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UPSC Principal/Vice-Principal Recruitment 2026 | Notification Released | Apply Online
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कॉन्सेप्ट कार्ड
समावेशी शिक्षा : आवश्यकता एवं प्रमुख महत्त्व
- समावेशी शिक्षा (InclusiveEducation) ऐसी शिक्षा व्यवस्था है जिसमें सभी बच्चों को उनकी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, भाषाई, लैंगिक, शारीरिक अथवा मानसिक भिन्नताओं के बावजूद समान रूप से शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया जाता है।
- भारतीय संविधान समानता, सामाजिक न्याय तथा सभी के लिए शिक्षा के अधिकार के सिद्धांतों पर आधारित है, जो समावेशी शिक्षा की अवधारणा को सुदृढ़ करते हैं।
- समावेशी शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक शिक्षार्थी को बिना किसी भेदभाव के गुणवत्तापूर्ण एवं समान शैक्षिक अवसर उपलब्ध कराना है।
- यह शिक्षा व्यवस्था विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (ChildrenwithSpecial Needs–CWSN) को सामान्य विद्यालयों में अन्य विद्यार्थियों के साथ सीखने का अवसर प्रदान करती है।
- समावेशी शिक्षा सामाजिक, आर्थिक, जातीय, धार्मिक, भाषाई तथा लैंगिक असमानताओं को कम करने में सहायक होती है।
- यह प्रत्येक बच्चे की व्यक्तिगत क्षमता, रुचि, अधिगम शैली तथा आवश्यकताओं का सम्मान करती है।
- समावेशी शिक्षा बच्चों में आत्मविश्वास, आत्मसम्मान तथास्वावलंबनके विकास को प्रोत्साहित करती है।
- यह विद्यार्थियों में सहयोग, सहिष्णुता, करुणा, समानता तथा परस्पर सम्मान जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास करती है।
- सामान्य एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ अध्ययन करने से सामाजिक समायोजन एवं सकारात्मक सामाजिक व्यवहार को बढ़ावा मिलता है।
- समावेशी शिक्षा विद्यालयों में भेदभाव, पूर्वाग्रह तथा सामाजिक बहिष्कार की प्रवृत्तियों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- यह प्रत्येक बच्चे को उसकी क्षमता के अनुरूप सीखने तथा अपनी पूर्ण संभावनाओं का विकास करने का अवसर प्रदान करती है।
- समावेशी शिक्षा में शिक्षक, अभिभावक, विद्यालय तथा समुदाय की सक्रिय सहभागिता बच्चों के समग्र विकास में सहायक होती है।
- यह विद्यालयों मेंसहयोगात्मक, सुरक्षित एवं सकारात्मक अधिगम वातावरण के निर्माण को प्रोत्साहित करती है।
- समावेशी शिक्षा सभी शिक्षार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समान अवसर तथा सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का प्रभावी माध्यम है।
- यह सतत एवं समावेशी विकास, लोकतांत्रिक समाज तथा समान अवसरों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उच्चतर शिक्षा से संबंधित प्रमुख शब्द-संक्षेप
संक्षेप
पूर्ण रूप
UGC
University Grants Commission
NAAC
National Assessment and Accreditation Council
NCTE
National Council for Teacher Education
IGNOU
Indira Gandhi National Open University
AICTE
All India Council for Technical Education
NCERT
National Council of Educational Research and Training
NIEPA
National Institute of Educational Planning and Administration
ICSSR
Indian Council of Social Science Research
ICPR
Indian Council of Philosophical Research
ICHR
Indian Council of Historical Research
RUSA
Rashtriya Uchchatar Shiksha Abhiyan
NIRF
National Institutional Ranking Framework
SWAYAM
Study Webs of Active Learning for Young Aspiring Minds
MOOC
Massive Open Online Course
ODL
Open and Distance Learning
CBCS
Choice Based Credit System
ABC
Academic Bank of Credits
NEP
National Education Policy
HEI
Higher Education Institution
GIAN
Global Initiative of Academic Networks
IMPRINT
Impacting Research Innovation and Technology
NRF
National Research Foundation
IIT
Indian Institute of Technology
IIM
Indian Institute of Management
NIT
National Institute of Technology
पर्यावरणीय शिक्षा का महत्त्व
पर्यावरणीय शिक्षा का महत्त्व उसकी आवश्यकता से स्पष्ट होता है, फिर भी उसका प्रतिपादन निम्नलिखित माध्यम से किया जाता है-
- सौरमंडल में पृथ्वी ही एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन संभव है। उसे नष्ट होने से बचाना है तथा उस पर बसने वाले प्राणीमात्र को सुखद जीवन उपलब्ध कराना है।
- प्रतिवर्ष मानव जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि हो रही है जिसके कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। प्रकृति व पर्यावरण को पुन: संतुलित करने तथा भावी पीढ़ियों को विरासत में सुंदर और व्यवस्थित समाज प्रदान करने हेतु जनसंख्या वृद्वि को नियंत्रित करने की आवश्यकता है।
- प्रकृति में संसाधनों के भंडार सीमित हैं। इनका उचित व विवेकपूर्ण उपयोग हो इसकी जानकारी जन-जन तक पहुँचानी है।
- पेड़-पौधे ही केवल कार्बन-डाइऑक्साइड को प्राणवायु ऑक्सीजन में बदल सकते हैं। अत: वायुमंडल में ऑक्सीजन की संतुलित मात्रा बनाए रखने तथा कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा की वृद्धि से होने वाली पर्यावरणीय विकृतियों से अवगत कराने के लिये विद्यार्थियों को जानकारी देनी चाहिये।
- औद्योगिक क्रांति तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों के फलस्वरूप सुख-सुविधाओं के उपकरणों ने चारों तरफ अनेक प्रकार के प्रदूषण फैला दिये है, उन्हें नियंत्रित करने तथा बचाव के उपाय सुझाने हेतु कार्यक्रम चलाने चाहिये।
पर्यावरणीय शिक्षा का स्वरूप (Form of Environmental Education)-
पर्यावरणीय शिक्षा को ‘पर्यावरण द्वारा शिक्षा’, ‘पर्यावरण के बारे में शिक्षा’ और ‘पर्यावरण के लिये शिक्षा’ के रूप में देखा जाना चाहिये। अत: पर्यावरणीय शिक्षा का स्वरूप निम्नलिखित होता है-
- पर्यावरण द्वारा शिक्षा- पर्यावरण से संबंधित विभिन्न प्रकार के मुद्दों और समस्याओं पर वास्तविक जीवन अनुभवों को अधिगम के आधार के रूप में प्रयोग किया जाता है तथा खुली गतिविधियों, जैसे- खोज, जाँच, स्थल भ्रमण आदि के प्रयोग पर बल दिया जाता है।
- पर्यावरण के बारे में शिक्षा- पर्यावरण का जैव भौतिक घटक जो मानव परिवेश का निर्माण और समर्थन करता है तथा जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करता है। इसको पर्यावरण के जैविक और अजैविक घटकों के अंतर्संबंधों समेत लंबे समय तक चलने वाले मानव जीवन सहायता तंत्रों के विकास और निगरानी तथा उद्देश्यपूर्ण नियोजन के परिवर्तन को खोजने और समझने की आवश्यकता है।
- पर्यावरण के लिये शिक्षा- पर्यावरण का संरक्षण, परिरक्षण और सुधार इसके अंतर्गत आता है। इसमें पर्यावरणीय समस्याओं की पहचान और उनके समाधान हेतु कार्य करना शामिल है।
यूनिकॉर्न क्या है?
यूनिकॉर्न एक ऐसा निजी स्वामित्व वाला स्टार्टअप है, जिसकी बाजार मूल्यांकन (Valuation) 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो जाता है। यह नाम इस तरह के स्टार्टअप की दुर्लभता और उनके तीव्र विकास को दर्शाता है।
भारतीय यूनिकॉर्न का महत्त्व
भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम में पिछले एक दशक में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2014 में जहाँ देश में केवल 4 यूनिकॉर्न थे, वहीं 2025 के मध्य तक यह संख्या बढ़कर 118 हो गई है। यह वृद्धि भारत के नवाचार, उद्यमिता और आर्थिक विकास की कहानी को दर्शाती है। भारतीय यूनिकॉर्न, जैसे कि जोमैटो, फोनपे, रेज़रपे, ओला, मीशो और डेल्हीवरी, न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बना रहे हैं। ये कंपनियाँ घरेलू चुनौतियों का समाधान करने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भी पहुँच रही हैं।
- रोज़गार सृजन : इन स्टार्टअप्स ने बड़ी संख्या में रोज़गार के अवसर पैदा किये हैं, जिससे लाखों लोगों को सीधे और परोक्ष रूप से लाभ हुआ है।
- आर्थिक विकास में योगदान : ये कंपनियाँ देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं और भारत को एक प्रमुख तकनीकी शक्ति के रूप में स्थापित कर रही हैं।
- नवाचार और तकनीकी प्रगति : ये यूनिकॉर्न नई तकनीकों और व्यावसायिक मॉडलों को पेश कर रहे हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में नवाचार को बढ़ावा मिल रहा है।
यह वृद्धि सरकार की नीतियों, बढ़ते डिजिटल उपयोग, और मजबूत निवेशक विश्वास का परिणाम है, जो भारत को दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक बना रहा है।
प्रमुख मनोवैज्ञानिक -
सिग्मंड फ्रॉयड (Sigmund Freud)
- फ्रॉयड का जन्म 6 मई 1856 को ऑस्ट्रिया के फ्रेइबर्ग में एक यहूदी परिवार में हुआ था ।उनके पिता जैकब ऊन के व्यापारी तथा माता एमेली सफल गृहणी थीं।
- फ्रॉयड की आरंभिक शिक्षा वियना में हुई और उन्होंने वियना यूनिवर्सिटी में चिकित्सा की पढ़ाई की।
- वर्ष 1885 में वे पेरिस गए और अगले वर्ष वियना में लौटकर मस्तिष्क एवं तंत्रिका विकार के विशेषज्ञ के तौर पर कार्य शुरू किया ।फ्रॉयड का आरंभ से ही तंत्रिका विज्ञान की ओर झुकाव था। वर्ष 1873 से 1881 के बीच वे उस समय के प्रसिद्ध तंत्रिका विज्ञानी अर्नस्ट ब्रुकी (Ernst Brucke) के संपर्क में रहे।
- वर्ष 1900 में उनकी बहुचर्चित पुस्तक ‘इंटरप्रेटेशन ऑफ ड्रीम्स’ का प्रकाशन हुआ जो उनके और उनके रोगियों के स्वप्नों के विश्लेषण पर आधारित थी।
- इस विश्व प्रसिद्ध पुस्तक में फ्रॉयड ने बताया कि सपने हमारी अतृप्त इच्छाओं का प्रतिबिंब होते हैं ।इनकी मृत्यु 23 सितंबर 1939 को लंदन में हुई।
कार्यक्षेत्र एवं सिद्धांत
- फ्रॉयड एक महान मनोवैज्ञानिक एवं चिकित्सक थे ।उन्होंने मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
- फ्रॉयड का मानना था कि लोगों को उनके अचेतन विचारों और प्रेरणाओं को सचेत करके ठीक किया जा सकता है, इस प्रकार ‘अंतदृष्टि' प्राप्त होती है।मनोविश्लेषण चिकित्सा का उद्देश्य दमित भावनाओं और अनुभवों को मुक्त करना है, अर्थात अचेतन को सचेत करना है।
- मनोविश्लेषण आमतौर पर अवसाद और चिंता जैसे विकारों के इलाज के लिये प्रयोग किया जाता है।
- फ्रॉयड के मनोविश्लेषण सिद्धांत की व्याख्या तीन आधारों पर की है -
1. व्यक्तित्व की संरचना (Structure of Personality)
2. व्यक्तित्व की गतिकी (Dynamics of Personality)
3. व्यक्तित्व का विकास (Development of Personality)
प्रमुख पुस्तकें
- ‘इंटरप्रेटेशन ऑफ ड्रीम्’', ‘ग्रुप साइकोलॉजी एंड द एनेलिसिस ऑफ द इगो, ‘टोटेम’ एंड टैबू’, ‘सिविलाइजेशन एंड इट्स डिसकॉनटेंट्स’ , ‘द इंट्रोडक्शन ऑफ साइकोलॉजी’ , ‘स्क्रीन मेमोरीज’, ‘द अनकॉन्शंस’ ।