि के साथ पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न हुई हैं। रासायनिक खाद, कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से आज मृदा व जल प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है।
- सिंचाई के साधन, जैसे- पंप, बोरवेल आदि से सिंचाई से कुछ राज्यों यथा- पंजाब व हरियाणा में (अति सिंचाई के कारण संलग्न क्षेत्रों) मृदा लवणता की समस्या देखी जा रही है।
- विलासिता के उत्पादों यथा- रेफ्रीजरेटर, एयरकंडीशनर, स्प्रे, हेयर ड्रायर आदि के संचालन से क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFC) के वायुमंडल में पहुँचने से ओज़ोन क्षरण हो रहा है। जिस कारण सूर्य से उत्सर्जित पराबैंगनी किरणों के धरातल पर पहुँचने से तापमान में वृद्धि के साथ त्वचा कैंसर की संभावनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
- परिवहन के आधुनिक साधनों के विकास तथा ऊर्जा की पूर्ति के लिये जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग तथा इससे उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से वायुमंडल के सांद्रण में वृद्धि के कारण ग्लोबल वार्म़िग की समस्या उत्पन्न हो रही है। रासायनिक संयंत्रों से ज़हरीली गैसों के निकलने से न केवल वायु प्रदूषण होता है बल्कि यह मानवीय स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालती हैं। भोपाल गैस त्रासदी, यूक्रेन की चेर्नोबिल तथा थ्री-माइल आइलैंड घटना आधुनिक प्रौद्योगिकी की असफलता से उत्पन्न गंभीर परिणाम हैं।
- आधुनिक प्रौद्योगिकी के खतरनाक परिणामों में ज़हरीले रसायनों का उत्पादन, कृत्रिम पदार्थों का उत्पादन तथा जीवों द्वारा विघटित न होने वाले पदार्थों का भारी मात्रा में उत्पादन (जैसे- प्लास्टिक) आदि प्रमुख हैं।
- आज नाभिकीय अपशिष्टों का प्रबंधन मानव समाज के लिये गंभीर खतरा है।
वास्तव में आधुनिक प्रौद्योगिकी से उत्पन्न होने वाले नकारात्मक प्रभाव मानव जीवन के खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। इसलिये आधुनिक तकनीक का उपयोग इस प्रकार किया जाना चाहिये कि वह मानव जीवन को खुशहाल व उत्तम बनाने में प्रभावी हो सके।
- अध्येता का सामान्य अर्थ होता है- ‘अध्ययन करने वाला’।
- अध्येता को ‘अधिगमकर्त्ता’, ‘शिक्षार्थी’ या ‘विद्यार्थी’ भी कहते हैं।
- शिक्षण के केंद्रबिंदु में अध्येता एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है।
- अध्येता शिक्षा ग्रहण करने के शुरुआती समय में अपरिपक्व अवस्था में होता है, लेकिन जैसे ही वह सामाजिक व सांस्कृतिक गुणों के माध्यम से चारित्रिक सद्गुणों को आत्मसात करता है तो वह परिपक्वता की श्रेणी में आ जाता है।
- विद्यालयी वातावरण अध्येता के मानस पटल पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, जिसका प्रभाव हमें सभी शिक्षक व साथी सहपाठियों के साथ अध्येता के मिलनसार व्यवहार में दिखाई देता है। विद्यालयी शिक्षा के माध्यम से ही अध्येता में अनुशासन की प्रवृत्ति का विकास होता है, जो उसे जीवनपर्यंत बेहतर नागरिक बनने के लिये प्रेरित करता है।
अध्येता की विशेषताएँ (Characteristics of Learner)
एक अध्येता के सद्गुणों व विशिष्ट तथ्यों का उल्लेख निम्नलिखित अवयवों/बिंदुओं के अंतर्गत किया जा सकता है-
- मूल प्रवृत्तियाँ : प्रत्येक व्यक्ति में कुछ ऐसे व्यवहार होते हैं, जो जन्मजात होते हैं, जिन्हें सीखना नहीं पड़ता, जो प्रेरक शक्तियों के माध्यम से प्राणी-मात्र के व्यवहार को परिचालित करते हैं, इन्हें मूल प्रवृत्तियाँ कहते हैं।
- संवेग एवं स्थायी भाव : प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में सुख-दुःख, भय, क्रोध, प्रेम, ईर्ष्या, घृणा आदि का अनुभव करता है। इन अनुभवों से मन में जो भाव उत्पन्न होते हैं, उनसे मानव में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैं। इन भावों को मनोवैज्ञानिक भाषा में ‘संवेग’ कहते हैं। स्थायी भाव एक अर्जित संस्कार है। अर्जित संस्कार धीरे-धीरे व्यवस्थित होकर स्थायी भाव का रूप धारण कर लेते हैं, फलस्वरूप आचरण व व्यवहार नियंत्रित होने लगते हैं।
- अभिवृद्धि एवं विकास : किसी भी व्यक्ति में होने वाले स्वाभाविक विकास को ‘अभिवृद्धि’ कहते हैं और किसी भी व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक पक्ष में जो प्रगतिशील परिवर्तन होता है, उसे ‘विकास’ कहते हैं।
- वंशानुक्रम एवं वातावरण : बालक को अपने माता-पिता, परिवार के सदस्यों और पूर्वजों से जो भी शारीरिक और मानसिक विशेषताएँ और गुण प्राप्त होते हैं, उन्हें ‘वंशानुक्रम’ के नाम से जाना जाता है। किसी व्यक्ति के चारों ओर के आवरण अथवा घेरे को ही ‘वातावरण’ कहते हैं।
- खेल एवं खेल प्रणाली : अध्येता के विकास में खेलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके माध्यम से शारीरिक, मानसिक व चारित्रिक विकास में सहायता मिलती है।
‘प्रौद्योगिकी विज़न 2035’ का लक्ष्य सुरक्षा, समृद्धि में बढ़ोत्तरी और प्रत्येक भारतीय की अस्मिता को सुनिश्चित करना है। इसका उल्लेख संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी भाषाओं के संबंध में दस्तावेज में ‘हमारी आकांक्षा’ या ‘विज़न वक्तव्य’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विज़न दस्तावेज में 12 विशेषाधिकारों (छः वैयक्तिक और छः सामूहिक) का उल्लेख भी किया गया है जो सभी भारतीय नागरिकों को उपलब्ध होंगे। ये इस प्रकार हैं-
वैयक्तिक विशेषाधिकार
- स्वच्छ वायु और पेयजल
- खाद्य एवं पोषण सुरक्षा
- सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा और सार्वजनिक स्वच्छता
- 24 x 7 बिजली
- बेहतर आवास
- बेहतर शिक्षा, आजीविका और सर्जनात्मक अवसर
सामूहिक विशेषाधिकार
- सुरक्षित और तेज़ आवागमन
- सार्वजानिक सुरक्षा और राष्ट्रीय रक्षा
- सांस्कृतिक विविधता और जीवंतता
- पारदर्शी और प्रभावशाली शासन
- आपदा और जलवायु लोच
- प्राकृतिक संसाधनों का पारिस्थितिकीय अनुकूल संरक्षण
विज़न दस्तावेज के अनुसार ये विशेषाधिकार भारत के प्रौद्योगिकी विज़न के केंद्र में हैं। इन विशेषाधिकारों को सुनिश्चित करने के लिये प्रौद्योगिकियों का निर्धारण किया गया है-
- जिन्हें तेज़ी से तैनात किया जा सके;
- जिन्हें प्रयोगशाला से व्यवहार में लाया जा सके;
- जिनके लिये लक्ष्य अनुसंधान आवश्यक है, और
- जो कि अभी भी कल्पना में हैं।
प्रौद्योगिकियों के इन अंतिम वर्गों के संबंध में इंटरनेट ऑफ थिंग्स, वियरेबल टेक्नोलॉजी, सिंथेटिक बायोलॉजी, ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस, बायो प्रिंटिंग और रिजनरेटिव मेडिसिन जैसे उत्कृष्ट ‘ब्लू स्काई’ अनुसंधान उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा सटीक कृषि और रोबोट आधारित खेती, वर्टिकल खेती, इंटरेक्टिव फूड, ऑटोनोमस व्हीकल, बायोलूमिनेसंस, इमारतों की 3D प्रिंटिंग, भूकंप की भविष्यवाणी, मौसम प्रौद्योगिकियाँ, हरित खनन आदि ऐसी अन्य प्रौद्योगिकियाँ हैं जिनसे मानव की वर्तमान और भावी पीढ़ियों की आवश्यकताएं पूरी की जा सकेंगी।
- शिक्षण की संपूर्ण प्रक्रिया एक त्रिस्तरीय पद्धति होती है जिसके तीन घटक (शिक्षक, विद्यार्थी एवं पाठ्यक्रम) होते हैं। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक दूसरों को पढ़ाते (Teach) हैं, प्रशिक्षित (Trained) करते हैं या उन्हें अनुदेश (Instruct) देते हैं। ये सभी उन प्रक्रियाओं को संदर्भित करते हैं जो पढ़ाए जा रहे लोगों की संज्ञानात्मक संरचना (किसी के मस्तिष्क में ज्ञान की संरचना) में बदलाव लाने के लिये निष्पादित होती हैं। हालाँकि पढ़ाना, प्रशिक्षण और अनुदेशन अपने अर्थ में काफी भिन्न हैं।
- प्रशिक्षण में किसी व्यक्ति को किसी विशेष कार्य को करने के लिये तैयार करने की प्रक्रिया शामिल होती है। यह सीखने की प्रक्रिया का वर्णन करता है जिसे पूरा करने में कई साल लगते हैं। प्रशिक्षण में अपेक्षाकृत एक व्यवस्थित माध्यम से ज्ञान और कौशल से युक्त कोई व्यक्ति ज्ञान और कौशल को अन्य व्यक्तियों में हस्तांतरित करता है जो इसे नहीं जानते हैं।
- अनुदेशन को अक्सर शिक्षण के पर्याय के रूप में उपयोग किया जाता है, लेकिन व्यापक अर्थ में इसका संबंध शिक्षा की बजाय कौशल के विकास से ज़्यादा होता है।
- प्रशिक्षण और अनुदेशन के विपरीत, शिक्षण ऐसी प्रक्रिया को संदर्भित करता है जो किसी व्यक्ति-विशेष के सर्वांगीण विकास हेतु उसको उसकी पूर्ण क्षमता तक पहुँचने में मदद करता है।
- शिक्षण प्रक्रिया में विद्यार्थियों का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास शामिल होता है। शिक्षण विद्यार्थियों में परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों की एक प्रक्रिया है। हालाँकि प्रशिक्षण, अनुदेशन और शिक्षण अर्थों में भिन्न होते हैं, लेकिन इन सभी के माध्यम से एक केंद्रीय प्रक्रिया के रूप में विद्यार्थियों में अधिगम संपन्न होता है।
- शिक्षण प्रक्रिया सार्थक तभी होगी जब शिक्षक इस आशय से शिक्षण गतिविधि में शामिल हो कि विद्यार्थी इसके परिणामस्वरूप कुछ सीखेंगे।
- शिक्षण की प्रक्रिया तब भी संपन्न होती है जब कुछ शैक्षणिक गतिविधियों द्वारा शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सीखने के उद्देश्य से संलग्न करता है, जैसे किसी गद्यांश को पढ़ना, विद्यार्थियों के लिये रचना लिखना आदि।
हाल के वर्षों में शोधार्थियों को बेहतर अकादमिक सहायता प्रदान करने हेतु कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का सृजन हुआ है, जिनमें ‘शोधगंगा’, ‘शोधगंगोत्री’ व ‘ई-शोधसिंधु’ के नाम उल्लेखनीय हैं।
शोधगंगा
- ‘शोधगंगा’ एक डिजिटल रिपॉज़िटरी प्लेटफॉर्म है, जो भारत में शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत इलेक्ट्रॉनिक थीसिस और शोध प्रबंध के लिये एक केंद्रीकृत डेटाबेस के रूप में कार्य करता है।
- यह UGC के एक अंतर-विश्वविद्यालय केंद्र ‘सूचना एवं पुस्तकालय नेटवर्क केंद्र’ (INFLIBNET) की एक पहल है। यह पूर्णत: निशुल्क प्लेटफार्म है।
- इस प्लेट्फॉर्म पर शोधार्थी अपने शोध-प्रबंध अन्य शोधार्थियों के साथ साझा करते हैं जिससे वे उनके शोध निष्कर्षों और अध्ययन-प्रक्रिया को देख सकें।
- शोधगंगा एक महत्त्वपूर्ण अकादमिक संसाधन है जो ज्ञान की साझेदारी तथा शोध सहयोग को बढ़ावा देने का काम करती है।
शोधगंगोत्री
- ‘शोधगंगोत्री’ भारत में एक ऑनलाइन मंच और एक राष्ट्रीय रिपॉजिटरी है, जिसे भारतीय विश्वविद्यालयों में पीएचडी स्तर पर चल रहे और हाल ही में पूरे हुए शोध कार्यों के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिये डिजाइन किया गया है।
- यह विभिन्न शैक्षणिक विषयों में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने वाले शोधार्थियों द्वारा प्रस्तुत अनुसंधान सिनोप्सिस के डेटाबेस के रूप में कार्य करता है। यह भी ‘INFLIBNET’ की एक पहल है और पूर्णत: निशुल्क प्लेटफार्म है।
- उल्लेखनीय है कि यह प्लेटफार्म ‘शोधगंगा’ से भी कनेक्टेड है। एक बार शोध पूर्ण होने के बाद शोध प्रबंध का लिंक ‘शोधगंगोत्री’ से ‘शोधगंगा’ पर शेयर कर दिया जाता है।
ई-शोधसिंधु
- ‘ई-शोधसिंधु’ की स्थापना शिक्षा मंत्रालय द्वारा एक विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर की गई थी। यह प्लेटफॉर्म अपने सदस्य संस्थानों को 10,000 से अधिक पीयर-रिव्यूड जर्नल्स, ग्रंथ सूचियों, उद्धरणों व तथ्यात्मक डाटाबेस तक पहुँच उपलब्ध कराता है।
- यह भारत के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं केंद्रीय वित्त पोषित तकनीकी संस्थानों को ई-संसाधनों तक पहुँच प्रदान करता है।
- जब स्वतंत्र भारत में परमाणु ऊर्जा के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अनुसंधान कार्य आरंभ करवाया, तब डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ‘परमाणु ऊर्जा आयोग’ (Atomic Energy Commission) के प्रथम अध्यक्ष बने। प्रारंभ में परमाणु शक्ति के संबंध में ‘शांति के लिये परमाणु’ (Atoms for Peace) सिद्धांत को अपनाया गया अर्थात् केवल शांतिपूर्ण कार्यों के लिये परमाणु शक्ति के विकास का लक्ष्य रखा गया।
- बांग्लादेश के संकट (वर्ष 1971) के पश्चात् जब यह स्पष्ट होने लगा कि चीन अपने मित्र पाकिस्तान की परमाणु शक्ति के निर्माण में सहायता कर सकता है, तब भारत को गंभीरता से अपने परमाणु कार्यक्रम पर विचार करना पड़ा। इससे पूर्व ही वर्ष 1964 में चीन अपना प्रथम परमाणु विस्फोट करके परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन चुका था।
- चीन और अमेरिका के मध्य बढ़ते राजनीतिक संबंधों को देखते हुए भारत ने 1974 में अपना पहला परमाणु परीक्षण (ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा : पोखरण-I) किया, परंतु विश्व समुदाय द्वारा इस विषय पर उठाए गए सवालों के संदर्भ में भारत ने यह स्पष्ट किया कि यह उसका शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट (Peaceful Nuclear Explosion- PNE) था।
- वर्ष 1968 की परमाणु अप्रसार संधि (Non-Proliferation Treaty- NPT) पर हस्ताक्षर करने से भारत सदा इनकार करता रहा है। वास्तव में भारत इस संधि को भेदभाव पर आधारित मानता है क्योंकि इसमें केवल पांच देशों (ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, फ्रांस और चीन) को ही परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र (Nuclear Weapon States) स्वीकार किया गया है।
- वर्ष 1991-96 के अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव गंभीरता से विचार करते रहे कि परमाणु परीक्षण किया जाए, परंतु उन्होंने परीक्षण के आदेश नहीं दिये।
- मई 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने साहसिक कदम उठाकर परमाणु परीक्षण (पोखरण-II) करवाए। परमाणु परीक्षण अत्यंत गोपनीय रूप से किये गए। फलस्वरूप भारत ने स्वयं को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र (Nuclear Weapon States) घोषित कर दिया।
- भारत ने न तो ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) पर हस्ताक्षर किये हैं और न ही ‘व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध संधि’ (Comprehensive Nuclear Test Ban Treaty- CTBT) को स्वीकृति दी है।
- भारत ने अपनी परमाणु नीति के तहत मुख्य रूप से तीन तत्त्वों को प्राथमिकता दी है- पारदर्शिता, जवाबदेहिता और सुदृढ़ता; जो एक लोकतांत्रिक संप्रभु देश की भावना को प्रकट करता है।
भारत की परमाणु नीति के प्रमुख बिंदु निम्नवत हैं-
- विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण एवं रखरखाव।
- परमाणु हथियारों से रहित किसी भी राष्ट्र के विरुद्ध परमाणु हथियारों का प्रयोग नहीं करना तथा परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्रों पर भी पहले आक्रमण नहीं करना।
- परमाणु आक्रमण होने पर जवाबी कार्यवाही इतनी सशक्त होगी कि दुश्मन की प्रतिक्रिया करने की शक्ति पूर्णतः नष्ट हो जाएगी।
- जवाबी परमाणु हमले का आदेश देने का अधिकार ‘परमाणु कमान प्राधिकरण’ (Nuclear Command Authority) के माध्यम से केवल राजनीतिक शक्ति होगा।
- भारत विश्व स्तर पर बिना भेदभाव वाले परमाणु नि:शस्त्रीकरण के द्वारा विश्व को परमाण्विक हथियारों से मुक्त कराने के अपने लक्ष्य के प्रति सदैव सजग रहेगा।
- भारतीय सेना पर जैविक या परमाण्विक हथियारों से भारत पर या किसी स्थान पर हमले से नाभिकीय हथियारों के प्रयोग का विकल्प खुला रहेगा।
- भारत अपनी परमाणु एवं प्रक्षेपास्त्र संबंधी सामग्री तथा प्रौद्योगिकी के निर्यात पर सख्त नियंत्रण बनाए रखेगा।
प्रत्येक वर्ष मई माह के प्रथम मंगलवार को विश्व अस्थमा दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अस्थमा के प्रति जागरूकता फैलाना, रोग की जटिलताओं को समझाना और समय पर उपचार की आवश्यकता को उजागर करना है। वर्ष 2025 में यह दिवस 6 मई को मनाया गया। इस वर्ष की थीम “श्वसन उपचार को सभी के लिये सुलभ बनाना” अस्थमा रोगियों के लिये इनहेलर और अन्य श्वसन दवाओं की व्यापक उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देती है, जिससे रोग प्रबंधन और आपातकालीन स्थितियों में राहत सुनिश्चित हो सके।
- अस्थमा: एक दीर्घकालिक श्वसन रोग
अस्थमा एक क्रॉनिक श्वसन विकार है, जिसमें श्वसन नलिकाएँ संकुचित और सूजनग्रस्त हो जाती हैं, जिससे बलगम का निर्माण बढ़ जाता है। इसका प्रभाव व्यक्ति की श्वशन-प्रणाली पर पड़ता है, जिससे सामान्य रूप से साँस लेना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- मुख्य लक्षण:
- बार-बार होने वाली खाँसी, विशेषकर रात या सुबह के समय
- घरघराहट की आवाज़ (सीटी जैसी साँस)
- साँस फूलना और थकावट
- सीने में जकड़न या दबाव का अनुभव
राष्ट्रीय हृदय, फेफड़े और रक्त संस्थान (NHLBI) के अनुसार, ये लक्षण समय-समय पर उभरते हैं और बिना उपचार के गंभीर रूप ले सकते हैं।
- वैश्विक परिप्रेक्ष्य
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, विश्वभर में 250 मिलियन से अधिक लोग अस्थमा से ग्रस्त हैं।
- वर्ष 2019 में, अस्थमा से लगभग 4,55,000 लोगों की मृत्यु हुई।
- यह आँकड़ा अस्थमा के समुचित प्रबंधन, दवाओं की उपलब्धता और समय पर उपचार की अनिवार्यता को दर्शाता है।
अस्थमा को यदि समय पर नियंत्रित किया जाए, तो इससे जुड़ी जटिलताओं और मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
- इतिहास एवं महत्व
- विश्व अस्थमा दिवस की शुरुआत वर्ष 1998 में Global Initiative for Asthma (GINA) द्वारा की गई थी।
- पहला आयोजन बार्सिलोना, स्पेन में हुआ था, जिसमें 35 देशों ने भाग लिया।
- तब से यह दिवस एक वैश्विक अभियान का रूप ले चुका है, जो अस्थमा रोग के विषय पर शिक्षा, जागरूकता और सामाजिक सहभागिता को प्रोत्साहित करता है।
अस्थमा केवल एक रोग नहीं, बल्कि एक सतत चुनौती है, जिसे जागरूकता, समय पर उपचार और सही देखभाल से नियंत्रित किया जा सकता है। विश्व अस्थमा दिवस हमें इस दिशा में एकजुट होकर प्रयास करने की प्रेरणा देता है।
‘रिवाइव अवर ओशन’ एक अंतर्राष्ट्रीय पहल है, जिसे डायनेमिक प्लैनेट नामक गैर-सरकारी संगठन ने शुरू किया है। इसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाकर समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (MPA) का निर्माण करना और इन क्षेत्रों के माध्यम से समुद्री पारिस्थितिकी संरक्षण तथा सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।
- प्रमुख विशेषताएँ :
- यह पहल कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैवविविधता ढाँचे के 30x30 लक्ष्य के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक वैश्विक महासागरों के 30% हिस्से को संरक्षित करना है।
- प्रारंभिक चरण में यह पहल सात देशों – यूनाइटेड किंगडम, पुर्तगाल, ग्रीस, तुर्किये, फिलीपींस, इंडोनेशिया और मैक्सिको – पर केंद्रित है।
- इसमें समुदायों को MPA की स्थापना और प्रबंधन के लिये सक्षम बनाया जाएगा।
- पहल MPA को आर्थिक परिसंपत्तियों के रूप में देखती है। उदाहरण के लिये, मेडिस द्वीप (स्पेन) में मत्स्य निषेध क्षेत्र से पर्यटन के ज़रिए हर वर्ष लगभग 16 मिलियन अमेरिकी डॉलर की आय होती है।
- यह पहल 2023 की हाई सीज़ संधि से भी मेल खाती है, जिसे प्रभावी बनाने के लिये 60 देशों द्वारा अनुसमर्थन आवश्यक है। भारत इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुका है।
- MPA की परिभाषा :
समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPA) ऐसे समुद्री क्षेत्र होते हैं जहाँ पारिस्थितिकीय तंत्र, आवास या प्रजातियों की सुरक्षा हेतु कुछ मानवीय गतिविधियों पर प्रतिबंध होता है। हालाँकि कुछ बहुउद्देशीय MPA में सीमित मत्स्यन और अनुसंधान की अनुमति दी जा सकती है। - स्थिति और चुनौतियाँ:
- प्रोटेक्टेड प्लेनेट रिपोर्ट 2024 के अनुसार, विश्व में 16000 से अधिक MPA मौजूद हैं, जो केवल 8% महासागरों को कवर करते हैं।
- इनमें से केवल 3% क्षेत्र पूर्णतः संरक्षित हैं।
- कई MPAs में कमज़ोर प्रबंधन और विनाशकारी गतिविधियाँ जैसे बॉटम ट्रॉलिंग अब भी जारी हैं, जिससे संरक्षण के उद्देश्य को क्षति पहुँचती है।
पूरी शिक्षण प्रक्रिया आश्रित चर, स्वतंत्र चर और मध्यस्थ चरों द्वारा संपादित होती है। आश्रित चर और स्वतंत्र चर के विपरीत, मध्यस्थ चर निष्क्रिय एवं निर्जीव होते हुए भी शिक्षण अधिगम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सक्रिय चर के रूप में आश्रित चर और स्वतंत्र चर के कार्यों को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है-
- निदानात्मक कार्य
- शिक्षक को शिक्षण प्रक्रिया में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिये कई तरह के निदानात्मक कार्यों का भी संपादन करना पड़ता है। विद्यार्थियों के व्यवहार के संदर्भ में शिक्षक को शिक्षण वातावरण में परिवर्तन करने होते हैं जिससे विद्यार्थियों का कुशल समायोजन हो सके।
- शिक्षक को शिक्षण अधिगम में प्रयोग किये जा रहे शिक्षण साधनों (पाठ्यवस्तु, अनुदेशन सामग्री, विधि और तकनीक आदि) के साथ-साथ अपनी शिक्षण योग्यताओं एवं शक्तियों का भी निदान करना होता है जिससे शिक्षण अधिगम में अधिकतम लक्ष्यों को पाया जा सके।
- निदानात्मक कार्यों के संदर्भ में विद्यार्थी का सक्रिय सहयोग अपेक्षित होता है। विद्यार्थियों को अपनी कमियाँ, अच्छाई, अधिगम क्षमता का मूल्यांकन करते हुए शिक्षण प्रकिया में एक सक्रिय भागीदार बनना होता है।
- उपचारात्मक कार्य
- शिक्षण कार्य को सफल बनाने के लिये शिक्षण अधिगम में आ रही बाधाओं की जाँच यानी निदानात्मक क्रिया के उपरांत शिक्षक को उन बाधाओं को दूर करना होता है। ऐसा करने के लिये शिक्षक उपचारात्मक कार्य करते हुए सभी मध्यस्थ चरों को उचित रूप से नियंत्रित करने का प्रयास करता है जिससे शिक्षण अधिगम सुचारु रूप से चलता रहे।
- शिक्षण अधिगम में अपनाए गए उपचारात्मक कार्यों को क्रियात्मक रूप में लाने के लिये विद्यार्थियों को सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्हें एक भागीदार के रूप में शिक्षक का सहयोग करना होता है।
- मूल्यांकन कार्य
- शिक्षण अधिगम में शिक्षक द्वारा संपादित निदानात्मक कार्यों एवं उपचारात्मक कार्यों की सफलता की जाँच के लिये मूल्यांकन तकनीक का सहारा लिया जाता है। मूल्यांकन में निदानात्मक कार्यों एवं उपचारात्मक कार्यों के गुण एवं दोष, सफलता और असफलता आदि की जाँच करते हुए पुन: यदि आवश्यक हो तो वांछित संशोधन किये जाते हैं जिससे शिक्षण अधिगम में वांछित सफलता मिल सके।
- मूल्यांकन विधि में विभिन्न विधियों का प्रयोग किया जाता है जिसमें निरीक्षण विधि, साक्षात्कार विधि, लिखित एवं प्रायोगिक परीक्षा, रेटिंग स्केल, प्रश्नावली आदि समेत प्रक्षेपी तकनीकों (Projective techniques) का सहारा लिया जाता है। मूल्यांकन विधियों में शिक्षक एवं विद्यार्थी को अपनी सक्रिय भूमिका निभानी होती है।
- जल निकायों का संरक्षण (Conservation of Water Bodies)- भारत की अधिकतर नदियाँ तथा झीलें प्रदूषण की शिकार हैं तथा इनका जल पीने योग्य नहीं रह गया है। यहाँ की नदियों एवं तालाबों के जल प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत असंसाधित मल-जल प्रवाह है। जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्यरत ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय’ का कार्य केंद्र प्रायोजित स्कीमों ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP)’ एवं ‘जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण हेतु राष्ट्रीय योजना’ (NPCA) के तहत नदियों, झीलों एवं नम भूमियों के संरक्षण के लिये राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
- गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan–GAP)- देश की प्रमुख नदियों में से एक तथा स्वयं का निर्मलीकरण (गंगा में पाए जाने वाले वायरस जैसे Bacteriophage वगैरह जीवाणुओं को खा जाते हैं।) करने वाली गंगा आज लगभग अपने अपवाह के आधे भाग में प्रदूषित हो गई है। वर्तमान में लगभग 50,000 से अधिक आबादी वाले 100 से अधिक शहरों का असंसाधित मल-अपशिष्ट गंगा में अपवाहित किया जाता है तथा हज़ारों की संख्या में लाशों व जले हुए अवशेषों को इसमें प्रवाहित किया जाता है। गंगा बेसिन में भारत की लगभग 40% जनसंख्या निवास करती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ‘केंद्रीय गंगा प्राधिकरण’ (CGA) का गठन कर 1985 में गंगा एक्शन प्लान (GAP) की शुरुआत की गई।
- राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (National River Conservation Plan)- 1995 में केंद्रीय गंगा प्राधिकरण (CGA) का नाम बदलकर ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण’ (NRCA) कर दिया गया था। गंगा कार्य योजना का विलय NRCP के साथ कर दिया गया।
- नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Project)- केंद्र सरकार द्वारा जून 2014 में नमामि गंगे नामक फ्लैगशिप कार्यक्रम के लिये 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए। इस कार्यक्रम का उद्देश्य गंगा नदी का संरक्षण, जीर्णोद्धार एवं प्रदूषण को खत्म करना है। नमामि गंगे कार्यक्रम के निम्नलिखित मुख्य स्तंभ हैं-
- सीवरेज ट्रीटमेंट
- रिवर फ्रंट डेवलपमेंट
- वनीकरण
- जैव विविधता का विकास
- जन-जागरूकता
- गंगा ग्राम योजना
- नदी सतह की सफाई
- औद्योगिक प्रवाह निगरानी
- ब्लॉकचेन एक ऐसी तकनीक है जिससे बिटकॉइन तथा अन्य क्रिप्टोकरेंसियों का संचालन होता है। यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो यह एक डिजिटल ‘सार्वजनिक बही-खाता’ (Public Ledger) है। ब्लॉकचेन तकनीक में तीन अलग-अलग तकनीकों का समायोजन होता है, जिसमें इंटरनेट, पर्सनल की (निजी कुंजी) की क्रिप्टोग्राफी अर्थात् जानकारी को गुप्त रखना और प्रोटोकॉल पर नियंत्रण रखना शामिल है।
- ब्लॉकचेन में एक बार किसी भी लेन-देन को दर्ज करने पर इसे न तो वहां से हटाया जा सकता है और न ही इसमें संशोधन किया जा सकता है।
- ब्लॉकचेन के कारण लेन-देन के लिये एक विश्वसनीय तीसरी पार्टी जैसे- बैंक की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके अंतर्गत नेटवर्क से जुड़े उपकरणों (मुख्यतः कंप्यूटर की शृंखलाओं, जिन्हें नोड्स कहा जाता है।) के द्वारा सत्यापित होने के बाद प्रत्येक लेन-देन के विवरण को बही-खाते में रिकॉर्ड किया जाता है।
- ऐसा माना जाता है कि 2008 में बिटकॉइन का आविष्कार होने के बाद इस क्रिप्टोकरेंसी को समर्थन देने के लिये ब्लॉकचेन तकनीक की खोज की गई।
- इस तकनीक में सभी ब्लॉक एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और किसी ब्लॉक में बदलाव के लिये अरबों गणनाएँ करने की ज़रूरत होती है, इसलिये एक बार आंकड़े दर्ज हो जाने के बाद इसमें बदलाव करना असंभव होता है, क्योंकि किसी भी एक ब्लॉक में मामूली बदलाव करते ही दूसरे सभी ब्लॉक परस्पर जुड़े होने के कारण बदलाव से असहमति जता देते हैं।
- अतः साइबर क्राइम और हैकिंग को रोकने के लिये ब्लॉकचेन तकनीक को फुलप्रूफ सिस्टम के तौर पर जाना जाता है। साइबर सिक्योरिटी को बढ़ावा देने के लिये ब्लॉकचेन तकनीक लागू करने वाला आंध्र प्रदेश पहला राज्य है।
- एक सर्वे के अनुसार, विश्व के 70% से अधिक बैंक अपनी व्यवस्था में ब्लॉकचेन के अनुप्रयोग की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। ध्यातव्य है कि यह तकनीक केवल क्रिप्टोकरेंसी तक सीमित नहीं है। क्रिप्टोकरेंसी के अलावा निम्नलिखित क्षेत्रों में ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग किया जा सकता है-
- सूचना प्रौद्योगिकी और डाटा प्रबंधन
- सरकारी योजनाओं का लेखा-जोखा
- सब्सिडी वितरण
- भू-रिकॉर्ड विनियमन
- बैंकिंग और बीमा
- डिजिटल पहचान और प्रमाणीकरण
- स्वास्थ्य आंकड़े
- क्लाउड स्टोरेज
- ई-गवर्नेंस
- शैक्षणिक जानकारी
- ई-वोटिंग आदि।
- भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (Telecom Regulatory Authority of India- TRAI) ने अप्रत्याशित फोन कॉल्स तथा मैसेजेज़ को रोकने के लिये ‘टेलिकॉम कमर्शियल कम्यूनिकेशन कस्टमर प्रिफरेंस रेग्यूलेशन, 2018’ जारी किया है। ट्राई ने इस मसौदे में ब्लॉकचेन तकनीक के इस्तेमाल को वरीयता दी है।
- मानव सभ्यता के विकास में सूचना तकनीक को चौथी क्रांति माना जा रहा है, जिसका मूल आधार है- डिजिटल तकनीक। इस तकनीक में आंकड़ों को बाइनरी (0, 1) रूप में परिवर्तित कर सूचनाओं का संप्रेषण किया जाता है। आधुनिक कंप्यूटर प्रणाली इसी तकनीक के आधार पर कार्य कर रही है, जिसके निम्नलिखित लाभ हैं-
- आंकड़ों, चित्रों व संदेशों की उच्च गुणवत्ता।
- सूचनाओं की संप्रेषण क्षमता एवं तीव्रता।
- त्रुटियों की संभावना एवं बाह्य हस्तक्षेप का नगण्य होना।
- डिजिटल तकनीक के द्वारा ग्लोबल विलेज (Global Village) की संकल्पना सार्थक होती दिख रही है क्योंकि किसी भी स्थान से किसी अन्य दूरस्थ स्थान को उपग्रहों के माध्यम से जोड़कर त्वरित सूचना प्राप्त कर सकते हैं।
- भारत जैसा विकासशील देश इस तकनीक के कारण विकास भी कर रहा है, किंतु इसी क्रम में एक तकनीकी समस्या ने भी जन्म लिया, जिसे ‘डिजिटल डिवाइड’ का नाम दिया गया है।
- यह एक ऐसी समस्या है जिसमें डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर रहे देशों के अंदर तथा अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में भी इसके उपयोग के आधार पर बड़ा आर्थिक अंतर उत्पन्न होता जा रहा है, जो सामाजिक समस्या को भी बढ़ा रहा है। इस प्रकार डिजिटल डिवाइड वह संकल्पना है जो डिजिटल तकनीक के उपयोग के आधार पर बढ़ रही आर्थिक-सामाजिक विषमता को व्याख्यायित करती है। इस समस्या के निवारण हेतु ‘डिजिटल कंवर्जेंस’ की अवधारणा अपनाई जा रही है। भारत सरकार ने इसके लिये दोहरी कार्यवाही को अपनाया है-
अवसंरचनात्मक विकास-
- इसके तहत वैसे क्षेत्रों में भी डिजिटल तकनीक से युक्त संरचनाओं का विकास किया जा रहा है, जो इस क्षेत्र में अभी तक पिछड़े हुए हैं। गुवाहाटी और प्रयागराज जैसे क्षेत्रों में सॉफ्टवेयर पार्क व IIIT की स्थापना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
- देश के पिछड़े क्षेत्रों को VSAT के माध्यम से बड़े सूचना केंद्रों से जोड़ा जा रहा है।
- देश के विभिन्न भागों में कंप्यूटर आधारित शिक्षण के लिये नए शैक्षणिक केंद्रों की स्थापना की जा रही है।
अनुप्रयोगात्मक प्रयास-
- ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है, जिससे डिजिटल ज्ञान को स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराया जा सके। इसके लिये विशेष सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है।
- INSAT-3A द्वारा टेलीमेडिसिन तथा GSAT-3 द्वारा टेली एजुकेशन का प्रावधान कर सुदूर क्षेत्रों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।
- गाँव व शहर के बीच आर्थिक विषमता को कम करने के लिये ‘GRAMSAT’ नामक उपग्रह प्रक्षेपित किया गया है, जिसका उद्देश्य गाँवों के समुचित विकास को प्राप्त करना है। गाँवों में ज़मीन से जुड़े आंकड़ों की जानकारी के लिये विशेष प्रकार के सॉफ्टवेयर प्रोग्राम तथा नेटवर्किंग को विकसित किया जा रहा है, जिसमें SWAN (State Wide Area Network) उल्लेखनीय है।
- वाई-फाई कॉलिंग एक नई तकनीक है जिसके माध्यम से हम बिना करियर नेटवर्क या मोबाइल नेटवर्क के किसी से बातचीत कर सकते हैं।
- इसके लिये किसी करियर नेटवर्क की बजाय हमें वाई-फाई कनेक्शन की ही आवश्यकता होती है।
- अभी तक वाई-फाई का प्रयोग तार-रहित इंटरनेट कनेक्शन, डेटा ट्रांसफर, जैसे- SHAREit, Xender आदि के लिये किया जाता था लेकिन अब इसका प्रयोग कॉल करने के लिये भी किया जा रहा है।
- वर्तमान में कुछ मोबाइल ऐप, जैसे- What’s App, Messenger, Skype आदि भी इंटरनेट कॉलिंग की सुविधा से लैस हैं।
- उक्त सभी मोबाइल ऐप कॉलिंग के लिये पूरी तरह वाई-फाई या डेटा कनेक्शन का प्रयोग करते हैं जिसे Voice Over Internet Protocol- VoIP कहा जाता है।
कार्यप्रणाली
- VoIP की सहायता से कॉलिंग के लिये यूजर को इन एप्लीकेशंस (What’s App, Messenger, Skype आदि) को मोबाइल या कंप्यूटर में डाउनलोड करना पड़ता है।
- इसके विपरीत, वाई-फाई कॉलिंग हेतु कोई एप्लीकेशन डाउनलोड करने की आवश्यकता नहीं होती है।
- वाई-फाई कॉलिंग के लिये यूजर इसे डिफ़ॉल्ट मोड में लगा सकता है। इससे मोबाइल में नेटवर्क न होने की स्थिति में यह स्वयं ही वाई-फाई कॉलिंग के माध्यम से कॉल करने में सक्षम होगा।
- वाई-फाई कॉलिंग के लिये यूजर को अलग से संपर्क सूची (Contact List) नहीं बनानी होगी बल्कि यह फोन की मौजूदा संपर्क सूची को एक्सेस कर लेगा।
- इसके तहत बिना इंटरनेट कनेक्शन और बगैर किसी अन्य ऐप के कॉल भी प्राप्त की जा सकेगी।
- वाई-फाई कॉलिंग हेतु मोबाइल फोन में ‘Wi-Fi Calling’ तथा ‘HD Voice’ की सुविधा अनिवार्य रूप से उपलब्ध होनी चाहिये।
महत्त्व
- जब करियर नेटवर्क कमज़ोर हो या उसके प्रयोग से बातचीत करना संभव न हो तब वाई-फाई कॉलिंग की आवश्यकता होती है। उदाहरण- बड़े मकानों के बीच, किसी भूमिगत स्थान में या दूरदराज़ के क्षेत्रों में नेटवर्क उपलब्ध नहीं होता। ऐसी स्थितियों में वाई-फाई कॉलिंग सहायक साबित हो सकती है।
- वाई-फाई कॉलिंग में किसी करियर नेटवर्क का प्रयोग नहीं होता। अतः इसमें टॉकटाइम या बैलेंस की आवश्यकता नहीं होती है।
- करियर नेटवर्क- करियर या वाहक नेटवर्क एक पंजीकृत नेटवर्क अवसंरचना है जिसका कार्य दूर-संचार सेवाएँ प्रदान करना है। जैसे- Airtel, Vodafone, Jio, BSNL आदि।
अपने वास्तविक रूप में इतिहास अतीत की घटनाओं का एक विश्वसनीय, क्रमबद्ध एवं समन्वित विवरण प्रस्तुत करता है। इसके अध्ययन का मुख्य ध्येय अतीत के बारे में जानना है।
ऐतिहासिक अनुसंधान के द्वारा किसी वस्तु, विचार, घटना और समुदाय या समाज विशेष के विगत जीवन तथा किसी संस्था के विकास से संबंधित तथ्यों और नियमों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इस प्रकार का अनुसंधान वर्तमान के साथ-साथ भविष्य के उचित नियोजन में भी सहायता करता है।
ऐतिहासिक अनुसंधान में ऐतिहासिक साक्ष्यों की आवश्यकता पड़ती है। इसके अंतर्गत जिन तथ्यों या सत्यों का अन्वेषण होता है, वे अतीत से जुड़े होने के कारण अमूर्त एवं चुनौतीपूर्ण संदर्भ प्रस्तुत करते हैं। ऐतिहासिक अनुसंधान के सारांशों अथवा निष्कर्षों को अन्य स्थितियों से सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता है।
जॉन डब्ल्यू. बेस्ट- ‘‘ऐतिहासिक अनुसंधान का संबंध ऐतिहासिक समस्याओं के वैज्ञानिक विश्लेषण से है। इसके विभिन्न पद भूत के संबंध में एक नई समझ पैदा करते हैं। जिसका संबंध वर्तमान और भविष्य से होता है।’’
ऐतिहासिक अनुसंधान का महत्त्व (Importance of Historical Research)
- ऐतिहासिक अनुसंधान अतीत की त्रुटियों से परिचित कराकर भविष्य के प्रति सतर्क करता है।
- यह अनुसंधान परिवर्तन की प्रकृति को समझने में सहायता करता है, जैसे- सामाजिक परिवर्तन, सांस्कृतिक परिवर्तन, नगरीकरण से संबंधित समस्याओं की प्रकृति से विशेष रूप से परिवर्तन की प्रकृति को समझा जा सकता है।
- अतीत के आधार पर वर्तमान का ज्ञान कराता है।
- इस अनुसंधान का महत्त्व शुद्ध अनुसंधान (Pure Research) और व्यावहारिक अनुसंधान (Applied Research) दोनों ही दृष्टिकोण से है।
- शिक्षा एवं मनोविज्ञान के लिये वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।
- अंधविश्वासों एवं भ्रमों का निवारण करता है।
- अतीत की घटनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन करके उसके गुण-दोषों से परिचित कराता है।
- सामाजिक जीवन में इस अनुसंधान की व्यावहारिक उपयोगिता भी है।
ऐतिहासिक अनुसंधान के मूल उद्देश्य (Objectives of Historical Research)
- ऐतिहासिक अनुसंधान का मूल उद्देश्य अतीत के आधार पर वर्तमान को समझना एवं भविष्य के लिये सतर्क होना है।
- अतीत, वर्तमान और भविष्य के मध्य संबंध स्थापित कर वैज्ञानिकों की जिज्ञासा को शांत करना है।
- अतीत के परिप्रेक्ष्य में वर्तमान घटनाक्रमों का अध्ययन कर भविष्य में इनकी सार्थकता को ज्ञात करना है।
- वर्तमान में जो सिद्धांत तथा क्रियाएँ व्यवहार में हैं, उनका उद्भव एवं विकास किन परिस्थितियों में हुआ, इस तथ्य का विश्लेषण करना।
- शिक्षा मनोविज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान के विभिन्न विषयों में चिंतन को नई दिशा एवं नवीन ज्ञान के नीति निर्धारण में सहायता प्रदान करना।
सम्मेलन एक औपचारिक बैठक को संदर्भित करता है, जहाँ प्रतिभागी विभिन्न विषयों पर सूचनाओं एवं विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इसके द्वारा सदस्य या प्रतिभागी अपनी व्यक्तिगत एवं सामूहिक समस्याओं पर विचार करते हैं।
यह एक प्रकार के बड़े समूह की सभा होती है, जहाँ सदस्य आपस में विचारों का आदान-प्रदान एवं अपने ज्ञान का संग्रहण करते हैं। प्रतिभागियों (Participants) के समूह द्वारा सम्मेलन के उद्देश्य व कार्यप्रणाली को समूह के वरिष्ठ व्यक्ति या नेता द्वारा स्पष्ट किया जाता है। सम्मेलन उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में अधिगम के लिये एक महत्त्वपूर्ण विधि है। शोधकर्त्ता (अनुसंधानकर्त्ता) इसके द्वारा अनुसंधान के क्षेत्र में संज्ञानात्मक (ज्ञानात्मक) एवं भावनात्मक उद्देश्यों की प्राप्ति करता है। सम्मेलन के द्वारा विचारों और मुद्दों की व्यापक रेंज को संभव बनाया जा सकता है।
सम्मेलन के प्रकार (Type of Conferences)
सम्मेलन के तीन प्रकार होते हैं-
- क्षेत्रीय सम्मेलन (Regional Conference)- क्षेत्रीय समस्याओं के संदर्भ में सम्मेलन का आयोजन।
- राष्ट्रीय सम्मेलन (National Conference)- राष्ट्र संबंधी विषयों, जैसे- धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक आदि पर सम्मेलन का आयोजन।
- अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (International Conference)- UNESCO या UNO द्वारा किसी मानवीय समस्या पर सम्मेलन।
सम्मेलन के लाभ (Advantage of Conference)
- स्वतंत्र अध्ययन अभिवृत्तियों का विकास होता है।
- विशेषज्ञों और प्रभावशाली व्यक्तियों से संवाद का अवसर प्राप्त होता है।
- कार्य करने के नए तरीकों व कौशल का विकास होता है।
- समान विचारधारा वाले लोगों से मिलने व बातचीत करने का अवसर मिलता है।
- संयम, धैर्य, कार्य कुशलता तथा सहनशीलता जैसे गुणों का विकास होता है।
- अनुसंधान संबंधी समस्याओं के प्रत्येक पक्ष का स्पष्ट निरूपण होता है।
- सहयोगात्मक भावना द्वारा समस्या समाधान की क्षमताओं का विकास होता है।
सम्मेलन की प्रक्रिया (Process of Conference)
सम्मेलन की कार्यवाही को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है-
- प्रारंभ- सम्मेलन का अध्यक्ष सम्मेलन के विषय, समस्या तथा उद्देश्य आदि के बारे में बताता है तथा सम्मेलन की पृठभूमि को भी स्पष्ट करता है।
- विचार विमर्श- मुख्य प्रश्न पूरे समूह के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। जब समूह के सदस्य उत्तर देना प्रारंभ करते हैं तो परिचर्चा की कार्यवाही शुरू हो जाती है तथा कोई भी सदस्य इसमें प्रतिभाग करके अपने तर्क-वितर्क प्रस्तुत कर सकता है।
- समापन- सम्मेलन के समापन पर अध्यक्ष मुख्य बिंदुओं का संक्षिप्तीकरण कर निष्कर्ष निकालने का प्रयास करता है तथा विशेष सुझाव भी देता है।
अनुसंधान (शोध) एक क्रमबद्ध एवं दीर्घ अवधि की प्रक्रिया है, जो विभिन्न चरणों में पूर्ण होती है। अनुसंधान या शोध कार्य को धैर्यपूर्वक करना चाहिये, जल्दबाज़ी या शॉर्टकट के द्वारा किया गया शोध कार्य त्रुटियुक्त होता है। कोई भी शोध कार्य पूर्ण होने पर भविष्य हेतु उपयोगी होता है। अनुसंधानकर्त्ता को अनुसंधान में किसी समस्या के समाधान तथा समस्या के संदर्भ में कुछ मुख्य बातों को ध्यान में रखते हुए शोध कार्य करना चाहिये।
- समस्या के समाधान में मुख्य बातें- गहन अध्ययन + स्वविवेक + बौद्धिक कौशल।
- समस्या के संदर्भ में मुख्य बातें- तथ्यों की गहन व व्यापक खोज करनी चाहिये।
अनुसंधान नैतिकता, अनुसंधान के ज़िम्मेदार आचरण के लिये दिशा-निर्देश प्रदान करता है। जब हम नैतिकता के बारे में सोचते हैं तो हम सही एवं गलत के बीच भेद करने वाले नियमों के बारे में सोचते हैं।
अनुसंधान नैतिकता का विषय अनुसंधान के प्रदत्त संकलन तथा विवेचन के चरण में संगत माना गया है, जैसे- शोध रिपोर्ट्स को रिपोर्ट करना शोध नैतिकता का विषय हो सकता है। अनुसंधान नैतिकता का बहुधा प्रत्यक्ष संबंध समस्या प्रतिपादन और अनुसंधान निष्कर्षों को प्रतिवेदित करने से होता है। अनुसंधान नैतिक तभी होगा जब उत्तरदाता की गोपनीयता तथा अज्ञानता सुनिश्चित होगी। शोध नैतिकता को बेहतर करने हेतु शोधार्थी को ही शोध समस्या सौंपनी चाहिये।
अनुसंधान के नैतिक मूल्य अथवा सिद्धांत (The Ethical Values or Theories of Research)
- अनुसंधान में ईमानदारीपूर्वक आँकड़ों, परिणाम तथा विधियों के साथ प्रकाशन स्थिति की रिपोर्ट तैयार करें।
- अनुसंधान में किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह व भ्रांत धारणा से बचना चाहिये।
- शोध नैतिकता में व्यक्तिपरकता को शामिल नहीं करना चाहिये।
- अनुसंधान प्रक्रिया में गंभीर एवं ध्यानपूर्वक तरीके से कार्य करना चाहिये।
- पेटेंट, कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा के अन्य प्रकारों का सम्मान करें। अनुमति के बिना प्रकाशित डाटा, विधियों व परिणामों का उपयोग न करें।
- अनुसंधान ‘सर्वजन हिताय’ होता है।
- साहित्य की समीक्षा करना जिसमें संगत क्षेत्र के अन्य व्यक्तियों या प्रासंगिक पूर्व कार्यों का योगदान हो अच्छी शोध नैतिकता की श्रेणी से संबंधित होता है।
- यह एक स्वतंत्र और स्वाभाविक प्रक्रिया है।
- अनुसंधान विश्वसनीय प्रक्रिया है। यह ज्ञान वृद्धि में सहायक है।
- अनुसंधान मानव गरिमा, गोपनीयता और स्वायत्तता का सम्मान करता है।
- अनुसंधान एक कलात्मक और सृजनशील प्रक्रिया है।
- अनुसंधान मानवीयता के गुणों से परिपूर्ण होता है।
- अनुसंधान कार्य भविष्य के लिये उपयोगी होता है।
सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) विभिन्न विषयों में आधुनिक अनुसंधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह शोधकर्त्ताओं को दक्षता, सहयोग प्रदान करने के साथ डाटा विश्लेषण सरल बनाने और शोध निष्कर्षों के प्रसार को बढ़ाने में सहायता करती है। शोध में ICT के प्रमुख अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं-
- डाटा संग्रहण और प्रबंधन- ICT ऑनलाइन सर्वेक्षण, सेंसर, मोबाइल ऐप और अन्य डिजिटल उपकरणों के माध्यम से बड़ी मात्रा में डाटा एकत्र करने की सुविधा प्रदान करती है। डाटाबेस सिस्टम और डाटा प्रबंधन सॉफ्टवेयर अनुसंधान डाटा को कुशलतापूर्वक व्यवस्थित करने, संगृहीत करने और पुनर्प्राप्त करने में सहायता करते हैं।
- डाटा विश्लेषण और विज़ुअलाइज़ेशन- उन्नत सॉफ्टवेयर और एल्गोरिदम शोधकर्त्ताओं को जटिल डाटा सेट का विश्लेषण करने, पैटर्न की पहचान करने और सार्थक निष्कर्ष प्राप्त करने में सहायता करते हैं। विजुअलाइज़ेशन उपकरण ग्राफ, चार्ट और इंटरैक्टिव विजुअल्स के निर्माण को सक्षम करते हैं, जो शोध निष्कर्षों की व्याख्या और संचार को बढ़ाते हैं।
- सहयोग और संचार- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ईमेल, प्रोजेक्ट प्रबंधन प्लेटफॉर्म और सहयोगी दस्तावेज संपादन जैसे ICT उपकरण शोधकर्त्ताओं को विभिन्न भौगोलिक स्थानों पर प्रभावी ढंग से सहयोग करने में सक्षम बनाते हैं। आभासी सहयोग स्थल टीम के सदस्यों के बीच रीयल टाइम संचार और समन्वय को बढ़ाते हैं।
- साहित्य समीक्षा और सूचना पुनर्प्राप्ति- ऑनलाइन डाटाबेस, डिजिटल लाइब्रेरी और अकादमिक सर्च इंजन शोध लेखों, पुस्तकों और कागजात की एक विशाल शृंखला तक त्वरित पहुँच प्रदान करते हैं तथा साहित्य समीक्षा व पृष्ठभूमि अनुसंधान में सहायता करते हैं। संदर्भ प्रबंधन सॉफ्टवेयर मानकीकृत प्रारूप में संदर्भों को व्यवस्थित और उद्धृत करने में मदद करता है।
- सिमुलेशन और मॉडलिंग- ICT शोधकर्त्ताओं को वास्तविक दुनिया की घटनाओं को दोहराने के लिये जटिल सिमुलेशन और मॉडल बनाने की अनुमति देती है, जिससे परिकल्पना परीक्षण और परिदृश्य विश्लेषण की सुविधा मिलती है। मॉडलिंग सॉफ्टवेयर परिणामों की भविष्यवाणी करने और सिस्टम व्यवहार को समझने में मदद करता है।
- रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS)- ICT उपग्रह इमेजरी और जीपीएस डाटा जैसी रिमोट सेंसिंग प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके भौगोलिक डाटा के विश्लेषण का समर्थन करती है। GIS सॉफ्टवेयर शोधकर्त्ताओं को स्थानिक संबंधों एवं पैटर्न का विश्लेषण व परिकल्पना करने में मदद करता है।
- संग्रहण एवं संरक्षण- डिजिटल रिपॉज़िटरी और संग्रह प्रणालियाँ डाटासेट, लेख और रिपोर्ट सहित अनुसंधान आउटपुट के दीर्घकालिक संरक्षण और पहुँच को सुनिश्चित करती हैं।
- ई-लर्निंग और कौशल विकास- ऑनलाइन पाठ्यक्रम, वेबिनार और डिजिटल शिक्षण प्लेटफॉर्म शोधकर्त्ताओं के लिये नए कौशल हासिल करना, प्रगति के साथ अपडेट रहना और अपने ज्ञान के आधार को बढ़ाना संभव बनाते हैं।
- स्वचालित प्रयोग और रोबोटिक्स- स्वचालन प्रौद्योगिकियाँ और रोबोटिक्स विशेष रूप से जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में प्रयोगों को कुशलतापूर्वक और सटीक रूप से संचालित करने में सहायता कर सकते हैं।
- सोशल मीडिया और सार्वजनिक जुड़ाव- शोधकर्त्ता अपने शोध को साझा करने, जनता के साथ जुड़ने, व्यापक दर्शक वर्ग तक निष्कर्षों का प्रसार करने, ज्ञान के प्रसार और शोध की सार्वजनिक समझ को बढ़ावा देने के लिये सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का उपयोग करते हैं।
- बिग डाटा और मशीन लर्निंग- बिग डाटा एनालिटिक्स और मशीन लर्निंग एल्गोरिदम बड़े और जटिल डाटा सेट से मूल्यवान अंतर्दृष्टि निष्कर्षित करने में मदद करते हैं, जिससे शोधकर्त्ताओं को डाटा- संचालित निर्णय और भविष्यवाणियाँ करने में मदद मिलती है।
ताप प्रदूषण तब होता है जब किसी जल निकाय अथवा वायुमंडल की वायु का तापमान बढ़ या घट जाता है। वायु के तापमान की अपेक्षा जल का तापमान सामान्यत: अधिक स्थिर होता है, अत: तापमान में तीव्र और एकाएक परिवर्तन के प्रति जलीय जीवों में अनुकूलन नहीं पाया जाता। तापमान में मात्र 1°C की कमी या वृद्धि जलीय जीवों के लिये घातक हो जाती है।
ताप प्रदूषण के प्रमुख स्रोत (Major Sources of Thermal Pollution)
- ताप प्रदूषण तब होता है जब अपशिष्ट ऊष्मा को जल निकाय के भीतर छोड़ दिया जाता है। वनाग्नि व ज्वालामुखी जैसी प्राकृतिक घटनाएँ भी ताप प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार हैं। ताप प्रदूषण के निम्नलिखित स्रोत हैं-
- परमाणु ऊर्जा संयंत्र
- कोयला दहन बिजली संयंत्र
- औद्योगिक कचरा व अपवाह
- तटीय इलाकों में वनोन्मूलन
- मृदा अपरदन
- ताप प्रदूषण के मानवीय कारणों में वनोन्मूलन, वाष्प जेनरेटरों से गर्म जल को बाहर छोड़ा जाना, साथ ही धातु प्रगालक, संसाधन मिलें, पेट्रोलियम शोध कारखाने, पेपर मिलें, रसायन संयंत्रों आदि के शीतलन हेतु जल का प्रयोग किया जाना है।
ताप प्रदूषण के प्रभाव (Effect of Thermal Pollution)
प्रत्येक प्रजाति एक अनुकूलतम तापमान परास में ही जीवित रह सकती है। कुछ जीवों, जैसे कि कुछ मछलियों के लिये यह तापमान परास बहुत कम होता है। उदाहरणत: झीलों की मछलियाँ उस स्थान से दूर हट जाती हैं जहाँ का तापमान सामान्य से 1.5ºC भी अधिक हो जाता है लेकिन नदियों की मछलियाँ 3ºC की तापमान वृद्धि सहन कर सकती हैं। तापमान परिवर्तन से जलीय निकाय के भीतर अन्य जीव स्वरूपों के लिये भी दशाएँ बदल जाती हैं जिनके कारण इन जल निकायों के समस्त बायोम में परिवर्तन आ जाता है। ताप प्रदूषण सुपोषण क्रिया (Eutrophication) को बढ़ावा देता है।
ताप प्रदूषण नियंत्रण के उपाय (Measures to Control Thermal Pollution)
- नाभिकीय संयंत्रों पर नियंत्रण
- पौधारोपण करना (तटीय क्षेत्रों में)
- मृदा अपरदन को रोकना (इससे जल को पर्याप्त सौर प्रकाश व ऑक्सीजन की प्राप्ति होगी।)
- कूलिंग टावर (ये वेस्ट ऊर्जा को वायुमंडल में वाष्प के माध्यम से छोड़ते हैं।)
- सह-उत्पादन (Co-generation)- इस प्रक्रिया में औद्योगिक जल अपवाह को ठंडा करके घरेलू उपयोग में लाया जाता है।
- कूलिंग तालाब
- कृत्रिम झील का निर्माण
- विश्व में लगभग 3 अरब लोग खाना बनाने एवं घरों को गर्म रखने में ठोस ईंधन (लकड़ी, चारकोल, कोयला, कृषि अपशिष्ट आदि) का प्रयोग करते हैं। इन अवैज्ञानिक और परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से भारी मात्रा में वायु प्रदूषण फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार घरेलू प्रदूषण के कारण प्रतिवर्ष 3.8 मिलियन लोगों की मृत्यु हो जाती है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू वायु प्रदूषण परंपरागत ईंधन, जैसे- जलावन लकड़ी, चारकोल, गोबर आदि द्वारा खाना बनाने के कारण फैलता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह प्रदूषण वायुरुद्ध घरों, वातायन (Ventilation) की कमी, घरों में रासायनिक उत्पादों एवं सिंथेटिक उत्पादों के प्रयोग के कारण फैलता है। ग्रामीण घरों में धूम्र निकासी रहित गैस चूल्हा, लकड़ी चूल्हा एवं मिट्टी तेल वाले हीटर नाइट्रोजन ऑक्साइड प्रदूषण के स्रोत हैं।
- घरेलू वायु प्रदूषण के स्रोत निम्नलिखित हैं-
- वाष्पशील कार्बनिक पदार्थ- परफ्यूम, स्प्रे, फर्नीचर पॉलिश, एयर फ्रेशनर जैसे पदार्थ घरेलू प्रदूषण के स्रोत हैं। इनके प्रभाव से आँखों, नाक, त्वचा में जलन, सिरदर्द, मितली आना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से ये पदार्थ शरीर में जमा होकर यकृत एवं शरीर के अन्य अंगों को बीमार करते हैं।
- तंबाकू- इसके धुएँ से व्यापक हानिकारक रसायन एवं कैंसरकारक रसायनों की उत्पत्ति होती है। इसके प्रभाव से आँखों, नाक, गले में जलन, कैंसर, अस्थमा एवं ब्रोंकाइटिस जैसे रोग हो जाते हैं।
- जैविक प्रदूषण- इनमें पौधों के परागकण, कीट, परजीवी, कवक एवं जीवाणुओं को सम्मिलित किया जाता है। इनके कारण एलर्जी एवं संक्रमणजन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
- रेडॉन- यह मृदा से प्राकृतिक रूप से निकलने वाली गैस है। शहरी घरों में कमजोर वातायन (Ventilation) के कारण यह घरों में सांद्रित (Concentrated) होकर फेफड़े के कैंसर का कारण बनती है।
- फॉर्मएल्डिहाइड- यह कार्पेट, तापरोधक फोम आदि से उत्पन्न होता है। यह आँखों एवं नाक में जलन एवं एलर्जी उत्पन्न करता है।
ड्रग्स को उनके स्रोत और उत्पादन विधि के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है : प्राकृतिक (नेचुरल), अर्ध-सिंथेटिक (सेमी-सिंथेटिक), और सिंथेटिक ड्रग्स।
1. प्राकृतिक ड्रग्स (Natural Drugs) :
ये सीधे प्राकृतिक स्रोतों, मुख्यतः पौधों, से प्राप्त होते हैं।
उदाहरण :
- अफीम पोस्ता (Papaver somniferum) : इससे मॉर्फिन और कोडीन जैसे अल्कलॉइड प्राप्त होते हैं।
- कैनबिस (Cannabis sativa) : मारिजुआना और हशीश का स्रोत।
- कोका (Erythroxylum coca) : कोकीन का प्राकृतिक स्रोत।
2. अर्ध-सिंथेटिक ड्रग्स (Semi-Synthetic Drugs) :
ये प्राकृतिक ड्रग्स को रासायनिक रूप से संशोधित करके बनाए जाते हैं ताकि उनकी प्रभावशीलता बढ़ाई जा सके या दुष्प्रभाव कम किये जा सकें।
उदाहरण :
- हेरोइन : मॉर्फिन का अर्ध-सिंथेटिक व्युत्पन्न।
- ऑक्सीकोडोन और हाइड्रोकोडोन : कोडीन से संशोधित दर्द निवारक का निर्माण।
- कोकीन : कोका पत्तियों से प्राप्त, लेकिन प्रसंस्करण के माध्यम से शुद्ध किया जाता है।
3. सिंथेटिक ड्रग्स (Synthetic Drugs) :
ये पूर्णतः प्रयोगशाला में रासायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निर्मित होते हैं, जिनका प्राकृतिक समकक्ष नहीं होता।
उदाहरण :
- एम्फेटामाइन्स : केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित करने वाले।
- फेंटानिल : मॉर्फिन से कई गुना अधिक शक्तिशाली सिंथेटिक ओपिओइड।
- मेथाक्वालोन : शांतिदायक और नींद लाने वाला एजेंट।
यह वर्गीकरण ड्रग्स की उत्पत्ति और उत्पादन विधि के आधार पर उसके विषय में जानकारी प्रदान करता है, जो उनके उपयोग, प्रभाव, और कानूनी स्थिति को समझने में सहायक होता है।
कर्नाटक के हासन, चिकमंगलूर और कोडागु जिलों में बढ़ते मानव-हाथी संघर्ष को ध्यान में रखते हुए, वन अधिकारियों ने एक अभिनव "सॉफ्ट रिलीज़" स्ट्रैटजी का प्रस्ताव रखा है। इस रणनीति का उद्देश्य पकड़े गए हाथियों को धीरे-धीरे भद्रा वन्यजीव अभयारण्य (BWS) में पुनर्वासित करना है ताकि उनके पर्यावरणीय अनुकूलन में आसानी हो और संघर्ष की संभावना कम हो जाए।
- मुख्य बिंदु :
- रणनीति का उद्देश्य :
- मानव-हाथी संघर्ष को कम करना।
- हाथियों के पुनर्वास के दौरान उनके स्वास्थ्य और अनुकूलन पर विशेष ध्यान देना।
- सॉफ्ट रिलीज़ प्रक्रिया :
- हाथियों को BWS के चार निर्दिष्ट स्थलों पर चरणबद्ध तरीके से छोड़ा जाएगा।
- रिलीज़ से पहले, उन्हें 20 वर्ग किलोमीटर के बाड़े में रखा जाएगा जहाँ उनकी स्वास्थ्य जाँच और अनुकूलन की प्रक्रिया सुनिश्चित की जाएगी।
- स्वास्थ्य और अनुकूलन :
- नियमित स्वास्थ्य परीक्षण एवं पर्यावरणीय अनुकूलन के माध्यम से हाथियों की स्थिति का मूल्यांकन किया जाएगा।
- इस चरण के दौरान हाथियों को आवश्यक खाद्य, पानी एवं चिकित्सा सुविधा प्रदान की जाती है।
- पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ :
- धीरे-धीरे रिलीज़ करने से हाथियों में तनाव कम होगा और वे अपने प्राकृतिक आवास के प्रति सहज होंगे।
- मानव समुदाय एवं वन विभाग के बीच समन्वय बढ़ेगा, जिससे संघर्ष के मामले में तेजी से समाधान संभव होगा।
- निगरानी एवं मूल्यांकन :
- हाथियों के व्यवहार, स्वास्थ्य एवं आवास में अनुकूलन की नियमित निगरानी की जाएगी।
- वन अधिकारियों एवं जैविक विशेषज्ञों द्वारा जारी फीडबैक के आधार पर रणनीति में आवश्यक सुधार किये जाएँगे।
- संरक्षण के व्यापक उद्देश्य :
- यह स्ट्रैटजी व्यापक वन्यजीव प्रबंधन एवं संरक्षण प्रयासों का एक हिस्सा है।
- उद्देश्य न केवल हाथियों के पुनर्वास को सुनिश्चित करना है, बल्कि क्षेत्रीय जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा भी है।
सॉफ्ट रिलीज़ स्ट्रैटजी एक मानवतावादी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपनाई गई पहल है, जो हाथियों के पुनर्वास के साथ-साथ मानव-हाथी संघर्ष को भी न्यूनतम करने में सहायक सिद्ध होगी। यह रणनीति हाथियों के स्वास्थ्य, अनुकूलन एवं दीर्घकालिक संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के लिये भी स्थायी समाधान प्रदान करती है।
- रणनीति का उद्देश्य :
सर्वोत्तम वैश्विक और भारतीय कृषि विधियाँ
प्राकृतिक कृषि एक संधारणीय कृषि पद्धति है जो रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करती है तथा मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि करके जैव विविधता को बढ़ावा देती है। दुनिया भर में अपनाई जाने वाली विभिन्न विधियाँ पारंपरिक ज्ञान, पारिस्थितिक संतुलन और संसाधन दक्षता पर केंद्रित हैं। नीचे वैश्विक और भारतीय प्राकृतिक कृषि की सर्वोत्तम कृषि विधियों का विवरण दिया गया है ।
- सर्वोत्तम वैश्विक कृषि विधियाँ
- एग्रोइकोलॉजी (लैटिन अमेरिका – ब्राज़ील, मैक्सिको, क्यूबा)
- पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जोड़ती है।
- जैव विविधता, फसल चक्र और प्राकृतिक कीट नियंत्रण को बढ़ावा देती है।
- परमाकल्चर (ऑस्ट्रेलिया)
- एक सतत भूमि उपयोग प्रणाली जो प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र का अनुकरण करती है।
- मृदा पुनर्जनन (Regeneration), वर्षा जल संचयन और सहजीवी पौधों की खेती पर केंद्रित है।
- सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन (एसआरआई) (मेडागास्कर और एशिया)
- जल उपयोग और पौधों की दूरी का अनुकूलन करके पैदावार बढ़ाता है।
- रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करता है और पौधों की मज़बूती बढ़ाता है।
- ऑर्गेनिक और बायोडायनामिक फार्मिंग (यूरोप – जर्मनी, स्विट्जरलैंड)
- कम्पोस्टिंग, फसल विविधीकरण और चंद्रमा चक्र (Lunar Cycle) का उपयोग कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।
- मृदा परिष्करण के लिये सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाता है।
- एग्रोइकोलॉजी (लैटिन अमेरिका – ब्राज़ील, मैक्सिको, क्यूबा)
- सर्वोत्तम भारतीय कृषि विधियाँ
- जीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) (आंध्र प्रदेश, कर्नाटक)
- सुभाष पालेकर द्वारा विकसित, यह जीवामृत, बीजामृत और अंतरफसल विधि का उपयोग कर रासायनिक उर्वरकों को समाप्त करता है।
- ऋषि कृषि और वैदिक खेती (महाराष्ट्र)
- पंचगव्य, अमृतपानी और आयुर्वेदिक सूत्रों का उपयोग कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।
- पारंपरिक ज्ञान पर आधारित प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करता है।
- सामुदायिक प्राकृतिक खेती (सिक्किम – भारत का पहला जैविक राज्य)
- एक नीति-आधारित पहल जिसने सिक्किम को पूरी तरह जैविक बनाया।
- रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देता है, हालांकि पैदावार में गिरावट को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।
- वाटरशेड सपोर्ट और आदिवासी कृषि (ओडिशा)
- बहु-स्तरीय फसल प्रणाली, कृषि वानिकी और देशी बीजों को बढ़ावा देता है।
- आदिवासी किसानों को पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हुए उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है।
प्राकृतिक खेती स्थिरता बढ़ाने, रासायनिक निर्भरता कम करने और जैव विविधता को संरक्षित करने में सहायक है। जहाँ वैश्विक पद्धतियाँ आधुनिक तकनीकों के साथ पारिस्थितिक सिद्धांतों को जोड़ती हैं, वहीं भारतीय पारंपरिक विधियाँ स्वदेशी ज्ञान पर आधारित हैं। इन पद्धतियों को बड़े पैमाने पर अपनाने से कृषि का भविष्य अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है।
- जीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) (आंध्र प्रदेश, कर्नाटक)
- परिचय
- फ्लाई ऐश (Fly Ash) प्राय: कोयला संचालित विद्युत संयंत्रों से उत्पन्न प्रदूषक हैं, जिसे दहन कक्ष से निष्कासित गैसों द्वारा ले जाया जाता है।
- इसे इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर या बैग फिल्टर द्वारा निष्कासित गैसों से एकत्र किया जाता है।
- इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रीसिपिटेटर (ESP) को एक फिल्टर उपकरण के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसका उपयोग प्रवाहित होने वाली गैस से धुएँ और धूल जैसे महीन कणों को हटाने के लिये किया जाता है।
- इस उपकरण को प्रायः वायु प्रदूषण नियंत्रण संबंधी गतिविधियों के लिये प्रयोग किया जाता है।
- चर्चा में क्यों?
हाल ही में मध्यप्रदेश के तीन ताप विद्युत गृहों को फ्लाई ऐश के कुशल व प्रभावी प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया।- यह पुरस्कार मध्यप्रदेश पॉवर जनरेटिंग कंपनी (MPPGCL) के श्री सिंगाजी ताप विद्युत गृह दोंगलिया, सतपुड़ा ताप विद्युत गृह सारनी व अमरकंटक ताप विद्युत गृह चचाई को प्रदान किया गया।
- यह सम्मान फ्लाई ऐश उपयोगिता-2025 विषय पर गोवा में मिशन एनर्जी फाउंडेशन द्वारा आयोजित 14वें अंतर्राष्ट्रीय आवासीय सम्मेलन के दौरान दिया गया।
- यह सम्मेलन मिशन एनर्जी फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया था, जो एक गैर-लाभकारी संगठन है।
- संयोजन :
फ्लाई ऐश में विभिन्न रासायनिक तत्त्व होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से :- सिलिकॉन डाइऑक्साइड (SiO₂)
- एल्युमीनियम ऑक्साइड (Al₂O₃)
- फेरिक ऑक्साइड (Fe₂O₃)
- कैल्शियम ऑक्साइड (CaO)
ये सभी तत्त्व मिलकर फ्लाई ऐश को विभिन्न उपयोगों के लिये उपयुक्त बनाते हैं।
- अनुप्रयोग :
फ्लाई ऐश का उपयोग कई उद्योगों में किया जाता है, जैसे :- कंक्रीट और सीमेंट उत्पादों : फ्लाई ऐश का मिश्रण कंक्रीट में मजबूती और स्थिरता बढ़ाने के लिये किया जाता है।
- रोड बेस : सड़क निर्माण में इसे एक मजबूत और स्थिर आधार के रूप में उपयोग किया जाता है।
- मेटल रिकवरी : फ्लाई ऐश में कुछ धातुओं का मिश्रण होता है, जिन्हें पुनः प्राप्त किया जा सकता है।
- मिनरल फिलर : फ्लाई ऐश का उपयोग विभिन्न प्रकार के मिनरल फिलर के रूप में भी किया जाता है, जो निर्माण सामग्री में सहायक होते हैं।
हालाँकि फ्लाई ऐश के कई फायदे हैं, लेकिन इसके कण कण विषैले वायु प्रदूषक हैं। ये हृदय रोग, कैंसर, श्वसन रोग और स्ट्रोक को बढ़ावा दे सकते हैं।
प्रकाश रासायनिक धुंध (Photochemical Smog) एक प्रकार का वायु प्रदूषण है, जो तब उत्पन्न होता है जब सूर्य के प्रकाश के प्रभाव से वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOₓ) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) जैसे प्रदूषकों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में ओजोन (O₃), पेरॉक्सी एसिटाइल नाइट्रेट (PAN) और अन्य विषैले यौगिकों जैसे हानिकारक द्वितीयक प्रदूषक उत्पन्न होते हैं। यह धुंध विशेष रूप से शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में गर्म, धूप वाले दिनों में अधिक पाई जाती है।
प्रकाश रासायनिक धुंध का निर्माण कैसे होता है?
1. प्राथमिक प्रदूषकों का उत्सर्जन :
- वाहनों, उद्योगों और बिजली संयंत्रों से NOₓ और VOCs जैसे प्रदूषक वातावरण में उत्सर्जित होते हैं।
2. प्रकाश रासायनिक प्रतिक्रिया :
- सूर्य के प्रकाश में, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) टूटकर नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और मुक्त ऑक्सीजन परमाणु (O) में परिवर्तित हो जाता है।
- मुक्त ऑक्सीजन परमाणु, ऑक्सीजन अणु (O₂) से प्रतिक्रिया करके ओजोन (O₃) का निर्माण करते हैं।
- VOCs, NO और ओजोन के साथ मिलकर PAN, एल्डिहाइड्स और अन्य विषैले यौगिक बनाते हैं।
प्रकाश रासायनिक धुंध के प्रमुख घटक
- ओजोन (O₃) : एक हानिकारक गैस जो श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है।
- पेरॉक्सी एसिटाइल नाइट्रेट (PAN) : आँखों में जलन और पौधों को नुकसान पहुँचाता है।
- नाइट्रोजन ऑक्साइड्स (NOₓ) : ओजोन के निर्माण और अम्ल वर्षा में योगदान देता है।
- वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) : ईंधन, पेंट और सॉल्वेंट्स से उत्सर्जित होते हैं।
धुंध के निर्माण में सहायक कारक
- उच्च तापमान : रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेज करता है।
- तेज धूप : प्रदूषकों के साथ रासायनिक प्रतिक्रियाओं को उत्प्रेरित करती है।
- स्थिर वायु : प्रदूषकों के फैलाव को रोकती है।
- शहरीकरण : वाहनों और उद्योगों से उत्सर्जन को बढ़ाता है।
प्रकाश रासायनिक धुंध के हानिकारक प्रभाव
- मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव
- श्वसन संबंधी समस्याएँ : दमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों में जलन का कारण बनता है।
- आँखों में जलन : PAN और ओजोन से आँखों में जलन होती है।
- दीर्घकालिक रोग : लंबे समय तक संपर्क से गंभीर श्वसन रोग हो सकते हैं।
- पर्यावरण पर प्रभाव
- वनस्पति को नुकसान : धुंध प्रकाश संश्लेषण को कम कर देती है, जिससे पौधों की वृद्धि में रुकावट आती है।
- मृदा प्रदूषण : मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर कृषि उत्पादन में कमी लाता है।
- पारिस्थितिकी असंतुलन : संवेदनशील प्रजातियों को नुकसान पहुँचाकर पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा करता है।
- वस्त्र और संरचनाओं पर प्रभाव
- संरचनाओं का क्षरण : इमारतों और स्मारकों को नुकसान पहुँचाता है।
- रंग-रोगन का क्षरण : वाहनों और अन्य धातु सतहों के रंग को खराब करता है।
प्रकाश रासायनिक धुंध मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और संरचनाओं के लिये एक गंभीर खतरा है। इसके प्रभाव को कम करने के लिये उत्सर्जन में कमी, स्वच्छ तकनीकों का उपयोग, और जन जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। इन उपायों से न केवल पर्यावरण को संरक्षित किया जा सकता है, बल्कि एक स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की दिशा में भी कदम बढ़ाए जा सकते हैं।
दृश्य सहायक सामग्री महत्वपूर्ण शिक्षण उपकरण हैं जो शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक रोचक, समझने योग्य और यादगार बनाने में सहायक होते हैं। ये दृश्य उपकरण जटिल अवधारणाओं को सरल बनाने, शिक्षार्थियों का ध्यान बनाए रखने और जानकारी के बेहतर स्मरण को बढ़ावा देने में मदद करते हैं।
- दृश्य सहायक सामग्री के प्रकार
- चार्ट्स और ग्राफ्स
- प्रकार : बार चार्ट, पाई चार्ट, रेखा ग्राफ, हिस्टोग्राम।
- उद्देश्य : सांख्यिकीय डेटा प्रस्तुत करना, विभिन्न चर का तुलनात्मक विश्लेषण करना, और समय के साथ प्रवृत्तियों को प्रदर्शित करना।
- उदाहरण : विभिन्न राज्यों में साक्षरता दर को दर्शाने वाला बार ग्राफ।
- आरेख (Diagrams)
- प्रकार : फ्लोचार्ट, प्रक्रिया आरेख, संकल्पना मानचित्र।
- उद्देश्य : प्रक्रियाओं को समझाना, संबंधों का प्रदर्शन करना, और संरचनाओं या प्रणालियों को चित्रित करना।
- उदाहरण : प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को समझाने वाला फ्लोचार्ट।
- मानचित्र (Maps)
- प्रकार : भौतिक, राजनीतिक, थीमैटिक, और टोपोग्राफिक मानचित्र।
- उद्देश्य : भौगोलिक समझ को बढ़ावा देना, स्थानिक संबंधों को प्रदर्शित करना और स्थानों का चित्रण करना।
- उदाहरण : भारत के राज्यों को दर्शाने वाला राजनीतिक मानचित्र।
- पोस्टर (Posters)
- उद्देश्य : प्रमुख अवधारणाओं का दृश्यात्मक सारांश प्रस्तुत करना, प्रेरणादायक संदेश दिखाना और अधिगम उद्देश्यों को सुदृढ़ करना।
- उदाहरण : मानव विकास के चरणों को दिखाने वाला पोस्टर।
- फोटोग्राफ्स और चित्र (Photographs and Pictures)
- उद्देश्य : वास्तविक उदाहरण प्रदान करना, दृश्य स्मृति को सुदृढ़ करना और संदर्भात्मक समझ को स्थापित करना।
- उदाहरण : इतिहास के पाठ में ऐतिहासिक स्मारकों की तस्वीरें।
- फ्लैशकार्ड्स (Flashcards)
- उद्देश्य : शब्दावली और सूत्रों को याद रखने, शीघ्र पुनरावृत्ति, और सक्रिय अधिगम को प्रोत्साहित करना।
- उदाहरण : गणितीय सूत्रों को दिखाने वाले फ्लैशकार्ड्स।
- मॉडल्स (Models)
- प्रकार : त्रि-आयामी(3-D), डिजिटल या भौतिक मॉडल।
- उद्देश्य : जटिल संरचनाओं को समझने के लिये एक स्पर्शनीय और दृश्य अनुभव प्रदान करना।
- उदाहरण : मानव ह्रदय का त्रि-आयामी मॉडल।
- इन्फोग्राफिक्स (Infographics)
- उद्देश्य : पाठ, चित्रों और चार्ट्स को मिलाकर जटिल डेटा को सरल और रोचक तरीके से प्रस्तुत करना।
- उदाहरण : वैश्विक जलवायु परिवर्तन आँकड़ों का सारांश प्रस्तुत करने वाला इन्फोग्राफिक।
- ब्लैकबोर्ड/व्हाइटबोर्ड चित्रण
- उद्देश्य : व्याख्यान के दौरान तात्कालिक दृश्य स्पष्टीकरण देना और इंटरैक्टिव अधिगम को बढ़ावा देना।
- उदाहरण : जीवविज्ञान व्याख्यान के दौरान तंत्रिका तंत्र का त्वरित चित्रण।
- चार्ट्स और ग्राफ्स
- शिक्षण में दृश्य सहायक सामग्री का महत्व
- स्मृति को सुदृढ़ करना : दृश्य एड्स दीर्घकालिक स्मृति को बढ़ावा देते हैं।
- सक्रिय अधिगम को प्रोत्साहित करना : सहभागिता और संवाद को बढ़ावा देना।
- विविध अधिगम शैलियों का समर्थन : दृश्य, श्रवण और संवेदनशील अधिगम विधियों के लिये उपयुक्त।
- समझ विकसित करने में मदद करना : ग्राफिक एड्स से कठिन जानकारी को सरल और स्पष्ट तरीके से समझाया जा सकता है।
मिडिल इनकम ट्रैप एक आर्थिक परिघटना है, जिसे विश्व बैंक ने वर्ष 2007 में परिभाषित किया था। यह उन देशों की स्थिति को दर्शाता है जो तीव्र गति से विकास तो करते हैं लेकिन उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त करने में असफल रहते हैं। यह ट्रैप मुख्य रूप से उन देशों पर लागू होता है, जिनकी प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) 1,000 से 12,000 अमेरिकी डॉलर (2011 की कीमतों के अनुसार) के बीच होती है।
- मिडिल इनकम ट्रैप के कारण और चुनौतियाँ :
जो देश इस जाल में फंस जाते हैं, उन्हें कई संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें शामिल हैं :- बढ़ती श्रम लागत : प्रारंभिक औद्योगीकरण के बाद श्रमिकों की मजदूरी बढ़ने लगती है, जिससे सस्ते श्रम पर आधारित प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है।
- नवाचार की कमी : विकसित अर्थव्यवस्थाओं में प्रवेश करने के लिये नवाचार और उच्च मूल्य-वर्धित उद्योगों की आवश्यकता होती है, लेकिन कई देश इस दिशा में पिछड़ जाते हैं।
- आय असमानता : संपत्ति और आय का असमान वितरण सामाजिक असंतोष को जन्म देता है और आर्थिक प्रगति में बाधा डालता है।
- जनसांख्यिकीय चुनौतियाँ : जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट, कार्यशील जनसंख्या की घटती भागीदारी और कौशल की कमी विकास को धीमा कर सकती है।
- उद्योगों पर अत्यधिक निर्भरता : कई मध्यम-आय वाले देश विशिष्ट उद्योगों पर अधिक निर्भर होते हैं, जिससे वैश्विक झटकों के प्रति उनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
- क्या भारत मिडिल इनकम ट्रैप में फंस सकता है?
भारत वर्तमान में तीव्र आर्थिक विकास के बावजूद इस ट्रैप में फंसने के जोखिम का सामना कर रहा है। इसकी प्रमुख वजहें हैं :- आय असमानता : भारत विश्व के सबसे असमान देशों में से एक है, जहाँ शीर्ष 10% आबादी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57% हिस्सा है, जबकि निचले 50% लोगों का हिस्सा घटकर मात्र 13% रह गया है।
- कर नीति का प्रभाव : उच्च GST और कॉर्पोरेट कर कटौती से धनी वर्ग को अधिक लाभ मिलता है, जिससे आय असमानता और गहरी होती है।
- मजदूरी और मुद्रास्फीति : स्थिर या घटती वास्तविक मजदूरी, मुद्रास्फीति, उच्च घरेलू ऋण और कम बचत दरें भारत की आर्थिक स्थिरता को चुनौती दे सकती हैं।
मिडिल इनकम ट्रैप से बचने के लिये भारत को समावेशी विकास रणनीतियों को अपनाने की आवश्यकता है। नवाचार को प्रोत्साहित करना, शिक्षा और कौशल विकास में निवेश बढ़ाना, सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना और मध्यम वर्ग की आय क्षमता में सुधार लाना महत्वपूर्ण कदम होंगे। यदि इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया, तो भारत का उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने का सपना अधूरा रह सकता है।
मूल्यांकन शिक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका उद्देश्य छात्रों की सीखने की प्रगति और प्रदर्शन का आकलन करना है। प्रौद्योगिकी के विकास के साथ, मूल्यांकन अब ऑनलाइन और ऑफलाइन दो मुख्य तरीकों से किया जाता है। प्रत्येक पद्धति के अपने लाभ और चुनौतियाँ हैं।
- ऑनलाइन मूल्यांकन
ऑनलाइन मूल्यांकन में कंप्यूटर या इंटरनेट आधारित परीक्षा शामिल होती है, जहाँ परीक्षार्थी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से परीक्षा देते हैं।- लाभ :
- लचीलापन और सुविधा – कहीं से भी परीक्षा देने की सुविधा, जिससे यात्रा की आवश्यकता कम होती है।
- स्वचालित मूल्यांकन – बहुविकल्पीय और वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की तुरंत जाँच हो जाती है।
- कम लागत – कागज, प्रिंटिंग और प्रशासनिक खर्चों में बचत होती है।
- तत्काल प्रतिक्रिया – परीक्षार्थियों को तुरंत परिणाम और प्रदर्शन विश्लेषण प्राप्त होता है।
- कुशल डेटा प्रबंधन – डिजिटल रूप से उत्तर संग्रहीत और विश्लेषित किये जाते हैं, जिससे सटीकता बढ़ती है।
- चुनौतियाँ :
- तकनीकी निर्भरता – इंटरनेट और उपयुक्त डिजिटल उपकरणों की आवश्यकता होती है।
- नकल और सुरक्षा संबंधी चिंताएँ – परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने के लिये सख्त निगरानी की जरूरत होती है।
- सीमित वर्णनात्मक मूल्यांकन – निबंध और लंबे उत्तरों की जाँच मैन्युअल रूप से करनी पड़ती है।
- डिजिटल विभाजन – सभी परीक्षार्थियों के पास आवश्यक तकनीकी संसाधन उपलब्ध नहीं होते।
- लाभ :
- ऑफलाइन मूल्यांकन
ऑफलाइन मूल्यांकन पारंपरिक कागज-आधारित परीक्षा होती है, जिसे परीक्षा केंद्रों में आयोजित किया जाता है।- लाभ :
- बेहतर निगरानी – परीक्षक की उपस्थिति से अनुचित तरीकों से परीक्षा देने की संभावना कम हो जाती है।
- सभी परीक्षार्थियों के लिये समावेशी – इंटरनेट या डिजिटल उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती।
- वर्णनात्मक उत्तरों के लिये प्रभावी – लंबे उत्तरों और विश्लेषणात्मक प्रश्नों का सटीक मूल्यांकन किया जा सकता है।
- कोई तकनीकी बाधा नहीं – सिस्टम विफलता या कनेक्टिविटी समस्याओं का जोखिम नहीं रहता।
- चुनौतियाँ :
- समय लेने वाली जाँच प्रक्रिया – मैन्युअल मूल्यांकन के कारण परिणाम घोषित होने में अधिक समय लगता है।
- अधिक प्रशासनिक लागत – परीक्षा केंद्र, परीक्षक और प्रिंटिंग जैसी सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
- सीमित लचीलापन – परीक्षार्थियों को परीक्षा केंद्र पर निर्धारित समय पर उपस्थित होना पड़ता है।
- लाभ :
- हाइब्रिड मूल्यांकन दृष्टिकोण
एक हाइब्रिड मॉडल दोनों पद्धतियों की श्रेष्ठ विशेषताओं को मिलाकर मूल्यांकन की गुणवत्ता को बढ़ा सकता है :- वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को ऑनलाइन माध्यम से शीघ्रता से मूल्यांकित किया जा सकता है।
- वर्णनात्मक और शोध-आधारित प्रश्नों का ऑफलाइन मूल्यांकन अधिक प्रभावी होता है।
- AI-आधारित ऑनलाइन निगरानी से परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सकती है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन मूल्यांकन दोनों की अपनी विशेषताएँ और सीमाएँ हैं। जहाँ ऑनलाइन मूल्यांकन सुविधा, गति और स्वचालन प्रदान करता है, वहीं ऑफलाइन मूल्यांकन विश्वसनीयता, समावेशिता और निष्पक्षता को सुनिश्चित करता है। मूल्यांकन का तरीका विषय, मूल्यांकन की आवश्यकताओं और संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर चुना जाना चाहिये। हाइब्रिड दृष्टिकोण अपनाकर एक अधिक संतुलित और प्रभावी मूल्यांकन प्रणाली विकसित की जा सकती है।
प्रत्यक्षवाद एक दार्शनिक और शोध दृष्टिकोण है, जो वैज्ञानिक विधियों और निष्पक्षता पर आधारित होता है। यह समाजशास्त्र को प्राकृतिक विज्ञानों की तरह एक व्यवस्थित और सुसंगठित ज्ञान के रूप में देखने पर बल देता है।
- मुख्य विशेषताएँ :
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण :
- प्रत्यक्षवाद वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण करता है, जिसे प्राकृतिक विज्ञानों में अपनाया जाता है।
- यह अनुभवजन्य तथ्यों (empirical facts) और परिक्षणीय डेटा (verifiable data) पर आधारित होता है।
- निष्पक्षता और तटस्थता :
- प्रत्यक्षवाद में निष्पक्षता (objectivity) को प्राथमिकता दी जाती है।
- यह व्यक्तिगत भावनाओं, विश्वासों और मूल्यों को ज्ञान से अलग मानता है।
- ज्ञान और ज्ञाता का विभाजन :
- प्रत्यक्षवाद यह मानता है कि ज्ञान (knowledge) और ज्ञाता (knower) स्वतंत्र होते हैं।
- इसमें आत्मपरकता (subjectivity) को नकारकर तथ्य-आधारित निष्कर्षों पर जोर दिया जाता है।
- समाजशास्त्र और सामान्य बोध का अंतर :
- समाजशास्त्र केवल सामान्य बोध (common sense) पर आधारित नहीं होता, बल्कि व्याख्यात्मक सिद्धांतों (explanatory theories) का अनुसरण करता है।
- यह सार्वभौमिक नियमों (universal laws) के आधार पर सामाजिक घटनाओं की व्याख्या करता है।
- संगठित और व्यवस्थित ज्ञान :
- प्रत्यक्षवाद को वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय शब्दावली के माध्यम से संरचित किया जाता है।
- यह विशेष प्रवीणताओं (expertise) और कौशलों पर आधारित होता है।
- सामान्यीकरण और अमूर्तता :
- प्रत्यक्षवाद समाजशास्त्र को नियमों और सामान्यीकरण (generalization) के माध्यम से समझने का प्रयास करता है।
- यह मानव अनुभवों को विश्लेषणात्मक और तर्कसंगत तरीके से परिभाषित करता है।
प्रत्यक्षवाद समाजशास्त्र को वैज्ञानिक अध्ययन की दृष्टि से देखने का प्रयास करता है। यह निष्पक्षता, तर्क, और अनुभवजन्य तथ्यों के आधार पर सामाजिक घटनाओं की व्याख्या करता है, जिससे समाजशास्त्र को एक सुव्यवस्थित विज्ञान के रूप में मान्यता मिलती है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण :
अनुसंधान एक व्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है, जिसका मुख्य लक्ष्य नए ज्ञान की खोज, समस्याओं के समाधान और मौजूदा समझ के विस्तार में योगदान देना है। प्रत्येक शोध अध्ययन एक स्पष्ट उद्देश्य के साथ किया जाता है, जो अनुसंधान की दिशा निर्धारित करता है। परिकल्पना (Hypothesis) के निर्माण से लेकर अनुसंधान प्रस्ताव (Research Proposal) के विकास तक, शोध के उद्देश्य मार्गदर्शक शक्ति के रूप में कार्य करते हैं, जिससे शोधकर्ता सार्थक निष्कर्षों तक पहुँच सकते हैं। अनुसंधान का अंतिम उद्देश्य नवीन निष्कर्षों की खोज, मौजूदा सिद्धांतों की पुष्टि या संशोधन, और वैज्ञानिक एवं बौद्धिक प्रगति में योगदान देना है।
- अनुसंधान के प्रमुख उद्देश्य
- नए ज्ञान की प्राप्ति – अनुसंधान का मुख्य लक्ष्य अज्ञात तथ्यों, अवधारणाओं या पैटर्न को खोजकर मानवीय ज्ञान को समृद्ध करना है।
- परिस्थितियों का सटीक वर्णन – अनुसंधान का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य किसी विशेष स्थिति, घटना या प्रवृत्ति का विस्तृत, सटीक और निष्पक्ष विवरण प्रस्तुत करना है।
- समस्याओं का समाधान – अनुसंधान विभिन्न क्षेत्रों जैसे विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, समाजशास्त्र आदि में प्रासंगिक चुनौतियों की पहचान, विश्लेषण और समाधान करने में सहायक होता है।
- विज्ञान पर आधारित वस्तुपरक ज्ञान – अनुसंधान तथ्यों और तर्कों पर आधारित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है, जिससे विषय की वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक समझ विकसित होती है।
- कार्य-कारण संबंध (Causal Relationship) की जाँच – अनुसंधान का एक प्रमुख उद्देश्य यह समझना है कि कैसे एक तत्व (Factor) दूसरे तत्व को प्रभावित करता है, जिससे कारण और प्रभाव के संबंधों को स्पष्ट किया जा सके।
- सह-संबंध (Correlation) की पहचान – अनुसंधान विभिन्न घटनाओं या चर (Variables) के बीच संबंध या सह-संबंध की खोज करता है, जिससे भविष्यवाणियाँ और निर्णय लेने की प्रक्रिया आसान हो जाती है।
- सिद्धांतों का विकास – व्यवस्थित अनुसंधान के माध्यम से नए सिद्धांतों (Theories) का निर्माण, पुष्टि या संशोधन किया जाता है, जिससे प्राकृतिक और सामाजिक घटनाओं को बेहतर समझा जा सकता है।
- महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर खोजना – अनुसंधान वैज्ञानिक विधियों, तर्कसंगत सोच और डेटा-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से विभिन्न विषयों से जुड़े महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर देने में सहायक होता है।
अनुसंधान के उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे नवाचार (Innovation) को प्रेरित करने, सामाजिक सुधार लाने और वैज्ञानिक उन्नति को गति देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। व्यवस्थित पद्धतियों और जिज्ञासु दृष्टिकोण को अपनाकर अनुसंधान विविध क्षेत्रों में प्रगति और विकास का आधार बना हुआ है।
अनुसंधान में मुख्य तथ्यों (Facts) का संकलन और विश्लेषण किया जाता है। स्रोत सामग्री के अध्ययन और मूल्यांकन के माध्यम से तथ्यों का व्यवस्थित संग्रह और संयोजन किया जाता है। मानविकी और समाज विज्ञान से जुड़े अनुसंधानों में व्यक्तिगत दृष्टिकोण का कुछ प्रभाव अवश्य रहता है, लेकिन शोधकर्ता की विश्लेषणात्मक क्षमता उसे वस्तुनिष्ठ (Objective) और तार्किक निष्कर्ष निकालने में सक्षम बनाती है।
अनुसंधान एक विकसित होती प्रक्रिया है, जिसकी प्रकृति गत्यात्मक (Dynamic), दृष्टिकोण वैज्ञानिक (Scientific), और विकास अभिसंचयी (Cumulative) होता है। यह ज्ञान और विद्वता का मार्गदर्शक भी है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए एडवर्ड और क्रॉनबैंक ने अनुसंधान को चार वर्गों में विभाजित किया:
- सर्वेक्षण अनुसंधान (Survey Research)
- यह अनुसंधान दो या अधिक चरों से संबंधित घटनाओं के आँकड़ों के संकलन और वर्गीकरण से जुड़ा होता है।
- इसका उद्देश्य इन चरों के बीच संबंधों (Correlation) को समझना होता है।
- यह अनुसंधान अन्वेषणात्मक (Exploratory) होता है।
- इस विधि का उपयोग कर जनसंख्या अध्ययन (Population Studies) को सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
- प्रविधि अनुसंधान (Technical Research)
- इस अनुसंधान का संबंध अवलोकन (Observation) विधि से जुड़ी समस्याओं के समाधान से होता है।
- जब किसी चर (Variable) के अध्ययन के लिये एक से अधिक अवलोकन विधियाँ उपलब्ध होती हैं, तो यह अनुसंधान उनकी तुलना और मूल्यांकन करके उनकी प्रभावशीलता (Effectiveness) को निर्धारित करता है।
- व्यावहारिक अनुसंधान (Applied Research)
- इस अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य व्यावहारिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना होता है।
उदाहरण: यदि किसी समस्या को हल करने के लिये कई विधियाँ उपलब्ध हों, और हमें सबसे प्रभावी विधि का चयन करना हो, तो यह अनुसंधान उचित निर्णय लेने में सहायक होता है।
- इस अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य व्यावहारिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करना होता है।
- आलोचनात्मक अनुसंधान (Critical Research)
- यह अनुसंधान पूर्व-निर्धारित धारणाओं (Preconceived Hypothesis) पर आधारित होता है।
- इसमें अनुसंधानकर्ता यह मानकर चलता है कि यदि यह अनुसंधान किया जाए, तो नए ज्ञान की प्राप्ति होगी या कुछ नए तथ्य सामने आएंगे।
एडवर्ड और क्रॉनबैंक द्वारा प्रस्तुत यह वर्गीकरण अनुसंधान पद्धतियों को एक संरचित रूप (Structured Approach) प्रदान करता है, जिससे शोधकर्ता अपनी अनुसंधान आवश्यकताओं के अनुसार उपयुक्त विधि का चयन कर सकते हैं।
अनुसंधान एक बौद्धिक, तार्किक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो नए ज्ञान के प्रकाश में आने और पुराने भ्रमों के सुधार में सहायक होती है। इसमें ज्ञान के प्रसार एवं संवर्धन के लिये प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों से प्राप्त निष्पक्ष आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है, और इस प्रक्रिया में सांख्यिकी विधियाँ तथा वैज्ञानिक अभिकल्प का प्रयोग किया जाता है। नियंत्रित और वस्तुनिष्ठ निरीक्षण द्वारा प्राप्त परिणामों के सत्यापन के लिये विश्वसनीय उपकरणों का उपयोग किया जाता है, साथ ही नए तथ्यों, विधियों या वस्तुओं की खोज एवं प्राचीन सिद्धांतों में सुधार हेतु परिकल्पनाओं का निर्माण एवं परीक्षण और सुव्यवस्थित विश्लेषण विधि का पालन किया जाता है।
- अनुसंधान के प्रकार
- प्रत्येक अनुसंधान की शुरुआत एक समस्या की पहचान से होती है, जिसके दो मुख्य उद्देश्य होते हैं :
- बौद्धिक (Intellectual) : मनुष्य की अंतर्निहित जिज्ञासा एवं ज्ञानार्जन की प्रेरणा से उत्पन्न आत्मसंतुष्टि।
- व्यावहारिक (Practical) : ज्ञान की प्राप्ति और किसी विशेष समस्या का व्यवस्थित विश्लेषण।
इन दो उद्देश्यों के आधार पर अनुसंधान को दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है :
- मूलभूत अनुसंधान (Fundamental or Basic Research) : मूलभूत अनुसंधान का मुख्य लक्ष्य नई प्ररचनाओं (Design) का निर्माण करना और वैज्ञानिक सिद्धांतों के माध्यम से प्राकृतिक तथा अन्य घटनाओं की बेहतर समझ विकसित करना है।
- विशेषताएँ :
- नए विचारों और सिद्धांतों का सृजन
- प्रगति और विकास के लिये आधार तैयार करना
- जीन पियाजे जैसे वैज्ञानिकों ने मानव विकास के सिद्धांत भी इसी आधार पर प्रतिपादित किये हैं।
- अनुप्रयुक्त अनुसंधान में भूमिका : मूलभूत अनुसंधान के सिद्धांतों और खोजों का उपयोग बाद में व्यावहारिक अनुसंधान में किया जाता है।
- विशेषताएँ :
- व्यावहारिक अनुसंधान (Applied Research) : व्यावहारिक अनुसंधान का लक्ष्य उन क्रियात्मक समस्याओं का समाधान करना है, जिनका सामना दैनिक जीवन में किया जाता है।
- विशेषताएँ :
- वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से व्यावहारिक समस्याओं का विश्लेषण
- नवीन प्रौद्योगिकियों और आधुनिक विधियों के विकास में योगदान
- प्रबंधकीय और संगठनात्मक दृष्टिकोण से अधिक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करना
- उदाहरण : किसी उद्योग या संगठन में उत्पन्न समस्या का समाधान खोजने हेतु शोध करना, जिससे की कार्यप्रणाली में सुधार और विकास हो सके।
- विशेषताएँ :
- वर्गीकरण के अन्य आयाम
राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन (National Science Foundation) अनुसंधान को निम्नलिखित श्रेणियों में भी वर्गीकृत करता है :- मूलभूत अनुसंधान (Fundamental Research)
- व्यावहारिक अनुसंधान (Applied Research)
- प्रयोगात्मक अनुसंधान (Experimental Research)
इस प्रकार, अनुसंधान की प्रक्रिया न केवल ज्ञान के सृजन और संवर्धन में सहायक है, बल्कि यह समाज में विद्यमान समस्याओं का विश्लेषण और समाधान भी प्रस्तुत करती है। यह एक सुव्यवस्थित, तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न प्रक्रिया है, जो निरंतर मानव सभ्यता के विकास में योगदान देती रहती है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों के त्वरित समाधान के लिये एक विशेष न्यायिक निकाय है। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करना और संसाधनों के सतत् उपयोग को सुनिश्चित करना है।
- परिचय
- स्थापना : राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत।
- उद्देश्य : पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन संबंधी विवादों का 6 माह के भीतर त्वरित समाधान।
- मुख्यालय : नई दिल्ली (मुख्य कार्यालय), और क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल, पुणे, कोलकाता, तथा चेन्नई।
- संरचना
- संघटन : अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य, और विशेषज्ञ सदस्य।
- कार्यकाल : सदस्यों का कार्यकाल अधिकतम 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक (पुनर्नियुक्ति नहीं)।
- नियुक्ति :
- अध्यक्ष : केंद्र सरकार द्वारा, भारतीय मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से।
- न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्य : चयन समिति के माध्यम से।
- सदस्यों की संख्या : 10-20 न्यायिक सदस्य और 10-20 विशेषज्ञ सदस्य।
- अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य
- भारत NGT स्थापित करने वाला दुनिया का तीसरा देश (ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बाद) और ऐसा करने वाला पहला विकासशील देश है।
- शक्तियाँ और अधिकार क्षेत्र
- अधिकार क्षेत्र : पर्यावरणीय अधिकारों और मुद्दों से संबंधित दीवानी मामलों का निपटारा।
- स्वप्रेरणा से अधिकार (Suo Motu Powers) : 2021 से लागू।
- भूमिकाएँ : न्यायिक, निवारक और उपचारात्मक।
- सिद्धांत :
- सतत् विकास।
- निवारक सिद्धांत (Precautionary Principle)।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle)।
- प्रक्रिया : प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन। CPC, 1908 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 से बाध्य नहीं।
- आदेश :
- सिविल कोर्ट के आदेशों की तरह बाध्यकारी।
- राहत और मुआवजे का प्रावधान।
- निर्णयों की समीक्षा और अपील की अनुमति।
- उच्चतम न्यायालय में अपील का प्रावधान (90 दिनों के भीतर)।
- NGT के तहत प्रमुख कानून :
- जल (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1974।
- वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986।
- जैव विविधता अधिनियम, 2002।
- वन संरक्षण अधिनियम, 1980।
- सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण प्राकृतिक संसाधनों के सतत् उपयोग और पर्यावरण संरक्षण में एक प्रभावी उपकरण है। यह प्रदूषण रोकने और न्यायिक प्रक्रियाओं में तेजी लाने के लिये एक मजबूत ढाँचा प्रदान करता है।
- इंट्रानेट के लाभ :
- लागत में कमी : इंट्रानेट व्यक्तिगत संचार विधियों जैसे फैक्स या मेल की आवश्यकता को समाप्त करता है। इसके बजाय, संगठन सीधे इंट्रानेट नेटवर्क पर जानकारी अपलोड कर सकते हैं, जिससे संचार लागत में कमी आती है और समग्र दक्षता में सुधार होता है।
- प्राधिकृत पहुँच : इंट्रानेट का एक प्रमुख लाभ यह है कि इसमें प्राधिकृत पहुँच नियंत्रण सेट किये जा सकते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि केवल उन व्यक्तियों को ही जानकारी तक पहुँच प्राप्त हो सकती है जिनके पास सही क्रेडेंशियल्स हैं, जिससे सुरक्षा बढ़ती है और संवेदनशील डेटा तक अनधिकृत पहुँच को रोका जाता है।
- गोपनीयता : इंट्रानेट प्रणाली संगठनात्मक जानकारी की सुरक्षा के लिये डिजाइन किये गए हैं। डेटा को एक सुरक्षित नेटवर्क में रखने से डेटा उल्लंघनों का जोखिम न्यूनतम होता है, जिससे गोपनीय जानकारी की सुरक्षा बनी रहती है।
- उत्पादकता में वृद्धि : चूँकि कर्मचारी आसानी से इंट्रानेट के माध्यम से आवश्यक संसाधनों और जानकारी तक पहुँच सकते हैं, कार्य जल्दी और अधिक प्रभावी तरीके से पूरे किये जा सकते हैं। इससे उत्पादकता में वृद्धि होती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होती है।
- इंट्रानेट के नुकसान :
- सुरक्षा चिंताएँ : सुरक्षा सुविधाओं के बावजूद, डेटा चोरी या अनधिकृत पहुँच का हमेशा जोखिम रहता है। हैकर्स निजी नेटवर्क तक पहुँच प्राप्त कर सकते हैं और संवेदनशील डेटा को जोखिम में डाल सकते हैं, इसलिये मजबूत साइबर सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है।
- संवाद में कमी : इंट्रानेट आधारित संचार पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कर्मचारियों के बीच आमने-सामने बातचीत कम हो सकती है। यह शारीरिक संचार की कमी टीमवर्क और आपसी समझ को प्रभावित कर सकती है, जो संगठनात्मक रिश्तों को मजबूत बनाने और सहयोगी कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये महत्वपूर्ण होते हैं।
इंट्रानेट प्रणाली लागत बचत और सुरक्षा में सुधार जैसे महत्वपूर्ण लाभ प्रदान करते हैं, लेकिन इसके साथ सुरक्षा जोखिमों और कर्मचारियों के बीच सामाजिक संवाद में कमी जैसी चुनौतियाँ भी हैं। इसलिये इन कारकों का संतुलन बनाए रखना संगठन में इंट्रानेट की प्रभावशीलता को अधिकतम करने के लिये महत्वपूर्ण है |
इंट्रानेट एक निजी कंप्यूटर नेटवर्क है, जिसका उपयोग किसी संगठन के अंदर सूचना के आदान-प्रदान और नेटवर्क सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये किया जाता है। यह इंटरनेट प्रोटोकॉल तकनीक का इस्तेमाल करता है, जिससे संस्था के सभी कंप्यूटर आपस में जुड़े रहते हैं। इंट्रानेट का उद्देश्य केवल एक संगठन के भीतर डेटा और जानकारी का सुरक्षित रूप से साझा करना है, न कि बाहरी उपयोगकर्ताओं से जुड़ा होना।
इंट्रानेट की स्थापना लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) और वाइड एरिया नेटवर्क (WAN) के माध्यम से की जाती है। इन नेटवर्कों के जरिए एक संगठित वातावरण में डेटा का आदान-प्रदान किया जाता है, जिससे कार्य स्थल पर कार्यशीलता और सुरक्षा दोनों को बढ़ावा मिलता है। इंट्रानेट में आमतौर पर दो मुख्य पोर्टल होते हैं:
- इंट्रानेट पोर्टल: यह पोर्टल आंतरिक सूचना को संयोजित करने और संस्थान के भीतर विभिन्न कंप्यूटरों में साझा करने के लिये होता है। इसका मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के बीच संगठनात्मक जानकारी को आसानी से उपलब्ध कराना है।
- एंटरप्राइज पोर्टल: इसे एंटरप्राइज इंफॉर्मेशन पोर्टल भी कहा जाता है। यह पोर्टल मुख्य रूप से संस्थान से बाहर की दुनिया में सूचना भेजने के लिये होता है। इसमें एक सुरक्षित यूनीसेफ एक्सेस पॉइंट होता है, जो वेब-आधारित यूजर इंटरफेस के रूप में कार्य करता है।
साइबर खतरों से बचाव के लिये निम्नलिखित सुरक्षात्मक उपाय लागू किये जा सकते हैं:
- एंटीवायरस (Antivirus): एंटीवायरस सॉफ्टवेयर, एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर होते हैं, जिसे वायरस तथा अन्य मालवेयर को रोकने, पहचानने, निर्धारित करने तथा हटाने के लिये डिजाइन किया गया है। जैसे: Avast, McAfee, Kaspersky, Quick Heal, Nortan इत्यादि।
- डिजिटल सिग्नेचर (Digital Signature): यह सिग्नेचर का इलेक्ट्रॉनिक रूप है, जो मैसेज या डॉक्यूमेंट भेजने वाले के प्रमाणीकरण तथा पहचान के लिये उपयोग होता है।
- डिजिटल सर्टिफिकेट (Digital Certificate): यह उद्देश्यों के लिए इलेक्ट्रॉनिक संदेशों के साथ जोड़ा जाता है, यह संदेश की प्रामाणिकता और पहचान सुनिश्चित करता है।
- फायरवॉल (Firewall): एक सुरक्षा बाधा, जो हार्डवेयर या सॉफ़्टवेयर-आधारित हो सकती है, जिसका उपयोग कंप्यूटरों को अनधिकृत पहुँच और संभावित साइबर खतरों से बचाने के लिये किया जाता है।
- आईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल (IP Security Protocol): यह Security Protocol Suit, इंटरनेट पर गोपनीय तथा प्रमाणीकृत सेवा प्रदान करने में उपयोगी है। IP Security, IP ट्रैफिक पर प्रमाणीकरण, इनक्रिप्शन तथा संक्षिप्तीकरण सेवा की अनुमति प्रदान करता है।
इन उपायों को लागू करने से कंप्यूटर सिस्टम और नेटवर्क की सुरक्षा स्थिति को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाया जा सकता है, जिससे साइबर खतरों से संबंधित जोखिमों को कम किया जा सकता है। नियमित अपडेट और साइबर सुरक्षा सर्वोत्तम प्रथाओं का पालन करना सुरक्षित डिजिटल वातावरण बनाए रखने के महत्वपूर्ण घटक हैं।
मानव गतिविधियों, जिन्हें मानवजनित गतिविधियाँ भी कहा जाता है, ने प्राकृतिक पर्यावरण को काफी हद तक बदल दिया है। जबकि तकनीकी प्रगति और औद्योगिक विकास ने जीवन स्तर में सुधार किया है, वे पर्यावरणीय क्षरण का कारण भी बने हैं, जो पारिस्थितिक तंत्र और मानव स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा पैदा करता है। निम्नलिखित अनुभागों में प्रमुख मानवजनित गतिविधियों और उनके पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा की गई है।
- वनों की कटाई
वनों की कटाई, जो बड़े पैमाने पर कृषि विस्तार, शहरीकरण और लकड़ी की कटाई के कारण होती है, पर्यावरण के लिये एक महत्वपूर्ण खतरा है। वन कार्बन भंडारण, जैव विविधता और जल चक्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन उनके विनाश के कारण निम्नलिखित हानियाँ होती हैं :- जैव विविधता का नुकसान होता है क्योंकि निवास स्थान नष्ट हो जाते हैं।
- कम कार्बन भंडारण के कारण ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि होती है।
- मृदा कटाव और उपजाऊ क्षमता में कमी।
- स्थानीय और वैश्विक जल चक्रों का विघटन।
- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण
औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों का विस्तार प्रदूषण और संसाधनों की कमी का कारण बनता है। इसके मुख्य प्रभावों में शामिल हैं:- कारखानों और वाहनों से वायु प्रदूषण, जो श्वसन समस्याओं और जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है।
- औद्योगिक अपशिष्टों से जल प्रदूषण, जो जलीय पारिस्थितिक तंत्र और पेयजल स्रोतों को प्रभावित करता है।
- ऊर्जा की खपत में वृद्धि, जो अक्सर जीवाश्म ईंधन पर निर्भर होती है, वैश्विक तापमान को बढ़ाती है।
- कृषि प्रथाएँ
आधुनिक कृषि, जो करोडों लोगों को भोजन प्रदान करती है, पर्यावरण पर दबाव डालती है। इनमें शामिल हैं:- सिंथेटिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग, जो मृदा और जल को प्रदूषित करते हैं।
- अत्यधिक सिंचाई, जिससे जल की कमी और मिट्टी का लवणीकरण होता है।
- एकल फसल कृषि, जो जैव विविधता और मृदा स्वास्थ्य को खराब करती है।
- खनन और संसाधन निष्कर्षण
खनिज, धातु और जीवाश्म ईंधन का निष्कर्षण आधुनिक उद्योगों के लिये आवश्यक है, लेकिन इसके गंभीर परिणाम होते हैं:- निवास स्थान का विनाश और परिदृश्य का परिवर्तन।
- भारी धातुओं जैसे हानिकारक प्रदूषकों का पर्यावरण में उत्सर्जन।
- जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण और उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि।
- अपशिष्ट उत्पादन
प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक और खतरनाक कचरे सहित अपशिष्ट उत्पादन में तेजी से वृद्धि एक प्रमुख पर्यावरणीय चिंता है:- प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री जीवन के लिये खतरा है और सदियों तक पर्यावरण में बना रहता है।
- ई-कचरे का अनुचित निपटान सीसा और पारा जैसे विषैले पदार्थों को जारी करता है।
- लैंडफिल से मीथेन उत्सर्जन होता है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
- जलवायु परिवर्तन
मानव गतिविधियों का सबसे व्यापक प्रभाव जलवायु परिवर्तन है। जीवाश्म ईंधन जलाने, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रक्रियाओं से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने:- वैश्विक तापमान में वृद्धि, हीटवेव और बदलते मौसम के पैटर्न को जन्म दिया है।
- ध्रुवीय बर्फ के पिघलने और समुद्र स्तर में वृद्धि से तटीय क्षेत्रों को खतरा उत्पन्न हुआ है।
- इससे प्राकृतिक आपदाओं, जैसे तूफान और बाढ़ की तीव्रता और आवृत्ति में वृद्धि हुई है।
- समाधान रणनीतियाँ
मानवजनित गतिविधियों के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिये निम्नलिखित सहयोगात्मक प्रयास आवश्यक हैं:- सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण।
- स्थायी कृषि और वानिकी प्रथाओं को अपनाना।
- कचरे को कम करने, पुनर्चक्रण और परिपत्र अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को बढ़ावा देना।
- पेरिस समझौते जैसे अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और पर्यावरणीय नियमों को सख्त बनाना।
- सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाना और कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिये व्यक्तिगत कार्यों को प्रोत्साहित करना।
मानवजनित गतिविधियों ने आधुनिक दुनिया को आकार दिया है, लेकिन पर्यावरण पर इसका नकारात्मक प्रभाव बहुत अधिक है। इन प्रभावों को संबोधित करने के लिये एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो स्थिरता और आने वाली पीढ़ियों के कल्याण को प्राथमिकता देता है। व्यक्तिगत, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सामूहिक कार्रवाई से नुकसान को कम किया जा सकता है और प्रकृति के साथ एक सामंजस्यपूर्ण संबंध निर्मित किया जा सकता है।
साइबर सुरक्षा कंप्यूटर नेटवर्क, प्रोग्राम या डाटा तक अनधिकृत पहुँच या उनको क्षति से बचाने के सुरक्षा उपायों से संबंधित है।
- कंप्यूटर सुरक्षा से संबंधित खतरों की समझ :
- मालवेयर (Malware): मालवेयर दोषपूर्ण (Malicious) सॉफ्टवेयर होते हैं, जिनका उपयोग कंप्यूटर सिस्टम को नुकसान पहुँचाने, संवेदनशील सूचनाओं को प्राप्त करने या व्यक्तिगत कंप्यूटर तक पहुँच के लिये किया जाता है। ये निम्न प्रकार के होते हैं :
- वायरस (Virus): ये छोटे सॉफ्टवेयर प्रोग्राम होते हैं, जो कंप्यूटर सिस्टम में प्रवेश करने के पश्चात उसे नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। ये स्वयं की कॉपी कर सकते हैं तथा अन्य प्रोग्रामों के साथ खुद को जोड़कर उन्हें क्षति पहुँचा सकते हैं। जैसे Melissa आदि।
- वॉर्म (Worms): यह स्वयं की प्रतिकृति (Self-Replicating) बनाने वाला कंप्यूटर प्रोग्राम होता है, जो दोषपूर्ण कोड फैलाने के उद्देश्य से कंप्यूटर सिस्टम में सेंध लगाता है। जैसे: Bagle, Morris, Sasser, Code Red आदि।
- ट्रोजन हॉर्स (Trojan Horse): यह ऐसा प्रोग्राम होता है, जो देखने में हानिकारक प्रतीत नहीं होता पर वास्तव में यह मालवेयर होता है।
- स्पाईवेयर (Spyware): यह प्रोग्राम कंप्यूटर सिस्टम (Owner) की गतिविधियों तथा संबंधित सूचनाओं को चुराने के लिये सिस्टम में इंस्टॉल किया जाता है।
- स्पूफिंग (Spoofing): अनधिकृत व्यक्ति द्वारा सुरक्षित डाटा तक पहुँच बनाने को Spoofing कहते हैं।
- हैकिंग (Hacking): हैकिंग एक कंप्यूटर या नेटवर्क में अनधिकृत घुसपैठ को कहा जाता है।
- सलामी तकनीक (Salami Technique): यह कई छोटे कार्यों की शृंखला को संदर्भित करता है, जिसे गुप्त रूप से संचालित किया जाता है। किसी एक प्रभावित व्यक्ति पर इन कार्यों का प्रभाव इतना कम होता है कि सामान्यत: इसे पहचान पाना कठिन होता है। उदाहरणस्वरूप ऑनलाइन खरीददारी या ATM से लेन-देन करते समय कुछ पैसे (5 या 10 पैसे) अनधिकृत रूप से व्यय हो जाना, वाहनों में डीजल एवं पेट्रोल भरवाते समय प्रतिलीटर कुछ मिलीलीटर कम तेल प्राप्त होना इत्यादि। इस प्रकार के सभी कार्य गैर-कानूनी कार्यों की श्रेणी में आते हैं।
- स्पैम (Spam): e-mail के रूप में जो अनचाहे bulk मैसेज प्राप्त होते हैं, उन्हें ‘Spam’ कहते हैं। इसे कई प्राप्तकर्त्ताओं को तुरंत भेजा गया अयातित ई-मेल भी कहते है।
- रूटकिट (Rootkit): ये ऐसे मालवेयर हैं, जिनका उपयोग किसी अनधिकृत व्यक्ति द्वारा कंप्यूटर सिस्टम पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिये किया जाता है।
- फिशिंग (Phishing): यह अवैध तरीके से संवेदनशील जानकारी, जैसे- पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड डिटेल आदि प्राप्त करने तथा फर्जी बैंक स्टेटमेंट, ई-पे रसीद आदि भेजने के लिये प्रोग्राम किये गए मालवेयर होते हैं।
- मालवेयर (Malware): मालवेयर दोषपूर्ण (Malicious) सॉफ्टवेयर होते हैं, जिनका उपयोग कंप्यूटर सिस्टम को नुकसान पहुँचाने, संवेदनशील सूचनाओं को प्राप्त करने या व्यक्तिगत कंप्यूटर तक पहुँच के लिये किया जाता है। ये निम्न प्रकार के होते हैं :
- एंटीवायरस (Antivirus): एंटीवायरस सॉफ्टवेयर ऐसे एप्लिकेशन होते हैं जो वायरस, मालवेयर, स्पायवेयर और अन्य हानिकारक सॉफ्टवेयर से आपके सिस्टम को सुरक्षित रखते हैं। यह सॉफ्टवेयर वायरस को पहचानकर उसे हटाता है, और सिस्टम को संभावित खतरों से बचाने के लिये निरंतर निगरानी करता है। एंटीवायरस प्रोग्रामों के उदाहरण में Avast, McAfee, Kaspersky, Quick Heal, Norton, Bitdefender, आदि शामिल हैं। इन सॉफ्टवेयर में रियल-टाइम प्रोटेक्शन, ऑटो-स्कैनिंग, और डेटा रिकवरी जैसी कई विशेषताएँ होती हैं, जो उपयोगकर्ता को साइबर हमलों से बचाती हैं।
- डिजिटल सिग्नेचर (Digital Signature): डिजिटल सिग्नेचर एक इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर है, जो किसी व्यक्ति या संगठन की पहचान को प्रमाणित करने के लिये प्रयोग किया जाता है। यह संदेश या दस्तावेज़ को सुरक्षित रूप से भेजने के लिये उपयोगी होता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि संदेश को बिना किसी परिवर्तन के प्राप्त किया गया है और वह वास्तविक भेजने वाले द्वारा ही भेजा गया है। यह आमतौर पर असिमेट्रिक क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करता है, जिसमें सार्वजनिक और निजी कुंजी का इस्तेमाल होता है।
- डिजिटल सर्टिफिकेट (Digital Certificate): डिजिटल सर्टिफिकेट एक इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज़ होता है, जिसे प्रमाणित किया जाता है और यह बताता है कि किसी व्यक्ति या संस्था की पहचान सत्यापित है। यह डिजिटल सिग्नेचर को विश्वसनीय बनाता है। डिजिटल सर्टिफिकेट आमतौर पर एक सार्वजनिक कुंजी के साथ जुड़ा होता है और इसे प्रमाणित करने वाली संस्था (Certificate Authority - CA) द्वारा जारी किया जाता है। यह सुरक्षा उद्देश्यों के लिये उपयोगकर्ता के डेटा की गोपनीयता और अखंडता सुनिश्चित करता है।
- फायरवॉल (Firewall): फायरवॉल एक सुरक्षा प्रणाली है, जो नेटवर्क पर होने वाली ट्रैफिक की निगरानी करती है और निर्धारित करती है कि कौन सी जानकारी नेटवर्क के अंदर या बाहर जा सकती है। यह हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर आधारित हो सकता है और उपयोगकर्ताओं को बाहरी हमलों से बचाने के लिये निर्धारित सुरक्षा नियमों के आधार पर काम करता है। फायरवॉल न केवल वायरस और हैकर्स को रोकता है, बल्कि यह नेटवर्क पर अनधिकृत प्रवेश और डाटा लीक को भी रोकने में मदद करता है।
- आईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल (IP Security Protocol): आईपी सुरक्षा प्रोटोकॉल (IPSec) एक सुरक्षा प्रोटोकॉल है जो नेटवर्क पर डेटा के संचार को सुरक्षित बनाने के लिये डिज़ाइन किया गया है। यह इंटरनेट ट्रैफिक पर डेटा को एन्क्रिप्ट और प्रमाणित करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि डेटा को भेजने और प्राप्त करने के दौरान उसकी गोपनीयता और अखंडता बनी रहती है। IPSec का उपयोग VPN (Virtual Private Network) और सुरक्षित इंटरनेट कनेक्शनों में किया जाता है, और यह डेटा के संरक्षण के लिये प्रमाणीकरण, इनक्रिप्शन और डेटा के बारे में जानकारी को संरक्षित करता है।
इन सुरक्षा उपायों का उपयोग करके, हम साइबर हमलों से अपनी डिजिटल दुनिया को सुरक्षित रख सकते हैं और व्यक्तिगत, वित्तीय, और संवेदनशील जानकारी की रक्षा कर सकते हैं।
QS वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग: सस्टेनेबिलिटी 2025 वैश्विक विश्वविद्यालयों द्वारा पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों का समाधान करने की प्रगति को मापने वाला एक महत्वपूर्ण मानदंड है। इस रैंकिंग का तीसरा संस्करण विश्वविद्यालयों के योगदान को तीन प्रमुख क्षेत्रों—पर्यावरणीय प्रभाव, सामाजिक प्रभाव, और शासन—के आधार पर मूल्यांकित करता है।
इस बार, रैंकिंग में 78 भारतीय विश्वविद्यालयों ने जगह बनाई, जिसमें कई संस्थानों ने वैश्विक मंच पर उल्लेखनीय प्रदर्शन किया।
- भारत के शीर्ष प्रदर्शनकर्त्ता
- IIT दिल्ली: भारत में प्रथम और विश्व स्तर पर 171वें स्थान पर।
- IIT खड़गपुर: राष्ट्रीय स्तर पर दूसरा और वैश्विक स्तर पर 202वाँ स्थान।
- IIT बॉम्बे: भारत में तीसरा और विश्व स्तर पर 234वाँ स्थान।
- IIT कानपुर: चौथे स्थान पर और वैश्विक स्तर पर 245वाँ।
- IIT मद्रास: भारत में पाँचवाँ और वैश्विक स्तर पर 277वाँ स्थान।
- उल्लेखनीय क्षेत्र
- पर्यावरणीय प्रभाव: IIT दिल्ली और IIT कानपुर ने क्रमशः 55वें और 87वें स्थान पर रहते हुए वैश्विक शीर्ष 100 में स्थान प्राप्त किया।
- पर्यावरणीय स्थिरता: IIT बॉम्बे भारत में सर्वोच्च स्थान पर रहा, वैश्विक स्तर पर 38वें स्थान पर।
- पर्यावरण शिक्षा: IIT बॉम्बे ने वैश्विक रैंकिंग में 32वाँ स्थान हासिल किया।
- शासन और समानता: मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन (MAHE) इस श्रेणी में भारत में अग्रणी रही और समानता के लिये शीर्ष स्थान पर (वैश्विक स्तर पर 390वाँ)।
- सामाजिक प्रभाव: IIT दिल्ली ने रोजगार और परिणाम के मामले में भारत में शीर्ष प्रदर्शन किया, वैश्विक स्तर पर 116वाँ स्थान।
- ज्ञान का आदान-प्रदान: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) इस क्षेत्र में भारत में सर्वोच्च स्थान पर रहा, वैश्विक स्तर पर 121वें स्थान पर।
- चुनौतियाँ और सुधार के अवसर
हालाँकि भारतीय विश्वविद्यालयों ने कई क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है, उन्हें स्वास्थ्य और कल्याण तथा शिक्षा प्रभाव में सुधार करने की आवश्यकता है। वर्तमान में, इन श्रेणियों में कोई भी भारतीय संस्थान शीर्ष 350 में शामिल नहीं है।
QS (Quacquarelli Symonds), एक लंदन स्थित संगठन, उच्च शिक्षा विश्लेषण के लिये जाना जाता है। इसकी रैंकिंग वैश्विक संस्थानों के लिये प्रगति और सुधार का रोडमैप प्रस्तुत करती है, जिससे शिक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता दोनों को बढ़ावा मिलता है।
1882 में लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन संबंधी प्रस्ताव दिया, जिसे भारतीय स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के इतिहास में ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है। इस प्रस्ताव के तहत रिपन ने नगरीय स्थानीय संस्थाओं के साथ-साथ ग्राम पंचायतों, न्याय पंचायतों तथा ज़िला स्तर पर ज़िला बोर्ड के गठन का प्रस्ताव रखा था।
- संविधान लागू होने के बाद की विकास यात्रा
- 2 अक्तूबर, 1952 को देश के 55 विकास खंडों में सामुदायिक विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई।
- इस कार्यक्रम के मूल्यांकन के लिये बलवंत राय मेहता समिति बनाई गई। बलवंत राय मेहता को ही भारत के पंचायती राज व्यवस्था का वास्तुकार (शिल्पी) कहा जाता है।
- इस समिति ने सामुदायिक विकास कार्यक्रमों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाने का मूल कारण जन-सहभागिता की उपेक्षा को माना व सुझाव दिया कि जन-सहभागिता सुनिश्चित करने का सबसे ठोस तरीका पंचायती राज ही हो सकता है, अत: पंचायतों का त्रिस्तरीय ढाँचा बनाया जाना चाहिये।
- सबसे पहले राजस्थान विधानसभा ने स्थानीय स्वशासन संबंधित अधिनियम पारित किया, जिसके आधार पर 2 अक्तूबर, 1959 को नागौर में नेहरू जी ने देश की पहली त्रिस्तरीय पंचायत का उद्घाटन किया।
- इसके तुरंत बाद 11 अक्तूबर, 1959 को ऐसी ही व्यवस्था आंध्र प्रदेश के महबूबनगर ज़िले के शादनगर विकास खंड में शुरू की गई।
- पंचायती राज पर गठित समितियाँ
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समिति |
सिफारिश |
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बलवंत राय मेहता (1957) |
त्रिस्तरीय पंचायत के गठन का सुझाव |
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अशोक मेहता (1977) |
त्रिस्तरीय की जगह द्विस्तरीय पंचायत के गठन का सुझाव |
|
जी.वी.के. राव (1985) |
ज़िला स्तरीय निकाय को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में महत्त्वपूर्ण स्थान देने का सुझाव |
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लक्ष्मीमल सिंघवी (1986) |
पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने का सुझाव |
इन समितियों की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी, 1989 के लोकसभा चुनाव के पहले पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने वाला 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित करना चाहते थे लेकिन वह राज्यसभा में अपेक्षित बहुमत हासिल नहीं कर पाए। आगे यही विधेयक 73वें संविधान संशोधन का आधार बना।
- 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
- 24 अप्रैल, 1993 को 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पूरे देश में लागू हुआ, इसलिये इस तिथि को ‘राष्ट्रीय पंचायत दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है। इस संशोधन के माध्यम से पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
- इसके तहत संविधान के भाग-9 को पुन: जोड़ा गया, जिसके अंतर्गत मूल संविधान में एकमात्र अनुच्छेद-243 था। भाग-9 का शीर्षक है-‘पंचायतें’ तथा इसमें अनुच्छेद 243 से 243ण (O) तक सम्मिलित हैं।
- इसके अलावा इस संशोधन के माध्यम से संविधान में 11वीं अनुसूची भी जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों के लिये निर्दिष्ट 29 विषयों की सूची दी गई है।
नोट: पंचायती राज राज्य सूची का विषय है।
- मेल मर्ज (Mail Merge): मेल मर्ज माइक्रोसॉफ्ट वर्ड (एम.एस.वर्ड) की एक महत्वपूर्ण सुविधा है। जिसकी सहायता से यूजर एक ही पत्र को अनेक व्यक्तियों को भेज सकता है। जब किसी संदेश को एक ग्रुप को भेजना हो तो वहाँ पर मेल मर्ज का प्रयोग किया जाता है। इससे हम डाटाबेस को भी जोड़ सकते है।
- वेब एड्रेस (Web Address): यह वेब पेज की स्थिति को बताता है। वेब पर वेब एड्रेस URL कहलाता है, URL (Uniform Resource Locator) इंटरनेट पर किसी फाइल के एड्रेस को दर्शाता है।
- डोमेन नाम (Domain Name): डोमेन नाम एक विशिष्ट नाम है, जिसकी सहायता से इंटरनेट उपयोगकर्त्ता वेबसाइट तक पहुँच सकता है। जैसे-Google.com, Yahoo.com इत्यादि।
- प्रमुख वेबसाइट डोमेन
- .int - International Organization & Treaty
- .info - Informational Organization
- .com - Commercial
- .gov - Government
- .edu - Education
- .org - Non-Profit Organization
- इंटरनेट प्रोटोकॅाल एड्रेस (आईपी एड्रेस) : जब यूजर अपने फोन या कंप्यूटर को इंटरनेट से जोड़ता है तो उसके डिवाइस को इंटरनेट पर पहचान के लिये एक खास कोड दिया जाता है, जिससे यूजर की लोकेशन और नेटवर्क का पता चलता है। इस कोड को ही आईपी एड्रेस (Internet Protocol Address) कहते हैं। आईपी एड्रेस चार भागों में विभजित रहता है। प्रत्येक को डॉट यानि दशमलव के चिन्ह द्वारा अलग किया जाता है। “184.106.117.64” यह आईपी एड्रेस का उदाहरण है। आईपी एड्रेस के दो वर्जन हैं :
- इंटरनेट प्रोटोकाल वर्जन 4 (IPv4): यह 32 बिट का होता है।
- इंटरनेट प्रोटोकाल वर्जन 6 (IPv6): यह 128 बिट का होता है।
- सर्च इंजन (Search Engine): सर्च इंजन एक जटिल सॉफ्टवेयर प्रोग्राम होता है, जो विशिष्ट की-वर्ड वाली जानकारी, सूचनाओं या दस्तावेज़ों को ढूंढ़ता है। कुछ सर्च इंजन: Google, Alta Vista, Yahoo, HotBot, Lycos आदि। यह इंटरनेट पर कंप्यूटर्स के बीच सूचना साझा करने का एक माध्यम है। यह हाइपरलिंक से जुड़े हुए टेक्स्ट डॉक्यूमेंट तथा अन्य संसाधनों का समूह है, जिन तक वेब ब्राउजर के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।
नागरिक अधिकारों की रक्षा और न्याय को बढ़ावा
जनहित याचिका (Public Interest Litigation या PIL) भारतीय न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण कानूनी तंत्र है, जिसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों और आम जनता के हितों की रक्षा करना है। यह याचिका उन मामलों में दाखिल की जाती है, जहाँ व्यापक जनहित से संबंधित मुद्दों का समाधान आवश्यक होता है। इसका उद्देश्य न्यायालय को इस तरह के मुद्दों पर कार्रवाई करने के लिये प्रेरित करना है जो अक्सर अनदेखे रह जाते हैं या जिन पर सरकार या प्रशासनिक तंत्र का ध्यान नहीं जाता। इसका आधार भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में निहित है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की गारंटी देते हैं।
- संबंधित कानून और अनुच्छेद
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 32 :
- यह अनुच्छेद नागरिकों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करने का अधिकार देता है। इसे 'संविधान की आत्मा' कहा जाता है क्योंकि यह न्यायिक उपचार की गारंटी प्रदान करता है।
- जनहित याचिका मुख्यतः अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की जाती है जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है और न्यायालय से हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 :
- अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को विशेष अधिकार देता है कि वे जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर सकें। उच्च न्यायालय को यह शक्ति है कि वह किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में निर्णय दे सके।
- यह अनुच्छेद राज्य स्तर पर न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति देता है, जिससे राज्य के विषयों पर जनहित याचिकाएँ दाखिल की जा सकती हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश
- हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) : इस मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल शारीरिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। यह जनहित याचिका की नींव रखने वाला एक महत्वपूर्ण मामला था।
- एस. पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981) : इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिका के दायरे को व्यापक किया और कहा कि कोई भी व्यक्ति या संस्था व्यापक जनहित के मुद्दों पर याचिका दाखिल कर सकता है, भले ही वह सीधे तौर पर प्रभावित न हो।
- जनहित याचिका की विशेषताएँ
- लोक कल्याण पर ध्यान : जनहित याचिका का मुख्य उद्देश्य उन समस्याओं का समाधान करना है जो समाज के व्यापक हिस्से को प्रभावित करती हैं। यह खासकर उन लोगों के लिये होती है जो अपनी आर्थिक या सामाजिक स्थिति के कारण न्यायालय तक पहुँचने में असमर्थ होते हैं।
- विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं : जनहित याचिका दायर करने के लिये याचिकाकर्ता का सीधे तौर पर प्रभावित होना आवश्यक नहीं है। यह किसी भी नागरिक या संगठन द्वारा दायर की जा सकती है जो मानता है कि किसी मामले में जनहित को नुकसान हो रहा है।
- व्यापक मुद्दों का दायरा : जनहित याचिका के अंतर्गत अनेक मुद्दे आते हैं, जैसे पर्यावरण संरक्षण, मानवाधिकारों का उल्लंघन, सरकारी नीति में खामियाँ, गरीबों के अधिकार, और भ्रष्टाचार।
- न्यायालय की भूमिका : जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दे सकता है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभाएँ और उन मुद्दों पर ध्यान दें जो जनहित से जुड़े हैं।
- जनहित याचिका का महत्व
- नागरिक अधिकारों की सुरक्षा : यह याचिका आम लोगों को यह अधिकार देती है कि वे न्यायपालिका के माध्यम से सरकार को जवाबदेह ठहरा सकें और जनहित के मुद्दों पर उचित कार्रवाई की मांग कर सकें।
- सामाजिक न्याय : जनहित याचिका सामाजिक न्याय को बढ़ावा देती है, खासकर उन वर्गों के लिये जो वंचित और शोषित हैं। यह सामाजिक असमानताओं को कम करने का एक महत्वपूर्ण साधन है।
- पर्यावरण संरक्षण : पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर जनहित याचिका एक प्रभावी माध्यम बन गया है। न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण सरकार और औद्योगिक संस्थाएँ पर्यावरण की रक्षा के लिये अधिक सचेत हो जाती हैं।
जनहित याचिका भारतीय न्यायिक प्रणाली का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई है, जो आम जनता के हितों की रक्षा करने और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने में सहायक है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 पर आधारित है, जो नागरिकों को न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से उनके अधिकारों की रक्षा करने का अवसर प्रदान करता है। न्यायालयों के दिशा-निर्देश और उनके द्वारा दिए गए फैसले जनहित याचिका को और भी प्रभावी बनाते हैं, जिससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद मिलती है।
- वर्ल्ड वाइड वेब (World Wide Web): यह इंटरनेट पर कंप्यूटर्स के बीच सूचना साझा करने का एक माध्यम है। यह हाइपरलिंक से जुड़े हुए टेक्स्ट डॉक्यूमेंट तथा अन्य संसाधनों का समूह है, जिन तक वेब ब्राउजर के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।
- वेब पेज (Web Page): HTML में वेब पर संचित कंप्यूटर डॉक्यूमेंट या फाइल होती हैं।
- वेबसाइट (Website): सामान्यत: अंतर्संबंधित वेब पेजों के समूह, जो किसी विषय से संबंधित तथा हाइपर लिंक से जुड़े हुए होते हैं। इसके प्रथम पेज को ‘Home Page’ कहा जाता है।
- वेब ब्राउज़र (Web Browser): यह सॉफ्टवेयर एप्लीकेशन है, जिसका उपयोग वेब पेज, चित्र, वीडियो और अन्य फाइलों सहित वर्ल्ड वाइड वेब पर सामग्री को खोजने, पुन: प्राप्त करने और प्रदर्शित करने के लिये किया जाता है। जैसे- इंटरनेट एक्सप्लोरर (IE), गूगल क्रोम (Google Chrome), सफारी (Safari), ओपेरा (Opera) आदि। यह दो प्रकार का होता है-
- Text Web Browser : यह केवल टेक्स्ट आधारित सूचनाओं को प्रदर्शित करता है।
- Graphical Web Browser : यह टेक्स्ट तथा ग्राफिकल, दोनों सूचनाओं को प्रदर्शित करता है।
- वेबमर्शियल (Webmercials): नेट पर वाणिज्यिक संदेशों के लिये इस शब्दावली का प्रयोग करते हैं।
- वेब सर्वर (Web Server): वेब सर्वर, सर्वर सॉफ्टवेयर से युक्त तथा इंटरनेट से जुड़े हुए कंप्यूटर सिस्टम होते हैं, जो वेब पेज के ज़रिये सूचनाएँ प्रदान (Deliver) करते हैं। वेब सर्वर का अपना IP Address तथा Domain Name होता है। जैसे: Apache HTTP Server, Microsoft IIS, Lightpad, Sunjava, Jigsaw इत्यादि।
- वेब (Web) 2.0 : यह एक ऐसा शब्द है जो वर्ल्ड वाइड वेब (www) तकनीक और वेब डिज़ाइन के उपयोग में बदलते रुझान का वर्णन करता है। इसका उद्देश्य रचनात्मकता, सुरक्षित जानकारी साझा करना, सहयोग बढ़ाना और वेब की कार्यक्षमता में सुधार करना है। वेब 2.0 का अनुप्रयोग लोगो को आपस में मिलकर ऑनलाइन सूचना का आदान-प्रदान करने की क्षमता पर केंद्रित होता है।
शिक्षण प्रक्रिया तीन चरणों में विभाजित की जाती है :
- पूर्व-सक्रिय चरण : तैयारी और योजना पर केंद्रित।
- सक्रिय चरण : सामग्री प्रस्तुत करने और संवाद पर केंद्रित।
- पश्च-सक्रिय चरण : मूल्यांकन और सुधार पर केंद्रित।
1. पूर्व-सक्रिय चरण (योजना चरण)
यह चरण शिक्षण प्रक्रिया की तैयारी और योजना बनाने पर केंद्रित होता है ताकि प्रभावी शिक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- मुख्य गतिविधियाँ :
- उद्देश्य निर्धारित करना :
- स्पष्ट और मापने योग्य शिक्षण लक्ष्यों को परिभाषित करना (संज्ञानात्मक, भावनात्मक, और क्रियात्मक)।
- पाठ योजना बनाना :
- सामग्री को तार्किक रूप से व्यवस्थित करना और गतिविधियों को अनुक्रमित करना।
- शिक्षण विधियाँ चुनना :
- व्याख्यान, चर्चा, प्रदर्शन जैसी उपयुक्त विधियों का चयन करना।
- संसाधनों की तैयारी :
- शिक्षण सामग्री, उपकरण, और सहायक सामग्री तैयार करना।
- चुनौतियों का पूर्वानुमान :
- संभावित कठिनाइयों की पहचान करना और उन्हें हल करने के उपाय तैयार करना।
- उद्देश्य निर्धारित करना :
2. सक्रिय चरण (कार्यांवयन चरण)
यह शिक्षण प्रक्रिया का मुख्य चरण है, जहाँ शिक्षक और छात्रों के बीच वास्तविक कक्षा संवाद होता है।
- मुख्य गतिविधियाँ :
- सामग्री प्रस्तुत करना :
- योजना के अनुसार पाठ को प्रस्तुत करना और संसाधनों का उपयोग करना।
- परस्पर संवाद को बढ़ावा देना :
- प्रश्नों, चर्चाओं और सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
- शिक्षण सहायक सामग्री का उपयोग :
- दृश्य, श्रव्य, या व्यवहारिक सामग्री का उपयोग करके समझ को गहन बनाना।
- प्रगति की निगरानी :
- छात्रों के व्यवहार, ध्यान और अवधारणाओं की समझ को देखना।
- कक्षा प्रबंधन :
- अनुशासन बनाए रखना, समावेशिता सुनिश्चित करना, और सहयोगपूर्ण शिक्षण वातावरण बनाना।
- सामग्री प्रस्तुत करना :
3.पश्च-सक्रिय चरण (मूल्यांकन चरण)
यह चरण शिक्षण प्रक्रिया और इसके परिणामों का मूल्यांकन करने और भविष्य की शिक्षा के लिये सुधार करने पर केंद्रित है।
- मुख्य गतिविधियाँ :
- अधिगम का मूल्यांकन :
- परीक्षण, असाइनमेंट, या गतिविधियों के माध्यम से छात्रों की समझ का आकलन करना।
- प्रतिक्रिया प्राप्त करना :
- छात्रों से उनके शिक्षण अनुभवों के बारे में जानकारी लेना।
- स्वयं-प्रतिबिंबन :
- शिक्षण विधियों और संवाद की प्रभावशीलता पर विचार करना।
- रिकॉर्ड रखना :
- छात्रों की प्रगति का रिकॉर्ड संजोकर रखना।
- पुनः योजना बनाना :
- प्रतिक्रिया और परिणामों का उपयोग करते हुए भविष्य की पाठ योजनाओं और रणनीतियों को समायोजित करना।
- अधिगम का मूल्यांकन :
ये तीन चरण मिलकर एक सतत, संरचित चक्र बनाते हैं, जो प्रभावी शिक्षण और गहन अधिगम सुनिश्चित करता है।
इंटरनेट शब्द, अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क को दर्शाता है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में Vint Cerf द्वारा की गई थी, जिन्हें इंटरनेट का पिता माना जाता है। यह आपस में जुड़े हुए नेटवर्कों का नेटवर्क है। इंटरनेट आधारित संचार के आरंभिक प्रयास सैन्य उद्देश्य के लिये किये गए थे। इंटरनेट पर डाटा का पारेषण (Transmission) TCP/IP द्वारा नियंत्रित होता है। TCP/IP(Transmission Control Protocol/Internet Protocol) डाटा पैकेट बनाने एवं उन्हें एकत्र करने तथा उनके एड्रेस को निर्धारित करने का कार्य करता है।
- इंटरनेट कनेक्शन के प्रकार
- एनालॉग या डायल-अप (Analog or Dial-up): यह इंटरनेट कनेक्शन के लिये टेलीफोन लाइन का उपयोग करता है। मॉडेम टेलीफोन लाइन तथा PC के मध्य इंटरफेस का कार्य करता है। SLP–Serial Line Internet Protocol तथा PPP– Point to Point Protocol, डायल-अप कनेक्शन के प्रोटोकॉल हैं। यह सबसे धीमी गति (अधिकतम 56 kbps) वाला इंटरनेट कनेक्शन है।
- ISDN (Integrated Services Digital Network ): यह कॉपर टेलीफोन वायर पर डिजिटल सिग्नल द्वारा इंटरनेट सेवा प्रदान करता है। यह एक साथ डाटा एवं वॉयस कम्युनिकेशन सेवा प्रदान करने में सक्षम है। यह डायल-अप कनेक्शन से 2 से 3 गुना ज़्यादा गति से इंटरनेट सेवा प्रदान करता है।
- DSL (Digital Subscriber Line): यह ब्रॉडबैंड कनेक्शन का एक प्रकार है, जो इंटरनेट सेवा हेतु साधारण टेलीफोन लाइन का उपयोग करता है। ADSL, SDSL, HDSL, VDSL आदि विभिन्न प्रकार की DSL तकनीक हैं, जिनकी डाटा ट्रांसफर रेट, डाउनलोड एवं अपलोड स्पीड अलग-अलग है।
- केबल टीवी (Cable TV): केबल टीवी लाइन का उपयोग कर सेवा प्रदान की जाती है। केबल टीवी लाइन के रूप में को-एक्सियल केबल का उपयोग होता है, जिस पर डाटा ट्रांसफर रेट, टेलीफोन लाइन से बेहतर होता है।
- वायरलैस (Wireless): रेडियो तरंगों के उपयोग द्वारा इंटरनेट सेवा प्रदान की जाती है। सामान्यत: इसका उपयोग LAN के रूप में किया जाता है।
- Wi-Fi (Wireless Fidelity): WiMAX (WorldWide Interoperability for Microwave Access) आदि कुछ वायरलेस तकनीकें हैं।
- सैटेलाइट (Satellite): सैटेलाइट इंटरनेट कनेक्शन उच्च गति इंटरनेट सेवा प्रदान करता है। सैटेलाइट कनेक्शन दो प्रकार का होता है।
- One Way : सैटेलाइट कनेक्शन से केवल डाटा डाउनलोड किया जा सकता है, जबकि अपलोड के लिये Dial&-up Access का प्रयोग किया जाता है।
- Two Way: डाउनलोड और अपलोड दोनों में सक्षम।
समावेशी और सतत् विकास की ओर
18-19 नवंबर 2024 को ब्राजील के रियो डी जेनेरियो के आधुनिक कला संग्रहालय में आयोजित 19वें G20 शिखर सम्मेलन ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा। यह पहला G20 शिखर सम्मेलन था जिसकी मेज़बानी ब्राजील ने की, और साथ ही यह पहला शिखर सम्मेलन था जिसमें अफ्रीकी संघ को पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल किया गया, जो अधिक समावेशिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
- ब्राज़ील की G20 अध्यक्षता की प्रमुख उपलब्धियाँ
ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने अध्यक्षता के दौरान निम्नलिखित उपलब्धियों को प्रस्तुत किया :- सामाजिक समावेश :
G20 सोशल समिट का आयोजन किया गया, जिससे नागरिक समाज को नीतिगत चर्चा में भाग लेने का अवसर मिला। - महिला सशक्तिकरण :
महिलाओं के लिये एक विशेष कार्य समूह की स्थापना की गई, जो लैंगिक समानता को प्राथमिकता देगा। - एसडीजी (SDG 18) :
जातीय-नस्लीय समानता को बढ़ावा देने के लिये नया सतत विकास लक्ष्य जोड़ा गया। - बहुपक्षीय विकास बैंक (MDB) :
इनमें सुधार के लिये एक रोडमैप तैयार किया गया, जिससे विकासशील देशों को अधिक वित्तीय सहायता मिलेगी। - जलवायु परिवर्तन :
जलवायु असमानताओं को कम करने और प्रभावित समुदायों की आय बढ़ाने पर जोर दिया गया।
- सामाजिक समावेश :
- एजेंडा प्राथमिकताएँ
शिखर सम्मेलन की थीम "न्यायपूर्ण विश्व और संधारणीय ग्रह का निर्माण (Building a Just World and a Sustainable Planet)" के तहत तीन प्रमुख एजेंडा तय किये गए :- भूख और गरीबी उन्मूलन :
"ग्लोबल एलायंस अगेंस्ट हंगर एंड पॉवर्टी" की घोषणा की गई, जिसका उद्देश्य 2030 तक भूख और गरीबी को समाप्त करना है। - ऊर्जा संक्रमण :
2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि और स्थिरता सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता जताई गई। - वैश्विक संस्थागत सुधार :
वर्ल्ड बैंक, IMF, WTO और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की वकालत की गई ताकि ग्लोबल साउथ को अधिक प्रतिनिधित्व मिल सके।
- भूख और गरीबी उन्मूलन :
- सुरक्षा और आयोजन की तैयारियाँ
ब्राज़ील सरकार ने शिखर सम्मेलन के लिये $60 मिलियन का बजट निर्धारित किया और 15 शहरों में आयोजनों की व्यवस्था की। 20,000 से अधिक सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया। क्राइस्ट द रिडीमर मूर्ति पर संभावित आतंकी हमले का अभ्यास भी सुरक्षा तैयारियों का हिस्सा था। - वैश्विक और क्षेत्रीय संवाद
ब्राज़ील के राष्ट्रपति लूला ने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा को अध्यक्षता सौंपी। उन्होंने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बीच एकजुटता पर जोर दिया। प्रमुख मुद्दों में रूस-यूक्रेन संघर्ष, इजराइल-हमास संघर्ष, अमेरिका-चीन तनाव, और वैश्विक तापमान वृद्धि पर चर्चा हुई। - G20 का वैश्विक महत्व
- वैश्विक आर्थिक प्रभाव :
G20 राष्ट्र सामूहिक रूप से विश्व के 85% आर्थिक उत्पादन, 75% निर्यात और 80% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं। - समावेशिता :
अफ्रीकी संघ को शामिल करना एक बड़ा कदम है, जो विकासशील देशों के दृष्टिकोण को मजबूती देगा। - जलवायु परिवर्तन :
G20 सदस्य देश वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 80% के हिस्सेदार हैं। इनकी नीतियाँ जलवायु परिवर्तन की दिशा तय करती हैं।
शिखर सम्मेलन का समापन ब्राजील द्वारा वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने, संधारणीयता को बढ़ावा देने और वैश्विक शासन में समावेशिता को बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता को पुनः पुष्टि करते हुए हुआ।
- वैश्विक आर्थिक प्रभाव :
यह भौतिक या तार्किक आधार पर नेटवर्क निर्माण के तरीके अर्थात् ज्यामितीय निर्माण को दर्शाता है।
- नेटवर्क टोपोलॉजी के प्रकार (Types of Network Topology)
- बस टोपोलॉजी (Bus Topology): इसमें एक केबल से सभी कंप्यूटर सीधे जुड़े रहते हैं। मुख्य केबल नेटवर्क के आधार का कार्य करती है तथा जुड़े हुए कंप्यूटरों में से एक सर्वर का कार्य करता है।

- बस टोपोलॉजी (Bus Topology): इसमें एक केबल से सभी कंप्यूटर सीधे जुड़े रहते हैं। मुख्य केबल नेटवर्क के आधार का कार्य करती है तथा जुड़े हुए कंप्यूटरों में से एक सर्वर का कार्य करता है।
- स्टार टोपोलॉजी (Star Topology): इसमें प्रत्येक कंप्यूटर तार के माध्यम से सीधे केंद्रीय हब (HUB) से जुड़ा रहता हैं। केंद्रीय हब नेटवर्क को नियंत्रित करने वाला सर्वर कंप्यूटर या साधारण जोड़ने वाला उपकरण हो सकता है। होस्ट कंप्यूटर के ख़राब होने पर पूरा नेटवर्क ही बंद हो जाता है।

- मेश टोपोलॉजी (Mesh Topology): इसमें प्रत्येक नोड(कंप्यूटर) एवं सर्वर एक दूसरे से सीधे जुड़े रहते हैं। प्रत्यक्ष कनेक्शन होने के कारण नेटवर्क अत्यधिक लोड को सहन करने में सक्षम होता है। इसमें एक नोड का कनेक्शन बाधित होने से अन्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

- ट्री टोपोलॉजी (Tree Topology): ट्री टोपोलॉजी में स्टार तथा बस टोपोलॉजी दोनों के गुण होते हैं। जिसमें स्टार टोपोलॉजी की तरह एक होस्ट कम्प्यूटर होता है तथा बस टोपोलॉजी की तरह सारे कम्प्यूटर एक ही नेटवर्क तार से जुड़े रहते हैं। यह नेटवर्क एक पेड़ के समान दिखाई देता है जिसमें सबसे ऊपर होस्ट कंप्यूटर होता है।

- रिंग टोपोलॉजी (Ring Topology): इसमें कंप्यूटर चक्रीय क्रम में आपस में जुड़े रहते हैं तथा डाटा का प्रवाह केवल एक दिशा में होता है। इसमें एक कंप्यूटर अपने आगे वाले कंप्यूटर से सीधे तौर पर जुड़ा रहता है तथा सिग्नल के लिये एकल पथ का निर्माण करता है।

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही भारत ने 'संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य' के रूप में अपनी यात्रा शुरू की। गणराज्य का अर्थ होता है कि राष्ट्र का मुखिया निर्वाचित होता है, जिसे राष्ट्रपति कहा जाता है। भारतीय संविधान के तहत राष्ट्रपति की भूमिका और शक्तियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ इनकी एक संशोधित और संक्षिप्त व्याख्या दी गई है :
- चुनाव और त्यागपत्र :
- राष्ट्रपति का चुनाव गणराज्य की परिभाषा के अनुरूप किया जाता है और वह अनुच्छेद 60 के तहत शपथ ग्रहण करते हैं।
- राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को सौंपकर पदमुक्त हो सकते हैं।
- उत्तराधिकार :
- राष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र या हटाए जाने की स्थिति में उपराष्ट्रपति अनुच्छेद 65 के तहत कार्यभार संभालते हैं।
- राष्ट्रपति (कार्य निर्वहन) अधिनियम, 1969 के अनुसार, यदि उपराष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो भारत के मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठतम न्यायाधीश राष्ट्रपति का कार्यभार संभालते हैं।
- कार्यपालिका शक्तियाँ :
- अनुच्छेद 53 के तहत संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होती है।
- यह शक्ति संविधान और विधियों के अनुसार ही प्रयोग की जा सकती है।
- राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर होते हैं और यह शक्ति कानूनी सीमाओं के तहत प्रयोग की जाती है।
- क्षमादान और दया याचिका :
- अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को दंड माफ करने, निलंबित करने, कम करने या समाप्त करने का अधिकार है।
- मृत्युदंड पाए अपराधियों की सजा पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार भी राष्ट्रपति को प्राप्त है।
- प्रधानमंत्री की नियुक्ति :
- अनुच्छेद 75 के अनुसार, राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करते हैं।
- जब किसी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिये स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तब राष्ट्रपति अपने विवेक का प्रयोग करते हैं।
- राज्यसभा में नामांकन :
- अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा में विशेष योगदान देने वाले 12 व्यक्तियों को राज्यसभा के लिये नामांकित कर सकते हैं।
- आपातकालीन शक्तियाँ :
- अनुच्छेद 352 : युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में आपातकाल की घोषणा।
- अनुच्छेद 356 : राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति शासन।
- अनुच्छेद 360 : वित्तीय आपातकाल की घोषणा।
- अन्य शक्तियाँ :
- अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति के पास कुछ विवेकाधिकार हैं, जैसे विधेयक को अपनी सहमति देने से पहले उसे पुनर्विचार के लिये वापस भेजना।
- राष्ट्रपति की वीटो शक्तियाँ :
- आत्यंतिक वीटो (Absolute Veto) : विधेयक को पूरी तरह खारिज करना।
- निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto) : विधेयक पर पुनर्विचार का आग्रह।
- पॉकेट वीटो (Pocket Veto) : विधेयक को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना। 1986 में भारतीय डाकघर संशोधन अधिनियम पर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने इस वीटो का प्रयोग किया था।
ये सिग्नल को प्रवर्धित (Amplify) करने तथा डिवाइसों के बीच इंटरफेस प्रदान करने का कार्य करते हैं।
प्रमुख नेटवर्क डिवाइसेज़ (Main Network Devices)
- रिपीटर (Repeater) : रिपीटर का काम वाई-फाई सिग्नल को प्राप्त कर उन्हें फिर से रिजनरेट करना है, ताकि सिग्नल स्ट्रेंथ में वृद्धि की जा सके और वाई-फाई कवरेज एरिया को बढ़ाया जा सके।
- हब (Hub) : कंप्यूटर नेटवर्क में हब एक डेटा डिस्ट्रीब्यूशन डिवाइस है जो नेटवर्क के विभिन्न डिवाइसों को जोड़ने और डेटा सिग्नल को फॉरवर्ड करने का काम करता है। इसका मुख्य कार्य डेटा पैकेट प्राप्त करना और उन्हें नेटवर्क पर सभी डिवाइसों तक पहुंचाना है।
- गेटवे (Gateway) : एक नेटवर्क गेटवे का उपयोग दो नेटवर्कों के बीच संचार करने के लिये किया जाता है जो विभिन्न प्रोटोकॉल सिस्टम या भाषाओं का उपयोग कर सकते हैं। यह आपके नेटवर्क को अन्य नेटवर्क या इंटरनेट से डेटा भेजने और प्राप्त करने की अनुमति देता है।
- स्विच (Switch) : स्विच एक ऐसा नेटवर्किंग उपकरण है जो की नेटवर्क के विभिन्न उपकरणों(devices) को एक दूसरे के साथ जोड़ता(connect) है, जिससे किसी नेटवर्क के अंदर डाटा का आदान-प्रदान आसानी से किया जा सके।
- ब्रिज (Bridge) : ब्रिज एक नेटवर्किंग डिवाइस है जिसका उपयोग दो "सब-नेटवर्क" को जोड़ने के लिये किया जाता है जो समान प्रोटोकॉल का उपयोग करते हैं। यह OSI मॉडल के डेटा लिंक लेयर के तहत काम करता है, इसलिये इसे लेयर-2 स्विच कहा जाता है।
- राउटर (Router) : राउटर छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होते हैं जो वायर्ड या वायरलेस कनेक्शन के माध्यम से दो या दो से अधिक कंप्यूटर नेटवर्क को आपस में जोड़ते हैं। इसलिये राउटर एक लेयर-3 नेटवर्क गेटवे डिवाइस है
- मॉडेम (Modem) : मॉडेम (modem), modulator-demodulator का संक्षिप्त रूप है। यह एक ऐसी डिवाइस है जो किसी डिजिटल सूचना को मॉड्यूलेट करके उसे एनालॉग प्रारूप में भेजती है और जो एनालॉग प्रारूप में इसे सिग्नल मिलता है उसे डिमॉड्यूलेट करके डिजिटल रूप में प्राप्त करता है।
- इथरनेट कार्ड (Ethernet Card) : इथरनेट कार्ड एक कंप्यूटर को इथरनेट केबल के माध्यम से इंटरनेट तक पहुंचने में सक्षम बनाता है ।
नीति निदेशक तत्त्व राज्य को नैतिक निर्देश हैं, ताकि राज्य मूलभूत आदर्शों को प्राप्त कर सके। ये तत्त्व देश के सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र की व्याख्या के साथ ही ‘कल्याणकारी राज्य’ का आदर्श भी घोषित करते हैं। ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं-
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अनुच्छेद |
विषय-वस्तु |
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36 |
नीति निदेशक तत्त्वों के संदर्भ में ‘राज्य’ की परिभाषा। |
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37 |
विधि निर्माण में नीति निदेशक सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य माना गया है। |
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38 |
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय से परिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना का प्रयास करना। |
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39 |
विचारशीलता और नैतिकता के सिद्धांतों का पालन करते हुए सामाजिक न्याय की स्थापना। इसके अंतर्गत, राज्य को आर्थिक और सामाजिक न्याय की सुनिश्चित करने, गरीबों और असहाय वर्गों के प्रति सामाजिक समर्थन प्रदान करने, और उन्हें आर्थिक रूप से समृद्धि में भागीदार बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिये। |
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39क |
समान अवसर के आधार पर न्याय देना व नि:शुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराना। (42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा शामिल) |
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40 |
ग्राम पंचायतों का संगठन करना तथा उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने हेतु शक्तियाँ व प्राधिकार देना। |
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41 |
कुछ दशाओं में विशेषत: बुढ़ापे, बेरोज़गारी, बीमारी, अशक्तता आदि की दशा में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार सुनिश्चित करने के लिये राज्य प्रभावी प्रावधान करेगा। |
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42 |
कार्य की न्यायसंगत और मानवीय दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध। |
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43 |
कर्मकारों को निर्वाह मज़दूरी एवं कुटीर उद्योगों का विकास। |
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43क |
उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी के लिये उपयुक्त विधान बनाना। (42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा) |
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43ख |
सहकारी समितियों का उन्नयन (97वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2011 द्वारा)। |
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44 |
नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करना। |
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45 |
6 वर्ष से कम आयु के बच्चों को शिक्षा तथा उनकी देखभाल (86 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा) |
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46 |
अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि व सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना। |
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47 |
लोगों के पोषाहार स्तर व जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य के सुधार को प्राथमिक कर्तव्य मानना तथा मादक पेयों व हानिकारक नशीले पदार्थों के सेवन का प्रतिषेध करने का प्रयास करना। |
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48 |
कृषि तथा पशुपालन का संगठन आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों के अनुसार करना तथा गायों-बछड़ों व अन्य दुधारु या वाहक पशुओं की नस्लों का परिरक्षण और सुधार करना व उनके वध का प्रतिषेध करने के लिये कदम उठाना। |
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48क |
पर्यावरण के संरक्षण व संवर्द्धन तथा वन व वन्य जीवों की रक्षा का प्रयास करना। (42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा) |
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49 |
राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण करना। |
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50 |
राज्य की लोक सेवाओं में कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण हेतु राज्य द्वारा कदम उठाना। |
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51 |
अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि, राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत व सम्मानपूर्ण संबंधों तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता से निपटाने के लिये प्रोत्साहन देने का प्रयास करना। (विदेश नीति हेतु आदर्श) |
सूचनाओं के आदान-प्रदान तथा संसाधनों के सम्मिलित उपयोग के लिये आपस में जुड़े हुए कंप्यूटरों के समूह को कंप्यूटर नेटवर्क कहते हैं। नेटवर्क के आर-पार ट्रांसमिशन के लिये आँकड़ो (Data) को कूटबद्ध करना कोडीकरण (Encryption) कहलाता है।
- कंप्यूटर नेटवर्क के प्रकार (Types of Computer Network)
कंप्यूटर नेटवर्क के निम्नलिखित प्रकार हैं- - LAN (Local Area Network): सीमित भौगोलिक क्षेत्र में कंप्यूटर तथा अन्य संबंधित उपकरणों को आपस में जोड़ने वाले नेटवर्क को ‘लोकल एरिया नेटवर्क’ कहते हैं। संस्थानों के अन्तर्गत आंतरिक संचार भी इसी के अंतर्गत आता है। जैसे- घर, स्कूल, ऑफिस आदि तक सीमित नेटवर्क। इंटरनेट लोकल एरिया नेटवर्क का ही एक प्रकार है।
- WAN (Wide Area Network): अत्यधिक बड़े भौगोलिक क्षेत्र को सम्मिलित करने वाले नेटवर्क को ‘वाइड एरिया नेटवर्क’ कहते हैं। जैसे-संपूर्ण देश या विश्व स्तर पर स्थापित नेटवर्क। इसमें अनेक संचार माध्यमों, जैसे- टेलीफोन लाइन, केबल, रेडियो वेब आदि का उपयोग किया जाता है। यह दो या दो से अधिक LAN का संयोजन भी हो सकता है। जैसे:- इंटरनेट (Internet)।
- MAN (Metropolitan Area Network): यह एक मेट्रोपोलिटन सिटी में आपस में जुड़े हुए LAN का नेटवर्क होता है। लेकिन यह WAN की अपेक्षा कम भौगोलिक क्षेत्र कवर करता है।
- VPN (Virtual Private Network): एक वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क किसी सार्वजनिक या साझे नेटवर्क (जैसे- इंटरनेट) पर निजी नेटवर्क सेवाओं को प्राप्त करने का प्रावधान करता है। इसके लिये टनलिंग प्रोटोकॉल (Tunneling Protocol) का उपयोग होता है।
- 1960 के दशक में US के रक्षा विभाग के लिये प्रथम नेटवर्क अरपानेट ( Advanced Research Projects Agency Network - ARPANET) विकसित किया गया।
जलवायु परिवर्तन पर एक ऐतिहासिक संधि
यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करके जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करना है। यह छह प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों - कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs), पर्फ्लोरोकार्बन (PFCs), और सल्फर हेक्साफ्लोराइड (SF₆) पर लागू होती है। यह 1992 में हुए संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) का विस्तार है, जो "साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों" (CBDR) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें देशों की आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखा गया है।
- महत्त्वपूर्ण तथ्य
- यह संधि UNFCCC के तीसरे सम्मलेन में 11 दिसंबर 1997 को जापान के क्योटो में इसे स्वीकार किया गया।
- यह क़ानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है जो 16 फरवरी 2005 से लागू हुआ।
- इसमें कुल 84 हस्ताक्षरकर्ताऔर 192 पक्ष हैं। हालाँकि, अमेरिका, कनाडा (2012 में वापस) और दक्षिण सूडान जैसे देश इसमें शामिल नहीं हैं।
- प्रतिबद्धता अवधि
- प्रथम प्रतिबद्धता अवधि (2008-2012) :
- 36 विकसित देशों ने अनिवार्य उत्सर्जन लक्ष्यों का पालन किया।
- लचीला तंत्र : नौ देशों ने उत्सर्जन व्यापार और अन्य देशों में कमी पर वित्तीय प्रोत्साहन जैसे तंत्रों का उपयोग किया।
- परिणाम : इन देशों ने उत्सर्जन कम किया, लेकिन कुल वैश्विक उत्सर्जन 1990 से 2010 के बीच 32% तक बढ़ा, जिसमें 2007-08 की वित्तीय मंदी का भी प्रभाव था।
- द्वितीय प्रतिबद्धता अवधि (2012-2020) :
- दोहा संशोधन (2012) : नए उत्सर्जन लक्ष्य तय किये गए, जिन्हें लागू करने के लिये 144 देशों की स्वीकृति की आवश्यकता थी। 2020 तक इस संख्या को प्राप्त कर लिया गया, जिसमें भारत 80वाँ देश था जिसने संशोधन पर सहमति प्रदान की।
- बाध्यकारी लक्ष्य वाले देश : 37 देश, जिनमें से केवल 7 ने दोहा संशोधन की पुष्टि की है।
- प्रथम प्रतिबद्धता अवधि (2008-2012) :
- संरचना और अनुपालन
- कानूनी रूप से बाध्यकारी : केवल UNFCCC सदस्य ही इसका हिस्सा बन सकते हैं, और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग व विमानन से होने वाले उत्सर्जन इसमें शामिल नहीं हैं।
- भूमि उपयोग, भूमि-उपयोग परिवर्तन और वानिकी (LULUCF) : देशों को अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिये LULUCF गतिविधियों का उपयोग करने की अनुमति है।
- कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP)
- क्योटो प्रोटोकॉल के पक्षकारों की औपचारिक बैठक जिसमें प्रगति की समीक्षा की जाती है और कार्यान्वयन पर चर्चा की जाती है।
- भारत की भूमिका और भागीदारी
- क्योटो प्रोटोकॉल : भारत पर बाध्यकारी उत्सर्जन प्रतिबद्धताएँ नहीं थीं, लेकिन उसने विकासशील और विकसित देशों के बीच विभेदित जिम्मेदारियों के सिद्धांत का समर्थन किया।
- दोहा संशोधन : भारत ने इस संशोधन की पुष्टि की, जोकि 2012-2020 की अवधि के लिये उत्सर्जन लक्ष्य को पूरा करने पर केंद्रित है।
क्योटो प्रोटोकॉल अंतरराष्ट्रीय जलवायु कार्रवाई में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसकी सीमाओं के बावजूद, इसने आगे की संधियों, जैसे पेरिस समझौते, के लिये आधार तैयार किया और वैश्विक जलवायु नीतियों को प्रभावित करना जारी रखा।
- संविधान के भाग III (अनुच्छेद 12-35 तक) में 6 मौलिक अधिकारों का विवरण है। संविधान के भाग III को ‘भारत का मैग्नाकार्टा’ की संज्ञा दी गई है।
- ‘मैग्नाकार्टा' का तात्पर्य है अधिकारों का वह प्रपत्र जिसे इंग्लैंड के किंग जॉन द्वारा 1215 में सामंतों के दबाव में जारी किया गया था। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों से संबंधित पहला लिखित प्रपत्र था।
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अनुच्छेद |
प्रावधान |
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12. |
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राज्य की परिभाषा (भारत की सरकार व संसद, राज्यों की सरकारें व विधानमंडल, सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकारी) |
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13. |
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मूल अधिकारों से असंगत तथा उनका अल्पीकरण करने वाली विधियाँ |
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14. |
समानता का अधिकार |
विधि के समक्ष समानता (विधि का शासन) |
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15. |
धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध |
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16. |
लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता |
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17. |
अस्पृश्यता का अंत |
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18. |
उपाधियों का अंत |
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19. |
स्वतंत्रता का अधिकार |
वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रताअनुच्छेद 19 सभी नागरिकों को स्वतंत्रता के छह अधिकारों की गारंटी देता है:
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20. |
अपराधों के लिये दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण |
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21. |
प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण |
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21क |
प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार (86वाँ संविधान संशोधन, 2002 द्वारा जोड़ा गया) |
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22. |
कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण |
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23.
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शोषण के विरुद्ध अधिकार |
मानव के बलात् श्रम (बेगार) व दुर्व्यापार का प्रतिषेध |
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24. |
कारखानों आदि में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन का प्रतिषेध |
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25. |
धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार |
अंत:करण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता |
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26. |
धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता |
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27. |
किसी विशेष धर्म को संपोषित करने वाले करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता |
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28. |
कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता |
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29. |
सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार |
अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार |
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30. |
शिक्षा संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार |
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31. |
निरसित |
संपत्ति का अनिवार्य अर्जन (44वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद-300क के तहत अब यह एक कानूनी अधिकार है।) |
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32. |
संवैधानिक उपचारों का अधिकार |
इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिये उपचार |
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33. |
सशस्त्र बलों, अर्द्धसैनिक बलों, पुलिस, खुफिया एजेंसियों एवं अन्य के मौलिक अधिकारों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की संसद की शक्ति। |
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34. |
जब किसी क्षेत्र में सेना विधि प्रवृत्त है तब इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों का निर्बंधन। |
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35. |
इस भाग के उपबंधों को प्रभावी करने के लिये विधान। |
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- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद-32)
- डॉ. बी.आर अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को भारतीय संविधान की आत्मा और हृदय कहा है।
- अनुच्छेद-32 मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिये एक प्रत्याभूत (Guaranteed) उपचार प्रदान करता है। यह उपचार का अधिकार भी एक मूल अधिकार है, क्योंकि यह भाग तीन में सम्मिलित है। उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों का संरक्षक और प्रत्याभूति दाता बनाया गया है।
- यह न्यायालय द्वारा जारी किया जाने वाला एक कानूनी आदेश है। सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) एवं उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) रिट जारी कर सकते हैं। ये हैं- बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण एवं अधिकार पृच्छा।
भारत में सुपर कंप्यूटर का विकास 1980 के दशक में उस समय शुरू हुआ, जब 1987 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने भारत को सुपर कंप्यूटर ‘क्रे-एक्स’ देने से मना कर दिया। भारत में कई संस्थाओं, जैसे- BARC, DRDO, National Aerospace Lab (NAL), C- DOT (Centre for Development of Telematics), C- DAC (Centre for Development of Advanced Computing) ने सुपर कंप्यूटरों के विकास में महत्वपूर्ण रूप से कार्य किया है। पुणे में वर्ष 1988 में सी-डैक (C-DAC) की स्थापना सुपर कंप्यूटरों के निर्माण हेतु की गई थी। सी-डैक, इलेक्ट्रॉनिकी तथा सूचना तकनीकी मंत्रालय (MeitY) के अंतर्गत आने वाला मुख्य अनुसंधान तथा विकास(R & D) संगठन है।
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वर्ष |
सुपर कंप्यूटर का नाम |
कंप्यूटिंग पॉवर |
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1991 |
PARAM 8000 |
भारत का पहला गीगा स्तर का सुपर कंप्यूटर |
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1998 |
PARAM 10000 |
100 गीगाफ्लॉप्स क्षमता का सुपर कंप्यूटर |
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2002 |
PARAM Padma |
1 टेराफ्लॉप्स क्षमता का भारतीय सुपर कंप्यूटर, जो विश्व के 500 शीर्ष सुपर कंप्यूटरों की सूची में शामिल (जून 2003 में जारी रैंक में 171वाँ स्थान) |
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2008 |
PARAM Yuva |
54 टेराफ्लॉप्स क्षमता का सुपर कंप्यूटर |
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2013 |
PARAM Yuva 2 |
529 टेराफ्लॉप्स (कुछ स्रोतों में 524 टेराफ्लॉक्स) की क्षमता |
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2014 |
PARAM Bio-Blaze |
बायोइंफार्मेटिक्स की चुनौतियों से निपटने के लिये सुपर कंप्यूटर, जिसकी पीक कंम्प्यूटिंग पावर 10.65 TF है। |
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2016 |
PARAM ISHAN 250 |
250 टेराफ्लॉप्स, IIT गुवाहाटी में शोध कार्यों हेतु |
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2017 |
SahasraT |
देश का पहला पेटाफ्लॉप्स सुपरकंप्यूटर |
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2018 |
Pratyush |
देश का प्रथम मल्टीपेटाफ्लॉप्स श्रेणी का कंप्यूटर |
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2020 |
PARAM Siddhi |
6.5 पेटाफ्लॉप्स (Peak DP) की गति से गणना करने में सक्षम |
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2023 |
AIRAWAT |
13.17 पेटाफ्लॉप की गति के साथ दुनिया के सबसे तेज 500 सुपर कंप्यूटर की लिस्ट में ऐरावत 75वें नंबर पर है । |
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2024 |
PARAM Rudra |
राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) के तहत, 5 पेटाफ्लॉप्स से अधिक की कम्प्यूटिंग गति वाले ये तीन सुपरकंप्यूटर पुणे, दिल्ली और कोलकाता में स्थापित किये गए हैं। |
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विश्व के शीर्ष दस सुपर कंप्यूटर |
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नाम |
गति (पेटाफ्लॉप्स में) |
देश |
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Frontier |
1194 |
यू.एस.ए. |
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Fugaku |
442 |
जापान |
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LUMI |
309.1 |
फिनलैंड |
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Leonardo |
238.7 |
इटली |
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Summit |
148.6 |
यू.एस.ए. |
|
Sierra |
94.6 |
यू.एस.ए |
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Sunway Taihu Light |
93.01 |
चीन |
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Perlmutter |
70.87 |
यू.एस.ए. |
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Selene |
63.46 |
यू.एस.ए. |
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Tianhe-2A |
61.44 |
चीन |
नोट : 2024 की स्थिति के अनुसार
- डाटा संप्रेषण (Data Communication) :
दो या अधिक उपकरणों के मध्य किसी भी संचार माध्यम द्वारा डाटा या सूचना का आदान-प्रदान, ‘डाटा संप्रेषण’ कहलाता है। डाटा संप्रेषण विभिन्न प्रकार के सिग्नल (Digital Signal, Analog Signal, Hybrid Signal) के माध्यम से होता है। - संप्रेषण चैनल (Communication Channel) : यह सिग्नल प्रवाह की दिशा बताता है। ये निम्न हैं :
- Simplex Channel: इसमें सूचना का प्रवाह सदैव एक ही दिशा में होता है।
- Half Duplex Channel: इसमें सूचना प्रवाह दोनों दिशाओं में होता है, लेकिन अलग-अलग समय पर।
- Full Duplex Channel: इसमें सूचना का प्रवाह दोनों दिशाओं में एक साथ एक ही समय पर संभव है।
- संप्रेषण माध्यम (Communication Media) : डाटा या सूचना के आदान-प्रदान का साधन ‘संप्रेषण माध्यम’ कहलाता है। यह निम्न दो प्रकार का होता है-
- निर्देशित (Guided) : जब संप्रेषण केबल द्वारा होता है तो उसे निर्देशित संप्रेषण कहते हैं। इथरनेट केबल या ट्विस्टेड पेयर केबल, को-एक्सियल केबल तथा फाइबर ऑप्टिक केबल आदि इसके प्रमुख साधन हैं।
- अनिर्देशित (Unguided) : जब संप्रेषण तरंगों (Waves) द्वारा होता है तो उसे अनिर्देशित संप्रेषण कहते हैं। रेडियो वेब, माइक्रो वेब, इंप्रारेड वेब संप्रेषण, सैटेलाइट संप्रेषण तथा ब्लूटूथ आदि इसके प्रमुख साधन हैं।
भारतीय संविधान एकल नागरिकता का प्रावधान करता है। नागरिकता संबंधी कानून बनाने की पूर्ण शक्ति संसद को दी गई है। संसद ने सर्वप्रथम 1955 में ‘नागरिकता अधिनियम’ (Citizenship Act) पारित किया, जिसमें (1986, 1992, 2003, 2005, 2015) प्रासंगिक संशोधन किये गए हैं।
- नागरिकता से संबंधित अनुच्छेद -
- अनुच्छेद 5- संविधान के प्रारंभ पर अधिवास द्वारा नागरिकता
- अनुच्छेद 6- पाकिस्तान से प्रव्रजन (Migration) करके आए व्यक्तियों की नागरिकता
- अनुच्छेद 7- पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों की नागरिकता के अधिकार
- अनुच्छेद 8- भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्ति की नागरिकता
- अनुच्छेद 9- किसी अन्य देश की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित करने पर भारत की नागरिकता स्वत: समाप्त हो जाएगी।
- अनुच्छेद-10- किसी नागरिक की नागरिकता का अधिकार संसदीय विधान के अलावा किसी अन्य रीति से नहीं छीना जा सकता है।
- अनुच्छेद-11- नागरिकता से संबंधित विधान बनाने की शक्ति संसद को होगी। इस प्रयोजन हेतु संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 पारित किया है।
- नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3-7 के अंतर्गत नागरिकता अर्जन के पाँच तरीके हैं-
- जन्म,
- वंश,
- पंजीकरण,
- देशीयकरण (दीर्घावधिक निवास) के माध्यम से।
- किसी क्षेत्र के भारत का भाग बनने पर भारत सरकार यह विनिर्दिष्ट करेगी कि उस भू-भाग के कौन व्यक्ति भारत के नागरिक होंगे।
- नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 8, 9 तथा 10 में नागरिकता समाप्ति की तीन स्थितियाँ बताई गई हैं-
- नागरिकता का परित्याग करने पर,
- किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकार करने पर
- भारत सरकार द्वारा नागरिकता से वंचित किया जाना।
- विदेशों में निवास करने वाले भारतीय मूल के लोग -
- अनिवासी भारतीय (NRI): अनिवासी भारतीय भारत के ही नागरिक होते हैं और भारतीय पासपोर्ट धारण करते हैं; किंतु ये नौकरी या व्यवसाय के लिये साधारणत: भारत से बाहर रहते हैं। इन्हें नागरिकों को प्राप्त लगभग सभी सुविधाएँ मिलती हैं। इन्हें मताधिकार का भी अधिकार है।
- भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO): ये भारत के नागरिक नहीं होते। ये वे व्यक्ति हैं जो स्वयं या जिनके पूर्वज भारत के नागरिक रहे हैं, किंतु वर्तमान में ये किसी अन्य देश के नागरिक हैं। भारत में कम-से-कम 7 वर्षों तक निवास के आधार पर भारतीय नागरिकता के लिये आवेदन कर सकते हैं। इन्हें मताधिकार एवं चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है। इन्हें भी NRI कोटा में शिक्षा का अधिकार है तथा भारतीय मुद्रा में भारतीय बैंक में खाता खोलने का अधिकार है।
- ओवरसीज़ सिटीज़न ऑफ इंडिया (OCI): ये विदेशी नागरिक होते हैं तथा साधारणत: इनका निवास विदेश में ही होता है। इन्हें जीवनपर्यंत वीज़ा की सुविधा उपलब्ध है। एक यात्रा की अवधि चाहे जितनी लंबी हो, इन्हें पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय नागरिकता के लिये 5 वर्ष पूर्व पंजीकरण कराया हो तथा कम-से-कम 1 साल से भारत में रह रहा हो। इन्हें NRI कोटा में शिक्षा का अधिकार है। भारत में भारतीय मुद्रा में बैंक खाता भी खोल सकते हैं।
- 9 जनवरी, 2015 की अधिसूचना (भारत का राजपत्र) के द्वारा PIO तथा OCI कार्ड धारकों की भिन्नता समाप्त कर दी गई है तथा अब सभी PIO कार्डों को OCI कार्डों का दर्जा प्राप्त होगा।
ऑपरेटिंग सिस्टम प्रोग्राम का सेट होता है, जो उपयोगकर्त्ता तथा हार्डवेयर के बीच इंटरफेस तथा कंप्यूटर के विभिन्न भागों के बीच समन्वयकर्त्ता, नियंत्रक तथा निरीक्षक का कार्य करता है। अत: यह हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के बीच मध्यस्थ का कार्य करता है।
- ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार :
- सिंगल यूज़र ऑपरेटिंग सिस्टम: MS.DOS, Windows 9x, Mac OS, MS Window, Palm OS आदि।
- मल्टी यूज़र ऑपरेटिंग सिस्टम: UNIX, LINUX, Windows 2000, Solaris आदि।
- मल्टी टास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम: UNIX, LINUX, Windows 95 आदि।
- रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम: LynxOS, RTLinux आदि।
- मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम: एंड्रॉयड (Andriod) (Google – 2007), सिंबियन (Symbian) (Symbian Ltd), IOS (Apple Corporation) आदि।
- ऑपरेटिंग सिस्टम के कार्य :
- प्रोसेस मैनेजमेंट (Process Management)
- मेमोरी मैनेजमेंट (Memory Management)
- फाइल मैनेजमेंट (File Management)
- इनपुट/आउटपुट मैनेजमेंट (Input/Output Management)
- यूज़र इंटरफेस (User Interface):
यह ऑपरेटिंग सिस्टम का मुख्य भाग है जो उपयोगकर्त्ता की विभिन्न एप्लीकेशनों तक पहुँच तथा संप्रेषण(Communication) को संभव बनाता है।- ग्राफिकल यूजर इंटरफेस(Graphical User Interface– GUI) : इसमें संकेत (Symbols) दृश्य रूपकों (Visual Metaphors) तथा प्वाइंटिंग डिवाइस का उपयोग होता है।
- कैरेक्टर यूजर इंटरफेस (Character User Interface– CUI) : इसमें कमांड का उपयोग होता है। डीबग, डिस्कपार्ट, पिंग आदि CUI के अनुप्रयोग हैं।
मूल रूप से भारत का संविधान अंग्रेज़ी और हिंदी में लिखा गया था। भारतीय संविधान की मूल संरचना भारत सरकार अधिनियम, 1935 पर आधारित है। हालाँकि भारत के संविधान में कई देशों के संविधान की विशेषताओं को अपनाया गया है, जो निम्नलिखित हैं-
- ब्रिटेन - संसदीय शासन प्रणाली, संसदीय विशेषाधिकार, विधि का शासन, विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, चुनाव में सर्वाधिक मत के आधार पर जीत की प्रक्रिया, मंत्रिमंडल प्रणाली, परमाधिकार लेख, द्विसदनात्मक व्यवस्था।
- संयुक्त राज्य अमेरिका - मूल अधिकार, न्यायिक पुनर्विलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, राष्ट्रपति पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति का पद, उद्देशिका का विचार
- कनाडा - एक सशक्त केंद्र के साथ अर्द्ध संघ सरकार का स्वरूप, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास, शक्ति विभाजन (संघ एवं राज्य के बीच), राज्यपाल की नियुक्ति, उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।
- आयरलैंड - राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत, राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाजसेवा आदि के क्षेत्रों में ख्याति प्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन, राष्ट्रपति की निर्वाचन संबंधी प्रक्रिया
- द. अफ्रीका - संविधान संशोधन की प्रक्रिया, राज्यसभा सदस्यों की निर्वाचन प्रक्रिया
- फ्राँस - स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का आदर्श, गणतंत्रात्मक व्यवस्था
- ऑस्ट्रेलिया - समवर्ती सूची का प्रावधान, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक, व्यापार वाणिज्य की स्वतंत्रता
- जर्मनी (वाइमर संविधान) - आपातकाल के दौरान मूल अधिकारों का निलंबन
- जापान - विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
- पूर्व सोवियत संघ - मूल कर्तव्य, प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय का आदर्श
संविधान का अधिकांश भाग भारत शासन अधिनियम, 1935 से अधिगृहीत है। जैसे न्यायपालिका, कैग, अध्यादेश, लोक सेवा आयोग, आपात उपबंध आदि।
कंप्यूटर के मुख्यत: दो भाग होते हैं- हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर,
- हार्डवेयर (Hardware): कंप्यूटर के लिये आवश्यक एवं उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि करने वाले सभी भौतिक हिस्से ‘हार्डवेयर’ कहलाते हैं। ये निम्नलिखित हैं-
- इनपुट डिवाइस (Input Device) : ऐसे हार्डवेयर डिवाइस जो कंप्यूटर को डाटा भेजने का कार्य करते हैं। इनके माध्यम से उपयोगकर्त्ता कंप्यूटर से इंटरैक्ट कर सकता है तथा उसे नियंत्रित कर सकता है। उदाहरण- की-बोर्ड, माउस, स्कैनर, माइक्रोफोन, टचस्क्रीन, वेब कैम, ज्वॉयस्टीक, ट्रैक बाल, ओसीआर रीडर, बार कोड रीडर, माइकर, लाइट पेन, ग्राफिक टैबलेट, डिजिटल कैमरा, स्मार्ट कार्ड रीडर एवं बायोमेट्रिक सेंसर आदि।
- आउटपुट डिवाइस (Output Device) : ऐसे पेरिपेरल डिवाइस जो कंप्यूटर से सूचना प्राप्त करते हैं तथा उसे प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण- मॉनीटर, स्पीकर, प्रिंटर, प्लॉटर, मल्टी मीडिया प्रोजेक्टर, एसजीडी (Speech Generating Device), जीपीएस डिवाइस (Global Positioning System), साउंड कार्ड, वीडियो कार्ड, ब्रेल रीडर आदि।
- स्टोरेज डिवाइस (Storage Device) : ऐसे हार्डवेयर डिवाइस जो जानकारी या सूचना को स्थायी या अस्थायी रूप से स्टोर करते हैं। जैसे- हार्ड ड्राइव, सीडी ड्राइव, यूएसबी स्टिक, डीवीडी ड्राइव, ब्लू रे ड्राइव, फ्लैश ड्राइव, मेमोरी कार्ड, क्लाउड स्टोरेज़, पेनड्राइव, फ्लॉपी डिस्क ड्राइव आदि।
- कम्युनिकेशन डिवाइस (Communication Device) : ऐसे उपकरण जो डाटा संप्रेषण में सहायक होते हैं। जैसे:- NIC (Network Interface Card) एक कम्युनिकेशन डिवाइस है, जो नेटवर्क से कंप्यूटर को जोड़ने के लिये कंप्यूटर में लगा होता है।
- WNIC (Wireless Network Interface Controller) : यह वायरलेस नेटवर्क से कंप्यूटर को जोड़ता है।
- मॉडेम (Modem) : एक संचार उपकरण जो टेलीफोन या मोबाइल नेटवर्क का उपयोग कर इंटरनेट की सुविधा प्रदान करता है। इस प्रक्रिया में यह एनालॉग सिग्नल को डिजिटल में तथा डिजिटल सिग्नल को एनालॉग में परिवर्तित करता है।
- हब (Hub) : यह एक नेटवर्क डिवाइस है, जो लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) को इंटरनेट से जोड़ता है। यह स्टार नेटवर्क का केंद्र होता है।
- वायरलेस एक्सेस प्वाइंट (Wireless Access Point) : यह भी लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) को इंटरनेट से बिना तार (Wireless) जोड़ता है।
- राउटर (Router) : यह एक डिवाइस है, जो नेटवर्क पर डाटा पैकेटों को अग्रेषित करता है।
- इंफ्रारेड (Infrared-IR) : बेतार संचार उपकरण जो निम्न दूरी पर स्थित कंप्यूटरों को संचार हेतु सक्षम बनाता है
- ब्लूटूथ (Bluetooth) : लघु तरंगदैर्ध्य की रेडियो तरंगों का उपयोग कर यह पूर्व निर्धारित परास में स्थित कंप्यूटरों को संचार में सक्षम बनाता है।
- वाई-फाई (Wi-Fi) : यह बेतार संचार द्वारा कंप्यूटरों को इंटरनेट से जुड़ने में सक्षम बनाता है।
- प्रिंटर(Printer): ये समान्यतः दो प्रकार हैं-
- इंपैक्ट प्रिंटर(Impact Printer): ये हैमर या पिन द्वारा स्याही युक्त रिबन को दबाकर कागज़ पर अक्षरों को प्रिंट करते हैं। जैसे:- डॉट-मैट्रिक्स प्रिंटर, डेजी-व्हील प्रिंटर, लाइन प्रिंटर, ड्रम प्रिंटर, बैंड प्रिंटर तथा चेन प्रिंटर आदि।
- नॉन-इंपैक्ट प्रिंटर (Non–Impact Printer): ये हैमर या पिन का उपयोग किये बिना अक्षरों/चित्रों को प्रिंट करते हैं। जैसे:- इंक-जेट प्रिंटर: इसमें इलेक्ट्रिक फिल्ड, चार्ज इंक पार्टिकल को कैरेक्टर्स में अरेंज कर देती है। लेजर प्रिंटर: यह लेजर बीम, मिरर तथा ड्रम के माध्यम से प्रिंट करता है। इसकी प्रिटिंग स्पीड अधिक होती है।
- प्रोसेसिंग डिवाइस (Processing Device) : कंप्यूटर हार्डवेयर के वे भाग जो इनपुट डाटा को उपयोगी सूचना में परिवर्तित करने का कार्य करते हैं। जैसे:-
- सीपीयू (CPU- Central Processing Unit) : यह कंप्यूटर को हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर से मिलने वाले निर्देशों का संचालन करता है। इसे कंप्यूटर का ‘मस्तिष्क’ कहते हैं।
- जीपीयू (GPU - Graphics Processing Unit) : यह एक कंप्यूटर चिप है, जो प्रतिकृति प्रतिपादन हेतु तेज़ी से गणितीय गणना करता है।
- मदरबोर्ड (Motherboard) : मदरबोर्ड कंप्यूटर में मुख्य प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) है, जो कि कंप्यूटर का आधार होता है। यह सीपीयू, रैम तथा अन्य कंप्यूटर हार्डवेयर के बीच संचार के लिये परिपथ प्रदान करता है। इसके सर्किट बोर्ड पर बहुत सारे चिप्स लगे होते है।
- साउंड कार्ड (Sound Card) : यह एक विस्तार कार्ड (Expansion Card) है, जो कंप्यूटर को ध्वनि उत्पन्न करने में सक्षम बनाता है।
- सॉफ्टवेयर (Software): कंप्यूटर को एक नियत भाषा में दिये जाने वाले निर्देशों को प्रोग्राम कहते हैं। किसी विशिष्ट कार्य को करने के लिये तैयार किये गए इन प्रोग्रामों के समूह को ही ‘सॉफ्टवेयर’ कहा जाता है। सॉफ्टवेयर दो प्रकार के होते हैं :
- सिस्टम सॉफ्टवेयर (System Software): ऐसे प्रोग्रामों को कहा जाता है, जिनका कार्य सिस्टम अर्थात् कंप्यूटर को चलाना है। ऑपरेटिंग सिस्टम, कंपाइलर आदि इसके उदाहरण हैं।
- एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर (Application Software): इन्हें किसी विशेष वातावरण की विशेष आवश्यकता को पूरा करने के लिये प्रोग्राम किया जाता है। भिन्न-भिन्न अनुप्रयोगों के लिये भिन्न-भिन्न एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर होते हैं। माइक्रोसॉफ्ट, एडोब फ़ोटोशॉप,एक्सेल, गूगल क्रोम, व्हाट्सएप आदि इसके उदाहरण हैं।
डाटा निरूपण (Data Representation): कंप्यूटर केवल बाइनरी नंबर (0, 1) को ही समझता है। अत: सभी प्रकार के डाटा(टेक्स्ट, इमेज, गणितीय संख्या या कोई चिन्ह आदि) का 0 एवं 1 के रूप में निरूपण ‘डाटा निरूपण’ कहलाता है। डाटा भंडारण के अधिक्रम में बिट्स, बाइट्स, फील्डस रिकार्ड्स, फाइलें तथा डाटाबेसेज शामिल रहते हैं।
- नंबर सिस्टम (Number System): अंकों (Values) का समूह जिसका उपयोग संख्याओं को व्यक्त करने के लिये किया जाता है, ‘नंबर सिस्टम’ कहलाता है।
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Number System |
Base |
Digits |
|
Binary |
2 |
0, 1 |
|
Octal |
8 |
0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 |
|
Decimal |
10 |
0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7 |
|
Hexadecimal |
16 |
0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, A, B, C, D, E, F |
- कैरेक्टर संकेतन तकनीक (Character Encoding Technique): कंप्यूटर में किसी अक्षर (Character), वर्ण, अंक या प्रतीक चिह्नों को 0 या 1 के यूनिक कोड (Unique Code) के स्वरूप में प्रदर्शित किया जाता है, जिसे ‘कंप्यूटर कोड’ कहते हैं।
- BCD (Binary Coded Decimal) : इसमें चार बिट्, एक डेसीमल डिजिट को निरूपित करता है। इसमें डेसीमल डिज़िट को बाइनरी डिजिट में निरूपित किया जाता है।
- ASCII (American Standard Code for Information Interchange) : यह कंप्यूटर में और इंटरनेट पर टेक्स्ट फाइलों के लिये सबसे सामान्य प्रारूप है। यह सूचना के अंतर्विनिमय के लिये अमरीकी मानक कोड है।
- एक ASCII फाइल में प्रत्येक अल्फाबेटिक न्यूमेरिक या विशेष कैरेक्टर को 7 बिट् या 8 बिट् के बाइनरी नंबर द्वारा निरूपित किया जाता है। क्रमश: इस प्रकार 128 कैरेक्टर तथा 256 कैरेक्टर परिभाषित किये गए हैं।
- UNIX और DOS, ASCII का उपयोग टेक्स्ट फाइल के लिये करते हैं।
- यूनिकोड (Unicode): यह एक अंतर्राष्ट्रीय वर्ण संकेतन मानक है जो विभिन्न प्लेटफॉर्मों, डिवाइसों, एप्लीकेशनों या विभिन्न कंप्यूटर भाषाओं में किसी अक्षर को निरूपित करने के लिये एक विशिष्ट संख्या प्रदान करता है। यह डाटा निरूपण के लिये 8, 16 या 32 बिट का प्रयोग करता है।
हिंदी भाषा के प्रचार - प्रसार तथा अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से 1 मार्च , 1960 को केंद्रीय हिंदी निदेशालय (Central Directorate of Hindi) की स्थापना शिक्षा मंत्रालय के अधीन की गई थी। इसके चार क्षेत्रीय कार्यालय हैं जो चेन्नई , हैदराबाद , गुवाहाटी , कोलकाता में स्थित हैं।
- भारतीय विश्वविद्यालय संघ (Association of Indian Universities) की स्थापना वर्ष 1973 में की गई थी।
- एजुसैट ( शिक्षा उपग्रह ) का प्रक्षेपण 20 सितंबर , 2004 को किया गया।
- ज्ञान गरिमा सिंधु मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषय से संबंधित एक त्रैमासिक पत्रिका है।
- केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान लेह ( लद्दाख ) में अवस्थित है।
- इंजीनियरिंग में मूल्य शिक्षा देने हेतु आई . आई . टी . दिल्ली में राष्ट्रीय मूल्य शिक्षा केंद्र की स्थापना की गई है।
- भारत का प्रथम हाइड्रो इंजीनियरिंग कॉलेज हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में स्थापित किया जाएगा।
- पंडित सुंदरलाल शर्मा केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान भोपाल ( मध्य प्रदेश ) में हैं।
- केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान के 5 क्षेत्रीय कार्यालय हैं।
- पूर्वी क्षेत्र - भुवनेश्वर ( उड़ीसा )
- पश्चिमी क्षेत्र - पुणे ( महाराष्ट्र )
- उत्तरी क्षेत्र - पटियाला ( पंजाब )
- दक्षिण क्षेत्र - मैसूर ( कर्नाटक )
- उ . पूर्वी क्षेत्र - गुवाहाटी ( असम )
- केंद्रीय हिंदी संस्थान ( आगरा ) के आठ क्षेत्रीय कार्यालय हैं - दिल्ली , हैदराबाद , गुवाहाटी , शिलॉन्ग , मैसूर , दीमापुर , भुवनेश्वर , अहमदाबाद।
- राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान (NITTTR) के देश में चार केंद्र हैं - चेन्नई , भोपाल , कोलकाता और चंडीगढ़ हैं।
- केंद्रीय तिब्बती स्कूल प्रशासन की स्थापना वर्ष 1961 में की गई थी।
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अनुसंधान संस्थान का नाम |
अनुसंधान कार्य क्षेत्र |
स्थापना वर्ष |
मुख्यालय |
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भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद् (ICHR) |
ऐतिहासिक शोध कार्यों की समीक्षा करना और इतिहास के वैज्ञानिक लेखन को बढ़ावा देना |
1972 |
नई दिल्ली |
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भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् (ICPR) |
दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में अनुसंधान कार्यक्रमों को बढ़ावा (Promote) देना। |
1977 |
दिल्ली व लखनऊ दोनों स्थानों पर |
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भारतीय उच्चतर अनुसंधान परिषद् (IIAS) |
यह मानविकी, समाज विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में उच्चतर शोध के लिये आवासीय सुविधायुक्त केंद्र है। |
1965 |
शिमला |
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भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICSSR) |
सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान के उन्नयन और समन्वय का कार्य करता है। |
1969 |
नई दिल्ली |
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राष्ट्रीय ग्रामीण संस्थान परिषद् (NCRI) |
गांधीवादी दर्शन के अनुसार ग्रामीणों क्षेत्रों में उच्चतर शिक्षा को बढ़ावा देना |
1995 |
हैदराबाद
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- उच्चतर शिक्षा से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण केंद्र
- भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (Indian Institute of Advanced Study) – शिमला
- डॉ. ज़ाकिर हुसैन मेमोरियल कॉलेज - दिल्ली
- श्री लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ - नई दिल्ली
- राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ - तिरुपति (आंध्र प्रदेश)
- राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान - नई दिल्ली
- राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन विश्वविद्यालय (National University of Educational Planning and Administration- NUEPA) - नई दिल्ली
कंप्यूटर मेमोरी, मानव मस्तिष्क की तरह, प्रोसेसिंग के लिये आवश्यक डाटा, सूचना और निर्देशों के भंडार के रूप में कार्य करती है। यह एक भंडारण इकाई या उपकरण के रूप में कार्य करता है जहाँ इनपुट और आउटपुट दोनों को अस्थायी रूप से रखा जा सकता है।
विभिन्न प्रकार की मेमोरी मौजूद हैं, सेमीकंडक्टर-आधारित मेमोरी के साथ, विशेष रूप से मेटल-ऑक्साइड-सेमीकंडक्टर (एमओएस) ट्रांजिस्टर के साथ एकीकृत सर्किट प्रमुख हैं। कंप्यूटर मेमोरी को मोटे तौर पर तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
- प्राथमिक मेमोरी: इसे मुख्य मेमोरी के रूप में भी जाना जाता है, यह कंप्यूटर संचालन के दौरान डेटा और प्रोग्राम निर्देशों को संग्रहीत करता है। यह सेमीकंडक्टर तकनीक का उपयोग करता है, जिसे अक्सर सेमीकंडक्टर मेमोरी कहा जाता है। यह रैंडम एक्सेस मेमोरी (RAM) और रीड ओनली मेमोरी (ROM) में विभाजित है।
- रैम (RAM: Random Access Memory):
- यह अस्थायी(Non-volatile) मेमोरी है जो बिजली आपूर्ति के आधार पर जानकारी संग्रहीत करती है।
- स्टेटिक रैम (S RAM) और डायनामिक रैम (D RAM) इसके प्रमुख प्रकार हैं।
- S RAM में ट्रांजिस्टर का उपयोग होता है।
- D RAM में कैपेसिटर और ट्रांजिस्टर का उपयोग होता है, तथा इसकी गति S RAM की तुलना में कम है।
- रोम (ROM: Read Only Memory):
- यह स्थायी(volatile) मेमोरी है जिसका उपयोग सिस्टम ऑपरेशन से संबंधित सूचनाओं को संग्रहीत करने के लिये किया जाता है।
- MROM, PROM, EPROM और EEPROM आदि इसके प्रमुख प्रकार हैं।
- द्वितीयक मेमोरी(Secondary Memory): द्वितीयक मेमोरी को सहायक या बैकअप मेमोरी के रूप में भी जाना जाता है, यह स्थायी मेमोरी है तथा इसमे बहुत अधिक मात्रा में स्थायी रूप से डेटा संग्रहीत होता है। यह प्राथमिक मेमोरी की तुलना में धीमी है तथा सीपीयू इसे अप्रत्यक्ष रूप से मुख्य मेमोरी के माध्यम से एक्सेस करता है। चुंबकीय टेप, चुंबकीय डिस्क और ऑप्टिकल डिस्क आदि इसके प्रमुख प्रकार हैं।
- कैश मेमोरी(Cache Memory): यह एक हाई-स्पीड सेमीकंडक्टर मेमोरी है जो सीपीयू और मुख्य मेमोरी के बीच बफर के रूप में कार्य करती है। यह सीपीयू के तेज संचालन के लिये अक्सर उपयोग किए जाने वाले डेटा और प्रोग्राम को संग्रहीत करता है। यह मुख्य मेमोरी की तुलना में कम समय में एक्सेसबल है । किंतु यह सेमीकंडक्टर के उपयोग के कारण महँगा है तथा इसकी भंडारण क्षमता सीमित है।
संक्षेप में, कंप्यूटर मेमोरी डेटा प्रोसेसिंग के लिये एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में कार्य करती है, जो विभिन्न कार्यात्मकताओं और आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक है।
शिक्षा आयोग (1964–66) की अनुशंसा पर वर्ष 1973 में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् का गठन गैर-वैधानिक संस्था के रूप में किया गया। शुरुआती चरण में इसका मुख्य कार्य केंद्र व राज्य सरकारों को शिक्षक शिक्षा से जुडे़ सभी मामलों पर सलाह देना था। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) और कार्य योजना (1992) की अनुशंसा के आधार पर एन.सी.टी.ई. को स्वायत्त वैधानिक निकाय के रूप में गठित करने की बात कही गई। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद एक वैधानिक संस्था के रूप में ‘‘राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् अधिनियम 1993’’ के अनुसरण से 17 अगस्त, 1995 से अस्तित्व में आया।
उद्देश्य :
NCTE का मुख्य उद्देश्य संपूर्ण देश में अध्यापक शिक्षा प्रणाली के योजनागत और समन्वित विकास को प्राप्त करना और इससे संबंधित मामलों हेतु एवं अध्यापक शिक्षा प्रणाली में मानकों और मापदंडों का विनियमन और उचित अनुरक्षण करना है।
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् की चार क्षेत्रीय समिति हैं, जो 6 जनवरी, 1996 से अस्तित्व में हैं-
- पूर्वी क्षेत्रीय समिति, भुवनेश्वर (ओडिशा)
- पश्चिमी क्षेत्रीय समिति, भोपाल (मध्य प्रदेश)
- उत्तर क्षेत्रीय समिति, जयपुर (राजस्थान)
- दक्षिण क्षेत्रीय समिति, बंगलूरू (कर्नाटक)
नोट: एन.सी.ई.आर.टी. का अध्यापक शिक्षा विभाग नेशनल काउंसिल ऑफ टीचर एजुकेशन (NCTE) के अकादमिक सचिवालय की तरह कार्य करता है।
कंप्यूटर के मुख्यत: तीन अवयव (Component) होते हैं :
- इनपुट/आउटपुट (I/O) यूनिट: इनपुट यूनिट, कोडेड डाटा को प्रोसेसर को भेजता है तथा आउटपुट यूनिट, प्रोसेस्ड रिजल्ट को यूजर को उपलब्ध कराता है।
- सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (CPU): यह कंप्यूटर का मस्तिष्क (Brain) होता है, इसे ‘प्रोसेसर’ या ‘माइक्रोप्रोसेसर’ भी कहते हैं। इसका कार्य दिये गए निर्देशों के अनुसार इनपुट डाटा को प्रोसेस करना है। इस क्रम में यह डाटा पर गणितीय एवं तार्किक ऑपरेशन संचालित करता है तथा कंप्यूटर के विभिन्न भागों के कार्यों को नियंत्रित भी करता है। इसकी गति को MIPS (Million Instruction Per Second) में मापा जाता है। इसके मुख्यत: तीन भाग होते हैं :
- एएलयू (ALU-Arithmetic Logic Unit): यह गणितीय (Mathematical) तथा तार्किक (Logical) ऑपरेशन संचालित करता है।
- सीयू (CU-Control Unit): यह माइक्रोप्रोसेसर में निहित निर्देश समूहों को लागू करता है। यह मेमोरी से निर्देशों को प्राप्त कर उन्हें डीकोड करता है तथा निर्देशानुसार कार्य का निष्पादन एवं ज़रूरत पड़ने पर एएलयू को आवश्यक कार्यवाही हेतु निर्देश भेजता है।
- रजिस्टर्स/मेमोरी यूनिट : ये प्रोसेसर में अस्थायी डाटा स्टोरेज़ एरिया होते हैं, जो प्रोसेस होने वाले डाटा को सँभालने का कार्य करते हैं। यही डाटा कंट्रोल यूनिट द्वारा आगे उपयोग किया जाता है। रजिस्टर में नया डाटा लिखने के साथ ही पुराना डाटा समाप्त होता जाता है।

- मेमोरी यूनिट (Memory Unit): मेमोरी, कंप्यूटर में आंतरिक स्टोरेज़ एरिया होता है, जो डाटा तथा निर्देशों को स्टोर करता है।
- केंद्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान(Central Institute of Educational Technology)
केंद्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना एन.सी.ई.आर.टी. की संवैधानिक इकाई के रूप में वर्ष 1984 में की गई थी। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। इस संस्थान का कार्य शैक्षिक प्रौद्योगिकी और जनसंचार माध्यमों का विकास करना है। यह संस्थान शैक्षिक प्रक्रियाओं, व्यवहारों और प्रतिफलों की गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु शैक्षिक अवसरों का विस्तार करता है। इसका प्रमुख उद्देश्य शैक्षिक तकनीकी को रेडियो, टी.वी फिल्म स्ट्रिप, उपग्रह संचार (INSAT) और साइबर मीडिया के माध्यम से बढ़ावा देना है। टीवी पर शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण INSAT के माध्यम से यही संस्था करती है। - क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान(Regional Institute of Education): यह एन.सी.ई.आर.टी. के अधीन एक संवैधानिक इकाई है। देश के विभिन्न भागों में निम्नलिखित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान कार्यरत हैं-
- क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, अजमेर (राजस्थान)
- क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल (मध्य प्रदेश)
- क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भुवनेश्वर (ओडिशा)
- क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, मैसूर (कनार्टक)
- क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, शिलॉन्ग (मेघालय)
- पंडित सुंदरलाल शर्मा केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान: यह संस्थान भोपाल (मध्य प्रदेश) में स्थित है। यह संस्थान औपचारिक और अनौपचारिक दोनों स्तरों पर कार्य शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा से संबंधित अनुसंधान, विकास, प्रशिक्षण और विस्तार संबंधी कार्यक्रम आयोजित करता है।
राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान
NCERT द्वारा स्थापित यह एक शोध संगठन है, जो समय-समय पर शिक्षकों, प्रशिक्षकों एवं शिक्षा क्षेत्र के प्रशासकों के लिये प्रशिक्षण व्यवस्था, सेमिनार और कार्यशालाओं का आयोजन करती है। इस संस्थान के विभाग, अनुभाग एवं प्रकोष्ठ निम्नलिखित हैं :
- राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान के विभाग (Departments of National Education Institute)
- कला एवं सौंदर्यबोध शिक्षा विभाग (Department of Education in Arts and Aesthetics- DEAA )
- प्रारंभिक शिक्षा विभाग (Department of Elementary Education-DEE)
- विशेष आवश्यकता समूह शिक्षा विभाग (Department of Education of Group with Special Needs- DEGSN)
- शैक्षिक मनोविज्ञान एवं शिक्षा आधार विभाग (Department of Educational Psychology and Foundation of Education- DEPFE)
- विज्ञान एवं गणित शिक्षा विभाग (Department of Education in Science and Mathematics–DESM)
- सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग (Department of Education in Social Science–DESS)
- भाषा शिक्षा विभाग (Department of Education in Language-DEL)
- जेंडर अध्ययन विभाग (Department of Gender Studies- DGS)
- अध्यापक शिक्षा विभाग (Department of Teacher Education- DTE)
- शिक्षा संस्थान के अनुभाग/प्रभाग (Section/Division of Education Institute)
- प्रकाशन प्रभाग (Publication Divisions)
- पुस्तकालय और प्रलेखन प्रभाग (Library and Documentation Division- LDD)
- अंतर्राष्ट्रीय संबंध प्रभाग (International Relation Division–IRD)
- योजना एवं अनुवीक्षण प्रभाग (Planning and Monitoring Division- PMD)
- शैक्षिक अनुसंधान प्रभाग (Division of Educational Research–DER)
- शैक्षिक सर्वेक्षण प्रभाग (Educational Survey Division–ESD)
- शैक्षिक किट प्रभाग (Division of Educational Kits–DEK)
- राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान के प्रकोष्ठ (Cell of National Education Institute)
- राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान परियोजना प्रकोष्ठ (RMSA Project Cell)
- हिंदी प्रकोष्ठ (Hindi Cell)
- जनसंपर्क प्रकोष्ठ (Public Relation Cell)
शैक्षिक अनुसंधान एवं नवाचार समिति
यह एन.सी.ई.आर.टी. की एक स्थायी समिति है। यह समिति विद्यालयी और अध्यापक शिक्षा से संबंधित महत्त्वपूर्ण विषयों पर अनुसंधान को बढ़ावा और सहायता देने के लिये उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती है। इस समिति के सदस्यों में विश्व विद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के शिक्षा तथा संबद्ध विषयों में कार्यरत प्रसिद्ध अनुसंधानकर्त्ता और एसआईई/एससीईआरटी (SCERT) इत्यादि संस्थानों के प्रतिनिधि सम्मिलित रहते हैं।
इस समिति के द्वारा निम्नलिखित कार्य किये जाते हैं :
- शिक्षक और शिक्षा के स्तर में गुणात्मक सुधार लाना
- पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों का निर्माण (कक्षा 1 से 12 तक)
- राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा का आयोजन
- शैक्षिक सर्वे रिपोर्ट का प्रकाशन
- व्यावसायिक कार्यक्रम
- विद्यालयी शिक्षा एवं शिक्षक शिक्षा के संदर्भ में नवाचार प्रयोग
- राष्ट्रीय जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम
- स्वास्थ्य एवं पर्यावरण शिक्षा
- कंप्यूटर शिक्षा
- पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम
- राष्ट्रीय पाठ्यचर्या फ्रेमवर्क (NCF), पाठ्यवस्तु, शिक्षण सामग्री का निर्माण।
- शिक्षा मंत्रालय की स्कूल स्तरीय शैक्षिक नीतियों के निर्धारण एवं क्रियान्वयन में सरकार को सहयोग एवं परामर्श देना।
- मूल्यांकन प्रक्रिया के साथ-साथ परीक्षा व्यवस्था में सुधार लाना।
- राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालय एवं अन्य शैक्षिक संस्थानों के मध्य समन्वय स्थापित करना।
- प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने वाले प्रक्रम के रूप में कार्य करना।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्(National Council of Educational Research and Training- NCERT) :
शैक्षिक अनुसंधान के विकास तथा उसके प्रचार-प्रसार में सहयोग एवं प्रशिक्षण देने हेतु शिक्षा मंत्रालय द्वारा वर्ष 1961 में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी) का गठन सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम (1860) के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी संस्था के रूप में किया गया। वर्तमान में यह परिषद् शिक्षा मंत्रालय की तकनीकी इकाई या संस्था के रूप में कार्य करती है। इस परिषद् का वित्तीय पोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।
यह परिषद् स्कूल शिक्षा से संबंधित शैक्षिक मामलों पर केंद्र और राज्य सरकारों को सहायता प्रदान करने और उन्हें सुझाव देने के लिये एक शीर्ष संसाधन संगठन है। यह स्कूल शिक्षा में गुणवत्तायुक्त सुधार के लिये शैक्षिक और तकनीकी सहायता प्रदान करता है और अनुसंधान, विकास, प्रशिक्षण, विस्तार, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग सूचना के प्रकाशन और प्रसार से संबंधित कार्यक्रम चलाता है।
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् का संचालन एवं शैक्षिक गतिविधियों का आयोजन एक कार्यकारिणी समिति (Executive Council) के द्वारा किया जाता है। समिति का विवरण निम्नलिखित रूप में है :
एन.सी.ई.आर.टी. की कार्यकारिणी समिति (Executive Council of NCERT)
- केद्रीय शिक्षा मंत्री (अध्यक्ष)
- केंद्रीय शिक्षा सचिव
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष
- एन.सी.ई.आर.टी. के निदेशक
- एन.सी.ई.आर.टी. के संयुक्त निदेशक
- शिक्षा मंत्रालय का एक प्रतिनिधि
- वित्त मंत्रालय का एक प्रतिनिधि
- दो प्राध्यापक सदस्य
- एन.सी.ई.आर.टी. संकाय के तीन सदस्य
- दो प्रख्यात शिक्षाविद् सदस्य
नोट: कार्यकारिणी समिति (Executive Council) एन.सी.ई.आर.टी के कार्यों से संबंधित मामलों का निर्णय लेती है।
- NEP-2020 के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘सकल नामांकन अनुपात’ (Gross Enrolment Ratio) को 26.3% (वर्ष 2018) से बढ़ाकर 50% तक करने का लक्ष्य रखा गया है।
- NEP-2020 के तहत स्नातक पाठ्यक्रम को ‘मल्टीपल एंट्री-एक्जिट’ से लचीला बनाने का प्रयास किया गया है, इसके तहत 3 या 4 वर्ष के स्नातक कार्यक्रम में विद्यार्थी कई स्तरों पर पाठ्यक्रम को छोड़ सकेंगे और उन्हें उसी के अनुरूप डिग्री या प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाएगा।
- विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से प्राप्त अंकों या क्रेडिट को डिजिटल रूप से सुरक्षित रखने के लिये एक ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ दिया जाएगा, जिससे अलग-अलग संस्थानों में विद्यार्थियों के प्रदर्शन के आधार पर उनके द्वारा अर्जित क्रेडिट को अंतिम रूप दिया जा सके।
- उल्लेखनीय है कि नई शिक्षा नीति के तहत एम.फिल. (M.Phil) कार्यक्रम को समाप्त कर दिया गया है।
- भारत उच्चतर शिक्षा आयोग : चिकित्सा एवं कानूनी शिक्षा को छोड़कर पूरे उच्चतर शिक्षा क्षेत्र के लिये एक एकल निकाय के रूप में भारत उच्चतर शिक्षा आयोग (Higher Education Commission of India-HECI) का गठन किया जाएगा। HECI के कार्यों के प्रभावी और पारदर्शितापूर्ण निष्पादन के लिये चार संस्थानों/निकायों का निर्धारण किया गया है-
- विनियमन हेतु : राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामकीय परिषद (National Higher Education Regulatory Council-NHERC)
- मानक निर्धारण : सामान्य शिक्षा परिषद (General Education Council-GEC)
- वित्तपोषण : उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद (Higher Education Grants Council-HEGC)
- प्रत्यायन : राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (National Accreditation Council- NAC)
महाविद्यालयों की संबद्धता 15 वर्षों में समाप्त हो जाएगी और उन्हें क्रमिक स्वायत्तता प्रदान करने के लिये एक चरणबद्ध प्रणाली की स्थापना की जाएगी।देश में आईआईटी (IIT) और आईआईएम (IIM) के समकक्ष वैश्विक मानकों के ‘बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय’ (Multidisciplinary Education and Research Universities) की स्थापना की जाएगी।
- अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद् (All India Council of Secondary Education):
- अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद् की स्थापना में माध्यमिक शिक्षा के विकास को प्रोत्साहित करने हेतु की गई थी। इसके अंतर्गत दो विभाग थे- 1. सलाहकार विभाग, 2. प्रशासकीय विभाग
- वर्ष 1958 में परिषद् का पुनर्गठन करके इसके प्रशासकीय विभाग को एक अलग स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित किया गया आगे चलकर यही स्वतंत्र इकाई माध्यमिक शिक्षा प्रसार निदेशालय में परिवर्तित हो गई।
कंप्यूटर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जिसे डेटा (इनपुट) प्राप्त करने, उसे प्रोसेस करने और परिणाम (आउटपुट) उत्पन्न करने के लिये प्रोग्राम किया जा सकता है। जब इसे अतिरिक्त हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के साथ जोड़ा जाता है, तो यह एक कंप्यूटर प्रणाली का निर्माण करता है। कंप्यूटर का वर्गीकरण अध्ययन और उपयोग की सुविधा के लिये किया जाता है, इस आधार पर कंप्यूटर को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-
- तकनीक के आधार पर (On the Basis of Technology)
- डिजिटल कंप्यूटर (Digital Computer): असतत रूप में सूचनाओं के प्रसंस्करण (Processing) द्वारा समस्याओं के समाधान में सक्षम उपकरणों के एक वर्ग को ‘डिजिटल कंप्यूटर’ कहते हैं। ये कंप्यूटर डाटा की प्रोसेसिंग डिजिटल रूप (0 एवं 1) में करते हैं। जैसे- सामान्य प्रयोग में आने वाले डेस्कटॉप, लैपटॉप इत्यादि।
- एनालॉग कंप्यूटर (Analog Computer): सतत रूप में सूचनाओं के प्रसंस्करण (Processing) के लिये उपयोग होने वाले कंप्यूटर ‘एनालॉग कंप्यूटर’ कहलाते हैं। इस प्रकार के कंप्यूटर का उपयोग तापमान, दाब, भार, वोल्टेज आदि से संबंधित सतत डाटा (Analog Data) की प्रोसेसिंग में होता है। जैसे-वाहनों की गति मापने हेतु प्रयोग में आने वाले एनालॉग स्पीडोमीटर, एनालॉग घड़ी इत्यादि।
- हाइब्रिड कंप्यूटर (Hybrid Computer): यह डिजिटल तथा एनालॉग कंप्यूटर का संयोजन होता है अर्थात् इसमें एनालॉग कंप्यूटर की स्पीड तथा डिजिटल कंप्यूटर की मेमोरी एवं शुद्धता (Accuracy) होती है। जैसे- रडार प्रणाली, स्मार्ट फोन, टैबलेट डिवाइस इत्यादि।
- आकार एवं कार्य क्षमता के आधार पर (On the Basis of Size and Work Capacity)
- सुपर कंप्यूटर (Super Computer): ये प्रदर्शन (Performance) एवं डाटा-प्रोसेसिंग के आधार पर सबसे शक्तिशाली होते हैं तथा बड़े संस्थानों/संस्थाओं द्वारा उपयोग किये जाने वाले विशेषीकृत एवं विशेष कार्य करने वाले कंप्यूटर होते हैं। वर्तमान में 1.1 एक्साफ्लॉप्स की क्षमता के साथ अमेरिकी सुपरकंप्यूटर Frontier दुनिया का सबसे तेज सुपरकंप्यूटर है।
- मेनफ्रेम कंप्यूटर (Mainframe Computer): ये आकार में बड़े तथा महँगे कंप्यूटर होते हैं, जो एक साथ हज़ारों उपयोगकर्त्ताओं को कार्य करने की सुविधा प्रदान करते हैं। सामान्यत: जहाँ सुपर कंप्यूटर एक ही प्रोग्राम पर बहुत तेज़ गति से कार्य कर सकता है, वहीं मेनफ्रेम कंप्यूटर थोड़ी कम गति से, लेकिन हज़ारों प्रोग्रामों पर एक साथ कार्य कर सकता है। स्टोरेज़ क्षमता अत्यधिक होने के कारण इसका उपयोग बड़े संगठनों, जैसे- बैंकिंग, बीमा संस्थान, सरकारी संगठन, कंपनियाँ आदि करते हैं।
- मिनी कंप्यूटर (Mini Computer): इनका उपयोग छोटी कंपनियों या फर्मों द्वारा किया जाता है। विशेष उद्देश्यों हेतु बड़ी कंपनियों के अलग-अलग विभागों द्वारा भी इनका उपयोग होता है। सामान्यत: इन्हें ‘मिडरेंज कंप्यूटर’ भी कहा जाता है, क्योंकि इनकी क्षमता सुपर कंप्यूटर तथा मेनफ्रेम कंप्यूटर से कम एवं पर्सनल कंप्यूटर, लैपटॉप आदि से अधिक होती है।
जैसे- K-202, IBM Midrange Computer आदि। - माइक्रो कंप्यूटर (Micro Computer): माइक्रो कंप्यूटर को सामान्य उपयोग हेतु डिज़ाइन किया गया है, जो शिक्षा, मनोरंजन, छोटे ऑफिस के कार्य आदि के लिये उपयोगी हैं।
जैसे-Desktop Computer, Gaming Consoles, Sound and Navigation of Car, Notebooks, Smartphones आदि।
वर्तमान तक कंप्यूटर की पाँच पीढ़ियाँ अस्तित्व में आ चुकी हैं। कंप्यूटर विकास का पीढ़ियों में विभाजन कंप्यूटर तकनीकी में हुए व्यापक परिवर्तन को दर्शाता है, जिसने कंप्यूटर को और अधिक छोटा, सस्ता, शक्तिशाली तथा दक्ष बनाया है। कंप्यूटर विकास को निम्नलिखित पाँच पीढ़ियों में बाँटा जा सकता हैं-
- प्रथम पीढ़ी (First Generation) 1940–1956:
- वृहद् आकार, वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tube) का सर्किट के लिये तथा मैग्नेटिक ड्रम का मेमोरी के लिये उपयोग
- अत्यधिक विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता तथा ऊष्मा का उत्सर्जन, मशीनी भाषा का उपयोग,इनपुट के लिये पंचकार्ड एवं पेपर टेप तथा आउटपुट के लिये प्रिंटर का उपयोग आदि।
- UNIVAC तथा ENIAC प्रथम पीढ़ी कंप्यूटर के उदाहरण हैं।
- द्वितीय पीढ़ी (Second Generation) 1956–1963:
- इस पीढ़ी में ट्रांजिस्टर (Transistor) ने वैक्यूम ट्यूब का, मैग्नेटिक कोर तकनीकी ने मैग्नेटिक ड्रम का तथा असेंबली (Assembly) भाषा ने मशीनी भाषा का स्थान ले लिया।
- जिसने कंप्यूटर को पहले से छोटा, सस्ता, तेज़ तथा अधिक ऊर्जा दक्ष बनाया लेकिन अधिक ऊर्जा खपत एक समस्या बनी रही।
- तृतीय पीढ़ी (Third Generation) 1964–1971:
- इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuit) के विकास ने कंप्यूटर की गति तथा क्षमता में अत्यधिक वृद्धि की ।
- की-बोर्ड, मॉनीटर एवं ऑपरेटिंग सिस्टम के साथ इंटरफेस के उपयोग ने कंप्यूटर को एक साथ कई एप्लीकेशन के उपयोग हेतु सक्षम बनाया।
- आसानी से काम करने योग्य तथा आकार में छोटे होने के कारण इस पीढ़ी के कंप्यूटर पहली बार सामान्य जन को सुलभ हुए।
- चौथी पीढ़ी (Fourth Generation) 1971&Present:
- माइक्रोप्रोसेसर (Microprocessors) जिसमें हज़ारों इंटीग्रेटेड सर्किट एक ही सिलिकॉन चिप पर लगी होती है, का उपयोग आरंभ हुआ।
- इस पीढ़ी के कंप्यूटर, नेटवर्क में जुड़ सकते थे।
- अत: इसने इंटरनेट के उपयोग को संभव बनाया। इसी पीढ़ी में GUI (Graphical User Interface) तथा माउस का व्यापक उपयोग प्रारंभ हुआ।
- पाँचवीं पीढ़ी (Fifth Generation) Present and Beyond:
- इस पीढ़ी के कंप्यूटर कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) पर आधारित हैं तथा विकास के क्रम में हैं। इस पीढ़ी में एक ऐसे कंप्यूटर के विकास का लक्ष्य है, जो प्राकृतिक भाषाओं का उपयोग कर सके।
संविधान प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। मानवता की प्रगति के लिये समाज के प्रत्येक नागरिक को शिक्षित होना आवश्यक है। यह तभी संभव है जब शिक्षा समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक बिना किसी भेदभाव के समान रूप से पहुँचे। इसे पूरा करने के लिये समावेशी शिक्षा महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
हमारा संविधान जाति, वर्ग, धर्म, आय एवं लैंगिक आधार पर किसी भी प्रकार के विभेद का निषेध करता है और इस प्रकार एक समावेशी समाज की स्थापना का आदर्श प्रस्तुत करता है, जिसके परिप्रेक्ष्य में बच्चे को सामाजिक, जातिगत, आर्थिक, वर्गीय, लैंगिक, शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से भिन्न देखे जाने की बजाय एक स्वतंत्र अधिगमकर्त्ता के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है, जिससे लोकतांत्रिक स्कूल में बच्चे के समुचित समावेशन हेतु समावेशी शिक्षा के वातावरण का सृजन किया जा सके। इस दृष्टि से हम समावेशी शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्त्व को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं-
- आवश्यकता :
- सभी बच्चों को एक साथ सीखने का अधिकार है।
- बच्चों में उनकी सीखने की क्षमता और सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव मिटाने के लिये समावेशी शिक्षा आवश्यक है।
- बच्चों के शैक्षणिक और सामाजिक प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिये।
- सामाजिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने तथा विशेष बच्चों को समाज व शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये।
- बच्चों के बीच आपसी सम्मान, समझ और करुणा स्थापित करने के लिये।
- बच्चों में भय को कम करने, दोस्ती का निर्माण व आत्मविश्वास की क्षमता के लिये।
- समूह में सुरक्षा और सुरक्षित भावना के विकास तथा विविधता के बीच व्यक्तिगत क्षमतानुसार आत्मविश्वास के लिये।
- महत्त्व :
- समावेशी शिक्षा प्रत्येक बच्चे के लिये उच्च और उचित उम्मीदों के साथ उसकी व्यक्तिगत शक्तियों का विकास करती है।
- यह अन्य विद्यार्थियों को अपनी उम्र के साथ कक्षा में भाग लेने और व्यक्तिगत लक्ष्यों पर काम करने के लिये अभिप्रेरित करती है।
- समावेशी शिक्षा बच्चों को उनके शिक्षा के क्षेत्र में और स्थानीय स्कूलों की गतिविधियों में उनके माता-पिता को भी शामिल करने की वकालत करती है।
- यह सम्मान और अपनेपन की स्कूल संस्कृति के साथ-साथ व्यक्तिगत मतभेदों को स्वीकार करने के लिये भी अवसर प्रदान करती है।
- समावेशी शिक्षा गरीबी और बहिष्कार के चक्र को तोड़ने में मदद कर सकती है। साथ ही यह बच्चों को अपने परिवारों और समुदायों के साथ रहने के लिये प्रोत्साहित करती है।
- सभी शिक्षार्थियों के लाभ के लिये स्कूल का माहौल बेहतर हो सकता है।
- यह प्रथा भेदभाव को दूर करने में मदद कर सकती है जो समाज के हर क्षेत्र में व्यापक है।
- यह राष्ट्र के विकास के लिये व्यक्तियों के व्यापक समावेश को बढ़ावा देती है।
- कंप्यूटर के मुख्यत: तीन अवयव (Component) होते हैं :
- इनपुट/आउटपुट (I/O) यूनिट: इनपुट यूनिट, कोडेड डाटा को प्रोसेसर को भेजता है तथा आउटपुट यूनिट, प्रोसेस्ड रिजल्ट को यूजर को उपलब्ध कराता है।
- सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (CPU): यह कंप्यूटर का मस्तिष्क (Brain) होता है, इसे ‘प्रोसेसर’ या ‘माइक्रोप्रोसेसर’ भी कहते हैं। इसका कार्य दिये गए निर्देशों अनुसार इनपुट डाटा को प्रोसेस करना है। इस क्रम में यह डाटा पर गणितीय एवं तार्किक ऑपरेशन संचालित करता है तथा कंप्यूटर के विभिन्न भागों के कार्यों को नियंत्रित भी करता है। इसकी गति को MIPS (Million Instruction Per Second) में मापा जाता है। इसके मुख्यत: तीन भाग होते हैं :
- एएलयू (ALU-Arithmetic Logic Unit): यह गणितीय (Mathematical) तथा तार्किक (Logical) ऑपरेशन संचालित करता है।
- सीयू (CU-Control Unit) : यह माइक्रोप्रोसेसर में निहित निर्देश समूहों को लागू करता है। यह मेमोरी से निर्देशों को प्राप्त कर उन्हें डीकोड करता है तथा निर्देशानुसार कार्य का निष्पादन एवं ज़रूरत पड़ने पर एएलयू को आवश्यक कार्यवाही हेतु निर्देश भेजता है।
- रजिस्टर्स/मेमोरी यूनिट: ये प्रोसेसर में अस्थायी डाटा स्टोरेज़ एरिया होते हैं, जो प्रोसेस होने वाले डाटा को सँभालने का कार्य करते हैं। यही डाटा कंट्रोल यूनिट द्वारा आगे उपयोग किया जाता है। रजिस्टर में नया डाटा लिखने के साथ ही पुराना डाटा समाप्त होता जाता है।

-
- मेमोरी यूनिट (Memory Unit): मेमोरी, कंप्यूटर में आंतरिक स्टोरेज़ एरिया होता है, जो डाटा तथा निर्देशों को स्टोर करता है।
कंप्यूटर की भाषाएँ, कंप्यूटर सिस्टम से संप्रेषण (Communication)का मुख्य माध्यम तथा किसी कार्य के संपादन हेतु कंप्यूटर को दिये गए निर्देश हैं। कंप्यूटर के प्रकार तथा कार्य के आधार पर अनेक भाषाओं का विकास किया गया है। कंप्यूटर की भाषाओं को मुख्यत: दो भागों में विभाजित किया गया है-
- निम्न-स्तरीय भाषाएँ (Low Level Languages): ये मशीन कोड हैं, जिनमें कंप्यूटर सिस्टम को 0 और 1 के रूप में निर्देश दिये जाते हैं। इसका मुख्य कार्य हार्डवेयर और सिस्टम घटकों का संचालन, प्रबंधन और नियंत्रण करना है। इसके निम्नलिखित दो प्रकार हैं-
- मशीनी भाषा (Machine Language): यह प्रोग्रामिंग भाषा की सबसे निम्न और प्रारंभिक स्तर की सबसे पहले विकसित होने वाली भाषा है। मशीनी भाषा एकमात्र भाषा है, जिसे कंप्यूटर सीधे समझता है। यह सामान्यत: हेक्साडेसिमल में लिखी जाती है। यह भाषा बाईनरी नंबर (0, 1) का उपयोग कंप्यूटर को विद्युत सिग्नल भेजने में करती है, जहाँ 0 विद्युत सिग्नल की अनुपस्थिति तथा 1 विद्युत सिग्नल की उपस्थिति को दर्शाता है। इंटरप्रेटर (Interpreter) एक प्रकार का अनुवादक सॉफ्टवेर है जिसका मुख्य कार्य उच्च-स्तरीय भाषाओं को मशीनी भाषा (0,1) में ट्रांसलेट करना हैं। हालाँकि यह एक बार में एक लाइन का ही अनुवाद करता है।
- असेंबली भाषा (Assembly Language): द्वितीय पीढ़ी की प्रोग्रामिंग भाषा, जिसकी संरचना तथा अनुदेशों के सेट, मशीनी भाषा के समान होते हैं, लेकिन इसमें मशीनी भाषा में उपयोग होने वाले अंकों की जगह अंग्रेज़ी के शब्दों, नामों तथा संकेतों का उपयोग होता है।
- उच्च-स्तरीय भाषाएँ (High Level Languages): उच्च-स्तरीय भाषाएँ मूल रूप से प्रतीकात्मक भाषाएँ हैं, जिनमें अंग्रेज़ी शब्दों तथा गणितीय प्रतीकों का उपयोग होता है। उच्च-स्तरीय भाषाओं में दिये जाने वाले निर्देशों का मशीनी भाषा में अनुवाद किया जाता है, ताकि कंप्यूटर उसे समझ सके। कंपाइलर (compiler) एक प्रकार का अनुवादक सॉफ्टवेर है जिसका मुख्य कार्य उच्च स्तरीय भाषा को मशीनी भाषा में परिवर्तित किया जाता है। यह एक बार में पूरे प्रोग्राम का अनुवाद करता है।
प्रमुख उच्च-स्तरीय भाषा वर्ग का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है-- बीजगणितीय फॉर्मूला प्रसंस्करण भाषाएँ (Algebraic Formula Processing Languages) : ये भाषाएँ गणितीय एवं सांख्यिकीय समस्याओं को सुलझाने में कंप्यूटर के उपयोग हेतु विकसित की गई हैं :
- BASIC (Beginner's All Purpose Symbolic Instruction Code)
- FORTRAN (Formula Translation)
- PL1 (Programming Language, Version 1)
- ALGOL (Algorithmic Language)
- व्यावसायिक डाटा प्रसंस्करण भाषाएँ (Business Data Processing Languages) : ये भाषाएँ कंप्यूटर को डाटा प्रसंस्करण प्रक्रियाओं तथा फाइलों को सँभालने में आने वाली समस्याओं से निपटने में सक्षम बनाती हैं।
- COBOL (Common Business Oriented Language)
- RPG (Report Programme Generation)
- स्ट्रिंग और लिस्ट प्रोसेसिंग भाषाएँ (String and List Processing Languages) : इन भाषाओं का उपयोग स्ट्रिंग ऑपरेशन में होता है, जिसमें पैटर्न सर्च तथा वर्णों (Characters) को सम्मिलित करना (Insertion) और हटा देना (Deletion) शामिल है। जैसे: LISP (List Processing), Prolog (Programming in Logic) इत्यादि।
- ऑब्जेक्ट आधारित प्रोग्रामिंग भाषाएँ (Object Oriented Programming Languages) : यह एक ऐसी भाषा है, जो एक्शन के बजाय ऑब्जेक्ट तथा तर्क (Logic) के बजाय डाटा को ध्यान में रखकर प्रोग्राम की जाती है। जैसे- C++, Java इत्यादि।
- दृश्य प्रोग्रामिंग भाषाएँ (Visual Programming Languages) : एक प्रोग्रामिंग भाषा, जो प्रोग्राम को विकसित करने के लिये चित्रात्मक तत्त्वों (Graphical Elements) तथा आकृतियों का उपयोग करती है। जैसे: Kodu, MIT app Inventor इत्यादि।
- बीजगणितीय फॉर्मूला प्रसंस्करण भाषाएँ (Algebraic Formula Processing Languages) : ये भाषाएँ गणितीय एवं सांख्यिकीय समस्याओं को सुलझाने में कंप्यूटर के उपयोग हेतु विकसित की गई हैं :
29 जुलाई 2020 को केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020’ (National Education Policy-2020) को मंज़ूरी दी है। नई शिक्षा नीति 34 वर्ष पुरानी ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1986’ [National Policy on Education (NPE)-1986] को प्रतिस्थापित करेगी।
- NEP-2020 से संबंधित प्रमुख तथ्य :
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा की पहुँच, समानता, गुणवत्ता, वहनीय शिक्षा और उत्तरदायित्व जैसे मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
- नई शिक्षा नीति के निर्माण के लिये जून 2017 में पूर्व इसरो (ISRO) प्रमुख डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था, इस समिति ने मई 2019 में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा’ प्रस्तुत किया था।
- ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020’ वर्ष 1968 और वर्ष 1986 के बाद स्वतंत्र भारत की तीसरी शिक्षा नीति होगी।
- NEP-2020 के तहत केंद्र व राज्य सरकारों के सहयोग से शिक्षा क्षेत्र पर देश की जीडीपी के 6% हिस्से के बराबर निवेश का लक्ष्य रखा गया है।
- नई शिक्षा नीति में वर्तमान 10+2 में सक्रिय शैक्षिक मॉडल के स्थान पर शैक्षिक पाठ्यक्रम को 5+3+3+4 प्रणाली के आधार पर विभाजित करने की बात कही गई है।
- तकनीकी शिक्षा, भाषायी बाध्यताओं को दूर करने, दिव्यांग विद्यार्थियों के लिये शिक्षा को सुगम बनाने आदि हेतु तकनीकी के प्रयोग को बढ़ावा देने पर बल दिया गया है।
- नई शिक्षा नीति में विद्यार्थियों में रचनात्मक सोच, तार्किक निर्णयन और नवाचार की भावना को प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया है।
- NEP-2020 के तहत ‘शिक्षा और सीखने (Education and Learning)’ पर पुन: अधिक ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर ‘शिक्षा मंत्रालय’ कर दिया गया है।
नोट: यह NEP-2020 का संक्षिप्त सारांश है। संपूर्ण नीति दस्तावेज़ यहां देखा जा सकता है:
https://www.education.gov.in/sites/upload_files/mhrd/files/NEP_final_HINDI_0.pdf
मूल्य शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा लोग दूसरों को नैतिक मूल्य प्रदान करते हैं। मूल्य शिक्षा का अर्थ विद्यार्थियों में मानवीयता का भाव उत्पन्न करने और राष्ट्रहित के प्रति गहरी सोच उत्पन्न करने की व्यवस्था से है। विद्यालयों में मूल्य शिक्षा के द्वारा विद्यार्थियों में सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक पक्ष का विकास होता है। वस्तुत: हम कह सकते हैं कि मूल्य हमारे जीवन में सही कार्य करने के लिये पथ-प्रदर्शक होते हैं। मूल्य शिक्षा भारतीय दर्शन परंपराओं और संस्कृति में अंतर्निहित है।

मूल्य शिक्षा आदर्श और यथार्थ के मध्य सेतु की भूमिका का निर्वाह करती है। मूल्यों के अभाव में विद्यार्थियों को दी गई शिक्षा निर्जीव होती है। मूल्य हमारे व्यवहार को निर्देशित तथा नियंत्रित करते हैं। उद्देश्यों के प्राप्ति के साधनों के चयन में निर्णय लेने में निर्णायक का कार्य करते हैं।
- मूल्य शिक्षा के संदर्भ में कोठारी आयोग के सुझाव
वर्ष 1964 में गठित राष्ट्रीय शिक्षा आयोग, जिसे कोठारी आयोग के नाम से भी जाना जाता है, ने मूल्य शिक्षा के संदर्भ में कुछ सुझाव दिये जो निम्नलिखित हैं-- प्राथमिक विद्यालय स्तर पर मूल्यपूरक शिक्षा रोचक कहानियों के द्वारा, माध्यमिक विद्यालय स्तर पर शिक्षकों एवं विद्यालयों के पारस्परिक विचार-विमर्श के द्वारा तथा विश्वविद्यालय स्तर पर विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा प्रदान की जाए।
- निजी प्रबंधकों (Private Management) द्वारा संचालित शिक्षा संस्थानों में भी नैतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक मूल्य की शिक्षा दी जाए।
- शिक्षण संस्थानों में साप्ताहिक या मासिक आधार पर नैतिक शिक्षा देने हेतु एक रोस्टर तैयार किया जाए।
- शिक्षा के सभी स्तरों पर मूल्य शिक्षा देने की व्यवस्था की जाए।
- कोठारी आयोग के अनुसार मूल्य शिक्षा दो विधियों के माध्यम से दी जानी चाहिये। ये दो विधियाँ निम्नलिखित हैं-
- प्रत्यक्ष विधियाँ (Direct Methods): इसके तहत मूल्य शिक्षा के लिये समयावधि निर्धारित होनी चाहिये तथा विद्यार्थियों को पौराणिक कथाओं कहानियों तथा महापुरुषों की जीवनी के माध्यम से मूल्य शिक्षा दी जाए।
- अप्रत्यक्ष विधियाँ (Indirect Methods): इसके तहत विद्यालय का वातावरण, सुझाव व प्रेरणा, सामूहिक कार्य, मौन चिंतन, प्रात:कालीन सभा तथा धार्मिक समारोह आदि| उपर्युक्त दोनों विधियों द्वारा मूल्य शिक्षा प्रदान की जाए।
- राष्ट्रीय मूल्य शिक्षा केंद (National Value Education Centre)
तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में मूल्य शिक्षा देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय मूल्य शिक्षा केंद्र की स्थापना आईआईटी दिल्ली में की गई है। वर्तमान समय में सभी तकनीकी शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ व्यावसायिक संस्थान भी अपने पाठ्यक्रम में मूल्य शिक्षा को स्थान दे रहे हैं।
- विश्व के प्रथम मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना इग्ंलैंड में 1969 ई. में हुई थी तथा जनवरी 1971 में पहले विद्यार्थी का नामांकन हुआ था।
- भारत में इस समय राज्य मुक्त विश्वविद्यालयों की संख्या (State Open Universities) 14 है।
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। इसलिये इसे राज्य मुक्त विश्वविद्यालयों के अंतर्गत नहीं रखा जाता है।
राज्य मुक्त विश्वविद्यालयों की सूची
|
विश्वविद्यालय का नाम |
राज्य |
स्थापना वर्ष |
|
डॉ. बी.आर. अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, हैदराबाद |
तेलंगाना |
1982 |
|
वर्धमान महावीर मुक्त विश्वविद्यालय, कोटा |
राजस्थान |
1987 |
|
नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय, पटना |
बिहार |
1987 |
|
यशवंत राव चव्हाण मुक्त विश्वविद्यालय, नासिक |
महाराष्ट्र |
1989 |
|
मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय, भोपाल |
मध्य प्रदेश |
1991 |
|
डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, अहमदाबाद |
गुजरात |
1994 |
|
कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, मैसूर |
कर्नाटक |
1996 |
|
नेता जी सुभाष मुक्त विश्वविद्यालय, कोलकाता |
प. बंगाल |
1997 |
|
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, प्रयागराज |
उत्तर प्रदेश |
1999 |
|
तमिलनाडु मुक्त विश्वविद्यालय, चेन्नई |
तमिलनाडु |
2002 |
|
पंडित सुंदर लाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय, बिलासपुर |
छतीसगढ़ |
2005 |
|
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी |
उत्तराखंड |
2005 |
|
कृष्णकांत हैंडिक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय, गुवाहाटी |
असम |
2005 |
|
ओडिशा राज्य मुक्त विश्वविद्यालय |
ओडिशा |
2015 |
- इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना संसद अधिनियम 1985 के तहत हुई है। IGNOU ने बहुत तेज़ी के साथ विकास किया है और यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुक्त (OPEN) शिक्षा संस्थान के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।
- IGNOU का मुख्य परिसर (Main Campus) दिल्ली में स्थित है।
- विश्वविद्यालय ने शिक्षा प्रदायगी के लिये संचार के माध्यम जैसे प्रिंट मीडियम, ऑडियो-वीडियो विजुअल, ब्रॉडकास्ट, रेडियो, शैक्षिक टीवी चैनलों और अन्य डिजिटल माध्यमों का बखूबी इस्तेमाल किया है।
- IGNOU अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अन्य देशों: संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, बहरीन, दोहा, श्रीलंका, मॉरीशस, मालदीव, नेपाल, केन्या, फिजी, कैरीबियन द्वीपसमूह आदि देशों में भी अपनी शैक्षिक सेवाएँ प्रदान करता है।
- IGNOU, यूनेस्को और क्षमता निर्माण के अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से अफ्रीका, इथोपिया, लाइबेरिया, मेडागास्कर और घाना में भी दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम की पहुँच प्रदान करता है।
- समाज से वंचित व्यक्तियों की उच्चतर शिक्षा तक पहुँच बनाने में IGNOU ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये IGNOU का शैक्षिक कार्यक्रम अनवरत जारी है।
नोट : वर्ष 2024 की NIRF रैंकिंग में तीन नई श्रेणियाँ सम्मिलित की गई हैं : ओपन यूनिवर्सिटी, स्किल यूनिवर्सिटी और स्टेट-फंडेड यूनिवर्सिटी। नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) 2024 में IGNOU ने ओपन यूनिवर्सिटी में शीर्ष स्थान हासिल किया।
- क्षेत्रीय केंद्र (Regional Centres)
क्षेत्रीय केंद्र को IGNOU अधिनियम की धारा 2(J) के तहत परिभाषित किया गया है। यह केंद्र मुक्त विश्वविद्यालय प्रणाली को बढ़ावा देने के लिये विद्यार्थियों की सहायता सेवा के रखरखाव तथा निगरानी का कार्य करता है। इसके अलावा IGNOU अधिनियम की धारा 5(1) (XXVI) के तहत विश्वविद्यालय को कॉलेज या क्षेत्रीय केंद्र पर वैधानिक दर्जा दिया जाता है ताकि विधियों द्वारा निर्धारित तरीके से सम्मानित किया जा सके।- IGNOU के क्षेत्रीय केंद्रों की संख्या 56 है।
- IGNOU-आर्मी मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय केंद्र 6 हैं।
- IGNOU-नौसेना मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय केंद्र 4 हैं।
- IGNOU-असम राइफल्स मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय केंद्र 1 है।
- नोट: IGNOU के समस्त क्षेत्रीय केंद्रों की संख्या IGNOU के वेबसाइट (12 सितंबर, 2019 तक) के अनुसार है।
- IGNOU द्वारा संचालित प्रमुख रेडियो/टीवी चैनल :
- ज्ञान वाणी: विद्यार्थियों की सुविधा हेतु वर्ष 2001 में इस एफ.एम. रेडियो चैनल की शुरुआत की र्गई।
- ज्ञान दर्शन: विद्यार्थियों की सुविधा हेतु 26 जनवरी, 2000 को इस शैक्षिक टेलीविजन चैनल की शुरुआत की गई। विद्यार्थियों के अध्ययन को यह चैनल सुगम व सहज बनाता है।
- एकलव्य प्रौद्योगिकी/तकनीक चैनल: आई.आई.टी. और IGNOU के मध्य दूरस्थ शिक्षा की एक संयुक्त पहल है। इस चैनल की शुरुआत 26 जनवरी, 2003 को हुई थी।
- व्यास चैनल (Vyas Channel): कॉन्सोर्टियम फॉर एजुकेशनल कम्युनिकेशन (CEC) ने यूजीसी के साथ मिलकर 24 × 7 उच्चतर शिक्षा चैनल की स्थापना 26 जनवरी, 2004 को की।
नोट: ज्ञान वाणी और ज्ञान दर्शन की नोडल एजेंसी IGNOU है तथा ज्ञान दर्शन टीवी चैनल का प्रसारण दूरदर्शन के माध्यम से किया जाता है।
जेम्स टेलर ने वर्ष 1995 में दूरस्थ शिक्षा की चार पीढ़ियों का उल्लेख किया है। वर्तमान में शिक्षा का विकास क्रम दिनोदिन आगे बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम के अंतर्गत पाँचवीं पीढ़ी (Fifth Generation) का आविर्भाव हो चुका है।
- प्रथम पीढ़ी (First Generation): इस पीढ़ी के अंतर्गत पत्राचार शिक्षा (Correspondence Education) को रखा गया है। पत्राचार शिक्षा प्रणाली में ‘मुद्रण’ माध्यम (Print Medium) का उपयोग शिक्षण अधिगम के विकास हेतु किया जाता है। इसके अंतर्गत विद्यार्थी अपनी गति व कठोर परिश्रम से सीखता है।
- द्वितीय पीढ़ी (Second Generation): इस पीढ़ी में मुद्रित सामग्री के साथ-साथ कंप्यूटर, सीडी, कैसेट्स जैसी अमुद्रित सामग्री का प्रयोग बढ़ जाता है। इस पीढ़ी में बहु-माध्यम उपागम (Multi Media Approach) तथा स्व अध्ययन सामग्री की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। तकनीकी दृष्टि से इस पीढ़ी ने बहुत अधिक सफलताएँ अर्जित की हैं।
- तृतीय पीढ़ी (Third Generation): इस पीढ़ी को ‘टेली लर्निंग एप्रोच’ भी कहते हैं। इसके अंतर्गत टेली कॉन्फ्रेंसिंग, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तथा रेडियो द्वारा पाठ्य वस्तुओं का प्रसारण होता है। विद्यार्थियों व शिक्षकों के मध्य विषय संबंधी मुद्दों पर क्रिया-प्रतिक्रिया का दौर प्रारंभ होता है।
- चतुर्थ पीढ़ी (Fourth Generation): इस पीढ़ी के अंतर्गत विद्यार्थी अपनी सुविधा के अनुसार अध्ययन कर सकता है। इसमें Computer Conferencing, E–Mail, जैसी सुविधाओं का उपयोग हुआ है।
- पाँचवीं पीढ़ी (Fifth Generation): ऑनलाइन अध्ययन करना, समस्या का समाधान इस पीढ़ी का प्रमुख ध्येय होता है। मल्टीमीडिया का अत्यधिक प्रयोग इस पीढ़ी में होता है। वर्तमान समय में आभासी विश्वविद्यालय (Virtual Universities) की अवधारणा का धीरे-धीरे विकास हो रहा है।
- वर्ष 1642: प्रथम गणना करने वाली मशीन पास्कलाइन (Pascaline)का विकास फ्राँसीसी वैज्ञानिक ब्लेज पास्कल द्वारा किया गया।
- ब्रिटिश गणितज्ञ चार्ल्स बैबेज ने वाष्प चालित गणना करने वाली मशीन एनालिटिकल (Analytical) इंजन का विकास किया।
- चार्ल्स बैबेज को कंप्यूटर का जन्मदाता माना जाता है।
- चार्ल्स बैबेज द्वारा ही डिफरेंस इंजन (Difference Engine) का विकास किया गया था।
- वर्ष 1890: हरमन हॉलेरिथ द्वारा ‘पंचकार्ड’ बनाया गया, जिसमें गणना से संबंधित जानकारी को स्टोर किया जा सकता था।
- वर्ष 1936: एलन ट्यूरिंग द्वारा ‘ट्यूरिंग मशीन’ का विकास किया गया। आधुनिक कंप्यूटर की मूल अवधारणा इसी पर आधारित है। एलन ट्यूरिंग को आधुनिक कंप्यूटर का जनक माना जाता है।
- वर्ष 1944: स्वचालित अनुक्रम नियंत्रित कैलकुलेटर मार्क-I बनकर तैयार हुआ।
- वर्ष-1945: गणितज्ञ जॉन वॉन न्यूमैन द्वारा पहली बार स्टोर्ड प्रोग्राम की अवधारणा प्रस्तुत की गई। न्यूमैन ने ही बाईनरी नंबर सिस्टम तथा कंप्यूटर आर्किटेक्चर की अवधारणा भी दी थी।
- वर्ष 1946 : इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एंड कैलकुलेटर (ENIAC) का निर्माण हुआ। यह पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर था, जो सामान्य उद्देश्यों हेतु प्रयोग किया गया।
- वर्ष 1947 : बेल लेबोरेटरी (Bell Laboratories) द्वारा ट्रांजिस्टर का आविष्कार किया गया। इसने कंप्यूटर में लगने वाले वैक्यूम ट्यूब को प्रतिस्थापित किया।
- वर्ष 1951 : UNIVAC–I (Universal Automatic Computer) का निर्माण पूरा हुआ। इसे Eckert - Mauchly Computer Corporation द्वारा डिज़ाइन किया गया था। यह पहला वाणिज्यिक (Commercial) कंप्यूटर था। इसका उपयोग यू.एस. प्रेसीडेंट इलेक्शन परिणामों के पूर्वानुमान तथा जनगणना में किया गया था।
- वर्ष 1950 : के दशक में FORTRAN भाषा का विकास हुआ।
- वर्ष 1958 : जैक किल्बी (Jack Kilby) तथा रॉबर्ट नॉएस (Robert Noyce) ने इंटीग्रेटेड सर्किट या कंप्यूटर चिप का आविष्कार किया। इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) सिलिकॉन का बना हुआ ट्रांजिस्टरों का समूह होता है।
- मैनुएल केस्टले ने ‘‘नेटवर्क सोसायटी’’ का सर्वप्रथम प्रयोग किया।
- विलियम इंग्लिश ने पहले माउस का प्रोटोटाइप तैयार किया।
- वर्ष 1964 : सेमर क्रे (Seymour Cray) द्वारा पहला सुपर कंप्यूटर CDC 6600 निर्मित हुआ।
- वर्ष 1968 : माउस और ग्राफिकल यूजर इंटरफेस (GUI) से युक्त आधुनिक कंप्यूटर के एक प्रोटोटाइप का डगलस एंजलबर्ट द्वारा प्रदर्शन किया गया। माउस का पेटेंट डगलस एंजलबर्ट के नाम है।
- वर्ष 1969 : बेल लैब (Bell Labs) ने UNIX ऑपरेटिंग सिस्टम का विकास किया, जिसे बाद में C–Programming Language में लिखा गया।
- वर्ष 1970 : इंटेल (Intel) द्वारा डायनेमिक एक्सेस मेमोरी (DRAM 1103) चिप का निर्माण किया गया।
- वर्ष 1973 : जेरॉक्स (Xerox) टीम के सदस्य रॉबर्ट मेटकॉफ (Robert Metcalfe) द्वारा इथरनेट (Ethernet) का विकास किया गया।
- वर्ष 1975 : पॉल एलन (Paul Allen) तथा बिल गेट्स (Bill Gates) द्वारा माइक्रोसॉफ्ट कंपनी की स्थापना की गई।
- वर्ष 1976 : स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) तथा स्टीव वॉज़्निएक द्वारा (Steve Wozniak) एप्पल कंप्यूटर्स की शुरुआत की गई।
- वर्ष 1981 : Osborne 1 को विश्व का पहला पोर्टेबल कंप्यूटर माना जाता है, जिसका उत्पादन बड़े पैमाने पर किया गया था। इसी वर्ष घोषित Epson HX-20 को पहला लैपटॉप कंप्यूटर माना जाता है।
- वर्ष 1983: GUI (Graphical User Interface) से युक्त पहला पर्सनल कंप्यूटर एप्पल का लीजा (Lisa) था। Gavilan SC पहला पोर्टेबल कंप्यूटर था, जिसे ‘लैपटॉप’ नाम से बाज़ार में उतारा गया।
- वर्ष 1985: माइक्रोसॉफ्ट ने विंडोज ग्राफिकल ऑपरेटिंग सिस्टम लांच किया।
- Symbolics.com पहला रजिस्टर्ड डोमेन नाम था।
- वर्ष 1990 : टिम बर्नर ली (Tim Berner Lee) ने Hyper Text Markup Language (HTML) का विकास किया।
- वर्ल्ड वाइड वेब (WWW) का आविष्कार ली द्वारा 1989 में ही कर लिया गया था, लेकिन HTML के विकास ने इसे अनुप्रयोगी बनाया।
- टिम बर्नर ली ने पहली बार URL (Uniform Resource Locator) की रचना की।
- वर्ष 1993 : इंटेल ने पेंटियम माइक्रोप्रोसेसर प्रस्तुत किया।
- सेर्गेई ब्रिन तथा लैरी पेज ने गूगल सर्च इंजन का विकास किया।
- वर्ष 2004 : Mozilla Firefox 1.0 नामक वेब ब्राउजर तथा Facebook नामक सोशल नेटवर्किंग साइट मार्केट में लांच की गईं।
- वर्ष 2005 : You Tube नामक एक Video Sharing Service की शुरुआत की गई।
मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा प्रणाली एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें शिक्षकों और विद्यार्थियों को खास स्थान पर खास समय के अनुसार एकत्रित होने की बाध्यता नहीं होती है। यह प्रणाली कार्यविधियों एवं शिक्षण समय के संबंध में बहुत लचीली है। साथ ही इसमें दाखिले के लिये किसी मेरिट कसौटी को पूरा करने की बाध्यता नहीं होती है। दूरस्थ शिक्षा को अनेक नामों से जाना जाता है, जैसे दूरवर्ती शिक्षा, पत्राचार शिक्षा, मुक्त शिक्षा, गृह अध्ययन, परिसर के बाहर अध्ययन (Off Campus Study)तथा इसे ‘बहुमाध्यम उपागम’ (Multi Media Approach) भी कहते हैं।
- दूरस्थ शिक्षा को गैर-सरकारी उपागम के रूप में भी जाना जाता है। इसमें मुद्रित एवं अमुद्रित बहु-माध्यमों का प्रयोग शिक्षण तथा विद्यार्थी के मध्य संचार के लिये किया जाता है। इसमें शिक्षक तथा विद्यार्थी एक-दूसरे से अलग रहकर आवश्यक कार्यों तथा उत्तरदायित्व को पूर्ण करते हैं। इसमें स्व अध्ययन (Self Study) को महत्त्व दिया जाता है।
- दूरस्थ शिक्षा को सुचारू रूप से चलाने के लिये शिक्षा सहायक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। शिक्षण सहायक उपकरणों की सूची में रेडियो, दूरदर्शन, ऑडियो-वीडियो फाइल्स, सी.डी. फिल्म्स, पत्राचार सामग्री तथा विभिन्न डिजिटल माध्यम सम्मिलित हैं।
- दूरस्थ शिक्षा प्रणाली को जन-शिक्षण प्रणाली भी कहते हैं। इस शिक्षा का मुख्य उद्देश्य वंचित क्षेत्रों से जुडे़ युवाओं को, जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, उन्हें अध्ययन का अवसर प्रदान करना।
- भारत में दूरस्थ (दूरवर्ती) शिक्षा का प्रारंभ वर्ष 1962 में पत्राचार (Correspondence) शिक्षा कार्यक्रम के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय ने किया।
- डी.एस. कोठारी- ‘‘अंशकालिक और पत्राचार पाठ्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा को पूर्णकालिक शिक्षा के समान दर्जा दिया जाना चाहिये, ताकि बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को अवसर मिले, जो खुद को शिक्षित करने की इच्छा रखते हैं, लेकिन पूर्णकालिक आधार पर ऐसा नहीं कर पाते’’।
- यूनेस्को- ‘‘जीवन पर्यंत शिक्षा एक प्रक्रिया है। व्यक्ति औपचारिक, निरौपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा से सीखता है।’’
- दूरस्थ शिक्षा से संबंधित प्रमुख संस्थाएँ
- दूरस्थ शिक्षा परिषद् (Distance Education Council): राष्ट्रीय स्तर पर दूरस्थ तथा मुक्त शिक्षा के मानकों और आपसी समन्वय को बनाये रखने के लिये इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के प्रबंधक बोर्ड ने इस उत्तरदायी संस्थान की स्थापना वर्ष 1992 में की थी।
- दूरस्थ शिक्षा ब्यूरो (Distance Education Bureau): दूरस्थ शिक्षा से संबंधित सभी कार्यों का दायित्व यूजीसी ने दूरस्थ शिक्षा परिषद के स्थान पर दूरस्थ शिक्षा ब्यूरो को सौंपा है। इस ब्यूरो की स्थापना सितंबर 2012 के निर्देशों के अनुपालन में की गई है। दूरस्थ शिक्षा ब्यूरो यूजीसी के अधीन एक निकाय है।वर्ष 2013 में दूरस्थ शिक्षा परिषद् के विघटित होने के बाद अस्तित्व में आई।
इस एजेंसी का गठन देश के उच्चतर शैक्षिक संस्थानों (IIT, NIT और IIM आदि ) के लिये अनुसंधान केंद्रित बुनियादी ढाँचे को विकसित करना तथा आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करने हेतु किया गया।
- स्थापना
- HEFA के गठन को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 12 सितंबर 2016 को मंजूरी प्रदान की।
- इसे 2017 में शिक्षा मंत्रालय और केनरा बैंक के संयुक्त उद्यम (क्रमशः 91% और 9% निवेश भागीदारी) के रूप में शुरू किया गया।
- मुख्य उद्देश्य
- प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में पूंजीगत परिसंपत्तियों के निर्माण के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करना।
- बाज़ार आधारित उपकरणों का उपयोग करके बाज़ार से धन प्राप्त करना।
- कानूनी स्थिति
- HEFA कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के अंतर्गत गैर-लाभकारी सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी के रूप में पंजीकृत है।
- यह गैर-जमा (Non-deposit) कंपनी के रूप में RBI के साथ NBFC-ND के रूप में पंजीकृत है।
- आर्थिक पक्ष
- HEFA की अधिकृत पूंजी दो हजार करोड़ रुपये है, जिसमें सरकारी हिस्सेदारी 1000 करोड़ रुपये की है।
- इसे PSU बैंक और सरकारी स्वामित्व वाली NBFC के दायरे में विशेष इकाई के रूप में गठित किया गया है।
आयु के संदर्भ में लिंग भिन्नताएँ यह दर्शाती हैं कि जैसे-जैसे व्यक्ति बड़े होते हैं, उनकी विकासात्मक प्रक्रियाएँ और अनुभव कैसे भिन्न होते हैं। ये भिन्नताएँ जीवन के विभिन्न चरणों में अधिक स्पष्ट होती हैं, जो संज्ञानात्मक, भावनात्मक, और सामाजिक विकास को प्रभावित करती हैं।
- आयु के अनुसार विकासात्मक भिन्नताएँ : आयु जीवन के विकासात्मक पथ निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, जो लिंग के आधार पर भिन्न हो सकते हैं। बचपन के दौरान, तेजी से शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास होता है, जिसमें लड़के और लड़कियाँ दोनों ही तीव्र विकास अनुभव करते हैं। हालाँकि, इस विकास की दर और प्रकार में भिन्नताएँ हो सकती हैं। उदाहरण के लिये, लड़कियाँ आमतौर पर भाषा अधिग्रहण और सूक्ष्म मोटर कौशल जैसे विकासात्मक स्तर को लड़कों की तुलना में थोड़ा पहले प्राप्त करती हैं। दूसरी ओर, लड़के, शुरुआती किशोरावस्था के दौरान अधिक स्पष्ट शारीरिक विकास प्रदर्शित कर सकते हैं।
- संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास : बचपन से वयस्कता की ओर बढ़ते समय, संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास जारी रहता है। अनुसंधान से पता चलता है कि जबकि दोनों लिंग संज्ञानात्मक वृद्धि का अनुभव करते हैं, यह वृद्धि अलग-अलग तरीकों से प्रकट होती है। लड़कियाँ अक्सर शब्दावली और सामाजिक कौशल में पहले विकसित होती हैं, जो उनके शैक्षिक प्रदर्शन और सामाजिक अंतःक्रिया को प्रभावित कर सकती है। लड़के किशोरावस्था में रीज़निंग और गणितीय कौशल में अधिक सक्षम हो सकते हैं, जो उनके शैक्षिक और कैरियर विकल्पों को प्रभावित कर सकता है।
- शारीरिक वृद्धि और स्वास्थ्य : शारीरिक वृद्धि की प्रक्रियाएँ भी लिंग के आधार पर भिन्न होती हैं। किशोरावस्था के दौरान, लड़कियाँ आमतौर पर लड़कों की तुलना में शारीरिक परिवर्तनों का पहले अनुभव करती हैं, जैसे कि तीव्र शारीरिक वृद्धि और हार्मोनल बदलाव। ये प्रारंभिक परिवर्तन आत्म-संवेदनशीलता और सामाजिक अंतःक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। लड़के आमतौर पर अधिक समय तक वृद्धि और मांसपेशियों के विकास का अनुभव करते हैं, जो उनके शारीरिक क्षमताओं और सामाजिक धारणाओं को प्रभावित कर सकता है।
- अनुभव का संचय : आयु के साथ, जीवन के अनुभवों का संचय लिंग भिन्नताओं को बढ़ाता है। उदाहरण के लिये, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में विभिन्न सामाजिक अपेक्षाएँ और कैरियर चुनौतियाँ का सामना करना पड़ सकता है, जो उनके अनुभव और अवसरों को प्रभावित कर सकती है। लिंग-विशिष्ट भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ व्यक्ति के अनुभव और कौशल के विकास को प्रभावित कर सकती हैं।
- शिक्षा और रोजगार पर प्रभाव : इन लिंग भिन्नताओं को समझना शिक्षकों और नियोक्ताओं के लिये महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा में, ऐसे शिक्षण तरीकों को अपनाना जो लड़कों और लड़कियों की अलग-अलग विकासात्मक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हों, यह सीखने के परिणामों में सुधार कर सकता है।
- लिंग भिन्नताओं को संबोधित करना : लिंग भिन्नताओं को प्रभावी रूप से संबोधित करने के लिये, ऐसी रणनीतियों को लागू करना आवश्यक है जो विभिन्न आयु चरणों में प्रत्येक लिंग की विशिष्ट विकासात्मक आवश्यकताओं का समर्थन करें। समावेशी शैक्षिक प्रथाओं को प्रोत्साहित करना, समान अवसर प्रदान करना, और सामाजिक अपेक्षाओं को संबोधित करना इन भिन्नताओं को कम करने में मदद कर सकता है।
स्पष्ट है कि आयु के संदर्भ में लिंग भिन्नताएँ यह प्रदर्शित करती हैं कि पुरुषों और महिलाओं के बीच विकासात्मक प्रक्रियाएँ कैसे भिन्न होती हैं। इन भिन्नताओं को समझकर और संबोधित करके, हम जीवन के सभी चरणों में अधिक समान अवसर और समर्थन प्रदान कर सकते हैं।
EQUIP का तात्पर्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के उन्नयन और समावेशी कार्यक्रम (Education Quality Upgradation and Inclusion Program) से है। यह प्रोजेक्ट सरकार के साथ नीति आयोग के सीईओ, प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार और पूर्व राजस्व सचिव सहित कुछ कॉर्पोरेट प्रमुखों के नेतृत्व वाली दस सदस्यीय समिति द्वारा तैयार किया गया है।
- प्रमुख बिंदु
- भारत में बहुस्तरीय उच्चतर शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने के लिये एक कार्ययोजना बनाने का प्रस्ताव किया गया है। इसे वर्ष 2019-2024 के बीच लागू किया जाना है।
- यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति की कार्यान्वयन योजना के रूप में वर्णित है। इसे नीति और कार्यान्वयन के बीच की खाई को पाटने के लिये लाया जा रहा है।
- उद्देश्य
- उच्चतर शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को दोगुना करना।
- शिक्षण और सीखने की प्रक्रियाओं में सुधार करना।
- उच्च शिक्षण संस्थानों में भौगोलिक रूप से विद्यमान विषमता में सुधार करना।
- देश भर में वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य गुणवत्ता मानकों को लागू करना।
- शीर्ष वैश्विक संस्थानों में कम-से-कम 20 भारतीय संस्थानों की उपस्थिति दर्ज कराना।
- अनुसंधान/नवाचार के परिवेश को बढ़ावा देना।
- विद्यार्थियों के लिये रोज़गार के अवसरों की उपलब्धता में आवश्यक सुधार करना।
- उच्चतर शिक्षा संस्थानों के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिये रूपरेखा तैयार करना।
- बेहतर प्रमाणन प्रणालियों, शिक्षा प्रौद्योगिकी के उपयोग, प्रशासनिक सुधार और निवेश में मात्रात्मक तथा गुणात्मक वृद्धि करना।
- वित्तपोषण
- इस परियोजना का वित्तपोषण उच्चतर शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (Higher Education Financing Agency-HEFA) के अलावा बाज़ार में अतिरिक्त बजटीय संसाधनों की उपलब्धता पर निर्भर होगा।
हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने देश में अनुसंधान की संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु नई पहल ‘स्कीम फॉर ट्रांस-डिसिप्लिनरी रिसर्च फॉर इंडियाज़ डेवलपिंग इकॉनमी’ (STRIDE) की घोषणा की।
- STRIDE के प्रमुख उद्देश्य
- इस योजना का मुख्य उद्देश्य युवाओं की प्रतिभा की पहचान करना, अनुसंधान की संस्कृति तथा नवाचार को बढ़ावा देना, क्षमता निर्माण करना, भारत की विकासशील अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय विकास हेतु ट्रांस-डिसिप्लिनरी रिसर्च को बढ़ावा देना है।
- मानविकी और मानव विज्ञान के संदर्भ में विशेष ध्यान देते हुए बहु-संस्थागत नेटवर्क तथा प्रभावी रिसर्च परियोजनाओं को फंड प्रदान करना।
- प्रमुख बिंदु
- STRIDE उन अनुसंधान परियोजनाओं को सहायता प्रदान करेगा जो सामाजिक रूप से प्रासंगिक होगें।
- इसे शोध की एक नई संस्कृति को विकसित करने की पहल के रूप में देखा जा रहा है।
- यह मज़बूत नागरिक समाज के निर्माण हेतु नए विचारों, अवधारणाओं और प्रथाओं तथा विकास को समर्थन प्रदान करेगा।
- कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ट्रांस-डिसिप्लिनरी रिसर्च कल्चर को मज़बूत करने में सहयोग हेतु STRIDE के निम्नलिखित तीन घटक दिये गए हैं-
- इसके अंतर्गत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में अनुसंधान तथा नवाचार को प्रेरित करने के साथ ही युवा प्रतिभाओं की पहचान की जाएगी। स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और वैश्विक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान हेतु युवा प्रतिभाओं की पहचान व उनका समर्थन करके विविध विषयों में अनुसंधान क्षमता का निर्माण किया जाएगा। इसमें सभी विषयों पर अनुसंधान के लिये 1 करोड़ रुपए तक का अनुदान दिया जाएगा।
- इस योजना के तहत भारत की अर्थव्यवस्था में योगदान करने के लिये विश्वविद्यालयों, सरकार, स्वैच्छिक संगठनों और उद्योगों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित किया जाता है। इसमें सभी विषयों पर अनुसंधान करने के लिये 50 लाख से 1 करोड़ रुपए तक का अनुदान दिया जाएगा।
इसके तहत निधिकरण के लिये पात्र शर्तों में शामिल हैं : दर्शन, इतिहास, पुरातत्त्व, नृविज्ञान, मनोविज्ञान, भाषा विज्ञान, भारतीय भाषा एवं संस्कृति, भारतीय ज्ञान प्रणाली, कानून, शिक्षा, पत्रकारिता, जनसंचार, वाणिज्य, प्रबंधन, पर्यावरण और सतत विकास। इस घटक के लिये उपलब्ध अनुदान के अंतर्गत एक उच्च शैक्षणिक संस्थान हेतु 1 करोड़ रुपए और बहु संस्थागत नेटवर्क के लिये 5 करोड़ रुपए तक दिये जाने का प्रावधान है।
- उच्चतर आविष्कार योजना : शिक्षा मंत्रालय द्वारा वर्ष 2015 (6 अक्तूबर, 2015) में इस योजना की शुरुआत की। इस योजना का मुख्य कार्य भारत और भारत के बाहर शिक्षा और उद्योगों के मध्य सहयोग स्थापित करना है।
- ईशान उदय : यूजीसी द्वारा वर्ष 2014 – 15 के शैक्षिक सत्र से पूर्वोत्तर भारत के विद्यार्थियों के लिये ईशान उदय विशेष छात्रवृत्ति योजना प्रारंभ की है।
- ईशान विकास : पूर्वोत्तर भारत के विद्यार्थियों में विज्ञान गणित और इंजीनियरिंग शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस योजना की शुरुआत की गई है।
- उन्नत भारत अभियान (Unnat Bharat Abhiyan): ग्रामीण क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी अंतर को दूर करने के लिये उच्चतर शिक्षा संस्थाओं में आधारभूत ज्ञान के प्रयोग के लिये उन्नत भारत अभियान प्रारंभ किया गया है। इस अभियान के अंतर्गत सभी तकनीकी और उच्चतर शिक्षा सस्थाएँ 5 गाँवों को (प्रत्येक अलग-अलग) गोद लेंगे और उनके नवाचार की योजना तैयार करेंगे। आई.आई.टी. दिल्ली को इस अभियान का राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया है। इस योजना का औपचारिक शुभारंभ नवंबर 2014 में किया गया था।
- ई-पाठशाला (e-Pathshala): एन.सी.ई.आर.टी (NCERT) द्वारा पाठ्यपुस्तकों, ऑडियो, वीडियो, आवधिक पत्रिकाओं सहित सभी ई-शैक्षिक संसाधनों और अन्य मुद्रण और गैर-मुद्रण सामग्री की प्रदर्शन मंजूषा और विस्तारण के लिये ई-पाठशाला का निर्माण किया गया है।
- राष्ट्रीय आविष्कार अभियान (Rashtriya Avishkar Abhiyan): इस अभियान का शुभारंभ डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा 9 जुलाई, 2015 को किया गया था। यह 6–18 आयु वर्ग के बच्चों में विज्ञान, गणित और प्रौद्योगिकी में प्रेरित व प्रोत्साहित करने की एक पहल है।
- उड़ान परियोजना (Udaan Scheme): केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने 11वीं व 12वीं की बालिकाओं के लिये वर्ष 2014 में यह परियोजना प्रारंभ की। इस परियोजना के अंतर्गत जेईई मुख्य एवं एडवांस प्रवेश परीक्षा और साथ ही अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों/संस्थानों में दाखिले की तैयारी हेतु पात्र बालिकाओं के मार्गदर्शन तथा प्रशिक्षण के लिये ऑनलाइन तथा ऑफलाइन संसाधन उपलब्ध कराना है।
- रिवाइटलाइज़िंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड सिस्टम एजुकेशन (राइज़) (Revitalising Infrastructure and System in Education – RISE): देश के उच्चतर शैक्षिक संस्थाओं में अनुसंधान से जुड़ी अधोसंरचनाओं को सुधारने हेतु वित्तीय वर्ष 2018 में ‘राइज’ अभियान नामक योजना को शुरू करने की घोषणा की गई है। इस योजना के तहत अगले चार वर्षों में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। यह निवेश उच्चतर शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (Higher Education Financing Agency) के द्वारा किया जाएगा।
- प्रधानमंत्री अनुसंधान अध्येता योजना(Prime Ministers Research Fellowship Scheme): विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिये वित्तीय वर्ष 2018-19 में प्रधानमंत्री अनुसंधान अध्येता योजना (PMRF) को मंजूरी दी गई है।
- इस योजना के तहत देश के शीर्ष विज्ञान एवं तकनीकी संस्थाओं से बीटेक उत्तीर्ण अथवा अंतिम वर्ष के सर्वोत्तम विद्यार्थियों को आईआईटी (IIT), आईआईएससी (IISC) के पीएचडी कार्यक्रम में सीधा प्रवेश दिया जाएगा।
- चयनित रिसर्च फेलों को प्रथम दो वर्षों के लिये 70,000 रुपये प्रतिमाह, तीसरे वर्ष के लिये 75,000 रुपये प्रतिमाह तथा चौथे और पाँचवे वर्ष के लिये 80,000 प्रतिमाह की फेलोशिप प्रदान की जाएगी।
यह परियोजना शैक्षिक संस्थाओं में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर के प्रयोग को प्रोत्साहित करता है। आईआईटी मुंबई इस परियोजना की नोडल एजेंसी है। इसके तहत निम्नलिखित सॉफ्टवेर हैं :
- विद्वान (Vidwan): यह एक विशेषज्ञ डाटाबेस है जो भारत और विदेशों में अग्रणी शैक्षिक और शोध संगठनों में कार्यरत वैज्ञानिकों, संकाय सदस्यों और अनुसंधान वैज्ञानिकों की प्रोफाइल को एकत्रित करता है।
- राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी (NDL): शिक्षा मंत्रालय, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा मिशन (NMEICT) के तहत राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित की जा रही है। आईआईटी खड़गपुर को राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी के समन्वय और स्थापना का दायित्व दिया गया है। इस परियोजना का उद्देश्य सभी लोगों में विभिन्न उपयोगकर्ता समूहों को एकल खिड़की पहुँच प्रदान करने के लिये शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थाओं निकायों में सभी मौजूदा डिजिटलीकृत और डिजिटल सामग्री को एकीकृत करना है
- टॉक-टू-ए-टीचर (Talk to a Teacher): आईआईटी मुंबई द्वारा तैयार किया गया कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य देशभर के शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान करना है। इस प्रोजेक्ट में अमृता विश्वविद्यालय भी भागीदार है।
- आस्क अ क्वेश्चन (Ask A Question): यह प्रश्नोत्तर आधारित एक प्लेटफार्म है। पूरे भारत के विज्ञान एवं इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों द्वारा प्रश्न पूछा जाता है और उसका जवाब आई.आई.टी. मुंबई के संकाय सदस्य (Faculty Member) देते हैं।
- ग्लोबल इनिशिएटिव ऑफ एकेडेमिक नेटवर्क(GIAN): GIAN भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त कार्यक्रम है। यह 30 नवंबर, 2015 को प्रारंभ हुआ। जिसके तहत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद वैज्ञानिकों और उद्यमियों की टैलेंट पूल बनाने की कोशिश की जाएगी, ताकि भारत के उच्चतर शिक्षण संस्थानों को वैश्विक उत्कृष्टता की सहायता मिल सके।
- राष्ट्रीय रिसर्च प्रोफेसरशिप (National Research Professorship):भारत सरकार ने ज्ञान के किसी क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले शिक्षाविदों (Academics) और विद्वानों को सम्मानित करने के लिये सन् 1949 से इस योजना की शुरुआत की थी। वे व्यक्ति, जिन्होंने 65 वर्ष की उम्र पार कर ली हो और ज्ञान के किसी क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया हो और 65 वर्ष के बाद भी उस क्षेत्र में सकारात्मक योगदान दे रहे हो तब उन व्यक्तियों को राष्ट्रीय रिसर्च प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया जाता है।
- राष्ट्रीय प्रशिक्षुकता प्रशिक्षण योजना(National Scheme of Apprenticeship Training):
- प्रशिक्षुकता अधिनियम, 1961 के तहत प्रशिक्षुकता योजना का कार्यान्वयन एक सांविधिक आवश्यकता है। इसके तहत लगभग 10000 प्रतिष्ठानों/संगठनों के इंजीनियर, डिप्लोमाधारकों (तकनीशियनों) और 10+2 की पढ़ाई पूरी कर चुके युवाओं को प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं।
- अधिनियम के तहत प्रशिक्षुकता प्रशिक्षण की अवधि एक वर्ष है। प्रशिक्षकों को हर महीने 5000 रुपये से कम की राशि का वजीफा भी दिया जाता है।
- मानव-संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा पूर्णत:, वित्तपोषित चार प्रशिक्षुकता बोर्ड-मुंबई, कोलकाता, कानपुर और चेन्नई में स्थित है।
- योजना का मुख्य उद्देश्य नव स्नातक इंजीनियरों, डिप्लोमा धारकों और 10+2 पास युवाओं को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना है, ताकि वह उद्योगों की आवश्यकतानुसार अपना क्षमता निर्माण कर सकें।
- इस योजना का आदर्श वाक्य ‘सशक्त युवा, समर्थ भारत’ है।
- ई-यंत्र (e-Yantra): ई-यंत्र शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा मिशन (NMEICT) प्रायोजित कार्यक्रम है। इंजीनियरिंग कॉलेजों तथा तकनीकी संस्थानों में रोबोटिक्स तकनीक के महत्त्व को देखते हुए आईआईटी बॉम्बे ने इस पहल को आगे बढ़ाया है। इसका उद्देश्य वास्तविक दुनिया की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान हेतु व्यावहारिक दृष्टिकोण के साथ अंत:स्थापित प्रक्रिया में अभियंताओं (इंजीनियरों) की अगली पीढ़ी को तैयार करना। आई.आई.टी. बॉम्बे (मुंबई) इस पहल का राष्ट्रीय संयोजक (National Coordinator) है।
- इंप्रिंट (IMPacting Research, INnovation and Technology- IMPRINT)
- इंप्रिंट (इंपैक्ट़िग रिसर्च इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी) योजना भारत सरकार की फ्लैगशिप योजना है। इसके तहत इंजीनियरिंग के क्षेत्र में मौजूद प्रासंगिक चुनौती को सुलझाने की कोशिश की जाएगी, ताकि ज्ञान के अमूर्तिकरण को उत्पाद में बदलकर भारतीय राष्ट्र विकास के पथ पर आगे बढ़ सकें।
- 5 नवंबर, 2015 में शुरू हुई यह योजना पैन आई.आई.टी. और आई.आई.एस.सी. योजना है, जिसका मुख्य काम इंजीनियरिंग के क्षेत्र में शोध के लिये कार्य करना है।
- आई.आई.टी. कानपुर इस पहल का राष्ट्रीय संयोजक (National Coordinator) है।
- स्वयं(Study Webs of Active Learning for Young Aspiring Minds-SWAYAM)
- स्वयं भारत सरकार द्वारा आरंभ किया गया ई-शिक्षा कार्यक्रम है, जिसे शिक्षा के तीन आधारभूत सिद्धांतों अर्थात् पहुँच, निष्पक्षता (अर्थात् सभी को शिक्षा) तथा गुणवत्ता को प्राप्त करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
- कक्षा 9 से लेकर परास्नातक (Post Graduate) से संबंधित सारे विषयों को देश के चुनिंदा 1000 शिक्षकों के माध्यम से स्वयं योजना के तहत पढ़ाने की व्यवस्था है।
- स्वयं प्लेटफॉर्म शिक्षा मंत्रालय और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (AICTE) द्वारा स्वदेश में माइक्रोसॉफ्ट की सहायता से निर्मित किया गया है।
- स्वयं में प्रदान किये जा रहे पाठ्यक्रम निम्न भागों में होंगे– (1) वीडियो व्याख्यान, (2) विशेष रूप से तैयार की गई अध्ययन सामग्री, जो डाउनलोड/मुद्रित की जा सकेगी, (3) परीक्षा तथा प्रश्नोत्तरी के माध्यम से स्वमूल्यांकन परीक्षा, (4) संकायों के समाधान के ऑनलाइन विचार-विमर्श।
- इस प्रकार SWAYAM एक मूक (Moocs–Massive Open Online Courses) प्लेटफॉर्म है।
राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा योजना केंद्र द्वारा प्रायोजित योजना (Centrally Sponsored Scheme) है, जिसे राज्यों के योग्य (Eligible) उच्चतर शिक्षण संस्थानों को रणनीतिक रूप से विभिन्न सहायता देने के लिये 2013 में शुरू किया गया। इसके तहत समालोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Appraisal) के आधार पर राज्यों को वित्तीय सहायता दी जाती है, जो उच्चतर शिक्षा में समानता, पहुँच और उत्कृष्टता से संबंधित मामलों को सुलझाने के लिये राज्यों की कार्ययोजना में सहायता करती है।
उद्देश्य
- निर्धारित मानकों और मापदंडों को सुनिश्चित करके राज्य की उच्चतर शिक्षा संस्थाओं की गुणवत्ता में सुधार करना और गुणवत्ता के मूल्यांकन के लिये प्रत्यायन (Accreditation) की पद्धति का अनिवार्य रूप से उपयोग करना।
- संबंधन (Affiliation), शैक्षिक और परीक्षा प्रणाली में सुधार करना।
- उच्चतर शिक्षा के सभी संस्थानों में पर्याप्त गुणवत्तायुक्त संकाय मुहैया करना और कार्य के सभी स्तरों पर क्षमता निर्माण करना।
- उच्चतर शिक्षण संस्थानों को उपयुक्त माहौल प्रदान करना, ताकि वह खुद को शोध और नवाचार के प्रति समर्पित कर सके।
- अल्पविकसित और पिछडे़ क्षेत्रों में शिक्षण संस्थानों को स्थापित कर उच्चतर शिक्षा में बने क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने की कोशिश करना।
- अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़ा वर्ग, महिलाएँ, दिव्यांगों, कमजोरों आदि समाज के वंचित समुदाय को उच्चतर शिक्षा में समावेशित करने की कोशिश करना।
मुख्य कार्य
- मौजूदा स्वायत्त कॉलेजों का विश्वविद्यालयों में उन्नयन (Upgradation)
- कॉलेजों को क्लस्टर (Cluster) विश्वविद्यालयों में बदलना।
- विश्वविद्यालय की अवसंरचना के लिये अनुदान।
- मौजूदा डिग्री कॉलेजों का मॉडल कॉलेजों में उन्नयन (Upgradation)
- नए व्यावसायिक (Professional) कॉलेजों की स्थापना।
- शोध, नवाचार और गुणवत्ता में सुधार।
- संकायों (Faculty) के लिये भर्ती में सहायता।
- संस्थाओं की पुनर्संरचना और उनमें सुधार।
- डाटा एकत्रीकरण (Data Collection) और योजना, ताकि संस्थाओं के क्षमता निर्माण में बेहतर तैयारी की जा सके।
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की स्थापना वर्ष 2017 में भारतीय संस्था पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत की गई थी। यह एक स्वायत्त संस्था है जो देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश एवं छात्रवृत्ति हेतु प्रवेश परीक्षाएँ आयोजित कराती है।
- उद्देश्य (Objectives)
- इस एजेंसी का उद्देश्य प्रवेश और भर्ती हेतु उम्मीदवारों की योग्यता का आकलन कुशल, पारदर्शी और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के आधार पर करना है।
- अभी तक इन परीक्षाओं का आयोजन CBSE द्वारा किया जाता था। NTA के गठन से CBSE का कार्यभार कम हुआ है।
- कार्य (Functions)
- यह ऑनलाइन माध्यम से परीक्षाओं को आयोजित कराती है जिसके लिये इसे ऐसे विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों का चयन करना होता है जहाँ पर सभी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हों और परीक्षा के आयोजन से उनकी शैक्षणिक दिनचर्या पर कोई प्रभाव न पड़े।
- अत्याधुनिक तकनीकी की सहायता से सभी विषयों के प्रश्न-पत्र तैयार किये जाते हैं, जिससे पेपर लीक की समस्या का समाधान हो सके।
- भारतीय शैक्षणिक संस्थानों में समय-समय पर प्रशिक्षण प्रदान करना और सलाहकारी सेवाएँ उपलब्ध कराना।
- एजुकेशनल टेस्टिंग सर्विसेज़ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करना।
- विभिन्न मंत्रालयों एवं केंद्र सरकार के विभागों तथा राज्य सरकारों द्वारा किसी परीक्षा के आयोजन का दायित्व सौंपे जाने की स्थिति में उसका संचालन करना।
- विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं के परीक्षण संबंधी मानकों की समय-समय पर जाँच करना।
- प्रशासन (Administration)
- NTA का अध्यक्ष एक प्रख्यात शिक्षाविद् होता है एवं उसकी नियुक्ति शिक्षा मंत्रालय द्वारा की जाती है।
- महानिदेशक इसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
- इसमें एक बोर्ड ऑफ गवर्नर होता है जिसमें परीक्षा आयोजित करवाने वाले संस्थानों के सदस्य भी शामिल होते हैं।
- तकनीकी शिक्षा(Technical Education): तकनीकी शिक्षा कुशल जनशक्ति का सृजन कर, औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाकर और लोगों के जीवन में सुधार कर मानव संसाधन विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत में तकनीकी शिक्षा के माहौल की शुरुआत सड़कों, भवनों, बंदरगाहों के निर्माण व रखरखाव में लगे आर्मी, नेवी और सर्वे विभाग के लोगों की सहायता करने की कोशिश से हुई। शुरुआत में ब्रिटिश सरकार इन कामों के लिये ब्रिटेन से आए तकनीकी रूप से कुशल व्यक्तियों को ऊँचे पदों पर बिठाती थी। लेकिन तकनीकी क्षेत्र के निम्न स्तरीय पद स्थानीय लोगों से ही भरे जाते थे। इन स्थानीय लोगों को कौशल प्रदान करने के लिये कारखाने के इर्द-गिर्द तकनीकी स्कूल खुलना शुरू हुए और भारत के लिये तकनीकी शिक्षा के माहौल का अंकुरण शुरू हो गया।
भारत में तकनीकी शिक्षा का विकास-- तकनीकी शिक्षा के अंतर्गत इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, आर्किटेक्चर, नगर नियोजन, प्रयुक्त कला और शिल्प (Applied Arts and Crafts), होटल प्रबंधन और कैटरिंग प्रौद्योगिकी से संबंधित कौशल निर्माण के हुनर सिखाए जाते हैं।
- भारत में सबसे पहले इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना उत्तराखंड के रूड़की शहर में सन् 1847 में हुई, जिसने प्रशिक्षण के लिये गंगा कैनल के लिये बने सार्वजनिक भवनों का इस्तेमाल किया।
- मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और मैटलर्जी (Metallurgy) के क्षेत्र में डिग्री देने की शुरुआत सन् 1917 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हुई।
- आज़ादी के बाद से भारत के आधुनिक उत्पादकीय ज़रूरतों को पूरा करने के लिये कई इंजीनियरिंग संस्थानों की स्थापना हो चुकी है।
- व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education): जो शिक्षा विद्यार्थियों को किसी विशेष व्यवसाय या वृत्ति के समन्वय में ज्ञान एवं कुशलता अर्जित करने में सहायक होती है, ‘उसे व्यावसायिक शिक्षा’ कहते हैं। व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण राष्ट्र के शिक्षा संबंधी प्रयास का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। व्यापक रूप में व्यावसायिक शिक्षा के अंतर्गत उन सभी प्रकार की शिक्षा को सम्मिलित किया जाता है, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति को जीविकोपार्जन के लिये प्रशिक्षण प्राप्त होता है। तकनीकी शिक्षा व्यावसायिक शिक्षा का ही अंग है।
व्यावसायिक शिक्षा की विशेषताएँ(Characteristics of Vocational Education)-- यह विद्यार्थियों की रुचि, प्रवृत्ति एवं व्यक्तित्व का ध्यान रखती है।
- यह शिक्षा एक व्यावहारिक शिक्षा है। यह शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान न प्रदान कर जीवन के हर क्षेत्र के लिये उपयोगी होती है।
- यह शिक्षा परिवार, श्रम एवं कार्य से संबंधित होने के साथ-साथ विद्यार्थियों के जीवन से भी संबंधित है।
- इस शिक्षा का स्वरूप स्थिर नहीं रहता है बल्कि गतिशील रहता है। इसमें समय की गति एवं सभ्यता के विकास के साथ इसके रूप में परिवर्तन आता है।
केंद्र सरकार की शैक्षिक सलाहकार समितियाँ शिक्षा मंत्रालय के शिक्षा विभाग के अंतर्गत कार्यरत हैं। ये समितियाँ शैक्षिक विषयों से संबंधित कार्यों और जिम्मेदारियों का प्रबंधन करती हैं। इनका क्षेत्र कार्यक्षेत्र विस्तृत है, और शिक्षा विभाग के विभिन्न क्षेत्रों में विकास को प्रोत्साहित करने के लिये विभिन्न सलाहकार मंडल, परिषद, और समितियों की स्थापना की गई है।
प्रमुख समितियाँ और परिषद्
- केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE)
- स्थापना वर्ष : 3 नवंबर, 1962
- मुख्यालय/स्थान : दिल्ली
- केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board of Education)
- स्थापना वर्ष : 1920 (सर्वप्रथम), हार्टोग समिति के सुझाव पर 1935 में पुनर्गठित
- मुख्यालय/स्थान : नई दिल्ली
- राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् (NCERT)
- स्थापना वर्ष : 1 सितंबर, 1961
- मुख्यालय/स्थान : नई दिल्ली
- अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् (All India Council for Technical Education - AICTE)
- स्थापना वर्ष : नवंबर 1945
- मुख्यालय/स्थान : दिल्ली
- राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (National Council for Teacher Education - NCTE)
- स्थापना वर्ष : 1995
- मुख्यालय/स्थान : दिल्ली
- केंद्रीय सामाजिक-कल्याण बोर्ड (Central Social Welfare Board)
- स्थापना वर्ष : 1953
- मुख्यालय/स्थान : दिल्ली
- वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (Council of Scientific & Industrial Research - CSIR)
- स्थापना वर्ष : 26 सितंबर, 1942
- मुख्यालय/स्थान : दिल्ली
- अखिल भारतीय प्रारंभिक शिक्षा परिषद् (All India Council For Elementary Education)
- स्थापना वर्ष : 1984
- मुख्यालय/स्थान : दिल्ली
- राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (NAAC)
- स्थापना वर्ष : 1994
- मुख्यालय/स्थान : बंगलूरू (कर्नाटक)
- राष्ट्रीय शैक्षणिक आयोजना और प्रशासन विश्वविद्यालय (National University of Educational Planning and Administration - NUEPA)
- स्थापना वर्ष : 1962
- मुख्यालय/स्थान : नई दिल्ली
ये संगठन केंद्र सरकार को शिक्षा विभाग के विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति को बढ़ाने के लिये सुझाव प्रदान करते हैं।
भारत में शैक्षिक प्रशासन और नियंत्रण का विकास
मूल संविधान में शिक्षा को राज्य (State) के विषय के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई थी। कुछ समय पश्चात् वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा को समवर्ती (Concurrent) सूची का विषय बना दिया गया अथवा अब शिक्षा से संबंधित सभी प्रकार के महत्त्वपूर्ण विषयों पर केंद्र और राज्य सरकार अपनी-अपनी सुविधानुसार कानून बना सकते हैं। परंतु कुछ राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर नीति-निर्धारण करने एवं अनुसंधान कार्य को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ उच्चतर शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिये राज्य सरकारों को केंद्र से परामर्श लेना पड़ता है।
वर्ष 1985 में केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रालय का नाम परिवर्तित कर दिया। इस प्रकार इसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय (Ministry of Human Resources Development) के नाम से जाना जाने लगा। पुन: वर्ष 2020 में इस मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया। केंद्रीय मंत्रिमंडल में यह मंत्रालय शिक्षा की समस्त इकाइयों से जुडे़ होने के कारण महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस मंत्रालय के अधीन शिक्षा से जुडे़ अनेक प्रभाग कार्यरत हैं, जो निम्नलिखित हैं-
- स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग (प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा)
- उच्चतर शिक्षा विभाग (विश्वविद्यालय एवं उच्चतर शिक्षा)
- तकनीकी एवं औद्योगिक शिक्षा
- प्रौढ़ शिक्षा एवं समाज कल्याण
- शोध एवं प्रकाशन
- यूनेस्को प्रभाग
- विदेशी शैक्षिक संबंध प्रभाग
- विदेशी छात्रवृत्तियाँ प्रभाग
- मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा प्रभाग
- केंद्रशासित एवं राष्ट्रीय छात्रवृत्ति प्रभाग
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शिक्षा मंत्रालय से संबद्ध महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ |
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राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान |
स्थापना वर्ष |
मुख्यालय/स्थान |
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केंद्रीय हिंदी संस्थान |
1960 |
आगरा (उत्तर प्रदेश) |
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केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान |
1969 |
मैसूर (कर्नाटक) |
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केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय |
15 अक्तूबर, 1970 |
नई दिल्ली |
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लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान |
अगस्त 1957 |
ग्वालियर(मध्य प्रदेश) |
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नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान |
7 मई, 1961 |
पटियाला (पंजाब) |
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भारतीय विज्ञान संस्थान |
27 मई, 1909 |
बंगलूरू (कर्नाटक) |
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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान |
1951 |
खड़गपुर (कोलकाता) (प्रथम आईआईटी) |
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भारतीय प्रबंधन संस्थान |
1961 |
कोलकाता (प. बंगाल) (प्रथम IIM–Indian Institute of |
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क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज |
1960 |
वारगंल (तेलंगाना) (प्रथम क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज) |
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इंजीनियरिंग स्टाफ कॉलेज ऑफ इंडिया |
1981 |
हैदराबाद (तेलंगाना) |
- यह फ्रेमवर्क पूरे देश के संस्थानों की रैंकिंग करने के लिये एक पद्धति की रूपरेखा है।
- इस रूपरेखा का निर्माण शिक्षा मंत्रालय द्वारा स्थापित कोर कमेटी करती है।
- इस रूपरेखा के पैरामीटर मोटे तौर पर ‘टीचिंग लर्निंग एंड रिसोर्सेज’, ‘रिसर्च एंड प्रोफेशनल प्रैक्टिस’, ग्रेजुएशन आउटकम्स, आउटरीच एंड इंक्लूसिविटी (Inclusivity) तथा ‘परसेप्शन’ को कवर करते हैं।
- शिक्षा मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त इस प्रेमवर्क की शुरुआत 29 सितंबर, 2015 को की गई।
- राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढाँचा (National Institutional Ranking Framework – NIRF), 2023 के अंतर्गत कार्य-निष्पादन के आधार पर विभिन्न वर्गों में संस्थानों की रैंकिंग-
- ओवरऑल सर्वश्रेष्ठ संस्थान - भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान- मद्रास,चेन्नई (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय - भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूरू (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ कॉलेज - मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ अभियांत्रिकी संस्थान - भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान- मद्रास, चेन्नई (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन संस्थान - भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ फार्मेसी संस्थान - नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एज्युकेशन एंड रिसर्च, हैदराबाद (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ आयुर्विज्ञान संस्थान - अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ विधि संस्थान - नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया विश्वविद्यालय, बंगलूरू (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ दंत चिकित्सीय संस्थान - सवीता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड टेक्निकल साइंसेस, चेन्नई (प्रथम स्थान)
- सर्वश्रेष्ठ वास्तुशिल्प संस्थान - भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रूड़की, उत्तराखंड (प्रथम स्थान)
- सन् 1986 के राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सुझावों पर भारतीय उच्चतर शिक्षा में गुणवत्ता के स्तर की जाँच करने के लिये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा सन् 1994 में राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद् नामक स्वायत्त निकाय की स्थापना की गई। इसका मुख्यालय बंगलूरू में स्थित है।
- NAAC का मुख्य अधिदेश (Mandate) उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और इनके विभागों (Department), स्कूलों, संस्थाओं, कार्यक्रमों आदि का मूल्यांकन और प्रत्यायन करना है। शिक्षण संस्थाओं को मूल्यांकन के आधार पर ग्रेड A, B और C में प्रत्यायित कर दिया जाता है और जिनका प्रत्यायन नहीं होता है, उन्हें ग्रेड D के अंतर्गत रखा जाता है।
- NAAC का प्रतीक चिह्न वाक्य-उत्कृष्टता (Excellence), विश्वसनीयता (Credibility), प्रासंगिकता (Relevance) है।
- NAAC का मुख्य अधिदेश (Mandate) उच्चतर शिक्षा की संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और इनके विभागों (Department), स्कूलों, संस्थाओं, कार्यक्रमों आदि का मूल्यांकन और प्रत्यायन करना है। शिक्षण संस्थाओं को मूल्यांकन के आधार पर ग्रेड A, B और C में प्रत्यायित कर दिया जाता है और जिनका प्रत्यायन नहीं होता है, उन्हें ग्रेड D के अंतर्गत रखा जाता है।
- उद्देश्य (Mission)
- विशेष अकादमी कार्यक्रम अथवा प्रोजेक्ट और उच्चतर शिक्षण संस्थानों अथवा इनकी इकाइयों का आवधिक मूल्यांकन करने की व्यवस्था करना।
- उच्चतर शिक्षण संस्थाओं में अध्यापकीय शिक्षा (Teaching–Learning) और शोध की गुणवत्ता में बढ़ावा देने के लिये अकादमिक माहौल बनाने में सहायता करना।
- उच्चतर शिक्षण संस्थानों में स्व मूल्यांकन, उत्तरदायित्व, स्वायत्तता, नवाचार को प्रोत्साहित करना।
- गुणवत्ता मूल्यांकन, उन्नयन और धारणीय स्थिति से संबंधित उच्चतर शिक्षा के विषयों पर उच्चतर शिक्षा के अन्य हितधारकों (Stakeholder) से सहायता लेना।
- NAAC का मूल्य ढाँचा (NAAC's Value-Frame Work)
- NAAC द्वारा निम्नलिखित संकेंद्रक मूल्यों (Core Values) को बढ़ावा दिया गया है :
- राष्ट्रीय विकास में योगदान
- विद्यार्थियों में वैश्विक प्रवीणताओं का संपोषण
- विद्यार्थियों में मूल्य व्यवस्था विकसित करना।
- प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देना।
- उत्कृष्टता (Excellence) के लिये खोज।
- भारतीय विश्वविद्यालय संघ सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत एक पंजीकृत सोसाइटी है, जिसमें भारतीय विश्वविद्यालय सदस्य के रूप में शामिल है।
- यह प्रशासकों एवं सदस्य विश्वविद्यालयों/संस्थानों के शिक्षाविदों को किसी मामले पर एक-दूसरे के विचारों के आदान-प्रदान के लिये मंच मुहैया कराता है।
- यह उच्चतर शिक्षा में सूचना आदान-प्रदान ब्यूरो (Bureau of Information Exchange) के रूप में कार्य करता है।
- ‘यूनिवर्सिटी हैंडबुक’ नाम से शोध पेपर (Research Paper) और ‘यूनिवर्सिटी न्यूज’ नाम से साप्ताहिक पत्रिका भी प्रकाशित करता है। यह कुछ उपयोगी सूचनाओं का प्रकाशन भी करता है।
- वर्तमान में इस संघ की सदस्यता 931 है, जिसमें विभिन्न राष्ट्रों के 17 एसोसिएट सदस्य हैं
- इस संघ का अधिकांश वित्तपोषण सदस्य विश्वविद्यालयों के वार्षिक चंदे से किया जाता है। भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय देखरेख व विकास संबंधी व्यय के एक हिस्से को पूरा करने के लिये अनुदान प्रदान करता है जिन्हें शोध अध्ययन, कार्यशालाएँ, विश्वविद्यालय प्रशासकों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रबोधन कार्यक्रम (Orientation Program) और ग्लोबल विश्वविद्यालय के डाटा बैंक बनाने पर खर्च किया जाता है।
- डी.एस. कोठारी आयोग ने भारतीय विश्वविद्यालय संघ को अंतर्विश्वविद्यालय परिषद् कहा है। आयोग ने अपने प्रतिवेदन में यूजीसी अधिनियम के अंतर्गत आने वाले सभी विश्वविद्यालय को इसके सदस्य के रूप में नामित करने का सुझाव दिया था।
प्रत्येक विश्वविद्यालय में पदों की व्यवस्था उस अधिनियम के अनुसार होती है, जिनके द्वारा वे स्थापित होते हैं, परंतु अगर सामान्य तौर पर किसी विश्वविद्यालय के शीर्षस्थ स्तर पर कुलपति (Chancellor), उपकुलपति (Vice Chancellor), प्रो. वाइस चांसलर या रेक्टर, कोर्ट, सीनेट, एक्जीक्यूटिव काउंसिल, सिंडिकेट, एकेडमिक काउंसिल, संकाय (Faculty), बोर्ड ऑफ रिसर्च कमेटी जैसे नामों से नामांकित पद और संस्थाएँ होती हैं। प्रतीकात्मक रूप से किसी विश्वविद्यालय का सर्वोच्च पद कुलाध्यक्ष (The Visitor) का होता है।
- कुलाध्यक्ष (The Visitor) : केंद्रीय विश्वविद्यालय के संदर्भ में राष्ट्रपति और राज्य विश्वविद्यालय के संदर्भ में राज्य का राज्यपाल कुलाध्यक्ष (The Visitor) होता है। कुलाध्यक्ष के पद को विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों की सूची में शामिल नहीं किया जाता है। कुलाध्यक्ष सरकार और विश्वविद्यालय के मध्य महत्त्वपूर्ण कड़ी की तरह काम करता है। कुलाध्यक्ष के पास यह शक्ति होती है कि वह विश्वविद्यालयों से संबंधित किसी भी कार्य का औचक निरीक्षण कर सके।
- कुलाधिपति (The Chancellor) : विश्वविद्यालय की प्रशासकीय सूची में सबसे शीर्षस्थ पद कुलाधिपति (Chancellor) का होता है, जिसकी नियुक्ति विश्वविद्यालय के आंतरिक मामले से संबंधित संस्था जिसे कोर्ट, बोर्ड ऑफ गवर्नर, सीनेट आदि नामों से जाना जाता है, उनके सदस्यों के द्वारा की जाती है। अधिकांश मामले में इस पद पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अथवा कोई व्यक्ति जो मुख्य न्यायाधीश के पद के समान ही सम्माननीय हो, उसकी नियुक्ति की जाती है। इसके अलावा विश्वविद्यालय के आंतरिक मुद्दे से जुड़ी शीर्षस्थ प्रशासकीय संस्था अथवा भारतीय राज्य के किसी सम्माननीय पद को कुलपति के रूप में नियुक्त करने की परंपरा भी बना सकती है। जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में भारत के उपराष्ट्रपति की नियुक्ति परंपरा बन चुकी है।
- कुलपति (The Vice Chancellor) : कार्यात्मक दृष्टि से विश्वविद्यालय का शीर्षस्थ अधिकारी कुलपति (Vice Chancellor) होता है। प्रशासकीय स्तर के साथ-साथ विश्वविद्यालय के कार्यात्मक स्तर पर उपयुक्त माहौल बनाए रखने की ज़िम्मेदारी कुलपति की होती है, ताकि शिक्षकों के साथ-साथ विद्यार्थी सही दिशा में सही लगन के साथ काम करते रहे। कुलपति की नियुक्ति विश्वविद्यालय की सर्वोच्च प्रशासकीय संस्था अपने विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार करती है।
- रेक्टर अथवा प्रो-वाइस-चांसलर (Rector or Pro-Vice-Chancellor) : कुलपति के कामों के सहायक के तौर पर रेक्टर अथवा प्रो-वाइस-चांसलर की नियुक्ति की जाती है। इस पद का चयन भी विश्वविद्यालय की प्रशासकीय संस्था ही करती है। सामान्यत: विश्वविद्यालय के प्रोपेसरों के बीच से ही किसी सदस्य को इस पद पर नियुक्त किया जाता है।
- डीन (Dean) : विश्वविद्यालय में संकाय (Faculty) के शीर्षस्थ पद को डीन (Dean /संकायाध्यक्ष) कहा जाता है। विश्वविद्यालय के आंतरिक प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिये तीन प्रशासनिक समितियों का गठन किया जाता है, जो विश्वविद्यालय से जुडे़ सभी विषयों पर आपसी सहमति के आधार पर निर्णय लेते हैं।
- सीनेट (Senate) : यह विश्वविद्यालय की सर्वोच्च प्रशासनिक समिति है। इसका अध्यक्ष कुलपति (Vice–Chancellor) होता है।
- कार्यकारी परिषद् (Executive Council) : सीनेट द्वारा निर्धारित नियमों व नीतियों का क्रियान्वयन कार्यकारी परिषद् द्वारा किया जाता है। इस परिषद् में विश्वविद्यालय की कार्यकारी शक्ति निहित होती है।
- शैक्षणिक परिषद् (Academic Council) : यह विश्वविद्यालय का उच्चतम शैक्षणिक निकाय होता है। विश्वविद्यालयों में शिक्षा और परीक्षा के मानकों के रखरखाव का दायित्व इसी परिषद् के पास होता है। सभी शैक्षणिक मामलों पर कार्यकारी परिषद् (Executive Council) को सलाह देने का अधिकार होता है। यह परिषद् पाठ्यक्रम और शोध संबंधी नियमों का भी निर्धारण करती है।
भारत में उच्चतर शिक्षा के अभिशासन को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है-
- विश्वविद्यालय
- कॉलेज
विश्वविद्यालय संसद द्वारा पारित अधिनियम के तहत स्थापित स्वायत्त संस्था होती है और कॉलेजों का अभिशासन विश्वविद्यालय से जुड़ा होता है, इसलिये इन्हें विश्वविद्यालयों से संबद्ध (Affiliated to Universities) शिक्षण संस्थान कहा जाता है।
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कॉलेज और विश्वविद्यालय में अंतर |
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अंतर का आधार |
कॉलेज |
विश्वविद्यालय |
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अर्थ |
विश्वविद्यालयों से जुडे़ अनेक उच्च शिक्षण संस्थान ‘कॉलेज’ कहलाते हैं। अधिकांश कॉलेज विश्वविद्यालय से संबद्ध (Affiliated to University) होते हैं और कुछ स्वायत्त भी होते हैं। |
एक विश्वविद्यालय प्राधिकृत (Authorized) शैक्षिक और अनुसंधान संस्थान होता है जो अपने विद्यार्थियों को ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में डिग्री और डिप्लोमा प्रदान करता है। |
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पाठ्यक्रम |
विश्वविद्यालयों से जुडे़ कॉलेज अपना पाठ्यक्रम विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों के अनुसार निर्धारित करते हैं और इन कॉलेजों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की डिग्रियाँ भी विश्वविद्यालयों की ही मिलती है। |
विश्वविद्यालय अपना पाठ्यक्रम खुद निर्धारित करते हैं। |
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शोध कार्यक्रम |
कॉलेजों के द्वारा शोध कार्यक्रम प्रस्तावित नहीं किया जाता। |
विश्वविद्यालयों द्वारा शोध कार्यक्रम प्रस्तावित किया जाता है। |
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अध्यक्ष |
कॉलेजों का हेड डीन अथवा डायरेक्टर होता है। |
जबकि विश्वविद्यालय प्रमुख अथवा अध्यक्ष का पद (Vice Chancellor) कुलपति का होता है। |
उपशीर्षक: विश्वविद्यालयों/ विश्वविद्यालय स्तर के संस्थानों का विवरण
विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय स्तर के संस्थान कॉलेजों के रूप में उच्चतर शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में आज़ादी के बाद बढे़ स्तर पर वृद्धि हुई है। वर्ष 1950 में विश्वविद्यालय की कुल संख्या 20 थी। 31 मार्च, 2023 तक तक यह संख्या बढ़कर लगभग 1085 हो गई, मतलब यह है कि विश्वविद्यालयों की संख्या में लगभग कई गुना वृद्धि हुई है। उच्चतर शिक्षा क्षेत्र में हुई वृद्धि से विश्वविद्यालय बहुत तेज़ी से बढे़ हैं, जो अध्ययन का सर्वोच्च स्तर है।
उच्चतर शिक्षा केंद्र और राज्य दोनों की साझा ज़िम्मेदारी है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में मानकों का समन्वय और निर्धारण यूजीसी और अन्य सांविधिक निकायों (Statutory Regulatory Bodies) को सौंपा गया है। केंद्र सरकार यूजीसी को अनुदान देती है और देश में केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय महत्त्व की संस्थाओं की स्थापना करती है। केंद्र सरकार यूजीसी की सिफारिश पर शैक्षिक संस्थाओं को ‘सम विश्वविद्यालय’ (Deemed University) घोषित करने के लिये भी ज़िम्मेदार है।
वर्तमान में विश्वविद्यालय/विश्वविद्यालय स्तर की संस्थाओं के मुख्य घटक निम्नवत् हैं-
- केंद्रीय विश्वविद्यालय(Central University): वर्तमान में (1 फरवरी, 2024 की स्थिति के अनुसार) केंद्रीय अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा नियमित विश्वविद्यालयों की संख्या 56 है।
- राज्य विश्वविद्यालय(State Universities): प्रांतीय अधिनियम अथवा राज्य अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा नियमित विश्वविद्यालय को ‘राज्य विश्वविद्यालय’(State University) कहा जाता है। वर्तमान में (1 फरवरी, 2024 की स्थिति के अनुसार) कुल 482 राज्य विश्वविद्यालय थे, जिनमें से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 की धारा 12(b) के तहत शामिल राज्य विश्वविद्यालयों की संख्या 253 है।
- सम विश्वविद्यालय(Deemed Universities): विश्वविद्यालय से इतर उच्चतर शिक्षा के संस्थान(जो विशेष क्षेत्रों, जैसे कि मेडिकल, शारीरिक, भाषाओं, सामाजिक विज्ञान, वन शोध, संगीत और सूचना प्रौद्योगिकी आदि क्षेत्रों में) जो किसी विशिष्ट क्षेत्र में ऊँचे मानक स्तर पर कार्य कर रहे हैं, उन्हें यूजीसी की सलाह पर केंद्रीय सरकार द्वारा ‘सम विश्वविद्यालय’ संस्थान के रूप में घोषित किया जा सकता है।वर्तमान में (1 फरवरी, 2024 की स्थिति के अनुसार) कुल 124 सम (डीम्ड) विश्वविद्यालय थे, जिनमें से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 की धारा 12(b) के तहत शामिल विश्वविद्यालयों की संख्या 44 है।
- राज्य निजी विश्वविद्यालय(State Private Universities): राज्य निजी विश्वविद्यालय वह विश्वविद्यालय है, जिसे प्रायोजित निकाय (Sponsored Bodies), जैसे कि कोई सोसाइटी, जिनका रजिस्ट्रेशन सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत होता है, कोई पब्लिक ट्रस्ट या कंपनी जिनका रजिस्ट्रेशन कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 25 के अनुसार होता है आदि के माध्यम से केंद्र अथवा राज्य सरकार के अधिनियमों के अधीन स्थापित किया गया है। राज्य निजी विश्वविद्यालयों को यूजीसी विनियम 2003 द्वारा विनियमित किया गया है। वर्तमान में (1 फरवरी, 2024 की स्थिति के अनुसार) कुल 475 राज्य निजी विश्वविद्यालय हैं, जिनमें से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 की धारा 12(b) के तहत शामिल विश्वविद्यालयों की संख्या 26 है।
स्रोत : UGC वेबसाइट
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यूजीसी अधिनियम के खंड 12 (CCC) के तहत विश्वविद्यालय प्रणाली में स्वायत्त अंतर विश्वविद्यालय प्रणाली में स्वायत्त अंतर विश्वविद्यालय केंद्र को स्थापित करता है, जिनके उद्देश्य निम्नवत् हैं :
- उन विश्वविद्यालयों को समान उन्नत केंद्रीय सुविधाएँ व सेवाएँ प्रदान करना, जो अवसंरचना और अन्य क्षेत्रों में निवेश करने में समर्थ नहीं है।
- संपूर्ण देश में शिक्षक और अनुसंधानकर्त्ताओं (Researchers) को प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट विशेषज्ञता प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना।
- अनुसंधान और शिक्षक समुदाय के लिये अंतर्राष्ट्रीय मानकों के समान आधुनिक उपकरणों और उत्कृष्ट पुस्तकालय सुविधाओं तक पहुँच प्रदान करना।
नई दिल्ली में स्थित परमाणु विज्ञान केंद्र अब ‘इंटर यूनिवर्सिटी एक्सेलेरेटर’ सेंटर कहलाता है। यह 1994 में स्थापित देश का पहला अनुसंधान केंद्र था। विश्वविद्यालय प्रणाली के तहत देश में 7 अंतर विश्वविद्यालय केंद्र कार्य कर रहे हैं, जो निम्नवत् हैं-
- इंटर यूनिवर्सिटी एक्सीलेरेटर सेंटर (पूर्व- न्यूक्लियर साइंस सेंटर), नई दिल्ली
- इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिज़िक्स (IUCAA) पुणे, महाराष्ट्र
- यूजीसी- डी.ए.ई. कॉन्सोर्टियम फॉर साइंटिफिक रिसर्च (UGC-DAECSR)- इंदौर (मध्य प्रदेश)
- सूचना और पुस्तकालय नेटवर्क (INFLIBNET)- अहमदाबाद (गुजरात)
- कॅान्सोर्टियम फॉर एजुकेशनल कम्युनिकेशन (CEC)- नई दिल्ली
- राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद् (NAAC)- बंगलूरू (कर्नाटक)
- अंतर विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र (IUTEC)- काकीनाड़ा (आंध्र प्रदेश)
- डॉ. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सन् 1948 में बने विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था में मौजूद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसी संस्था को भारतीय उच्चतर शिक्षा व्यवस्था के लिये स्वीकार किया गया, जिसे 1956 में वैधानिक मान्यता मिली।
- 28 दिसंबर, 1953 को औपचारिक रूप से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की गई थी। देश में विश्वविद्यालयी शिक्षा के मानकों का समन्वय, निर्धारण तथा रखरखाव करने के लिये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को औपचारिक रूप से नवंबर 1956 में संसद के एक अधिनियम द्वारा भारत सरकार के एक सांविधिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया।
- पात्र विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अनुदान प्रदान करने के अतिरिक्त आयोग केंद्र और राज्य सरकारों को उच्चतर शिक्षा के विकास हेतु आवश्यक उपायों पर सुझाव भी देता है।
- यूजीसी के क्षेत्रीय कार्यालयों की संख्या 6 है। यह बंगलूरू, भोपाल, गुवाहाटी, हैदराबाद, कोलकाता और पुणे में स्थित अपने क्षेत्रीय कार्यालयों के साथ-साथ मुख्यालय नई दिल्ली से कार्य करता है।
- यूजीसी का आदर्श वाक्य ‘ज्ञान-विज्ञान विमुक्तये’ है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ज़िम्मेदारियाँ
- यूजीसी के पास देश में एकमात्र अनुदान देने वाली एजेंसी होने का अनूठा गौरव है, जिसे दो ज़िम्मेदारियाँ दी गई हैं :
- उच्चतर शिक्षा संस्थानों को उचित निधियों का आवंटन करना।
- विश्वविद्यालय की शिक्षा के समन्वय, निर्धारण और देख-रेख की ज़िम्मेदारी।
- विश्वविद्यालय में शिक्षण, परीक्षा और शोध के मानकों को निर्धारित करना और बनाए रखना।
- शिक्षा के न्यूनतम स्तर के लिये विनियमों की रूपरेखा तैयार करना।
- कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षा पर निगरानी रखना।
- विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार हेतु आवश्यक उपायों के लिये केंद्र और राज्य सरकार को सलाह देना तथा सरकार एवं उच्चतर शिक्षण संस्थानों के बीच महत्त्वपूर्ण लिंक के रूप में कार्य करना
आयोग के सदस्य
- आयोग में सम्मिलित होंगे :
- एक अध्यक्ष
- एक उपाध्यक्ष
- कुल 10 सदस्य (सचिव उच्चतर शिक्षा, सचिव व्यय एवं 8 अन्य सदस्य), इन सबकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।
- यूजीसी के अध्यक्ष का कार्यकाल पाँच वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु तथा उपाध्यक्ष का कार्यकाल तीन वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु जो भी पहले हो।
- यूजीसी के सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष निर्धारित है।
इसके साथ यह आवश्यक है कि कुल सदस्यों में कम-से-कम आधे सदस्य केंद्र/राज्य सरकार के अधिकारी न हों।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 77 के खंड (3) के द्वारा भारतीय सरकार के कामों को सुविधाजनक बनाने के लिये मंत्रालयों की स्थापना हुई, जिसके माध्यम से शिक्षा मंत्रालय की भी स्थापना हुई। इस मंत्रालय ने अपने कार्यों को सुविधाजनक बनाने के लिये दो विभाग- स्कूल शिक्षा और साक्षरता तथा उच्चतर शिक्षा को स्थापित किया। इस प्रकार उच्चतर शिक्षा से जुडे़ मसलों की सबसे शीर्ष संस्था शिक्षा मंत्रालय का उच्चतर शिक्षा विभाग बना। नीति और आयोजना के स्तर पर भारत में उच्चतर शिक्षा के लिये आधारभूत संरचना मुहैया कराने हेतु उच्चतर शिक्षा विभाग (Department of Higher Education) जिम्मेदार है। इस तरह विश्व स्तर की शिक्षा मुहैया कराने के लिये विश्व स्तर के विश्वविद्यालयों, संस्थानों और कॉलेजों तक भारतीय शिक्षण संस्थानों की पहुँच बनाने की ज़िम्मेदारी भी उच्चतर शिक्षा विभाग के पास है।
- ध्येय (Vision)
- समान और समावेशी रूप से भारत के मानव संसाधन की अभीष्टतम क्षमता को उच्चतर शिक्षा से प्राप्त करना।
- लक्ष्य (Mission)
- सभी पात्र व्यक्तियों को तथा विशेष रूप से कमज़ोर वर्गों के व्यक्तियों को समानता के साथ उच्चतर शिक्षा के अधिक अवसर प्रदान करना।
- उच्चतर शिक्षा में मौजूद क्षेत्रीय तथा अन्य असंतुलन को दूर करने की कोशिश करना। सभी प्रकार के संगठनों की सहायता में भागीदार बनना।
- अनुसंधान तथा नवप्रवर्तनों को मज़बूत करने के लिये नीतियाँ और कार्यक्रम आरंभ करना और इस हेतु निजी क्षेत्रों को भी प्रोत्साहन देना।
- उद्देश्य (Objectives)
- उच्चतर शिक्षा सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio) 2011–12 तक 15 प्रतिशत, 2016-17 तक 21 प्रतिशत और 2020 तक 30 प्रतिशत करना।
- उच्चतर संस्थाओं के मौजूदा आधारभूत अवसंरचना में वृद्धि करना।
- सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को उच्चतर शिक्षा का अवसर प्रदान करना।
- विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शोध सुविधाओं में सुधार कर ज्ञान अर्जन करने की शर्त रखना।
- सर्वसुलभ ज्ञान की उन्नति तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिये अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना।
- भारतीय भाषाओं के विकास को बढ़ावा देना।
- उच्चतर शिक्षण संस्थाओं में स्वायत्तता, नवाचार और शैक्षिक सुधारों को बढ़ावा देना।
इस समिति का गठन डॉ. यशपाल की अध्यक्षता में 1992 में बच्चों पर एकेडेमिक बोझ कम करने हेतु की गयी थी। इसने 1993 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में बच्चों और अध्यापकों के अनुपात को कम करने, प्राथमिक स्तर पर बच्चों को गृह कार्य की प्रथा समाप्त करने, रटने पर बल समाप्त करने हेतु क्विज टाइप प्रश्नों को प्रचलन में लाने, शैक्षिक नवाचारों हेतु स्वैच्छिक संगठनों की सहायता प्राप्त करने एवं पाठ्यक्रम और पर्यवेक्षण का विकेंद्रीकरण करने पर जोर दिया।
डॉ. यशपाल समिति की प्रमुख संस्तुतियाँ :
- स्कूली बच्चों को स्कूल में भारी किताबें ले जाने की बाध्यता नहीं होनी चाहिये।
- नर्सरी दाखिले के लिये साक्षात्कार प्रक्रिया को खत्म किया जाना चाहिये।
- शिक्षक-छात्र अनुपात को कम से कम 1:30 निर्धारित किया जाए।
- ग्राम, ब्लॉक एवं जिला स्तर पर शिक्षा समितियों के गठन की सिफारिश की।
- प्राइमरी स्कूल के बच्चों को कोई होमवर्क नहीं दिया जाना चाहियेऔर यहां तक कि उच्च कक्षाओं के लिये भी, यह गैर-पाठ्यात्मक होना चाहिये।
- सीबीएसई का अधिकार क्षेत्र केवल केंद्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों तक ही सीमित होना चाहिये, और अन्य सभी स्कूल संबंधित राज्य बोर्डों से संबद्ध होने चाहिये।
- पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तकें तैयार करने की प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिये और इसमें अधिक शिक्षकों को सम्मिलित किया जाना चाहिये।
- व्यावसायीकरण से बचने के लिये निजी स्कूलों को मान्यता देने के नियम और अधिक सख्त होने की जरूरत है।
- समिति ने शिक्षक प्रशिक्षण में सुधार के लिये कई कदमों की भी सिफारिश की।
नोट : अंतर्राष्ट्रीय नियम के अनुसार बच्चों के कंधे पर उनके कुल वज़न का 10 फ़ीसदी से ज़्यादा वज़न नहीं होना चाहिये। देश के चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट, 2006 के तहत भी बच्चों के स्कूल बैग का वज़न उनके शरीर के कुल वज़न का 10 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिये।
परिचय
शैक्षिक पुर्ननिर्माण की दिशा में भारत सरकार द्वारा प्रथम बड़ा प्रयास प्रो० डी० एस० कोठारी की अध्यक्षता के अन्तर्गत शिक्षा आयोग (1964-66) का गठन किया । शिक्षा आयोग को शिक्षा के राष्ट्रीय अनुक्रम पैटर्न और सभी स्तरों पर और सभी पहलुओं में शिक्षा के विकास के लिये सामान्य सिद्धांतों और नीतियों पर सरकार को सलाह देने के लिये आदेश किया गया था। यह भारत में स्वातंत्र्योत्तर शिक्षा से जुडे महत्वपूर्ण आयोगों में से प्रमुख आयोग था।
शिक्षा आयोग की प्रमुख संस्तुतियाँ :
- आयोग ने कई पथ-प्रदर्शक सिफारिशें कीं, पहले ही वाक्य में आयोग ने माना कि "भारत का भाग्य अब अपने कक्षाओं में आकार ले रहा है" (पाठ. 1, पैरा 1.01), जो राष्ट्रीय विकास में शिक्षा के महत्व को दर्शाता है।
- राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये आयोग ने उत्पादकता में वृद्धि, सामाजिक और राष्ट्रीय एकीकरण, शिक्षा और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देना और सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित करने के लिये सिफारिश की ।
- शिक्षा को उत्पादकता से जोड़ने के लिये आयोग द्वारा कुछ उपायों की सिफारिश की गई थी - विद्यालयी शिक्षा के बुनियादी घटक के रूप में विज्ञान का परिचय; सभी - प्रकार की शिक्षा के अभिन्न अंग के रूप में कार्य अनुभव की शुरूआत; माध्यमिक शिक्षा का व्यवसायीकरण; और विश्वविद्यालय स्तर पर कृषि और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी पर बल ।
- सार्वजनिक शिक्षा की एक समान विद्यालय प्रणाली शुरू की जानी चाहिये।
- आयोग ने सिफारिश की है कि पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, कार्यशालाओं, शिल्प शेड, आदि पूरे वर्ष भर खुला होना चाहिये और कम से कम एक दिन के आठ घंटे उपयोग किया जाना चाहिये।
- शिक्षा पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) का 6 प्रतिशत खर्च करना ।
- इस अवस्था में प्रतिभाशाली छात्रों के पहचान के लिये उपयुक्त तकनीकों का विकास करना चाहिये।
- आयोग ने शिक्षा, इसकी विषयवस्तु, विकास के विस्तार और योजना आदि की भूमिका में बहुमूल्य योगदान दिया। भारत में मौजूद शिक्षा प्रणाली बहुत सीमा तक, इस रिपोर्ट से अपनी प्रेरणा प्राप्त करती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) भी काफी सीमा तक इस पर आधारित है। आयोग ने स्वतंत्र भारत के संविधान में निर्धारित आवश्यकताओं, आकांक्षाओं के आदर्शों और बहुमूल्य आगे आने वाले शैक्षिक पुनर्निर्माण के पूरे कार्यक्रम पर विचार किया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में महिलाओं की शिक्षा में सुधार हेतु सुझाव देने के लिये दुर्गाबाई देशमुख की अध्यक्षता में वर्ष 1958 में राष्ट्रीय महिला शिक्षा समिति का गठन किया गया था। यह भारत में स्वातंत्र्योत्तर शिक्षा से संबद्ध महत्वपूर्ण समितियों में प्रमुख थी।
इस समिति की प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित थी :
- स्वतंत्रता के बाद दुर्गाबाई देशमुख की अध्यक्षता में यह पहली समिति थी। इसने विशेषतः ऐसे विद्यालयों में जहाँ कोई अध्यापिका नहीं थी वहाँ अध्यापिकाओं की नियुक्ति और महिला शिक्षा के पक्ष में जनमत को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता से संबंधित प्रावधानों की सिफारिश की।
- पाठ्यक्रम के संबंध में समिति ने लड़कों और लड़कियों के लिये संपूर्ण शिक्षा के मध्य बिन्दु (मिडिल स्कूल) तक एक जैसे पाठ्यक्रम की सिफारिश की।
- समिति ने माध्यमिक स्तर पर सहशिक्षा की अनुशंसा की।
- इसने जेंडर संबंधी प्रतिरूपी चित्रण की पाठ्यपुस्तकों को संशोधित करनें की भी सिफारिश की।
- वयस्क महिलाओं के लाभार्थ, सभी राज्यों में सघन पाठ्यक्रम आरंभ किये जाने थे ताकि वे माध्यमिक विद्यालय परीक्षा में भाग ले सकें।
समग्रतः समिति ने शिक्षा के प्रत्येक स्तर के संबंध में महिलाओं की आवश्यकता के संदर्भ में विस्तृत दृष्टि प्रदान की। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में बालक और बालिकाओं की शिक्षा में समानता लाने को उच्च प्राथमिकता दिये जाने की अनुशंसा की। Top of Form
भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में सुधार के लिये सुझाव देने हेतु आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में वर्ष 1990 में इस समिति का गठन किया गया। आचार्य राममूर्ति समिति की प्रमुख संस्तुतियाँ निम्नलिखित थी :
- समिति ने सुझाव दिया कि महिलाओं की शिक्षा के लिये, सभी स्कूल-आधारित कार्यक्रमों के कार्यान्वयन और आंतरिक निगरानी के कार्य की जिम्मेदारी पंचायती राज ढाँचे में स्थित शैक्षिक परिसरों को सौंपने का सुझाव दिया।
- संस्थागत स्तर पर, प्राथमिक / मध्य / उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों के प्रमुख को सूक्ष्म स्तर की योजना और लड़कियों की शिक्षा के सार्वभौमिकरण के लिये पूरी तरह से जिम्मेदार बनाया जाना चाहिये।
- यह भी सिफारिश की गई थी कि सभी स्कूल पाठ्य-पुस्तकें, दोनों NCERT / SCERT और अन्य प्रकाशकों द्वारा, महिलाओं और लैंगिक रूढ़ियों की अयोग्यता को समाप्त करने के लिये समीक्षा की जाए ।
- इसके साथ ही, इस बात पर बल दिया गया कि योजना और प्रबंधन का विकेंद्रीकृत और भागीदारी मोड शिक्षा में क्षेत्रीय असमानताओं की चुनौती का जवाब देने के लिये एक प्रभावी आधार प्रदान करता है, जिसमें महिलाओं की शिक्षा भी सम्मिलित है।
इस समिति ने शिक्षा के उद्देश्य, सामान्य स्कूल प्रणाली, कार्य हेतु व्यक्तियों का सशक्तीकरण,स्कूली विश्व व कार्य स्थल में संबंध स्थापित करना, परीक्षा सुधार, मातृभाषा को स्थान,स्त्रियों की शिक्षा, धार्मिक अंतरों को कम करना, शैक्षिक उपलब्धि, अवसरों आदि के संदर्भ में बुनियादी सुधार संबंधी महत्वपूर्ण सुझाव दिये थे।
मुदलियार आयोग का गठन
- भारत सरकार और राज्य सरकारों ने पाठ्यक्रम निर्धारण तथा माध्यमिक शिक्षा के पुनर्गठन हेतु शैक्षिक संरचना में बदलाव की आवश्यकता महसूस की। इसलिये केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की अनुशंसा पर भारत सरकार ने 23 सितंबर, 1952 को डॉ. लक्ष्मण स्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा के सभी पहलुओं की वर्तमान स्थिति पर जांच करने तथा उसमें सुधार के लिये अनुशंसाओं सहित अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये माध्यमिक शिक्षा आयोग की नियुक्ति की। यह भारत में स्वातंत्र्योत्तर शिक्षा से जुड़े महत्त्वपूर्ण आयोगों में एक था।
माध्यमिक शिक्षा आयोग की प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित थी-
- आयोग ने माध्यमिक शिक्षा के उद्देश्यों को प्रस्तावित किया जिसमें चरित्र निर्माण, लोकतांत्रिक नागरिकता विकसित करना, आर्थिक और व्यावसायिक दक्षता, नेतृत्व को बढ़ावा देना और हमारी सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना सम्मिलित था।
- इसमें दिव्यांग और पिछड़े बच्चों के लिये विद्यालय खोलने पर बल दिया गया है।
- आयोग ने उद्योगों के निकट बड़ी संख्या में तकनीकी और औद्योगिक विद्यालय स्थापित करने का सुझाव दिया।
- उच्च तथा उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा के पाठ्यक्रम में एक कोर विषय अनिवार्य रहे, जैसे- गणित, सामान्य ज्ञान, कला, संगीत आदि।
- 12वीं कक्षा को विश्वविद्यालयों से जोड़ दिया जाए तथा बहु-उद्देशीय विद्यालय स्थापित किये जाएँ।
- आयोग ने शिक्षकों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को बढ़ाने के बारे में महत्वपूर्ण सिफ़ारिशें की।
- वस्तुनिष्ठ प्रकार के परीक्षण मूल्यांकन का भी सुझाव दिया।
संसद द्वारा आयोग की अनुशंसाओं को पूर्णता स्वीकार कर लिया गया। आयोग ने विद्यार्थियों के लिये कृषि शिक्षा पर बल देने, शैक्षिक और व्यावसायिक मार्गदर्शन प्रदान करने की आवश्यकताओं को रेखांकित किया। इसने शिक्षा प्रणाली में सुधाार के लिये महत्वपूर्ण उपाय सुझाए, जिनका माध्यमिक शिक्षा पर बहुत दूरगामी प्रभाव पड़ा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, भारतीय जनमानस की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये शिक्षा की व्यवस्था को फि़र से उन्मुख करने का प्रथम प्रयास भारत सरकार द्वारा डॉ. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में नवंबर 1948 में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की नियुक्ति के माध्यम से किया गया था । यह भारत में स्वातंत्र्योत्तर शिक्षा से जुडे प्रमुख आयोगों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयोग था।
विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग की प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित थी-
- ज्ञान को विकसित करके जीवन जीने की जन्मजात योग्यता को जागृत करना।
- सांस्कृतिक विरासत से परिचित करवाना व लोकतंत्र के लिये प्रशिक्षित करना।
- विश्वविद्यालय पूर्व 12 वर्ष का अध्ययन होना चाहिये।
- स्नातक पाठ्यक्रम की अवधि 3 वर्ष हो।
- विद्यालयी शिक्षा के 10 से 12 वर्षों के बाद छात्रों को अलग-अलग व्यवसाय में स्थानांतरित करने हेतु बड़ी संख्या में व्यावसायिक संस्थान खोले जा सकते हैं ।
- विश्वविद्यालय का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य अपने शिक्षण और परीक्षाओं के उच्चतम मानक को बनाए रखना है।
- देश में विश्वविद्यालय शिक्षा की देख-रेख के लिये एक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन किया जाए।
- इस आयोग द्वारा दी गई रिपोर्ट बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने स्वतंत्रता के पश्चात भारत में विश्वविद्यालय शिक्षा के विकास के लिये पूर्व के ज्ञान तथा प्रज्ञा एवं पश्चिम के प्राचीन तथा आधुनिक समाज का विश्लेषण किया। तदनुसार अपने पाठ्यक्रम पर अपनी सिफ़ारिशें दीं।
वर्ष 2017 में UNFCCC के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ का 23वाँ सम्मेलन बॉन, जर्मनी में आयोजित किया गया। इसे COP-23 भी कहते हैं। अमेरिका द्वारा पेरिस समझौते से अपना नाम वापस लेने के बाद वार्ता का यह प्रथम प्रयास है। यह वार्ता पेरिस समझौते की कार्य योजना को पूर्ण करने पर आधारित थी। इस कॉन्फ्रेंस की कुछ मुख्य उपलब्धियाँ थीं-
- 2018 तालानोवा वार्ता का शुभारंभ : इसके तहत पेरिस समझौते के लक्ष्यों की प्रगति के संबंध में पार्टियों के सामूहिक प्रयासों की समीक्षा की जाएगी तथा नेशनली डिटरमाइंड कॉन्ट्रिब्यूशन (NDC) की तैयारियों के संबंध में सभी को सूचित करना ज़रूरी होगा।
- बिलो 50 इनिशिएटिव : इसे वर्ल्ड बिजनेस कॉउंसिल फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (WBCSD) द्वारा आरंभ किया गया। इसका लक्ष्य ऐसे ईंधन के लिये मांग और बाज़ार का निर्माण करना है जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की तुलना में 50% कम CO2 का उत्सर्जन करें।
- जेंडर एक्शन प्लान : देशों ने पहली बार जेंडर एक्शन प्लान को अंतिम रूप प्रदान किया जिसका उद्देश्य सभी UNFCCC प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना है।
- लोकल कम्युनिटीज एवं इंडीजेनस पीपल्स के लिये मंच की स्थापना : यह मंच स्थानीय समुदायों एवं मूल निवासियों के लिये जलवायु वार्ता में प्रत्यक्ष एवं व्यापक तरीके से मदद पहुँचाकर, भागीदारी सुनिश्चित करेगा। ताकि वो अपने परंपरागत ज्ञान का उपयोग कर सकें। यह वर्ष 2018 से कार्य करना प्रारंभ कर देगा।
- कृषि में ऐतिहासिक प्रगति : ‘कृषि पर कोरोनिविया ज्वाइंट वर्क’ ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार जलवायु वार्ता में देश किसी कृषि पर समझौते पर राजी हुए।
- कोयला संबंधी पूर्व संधियों को सशक्त बनाना : कनाडा एवं यूनाइटेड किंगडम के नेतृत्व में एलायंस का निर्माण किया गया जिसके अंतर्गत 2030 तक कोयले के उपयोग में कमी लानी थी।
वारसा जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, 2013 (COP-19) पोलैंड की राजधानी वारसा में संपन्न हुआ था। इस सम्मेलन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि इसमें भाग लेने वाले देशों ने वार्ता के गतिरोध को दूर किया एवं 2015 तक एक सार्वभौमिक कानूनी संधि को तैयार करने हेतु एक रूपरेखा तय की। हालाँकि यह EU की मूल आशाओं पर खरा नहीं उतरा लेकिन अधिकांश विकासशील देशों को यह स्वीकार्य था।
सरकारों ने इंटेन्डेड नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन (INDC-Intended Nationally Determined Contribution) की घरेलू तैयारी करने का निर्णय लिया ताकि दिसंबर 2015 से पहले उसे तैयार कर लिया जाए। इसे एक स्पष्ट एवं पारदर्शी तरीके से संपादित करने को कहा गया। इसमें निम्नलिखित मुद्दों पर निर्णय लिये गए-
- डरबन प्लेटफार्म को आगे बढ़ाना
- ग्रीन क्लाइमेट फंड
- दीर्घ अवधि वित्त
- REDD+ हेतु वारसा फ्रेमवर्क
- क्षति एवं नुकसान हेतु वारसा अंतर्राष्ट्रीय तंत्र
वारसा सम्मेलन के अन्य परिणाम
- 2020 तक 100 अरब अमेरिकी डॉलर को गतिशील करने हेतु प्रयासों को मज़बूती प्रदान करना : विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को सार्वजनिक एवं निज़ी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से मुकाबले हेतु 2020 तक 100 बिलियन डॉलर देने के प्रयास पर सहमति बनी, जो 2014 से 2020 की अवधि में प्रत्येक 2 वर्ष पर दिया जाना निर्धारित किया गया।
- हरित जलवायु निधि (Green Climate Fund) : इस निधि को व्यवसाय हेतु खोल दिया गया एवं 2014 के मध्य से इसने काम करना शुरू कर दिया।
- प्री-2020 एम्बिशन गैप को खत्म करना : सरकारों ने एम्बिशन गैप को खत्म करने हेतु उपायों को मज़बूती प्रदान करने पर विचार किया।
- उत्तरदायित्व में प्रगति : विकासशील देशों द्वारा कटौती प्रयासों के मापन, रिपोर्टिंग एवं सत्यापन हेतु तैयार फ्रेमवर्क अब पूरी तरह सक्रिय हो गया। इसके द्वारा देशों की संपोषणीयता प्रयासों को अब अच्छी तरह मापा जा सकेगा।
- जलवायु परिवर्तन पर कार्य हेतु तकनीकी को बढ़ावा : CTCN अब पूरी तरह सक्रिय चरण की तरफ बढ़ चुका है, जिससे विकासशील देशों के कार्यों को मदद मिल सकेगी। CTCN द्वारा विकासशील देशों की तरफ से तकनीकी विकास एवं तकनीकी हस्तांतरण के मुद्दों पर मदद मिलने के अनुरोध को अब सहायता मिल सकेगी।
UNFCCC के अंतर्गत COP-17 सम्मेलन का आयोजन डरबन में 2011 में संपन्न हुआ। यह अपने किस्म का दूसरा सबसे बड़ा सम्मेलन था। इस सम्मेलन ने काफी संतुलित तरीके से प्रगति की,जिसमें कन्वेंशन एवं क्योटो प्रोटोकॉल, बाली एक्शन प्लान एवं कानकुन समझौते के क्रियान्वयन पर चर्चा हुई।
इसके मुख्य परिणामों में पार्टीज द्वारा लिया गया एक महत्त्वपूर्ण निर्णय सम्मिलित है जिसमें 2015 के पहले तक, जल्द-से-जल्द जलवायु परिवर्तन पर एक सार्वभौमिक कानूनी समझौते को अपनाने की बात कही गई। साथ ही इस कानूनी समझौते को 2020 तक स्थापित करने की बात भी कही गई। इस समझौते के अनुसार GHG के उत्सर्जन में कटौती के लिये सभी विकसित एवं विकासशील देश अपने दायित्वों को निभाएंगे। इस कानूनी उपकरण के विकास हेतु इस अधिवेशन में ADP (Ad-hoc Working Group on the Durban Platform for Enhanced Action) की स्थापना की गई।
एडीपी-[ADP (Ad-hoc Working Group on the Durban Platform for Enhanced Action)]
यह एक सहायक निकाय है जिसकी स्थापना COP-17 में दिसम्बर 2011 में हुई थी। इस ADP को एक प्रोटोकॉल का विकास करना था जो कि एक अन्य कानूनी उपकरण या कन्वेंशन के अंतर्गत कानूनी बाध्यता युक्त एक सहमतिपूर्ण परिणाम था। इसे सभी पार्टियों के लिये उपयुक्त होना ज़रूरी था। इसका विकास 2015 के पहले तक पूरा कर लेना था ताकि COP-21 (2015) तक इसे अपना लिया जाए। जिससे यह 2020 से प्रभावी एवं क्रियान्वित हो सके।
यह 2012 के प्रथम मध्य हेतु अपने कार्यों की योजना बनाएगा जिसमें शमन, अनुकूलन, योजना, तकनीकी विकास एवं हस्तांतरण, कार्यों की पारदर्शिता एवं समर्थन तथा क्षमता-विकास, पार्टियों द्वारा प्रस्तुतीकरण करवाना एवं प्रासंगिक तकनीकी, सामाजिक तथा आर्थिक सूचनाएँ सम्मिलित हैं।
- 1 जनवरी, 2013 को प्रारंभ होने वाली ‘क्योटो प्रोटोकॉल की द्वितीय प्रतिबद्धता अवधि’ की स्थापना पर सहमति इस सम्मेलन की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस द्वितीय प्रतिबद्धता अवधि में 1 जनवरी, 2013 से 31 दिसम्बर, 2020 तक की आठ वर्षों की अवधि में औद्योगीकृत व विकसित देशों द्वारा 1990 के स्तर से कम-से-कम 18% की कटौती की बात कही गई।
- इस सम्मेलन में विकसित देशों द्वारा कृषि को भी जलवायु परिवर्तन के अंतर्गत लाया गया।
- भारत UNFCCC के CBDR (समान लेकिन विभेदी ज़िम्मेदारी) अर्थात् समानता के सिद्धांत के अनुपालन की अपनी मांग पर दृढ़ रहा। जिसमें भविष्य की वार्ताओं अर्थात् आगे किसी भी नए जलवायु व्यवस्था में समानता के सिद्धांत को शामिल करना निहित था।
- कानकुन करार के अंतर्गत प्रावधानित, GCF (Green Climate Fund) की वास्तविक स्थापना इसी सम्मेलन द्वारा की गई। साथ ही इसके निर्माण कार्य में प्रगति हेतु एक प्रबंधन ढाँचा को अपनाया गया।
ओज़ोन परत, समतापमंडल (स्ट्रेटोस्फीयर) में मुख्यत: 15 से 30 किमी. की उँचाई पर अवस्थित है, जो सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (अल्ट्रा-वायलेट) किरणों को अवशोषित कर जीव समुदायों, विशेषकर: मनुष्यों को त्वचा कैंसर व अन्य गंभीर बीमारियों से बचाती है। किंतु ओज़ोन परत का दिनों-दिन क्षरण होता जा रहा है।
- क्लोरो-फ्लोरोकार्बन(CFC) ओज़ोन परत के क्षरण के लिये प्रमुख उत्तरदायी गैस है। इसका प्रयोग रेफ्रीजरेटर, एयर कंडीशनर, स्प्रे आदि में होता है। इसके अलावा कार्बन टेट्राक्लोराइड, मिथाइल ब्रोमाइड, मिथाइल क्लोरोफार्म, हैलोन्स आदि रसायन भी ओज़ोन परत के क्षरण हेतु ज़िम्मेदार हैं।
- 1987 में निर्मित तथा 1989 से प्रभावी ‘मॉण्ट्रियल प्रोटोकॉल’ ओज़ोन परत संरक्षण से संबंधित है।
- विश्व ओज़ोन संरक्षण दिवस प्रतिवर्ष 16 सितंबर को मनाया जाता है।
- समतापमंडल के अतिरिक्त वायुमंडल के निचले स्तर अर्थात् क्षोभमंडल में भी ओज़ोन पाई जाती है। पर्यावरणीय दृष्टि से समतापमंडल की ओज़ोन लाभदायक है, जबकि क्षोभमंडल की ओज़ोन हानिकारक है, क्योंकि यह वायु को प्रदूषित करती है एवं स्मॉग का निर्माण करती है, जो श्वसन के लिये हानिकारक होता है।
अंटार्कटिका क्षेत्र के ऊपर सर्वाधिक ओज़ोन क्षरण के तीन कारण हैं-
- ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSCs)
- ध्रुवीय भँवर (Polar Vortex)
- सक्रिय क्लोरीन का प्रभाव (Active Chlorine Effect)
- ओज़ोन छिद्र तकनीकी रूप से कोई छिद्र नहीं है, जहाँ पर ओज़ोन गैस उपस्थित रहती हो, बल्कि यह अंटार्कटिका के ऊपर समतापमंडल में ओज़ोन अपघटित क्षेत्र है, जो दक्षिणी गोलार्द्ध में बसंत ऋतु (अगस्त-अक्तूबर) के आरंभ होने पर घटित होता है।
- वायुमंडल में ओज़ोन का सांद्रण करीब 300 डॉबसन यूनिट है। कोई क्षेत्र जहाँ का सांद्रण 220 डॉबसन यूनिट से नीचे गिर जाता है, वह ओज़ोन छिद्र का भाग माना जाता है।
- भारत ने ओज़ोन परत के संरक्षण हेतु 1991 में वियना कन्वेंशन पर तथा ओज़ोन क्षयकारी पदार्थों के संबंध में 1992 में मॉण्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये।
जलवायु किसी स्थान के लंबे समय की मौसमी घटनाओं का औसत होती है। मौसमी प्रतिरूप में लंबे समय के परिवर्तन को जलवायु परिवर्तन कहते हैं। जलवायु परिवर्तन सामान्यत: तापमान, वर्षा, हिम एवं पवन प्रतिरूप में आए एक बड़े परिवर्तन द्वारा मापा जाता है, जो कई वर्षों में होता है। जलवायु परिवर्तन के भयंकर दुष्परिणामों से बचने के लिये विश्व के सभी देशों में यह सहमति बनी है वैश्विक तापमान को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2०C से नीचे और तापमान की वृद्धि को 1.5०C तक सीमित रखा जाए।
जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Affecting Climate Change)
जलवायु परिवर्तन एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जो प्राकृतिक एवं मानवीय कारकों द्वारा प्रभावित होती है। औद्योगीकरण से पहले इस प्रक्रिया में मानवीय कारकों की भूमिका कम थी। औद्योगीकरण, नगरीकरण की प्रक्रिया तथा संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से वैश्विक तापन व प्रदूषण के रूप में गंभीर समस्या सामने आई। जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक एवं मानवीय कारक निम्नलिखित हैं-
- प्राकृतिक कारक (Natural Factors)
- वायुमंडल सामान्यतः अस्थिरता की दशा में रहता है, जिस कारण मौसम एवं जलवायु में समय एवं स्थान के संदर्भ में अल्पकालीन से लेकर दीर्घकालीन परिवर्तन होते रहते हैं। दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन हज़ारों वर्षों तक स्थायी रहते हैं एवं अत्यंत धीमी गति से घटते हैं। सौर विकिरण में विभिन्नता, सौरकलंक चक्र, ज्वालामुखीय उद्भेदन, पृथ्वी की कक्षा में परिवर्तन, वायुमंडलीय गैसीय संयोजन में परिवर्तन, महाद्वीपीय विस्थापन जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक कारक हैं।
- मानवजनित कारक (Anthropogenic Factors)
- वर्तमान जलवायु परिवर्तन मानव जनित समस्या है। मनुष्य अपनी समस्त क्रियाओं से पर्यवरण को प्रभावित करता है। मानव द्वारा आर्थिक उद्देश्यों एवं भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रकृति के साथ व्यापक छेड़छाड़ के क्रियाकलापों ने प्राकृतिक पर्यावरण का संतुलन नष्ट किया है। इस तरह की समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन कहलाती हैं। मानवजनित कारक और उनका जलवायु परिवर्तन में योगदान-
- संसाधनों का दुरुपयोग
- नगरीकरण एवं तीव्र औद्योगीकरण
- जीवाश्म ईंधन का प्रयोग
- भूमि-उपयोग में बड़े पैमाने पर बदलाव
- जलवाष्प, CO2 तथा अन्य ग्रीन हाउस गैसों (CH4, N2O, CFC) में वृद्धि
- समतापमंडल में ओज़ोन का ह्रास
- तापमान में वृद्धि
2009 में COP का 15वाँ अधिवेशन कोपेनहेगन में संपन्न हुआ। साथ ही यह क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत Annex-1 पार्टीज के लिये आगे की प्रतिबद्धता हेतु एड-हॉक वर्किंग ग्रुप (AWG-KP) का 10वाँ सम्मेलन था एवं AWG-LCA का 8वाँ अधिवेशन था। कोपेनहेगन जलवायु परिवर्तन कॉन्फ्रेंस ने जलवायु परिवर्तन नीति को उच्चतम राजनैतिक स्तर तक बढ़ाया।
- समझौते के प्रमुख बिंदु
- इस सम्मेलन ने प्रभावशाली वैश्विक जलवायु परिवर्तन सहयोग के लिये आवश्यक आधारभूत संरचना निर्माण हेतु बातचीत को आगे बढ़ाया जिसमें क्योटो प्रोटोकॉल के CDM का संवर्द्धन भी सम्मिलित था।
- इसने कोपेनहेगन एकार्ड (Copenhagen Accord) को जन्म दिया, जिसने (लघु एवं दीर्घ अवधि में) कार्बन कटौती एवं जलवायु परिवर्तन जवाबदेही हेतु एक स्पष्ट राजनैतिक इरादे को व्यक्त किया। यह संयुक्त राज्य अमेरिका तथा बेसिक देशों (BASIC Countries- Brazil, South Africa, India, China) के बीच GHG के उत्सर्जन पर रोक लगाने हेतु ऐतिहासिक अर्थपूर्ण समझौता था।
- इस कोपेनहेगन एकार्ड की प्रकृति गैर बाध्यकारी थी क्योंकि विकसित एवं विकासशील देशों के मध्य असामंजस्य होने की वजह से COP-15 एक विधिक रूप से बाध्यकारी समझौते (Legally Binding Agreement) का रूप नहीं ले सका।
- इस समझौते के तहत महत्तम वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि, पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2ºC से ज़्यादा न हो, इसकी बात की गई। इसे सीमित करने हेतु एक दीर्घ अवधि लक्ष्य की स्थापना हो, जिसका 2015 में पुनर्निरीक्षण हो। साथ ही इसमें एनेक्स-1 देशों (विकसित देश) को 2020 तक हरितगृह गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिये एक निश्चित लक्ष्य तैयार करना था। विकासशील देशों को राष्ट्रीय स्तर पर GHG के उत्सर्जन दर में कमी लाने के लिये कुछ कटौती संबंधी ऐच्छिक प्रयास करने थे परंतु वे इस कटौती हेतु शर्तों से बंधे नहीं थे। हालाँकि इसे व्यवहारिक रूप में कैसे संपादित किया जाए इस पर कोई सहमति नहीं बनी। इसमें एक और मांग जोड़ी गई कि महत्तम तापमान वृद्धि को 1.5ºC से नीचे रखा जाए। यह मांग सुभेद्य विकाशील राष्ट्रों द्वारा की गई थी।
- 4 नए निकायों की स्थापना-
- REDD+ पर एक तंत्र का विकास
- COP के अंतर्गत एक उच्च स्तरीय पैनल जो वित्तीय प्रावधानों के क्रियान्वयन का अध्ययन करे
- कोपेनहेगन ग्रीन क्लाइमेट फंड (Green Climate Fund)
- एक प्रौद्योगिकी तंत्र (Technology Mechanism)
इस सम्मेलन में विकसित देशों ने 2020 तक उनके हरितगृह गैसों के उत्सर्जन में कमी हेतु एक लक्ष्य को तय करने पर सहमति जताई। विकासशील देशों ने उनके उत्सर्जन में कमी हेतु राष्ट्रीय रूप से उचित कटौती रणनीतियों (Mitigation Strategies) के अनुकरण करने को स्वीकारा लेकिन कार्बन उत्सर्जन की कमी हेतु प्रतिबद्धता की ज़रूरत को नहीं स्वीकार किया।
भारत में लुप्त हो रहे महत्त्वपूर्ण जीवों की प्रजातियों को बचाने के लिये 1973 में जीव संरक्षण के प्रयास शुरू किये गए। इसके अंतर्गत तेज़ी से लुप्त हो रही प्रजातियों के लिये संरक्षित क्षेत्र बनाकर उनका संरक्षण किया जा रहा है। लुप्त हो रहे महत्त्वपूर्ण जीवों के संरक्षण हेतु भारत सरकार द्वारा निम्नलिखित प्रयास किये जा रहे हैं-
- प्रोजेक्ट टाइगर : 1973 में भारत सरकार द्वारा बाघ (जो एक संकटग्रस्त प्रजाति है) के संरक्षण हेतु इसे शुरू किया गया था। इसी के अंतर्गत टाइगर रिज़र्व की स्थापना की गई, जो फिलहाल 55 हैं।
- प्रोजेक्ट एलीफेंट : 1992 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य हाथियों के आवास संरक्षण द्वारा उनकी संख्या में वृद्धि करना था।
- हाथियों को उनके बृहद् पर्यावास से जोड़ने वाला सँकरा रास्ता हाथी गलियारा (Elephant Corridor) कहलाता है।
- हाथियों की अवैध हत्या को रोकने हेतु दक्षिण एशिया में 2003 में साइट्स द्वारा माइक (MIKE) कार्यक्रम शुरू किया गया। The Ministry of Environment and Forests (MoEF) एवं Wildlife Trust of India (WTI) द्वारा 2011 में ‘हाथी मेरे साथी’ अभियान शुरू किया गया।
- गंगा डॉल्फिन : इन्हें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में रखा गया है। यह भारत, नेपाल, बांग्लादेश की गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना आदि नदी तंत्र में पाई जाती है। यह मीठे जल की प्रजाति है।
- हंगुल परियोजना : इसे ‘कश्मीर स्टैग’ भी कहते हैं, जो केवल कश्मीर के दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में ही पाए जाते हैं। इसे जम्मू और कश्मीर IUCN तथा WWF ने मिलकर 1970 में शुरू किया।
- मगरमच्छ संरक्षण परियोजना : मगरमच्छ के संरक्षण हेतु 1975 में इसे बनाया गया।
- गैंडा परियोजना : इसे 1987 में शुरू किया गया एवं 2005 में ‘इंडियन राइनो विजन 2020’ प्रारंभ किया। एक सींग वाले गैंडे सिर्फ भारत में ही पाए जाते हैं।
- गिद्ध संरक्षण प्रोजेक्ट : गिद्धों के संरक्षण हेतु 2011 में SAVE (Saving India’s Vulture Extinction) प्रारंभ किया गया।
- लाल पांडा परियोजना-1996 : पूर्वी हिमालय क्षेत्र के लाल पांडा संरक्षण हेतु
- हिम तेंदुआ योजना-2009 : हिमालयी राज्यों में तेंदुआ संरक्षण
विश्व के कुछ क्षेत्रों में प्रजातियों की अत्यधिक विविधता पाई जाती है, जिसे ‘हॉटस्पॉट क्षेत्र’ कहते हैं। हॉटस्पॉट की संकल्पना को पर्यावरणविद् नार्मन मायर्स ने 1988 में विकसित किया। किसी स्थान को हॉटस्पॉट क्षेत्र घोषित करने हेतु मापदंड-
- इस क्षेत्र में विश्व की कम-से-कम 0.5% या 1500 से अधिक स्थानिक संवहनीय पौधों की प्रजातियाँ होनी चाहिये।
- इस क्षेत्र की प्राथमिक वनस्पतियों का कम-से-कम 70% नष्ट हो चुका हो।
उपर्युक्त कारकों को सम्मिलित करते हुए विश्व के जिन हॉटस्पॉट क्षेत्रों में स्थानिक प्रजातियों की प्रचुरता पाई जाती है, वे अत्यधिक हॉटस्पॉट (Hottest Hotspots) क्षेत्र कहलाते हैं। इनके विनाश का भी खतरा अधिक है। इस वर्ग में विश्व के 8 हॉटस्पॉट क्षेत्रों को रखा जाता है-
1. मेडागास्कर, 2. फिलीपीन्स, 3. सुंडालैंड, 4. ब्राज़ील का अटलांटिक वन क्षेत्र, 5. कैरेबियन, 6. इंडो-बर्मा, 7. पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका, 8. तंजानिया/केन्या के तटीय वन एवं पूर्वी आर्क क्षेत्र।
भारत के प्रमुख हॉटस्पॉट क्षेत्र (India's Leading Hotspots)
भारत के चार क्षेत्र विश्व के जैव विविधता बाहुल्य क्षेत्र में आते हैं-
- हिमालयी क्षेत्र : एक सींग वाला गैंडा, एशियाई जंगली भैंसा, सुनहरा लंगूर, हिमालय का ताहर, गंगा की डॉल्फिन, नामदफा उड़ने वाली गिलहरी।
- इंडो-बर्मा क्षेत्र : बंदर, लंगूर, गिब्बन आदि कपियों का आवास क्षेत्र। इसके अंतर्गत उत्तर पूर्वी भारत का क्षेत्र, म्याँमार, थाइलैंड, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया एवं दक्षिणी चीन आता है।
- पश्चिमी घाट और श्रीलंका : दक्षिण-पश्चिमी भारत एवं श्रीलंका के दक्षिण-पश्चिम के उच्च भूमि क्षेत्र तक फैला हुआ है। एशियाई हाथी, नीलगिरी ताहर, शेर पूँछ वाला बंदर (मकाक) आदि कुछ विशेष प्रजातियाँ हैं।
- सुंडालैंड क्षेत्र : दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित इंडो-मलाया द्वीप समूह के पश्चिमी भाग तक फैला है। भारत का निकोबार द्वीप समूह इसके अंतर्गत आता है। प्रवाल, व्हेल, समुद्री गाय (ड्यूगॉन्ग) आदि विशेष प्रजातियाँ हैं।
होप स्पॉट (Hope Spot)
‘होप स्पॉट’ सागरों के ऐसे विशेष क्षेत्र हैं जो इनके स्वास्थ्य के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। ये क्षेत्र जैव-विविधता से समृद्ध होने के अलावा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा किसी समुदाय के लिये आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। इस अवधारणा का प्रतिपादन 2009 में ‘मिशन ब्लू’ के अंतर्गत डॉ. साल्विया अर्ल ने किया तथा इसे IUCN के साथ संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया। भारत के दो क्षेत्र अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तथा लक्षद्वीप को 2013 में इसके अंतर्गत नामित किया गया है।
यह जलवायु परिवर्तन पर प्रथम बहुपक्षीय कन्वेंशन था। 1992 के सम्मेलन से संबंधित देश UNFCCC में शामिल हो गए ताकि साथ मिलकर औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि को रोका जा सके एवं उसके प्रभावों का मुकाबला किया जा सके। यह कन्वेशन 21 मार्च, 1994 से कार्य करने लगा। वर्तमान में इसकी (सदस्यता) सार्वभौमिक के करीब है। जिन 197 देशों ने कन्वेंशन को सत्यापित (Ratified) किया है, वे पार्टीज़ टू द कन्वेंशन (Parties to the Convention) कहलाते हैं जबकि 165 देश इस फ्रेमवर्क के हस्ताक्षरकर्त्ता बने।
सम्मेलन की कुछ मुख्य बातें
- समस्या के अस्तित्व का पहचाना जाना : जब 1994 में UNFCCC कार्यशील हुआ था तो आज की अपेक्षा उस समय मानव जनित जलवायु परिवर्तन के बारे में काफी कम वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद थे। इस स्थिति पर इसने मांट्रियल प्रोटोकॉल को आदर्श बनाते हुए (वैज्ञानिक अनिश्चितता के बावजूद मानव हित में कार्य करने हेतु) कुछ निश्चित नियम रूप को अपनाया।
- विशिष्ट लक्ष्य का निर्धारण : इस कन्वेंशन का अंतिम उद्देश्य हरितगृह गैसों की सांद्रता को स्थिर करना एवं इसे इस स्तर पर रखना जिससे जलवायु तंत्र के साथ खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोका जा सके।
- लक्ष्य के रोडमैप का नेतृत्व करने हेतु विकसित देशों पर दायित्व : चूँकि अतीत एवं वर्तमान के अधिकांश हरितगृह गैसों के उत्सर्जन स्रोत विकसित औद्योगिक देश रहे हैं, अत: अपने घरेलू क्षेत्र में ज़्यादातर उत्सर्जन कटौती की अपेक्षा उन्हीं से की जाती हैं। ये एनेक्स-1 के देश कहलाए एवं वे OECD (Organization for Economic Cooperation and Development) से संबंधित थे।
- विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन क्रियाओं हेतु वित्तीय सहायता का निर्देश : इस कन्वेंशन के अंतर्गत जलवायु परिवर्तन पर कार्यवाही हेतु वित्तीय सहायता प्रदान कर विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन क्रियाविधि को समर्थन देने हेतु औद्योगीकृत देश राजी हुए।
- सचिवालय (Secretariat) : UNFCCC एवं क्योटो प्रोटोकॉल को सचिवालय द्वारा सेवा प्रदान की जाती है एवं इसे जलवायु परिवर्तन सचिवालय के नाम से भी जाना जाता है। UNFCCC का सचिवालय अंतर्राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन समझौते में सम्मिलित सभी संस्थानों को समर्थन देता है (खासकर कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) को)। कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज मीटिंग ऑफ पार्टीज (CMP) की तरह कार्य करती है। यह सहायक निकायों (जो COP/CMP को सलाह देता है) एवं COP/CMP ब्यूरो (जो COP/CMP से उत्पन्न संगठनात्मक एवं प्रक्रियात्मक मुद्दों को मुख्यत: देखता है) को भी समर्थन देता है। ‘‘मोमेंटम फॉर चेंज : क्लाइमेट न्यूट्रल नाउ’’ पहल भी इसके द्वारा प्रवर्तित की गई है।
- प्रदूषित जल में उपस्थित वायरस, जीवाणुओं, परजीवियों एवं कृमियों के कारण संक्रमणजन्य रोगों, जैसे- पीलिया, हैजा, टाइफाइड, अतिसार, हेपेटाइटिस, किडनी खराब होने आदि का खतरा रहता है। संक्रमित जल पीने, नहाने, खाना बनाने आदि के लिये अनुपयुक्त होता है।
- पेयजल में फ्लोराइड की अधिकता से फ्लोरोसिस रोग होता है जिसमें अस्थियाँ व दाँत कमज़ोर हो जाते हैं।
- पेयजल में क्रोमियम की मात्रा उचित से अधिक होने पर यकृत तथा गुर्दा संबंधी रोग होते हैं।
- भारी धातुओं से युक्त जल के प्रयोग से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं। पारायुक्त जल से प्रभावित मछलियों के सेवन से 1956 में जापान में मिनामाटा महामारी से अनेक लोगों की मौत हो गई थी। अपशिष्ट जल में उपस्थित पारा मिश्रण सूक्ष्म जैविक क्रियाओं द्वारा अत्यधिक विषैले पदार्थ मिथाइल पारा (Methyl Mercury) में बदल जाता है जिससे अंगों, होंठ, जीभ आदि में संवेदनशून्यता; बहरापन, आँखों का धुंधलापन एवं मानसिक असंतुलन हो जाता है।
- कैडमियम प्रदूषण से ‘इटाई-इटाई’ रोग हो जाता है जिससे अस्थियों एवं जोड़ों में तीव्र दर्द होता है तथा यकृत एवं फेफड़े का कैंसर हो जाता है।
- सीसा युक्त जल से एनीमिया, सिर दर्द, मांसपेशियों की कमज़ोरी एवं मसूड़ों में नीलापन आदि प्रभाव दिखाई देते हैं।
- एस्बेस्टस के रेशों से युक्त जल द्वारा एस्बेस्टोसिस (फेफड़े के कैंसर का एक रूप) रोग हो जाता है।
जल प्रदूषण नियंत्रण के उपाय (Measures to Control Water Pollution)
जल प्रदूषण को निम्नलिखित उपायों द्वारा प्रभावशाली तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है-
- घरेलू सीवेज : घरेलू सीवेज में 99.9% जल एवं 0.1% प्रदूषक होते हैं। शहरी क्षेत्रों के घरेलू सीवेज के 90% से अधिक प्रदूषकों को केंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट द्वारा हटाया जा सकता है।
- औद्योगिक अपशिष्ट जल : कुछ उद्योगों द्वारा सामान्य विषाक्त प्रदूषकों का उत्सर्जन किया जाता है जिनका निपटान नगरपालिका द्वारा किया जा सकता है किंतु कुछ प्रदूषकों, जैसे- तेल, ग्रीस, भारी धातुओं आदि का निपटान विशेष निपटान संयंत्रों द्वारा किया जाना चाहिये। औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लिये यह अनिवार्य किया जाना चाहिये कि वे कारखानों से निकले अपशिष्टों को बिना शोधित किये नदियों, झीलों एवं तालाबों में विसर्जित न करें।
- कृषि अपशिष्ट जल : मानवोत्पत्ति संबद्ध गतिविधियों में केवल कृषि ही दो-तिहाई से अधिक वैश्विक जल-उपयोग हेतु उत्तरदायी है। कृषि क्षेत्र में अनेक अपरदन नियंत्रण प्रणालियों द्वारा जल के प्रवाह को कम किया जा सकता है। किसान उर्वरकों एवं कीटनाशकों का आवश्यकता से अधिक उपयोग न कर तथा जैव-उर्वरकों एवं जैव-कीटनाशकों का प्रयोग कर जल की गुणवत्ता को बनाए रख सकते हैं। कीटनाशक का प्रयोग कैंसर का कारक भी है।
- आम जनता को जागरूक किया जाना चाहिये एवं जल प्रदूषण एवं उससे उत्पन्न कुप्रभावों से अवगत कराना चाहिये।
- सरकार को जल प्रदूषण के नियंत्रण के लिये प्रभावी कानून बनाना चाहिये। यद्यपि सरकार ने जल (संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1974 लागू किया है लेकिन इसे और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
- जल जीवों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है एवं यह जैवमंडल में पोषक तत्त्वों के संचरण एवं चक्रण में सहायक है। औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं मानव जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण जल की मांग में तीव्र वृद्धि हुई है एवं गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है।
- जल के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक अभिलक्षणों में प्राकृतिक एवं मानवजनित प्रक्रियाओं द्वारा होने वाला ऐसा अवनयन या ह्रास जिससे कि वह मानव एवं अन्य जैविक समुदायों के लिये अनुपयुक्त हो जाता है, जल प्रदूषण कहलाता है।
- जल में प्रदूषण संकेतक के रूप में उपयोग किये जाने वाले प्राचल (Parameter) हैं- कुल विघटित ठोस पदार्थ, कॉलिफॉर्म काउंट, विघटित ऑक्सीजन।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भारत में फ्लोराइड, जिंक, क्रोमियम, भारी धातुओं (पारा, यूरेनियम, कैडमियम आदि) को पेयजल प्रदूषण के लिये उत्तरदायी माना है।
- जलीय पारितंत्र में सुपोषण, जैव आवर्धन आदि प्रक्रिया तेज़ हो जाती है।
- पेयजल में कुल द्रवीभूत ठोस (TDS) पदार्थ के सांद्रण की अधिकतम सीमा 500 mg/L मानी गई है। जल प्रदूषण में द्रवीभूत ठोस पदार्थ का सांद्रण इस सीमा से कहीं अधिक हो जाता है।
- प्रदूषित जल का प्रभाव प्रवाल भित्ति पर भी पड़ता है, इससे प्रवाल विरंजन की घटना में बढ़ोतरी होती है।
जल प्रदूषण के स्रोत (Sources of Water Pollution)
- उत्पत्ति के आधार पर जल प्रदूषकों के स्रोतों को दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
- बिंदु स्रोत प्रदूषण (Point Source Pollution) : इसके अंतर्गत ऐसा प्रदूषण आता है जिसमें प्रदूषक, जल के निश्चित स्रोत से आते हैं। जैसे- नगरपालिका क्षेत्र का सीवेज स्थल एवं फैक्ट्रियों का बहि:स्राव स्थल।
- अबिंदु स्रोत प्रदूषण (Non-Point Source Pollution) : इसके अंतर्गत ऐसे प्रदूषण को शामिल किया जाता है जिसमें प्रदूषकों का बहि:स्राव किसी पृथक् स्रोत से नहीं होता है। इसमें प्रदूषक एक विस्तृत क्षेत्र से आते हैं। उदाहरण के लिये शहर के वर्षा जल का बहाव, कृषि क्षेत्र का बहाव, धोबी घाट, खुले में शौच, पशुओं के शव इत्यादि।
- बिंदु स्रोत प्रदूषण को उपयुक्त तकनीक का प्रयोग कर नियंत्रित किया जा सकता है किंतु अबिंदु स्रोत प्रदूषण को नियंत्रित करना कठिन है।
जल प्रदूषण के कारण (Causes of Water Pollution)
- घरेलू एवं औद्योगिक अपशिष्टों का जल स्रोतों में मिलना,
- कृषि में प्रयुक्त उर्वरक एवं खरपतवार युक्त जल का नदी में मिलना,
- तेल अधिप्लाव,
- रेडियोसक्रिय तत्त्वों से युक्त रसायन का जलीय तंत्र तक पहुँचना,
- विद्युत ऊर्जा केंद्र से निकले उच्च तापयुक्त जल का जल स्रोत में निकास,
- नहाने व कपड़े धोने के लिये नदी जल का प्रयोग
वायु में किसी भी हानिकारक ठोस, तरल या गैस (ध्वनि व रेडियोधर्मी विकिरण भी) का इस मात्रा में मिल जाना कि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मानव समेत अन्य जीवधारियों को हानि पहुँचाए, ‘वायु प्रदूषण’ कहलाता है। वायु विभिन्न गैसों का मिश्रण है, जिसमें नाइट्रोजन (78%), ऑक्सीजन (21%), ऑर्गन (0.9%), कार्बन डाइऑक्साइड (0.038%) इत्यादि गैसें पाई जाती हैं।
वायु प्रदूषकों के प्रकार (Types of Air Pollutants)
- प्रदूषकों की उत्पत्ति के आधार पर
- प्राकृतिक प्रदूषक (Natural Pollutants)- ये प्रदूषक प्राकृतिक स्रोतों से अथवा प्राकृतिक क्रियाकलापों से निकलते हैं। कुछ उदाहरण हैं : पौधों के परागकण और पौधों के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक, ज्वालामुखी विस्फोट तथा जैविक पदार्थों के सड़ने-गलने से निकलने वाली गैसें, जैसे- SO2, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOX) आदि।
- मानवजनित प्रदूषक (Manmade Pollutants)- इसमें कारखानों, रसोईघरों, स्वचालित वाहनों आदि से निकलने वाले प्रदूषक शामिल हैं।
- प्रदूषकों की प्रकृति के आधार पर
- गैसीय प्रदूषक (Gaseous Pollutants)- इनमें निम्नलिखित प्रदूषकों को शामिल किया जाता है-
- जीवाश्म ईंधनों के दहन से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन आदि।
- एरोसॉल कैन तथा रेफ्रिजरेशन प्रणाली से निस्सृत क्लोरो-फ्लोरोकार्बन।
- सल्फर युक्त जीवाश्म ईंधनों के दहन से निस्सृत सल्फर के यौगिक, जैसे- SO2, SO3 आदि। SO2 श्वसन मार्ग को प्रभावित करता है।
- अत्यधिक ऊँचाई पर उड़ने वाले सुपरसोनिक जेट विमानों एवं रासायनिक उर्वरकों से निस्सृत नाइट्रोजन के यौगिक, जैसे- नाइट्रस ऑक्साइड (N2O), नाइट्रिक ऑक्साइड (NO), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) तथा नाइट्रोजन ट्राइऑक्साइड (NO3)
- सूती वस्त्रों की ब्लीचिंग तथा अन्य रासायनिक क्रियाओं से निकलने वाली क्लोरीन।
- कणिकीय प्रदूषक (Particulate Pollutants)- कणिकीय प्रदूषकों के मुख्य स्रोत हैं- गाड़ियों से निकलने वाला धुआँ, ताप संयंत्र, तेलशोधन कारखाना, निर्माण कार्य आदि। इन प्रदूषकों के कारण धुंध (Haze) फैल जाता है तथा दृश्यता प्रभाव कम हो जाता है। साथ ही ये प्रदूषक पेफड़े व श्वसन प्रक्रिया को भी दुष्प्रभावित करते हैं। फ्लाई ऐश और अन्य धातु कण ऐसे प्रदूषकों के उदाहरण हैं।
- गैसीय प्रदूषक (Gaseous Pollutants)- इनमें निम्नलिखित प्रदूषकों को शामिल किया जाता है-
- प्राथमिक और द्वितीयक प्रदूषकों के आधार पर
- प्राथमिक प्रदूषक (Primary Pollutants)- ये प्रदूषक प्राकृतिक अथवा मानवीय क्रियाकलापों के द्वारा सीधे वायु में निष्कासित होते हैं। इनके उदाहरण हैं- ईंधन जलाने से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, विविध हाइड्रोकार्बन तथा कणिकाएँ।
- द्वितीयक प्रदूषक (Secondary Pollutants)- सूर्य के विद्युतचुंबकीय विकिरणों के प्रभाव के अधीन प्राथमिक प्रदूषकों तथा सामान्य वायुमंडलीय यौगिकों के बीच रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप द्वितीयक प्रदूषक का निर्माण होता है। उदाहरण के लिये प्राथमिक प्रदूषक सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) वायुमंडल की ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके सल्फर ट्राइऑक्साइड (SO3) बनाती है जो एक द्वितीयक प्रदूषक है। सल्फर ट्राइऑक्साइड जलवाष्प से मिलकर एक और द्वितीयक प्रदूषक सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4) बनाती है जो कि अम्ल वर्षा का घटक है। NO2 के दो अन्य द्वितीयक प्रदूषक परॉक्सीएसिटिल नाइट्रेट (PAN) तथा नाइट्रिक अम्ल (HNO3) हैं। धूम-कोहरा (SMOG) धुएँ और कोहरे का मिश्रण होता है
इनके अतिरिक्त एरोसॉल, प्रकाश रासायनिक धूम-कोहरा, फ्लाई ऐश, निलंबित कणिकीय पदार्थ तथा घरेलू वायु प्रदूषण भी वायु प्रदूषण के कारक हैं।
हमारे पर्यावरण की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक विशेषताओं में किसी प्रकार के अवांछनीय परिवर्तन जो वायु, जल और मृदा में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मानव या अन्य जातियों तथा हमारे जीवमंडल में जीवन को आश्रय देने वाली व्यवस्थाओं को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं या करेंगे, को प्रदूषण कहते हैं। इस प्रकार पर्यावरण में अवांछित पदार्थों के समाविष्ट हो जाने की प्रक्रिया, जो जीवन के सम्मुख संकट उत्पन्न करती है, ‘प्रदूषण’ कहलाती है तथा वह पदार्थ जिसे किसी संसाधन में मिलाने से संसाधन की उपयोगिता कम हो जाती है, प्रदूषक कहलाता है।
- वैसे प्रदूषक जो अपने मूल स्वरूप में ही पर्यावरण में विद्यमान रहते हैं, प्राथमिक प्रदूषक कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये जिस रूप में उत्पादित होते हैं, उसी स्वरूप में बने रहते हैं। जैसे- कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड इत्यादि।
- वैसे प्रदूषक जो प्राथमिक प्रदूषकों की आपसी अंत:क्रिया के कारण निर्मित होते हैं, द्वितीयक प्रदूषक कहलाते हैं। जैसे- ओज़ोन, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, सल्फ्यूरिक एसिड, परॉक्सीएसिटिल नाइट्रेट (PAN), धूम (Smog) इत्यादि।
- प्रदूषकों के निवारण के आधार पर इसे जैव-निम्नीकृत (Bio-degradable) प्रदूषक तथा जैव-अनिम्नीकृत (Non-Biodegradable) प्रदूषक में बाँटा जाता है।
- वैसे प्रदूषक जो सूक्ष्मजीवीय गतिविधियों के कारण निम्नीकृत हो जाते हैं, उन्हें जैव-निम्नीकृत प्रदूषक कहते हैं। जैसे- कागज़, सब्ज़ी, फल इत्यादि।
- वैसे प्रदूषक जिनका अपघटन सूक्ष्म जीवों द्वारा नहीं हो पाता, जैव-अनिम्नीकृत प्रदूषक कहलाते हैं। ये लंबे समय तक प्रकृति में बने रहते हैं। जैसे- प्लास्टिक, रेडियोसक्रिय तत्त्व, सीसा इत्यादि। आहार शृंखलाओं में से गुज़रते हुए इसका अत्यधिक मात्रा में संचित होना जैव आवर्धन कहलाता है। अत: जीवित जीवों में प्रदूषकों की सांद्रता में वृद्धि ही जैव-आवर्धन है।
- पर्यावरण पर मानवोद्भविक क्रियाओं का प्रभाव निर्धारित करने में जनसंख्या, प्रति व्यक्ति धनाढ़यता एवं संसाधनों के दोहन में प्रयुक्त तकनीकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक हैं।
- प्रदूषण के प्रमुख प्रकार- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, रेडियोएक्टिव प्रदूषण, ताप प्रदूषण तथा मृदा प्रदूषण आदि हैं।
देश की शासन प्रणाली अथवा शिक्षा व्यवस्था की प्रणाली का शिक्षण के स्वरूप पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार की प्रशासनिक प्रणाली में शिक्षण दिया जाता है, यह उसी प्रकार का रूप धारण कर लेता है। शासन व्यवस्था के आधार पर शिक्षण के निम्नलिखित प्रकार होते हैं-
निरंकुश शिक्षण (Autocratic Teaching) : शिक्षण प्रक्रिया का संचालन शासक की इच्छा के अधीन होता है। इस शिक्षण पद्धति में शिक्षक केंद्रबिंदु होता है एवं शिक्षक का स्थान प्रधान होता है और विद्यार्थियों का स्थान गौण होता है। इसमें शिक्षक की विचारधारा को वरीयता दी जाती है और विद्यार्थियों को उसके आदेशों का बिना किसी किंतु-परंतु के पालन करना होता है। जैसे- प्राचीन राजतंत्र में शिक्षा का संचालन।
लोकतांत्रिक प्रणाली का शिक्षण (Democratic Teaching) : इस व्यवस्था के अंतर्गत शिक्षण प्रक्रिया का संचालन जनता की इच्छा के अनुसार करना होता है, जो कि व्यावहारिक न होने के कारण संभव नहीं है। वस्तुतः इस पद्धति में विद्यार्थी केंद्र में और शिक्षक मार्गदर्शक की भूमिका में होता है। इसमें अनुशासनहीनता की स्थिति की संभावना बनी रहती है।
हस्तक्षेप रहित शिक्षण (Laisses Faire Teaching) : शासन व्यवस्था की ओर से शिक्षण के विभिन्न स्वरूपों का निर्धारण कर दिया जाता है। विद्यार्थी किसी भी स्वरूप में अध्ययन करने के लिये स्वतंत्र होता है। इसमें विद्यार्थी दबाव एवं बाधामुक्त होकर सीखता है। जैसे- भारतीय शिक्षा पद्धति।
व्यक्तिगत भिन्नता का अर्थ (Meaning of Individual Difference)
भिन्नता प्रकृति का नियम है। इस दुनिया में कोई भी दो प्राणी पूरी तरह एक जैसे नहीं हो सकते, चाहे वे मनुष्य हों या कोई अन्य प्राणी। अलग-अलग व्यक्तियों में पाई जाने वाली भिन्नता को ही व्यक्तिगत भिन्नता कहा जाता है।
व्यक्तिगत भिन्नता की परिभाषा (Definition of Individual Difference)
- स्किनर के अनुसार : व्यक्तित्व के वे सभी पहलू जिनका मूल्यांकन किया जा सकता है व्यक्तिगत भिन्नताओं के अंतर्गत आते हैं।
- जेम्स ड्रेवर के अनुसार : कोई व्यक्ति अपने समूह से शारीरिक एवं मानसिक तौर पर जो भिन्नता रखता है, उसे व्यक्तिगत भिन्नता कहा जाता है।
- टायलर के अनुसार : शरीर के रंग-रूप, आकार-प्रकार, कार्य, गति, बुद्धि, ज्ञान, उपलब्धि, रुचि, अभिरुचि आदि लक्षणों में मौजूद भिन्नता को व्यक्तिगत भिन्नता कहते हैं।
व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार (The Basis of Individual Differences)
मनुष्य के अलावा सभी प्राणियों में केवल शारीरिक बनावट एवं शारीरिक क्षमता के आधार पर भिन्नताएँ पाई जाती हैं। लेकिन मनुष्य में व्यक्तिगत भिन्नताओं के कई आधार होते हैं। अपनी पुस्तक ‘साइकोलॉजी ऑफ ह्यूमन डिफरेंसेज’ में टायलर ने लिखा है, ‘‘एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से अंतर एक सार्वभौमिक घटना जान पड़ती है।’’ व्यक्तिगत भिन्नताओं के अंतर का आधार भाषा, जाति, लिंग, समुदाय, धर्म आदि की विविधता हो सकती है।
मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तिगत भिन्नताओं को निम्नलिखित आधार पर वर्गीकृत किया है-
- जाति के आधार पर : समाज में जाति एवं नस्ल संबंधित भिन्नताएँ पाई जाती हैं। विभिन्न जातियों के रहन-सहन, खान-पान तथा उनकी संस्कृति आदि में अंतर होता है। कोई जाति विद्या अर्जन के लिये प्रसिद्ध होती है तो किसी को युद्ध लड़ने के लिये जाना जाता है।
- धर्म के आधार पर : धर्म व्यक्ति के नैतिक मूल्यों एवं आचरण को निर्धारित करता है। संसार में अनेक धर्म हैं जिनके रहन-सहन, खान-पान, आचार-व्यवहार तथा उनकी मान्यताओं में अंतर होता है। यही अंतर व्यक्ति की भिन्नता को दर्शाता है।
- अभिवृत्ति के आधार पर : किसी भी दो व्यक्ति की अभिवृत्ति एक समान नहीं हो सकती। प्रत्येक व्यक्ति की अभिवृत्ति एवं रुचि अलग-अलग होती है।
- भाषा के आधार पर : प्रत्येक भाषा समुदाय की अपनी पहचान होती है चाहे वह अंचल के आधार पर हो अथवा राष्ट्र के आधार पर। दो भिन्न भाषाओं से जुड़े व्यक्तियों में भिन्नताएँ स्पष्ट हो जाती हैं।
- लिंग के आधार पर : आज किसी-न-किसी रूप में विश्व के प्रत्येक देश या क्षेत्र में नारियों को दोयम दर्जे पर रखा जाता है, जो न सिर्प रूढ़िवादिता के कारण है बल्कि अमानवीय भी है।
- समुदाय के आधार पर : आज पूरी दुनिया छोटे-छोटे और बड़े-बड़े कितने ही समुदायों में विभक्त है। पश्चिमी देशों के लोग स्वयं को पूर्वी लोगों की तुलना में श्रेष्ठ मानते हैं।
- विश्वसनीयता (Credibility) : शिक्षक किसी विद्यार्थी की उत्तर-पुस्तिका की जाँच करता है और जाँच के बाद अंक देता है तो यदि उसी उत्तर-पुस्तिका की पुन: कितनी ही बार जाँच क्यों न की जाए, पहले आए अंकों में और दुबारा दिये गए अकों में अधिक अंतर नहीं होना चाहिये।
- वैधता (Validity) : इसके अंतर्गत दो विशेषताओं को शामिल किया गया है-
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- मूल्यांकन पत्र निर्धारित किये गए पाठ्यक्रमों के आधार पर ही बनाया जाना चाहिये।
- परीक्षा जिस विषय की हो, उससे संबंधित प्रश्न ही पूछे जाने चाहिये।
- विभेदीकरण (Differentiation) : मूल्यांकन पत्र (पेपर) का निर्माण करते समय यह ध्यान रखा जाए कि पेपर तीनों स्तरों (प्रतिभाशाली, औसत, मंदबुद्धि) के विद्यार्थियों के अनूकल हों। साथ ही विद्यार्थियों को मूल्यांकन प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी होनी चाहिये यानी मूल्यांकन में न्याय संगतता की विशेषता भी होनी चाहिये।
- समग्रता (Totality) : प्रश्न-पत्र के लिये जो भी पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है, उसके संपूर्ण भागों से प्रश्नों को सम्मिलित किया जाना चाहिये। तभी विद्यार्थियों की मानसिक एवं बौद्धिक योग्यता का पता लगाया जा सकता है।
- उद्देश्यनिष्ठता (Purposefulness) : प्रश्न-पत्र तैयार करते समय निश्चित उद्देश्यों का ध्यान रखना चाहिये, जिससे कि विद्यार्थी और प्रश्न-पत्र तैयार करने वाली टीम/संस्था दोनों ही अपने-अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर सकें। उदाहरण- CTET के पेपर से विद्यार्थी शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करके अपने उद्देश्यों को पूरा करता है, दूसरी और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड शिक्षक पात्रता परीक्षा हेतु कुशल विद्यार्थियों का चयन करके अपना उद्देश्य पूरा करता है।
- वस्तुनिष्ठता (Objectivity)
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- प्रश्न-पत्र में बहुवैकल्पिक तथा वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को शामिल किया जाना चाहिये।
- उत्तर-पुस्तिका की जाँच करते समय शिक्षक के व्यक्तिगत संवेगों व पूर्वाग्रह का प्रभाव विद्यार्थियों की उत्तर-पुस्तिका पर नहीं पड़ना चाहिये।
- मानकता (Standardization) : प्रश्न-पत्र एक निश्चित मानक पर आधारित हो। जैसे- उत्तीर्ण (पास) होने के लिये 33% अंकों की तथा प्रथम श्रेणी के लिये 60% अंकों की अनिवार्यता।
- व्यावहारिकता (Practicality) : मूल्यांकन प्रक्रिया सुविधाजनक व व्यावहारिक होनी चाहिये। प्रश्न-पत्र ऐसे हों, जिनमें समय व धन की बचत हो, साथ ही प्रश्न-पत्र की गुणवत्ता (कागज़ स्वरूप) का भी ध्यान रखा जाए। इस प्रकार मूल्यांकन में मितव्ययिता को भी महत्त्व देना चाहिये।
शिक्षण प्रक्रिया में अधिगम अर्थात् सीखने की तुलना में अधिगम की परिस्थितियाँ अधिक उपयोगी हैं। रॉबर्ट गेने ने अपनी पुस्तक ‘The Conditions of Learning’ में अधिगम की निम्न आठ दशाओं/भेदों के बारे में लिखा है। ये दशाएँ कठिनाइयों के स्तर के क्रम में रखी गई हैं। ऊपर से नीचे जाने पर कठिनाइयों का स्तर बढ़ता जाता है।
- संकेत अधिगम (Signal Learning) : यह पावलव की शास्त्रीय अनुबंध क्रिया पर आधारित है। इसके अंतर्गत संकेत मात्र से ही अधिगम कराया जाता है। इसमें प्राणी एक संकेत के प्रति उद्दीपक प्रतिक्रियाएँ करना सीखता है।
- उद्दीपन-अनुक्रिया अधिगम (Stimulus-Response Learning) : यह थार्नडाइक के ‘संबंधवाद’ तथा स्किनर के ‘सक्रिय अधिगम’ का रूप है। गेने ने इस अधिगम के अंतर्गत थार्नडाइक के ‘प्रयास एवं भूल अधिगम’ तथा स्किनर के ‘कार्य अनुबंधन अधिगम’ को रखा है।
- शृंखला अधिगम (Chain Learning) : इस अधिगम में दो या दो से अधिक उद्दीपन-अनुक्रियाएँ आपसी समन्वय से एक शृंखला अधिगम का निर्माण करती हैं।
- शाब्दिक साहचर्य अधिगम (Verbal Association Learning) : यह शृंखला अधिगम का ही एक प्रकार है। जब यह शृंखला शाब्दिक अभिव्यक्ति से संबंधित हो जाती है तो उसे शाब्दिक साहचर्य अधिगम कहते हैं, जैसे- शब्दावली सीखना, कहानी याद करना इत्यादि इस अधिगम के उदाहरण हैं।
- विभेदन अधिगम (Discrimination Learning) : विभेदन अधिगम के अंतर्गत विद्यार्थी भिन्न-भिन्न उद्दीपनों के प्रति अनुकूलन से भिन्न-भिन्न स्पष्ट अनुक्रिया करना सीख जाता है। एक जैसे दिखने वाले उद्दीपनों में विभेद करने की क्षमता आ जाती है और बच्चा विभेदी उद्दीपन के अनुरूप अनुक्रिया करने में समर्थ हो जाता है, जैसे- बालक पुटबॉल और हॉकी में अंतर करना सीख जाता है।
- संप्रत्यय अधिगम (Concept Learning) : जो अधिगम व्यक्ति में किसी वस्तु या घटना को एक वर्ग के रूप में अनुक्रिया करना संभव बनाते हैं, उन्हें ‘संप्रत्यय अधिगम’ कहते हैं। सर्वप्रथम केंडलर ने इसका उल्लेख किया था।
- नियम अधिगम (Rule Learning) : नियम अथवा सिद्धांत अधिगम में विद्यार्थियों द्वारा विचारों का संयोजन किया जाता है। इस अधिगम में दो या अधिक संप्रत्ययों को शृंखलाबद्ध किया जाता है, जिससे एक नियम की संकल्पना का निर्माण होता है, जैसे- ‘पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है।’
- समस्या-समाधान अधिगम (Problem Solving Learning) : समस्या-समाधान अधिगम में नियम अधिगम का ही प्राकृतिक विस्तार होता है। नियम अधिगम के साथ-साथ विद्यार्थियों को अपनी मौलिकता का भी प्रयोग करना पड़ता है। इस प्रकार विद्यार्थी समस्या के समाधान तक पहुँचते हैं। इस अधिगम में चिंतन की सामग्री निहित होती है।
भारत ने हमेशा से उच्चतर शिक्षा को महत्त्व दिया है। प्राचीन भारत में विकसित हुई शिक्षा को वैदिक प्रणाली के रूप में जाना जाता है। इनका मुख्य लक्ष्य आत्मज्ञान की प्राप्ति थी, ताकि सांसारिक बंधनों से परे किसी अमूर्त सत्ता का सान्निध्य प्राप्त कर सकें।
भारत में उच्चतर शिक्षा के विकास का क्रम :
- दुनिया का प्रथम विश्वविद्यालय 700 ई.पू. में तक्षशिला में स्थापित किया गया था। नालंदा महाविद्यालय की स्थापना चौथी शताब्दी में हुई थी।
- गुरुकुल शिक्षा प्रणाली ने अध्यापक केंद्रित प्रणाली स्थापित की, जिसमें विद्यार्थियों को कठोर अनुशासन और अपने शिक्षक के प्रति कुछ दायित्वों के अधीन रहना होता था।
- वर्तमान विश्वविद्यालय प्रणाली की शुरुआत औपनिवेशिक भारत से होती है। भारत में अंग्रेज़ी उच्चतर शिक्षण संस्थान की शुरुआत कलकत्ता में सन् 1817 में स्थापित हिंदू कॉलेज की स्थापना के साथ शुरू हुई। भारत में यूरोपीय शैली पर आधारित यह पहला शिक्षण संस्थान था।
- सन् 1823 के माउंटस्टुआर्ट एलिफिंस्टन व 1835 के लॉर्ड मैकाले की रिपोर्ट में वर्तमान भारतीय उच्चतर शिक्षण संस्थानों की जडे़ं मिलती हैं। इन रिपोर्टों में सुझाव था कि भारत में यूरोपीय साहित्य व विज्ञान की पढ़ाई के लिये उच्च शिक्षण संस्थानों की शुरुआत हो और शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेज़ी का उपयोग किया जाए।
- लंदन विश्वविद्यालय के आधार पर भारत में विश्वविद्यालय स्थापित करने का विचार 1854 में आए चार्ल्स वुड डिस्पैच में किया गया, जिसे भारत में अंग्रेज़ी शिक्षा का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है। इसके तहत कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में 1857 में विश्वविद्यालय स्थापित किये गए।
- सन् 1943 तक भारत में विश्वविद्यालयों की संख्या 12 और कॉलेजों की संख्या 75 थी। सन् 1944 की सार्जेंट रिपोर्ट भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाने के संदर्भ में पहला प्रयास थी।
- वर्ष 1950 में भारत में 20 विश्वविद्यालय थे, जिसमें विद्यार्थियों की संख्या लगभग 2 लाख थी।
- औपनिवेशिक भारत में उच्चतर शिक्षा तक पहुँच केवल शहरी उच्च वर्ग के पुरुषों के पास थी, जिसमें ऊँची जातियों के पुरुषों की संख्या अधिक थी जबकि महिलाओं की संख्या भी बहुत कम थी। इस तरह से बडे़ शहरों तक सीमित उच्चतर शिक्षा व्यवस्था से शहर, कस्बे, गाँव और अनुसूचित जाति, जनजाति से संबंधित लोग बिल्कुल अनभिज्ञ थे।
- सन् 1948 में सभी विश्वविद्यालयों के लिये अनुदान संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने व उनकी देख-रेख करने के लिये डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की गई।
आज भारत अपने समाज और बाहरी दुनिया को ध्यान में रखते हुए ज्ञान के नए क्षेत्रों का सृजन कर रहा है और उन्हें उच्चतर शिक्षा से जोड़ रहा है। इस प्रकार शुरुआत से लेकर अब तक की उच्चतर शिक्षा अपने स्वरूप में काफी बदल चुकी है। पाठ्यक्रम के अनुसार हम वर्तमान भारत में उच्चतर शिक्षा की संरचना और स्वरूप को समझने की कोशिश करेंगे।
सतत् प्रक्रिया (Continuous Process): शिक्षक द्वारा शिक्षण कार्य निरंतर कराया जाता है। अत: यह ज्ञात करने के लिये कि विद्यार्थियों को अधिगम अनुभव प्राप्त हुए हैं या नहीं, मूल्यांकन एक सतत् प्रक्रिया है।
- व्यापक प्रक्रिया (Comprehensive Process): व्यवहार की दृष्टि से देखें तो मूल्यांकन द्वारा विद्यार्थियों के व्यवहार के तीनों पक्षों-ज्ञानात्मक, भावनात्मक और क्रियात्मक में हुए परिवर्तनों का मूल्यांकन किया जाता है।
- सामाजिक प्रक्रिया (Social Process): शिक्षा के समस्त उद्देश्यों की प्राप्ति समाज की आकांक्षा, आदर्श एवं आवश्यकता के अनुरूप है या नहीं, यह ज्ञात करने के लिये मूल्यांकन एक आवश्यक प्रक्रिया है।
- उद्देश्यनिष्ठता (Purposefulness): पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति किस सीमा तक हो पाई है और जो उपलब्धि प्राप्त हुई है, उसका स्तर कैसा है? आगामी शिक्षण का स्वरूप इन्हीं परिणामों पर निर्भर करता है।
- निर्माणात्मक/रचनात्मक प्रक्रिया (Formative Process): मूल्यांकन ही शिक्षण विधियों, शिक्षक द्वारा निर्धारित किये गए उद्देश्यों की प्राप्ति व विद्यार्थियों द्वारा अधिगम की प्रभावशीलता आदि के विषय में हमें सही निर्णय लेने योग्य बनाता है। मूल्यांकन एक निर्माणात्मक प्रक्रिया है।
- विद्यार्थी केंद्रित (Student Centred): मूल्यांकन द्वारा ही यह ज्ञात करते हैं कि विद्यार्थियों में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के अपेक्षित व्यवहारगत परिवर्तन हुआ है या नहीं, इसलिये मूल्यांकन को विद्यार्थी केंद्रित माना जाता है।
- सहकारी/सहभागी निर्णय (Interactive Decision): पहले शिक्षक ही विद्यार्थी का मूल्यांकन करके कोई निर्णय लेता था, जो विश्वनीय नहीं था, किंतु अब मूल्यांकन प्रक्रिया में शिक्षक के अतिरिक्त विद्यार्थी के मित्र, अभिभावक व अन्य शिक्षकों को सम्मिलित किया जाता है। इस प्रकार विद्यार्थी के मूल्यांकन में उसके सभी पक्षों पर बातचीत करके ही अंतिम निर्णय लिया जाता है। यह प्रक्रिया पूर्वाग्रह से मुक्त होती है।
ई-शिक्षा से तात्पर्य अपने स्थान पर ही इंटरनेट व अन्य संचार उपकरणों की सहायता से प्राप्त की जाने वाली शिक्षा से है। इसके विभिन्न रूप हैं, जिसमें वेब आधारित लर्निंग, मोबाइल आधारित लर्निंग या कंप्यूटर आधारित लर्निंग और वर्चुअल क्लासरूम इत्यादि शामिल हैं। पिछले तीन दशकों में जीवन के हर क्षेत्र में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी सेवाओं का काफी विस्तार हुआ है। शिक्षा क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं है। प्राचीन गुरुकुल तथा आश्रम की वाचिक परंपरा से होते हुए शिक्षा ने अनेक सोपान तय किये हैं। इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में पठन-पाठन का समूचा परिदृश्य बहुत बदल चुका है।
- आज की स्कूली शिक्षा नवयुगीन साधनों तथा युक्तियों से सुसज्जित होती जा रही है। साधारण ब्लैकबोर्ड की जगह स्मार्टबोर्ड ने ले ली है तथा विविध प्रकार के मार्कर पेन ने चॉक का स्थान ले लिया है।
- इंगित करने के लिये इस्तेमाल होने वाली स्टिक का स्थान लेजर पॉइंटर ने ले लिया है। स्लाइड प्रोजेक्टर तथा एलसीडी प्रोजेक्टर अब हर कक्षा की अनिवार्य आवश्यकता बनते जा रहे हैं।
- शिक्षा में दृश्य-श्रव्य प्रणाली का प्रचलन उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। सुगम तथा बेहतर प्रस्तुतिकरण के लिये टच स्क्रीन वाले बोर्ड अब स्कूलों में इस्तेमाल किये जा रहे हैं। शिक्षण प्रणाली के तौर-तरीकों में बहुत तेजी से बदलाव हो रहा है और शिक्षा अब तेजी से ई-शिक्षा की ओर अग्रसर हो रही है।
ई-शिक्षा के प्रकार
- समकालिक (Synchronous) शैक्षिक व्यवस्था- इस शैक्षिक व्यवस्था से तात्पर्य है कि ‘एक ही समय में’ अर्थात् विद्यार्थी और शिक्षक अलग-अलग स्थानों से एक-दूसरे से शैक्षिक संवाद करते हैं। इस तरह से किसी विषय को सीखने पर विद्यार्थी अपने प्रश्नों का तत्काल उत्तर जान पाते हैं, जिससे उनके उस विषय से संबंधित संदेह भी दूर हो जाते हैं। इसलिये इसे रियल टाइम लर्निंग भी कहा जाता है। इस प्रकार की ई-लर्निंग व्यवस्था में कई ऑनलाइन उपकरण की मदद से विद्यार्थियों को स्टडी मटीरियल उपलब्ध कराया जाता है। समकालिक ई-शैक्षिक व्यवस्था के कुछ उदाहरणों में ऑडियो और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, लाइव चैट तथा वर्चुअल क्लासरूम आदि शामिल हैं। ये तरीके बीते कुछ वर्षो में अधिक लोकप्रिय हो गए हैं।
- असमकालिक (Asynchronous) शैक्षिक व्यवस्था- इस शैक्षिक व्यवस्था से तात्पर्य है कि ‘एक समय में नहीं’ अर्थात् यहाँ विद्यार्थी और शिक्षक के बीच वास्तविक समय में शैक्षिक संवाद करने का कोई विकल्प नहीं है। इस व्यवस्था में पाठ्यक्रम से संबंधित जानकरी पहले ही उपलब्ध होती है। उदाहरण के लिये वेब आधारित अध्ययन, जिसमें विद्यार्थी किसी ऑनलाइन कोर्स, ब्लॉग, वेबसाइट, वीडियो ट्युटोरिअल्स, ई-बुक्स इत्यादि की मदद से शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस तरह की ई-शैक्षिक व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह है कि विद्यार्थी किसी भी समय, जब चाहे तब शैक्षिक पाठ्यक्रमों को एक्सेस(पहुँच) कर सकते हैं। यही कारण है कि विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग असमकालिक शैक्षिक व्यवस्था के माध्यम से अपनी पढ़ाई करना पसंद करता है।
