हमारे बारे में
केंद्रीय परीक्षाएँ
राज्यस्तरीय परीक्षाएँ
ऑनलाइन कोर्सेज़
डेली कॉन्सेप्ट
क्विज
पुस्तकें
डाउनलोड्स
लॉग इन
भाषा: Eng हिंदी











प्रैक्टिस क्विज़




कॉन्सेप्ट कार्ड  

राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (NAAC)

    • राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद् (NAAC) भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता के मूल्यांकन एवं प्रत्यायन के लिए स्थापित एक स्वायत्त संस्था है। 
    • इसकी स्थापना 1994 में UGC के तत्वावधान में की गई तथा इसका मुख्यालय बेंगलुरु में स्थित है। 
    • NAAC का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, उत्कृष्टता तथा उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना है। 
    • यह विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों तथा अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन करता है। 
    • NAAC संस्थानों को निर्धारित मानकों के आधार पर प्रत्यायन (Accreditation) प्रदान करता है। 
    • इसका कार्य शिक्षण, अधिगम, अनुसंधान तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं की गुणवत्ता का परीक्षण करना है। 
    • यह संस्थानों में गुणवत्ता संस्कृति (Quality Culture) के विकास को प्रोत्साहित करता है। 
    • छात्रों, अभिभावकों तथा समाज को संस्थानों की गुणवत्ता संबंधी विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराता है। 
    • NAAC पाठ्यक्रम, शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया तथा मूल्यांकन प्रणाली की समीक्षा करता है। 
    • यह अनुसंधान, नवाचार तथा विस्तार गतिविधियों को भी मूल्यांकन का आधार बनाता है। 
    • संस्थान की आधारभूत संरचना तथा अधिगम संसाधनों का भी परीक्षण किया जाता है। 
    • छात्र सहायता, प्रगति तथा कल्याण संबंधी व्यवस्थाओं का मूल्यांकन किया जाता है। 
    • शासन, नेतृत्व एवं प्रबंधन की प्रभावशीलता को भी महत्वपूर्ण मानदंड माना जाता है। 
    • NAAC संस्थागत मूल्यों, नैतिकता तथा सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रोत्साहित करता है। 
    • प्रत्यायन प्रक्रिया संस्थानों को अपनी कमियों की पहचान करने में सहायता करती है। 
    • इससे संस्थानों की शैक्षणिक प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता में वृद्धि होती है। 
    • NAAC की ग्रेडिंग प्रणाली गुणवत्ता सुधार के लिए प्रतिस्पर्धी वातावरण तैयार करती है। 
    • यह राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में सहायक है। 
    • विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण संस्थानों के चयन में NAAC महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है। 
    • इसलिए NAAC भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में गुणवत्ता आश्वासन एवं सतत सुधार का प्रमुख संस्थागत तंत्र माना जाता है। 

कित्तूर विद्रोह (1824–1829) : कारण, घटनाक्रम एवं परिणाम

    • कित्तूरविद्रोह (Kittur Rebellion) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध दक्षिण भारत के प्रारम्भिक सशस्त्र प्रतिरोध आंदोलनों में से एक था। इसका नेतृत्व कित्तूर की रानी चेनम्मा (Rani Chennamma) ने किया। 
    • कित्तूरवर्तमान कर्नाटक के बेलगावी (Belagavi) जिले में स्थित एक छोटा लेकिन समृद्ध राज्य था। 
    • 1824में कित्तूर के शासक मल्लसर्जा देसाई (Mallasarja Desai) के उत्तराधिकारी शिवलिंग रुद्रसर्जा (Shivaling Rudrasarja) की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का विवाद उत्पन्न हुआ। 
    • मृत्यु से पूर्वशिवलिंगरुद्रसर्जा ने शिवलिंगप्पा (Shivalingappa) को दत्तक पुत्र एवं उत्तराधिकारी घोषित किया था। 
    • तत्कालीनधारवाड़के ब्रिटिश कलेक्टर सेंट जॉन थैकरे (St. John Thackeray) ने इस दत्तक उत्तराधिकार को स्वीकार करने से इंकार कर दिया तथा कित्तूर राज्य पर कंपनी का अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। 
      (ध्यान दें: यह घटना लॉर्ड डलहौज़ी के "Doctrine of Lapse" (1848) से पहले की है। अतः इसे व्यपगत सिद्धांत से नहीं जोड़ना चाहिए।) 
    • ब्रिटिश हस्तक्षेप के विरोध में23अक्टूबर 1824 को रानी चेनम्मा के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष प्रारम्भ हुआ। 
    • प्रारम्भिक युद्ध मेंकित्तूरकी सेना ने ब्रिटिश सेना को पराजित किया तथा सेंट जॉन थैकरे युद्ध में मारा गया। 
    • इसके बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बड़ी सैन्य शक्ति के साथकित्तूरपर पुनः आक्रमण किया। 
    • लंबी लड़ाई के बाददिसंबर 1824में रानी चेनम्मा को बंदी बना लिया गया तथा उन्हें बेलहोंगल (Bailhongal) किले में कैद कर दिया गया। 
    • 21फ़रवरी 1829 को बेलहोंगल किले में ही रानी चेनम्मा का निधन हुआ। 
    • रानीचेनम्माके बंदी बनाए जाने के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उनके सेनानायक संगोली रायन्ना (Sangolli Rayanna) ने गुरिल्ला युद्ध जारी रखा और शिवलिंगप्पा को वैध शासक बनाने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। 
    • 1830–1831के दौरान संगोली रायन्ना ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अनेक अभियान चलाए, किन्तु अंततः उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 
    • 26जनवरी 1831 को संगोली रायन्ना को फाँसी दे दी गई, जिसके साथ इस चरण का विद्रोह समाप्त हो गया। 
    • कित्तूरविद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारम्भिक संगठित प्रतिरोधों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यह विदेशी शासन के विरुद्ध स्वाधीनता, आत्मसम्मान तथा उत्तराधिकार के अधिकार की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। 
    • रानीचेनम्माएवं संगोली रायन्ना आज भी भारतीय इतिहास में साहस, नेतृत्व एवं देशभक्ति के प्रेरणास्रोत के रूप में स्मरण किए जाते हैं। 

विश्व बैंक

  • विश्व बैंक की स्थापना 1944 में अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (IBRD) के रूप में हुई थी। यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशेषीकृत एजेंसी है जिसका मुख्य उद्देश्य गरीबी घटाना और सतत समाधान अपनाकर साझा समृद्धि को बढ़ावा देना है।

    संरचना : पाँच प्रमुख स्तंभ   

    विश्व बैंक समूह पाँच संस्थानों की एक अनूठी साझेदारी है, जो मिलकर कार्य करते हैं: 

    • IBRDInternational Bank for Reconstruction and Development मध्यम-आय वाले और ऋण-योग्य गरीब देशों को दीर्घकालिक ऋण और विश्लेषणात्मक सेवाएँ देता है 
    • IDAInternational Development Association दुनिया के सबसे गरीब देशों को ब्याज-मुक्त ऋण (क्रेडिट) और अनुदान प्रदान करता है। 
    • IFCInternational Finance Corporation विकासशील देशों में निजी क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहित करता है। 
    • MIGAMultilateral Investment Guarantee Agency निवेश को बढ़ावा देने के लिये राजनीतिक जोखिमों के खिलाफ बीमा उपलब्ध कराता है। 
    • ICSIDInternational Centre for Settlement of Investment Disputes निवेशक और राज्य के बीच विवादों का समाधान करता है। (नोट : भारत इसका सदस्य नहीं है।) 

    सदस्यता और वोटिंग अधिकार   

    विश्व बैंक के 189 सदस्य देश हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। वोटिंग अधिकार सदस्य देशों की शेयरधारिता पर निर्भर करते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ा एकल शेयरधारक है, जिसके पास 16.41% वोट हैं। 

    प्रमुख रिपोर्टें   

    विश्व बैंक कई प्रभावशाली रिपोर्टें प्रकाशित करता है जो वैश्विक विकास को ट्रैक करती हैं, जैसे: 

    • मानव पूंजी सूचकांक 
    • विश्व विकास रिपोर्ट (World Development Report) 
      (पहले यह Ease of Doing Business Report भी प्रकाशित करता था, जिसे अब बंद कर दिया गया है।) 

भारत की भाषाएँ एवं लिपियाँ

    • भारत भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता वाला देश है, जहाँ अनेक भाषाएँ एवं लिपियाँ प्रचलित हैं। 
    • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा, क्षेत्रीय भाषाओं तथा भाषा संबंधी प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। 
    • संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। 
    • संघ की राजभाषा हिन्दी (देवनागरी लिपि) है, जबकि अंग्रेज़ी का उपयोग राजकीय कार्यों में सहायक आधिकारिक भाषा के रूप में किया जाता है। 
    • भारत की अधिकांश भाषाएँ इंडो-आर्यन तथा द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित हैं, जबकि कुछ भाषाएँ ऑस्ट्रो-एशियाटिक तथा तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार से भी संबंधित हैं। 
    • हिन्दी, संस्कृत, मराठी और नेपाली मुख्यतः देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं। 
    • पंजाबी भाषा की प्रमुख लिपि गुरुमुखी है। 
    • गुजराती भाषा गुजराती लिपि में लिखी जाती है। 
    • बांग्ला और असमिया भाषाएँ क्रमशः बांग्ला एवं असमिया लिपि में लिखी जाती हैं। 
    • उड़िया (ओड़िया) भाषा ओड़िया लिपि का प्रयोग करती है। 
    • उर्दू भाषा फ़ारसी-अरबी (नस्तालीक़) लिपि में लिखी जाती है। 
    • तमिल भाषा तमिल लिपितेलुगु भाषा तेलुगु लिपिकन्नड़ भाषा कन्नड़ लिपि तथा मलयालम भाषा मलयालम लिपि में लिखी जाती हैं। 
    • कोंकणी भाषा विभिन्न क्षेत्रों में देवनागरी, रोमन, कन्नड़, मलयालम एवं फ़ारसी-अरबी लिपियों में भी लिखी जाती है, जबकि संविधान में इसकी मान्यता देवनागरी लिपि के साथ है। 
    • सिंधी भाषा भारत में मुख्यतः देवनागरी तथा फ़ारसी-अरबी दोनों लिपियों में लिखी जाती है। 
    • संथाली भाषा की प्रमुख लिपि ओल चिकी (Ol Chiki) है, जिसका विकास Raghunath Murmu ने किया। 
    • मैतेयी (मणिपुरी) भाषा की पारंपरिक लिपि मैतेयी मयेक (Meitei Mayek) है, यद्यपि लंबे समय तक बंगाली लिपि का भी प्रयोग किया गया। 
    • डोगरी, बोडो और मैथिली संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाएँ हैं तथा इनकी प्रमुख लिपियाँ क्रमशः देवनागरी, देवनागरी और देवनागरी हैं। 
    • भारत में भाषाई विविधता राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समृद्धि तथा साहित्यिक विकास का महत्वपूर्ण आधार है। 
    • संविधान सभी भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा विकास के प्रति प्रतिबद्ध है। 
    • इस प्रकार भारत की भाषाएँ एवं लिपियाँ देश की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक विविधता तथा राष्ट्रीय एकता का सशक्त प्रतीक हैं। 

विशेष आवश्यकता वाले बच्चे : शारीरिक एवं संवेदी दिव्यांगता

    • विशेष आवश्यकता वाले बच्चे (Childrenwith Special Needs – CWSN) वे बच्चे हैं जिन्हें शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक अथवा अन्य कारणों से शिक्षा एवं विकास के लिए अतिरिक्त सहायता एवं उपयुक्त सुविधाओं की आवश्यकता होती है। 
    • शारीरिक एवं संवेदीदिव्यांगता से प्रभावित बच्चों को समावेशी शिक्षा के अंतर्गत उनकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण, संसाधन एवं सहयोग प्रदान करना आवश्यक है। 

    1. शारीरिक दिव्यांगता (Physical Disability) 

    • शारीरिक दिव्यांगतासे आशय ऐसी स्थिति से है जिसमें बच्चे को शरीर के किसी अंग अथवा मांसपेशियों के संचालन, संतुलन अथवा गतिशीलता में कठिनाई होती है। 
    • ऐसे बच्चों को चलने-फिरने, बैठने, लिखने, सीढ़ियाँ चढ़ने अथवा दैनिक गतिविधियों के निष्पादन में कठिनाई हो सकती है।
    • शारीरिकदिव्यांगताजन्मजात, दुर्घटना, बीमारी अथवा तंत्रिका एवं मांसपेशीय विकारों के कारण हो सकती है। 
    • विद्यालय में इन बच्चों के लिएरैंप,रेलिंग, व्हीलचेयर-अनुकूल कक्षाएँ, उपयुक्त फर्नीचर तथा सहायक उपकरण उपलब्ध कराना आवश्यक है। 
    • शिक्षक को लचीली शिक्षण विधियों, अतिरिक्त समय तथा आवश्यकतानुसार वैकल्पिक मूल्यांकन की व्यवस्था करनी चाहिए।

    2. दृष्टि दिव्यांगता (Visual Impairment) 

    • दृष्टि दिव्यांगता वह स्थिति है जिसमें बच्चे की देखने की क्षमता आंशिक या पूर्ण रूप से प्रभावित होती है। 
    • दृष्टि दिव्यांगता को सामान्यतः पूर्ण दृष्टिबाधिता (Blindness) तथा अल्प दृष्टि (Low Vision) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। 
    • ऐसे बच्चों को पढ़ने, लिखने, चित्रों एवंआरेखोंको समझने तथा विद्यालय में सुरक्षित आवागमन में कठिनाई हो सकती है। 
    • इनके लिएब्रेल लिपि (Braille), ऑडियो पुस्तकें, स्क्रीन रीडर,आवर्धक (Magnifier), स्पर्श आधारित शिक्षण सामग्री तथा ओरिएंटेशन एवं मोबिलिटी प्रशिक्षण उपयोगी होते हैं। 

    3. श्रवण दिव्यांगता (Hearing Impairment) 

    • श्रवण दिव्यांगता वह स्थिति है जिसमें बच्चे की सुनने की क्षमता आंशिक अथवा पूर्ण रूप से प्रभावित होती है। 
    • ऐसे बच्चों को भाषा विकास, संचार, निर्देशों को समझने तथा कक्षा में सहभागिता करने में कठिनाई हो सकती है।
    • इनके लिए श्रवण यंत्र (HearingAid), कॉक्लियर इम्प्लांट (जहाँ उपयुक्त हो), सांकेतिक भाषा (Sign Language), दृश्य शिक्षण सामग्री तथा होंठों की गतिविधि पढ़ने (Lip Reading) जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। 
    • समावेशी समर्थन (Inclusive Support) 
    • समावेशी विद्यालयों में बच्चों की आवश्यकताओं के अनुसारसुगम (Accessible)एवं बाधा-रहित (Barrier-free) वातावरण विकसित किया जाना चाहिए। 
    • शिक्षक, अभिभावक, विशेष शिक्षक एवं समुदाय के सहयोग से प्रत्येक बच्चे को उसकी क्षमता के अनुरूप सीखने के अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
    • सहायक प्रौद्योगिकी (AssistiveTechnology), अनुकूलित शिक्षण सामग्री तथा सकारात्मककक्षागत वातावरण के माध्यम से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शैक्षणिक एवं सामाजिक सहभागिता को प्रभावी बनाया जा सकता है। 
    • समावेशी शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक बच्चे कोसमान अवसर, सम्मान, आत्मनिर्भरता तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षाप्रदान करना है। 





















Prepare Anytime,
Anywhere

Download Drishti Learning App


Prepare Anytime,
Anywhere

Download Drishti Learning App


drishti wishes