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गार्डनर का बहु-बुद्धि सिद्धांत

    •  गार्डनर का बहु-बुद्धि सिद्धांत अमेरिकी मनोवैज्ञानिक Howard Gardner द्वारा 1983 में प्रतिपादित किया गया था। 
    • इससिद्धांत के अनुसार बुद्धि एक एकल क्षमता नहीं है, बल्कि विभिन्न प्रकार की स्वतंत्र बुद्धियों का समूह है। 
    • गार्डनरने माना कि प्रत्येक व्यक्ति में बुद्धियों का एक विशिष्ट संयोजन पाया जाता है। 
    • यहसिद्धांत व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझने और उनका सम्मान करने पर बल देता है। 
    • प्रारंभमें गार्डनर ने सात प्रकार की बुद्धियों का उल्लेख किया, बाद में उनकी संख्या बढ़ाकर आठ तथा फिर नौ मानी गई। 
    • भाषिकबुद्धि (Linguistic Intelligence) – भाषा का प्रभावी उपयोग, लेखन, वाचन एवं संप्रेषण की क्षमता। 
    • तार्किक-गणितीयबुद्धि (Logical-Mathematical Intelligence) – तर्क करने, गणना करने तथा समस्याओं को हल करने की क्षमता। 
    • दृश्य-स्थानिकबुद्धि (Visual-Spatial Intelligence) – चित्रों, आकृतियों और स्थानिक संबंधों को समझने की क्षमता। 
    • संगीतात्मकबुद्धि (Musical Intelligence) – संगीत, लय, स्वर और धुनों को पहचानने तथा सृजित करने की क्षमता। 
    • शारीरिक-गतिजबुद्धि (Bodily-Kinesthetic Intelligence) – शरीर की गतिविधियों का कुशल उपयोग करने की क्षमता। 
    • अंतरवैयक्तिकबुद्धि (Interpersonal Intelligence) – दूसरों की भावनाओं, विचारों और व्यवहार को समझने की क्षमता। 
    • अंतर्वैयक्तिकबुद्धि (Intrapersonal Intelligence) – स्वयं को समझने, आत्म-जागरूकता और आत्म-नियंत्रण की क्षमता। 
    • प्राकृतिकबुद्धि (Naturalistic Intelligence) – प्रकृति, पौधों, जीव-जंतुओं तथा पर्यावरण को समझने की क्षमता। 
    • अस्तित्ववादीबुद्धि (Existential Intelligence) – जीवन, मृत्यु, अस्तित्व और ब्रह्मांड से जुड़े गहन प्रश्नों पर चिंतन करने की क्षमता। 
    • यहसिद्धांत बताता है कि सभी विद्यार्थी समान प्रकार से नहीं सीखते हैं। 
    • शिक्षकोंको विविध शिक्षण विधियों का प्रयोग कर प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता का विकास करना चाहिए। 
    • यहसिद्धांत समावेशी शिक्षा, बाल-केंद्रित शिक्षण और विभेदित अधिगम को बढ़ावा देता है। 
    • बहु-बुद्धिसिद्धांत विद्यार्थियों की छिपी हुई प्रतिभाओं को पहचानने में सहायता करता है। 
    • आधुनिकशिक्षा में यह सिद्धांत समग्र विकास और कौशल-आधारित अधिगम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 

नागरिकता का मार्क्सवादी सिद्धांत

    • नागरिकता का मार्क्सवादी सिद्धांत समाजराज्यवर्ग संघर्ष तथा आर्थिक संरचना के आधार पर नागरिकता की व्याख्या करता है 
    • यह सिद्धांत मुख्यतः Karl Marx तथा Friedrich Engels के विचारों पर आधारित है। 
    • मार्क्सवाद के अनुसार समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष (Class Struggle) का इतिहास है। 
    • समाज मुख्य रूप से शोषक और शोषित वर्गों में विभाजित रहता है। 
    • पूंजीवादी व्यवस्था में नागरिकता की अवधारणा वास्तविक समानता प्रदान नहीं करती, बल्कि आर्थिक असमानताओं को छिपाती है। 
    • मार्क्सवादी विचारकों के अनुसार उदारवादी नागरिकता केवल औपचारिक या कानूनी समानता प्रदान करती है। 
    • कानून के समक्ष समानता होने के बावजूद आर्थिक संसाधनों में भारी असमानता बनी रहती है। 
    • इस कारण गरीब और श्रमिक वर्ग अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाते। 
    • मार्क्सवाद के अनुसार राज्य एक वर्गीय संस्था है, जो प्रायः शासक वर्ग के हितों की रक्षा करता है। 
    • इसलिए नागरिकता को केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं किया जा सकता। 
    • नागरिकता का वास्तविक अर्थ आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समानता की स्थापना से जुड़ा है। 
    • मार्क्सवादी दृष्टिकोण में कार्य का अधिकार, शिक्षा का अधिकार तथा सामाजिक सुरक्षा का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। 
    • यह सिद्धांत उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व की आलोचना करता है। 
    • मार्क्सवाद आर्थिक शोषण को समाप्त कर वर्गविहीन समाज (Classless Society) की स्थापना का समर्थन करता है। 
    • वर्गविहीन समाज में सभी व्यक्तियों को समान अवसर और संसाधन उपलब्ध होंगे। 
    • मार्क्सवादी नागरिकता सामूहिक हितों और सामाजिक न्याय पर आधारित होती है। 
    • इस सिद्धांत के अनुसार वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है जब आर्थिक असमानता समाप्त हो। 
    • नागरिकता केवल अधिकारों का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से भी जुड़ी होती है। 
    • मार्क्सवादी विचारधारा सामाजिक कल्याण, श्रमिक अधिकारों तथा आर्थिक न्याय पर विशेष बल देती है। 
    • आधुनिक कल्याणकारी राज्य की कई नीतियों पर मार्क्सवादी विचारों का अप्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है। 
    • इसलिए नागरिकता का मार्क्सवादी सिद्धांत समानता, सामाजिक न्याय और आर्थिक मुक्ति पर आधारित नागरिकता की अवधारणा प्रस्तुत करता है। 

विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप मानव आवासों के प्रकार

  • मानव अपने निवास स्थान का निर्माण स्थानीय जलवायुभू-आकृतिउपलब्ध संसाधनों तथा जीवन-शैली के अनुसार करता है। इसी कारण विभिन्न क्षेत्रों में आवासों के स्वरूप में विविधता देखने को मिलती है।  

    पत्थर और लकड़ी से बने घर 

    • ये घर पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ पर्याप्त वर्षा एवं हिमपात होता है।  
    • हिमाचल प्रदेश के मनाली तथा कश्मीर घाटी में ऐसे घर अधिक प्रचलित हैं।  
    • इनका निर्माण पत्थर एवं लकड़ी से किया जाता है तथा छतें ढलानदार होती हैं, जिससे वर्षा और बर्फ आसानी से नीचे गिर सके।  
    • कश्मीर के पारंपरिक घरों में लकड़ी की सुंदर नक्काशी तथा विशेष प्रकार की खिड़कियाँ देखने को मिलती हैं।  

    हाउसबोट (Houseboat) 

    • हाउसबोट जल पर तैरने वाले आवास हैं, जिनका निर्माण मुख्यतः लकड़ी से किया जाता है।  
    • ये कश्मीर की डल झील तथा केरल के बैकवाटर्स में प्रसिद्ध हैं।  
    • इन पर आकर्षक लकड़ी की नक्काशी की जाती है और इन्हें पर्यटन की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है।  

    ऊँची इमारतें 

    • महानगरों और बड़े शहरों में भूमि की कमी के कारण बहुमंजिला इमारतों का निर्माण किया जाता है।  
    • ये ईंट, सीमेंट, स्टील और कंक्रीट जैसी मजबूत सामग्रियों से बनाई जाती हैं।  
    • इनमें बड़ी संख्या में लोगों के रहने की व्यवस्था होती है।  

    डोंगा 

    • डोंगा नावनुमा आवास हैं जो कश्मीर की डल झील में पाए जाते हैं।  
    • इनका उपयोग आवास तथा परिवहन दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता है।  

    टेंट हाउस 

    • ये अस्थायी आवास होते हैं जो कपड़े, प्लास्टिक या पशुओं के बालों से बनाए जाते हैं।  
    • पर्वतारोहियों तथा घुमंतू जनजातियों द्वारा इनका उपयोग किया जाता है।  
    • लद्दाख की चांगपा जनजाति याक के बालों से बने ‘रेबो’ नामक तंबुओं का उपयोग करती है।  

    इग्लू 

    • इग्लू अत्यधिक ठंडे ध्रुवीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं।  
    • इनका निर्माण बर्फ की सघन चादरों से किया जाता है।  
    • बर्फ की परतें ऊष्मा को संरक्षित रखती हैं, जिससे अंदर अपेक्षाकृत गर्म वातावरण बना रहता है।  
    • मानव आवास स्थानीय प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होते हैं और मानव की अनुकूलन क्षमता को दर्शाते हैं। 

राष्ट्रीय प्रतीक : राष्ट्रीय ध्वज एवं राजचिह्न

    •  राष्ट्रीय प्रतीक किसी राष्ट्र की पहचानसंप्रभुतागौरव तथा सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक होते हैं। भारत के राष्ट्रीय ध्वज एवं राजचिह्न राष्ट्रीय एकतालोकतंत्र और संविधान के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं 
    • भारत के राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) को 22 जुलाई, 1947 को संविधान सभा द्वारा अपनाया गया। 
    • राष्ट्रीय ध्वज का स्वरूप पिंगली वेंकैया द्वारा प्रस्तुत डिजाइन पर आधारित है। 
    • राष्ट्रीय ध्वज आयताकार है तथा इसकी लंबाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। 
    • इसमें समान आकार की तीन क्षैतिज पट्टियाँ होती हैं—ऊपर केसरिया, मध्य में श्वेत तथा नीचे हरा रंग। 
    • मध्य की श्वेत पट्टी में गहरे नीले रंग का अशोक चक्र अंकित है, जिसमें 24 तीलियाँ होती हैं। 
    • अशोक चक्र को सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के धर्मचक्र से लिया गया है। 
    • केसरिया रंग साहस, त्याग एवं बलिदान, श्वेत रंग सत्य, शांति एवं पवित्रता तथा हरा रंग समृद्धि, विकास एवं प्रकृति का प्रतीक माना जाता है। 
    • राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान एवं उपयोग से संबंधित प्रावधान भारतीय ध्वज संहिता, 2002 (Flag Code of India, 2002) तथा अन्य संबंधित विधिक प्रावधानों द्वारा निर्धारित किए गए हैं। 
    • भारत का राजचिह्न (State Emblem of India) सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तंभ से प्रेरित है। 
    • भारत सरकार ने 26 जनवरी, 1950 को राजचिह्न को आधिकारिक रूप से अपनाया। 
    • राजचिह्न में चार सिंहों का स्वरूप है, जिनमें से सामान्य दृश्य में तीन सिंह दिखाई देते हैं। 
    • सिंहों के नीचे बने गोलाकार आधार (अभिलंब) पर हाथी, अश्व, वृषभ तथा सिंह की आकृतियाँ तथा उनके बीच धर्मचक्र अंकित हैं। 
    • राजचिह्न के आधार के नीचे "सत्यमेव जयते" अंकित है। 
    • "सत्यमेव जयते" वाक्य मुण्डक उपनिषद् से लिया गया है, जिसका अर्थ है—"सत्य की ही विजय होती है।" 
    • राष्ट्रीय ध्वज और राजचिह्न का उपयोग केवल निर्धारित नियमों एवं संवैधानिक मर्यादाओं के अंतर्गत किया जा सकता है। 
    • राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना प्रत्येक भारतीय नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। 
    • राष्ट्रीय ध्वज और राजचिह्न देश की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रीय गौरव तथा अखंडता के प्रतीक हैं। 
    • ये राष्ट्रीय प्रतीक नागरिकों में देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करते हैं। 
    • इस प्रकार राष्ट्रीय ध्वज एवं राजचिह्न भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय अस्मिता के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। 

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा : प्रभावी शिक्षण एवं समावेशी रणनीतियाँ

  • विशेष आवश्यकता वाले बच्चे (Childrenwith Special Needs – CWSN) वे बच्चे हैं जिन्हें शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक, अधिगम अथवा अन्य विकासात्मक आवश्यकताओं के कारण अतिरिक्त शैक्षिक सहायता एवं अनुकूलन की आवश्यकता होती है। 

    • समावेशी शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक बच्चे को उसकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं एवं क्षमताओं के अनुरूपसमान अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा सक्रिय सहभागिताप्रदान करना है। 

    1. प्रारम्भिक पहचान एवं शैक्षिक आकलन 

    • विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की प्रारम्भिक पहचान एवं समग्र शैक्षिक आकलन (Assessment) किया जाना चाहिए।
    • आकलन के आधार पर बच्चे की क्षमताओं, कठिनाइयों एवं आवश्यक सहयोग की पहचान कर उपयुक्त शिक्षण योजना तैयार की जाती है।

    2. व्यक्तिगत शिक्षण योजना (Individualized Education Plan – IEP) 

    • प्रत्येक बच्चे की आवश्यकताओं के अनुसार व्यक्तिगत शिक्षण योजना (IEP) तैयार की जानी चाहिए।
    • इसमें अधिगम लक्ष्य, शिक्षण रणनीतियाँ, आवश्यक संसाधन तथा मूल्यांकन की उपयुक्त विधियाँ निर्धारित की जाती हैं।

    3. समावेशी एवं सुगम शिक्षण वातावरण 

    • विद्यालय मेंबाधा-रहित (Barrier-free)एवं सुगम (Accessible) वातावरण विकसित किया जाना चाहिए। 
    • रैंप,रेलिंग, व्हीलचेयर-अनुकूल कक्षाएँ, उपयुक्त प्रकाश व्यवस्था तथा सुलभ शौचालय जैसी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

    4. शिक्षण-अधिगम में आवश्यक अनुकूलन 

    • शिक्षण विधियों को बच्चों की आवश्यकताओं के अनुसार लचीला एवं बहु-संवेदी (Multisensory) बनाया जाना चाहिए।
    • आवश्यकता अनुसारब्रेल लिपि, बड़े अक्षरों वाली पुस्तकें, ऑडियो सामग्री, स्क्रीन रीडर, सांकेतिक भाषा, सहायक प्रौद्योगिकी तथा डिजिटल शिक्षण संसाधनोंका उपयोग किया जाना चाहिए। 
    • परियोजना कार्य, मौखिक प्रस्तुति, चित्रांकन, मॉडल निर्माण एवं गतिविधि-आधारित अधिगम को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

    5. मूल्यांकन में लचीलापन 

    • विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को परीक्षा एवंअसाइनमेंटमें आवश्यकतानुसार अतिरिक्त समय, लेखक (Scribe), वैकल्पिक प्रश्न प्रारूप तथा उपयुक्त मूल्यांकन व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए। 
    • मूल्यांकन का उद्देश्य केवल अंक देना नहीं, बल्कि बच्चे की वास्तविक अधिगम प्रगति का आकलन करना होना चाहिए।

    6. प्रशिक्षित शिक्षक एवं सहयोगी सेवाएँ 

    • विद्यालयों में विशेष शिक्षकों (SpecialEducators), परामर्शदाताओं तथा आवश्यकता अनुसार स्पीचथेरेपिस्ट, ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट एवं मनोवैज्ञानिकों का सहयोग उपलब्ध होना चाहिए। 
    • सामान्य शिक्षकों को भी समावेशी शिक्षा एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के शिक्षण का नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

    7. अभिभावकों एवं समुदाय की सहभागिता 

    • शिक्षक एवं अभिभावकों के बीच नियमित संवाद एवं सहयोग बच्चों के समग्र विकास के लिए आवश्यक है।
    • परिवार, विद्यालय एवं समुदाय के संयुक्त प्रयास से बच्चों के शैक्षिक, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास को सुदृढ़ बनाया जा सकता है।

    8. समावेशी शिक्षा का उद्देश्य 

    • विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को उनकी क्षमता के अनुरूप आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी एवं सामाजिक रूप से सक्रिय नागरिक बनने के अवसर प्रदान करना समावेशी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है।





















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