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पाठ्यचर्या: संकल्पना एवं सिद्धांत

  • पाठ्यचर्या (Curriculum) शिक्षा की संपूर्ण नियोजित प्रक्रिया को संदर्भित करती है। यह केवल विद्यालय में पढ़ाई जाने वाली विषय-वस्तु या पाठ्यक्रम (Syllabus) तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षार्थियों को प्रदान किए जाने वाले समस्त नियोजित अधिगम-अनुभवों को समाहित करती है। इसमें उद्देश्य, विषय-वस्तु, शिक्षण-अधिगम की विधियाँ, अधिगम-अनुभव तथा मूल्यांकन शामिल होते हैं।  

    • पाठ्यचर्या का प्रमुख उद्देश्य शिक्षार्थियों के समग्र विकास के लिए उपयुक्त अधिगम-अनुभवों का संगठन करना है। इसमें बौद्धिक विकास के साथ-साथ सामाजिक, भावात्मक, नैतिक, शारीरिक और सृजनात्मक विकास को भी महत्व दिया जाता है।  
    • जॉन ड्यूई (John Dewey) के प्रगतिशील शिक्षा-दृष्टिकोण में अनुभव और गतिविधि का विशेष महत्व है। उनके विचारों से प्रेरित पाठ्यचर्या में बालक के अनुभवों, रुचियों और सामाजिक जीवन से जुड़े गतिविधि-आधारित एवं अनुभवात्मक अधिगम को महत्व दिया जाता है।  
    • राल्फ टायलर (Ralph W. Tyler) ने पाठ्यचर्या विकास का एक उद्देश्य-केंद्रित तर्क प्रस्तुत किया। उनके मॉडल में चार प्रमुख प्रश्न हैं—कौन-से शैक्षिक उद्देश्यों को प्राप्त करना है, कौन-से अधिगम-अनुभव प्रदान किए जाएँ, उन्हें प्रभावी ढंग से कैसे व्यवस्थित किया जाए और उद्देश्यों की प्राप्ति का मूल्यांकन कैसे किया जाए।  
    • हिल्डा टाबा (Hilda Taba) ने पाठ्यचर्या विकास में शिक्षक की सक्रिय भूमिका पर बल दिया और Grassroots Approach प्रस्तुत किया। उनके अनुसार पाठ्यचर्या का विकास शिक्षकों एवं शिक्षार्थियों की वास्तविक आवश्यकताओं से शुरू होकर क्रमिक रूप से किया जाना चाहिए।  
    • लॉरेंस स्टेनहाउस (Lawrence Stenhouse) ने पाठ्यचर्या को केवल निर्धारित सामग्री के रूप में न देखकर एक प्रक्रिया (Process) के रूप में देखा। उन्होंने शिक्षक को पाठ्यचर्या के आलोचनात्मक परीक्षण और विकास में सक्रिय भूमिका निभाने वाला पेशेवर माना।  
    • पाठ्यचर्या के प्रमुख सिद्धांतों में उद्देश्यपरकता, शिक्षार्थी-केंद्रितता, अनुभवात्मकता, लचीलापन, निरंतरता, क्रमबद्धता, एकीकरण, प्रासंगिकता और सामाजिक उपयोगिता शामिल हैं। पाठ्यचर्या को शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं तथा समाज की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए।  
    • पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम में अंतर समझना महत्वपूर्ण है। पाठ्यक्रम (Syllabus) किसी विषय में पढ़ाई जाने वाली निर्धारित विषय-वस्तु की अपेक्षाकृत सीमित रूपरेखा है, जबकि पाठ्यचर्या व्यापक अवधारणा है, जिसमें समस्त नियोजित शैक्षिक अनुभव शामिल होते हैं।  
    • आधुनिक दृष्टिकोण में पाठ्यचर्या को एक गतिशील, लचीली और संदर्भ-सापेक्ष प्रक्रिया माना जाता है। इसमें समावेशन, बहुसांस्कृतिकता, तकनीकी परिवर्तन, कौशल विकास और 21वीं सदी की क्षमताओं को भी उचित स्थान दिया जाता है।  
    • निष्कर्षतः, पाठ्यचर्या शिक्षा के उद्देश्यों को व्यवहार में रूपांतरित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। प्रभावी पाठ्यचर्या वही है जो उद्देश्यों, विषय-वस्तु, अधिगम-अनुभव, शिक्षण-पद्धति और मूल्यांकन के बीच तार्किक एवं समन्वित संबंध स्थापित करते हुए शिक्षार्थी के समग्र विकास को बढ़ावा दे। 

समावेशी शिक्षा: संकल्पना, प्रमुख सिद्धांत एवं नीतियाँ

    •  समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) ऐसी शिक्षा-व्यवस्था है जिसमें दिव्यांग और गैर-दिव्यांग विद्यार्थी साथ सीखते हैं तथा शिक्षण-अधिगम की व्यवस्था विभिन्न विद्यार्थियों की सीखने की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित की जाती है। इसका आधार समानता, गैर-भेदभाव, सहभागिता, पहुँच और आवश्यक समर्थन है।  
    • समावेशीशिक्षा का केंद्र केवल विद्यार्थी को सामान्य कक्षा में प्रवेश देना नहीं है, बल्कि शैक्षिक वातावरण, पाठ्यचर्या, शिक्षण-पद्धति, मूल्यांकन और संसाधनों में आवश्यक अनुकूलन करके उसकी सार्थक सहभागिता और अधिगम सुनिश्चित करना है। इस दृष्टिकोण में विविधता को शिक्षा-व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है। 
    • समावेशीशिक्षा के प्रमुख सिद्धांतों में समान अवसर, समानता एवं गैर-भेदभाव, सहभागिता, अभिगम्यता (Accessibility), उचित समायोजन (Reasonable Accommodation), व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप समर्थन और सामाजिक समावेशन प्रमुख हैं। उद्देश्य यह है कि शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, सीखने संबंधी या अन्य आवश्यकताओं के कारण कोई विद्यार्थी शिक्षा से वंचित न हो। 
    • अभिगम्यतासमावेशी शिक्षा का महत्त्वपूर्ण आधार है। इसमें विद्यालय की इमारत, परिसर, शिक्षण-सामग्री और संचार के माध्यमों को विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के अनुरूप सुलभ बनाना शामिल है। आवश्यकतानुसार Braille, Sign Language, सहायक उपकरण तथा उपयुक्त तकनीकी साधनों का उपयोग किया जा सकता है।  
    • Rights of Persons with Disabilities Act, 2016में समावेशी शिक्षा को स्पष्ट कानूनी आधार दिया गया है। इसके अंतर्गत शैक्षिक संस्थानों से दिव्यांग बच्चों को बिना भेदभाव प्रवेश देने, समान शैक्षिक एवं सह-पाठ्यचर्या अवसर प्रदान करने, अभिगम्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने और आवश्यक reasonable accommodation तथा individualized support देने की अपेक्षा की गई है।  
    • इसीअधिनियम के अंतर्गत समावेशी शिक्षा को सुगम बनाने के लिए शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों की स्थापना, प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति, resource centres, सहायक संचार माध्यम, Braille और Sign Language, उपयुक्त शिक्षण-सामग्री तथा assistive devices जैसी व्यवस्थाओं पर बल दिया गया है। पाठ्यचर्या और परीक्षा-व्यवस्था में आवश्यक संशोधन, जैसे अतिरिक्त समय और scribe की सुविधा, भी निर्धारित प्रावधानों में शामिल हैं।  
    • राष्ट्रीयशिक्षा नीति 2020 शिक्षा में समानता और समावेशन को महत्त्व देती है तथा सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूहों और दिव्यांग विद्यार्थियों की भागीदारी पर विशेष बल देती है। इसमें सहायक उपकरण, उपयुक्त तकनीक, सुलभ प्रारूपों में शिक्षण-सामग्री, Indian Sign Language तथा विशेष शिक्षकों की उपलब्धता जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है। 
    • समावेशीशिक्षा में Universal Design for Learning (UDL) की दृष्टि विविध शिक्षार्थियों के लिए सीखने के अवसरों को अधिक सुलभ और लचीला बनाने से संबंधित है। उपयुक्त तकनीक, लचीली पाठ्यचर्या और विभिन्न प्रकार की शिक्षण-सामग्री विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं के अनुरूप अधिगम को समर्थन दे सकती हैं।  
    • इसप्रकार समावेशी शिक्षा का मूल उद्देश्य समान शैक्षिक अवसर, पूर्ण सहभागिता, अभिगम्यता, आवश्यक समर्थन और भेदभाव-मुक्त अधिगम वातावरण सुनिश्चित करना है, ताकि विविध क्षमताओं और आवश्यकताओं वाले विद्यार्थी शिक्षा-व्यवस्था में प्रभावी रूप से भाग ले सकें।  

द्वैताद्वैतवाद

  • श्री निम्बार्काचार्य का समय अनिर्णीत है। निम्बार्क संप्रदाय में इन्हें सृष्टि के आदि में उत्पन्न माना जाता है, किंतु डॉ. भंडारकर ने इनका समय 1162 ई. के आसपास निर्धारित किया है। कुछ विद्वान इस संप्रदाय को वैष्णव भक्ति का प्राचीनतम संप्रदाय मानते हैं। श्री निम्बार्क का संप्रदाय सनकादि या हंस संप्रदाय के अंतर्गत आता है। 

    निम्बार्काचार्य रामानुजाचार्य के समकालीन थे। इनका मानना था कि भक्ति कृपास्वरूप प्राप्त की जा सकती है। 

    इस संप्रदाय का दार्शनिक सिद्धांत ‘भेदाभेदवाद’ या ‘द्वैताद्वैतवाद’ है। जीव अवस्था-भेद से ब्रह्म के साथ भिन्न भी है तथा अभिन्न भी है। जीव ब्रह्म का अंश है और ब्रह्म अंशी है। जीव अणु तथा अल्पज्ञ है। भक्ति ही मुक्ति का साधन है। विष्णु के अवतार रूप कृष्ण ही उपास्य हैं। 

    ब्रह्म और जीव सांसारिक दृष्टि से भिन्न हैं, परंतु तत्त्वतः एक हैं। अपनी अंतिम परिणति में ये एक हो जाते हैं, जैसे कृष्ण और गोपियाँ। प्रलय के समय भी ये एक हो जाते हैं। 

    निम्बार्काचार्य ने राधा और कृष्ण की युगल उपासना पर बल दिया। विष्णु कृष्ण के रूप में तथा उनकी शक्ति राधा के रूप में आराध्य बने। कृष्ण, विष्णु के अवतार हैं। 

    ब्रजमंडल में इस संप्रदाय का प्रचार है और इसके अंतर्गत श्रीकृष्ण की अनेक लीलाओं के माध्यम से भक्ति-भाव की अभिव्यक्ति की जाती है। निम्बार्क संप्रदाय के अनेक कवियों ने ब्रजभाषा में सुंदर पदों की रचना की है।

शिक्षा और अर्थव्यवस्था का पारस्परिक संबंध

  • शिक्षा में अर्थशास्त्र का आशय शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्ध सीमित संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, लागत, वित्तपोषण, निवेश और उससे प्राप्त आर्थिक एवं सामाजिक लाभों के अध्ययन से है। यह शिक्षा को एक आर्थिक गतिविधि तथा मानव पूंजी के निर्माण की प्रक्रिया के रूप में समझने में सहायता करता है।  

    • शिक्षा के क्षेत्र में संसाधन जैसे धन, शिक्षक, भवन, शिक्षण-सामग्री, समय और तकनीकी साधन सीमित होते हैं, जबकि शैक्षिक आवश्यकताएँ व्यापक होती हैं। इसलिए उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग शिक्षा के अर्थशास्त्र का महत्वपूर्ण विषय है।  
    • शिक्षा पर किया गया व्यय केवल वर्तमान उपभोग नहीं माना जाता, बल्कि इसे मानव पूंजी में निवेश के रूप में भी देखा जाता है। शिक्षा व्यक्ति के ज्ञान, कौशल, उत्पादकता और रोजगार-क्षमता में वृद्धि कर सकती है, जिससे दीर्घकाल में व्यक्तिगत आय तथा आर्थिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।  
    • थियोडोर डब्ल्यू. शुल्त्स (Theodore W. Schultz) और गैरी बेकर (Gary S. Becker) के मानव पूंजी संबंधी कार्यों ने शिक्षा को आर्थिक विकास और उत्पादकता से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मानव पूंजी दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा एवं प्रशिक्षण व्यक्ति की उत्पादक क्षमताओं को बढ़ाने वाले निवेश हैं।  
    • शिक्षा के अर्थशास्त्र में लागत-लाभ विश्लेषण (Cost-Benefit Analysis) तथा लागत-प्रभावशीलता विश्लेषण (Cost-Effectiveness Analysis) जैसी अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हैं। इनके माध्यम से विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रमों में संसाधनों के उपयोग और उनके परिणामों का तुलनात्मक मूल्यांकन किया जा सकता है।  
    • शिक्षा का आर्थिक आधार शैक्षिक वित्त (Educational Finance) से भी संबंधित है। इसमें शिक्षा के लिए संसाधनों की व्यवस्था, सार्वजनिक एवं निजी वित्तपोषण, बजट आवंटन और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण का अध्ययन किया जाता है।  
    • शिक्षा में अर्थशास्त्र समानता और दक्षता के बीच संतुलन पर भी विचार करता है। केवल अधिक व्यय करना पर्याप्त नहीं है; संसाधनों का प्रभावी उपयोग करते हुए विभिन्न सामाजिक समूहों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की समान पहुँच सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।  
    • शिक्षा के आर्थिक प्रभावों के साथ-साथ इसके गैर-मौद्रिक लाभ भी होते हैं, जैसे बेहतर स्वास्थ्य, सामाजिक सहभागिता, नागरिक चेतना, लैंगिक समानता और जीवन-गुणवत्ता में सुधार।  
    • निष्कर्षतः, शिक्षा का अर्थशास्त्र शिक्षा में संसाधनों के कुशल उपयोग, वित्तपोषण, लागत, मानव पूंजी निर्माण और शिक्षा से प्राप्त निजी एवं सामाजिक प्रतिफलों का अध्ययन करता है। यह शिक्षा संबंधी नीतियों और संसाधन-वितरण के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। 

शिक्षा के विकास में पाश्चात्य दार्शनिक विचारधाराओं की भूमिका

    • पाश्चात्य दार्शनिक विचारधाराओं ने शिक्षा के उद्देश्यों, पाठ्यचर्या, शिक्षण-पद्धतियों, अनुशासन तथा शिक्षक-शिक्षार्थी संबंधों के विकास को व्यापक रूप से प्रभावित किया। प्रमुख विचारधाराओं में आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, यथार्थवाद, प्रयोजनवाद और अस्तित्ववाद शामिल हैं।  
    • आदर्शवाद (Idealism) शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति के आत्मिक एवं नैतिक विकास तथा सत्य, शिव और सुंदर जैसे उच्च मूल्यों की प्राप्ति मानता है। प्लेटो के अनुसार शिक्षा व्यक्ति को सत्य एवं न्याय की समझ विकसित करने में सहायता करती है। आदर्शवाद में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका, मूल्य-आधारित शिक्षा और बौद्धिक विकास पर बल दिया जाता है।  
    • प्रकृतिवाद (Naturalism) ने शिक्षा को बालक की प्रकृति, रुचि, क्षमता और विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने पर बल दिया। ज्याँ-जाक रूसो ने बालक-केंद्रित शिक्षा तथा प्रकृति के अनुरूप विकास का समर्थन किया। इस विचारधारा ने प्राकृतिक विकास, स्वतंत्रता और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व दिया।  
    • यथार्थवाद (Realism) ने शिक्षा में वास्तविक जगत, वस्तुनिष्ठ ज्ञान और इंद्रिय-अनुभव को महत्व दिया। इसने शिक्षा को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ने तथा विज्ञान, गणित और व्यावहारिक विषयों के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। अरस्तू की अनुभव एवं अवलोकन-आधारित ज्ञान परंपरा को यथार्थवादी चिंतन की महत्वपूर्ण आधारभूमि माना जाता है।  
    • प्रयोजनवाद (Pragmatism) ने शिक्षा को जीवन और अनुभव से जोड़ते हुए करके सीखने (Learning by Doing), समस्या-समाधान और लोकतांत्रिक सहभागिता पर बल दिया। जॉन ड्यूई ने शिक्षा को सामाजिक प्रक्रिया माना और विद्यालय को लोकतांत्रिक समाज का लघु रूप समझा। इससे बालक-केंद्रित एवं गतिविधि-आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिला।  
    • अस्तित्ववाद (Existentialism) व्यक्ति की स्वतंत्रता, चुनाव, उत्तरदायित्व और प्रामाणिक अस्तित्व पर बल देता है। शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं निर्णय लेने, अपने मूल्यों को समझने और अपने जीवन के अर्थ की खोज करने में सक्षम बनाना माना जाता है। ज्याँ-पॉल सार्त्र और कीर्केगार्द जैसे विचारकों का अस्तित्ववादी चिंतन महत्वपूर्ण है।  
    • पाश्चात्य विचारधाराओं ने आधुनिक शिक्षा में बाल-केंद्रितता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, अनुभवात्मक अधिगम, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों, आलोचनात्मक चिंतन और व्यावहारिक शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।  
    • इस प्रकार पाश्चात्य दर्शन ने शिक्षा को पारंपरिक ज्ञान-प्रदान की सीमाओं से आगे बढ़ाकर व्यक्ति, अनुभव, समाज, प्रकृति, तर्क, स्वतंत्रता और व्यावहारिक जीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 





















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