एक भी अपडेट मिस न करें! टीचिंग एग्ज़ाम्स की ताज़ा जानकारी, PYQs और बहुत कुछ तुरंत पाने के लिए आज ही हमारे टेलीग्राम चैनल से जुड़ें।







“इनकी प्रेमगाथाएँ वास्तव में साहित्य-कोटि के भीतर आती हैं।”

“इस शाखा के सब कवियों ने कल्पित कहानियों के द्वारा प्रेममार्ग का महत्त्व दिखाया है। इन साधक कवियों ने लौकिक प्रेम के बहाने उस ‘प्रेमतत्त्व’ का आभास दिया है, जो प्रियतम ईश्वर से मिलाने वाला है।”

“इन प्रेमकथाओं का विषय तो वही साधारण होता है, अर्थात् किसी राजकुमार का किसी राजकुमारी के अलौकिक सौंदर्य की बात सुनकर उसके प्रेम में पागल होना, घर-बार छोड़कर निकल पड़ना तथा अनेक कष्ट और आपत्तियाँ झेलकर अंत में उस राजकुमारी को प्राप्त करना। पर ‘प्रेम की पीर’ की जो व्यंजना होती है, वह ऐसे विश्वव्यापक रूप में होती है कि वह प्रेम इस लोक से परे दिखाई पड़ता है।”

“सूफी कवियों ने जो कहानियाँ ली हैं, वे सब हिंदुओं के घर में बहुत दिनों से चली आती कहानियाँ हैं, जिनमें आवश्यकतानुसार उन्होंने कुछ हेर-फेर किया है। कहानियों का मार्मिक आधार हिंदू है। मनुष्य के साथ पशु-पक्षी और पेड़-पौधों को भी सहानुभूति-सूत्र में बद्ध दिखाकर एक अखंड जीवन-समष्टि का आभास देना हिंदू प्रेम-कथाओं की विशेषता है। मनुष्य के घोर दुःख पर वन के वृक्ष भी रोते हैं, पक्षी भी संदेशे पहुँचाते हैं—यह बात इन कहानियों में मिलती है।”

“शिक्षितों और विद्वानों की काव्य-परंपरा में यद्यपि अधिकतर आश्रयदाता राजाओं के चरितों और पौराणिक या ऐतिहासिक आख्यानों की ही प्रवृत्ति थी, पर साथ ही कल्पित कहानियों का भी चलन था—इसका पता लगता है।”
जैसे—ईश्वरदास की ‘सत्यवती कथा’।

“दिल्ली के बादशाह सिकंदरशाह (संवत् 1546–1574) के समय में कवि ईश्वरदास ने ‘सत्यवती कथा’ नाम की एक कहानी दोहे और चौपाइयों में लिखी थी, जिसकी शुरुआत तो व्यास–जनमेजय के संवाद से पौराणिक ढंग पर होती है, पर जो अधिकतर कल्पित, स्वच्छंद और मार्मिक मार्ग पर चलने वाली है।”

“नामदेव की रचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ‘निर्गुणपंथ’ के लिये मार्ग निकालने वाले नाथपंथ के योगी और भक्त नामदेव थे। जहाँ तक पता चलता है, ‘निर्गुण मार्ग’ के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीरदास ही थे।”

“यह शाखा भारतीय ब्रह्मज्ञान और योगसाधना को लेकर तथा उसमें सूफियों के प्रेमतत्त्व को मिलाकर उपासना-क्षेत्र में अग्रसर हुई और सगुण के खंडन में उसी जोश के साथ तत्पर रही, जिस जोश के साथ पैगंबरी मत बहुदेवोपासना और मूर्तिपूजा आदि के खंडन में रहते हैं।”

“इस शाखा की रचनाएँ साहित्यिक नहीं हैं—फुटकल दोहों या पदों के रूप में हैं, जिनकी भाषा और शैली अधिकतर अव्यवस्थित और ऊटपटाँग है। कबीर आदि दो-एक प्रतिभा-संपन्न संतों को छोड़कर, औरों में ज्ञानमार्ग की सुनी-सुनाई बातों का पिष्टपेषण तथा हठयोग की बातों के कुछ रूपक भद्दी तुकबंदियों में मिलते हैं।”

“भक्तिरस में मग्न करने वाली सरसता भी बहुत कम पाई जाती है। बात यह है कि इस पंथ का प्रभाव शिष्ट और शिक्षित जनता पर नहीं पड़ा, क्योंकि उसके लिये न तो इस पंथ में कोई नई बात थी, न कोई नया आकर्षण। संस्कृत बुद्धि, संस्कृत हृदय और संस्कृत वाणी का वह विकास इस शाखा में नहीं पाया जाता, जो शिक्षित समाज को अपनी ओर आकर्षित करता।”

“अशिक्षित और निम्न श्रेणी की जनता पर इन संत-महात्माओं का भारी उपकार है। उच्च विषयों का कुछ आभास देकर, आचरण की शुद्धता पर जोर देकर, आडंबरों का तिरस्कार करके, आत्मगौरव का भाव उत्पन्न करके, इन्होंने इसे ऊपर उठाने का स्तुत्य प्रयत्न किया। पाश्चात्यों ने इन्हें जो ‘धर्मसुधारक’ की उपाधि दी है, वह इसी बात को ध्यान में रखकर दी है।”

सिद्धों-नाथों की ‘कर्म’ संबंधी अवधारणा की आलोचना करते हुए लिखा है— 
“उनका उद्देश्य ‘कर्म’ को उस तंग गड्ढे से निकालकर प्रकृत धर्म के खुले क्षेत्र में लाना न था, बल्कि एकबारगी किनारे धकेल देना था। जनता की दृष्टि को आत्मकल्याण और लोककल्याण विधायक सच्चे कर्मों की ओर ले जाने के बदले, वे उसे कर्मक्षेत्र से ही हटाने में लग गये थे। उनकी बानी तो ‘गुह्य, रहस्य और सिद्धि’ लेकर उठी थी। अपनी रहस्यदर्शिता की धाक जमाने के लिये बाह्य जगत की बातें छोड़ घट के भीतर के कोठों की बातें बताया करते थे। भक्ति, प्रेम आदि हृदय के प्रकृत भावों का अंतःसाधना में कोई स्थान न था।” 

मंत्र, तंत्र, उपचार और अलौकिक सिद्धियों आदि के माध्यम से ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग को लक्ष्य करते हुए तुलसीदास ने लिखा है— 
“गोरख जगायो जोग, भगति भगायो लोग।” 

कालदर्शी भक्त कवि जनता के हृदय को सँभालने और लीन रखने के लिये दबी हुई भक्ति को जगाने लगे। क्रमशः भक्ति का प्रवाह ऐसा विकसित और प्रबल होता गया कि उसकी लपेट में केवल हिंदू जनता ही नहीं, देश में बसने वाले सहृदय मुसलमानों में से भी न जाने कितने आ गये। प्रेमस्वरूप ईश्वर को आगे लाकर भक्त कवियों ने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को मनुष्य के सामान्य रूप में दिखाया और भेदभाव के दृश्यों को हटाकर पीछे कर दिया। 

देश में सगुण और निर्गुण नाम से भक्तिकाव्य की दो धाराएँ विक्रम की 15वीं शताब्दी के अंतिम भाग से लेकर 17वीं शताब्दी के अंत तक समानांतर चलती रहीं। 

निर्गुण धारा को दो शाखाओं में विभक्त किया गया है— ‘ज्ञानमार्गी शाखा’ और ‘शुद्ध प्रेममार्गी शाखा’ (सूफियों की)। 

“भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था, उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के हृदय-क्षेत्र में फैलने के लिये पूरा स्थान मिला।”

“भक्ति आंदोलन की जो लहर दक्षिण से आयी, उसी ने उत्तर भारत की परिस्थिति के अनुरूप हिंदू–मुसलमान दोनों के लिये एक सामान्य भक्तिमार्ग की भावना कुछ लोगों में जगाई।”

“धर्म का प्रवाह कर्म, ज्ञान और भक्ति—इन तीन धाराओं में चलता है। इन तीनों के सामंजस्य से धर्म अपनी पूर्ण सजीव दशा में रहता है। किसी एक के भी अभाव से वह विकलांग रहता है। कर्म के बिना वह लूला-लंगड़ा, ज्ञान के बिना अंधा और भक्ति के बिना हृदयविहीन, बल्कि निष्प्राण हो जाता है। ज्ञान के अधिकारी तो सामान्य से बहुत अधिक समुन्नत और विकसित बुद्धि के कुछ थोड़े-से विशिष्ट व्यक्ति ही होते हैं। कर्म और भक्ति ही सारे जनसमुदाय की संपत्ति होती है।”

“साधना के जो तीन अवयव—कर्म, ज्ञान और भक्ति—कहे गए हैं, वे सब काल पाकर दोषग्रस्त हो सकते हैं। ‘कर्म’ अर्थशून्य विधि-विधानों से निकम्मा हो सकता है, ‘ज्ञान’ रहस्य और गुह्य की भावना से पाखंडपूर्ण हो सकता है और ‘भक्ति’ इंद्रिय-उपभोग की वासना से कलुषित हो सकती है। भक्ति की निष्पत्ति श्रद्धा और प्रेम के योग से होती है। जहाँ श्रद्धा या पूज्यबुद्धि का अवयव—जिसका लगाव धर्म से होता है—छोड़कर केवल प्रेमलक्षणा भक्ति ली जाएगी, वहाँ वह अवश्य विलासिता से ग्रस्त हो जाएगी।”

“साधना के क्षेत्र में जो ब्रह्म है, साहित्य के क्षेत्र में वही रहस्यवाद है।”

“हिंदी साहित्य के आदिकाल में कर्म तो अर्थशून्य विधि-विधान, तीर्थाटन और पर्व-स्नान इत्यादि के संकुचित घेरे में पहले से बहुत कुछ बद्ध चला आता था। धर्म की भावनात्मक अनुभूति या भक्ति, जिसका सूत्रपात महाभारतकाल में और विस्तृत प्रवर्तन पुराणकाल में हुआ था, कभी कहीं दबती, कभी कहीं उभरती, किसी प्रकार चली भर आ रही थी।”

शुक्लजी ने भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल) का समय संवत् 1375 से 1700 (सन् 1318 ई. से 1643 ई. तक) तक माना है।

भक्तिकाल का विभाजन इस प्रकार किया है। यही विभाजन सर्वमान्य है-

इस काल को छः प्रकरणों में इस प्रकार बाँटा गया है–

प्रकरण-1ः सामान्य परिचय

प्रकरण-2ः निर्गुण धारा- ज्ञानाश्रयी शाखा

प्रकरण-3ः निर्गुण धारा- प्रेममार्गी (सूफी) शाखा

प्रकरण-4ः सगुण धारा- रामभक्ति शाखा

प्रकरण-5ः सगुण धारा- कृष्णभक्ति शाखा

प्रकरण-6ः सगुण धारा- भक्तिकाल की फुटकल रचनाएँ

प्रकरण-1 (सामान्य परिचय)

इस प्रकरण में शुक्ल जी ने भक्ति काल के उदय की व्याख्या करते हुए उसकी सामान्य प्रवृत्तियों का संक्षिप्त विवरण दिया है।

भक्तिकाल की राजनीतिक परिस्थितियाँ इस प्रकार थीं- "देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिंदू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिये वह अवकाश न रह गया। उसके सामने ही उसके देव-मंदिर गिराए जाते थे, देवमूर्तियाँ तो\ड़ी जाती थीं और पूज्य-पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी नहीं कर सकते थे। ऐसी दशा में अपनी वीरता के गीत न तो वे गा ही सकते थे और न बिना लज्जित हुए सुन ही सकते थे। आगे चलकर जब मुस्लिम-साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लड़ने वाले स्वतंत्र राज्य भी नहीं रह गए। इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के पीछे हिंदू जनसमुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी छाई रही। अपने पौरुष से हताश जाति के लिये भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?"

"भक्तिकाल की धार्मिक स्थिति के विषय में लिखा है-"वज्रयानी सिद्ध, कापालिक आदि देश के पूर्वी भागों में और नाथपंथी जोगी पश्चिमी भागों में रमते चले आ रहे थे। इसी बात से इसका अनुमान हो सकता है कि सामान्य जनता की धर्मभावना कितनी दबती जा रही थी, उसका हृदय धर्म से कितनी दूर हटता चला जा रहा था।"

विद्याधर 

भअ भज्जिअ बंगा भंगु कलिंगा तेलंगा रण मुत्ति चले। 

मरहट्ठा धिट्ठा लग्गिअ कट्ठा सोरट्ठा भअ पाअ पले।। 

चंपारण कंपा पब्बअ झंपा उत्थी उत्थी जीव हरे। 

कासीसर राणा किअउ पआणा, बिज्जाहर भण मंतिवरे।। 

विद्यापति  

कीर्तिलता/कीर्तिपताका 

  • सक्कय बाणी वहुअन भावइ।
    पाउंअ रस को मम्म पावइ।। 
  • देसिल वअना सब जन मिट्ठा।
    तँ तैसन जम्पओ अवहट्ठा।।  
  • पुरुष कहाणी हौं कहौं जसु पंत्थावै पुन्नु।। 
  • जइ सुरसा होसइ मम भाषा। जो जो बुन्झिहिसो करिहि पसंसा।। 
  • बालचंद विज्जावहु भाषा। दुहु नहि लग्गइ दुज्जन हासा।। 
  • जाति अजाति विवाह अधम उत्तम का पारक। 

लौकिक साहित्य 

कल्लोल कवि 

ढोला मारू रा दूहा  

  • सोरठियो दूहो भलो, भलि मरवण री बात।
    जोबन छाई धण भली, तारां छायी रात।। 

अमीर खुसरो (अबुल हसन) 

  • सजन सकारे जाँयगे नैन मरेंगे रोय।
    विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय।। 
  • मुल्के-दिल कर दी ख़रावज तीरे-नाज
    -दरीं वीरान सुलतानी हनोज 
  • चु मन तूतिए-हिन्दम, अर रास्त पुर्सी।
    जे मन हिन्दुई पुर्स, ता नाज गोयम।। 

(इसका अर्थ यह हैः मैं हिंदुस्तान की तूती हूँए अगर तुम वास्तव में मुझसे कुछ पूछना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो जिसमें मैं कुछ अद्भुत बातें बता सकूँ।) 

  • बाला था जब सबको भाया
    बढ़ा हुआ कुछ काम आया
    खुसरो कह दिया उसका नाम
    बूझै, नहीं तो छोड़ै गाँव। 
  • तरवर से इक तिरिया उतरी, उसने बहुत रिझाया।
    बाप का उसने नाम जो पूछा, आधा नाम बताया।।
    आधा नाम पिता पर प्यारा, बूझ पहेली गोरी।
    अमीर खुसरो यों कहे, अपने नाम बोली- ‘निबोरी।। 
  • बहुत कठिन है डगर पनघट की 

अज्ञात कवि 

बसंतविलास 

  • इणि परि कोइलि कूजइ, पूजइं युवति मणोर।
    विधुर वियोगिनि धूजइं, कूजय मयण किसोर।। 

अब्दुल रहमान 

  • संदेसडउ सबित्थरउ पइ मइ कहणु जाइ।
    जे कालांगुलि मूंदडऊ सो बाँहडी समाइ। 

विद्यापति  

पदावली 

  • सुधामुख के विहि निरमल बाला
    अपरूप रूप मनोभव-मंगल त्रिभुवन विजयी माला।। 
  • सखि पेखल एक अपरूप
    सुनइत मानवि सपन सरूप। 
  • बड़ कौसल तुव राधे।
    किनल कन्हाई लोचन आधे।। 
  • मधुक मातल उड़ए पारए
    तइअओ पसारइ पाँखि। 
  • निरजन उरज हेरइ कत बेरि
    हँसइ जे अपन पयोधर हेरि 

  • हँसि हँसि बहु आलिंगन देल।
    मनमथ अंकुर कुसमित भेल।।
    जब निबिबंध सरकाओल कान।
    तोहर सपथ हम किछु नहि जान।। 
  • कालिक अवधि करिअ पिय गेल।
    लिखिइते कालि भीति भरि गेल।।
    भेल प्रभात कहत सब ही।
    कह कह सजनि कालि कबही।। 
  • सखि हे, पूछसि अनुभव मोय
    जोइ पिरीत अनुराग बखानइते तिले-तिले नूतन होय
    जनम अवधि भर रूप निहारल नयन तिरपित भेल। 
  • खने खने नयन कोन अनुसरई।
    खने खने बसन धूलि तनु भरई।। 
  • माधव हम परिनाम निरासा
    तुंहूँ जगतारन दीन दयामय अतए तोहर बिसवासा 

विजयसेन सूरि 

  • कोयल कलयलो मोर केकारओ 
    सम्मए महुयर महुर गुंजारवो। 
    जलद जाल बंबाले रीझरणि रमाउलु रेहइ, 
    उज्जिल सिहरू अलि कज्जल सामलु।। 

जैनाचार्य मेरुतुंग 

  • भोलि मुद्धि मा गब्बु करि पिक्खिवि पुडगु पाइँ। 
    चउदसइं छहुत्तरहं मुज्जह मयह गयाइँ। 

रासो साहित्य 

दलपति विजय 

  • पिउ चित्तौड़ आविऊ, सावण पहिली तीज। 
    जोवै बाट बिरहणिी खिण-खिण अणवै खीज।। 
    सन्देसो पिण साहिबा, पाछो फिरिय देह। 
    पंछी घाल्या पिंज्जरे, छूटण रो संदेह।। 

नरपति नाल्ह 

  • अस्त्रीय जनम काइ दीधउ महेस 
    अवर जनम थारइ घणा रे नरेश 
    रानि सिरजीय रोकडी 
    घणह सिरजीव धउलीय गाइ। 
    बनखंड काली कोइली 
    हउं बइसती अंबा नइ चंपा की डाल 
    भषती दाष बिजोरडी। 
    इणि दुष झूरइ अवलाजी बाल। 

  • आँजणी काइं सिर जीय करतार 
    सेत कमावती स्यउँ भरतार 
    पहिरण आछी लोवणी 
    तुंग तुरीय जिम भींडती गाय 
    साईंय लेती सामुही 
    हँसि हँसि बूझती प्रिय की बात। 


  • आगि लागि घर जरिगा अति सुख कीन, 
    पिय के हाथ घड़िलवा भरि-भरि दीन। 

  • तइ तउ उलग जाइ किसउ की यउ नाह। 
    मोडिय सीस दीन्हीउ बाँह। 
    कठिन पउहर ना मिल्या। 
    तहँ तउ अंग से अंग मिडीइउ राउ। 
    जंघ जुगल जोड्या नहीं। 
    राउजी सेजि बिछाय खेलिया खेलि। 

  • दव का दाधा हो कूपल लेइ। 
    जीभ का दाधा पाल्हवइ।। 

चंदबरदाई 

  • छत्रपति गयंद हरि हंस गति बिह बनाय संचै सचिय। 
    पप्रिनी रूप पप्रवतिय, मनहुं काम कामिनी रचिय।। 

  • राजनीति पाइयै। ग्यान पाइयै सु जानिय 
    उकति जुगाति पाइयै। अरथ घटि बढ़ि अनमानिय।। 

  • उक्ति धर्म विशालस्य। राजनीति नवरसं।। 
    खट भाषा पुराणं च। कुरानं कथितं मया।।  

जगनिक 

  • दस दस रुपया के नौकर हैं, नाहक डरिहौ मूड़ कटाय। 
    हम तुम खेलैं समर भूमि में दुह में एक आँकु रहि जाय। 
    यह मन भाइ गई उदले के, तुरतै घोड़ा दियो बढ़ाय। 


  • अररर गोला छूटन लागे, सर सर तीर रहे सन्नाय। 
    गोला लागै जेहि हाथी के, मानो चोर सेंध ह्नै जाय।। 
    गोला लागै जौन ऊँट के, सो गिरि परै चकत्ता खाय। 
    खट खट खट खट तेगा बोलै, बोलै छपक छपक तलवार।। 
    चलै जुनब्बी गुजराती, ऊना चलै विलायत क्यार। 

  • सदा तैरैया ना बनफूले, यारो सदा सावन होय। 
    स्वर्ग मड़ैया सब काहू को यारो सदा जीवै कोय।। 

जैन साहित्य 

स्वयंभू 

  • राम कहा सरि एह सोहंती। 
  • णिय मन्दिर हो विणिग्गय जाणइ।
    णं हिमवन्त हो गंग महागणइ।।
    णं छन्द हो णिमाय गायत्री।
    णं सद्द हो णीसरिय विहत्ती।। 
  • रोवई लंकापुर परमेसरि। हा रावण! तिहुयण जण केसरी।। (पउमचरिउ) 

पुष्यदंत 

  • पडु तडि-वडण पडिय बियडायल, रुज्जिय सीह दाउणो।
    णच्चिय मत्त मोर कल-कल-रव, पूरिय सयल काणणो।। 
  • जिहि दिसि दिसि तिमरइँ मिलियाईं।
    तिहि दिसि दिसि जारइ मिलियाईं।। 

हेमचंद्र 

  • सिरि जरखंडी लोअड़ी, गलि मणियड़ा बीस।
    तो वि गोट्ठडा कराविआ मुद्धहे उट्ठ बईस।। 
  • जइ केवइं पावीसु पिउ, अकिआ कुड्डु करीसु।
    पाणिउ नवइ सरावि जिवँ सब्वंगे पइसीसु।। 
  • खग्ग विसाहिउ जहिं लहहुँए पिय तहि देसहिं जाहुँ।
    रण-दुब्भिक्खें भग्गाँइ, विणु जुज्झें बलाहुँ।। 
  • भग्गउँ देक्खिवि निअय-बलु बलु पसरिअउँ परस्सु। 
    उम्मिल्लइ सहि-रेह जिवँ करि करवालु पियस्सु।। 
  • प्राइव मुणिहँवि भंतडी ते मणिअडा गणंति 
    अखइ निरामइ परम-पइ अज्जवि लउ लहंति 
  • आवहिं जम्महि अन्नहिं वि गोरि सु दिज्जहि कंतु। 
    गय मत्तहं चत्तंकुसहं जो अब्भिडइ हसंतु। 
  • बिट्टीए मइँ भणिय तुहुँ मा कुरु बंकी दिट्ठि। 
    पुत्ति सकण्णी भल्लि जिवँ मारइ हियइ पइट्ठि।। 
  • पुत्ते जाएँ कवण गुणु अवगुण कवणु मुएण। 
    जा बप्पी की भुँहड़ी, चंपज्जइ अवरेण। 
  • जीविउ कासु वल्लहउँ धणु पणु कासु इट्ठु। 
    दोणि वि अवसर-निवडिअइं तिण-सम गणइ विसिट्ठु।। 
  • पाइ विलग्गी अंत्रडी सिरु ल्हसिउँ खंघस्स् 
    तोवि कटारइ हत्थडउ बलि किज्जउँ कंतस्स। 
  • जो गुण गोवइ अप्पणा पयडा करइ परस्सु 
    तसु हउँ कलजुगि दुल्लहहो बलि किज्जउँ सुअणस्सु। 

शालिभद्र सूरि 

  • तं जि पहिय पिक्खेविणु पिअ उक्कखिरिय। 
    मन्थर गय सरलाइवि उत्तावलि चलिय। 
    तुह मणहर चल्लंतिय चंचल रमण भरि। 
    छुड़वि खिसिय रसणाबलि किकिण रव पसरि।। 
  • उपनूं केवल नाण तउ विरहइ रिसहे सिउ ए। 
    आविउ भरह नरिन्द सिउं अवधापुरि ए।। 
  • बोलह बाहुबली बलवंत। लोह खण्डि तउ गरवीउ हंत। 
    चक्र सरीसउ चूनउ करिउं। सयलहं गोत्रह कुल संहरउं।। 

सिद्ध साहित्य 

सरहपा 

  • जइ रागग्गा बिअ होइ मुत्ति ता गुणह सिआलह। 
  • लोमुपाटणें अत्थि सिद्धि ता जुवइ णिअम्बइ।। 
  • पिच्छी गहणो दिट्ठ मोक्ख तो मोरह चमरह। 
  • उच्छे भोअणें होइ जाण ता करिह तुरंगह।। 
  • सहजे िए णिच्चल जोण किअ, समरसें णिच मणराअ। 
  • सिद्धो सो पुणि तक्खणे, रागउ जरामरणइ भाअ। 
  • (काया की कृच्छ साधना काम्य नहीं थीए सहज मार्ग पर बार-बार बल) 
  • सरहे गहण गुहिर मग अहिआ। 
  • पसू लोअ जिमि रहिआ।। 
  • बह्मण्ेहि जाणत हि भेऊ। एवइ पढ़िअउए च्चउ बेउ।। 
  • मस्टी पार्णी कुस लइ पढ़त। घरहि बइसी अग्गि हुणंत।। 

शबरपा 

  • हेरि ये मेरि तइला बाड़ी खसमे समतुला 
  • षुकड़ए सेरे कपासु फुटिला। 
  • तइला वाड़िर पासेर जोहणा वाड़ी ताएला 
  • फिटेलि अंधारि रे आकाश फुलिआ।। 

कण्हपा 

  • आगम वेअ पुराणेहि, पाणिअ माण बहंति। 
  • पक्क सिरिफल अलिअ, जिम वाहेरित भ्रमयंति।। 

कुक्कुरिपा 

  • हांउ निवासी खमण भतारे, मोहोर विगोआ कहण न जाइ। 
  • फेटलिउ गो माए अन्त उड़ि चाहि, जा एथु बाहाम सो एथु नाहिं। 

नाथ साहित्य 

गोरखनाथ 

  • अवधू मन चंगा तो कठौती में गंगा। 
  • दुबध्या मेटि सहज में रहैं। 
  • सोवता अवधू जीवता मूवा, बोलता अवधू प्यंजरै सूवा।। 
  • अभि-अंतर की त्यागै माया। 
  • गुर कीजै गहिला निगुरा रहिला, गुर बिन ग्यांन न पायला रे भाईला। 
    दूधै धोया कोइला उजला न होइला, कागा कंठै पहुप माल हंसबा न मैला।। 
  • नाथ बोलै अमृत बांणी। बरिषैगी कंबली पांणी।। 
    गाड़ि पडरवा बांधिलै खूंटा। चलैं दमामा बजिले ऊँटा।। 
  • धसै सहंस इकीसौं जाप। अनहद उपजै आपहि आप।। 
    बंका नालि मैं ऊगे सूर। रोम रोम धुनि बाजै सूर।। 
  • हवकि बोलिबा ठवकि न चलिबा। 
    धीरै धरिबा पाँव। 
    गरबं न करिबा सहज रहिबा 
    भणत गोरस राँव।। 
  • यंद्री का लड़बड़ा, जिम्भा का फूहड़ा। 
    गोरस कहै ते परतसि चूहड़ा।। 
    काछ का जती मुख का सती। 
    सो सत पुरुष उतमो कथी।। 
  • नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा। 
    ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा।। 
  • अंजन मांहि निरंजन भेट्या, तिल मुख भेट्या तेलं। 
    मूरति मांहि अमूरति परस्या, भया निरंतरि खेलं।। 

चर्पटनाथ 

  • ताबाँ तूँबा ये दुइ साँचा, राजा ही ते जोगी ऊँचा। 
    ताँबा डूबै तूँबा तरै, जीवै जोगी राजा मरै। 
    किसका बेटा किसकी बहू, आप सवारथ मिलिया सहू। 
  • फ्इक लाल पटा एक सेतपटा। इक तिलक जनेऊ लमक लटा 
    जब लहीं ऊलटी प्राण घटा। तब चरपट भूले पेट नटा। 
    जब आवैगी काल घटा। तब छोड़ि जाइगे लटा पटा। 
    सुणि सिखवंती सुणि पतिवंती। इस जग महि कैसे रहणा।। 

पदावली 

  • सरस बसंत समय भल पावलि, दछिन पवन बह धीरे।
    सपनहु रूप वचन इक भाषिय, मुख से दूरि करु चीरे।।
    तोहर बदन सम चाँद होअथि नाहिं, कैयो जतन बिह केला।
    कै बेरि काटि बनावल नव कै, तैयो तुलित नहिं भेला।
    लोचन तूअ कमल नहिं भै सक, से जग के नहिं जाने।
    से फिरि जाय लुकैलन्ह जल महँ, पंकज निज अपमाने।।
    भन विद्यापति सुनु बर जोवति, सम लछमि समाने।
    राजा सिवसिंह रूप नरायन, ‘लखिमा देइ प्रति माने।। 
  • कालि कहल पिय साँझहि रे, जाइबि मइ मारु देस।
    मोए अभागिलि नहिं जानल रे, सँग जइतवँ जोगिनि बेस।।
    हिरदय बड़ दारुन रे, पिया बिनु बिहरि जाइ।
    एक सयन सखि सूतल रे, अछल बलभ निसि भोर।।
    जानल कत खन तजि गेल रे, बिछुरल चकवा जोर।
    सूनि सेज पिय सालइ रे, पिय बिनु घर मोए आजि।।
    बिनति करहु सुसहेलिन रे, मोहि देहि अगिहर साजि।
    विद्यापति कवि गावल रे, आवि मिलत पिय तोर।
    लखिमा देइ बर नागर रे, राय सिवसिंह नहिं भोर।। 

                          तिरहुत के राजा शिवसिंह के लिये 

लौकिक साहित्य 

अमीर खुसरो 

  • एक थाल मोती से भरा। सबके सिर पर औंधा धरा।।
    चारों ओर वह थाली फिरे। मोती उससे एक न गिरे।।   (आकाश) 
  • एक नार ने अचरज किया। साँप मारि पिंजड़े में दिया।। 
    जों-जों साँप ताल को खाए। सूखे ताल साँप मर जाए।। (दिया-बत्ती) 
  • एक नार दो को ले बैठी। टेढ़ी होके बिल में पैठी।। 
    जिसके बैठे उसे सुहाय। खुसरो उसके बल-बल जाय।। (पायजामा)
     
  • अरथ तो इसका बूझेगा। मुँह देखो तो सूझेगा।। (दर्पण) 
  • चूक भई कुछ वासों ऐसी। देस छोड़ भयो परदेसी।। 
  • एक नार पिया को भानी। तन वाको सगरा ज्यों पानी।
  • चाम मास वाके नहिं नेक। हाड़-हाड़ में वाके छेद।।
    मोहिं अचंभो आवत ऐसे। वामें जीव बसत है कैसे।।
     
  • उज्जल बरन, अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान। 
    देखत में तो साधु है, निपट पाप की खान। 

  • खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। 
    तन मेरो मन पीउ को, दोउ भए एक रंग। 

  • गोरी सोवै सेज पर, मुख पर डारै केस। 
    चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस।
     
  • मोरा जोबना नवेलरा भयो है गुलाल। कैसे गर दीनी कस मोरी माल।। 
    सूनी सेज डरावन लागै, बिरहा अगिन मोहि डस-डस जाय। 

  • हजरत निजामदीन चिश्ती जरजरीं बख्श पीर। 
    जोइ-जोइ ध्यावैं तेइ-तेइ फल पावैं, 
    मेरे मन की मुराद भर दीजै अमीर।।
     
  • जे हाल मिसकी मकुन तगाफुल दुराय नैना, बनाय बतियाँ। 
    कि ताबे हिज्राँ न दारम, ऐ जाँ! न लेहु काहें लगाय छतियाँ। 
    शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्फ व रोजे वसलत चूँ उम्र कोतह। 
    सखी! पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ? 

हम्मीर रासो 

  • ढोला मारिय ढिल्लि महँ मुच्छिउ मेच्छ सरीर।
    षुर जज्जल्ला मंतिवर चलिअ बीर हम्मीर।। 
    चलिअ बीर हम्मीर पाअभर मेइणि कंपइ। 
    दिगमग णह अंधार धूलि सुररह आच्छाइहि।। 
    दिगमग णह अंधार आण खुरसाणुक उल्ला। 
    दरमरि दमसि विपक्ख मारु ढिल्ली मह ढोल्ला।। 

  • पिंधउ दिड़ सन्नाह, बाह उप्परि पक्ख दह। 
    बंधु समदि रण धँसेउ साहि हम्मीर बअण लइ।। 
    अड्डुउ णहपह भमउँ, खग्ग रिपु सीसहि झल्लउँ। 
    पक्खर पक्खर ठेल्लि पेल्लि पब्बअ अप्फालउँ।। 
    हम्मीर कज्ज जज्जल भणइ कोहाणल मह मइ जलउँ। 
    सुलितान सीस करवाल दह तज्जि कलेवर दिये चलउँ।। 

  • पअभर दरमरु धरणि तरणि रह धुल्लिअ झंपिअ। 
    कमठ पिट्ठ टरपरिअ, मेरु मंदर सिर कंपिअ।। 
    कोहे चलिअ हम्मीर बीर गअजुह संजुत्तें। 
    किअउ कट्ठ, हा कंद! मुच्छि मेच्छिअ के पुत्ते।। 

विद्यापति  

  • रज्ज लुद्ध असलान बुद्धि बिक्कम बले हारल। 
    पास बइसि बिसवासि राय गयनेसर मारल।। 
    मारंत राय रणरोल पड्डु, मेइनि हा हा सद्द हुअ। 
    सुरराय नयर नरअर-रमणि बाम नयन पण्फुरिअ धुअ।। 

  • पुरिसत्तेण पुरिसउ, नहिं पुरिसउ जम्म मत्तेन।
    जलदानेन हु जलओ, हु जलओ पुंजिओ धूमो।।
     
  • कतहुँ तुरुक बरकर। बार जाए ते बेगार धर।। 
    धरि आनय बाभन बरुआ। मथा चढ़ावइ गाय का चुरुआ।। 
    हिंदू बोले दूरहि निकार। छोटउ तुरुका भभकी मार।। 

पद्मावती समय से 

  • हिंदुवान थान उत्तम सुदेश। तहँ उदित द्रुग्ग सुदेस। 
    संभरिनरेस चहुआन थान। प्रथिराज तहाँ राजंत भान।। 
    संभरिनरेस सोमेस पूत। देवत्त रूप अवतार धत। 
    जिहि पकरि साह साहाब लीन। तिहुँ बेर करिय पानीपहीन।। 
    सिंगिनिसुसद्द गुनि चढ़ि जँजीर। चुक्कड़ सबद बेधंत तीर।। 
  • मनहु कला ससभान कला सोलह सो बन्निय। 
    बाल बैस, ससि ता समीप अम्रित रस पिन्निय।। 
    विगसि कमलस्रिग, भमर, बेनु, खंजन मृग लुट्टिय। 
    हीर, कीर, अरु बिंब मोति नखिसिख अहिघुट्टिय।। 

  • कुट्टिल केस सुदेस पोह परिचियत पिक्क सद। 
    कमलगंध वयसंध, हंसगति चलित मंद।। 
    सेत वस्त्र सौहै, शरीर नष स्वाति बूँद जस। 
    भमर भवहि भुल्लहिं सुभाव मकरंद बास रस।। 

  • प्रिय प्रिथिराज नरेस जोग लिखि कग्गर दिन्नौ। 
    लगन बरब रचि सरव दिन्न द्वादस ससि लिन्नौ।। 
    सै ग्यारह अरु तीस साष संवत परमानह। 
    जो पित्रीकुल सुद्ध बरन, बरि रक्खहु प्रानह।। 

  • दिक्खंत दिट्ठि उच्चरिय वर इक षलक्क विलँव करिय। 
    अलगार रयनि दिन पंच महि, ज्यों रुकमिनि कन्हर बरिय।। 
    संगह सविष लिय सहस बाल। रुकमिनिय जेम लज्जत मराल।। 
    पूजियइ गउरि शंकर  मनाय। दच्छिनइ अंग करि लगिय पाय।। 
    फिरि देषि देषिद्ध प्रिथिराज राज। हँसि मुद्ध-मुद्ध चर पट्ट लाज।। 

  • बज्जिय घोर निशान राम चौहान चहौं दिस। 
    सकल सूर सामंत समरि बल जंत्र मंत्र तिस।। 

  • उट्टि राज प्रिथिराज बाग मनो लग्ग वीर नट। 
    कढत तेग मनबेग लगत मनो बीजु झट्ट घट।। 
    थकि रहे सूर कौतिक गगन, रँगन मगन भइ शोन धर। 
    हदि हरषि वीर जग्गे हुलसि हु रेउ रंग नव रत्त वर।। 
    षुरासान मुलतान खंधार मीरं। बलष स्यो बलं तेग अच्चूक तीरं।। 
    रुहंगी फिरंगी हलब्बी सुमानी। ठटी ठट्ट भल्लोच्च ढालं निसानी।। 
    मंजारी चषी मुक्ख जंबुक्क लारी हजारी-हजारी हुँके जोध भारी।। 

जगनिक 

  • बारह बरिस लै कूकर जीवै, तेरह लै जीवै सियार।
    बरिस अठारह छत्री जीवै, आगे जीवन को धिक्कार। 

शारंगधर 

"शारंगधर पद्धति" (ये श्रीकंठ पण्डित द्वारा संगृहीत है। शुक्ल जी के अनुसारए ये रचना भी इन्हीं की थी।) 

  • नूनं बादलं छाइ खेह पसरी निःश्राण शब्दः खरः।
    शत्रुं पाड़ि लुटालि तोड़ हिनसौं एवं भणन्त्युद्भटाः।।
    झूठे गर्वभरा मघालि सहसों रे कंत मेरे कहे।
    कंठे पाग निवेश जाह शरणं श्रीमल्लदेवं विभुम्।। 

जैनाचार्य मेरुतुंग 

  • झाली तुट्टी किं न मुउ, किं न हुएउ छरपुंज।
    हिंदइ दोरी बँधीयउ जिम मंकड़ तिम मुंज।। 

  • मुंज भणइ, मुणालवइ! जुब्बण गयुं न झूरि।
    जइ सक्कर सय खंड थिय तो इस मीठी चूरि।।
     
  • जा मति पच्छइ संपजइ सा मति पहिली होइ।
    मुंज भणइ, गुणालवइ! बिघन न बेढ़इ कोइ।।

  • बाह बिछोड़बि जिह तुहँ हउँ तेवइँ का दोसु।
    हिअयट्ठिय जइ नीसरहि, जाणउँ मुंज सरोसु।।
     
  • एउ जम्मु नग्गुहँ गिउ, भड़सिरि खग्गु न भग्गु।
    तिक्खाँ तुरियँ न माणियाँ, गोरी गली न लग्गु।। 

रासो साहित्य 

नरपति नाल्ह 

  • बारह सै बहोत्तरा मझारि। जैठबदी नवमी बुधवारि।
    नाल्ह रसाण आरंभइ। शारदा तूठी ब्रह्मकुमारि।
    कासमीरां मुख मण्डनी। रास प्रसागों वीसलदेराइ। 

  • परणब चाल्यो बीसलराय। चउरास्या सहु लिया बोलाइ।
    जान तणी साजति करउ। जीरह रँगावली पहरज्यो टोप।। 
    हुअउ पइसारउ बीसलराव। आवी सयल अँतेवरी राव।। 
    रूप अपूरब पेषियइ। इसी अस्त्री नहिं सयल संसार।। 
    अति रंग स्वामी सूँ मिली राति। बेटी राजा भोज की।। 
    गरब करि ऊर्भो छइ साँभरयो राव। मो सरीखा नहिं ऊर भूवाल।। 
    म्हाँ घरि साँभर उग्गहइ। चिहुँ दिसि थाण जैसलमेर।। 
    गरबि न बोलो हो साँभर्या राव। तो सरीखा घणा ओर भुवाल।। 
    एक उड़ीसा को धणी। बचन हमारइ तू मानि जु मानि।। 
    ज्यूँ थारइ साँभर उग्गहइ। राजा उणि घरि उग्गहइ हीराखान। 
    कुँवरि कहइ फ्सुणि, साँभर्या राव। काई स्वामी तू उल्लगई जाइ? 
    कहेउ हमारउ जइ सुणउ। थारइ छइ साठि अँतेवरि नारिय्।। 
    कड़वा बोल न बोलिस नारि। तूमो मेल्हसी चित्त बिसारि।।
     
  • जीभ न जीभ विगोयनो। दव का दाधा कुपली मेल्हइ।। 
    जीभ का दाधा नु पाँगुरइ। नाल्ह कहइ सुणीजइ सब कोइ।। 
    आव्यो राजा मास बसंत। गढ़ माहीं गूड़ी उछली।। 
    जइ धन मिलती अंग सँभार। मान भंग हो तो बाल हो।। 
    ईणी परिरहता राज दुवारि। 

चंदबरदाई 

  • पुस्तक जल्हन हत्थ दै चलि गज्जन नृपकाज।
    रघुनाथचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि।
    पृथिराजसुजस कवि चंद कृत चंदनंद उद्धरिय तिमि। 

जल्हण (चंदबरदाई के पुत्र) 

  • एकादस सै पंचदह विक्रम साक अनंद।
    तिहि रिपुजय पुरहरन को भए पृथिराज नरिंद।। 

  • एकादस सै पंचदह विक्रम जिस ध्रमसुत्त।
    प्रतिय साक प्रथिराज कौ लष्यौ विप्र गुन गुत्त। 

  • दहति पुत्र कविचंद के सुंदर रूप सुजान।
    इक जल्ह गुन बावरो गुन समुंद ससभान।। 

विरूपा 

  • सहजे थिर करि वारुणी साध। अजरामर होइ दिट काँध। 
    दशमि दुआरत चिह्न देखइआ। आइल गराहक अपने बहिआ।  
    चउशठि घड़िए देट पसारा। पइठल गराहक नाहि निसारा। 
    (वारुणीप्रेरित अंतर्मुख साधना की पद्धति का वर्णन) 

कुक्कुरिपा 

  • ससुरी निंद गेल, बहुड़ी जागअ कानेट चोर निलका गइ मागअ। 
    दिवसइ बहुणी काढ़इ डरे भाअ। रति भइले कामरू जाअ। 

तंतिपा 

  • बेंग संसार बाड़हिल जाअ। दुहिल दूध के बेटे समाअ।
    बलद बिआएल गविआ बाँझे। पिटा दुहिए एतिना साँझे।
    जो सो बुज्झी सो धनि बुधी। जो सो चोर सोई साथी।
    निते निते पिआला षिहे जूझअ। टेढपाएर गीत बिरले बूझअ।
    (अटपटी बानीधसंध्या भाषा-शैली) 

दारिकपा की शिष्या सहजयोगिनी चिंता 

  • प्रत्यात्मवेद्यो भगवान् उपमावर्जितः प्रभुः।
    सर्वगः सर्वव्यापी च कर्त्ता हर्त्ता जगत्पत्तिः।
    श्रीमान् वज्रसत्वोSसौ व्यत्तफ़ भाव प्रकाशकः।
    (सिद्धों द्वारा ईश्वरत्व की भावना कर ली गई थी। "व्यक्त भावानुगत तत्त्वसिद्धि" ग्रंथ से) 

कर्णरीपा (आर्यदेव) 

  • प्रतरन्नपि गंगायां नैव श्वा सुद्धमर्हति। 
    तस्माद्धर्मधियां पुंसां तीर्थस्नानं तु निष्फलम्।। 
    धर्मो यदि भवेत् स्नानात् कैवर्त्तानां कृतार्थता। 
    नक्त्तं दिवं प्रविष्टानां मत्स्यादीनां तु का कथा। 
    ("चित्त शोधन प्रकरण" सेए "नाद" और "बिंदु" के योग से जगत् की उत्पत्ति) 

नाथ साहित्य 

गोरखनाथ 

  • जोइ-जोइ पिण्डे सोइ-ब्रह्माण्डे
     
  • नाथांशो नादो, नादांशः प्राणः शक्त्यंशो बिंदुः बिन्दोरांशः शरीरम्।
    (गोरक्षसिद्धांत संग्रह "गोपीनाथ कविराज संपादित") 

  • स्वामी तुम्हई गुर गोसाईं। अम्हे जो सिव सबद एक बूझिबा।।
    निरारंबे चेला कूण बिधि रहै। सतगुरु होइ स पुछड्ढा कहै।।
    अबधू रहिया हाटे बाटे रूष विरष की छाया।
    तजिबा काम क्रोध लोभ मोह संसार की माया।
    (शुक्ल जी के अनुसार गोरखनाथ की कुछ रचना "साखी" और "बानी" में मिलती हैं।) 

जैन साहित्य 

पुष्यदंत 

  • बिणु धवलेण सयडु किं हल्लइ। बिणु जीवेण देहु किं चल्लइ।
    बिणु जीवेण मोक्ख को पावइ। तुम्हारिसु किं अप्पइ आवइ।। 

देवसेन 

  • जो जिण सासण भाषियउ सो मइ कहियउ सारु।
    जो पालइ सइ भाउ करि सो सरि पावइ पारु।। 

हेमचंद्र 

  • भल्ला हुआ जु मारिया बहिणि महारा कंतु।
    लज्जेजं तु वयंसिअहु जइ भग्गा घरु एंतु।
     
  • जइ सो आवइए दुइ! घरु काँइ अहोमुहु तुज्झु।
    वयणु ज खंढइ तउ, सहि ए! सो पिउ होइ न मुज्झु।।

  • जे महु दिण्णा दिअहड़ा। दइएँ पवसंतेण।
    ताण गणंतिए अंगुलिउँ जज्जरियाउ नहेण।। 

  • पिय संगमि कउ निद्दड़ी? पियहो परक्खहो केंव।
    मई बिन्निवि विन्नासिया, निंद्दन एँव न तेंव।। 

सोमप्रभ सूरि 

  • रावण जायउ जहि दिअहि दह मुह एक सरीरु।
    चिंताविय तइयहि जणणि कवणु पियावउँ खीरु।।
     
  • बेस बिसिट्ठह बारियइ जइवि मणोहर गत्त।
    गंगाजल पक्खालियवि सुणिहि कि होई पवित्त?

  • पिय हउँ थक्किय सयलु दिणु तुह विरहग्गि किलंत।
    थोड़इ जल जिमि मच्छलिय तल्लोविल्लि करंत।। 

सरहपा 

  • पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ। देहहि बुद्ध बसंत न जाणइ।  

       अमणागमण ण तेन विखंडिअ। तोवि णिलज्जइ भणइ हउँ पंडिअ।। 

  • जहि मन पवन न संचरइ, रवि ससि नांहि पवेश।  

       तहि बट चित्त बिसाम करु। सरेहे कहि उवेस।। 

  • घोर अंधारे चन्दमणि जिमि उज्जोअ करेइ। 

         परम महासुह एखु कणे दुरिअ अशेष हरेइ।। 

         जीवंतह जो नउ जरइ सो अजरामर होइ। 

          गुरु उपएसें बिमलमइ सो पर घण्णा कोइ।।  

  • नाद न बिंदु न रवि न शशि मंडल। चिअराज सहाबे मूकल। 

        उजु रे उजु छाँड़ि मा लेहु रे बंक। निअहि बोहि मा जाहु रे रंक।। 

        हाथेरे काकाण मा लोउ दापण। अपणे अपा बुझतु निअन्मण। 

लुइपा  

  • काआ तरुवर पंच बिड़ाल। चंचल चीए पइठो काल।  

        दिट करिअ महासुह परिमाण। लूइ भणइ गुरु पुच्छिअ जाण।। 

(बौद्ध शास्त्रों में विकारों की संख्या पाँच/पंच प्रतिबंध- आलस्य हिंसा काम चिकित्सा और मोह। निर्गुण संतों और सूफियों ने यही स्वीकारी। हिंदू शास्त्रों में विकार-संख्या-6) 

  • भाव होइ, अभाव ण जाइ। अइस संबोहे को पतिआइ? 

       लूइ भइ बट दुलक्ख बिणाण। तिअ धाए बिलसइ, अह लागे णा। 

कण्हपा 

  • एक्क किज्जइ मंत्र तंत। णिअ धरणी लइ केलि करंत। 

         णिज घर घरणी जाब ण मज्जइ। ताब की पंचवर्ण बिहरिज्जइ।। 

         जिमि लोण बिलज्जइ पाणिएहि तिमि धरिणी लइ चित्त। 

         समरस जइ तक्खणे जड़ पुणु ते सम नित्त। 

  • नगर बाहिरे डोंबी तोहरि कुड़िया छइ। 

          छोड़ जाइ सो बाह्य नाड़िया। 

  • आलो डोंबि! तोए सम करिब साँग। निघिण कण्ह कपाली जोइ लाग।। 

         एक्क सो पदमा चौषट्टि पाखुड़ी। तढ़ि चढ़ि नाचअ डोंबी बापुड़ी।। 

          हालो डोंबी! तो पुछमि सदभावे। अइससि जासि डोंबी काहरि नावे।। 

  • गंगा जउँना माझे रे बहइ नाई। 

         ताहि बुड़िलि मातंगि पोइआ लीले पार करेइ। 

  • बाहतु डोंबीए बाहलो डोंबी बाट भइल उछारा।  

          सद्गुरु पाअ पए जाइब पुणु जिणउरा।। 

  • काआ नावड़ि खाँटि मन करिआल। सदगुरु बअणे घर पतवाल। 

         चीअ थिर करि गहु रे नाई। अन्न उपाये पार ण जाई।। 

  • आचार्य शुक्ल ने सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य कोसांप्रदायिक शिक्षा मात्रकहकर वीरगाथा काल में सम्मिलित नहीं किया था, किंतु हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उसे आदिकाल में स्वीकार कर लिया। 
  • पृथ्वीचंद्र कीमातृकाप्रथमाक्षरादोहराको प्रथम बावनी काव्य माना जाता है। 
  • डिंगल शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जोधपुर के कवि राजा बाँकीदास कीकुकवि बत्तीसी(सं. 1817 वि.) में हुआ है। 
  • चर्चरी एवं चाँचरि आदिकालीन काव्यरूप है। हरिभद्र सूरि कृतसमरायिच्चकहामें इसका प्राचीनतम उपयोग मिलता है। 
  • जगत्सुंदरी प्रयोगमालाएक वैद्यक ग्रंथ है। इसके रचयिता ज्ञातनहींहैं। 
  • दोहा-चौपाई छंद मेंभगवद्गीताका अनुवाद करने वाला हिंदी का प्रथम कवि भुवाल (10वीं शती) है। 
  • मिश्रबंधुओं नेमिश्रबंधु विनोदके प्रथम संस्करण मेंप्रारंभिक काल’ (700-1444 वि.) के अंतर्गत 19 कवियों को स्थान दिया है। अगले संस्करण में नाथ पंथियों और सिद्धों को शामिल करते हुए इस काल में कवियों की संख्या 75 तक पहुँचा दी। 

गद्य साहित्य  

रचना एवं रचनाकार 

समय 

अन्य स्मरणीय बिंदु 

कुवलयमाला कहा 
(उद्यतन सूरि) 

9वीं शती 

यह आरंभिक उल्लेख्य गद्य-ग्रंथ अपनी भाषा के कारण चर्चित है। इसमें कुछेक स्थानों पर उस समय की सामान्य प्रचलित भाषा का सुंदर रूप मिलता है। 

राउलवेल 
(रोड कवि) 

10वीं शती  

यह शिलांकित कृति है एवं गद्य-पद्य मिश्रित चंपूकाव्य है। 

इसमेंराउलनामक नायिका का नख-शिख वर्णन है साथ ही कलचुरि राजवंश के एक सामंत की सात नायिकाओं का नख-शिख-वर्णन है। 

इससे हिंदी में नख-शिख वर्णन की परंपरा का आरंभ होता है। 

उक्तिव्यक्तिप्रकरण 
(दामोदर शर्मा) 

12वीं शती 

बनारस और आसपास के प्रदेशों की संस्कृति और भाषा आदि पर प्रकाश डाला गया है। इससे उस युग के काव्य-रूपों की जानकारी भी प्राप्त होती है। इस दृष्टि से इसे हजारीप्रसाद द्विवेदी नेअत्यंत महत्त्वपूर्णमाना। 

इसमेंकोसलभाषा को अपभ्रष्ट कहा है। 

संस्कृत के समानांतर 12वीं सदी में व्यवहृत कौशली के उदाहरण भी वर्णित। 

व्याकरण के अनुकूल व्यवस्थित यह व्याकरणशास्त्र है। 

वर्णरत्नाकर 
(ज्योतिरीश्वर ठाकुर) 

14वीं शती 

हिंदू दरबार और भारतीय जीवन पद्धति का यथार्थ चित्रण। 

मैथिली हिंदी में रचित यह ग्रंथ शब्दकोश-सा प्रतीत होता है। 

सुनीति कुमार चटर्जी ने इसका संपादन किया है। 

  • कीर्तिलताऐतिहासिक चरितकाव्य है। 
  • विद्यापति-पदावलीका संपादनरामवृक्ष बेनीपुरीने किया। 
  • विद्यापति कीपदावलीअत्यंत प्रसिद्ध है। यह भक्तिपरक रचना है या  शृंगारपरक, इसे लेकर विद्वान विभिन्न वर्गों में विभक्तहैं। इसके संदर्भ में उल्लेख्य बिंदु इस प्रकार हैं- 
  • पदावलीमें प्रार्थना और नचारी के अंतर्गत पदों में दुर्गा, गंगा, जानकी, शिव, कृष्ण के आराधना-गीत हैं अतः बहुत से विद्वानों ने इन्हें भक्त कवि माना। 
  • मिथिला में इन्हें कोई वैष्णव भक्त कवि नहीं मानता, जबकि बंगाल में मानते हैं। 
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- "विद्यापति के पद अधिकतर  शृंगार के ही हैं जिनमें नायिका और नायक राधा-कृष्ण हैं। इन पदों की रचना जयदेव के गीतकाव्य के अनुकरण पर ही शायद की गयी हो। इनका माधुर्य अद्भुत है। विद्यापति शैव थे।..... विद्यापति को कृष्ण भक्तों की परंपरा में नहीं समझनाचाहिये।" 

विद्यापति के कवि-रूप के संदर्भ में विद्वानों के मत 

शृंगारी 

भक्त 

रहस्यवादी 

हरप्रसाद शास्त्री 

रामचंद्र शुक्ल 

सुभद्रा झा 

रामकुमार वर्मा 

रामवृक्ष बेनीपुरी 

बाबू ब्रजनंदन सहाय 

श्यामसुंदर दास 

हजारीप्रसाद द्विवेदी 

जॉर्ज ग्रियर्सन 

नागेंद्रनाथ गुप्त 

जनार्दन मिश्र 

  •  सर्वप्रथम ग्रिर्यसन ने विद्यापति को रहस्यवादी कहा। 
  • इनका संबंध शैव संप्रदाय से था। हिंदी में इन्हें कृष्णगीति परंपरा का प्रवर्तक माना जाता है जबकि हरप्रसाद शास्त्री नेइन्हें ‘पंचदेवोपासक’ माना। 
  • बच्चन सिंह ने इन्हेंजातीय कविकहा है। 
  • निराला ने पदावली के पदों कोनागिन की लहरकहाहै। 
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी नेशृंगार रस के सिद्ध वाक् कविकहाहै। 
  • विद्यापति कोमैथिल कोकिल’, ‘अभिनव जयदेव’, ‘कवि शेखर’, ‘कवि कण्ठहार’, ‘कवि रंजन’, ‘खेलन कवि’, ‘दशावधान’, ‘पंचाननइत्यादि उपाधियों से विभूषित किया गयाहै। 
  • आनंद कुमार स्वामी ने विद्यापति कीपदावलीको जीव और परमात्मा के संबंध का रूपक माना है। 
  • खुसरो को खड़ी बोली हिंदी का प्रथम कवि माना जाता है। 
  • इनका नाम अबुल हसन था और इनके गुरु निजामुद्दीन औलिया थे। 
  • संगीत में ये कव्वाली, तराना गायन-शैली और सितार के जन्मदाता माने जाते हैं। 
  • अमीर खुसरो को निम्न उपाधियों से नवाज़ा गया है- 

तोता--हिंद’ (अलाउद्दीन खिलजी द्वारा) 

कवियों में राजकुमार’ (प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डॉ. ईश्वरी प्रसादद्वारा) 

अवधी का प्रथम कवि’ (डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा) 

इन्होंने स्वयं कोतूतिए-हिंद’ (हिंदुस्तान की तूती) कहा है। 

अमीर का खिताब (अलाउद्दीन खिलजी द्वारा) 

  • खुसरो के बारे में प्रेमचंद लिखते हैं– "खुसरो ने खालिकबारी की रचना करके हिन्दुस्तानी की नींव रखी थी। इस ग्रंथ की रचना में कदाचित उसका यही अभिप्राय होगा कि जनसाधारण की आवश्यकता के शब्द उन्हें दोनों ही रूपों में सिखलाए जाएं, जिसमें उन्हें अपने रोजमर्रा के कामों में सहूलियत हो जाए। 

(प्रेमचंद के श्रेष्ठ निबंधसंपादक सत्यप्रकाश मिश्र) 

विद्यापति 

  • विद्यापति (1360-1450 .) पंडित हरि मिश्र के शिष्य थे। 
  • बिसफी गाँव (दरभंगा जिला) के थे और तिरहुत के राज-दरबार से जुड़े थे। 
  • इन्होंने तीन भाषाओं में चौदह ग्रंथों की रचना की- 

संस्कृत:शैव सर्वस्व सार, गंगा वाक्यावली, दुर्गाभक्त तरंगिणी, भू-परिक्रमा, दान-वाक्यावली, पुरुष परीक्षा, विभाग सार, लिखनावली, गया पतन एवं वर्षकृत्य। 

अवहट्ट:कीर्तिलता, कीर्तिपताका। 

मैथिली:पदावली, गोरक्ष विजय (नाटक)। 

(गोरक्ष विजय का गद्य भाग संस्कृत और पद्य भाग मैथिलीमेंहै।) 

पृथ्वीराज विजय 

  • पृथ्वीराज विजयकश्मीरी कवि जयानक की रचना मानी जाती है। 
  • ये एक प्राचीन संस्कृत महाकाव्य है। जिसका रचनाकाल 12वीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। 
  • इसकी एक ही प्रति उपलब्ध है, जो पूना के दक्षिण कॉलेज की लाइब्रेरी में सुरक्षित है। 
  • डॉ. बूलर के अनुसारइतिहास की दृष्टि से यह ग्रंथ अधिक प्रामाणिक है। 
  • इसमें पृथ्वीराज चौहान का वीरतापूर्ण वर्णन किया गया है। 
  • शारदा लिपि में रचित है। 

रचना एवं रचनाकार 

समय 

अन्य स्मरणीय बिंदु 

ढोला मारू रा दूहा 
(कल्लोल/कुशललाभ) 

11वीं शती 

लोक प्रचलित प्रेम काव्य। राजस्थान में अधिक लोकप्रिय। 

राजकुमार ढोला और राजकुमारी मारवणी की कथा। 

इसमें नारी-हृदय की अत्यंत मार्मिक व्यंजना मिलती है। 

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसके दोहों को हेमचंद्र और बिहारी के दोहों की बीच की कड़ी मानाहै। 

संदेशरासक 

अब्दुल रहमान (अद्दहमाण) 

11-12वीं शती 

देशीभाषा में मुसलमान द्वारा रचित प्रथम ग्रंथ था। 

संदेशरासकमें विक्रमपुर की एक वियोगिनी की व्यथा व्यक्तहुईहै। 

विश्वनाथ त्रिपाठी ने इसकी भाषा कोसंक्रातिकालीन भाषाकहाहै। 

यह प्रथम धर्मेतर रास ग्रंथ है। 

3 प्रक्रमों में विभाजित 223 छंदों का विरह युक्त काव्य है। 

वसंतविलास 
(रचनाकार अज्ञात) 

13वीं शती 

इसमें बसंत और स्त्रियों पर बसंत के विलासपूर्ण प्रभाव का मनोहारी अंकन है। इस  शृंगारिक काव्य का संपादन माताप्रसाद गुप्त ने किया और इसका समय 13वीं शताब्दी बताया है और 84 दोहों को ही वास्तविक माना है। 

इसकी भाषा से ही पिंगल सरस ब्रजभाषा का रूप लेती दिखती है। 

अमीर खुसरो की रचनाएँ 100 बताई जाती हैं, जिनमें मुख्य हैं- खालिक बारी, पहेलियाँ, मुकरिया, दो सुखने, गज़ल आदि।  

1253-1325 . 

इनकी पहेलियों और मुकरियों मेंउक्तिवैचित्र्यकी प्रधानता है। 

आवाज़--खुसरवीइनका संगीत संबंधी ग्रंथ है। 

खालिकबारीवस्तुतः फारसी-हिंदी शब्दकोश है। 

इनके ग्रंथनुहसिपहरमें भारतीय बोलियों का विस्तृत वर्णन है। (भाषा विज्ञान) 

विद्यापति पदावली 

(विद्यापति) 

14वीं शती 

 शृंगार-भक्तिपरक मुक्तक काव्य है, जिसके पदों की मादकता को निराला नेनागिन की लहरकहा है। 

रामवृक्ष बेनीपुरी ने विद्यापति की पदावलियों को जीव और परमात्मा के संबंध का रूपकमानाहै। 

  • उपर्युक्त चारों काव्य ग्रंथों एवं कवियों की भाषा प्राकृत की रूढ़ियों से बहुत कुछ या लगभग मुक्त ही है, जबकि तीनों गद्य-ग्रंथों की भाषा पर प्राकृत की रूढ़ियों का प्रभाव मिलता है। गद्य के तीनों ग्रंथों से आशय है- 

राउलवेल 

उक्तिव्यक्तिप्रकरण 

वर्णरत्नाकर 

  • ढोला मारू रा दूहामूलतः दोहे में रचित था, जिसमें 17वीं शती में कुशललाभ कवि ने कुछ चौपाइयाँ जोड़ीं। 

 

पृथ्वीराजरासो की भाषा 

चंदबरदाई 

गार्सां तासी 

डॉ. टेसीटरी 

दशरथ शर्मा एवं मनीराम रंगा 

 

षट्भाषा 

कन्नौजी 

पश्चिमी हिंदी 

अपभ्रंश या पुरानी राजस्थानी रासक  

(उपरूपक) 

 

विद्वान इसकी प्रामाणिकता को लेकर इस प्रकार विभाजित हैं- 

प्रामाणिक 

अर्ध प्रामाणिक 

अप्रामाणिक 

मिश्रबंधु 

मुनिजिन विजय 

डॉ. बूलर 

श्यामसुंदर दास 

हजारीप्रसाद द्विवेदी 

रामचंद्र शुक्ल 

मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या 

डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी 

मुंशी देवी प्रसाद 

कर्नल टॉड 

डॉ. दशरथ ओझा 

कविराज श्यामलदास 

 

 

गौरीशंकर हीराचंद ओझा 

इस विवाद से संबंधित मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं- 

  • सर्वप्रथम डॉ. बूलर ने 1875 . में जयानक कृतपृथ्वीराजविजय’ (संस्कृत भाषा) के आधार परपृथ्वीराजरासोको अप्रामाणिक घोषित किया। 
  • मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या के अनुसार इसकी तिथियों में वास्तविक तिथियों से 90-91 वर्षों का अंतर सायास किया गया है। इस प्रकार इन्होंनेआनंद संवत्की परिकल्पना की। 
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी- "इसकी रचना शुक-शुकी संवाद में हुई थी। जिन सर्गों में यह शैली नहीं मिलती उन्हें प्रक्षिप्त मानना चाहिये। इससे वे अंश ही प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं, जिनमें इतिहास विरुद्ध तथ्य हैं।" 
  • आदिकालीन काव्यग्रंथों में कथा कहने की परंपरा को लक्ष्य करके हजारीप्रसाद द्विवेदी नेपृथ्वीराजरासोके संदर्भ में लिखा- "कथा की परीक्षा इतिहास की दृष्टि से नहीं, काव्य की दृष्टि से होनी चाहिये। पुरानी कथाएँ काव्य ही अधिक हैं, इतिहास वे एकदम नहीं हैं।" 
  • पुरातन प्रबंध संग्रह’ (15वीं शती में संकलित) में इस ग्रंथ के कुछ छंद संगृहीत हैं, जिससे इसकी प्राचीनता प्रामाणित होती है। मुनिजिन विजय ने इसके एक अंशजयचंद प्रबंधकी ओर ध्यान दिलाया। 
  • आचार्य शुक्ल- "माना कि रासो इतिहास नहीं है, काव्यग्रंथहै। पर काव्य ग्रंथों में सत्य घटनाओं में बिना किसी प्रयोजन कोई उलट-फेर नहीं किया जाता।यह पूरा ग्रंथ वास्तव में जालीहै।" 
  • "यदि यह ग्रंथ (पृथ्वीराज रासो) प्रामाणिक है, तो यह भारत के इस भाग विशेष का तत्कालीन इतिहास है।" जॉर्ज ग्रियर्सन 

पृथ्वीराजरासो (चंदबरदाई) 

  • मिश्रबंधुओं ने लिखा है, "हिंदी का वास्तविक प्रथम महाकवि चंदबरदाई को ही कहा जा सकता है।" 
  • आचार्य शुक्ल "ये (चंदबरदाई) हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनकापृथ्वीराजरासोहिंदी का प्रथम महाकाव्य है।" 
  • रामस्वरूप चतुर्वेदी "पृथ्वीराज रासउ हिंदी की अपनी महाकाव्य परंपरा की बड़ी उपयुक्त प्रस्तावना है। हिंदी का चरित्र, पहली बार ही, बड़े मोहक रूप में भाषा और संवेदना के दोनों स्तरों पर इसमें निखर कर आया है।" 
  • "वस्तुतः हिंदी में चंद को छंदों का राजा कहा जा सकता है।" 

हजारीप्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह  

(‘संक्षिप्त पृथ्वीराजरासो’) 

  • शिवसिंह सेंगर नेचदंबरदाईको छप्पयों का राजा कहा। 
  • बच्चन सिंह "यह एक राजनीतिक महाकाव्य है, दूसरे शब्दों में राजनीति की महाकाव्यात्मक त्रासदी है।" 
  • इसमें रासो काव्य के साथ-साथचरित काव्य’, ‘कथाकाव्य’, ‘आख्यायिकाआदि के लक्षण भी दृष्टिगोचर होते हैं। 
  • इसका सबसे बड़ा समयकनवज्ज युद्धहै। इसे इस ग्रंथ का मूल कथानक भी माना जाता है। 
  • कयमासवधनामक खंड में मंत्री कयमास के कामांध हो जाने और इस कारण पृथ्वीराज का उसका वध करने का कथानक वर्णित है। 
  • पृथ्वीराजरासोका रचनाकाल और मूल रूप सर्वाधिक विवादित है।  
  • पृथ्वीराज रासोका शुरुआती प्रकाशन सन 1865 . में फर्रुखाबाद केचार्ल्स इलियट’ (कलक्टर) ने कराया था। 
  • पृथ्वीराज रासो की जो हस्तलिखित प्रतियाँ उपलब्ध हैं, उनसे रासो के चार रूपांतर अस्तित्व में आये हैंवृहद् रूपांतर में अध्यायों कोसमयकहा है। मध्यम रूपांतर में अध्यायों कोप्रस्तावकहा है। लघुतम रूपांतर में अध्यायों कोखंडकहा है। लघुतम रूपांतर में अध्यायों का विभाजन नहीं है। 
  • पृथ्वीराज रासो में यात्राओं के प्रमुख तीन हेतु हैं 

मृगया (आखेट) 

विवाह 

युद्ध (रण) 

  • डॉ. दशरथ शर्मा तथामीनाराम रंगाने पृथ्वीराज रासो की भाषा कोअपभ्रंशऔरपुरानी राजस्थानीबताया है। 
  • "पृथ्वीराज रासो की भाषा का प्रथम अध्ययन श्री ग्राउस ने किया था। सन् 1973 . के रायल एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने रासो की भाषा को 12वीं शताब्दी के साहित्य में प्रयुक्त होने वाली ब्रजभाषा माना है।" 

–(चंदबरदाई -डॉ. सुमनराजे, पृष्ठ 83) 

  • "इस काव्य के अधिकांश छंद प्राकृत और अपभ्रंश युग के हैं। इसके मूलरूप का प्रणयन 12वीं शताब्दी में ही हुआ होगा, जबकि इन छंदों का बोलबाला था, चंद ऐसे ही छंदों के राजा कहे जाते हैं।" 

डॉ. विपिन बिहारी त्रिवेदी 

रासो काव्य दो रूप में मिलता है

  • प्रबंध एवं वीरगीत (बैलेड्स)।  
  • आचार्य शुक्ल के अनुसार, "साहित्यिक प्रबंध के रूप में जो प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध है, वह है– ‘पृथ्वीराजरासो’। वीरगीत के रूप में हमें सबसे पुरानी पुस्तकबीसलदेवरासोमिलती है, यद्यपि उसमें समयानुसार भाषा के परिवर्तन का आभास मिलता है। जो रचना कई सौ वर्षों से लोगों में बराबर गायी जाती रही हो, उसकी भाषा अपने मूल रूप में नहीं रह सकती। इसका प्रत्यक्ष उदाहरणआल्हाहै जिसके गाने वाले प्रायः समस्त उत्तरी भारत में पाये जाते हैं।" 
  • प्रबंध का सर्वप्रथम ग्रंथखुमाणरासोहै। 
  • वीरगीत वीरकाव्य परंपरा का सर्वप्रथम ग्रंथबीसलदेवरासोहै। 

प्रमुख रासो ग्रंथ 

रचना एवं रचनाकार 

रचनाकाल 

काव्यरूप 

संबंधित उल्लेख्य बिंदु 

खुमाणरासो 
(दलपतविजय) 

9वीं शती 

प्रबंध 

चित्तौड़ नरेश खुमाण की वीरता (विशेषतः बगदाद के खलीफा अलमामू से युद्ध विजय) का वर्णन किया गया है। 

मेवाड़ के परवर्ती शासकों (महाराणा प्रताप सिंह, राज सिंह) का वर्णन है। इससे लगता है कि यह रचना विक्रम की 17वीं शती के आसपास की है। किंतु यह बाद में जोड़ा गया। 

यह 5000 छंदों का विशाल काव्य ग्रंथ है। 

आचार्य शुक्ल, "शिवसिंह सरोज के कथानुसार एक अज्ञात नामाभाट ने रचा जिसमें श्रीरामचंद्र से लेकर खुमान तक के युद्धों का वर्णन था। यह नहीं कहा जा सकता कि दलपतविजय असली खुमानरासो का रचयिता था अथवा उसके पिछले परिशिष्ट का।" 

विजयपालरासो (नल्हसिंह भाट) 

11वीं शती 

वीरगीत 

यह रचना अनुपलब्ध है। 

विजयगढ़ के राजा विजयपाल का प्रशस्ति-ग्रंथ। 

बीसलदेवरासो 
(नरपति नाल्ह) 

12वीं शती 

वीरगीत 

(100 पृष्ठों का छोटा-सा ग्रंथ) 

एक विरहपरक संदेश काव्य, जिसमें अजमेर के राजा चौहान बीसलदेव तथा राजा भोज की पुत्री राजमती के विवाह, वियोग और पुनर्मिलन की कथा है। 

रासो होते हुए भी यह प्रधानतः  शृंगारी काव्य है। 

हिंदी में सर्वप्रथम बारहमासा वर्णन इसमें मिलता है। 

राजस्थानी भाषा में रचित। 

रानीपन और सांमती जीवन से बंधनमुक्ति की अभिव्यक्ति का ग्रंथ। 

पृथ्वीराजरासो (चंदबरदाई) 

 

12वीं शती 

प्रबंध (पिंगल शैली) 

पृथ्वीराज चौहान के शौर्य और वीरता के अलावा, संयोगिता के साथ उनकी प्रेम-कहानी का भी सुंदर वर्णन किया है। 

69 समय (सर्ग) और 68 प्रकार के छंदों का प्रयोग। 

मुख्य छंद हैंः कवित्त, छप्पय, दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या। चंद कविछप्पय छंदके विशेषज्ञ थे। 

वीर और  शृंगार रस प्रमुख हैं और इसका अंगीरसवीरही माना जाता है। 

जयचंद प्रकाश  
(भट्टकेदार) 

12वीं शती 

 

वीरगीत प्रबंध 

 

इन दोनों रचनाओं में कन्नौज के सम्राट जयचंद के शौर्य और पराक्रम की कथा का वर्णन होना अनुमानित किया जाता है। 

दोनों ग्रंथ अप्राप्य हैं किंतु सिंठापच दयालदास कृतराठौरां री ख्यातमें इनका  
उल्लेखहै। 

जयमयंक जस चंद्रिका (मधुकर कवि) 

12वीं शती 

प्रबंध 

परमालरासो 
(जगनिक) 

13वीं शती 

वीरगीत 

महोबा के राजा परमाल देव के दो वीरों आल्हा और ऊदल (उदयसिंह) की वीरता का वर्णन। 

उत्तर प्रदेश में वर्षा ऋतु मेंआल्हाखंडके नाम से गाया जाता है। केंद्र बैसवाड़ा है। फर्रुखाबाद के तत्कालीन क्लेक्टर चार्ल्स इलियट ने सर्वप्रथम 1865 . में इसे प्रकाशित करवाया था। 

रणमल्ल छंद 
(श्रीधर) 

14वीं शती 

वीरगीत 

ईडर के राठौर राजा रणमल्ल की पाटन के सूबेदार जफर खाँ पर प्राप्त विजय कावर्णन। 

यह 70 छंदों का काव्य ग्रंथ है। 

शारंगधर कृतहम्मीररासो’ (14वीं शती) भी रासो काव्य है, जो कि अनुपलब्ध है। 

कीर्तिलता (विद्यापति) 

14वीं शती का अंत या 15वीं का आरंभ 

(इन दोनों का समय 

प्रबंध (पूरबी अपभ्रंश) 

तिरहुत के राजा कीर्तिसिंह द्वारा अपने पिता का बदला लेने का वर्णन। 

ऐतिहासिक महत्त्व-जौनपुर नगर का यथार्थ वर्णन। 

कवि ने इसे स्वयंकहाणीकहा है। 

स्वयं इसकी भाषा कोअवहट्टकहा। 

इसकी रचना भृंग-भृंगी संवाद में है। 

कीर्तिपताका (विद्यापति) 

 

यह अप्राप्य है। 

तिरहुत के राजा शिवसिंह की प्रशस्ति है। 

 

रासोशब्द की उत्पत्ति के संदर्भ में 

प्रस्तोता 

मूल शब्द 

गार्सां तासी 

हरप्रसाद शास्त्री 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

नंददुलारे वाजपेयी 

हजारीप्रसाद द्विवेदी 

रामस्वरूप चतुर्वेदी 

दशरथ शर्मा 

माता प्रसाद गुप्त 

गणपतिचंद्र गुप्त 

काशीप्रसाद जायसवाल 

राजसूय 

राजयश 

रसायण से रास या रासो 

रास 

रासक (उपरूपक) 

रासउ का रस 

रासक 

रासक 

रासक-रास-रासा-रासु-रासो 

रहस्य 

शालिभद्र सूरि 

  • शालिभद्र सूरि केबुद्धि रासका संग्रह उनके शिष्य शिवि ने किया था। 
  • बुद्धिरास एक प्रेमकाव्य है। 
  • शालिभद्र सूरि का प्रसिद्ध ग्रंथ भरतेश्वर बाहुबली रास (1184.)है। 
  • यह 205 छंदों में रचित खंडकाव्य है। 
  • अयोध्या के राजा भरत और तक्षशिला के राजा बाहुबली को लेकर शालिभद्र सूरि द्वारा इस चरित काव्य की रचना की गयी। 
  • इसका संपादन मुनि जिनविजय ने किया है। 

आसगु कवि 

  • आसगु कवि ने दो ग्रंथ लिखे हैं 
    चंदनबालारास’ (1200 .) (यह 35 छंदों का खंडकाव्यहै।) 
    जीव-दया रास 

विनयचंद्र सूरि 

  • विनयचंद्र सूरि कृतनेमिनाथ चउपईसे चौपाई छंद में बारहमासा - वर्णन का आरंभ माना जाता है 

विजयसेन सूरि 

  • विजयसेन सूरि का प्रसिद्ध ग्रंथरेवंतगिरि रास(1231 .) है। 
  • इसमें जैन तीर्थ रेवंतगिरि और तीर्थंकर नेमिनाथ की प्रतिमा का महत्त्व वर्णित है। 
  • यह महत्त्व ऐतिहासिक और पौराणिक इतिवृत्त तथा प्राकृतिक सौंदर्य के आधार पर वर्णित किया गया है। 
  • रेवंतगिरि रासकी ही तरह कवि कल्हण कृतआबू रास(1232 .) में प्रसिद्ध जैन तीर्थ आबू मंदिर का वर्णन मिलताहै। 

अन्य रास काव्य एवं कवि 

  • स्थूलिभद्र रास (1209 .) - जिनधर्म सूरि (जिणधाम) 
  • नेमिनाथ रास (1213 .) मुनि सुमतिगण 
  • गय सुकुमार रास (14वीं शती) देल्हण 
  • पुराण-सार चंद्रमुनि 
  • योगसार योगचंद्र मुनि 
  • श्रावकाचारएवंभरतेश्वर-बाहुबली रासकी तुलना मेंचंदनबालारास’ ‘स्थूलिभद्ररास’, ‘रेवंतगिरि रासएवंनेमिनाथरासकी भाषा प्राकृत की रूढ़ियों (अपभ्रंश के प्रभाव) से बहुत कुछ मुक्त है। 

फागु काव्य 

  • जैन कवियों ने फागु काव्य भी लिखे। 
  • फागुबसंत ऋतु, होली आदि के अवसर पर गाया जाने वाला मादक गीत होता है। 
  • सर्वाधिक प्राचीन फागु-ग्रंथ जिनचंद सूरि कृतजिनचंद सूरि फागु(1284 .) को माना जाता है। इसमें 25 छंद हैं। 
  • स्थूलिभद्र फागुको इस काव्य परंपरा का सर्वाधिक सुंदर ग्रंथ माना गया है। 
  • विरह देसावरी फागुश्रीनेमिनाथ फागु’ (राजशेखर सूरि) इसी परंपरा के अन्य चर्चित ग्रंथ हैं। 
  • श्री नेमिनाथ फागु का प्रमुख रसशृंगारहै। 
  • श्री नेमिनाथ फागु 1350 . की रचना है। इसमें नेमिनाथ एवं राजुल के विवाह का वर्णन है। संपूर्ण काव्य मात्र 27 छंदो में लिखा गयाहै। 
  • वसंतविलास फागुधर्मेतर फागु ग्रंथ है। 
  • सिद्धों का प्रभाव भारत के पूर्वी भागों में अधिक रहा तो नाथों का पश्चिमी भाग (राजपूताना, पंजाब) में। जैनों ने अपना अधिकांश काव्य राजस्थान, गुजरात और दक्षिण में लिखा। 

जैन मत संबंधी रचनाएँ दो तरह की हैं- 

  • प्रायः दोहों में रचितमुक्तक काव्यमें सिद्धों-नाथों की तरह अंतस्साधना, धर्म सम्मत व्यवहार आचरण, उपदेश, नीति आदि का मंडन और कर्मकांड, वर्ण व्यवस्था आदि का खंडनहै। 
  • पौराणिक जैन साधकों की प्रेरणादायी जीवन कथा या लोक प्रचलित हिंदू कथाओं को आधार बनाकर जैन मत का प्रचार करने के लियेचरित काव्यआदि लिखे गए हैं। 
  • सबसे ज्यादा चरित काव्य जैनियों ने लिखे। 
  • स्वयंभू, पुष्यदंत, धनपाल, जिनदत्त सूरि, हेमचंद्र, सोमप्रभ सूरि, जैनाचार्य मेरुतुंग आदि जैन कवि थे। 

जैन साहित्य में रास काव्य-परंपरा प्रसिद्ध रही। उससे संबंधित मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं- 

  • प्राचीनतम ग्रंथ – ‘रिपुदारणरास’ (संस्कृत भाषा)
    (डॉ. दशरथ ओझा ने 905 . समय माना है।)
  • अपभ्रंश में प्रथम – ‘उपदेशरसायनरास’ (जिनदत्त सूरि) 
  • हिंदी में प्रथम – ‘भरतेश्वर बाहुबली रास’ (शालिभद्र सूरि) 
  • प्रथम धर्मेतर रास – ‘संदेश रासक’ (अब्दुल रहमान) 
  • हिंदी का प्रथम ऐतिहासिक रास – ‘पंचपांडव चरित रास’ (शालिभद्र सूरि-II) (1350 .) .
  • डॉ. नगेंद्र ने  देवसेन कृतश्रावकाचारको हिंदी की प्रथम रचना माना है। 

    देवसेन 

    • देवसेन का प्रसिद्ध ग्रंथश्रावकाचार’ (933 .) है। 
    • आचार्य शुक्ल के अनुसार, "इसकी भाषा अपभ्रंश का अधिक प्रचलित रूप लिये हुए है, जैसे–  
      जो जिण सासण भाषियउ सो मइ कहियउ सारु। 
      जो पालइ सइ भाउ करि सो सरि पावइ पारु।।" 
    • श्रावकाचारमें 250 दोहों में श्रावक धर्म का वर्णन है। गृहस्थ जीवन धर्म उस वर्णन का केंद्र है। 
    • इनका एक अन्य ग्रंथदब्ब-सहाय-पयास’ (द्रव्यस्वभाव प्रकाश) भी दोहों में है। इसेबृहत नयचक्रभी कहा जाता है और बाद में शुभंकर के कहने से माइल्ल धवल ने इसेगाथाबंध’ (प्राकृत भाषा) में कर दिया था। 
    • इनकानयचक्र’ (लघुनयचक्र) भी प्रसिद्ध ग्रंथ है। 
    • देवसेन ने अपने ग्रंथदर्शनसारमें जैन धर्म के अनेक संघों की उत्पत्ति लिखी है और उसेजैनाभासनाम दिया है। 
    • देवसेन के अन्य ग्रंथ हैं- ‘आराधनासार’, ‘तत्त्वसार’, ‘भाव संग्रहऔरसावय धम्म दोहा’। 
    • डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल की खोज में 40 पुस्तकों का पता चला था, जिन्हें गोरखनाथ द्वारा रचित बताया जाता है। 
    • डॉ पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम 14 ग्रंथों को असंदिग्ध रूप से प्राचीन माना, क्योंकि इनका उल्लेख प्रायः सभी प्रतियों में मिला। उनका संपादनगोरखबानीके नाम से किया। 

    ये 14 ग्रंथ निम्न हैं 

    1. सबदी
    2. पद
    3. शिष्या दर्शन
    4. प्राण संकली
    5. नरवैबोध
    6. आत्मबोध
    7. अभयमात्रा योग
    8.  पंद्रहतिथि
    9. सप्तवार
    10. मछिंद्र गोरखबोध
    11. रोमावली
    12. ग्यानतिलक
    13. ग्यान चौंतीसा
    14. पंचमात्रा
    • इनके संस्कृत भाषा में लिखे ग्रंथ हैं- 1. सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति,  
      2. विवेक मार्तंड, 3. शक्ति संगम तंत्र, 4. निरंजन पुराण, 5. वैराट पुराण, 6. गोरक्षशतक, 7. योगसिद्धांत पद्धति, 8. योग चिंतामणिआदि। 
    • आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमान्वित भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ। भारतवर्ष के कोने-कोने में उनके अनुयायी आज भी पाये जाते हैं। भक्ति आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का भक्ति मार्ग ही था। गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेताथे।" 

    अन्य उल्लेख्य बिंदु 

    • चौरंगीनाथ गोरखनाथ के शिष्य थे। भक्तों में येपूरनभगतके नाम से प्रसिद्ध हुए। 
    • इन नाथों को इन नामों से भी जाना जाता है- 

    मत्स्येंद्रनाथ मीननाथ, मछंदरनाथ, चौथे बोधिसत्व अवलोकितेश्वर 

    जलंधर बालनाथ 

    नागार्जुन रसायनी 

    चौरंगीनाथ पूरनभगत 

    • नागार्जुन, गोरखनाथ, चर्पट और जलंधर का नाम नाथ और सिद्ध दोनों में गिना जाता है। 
    • आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार– "नाथ-पंथ या नाथ संप्रदाय के सिद्ध-मत, सिद्ध-मार्ग, योग-मार्ग, योग संप्रदाय, अवधूत-मत एवं अवधूत संप्रदाय नाम भी प्रसिद्ध हैं।" (कबीरपुस्तक से) 
    • आचार्य शुक्ल के अनुसार– "गोरखनाथ के नाथपंथ का मूल भी बौद्धों की यही वज्रयान शाखा है। चौरासी सिद्धों में गोरखनाथ (गोरक्षपा) भी गिन लिये गए हैं। पर यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मार्ग अलग कर लिया।" 
    • डॉ. नगेंद्र के अनुसार "सिद्धों की वाममार्गी भोगप्रधान योगसाधना की प्रतिक्रियास्वरूप आदिकाल में नाथपंथ की हठयोग साधना प्रारंभहुई।"  
    • राहुल सांकृत्यायन के अनुसार– "नाथपंथ सिद्धों की परंपरा का विकसित रूपहै।" 
    • रामकुमार वर्मा के अनुसार– "नाथों का समय 12वीं सदी से 14वीं सदी के अंत तक है।" 

    नवनाथ 

    गोरक्ष सिद्धांत संग्रह के अनुसार 

    डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार 

    1. नागार्जुन 6. गोरक्षनाथ

    2. जड़भरत 7. चर्पटनाथ

    3. हरिश्चंद्र 8. जलंधरनाथ 

    4. सत्यनाथ 9. मलयार्जुन 

    5. भीमनाथ 

    1. आदिनाथ 6. चौरंगीनाथ 

    2. मत्स्येंद्रनाथ 7. ज्वालेंद्रनाथ 

    3. गोरखनाथ 8. भर्तृनाथ 

    4. गाहिणीनाथ 9. गोपीचंदनाथ 

    5. चर्पटनाथ (चरकानंद) 

    • आदिनाथ को बाद के संतों नेशिवमाना है। 
    • मत्स्येंद्रनाथ का वास्तविक नाम विष्णु शर्मा माना गया है। इनकी संस्कृत रचनाकाल ज्ञान निर्णयका संपादन प्रबोधचंद्र बागची ने किया है। अभिनवगुप्त ने अपने ग्रंथतंत्रालोकमें इनकी वंदनाकी है। 

    गोरखनाथ 

    • गोरखनाथ मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य थे। 
    • इनके समय को लेकर विवाद है- 

    राहुल सांकृत्यायन845 . 

    हजारीप्रसाद द्विवेदी - 9वीं शती 

    पीतांबरदत्त बड़थ्वाल11वीं शती 

    रामचंद्र शुक्ल, रामकुमार वर्मा13वीं शती 

    • मिश्रबंधुओं ने इन्हें हिंदी का प्रथम गद्य लेखक कहा। 
    • सिद्धों के दोहों में मतों का खंडन-मंडन होता है और चर्यापदों में सिद्धों की अनुभूति और रहस्य भावना प्रकट हुई है। सिद्धों का दोहा और चर्यापद संत साहित्य मेंसाखीऔरसबदमें रूपांतरित हो गया। सिद्धों के चर्यापद की भाषा उनके दोहों की तुलना में अपभ्रंश की रूढ़ियों से अधिक मुक्त होती हुई दिखाई पड़ती है। 
    • आचार्य शुक्ल ने लिखा है, "कण्हपा की रचनाओं में उपदेश की भाषा तो पुरानी टकसाली हिंदी (काव्यभाषा) है, पर गीत की भाषा पुरानी बिहारी या पूरबी बोली मिली है। यही भेद हम आगे चलकर कबीर कीसाखी’, रमैनी’ (गीत) की भाषा में पाते हैं। साखी की भाषा तो खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य भाषासधुक्कड़ीहै पर रमैनी के पदों की भाषा में काव्य की ब्रजभाषा और कहीं-कहीं पूरबीबोलीभीहै।" 
    •  

    लुइपा 

    • इनकी रचनाओं में रहस्यवादी स्वर की प्रमुखता है। 
    • लुइपा (जन्म सन् 773 .) शबरपा के शिष्य थे। 
    • सिद्धों में लुइपा का सबसे ऊँचा (सम्मानजनक) स्थान माना जाताहै। 
    • इन्हेंसहज धर्म का प्रथम आचार्यभी माना जाता है। 
    • बुद्धोदय, अभिसमय विभाग और गीतिका इनके प्रमुख ग्रंथ हैं। 
    • उडीसा के राजा दारिपा और उनके मंत्री डोंगीपा लुइपा से प्रभावित होकर इनके शिष्य बन गए। 

    कण्हपा 

    • कण्हपा (जन्म सन् 820 .) जलंधरपा के शिष्य थे। 
    • राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है, "कण्हपा पांडित्य और कवित्व में बेजोड़ थे।" 

    डोम्भिपा 

    • डोम्भिपा (जन्म सन् 840 .) विरूपा के शिष्य थे। 
    • इनके 21 ग्रंथ बताए जाते हैं, जिनमेंडोम्बि-गीतिका’, ‘योगचर्या’, ‘अक्षरद्विकोपदेशप्रसिद्ध हैं। 
    • दोहाकोशका संपादन डॉ. प्रबोध चंद्र बागची ने किया है। इसमें सरहपा, तिल्लोपा और कण्हपा के दोहे संगृहीत हैं। 
    • हरप्रसाद शास्त्री ने सिद्धों की रचनाओं का संग्रह बँगला अक्षरों मेंबौद्धगान दूहाके नाम से निकाला था। 
    • आचार्य शुक्ल नेरत्नाकर जोपम कथाको सिद्धों से संबद्ध रचना बताया है। 
    • जैनों की सदाचार, उपदेश, रहस्य-साधना वाली मुक्तक रचनाएँ सिद्धों की रचनाओं से बहुत मिलती हैं। इनमें भी सहज पर बल दिया गया है। जोइंदु (10वीं शती), रामसिंह (लगभग 12वीं शती) आदि इस कोटि के प्रमुख जैन कवि हैं।  विश्वनाथ त्रिपाठी 
    • सिद्धों की संख्या 84 है। इनका केंद्र श्रीपर्वत था। 
    • सिद्धों ने संधा भाषा-शैली का प्रयोग किया है। इसका प्रभाव नाथों से होता हुआ भक्तिकालीन निर्गुण संत कवियों पर पड़ा और उन्होंने उलटबाँसियाँ लिखीं। सिद्धों की भाषा को ‘संधा भाषा’ का नाम मुनिदत्त और अद्वयवज्र ने दिया। 
    • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने चौरासी सिद्धों के नाम इस प्रकार दिये हैं- 

    लूहिपा, लीलापा, विरूपा, डोंभिपा, शबरपा, सरहपा, कंकालीपा,मीनपा, गोरक्षपा, चौरंगीपा, वीणापा, शांतिपा, तंतिपा, चमरिपा, खड्गपा, नागार्जुन, कण्हपा, कर्णरिपा, थगनपा, नारोपा, शीलपा, तिलोपा, छत्रपा, भद्रपा, दोखंधिपा, अजागिपा, कालपा, धोंभीपा, कंकणपा, कमरिपा, डेंगिपा, भदेपा, तंधेपा, कुक्कुरिपा, कुचपा, धर्मपा, महीपा, अचिंतिपा, भल्लहपा, नलिनपा, भूसुकुपा, इंद्रभुति, मेकोपा, कुठालिपा, कमरिपा, जालंधरपा, राहुलपा, धर्वरिपा, धोकरिपा, मेदिनीपा, पंकजपा, घंटापा, जोगीपा, चेलुकपा, गुंडरिपा, निर्गुणपा, जयानंत, चर्पटीपा, चपंकपा, भिखनपा, भलिपा, कुमरिपा, चँवरिपा, मणिभद्रपा (योगिनी), कनखलापा (योगिनी), कलकलपा, कंतालीपा, धहुरिपा, उधरिपा, कपालपा, किलपा, सागरमपा, सर्वभक्षपा, नागबोधिपा, दारिकपा, पुतलिपा, पनहपा, कोकालिपा, अनंगपा, लक्ष्मीकरा (योगिनी), समुदपा, भलिपा। 

    सरहपा 

    • प्रथम सिद्ध सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि भी माना जाता है। 
    • राहुल सांकृत्यायन ने सिद्ध सरहपा का समय 769 . स्वीकार किया है। 
    • सरहपा को सरोजवज्र, राहुल भद्र आदि नामों से भी जाना जाता है। 
    • डॉ. वी. भट्टाचार्य ने इन्हें बांग्ला भाषा का प्रथम कवि माना है। 
    • इनके 32 ग्रंथ बताए जाते हैं, जिनमें ‘दोहाकोश’ प्रसिद्ध है। 
    • चर्यागीत कोश इनकी अन्य उल्लेखनीय रचना है। 
    • हिंदी में सर्वप्रथम चौपाई और दोहा पद्धति का प्रयोग इन्हीं की रचनाओं में मिलता है। 
    • बच्चन सिंह ने लिखा है, "आक्रोश की भाषा का पहला प्रयोग सरहपा में ही दिखाई देता है।" 

    शबरपा 

    • शबरपा सरहपा के शिष्य थे। जन्म 780 . में माना गया है। 
    • शबरों की वेशभूषा में रहने से शबरपा नाम पड़ा। 
    • इनका प्रसिद्ध ग्रंथ चर्यापद है। 
    • चर्यापद एक प्रकार का गीत है जो प्रायः अनुष्ठानों के समय गाया जाता है। 
    • चर्यापद संधा भाषा-शैली के दृष्टि-कूट में लिखी गई है। दृष्टि-कूट के दोहरे अर्थ होते हैं। 

    प्राकृत पैंगलम् 

    • प्राकृत पैंगलम्’ (प्राकृत-पिंगल सूत्र) में विद्याधर, शारंगधर, जज्जल, बब्बर आदि कवियों की रचनाएँ मिलती हैं। 
    • इसमें प्राकृत और अपभ्रंश के छंदों की विवेचना के रूप में विभिन्न कवियों की रचनाएँ (छंद) संकलित की गई हैं। 
    • इसका संग्रह 14वीं शती के अंत में लक्ष्मीधर ने किया था। 
    • वंशीधर नामक किसी विद्वान ने इसकी टीका लिखी है। 
    • आदिकाल में लिखा गया वैष्णव साहित्य बहुत ही कम मात्रा में उपलब्ध है। लेकिनप्राकृत पैंगलमके अनेक छंदों में विष्णु के विभिन्न अवतारों से संबंधित पंक्तियाँ मिलती हैं। इसी प्रकार हेमचंद्र (12वीं शती) केप्राकृत व्याकरणमें संकलित अपभ्रंश दोहों में भी कृष्ण, राधा, दशमुख आदि की चर्चा आती है। यानी रचा तो गया होगा, पर अनुपलब्ध है। 
    • प्राकृत पैंगलम्में संकलित कवि बब्बर के पद्यों मेंसुखी और संपन्न जीवन क्या है?’ का चित्रण मिलता है। 
    • प्राकृत पैंगलम्में वर्णित आठ छंदों के आधार पर आचार्य शुक्लनेहम्मीररासोकी कल्पना की इसके रचयिता शारंगधर को माना। 
    • यह प्रशस्तिमूलक मुक्तक काव्य है। 

    शारंगधर 

    • रणथंभौर के सुप्रसिद्ध वीर महाराज हम्मीरदेव के प्रधान सभा सदों में राघवदेव थे। उनके भोपाल, दामोदर और देवदास ये तीन पुत्र हुए। दामोदर के तीन पुत्र हुएशारंगधर, लक्ष्मीधर और कृष्ण। 
    • आचार्य शुक्ल ने शारंगधर का समय विक्रम की 14वीं शती के अंतिम चरण में माना है। 
    • शुक्ल जी नेहम्मीररासोका रचयिताशारंगधरऔर राहुल सांकृत्यायन नेजज्जलको माना। 
    • हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, ‘हम्मीरशब्द किसी पात्र का नाम होकर विशेषण है, जो अमीर का विकृत रूप है। 
    • शारंगधर काशारंगधर पद्धतिग्रंथ संस्कृत का पद्यकोष है, जिसमें बीच-बीच में देशभाषा के वाक्य भी रखे गए हैं। इसमें अपना परिचय भी दिया है। 
    • शारंगधर पद्धतिमें बहुत-से शाबर मंत्र और भाषा-चित्र-काव्यदियेहैं। 
    • शारंगधर का आयुर्वेद का ग्रंथ भी प्रसिद्ध रहा। 
    • रामचंद्र शुक्ल के अनुसार- ‘ये अच्छे कवि और सूत्रकार भी थे। 
    • डॉ. बच्चन सिंह ने इन्हें अनुमानतःकुंडलिया छंद का प्रथम प्रयोक्तामाना है। 

    जैनाचार्य मेरुतुंग 

    आचार्य शुक्ल ने इनके संदर्भ में लिखा है- 

    • "‘प्रबंध चिंतामणि(1304 .) नामक एक संस्कृत ग्रंथभोज-प्रबंधके ढंग का बनाया, जिसमें बहुत से पुराने राजाओं के आख्यान संगृहीतकिये।" 
    • "इन्हीं आख्यानों के अंतर्गत बीच-बीच में अपभ्रंश के पद्य भी उद्धृत हैं जो बहुत पहले से चले आते थे।" 
    • "कुछ दोहे तो राजा भोज के चाचा मुंज के कहे हुए हैं। मुंज के दोहे अपभ्रंश या पुरानी हिंदी के बहुत ही पुराने नमूने कहे जा सकतेहैं।" 
    • "मुंज ने जब तैलंग देश पर चढ़ाई की थी तब वहाँ के राजा तैलप ने उसे बंदी कर लिया था और रस्सियों से बाँधकर अपने यहाँ ले गया था। वहाँ उसके साथ तैलप की बहिन मृणालवती से प्रेम होगया।" 
    • इसमेंदूहा विद्याविवाद-प्रसंग मिलता है। कहीं-कहीं अपभ्रंश के दोहे भी हैं। यह ऐतिहासिक महत्त्व की गद्य रचना है। 
    • इसमेंप्राकृत पैंगलममें जैनेतर रचनाएँ भी संकलित हैं। 

    विद्याधार (विक्रम की 13वीं शती) 

    • आचार्य शुक्ल के अनुसार, इस नाम के एक कवि ने कन्नौज के किसी राठौर सम्राट (शायद जयचंद) के प्रताप और पराक्रम का वर्णन किसी ग्रंथ में किया था। ग्रंथ का पता नहीं पर कुछ पद्यप्राकृत पिंगल सूत्रमें मिलते हैं, जैसे 

    भअ भज्जिअ बंगा भंगु कलिंगा तेलंगा रण मुत्ति चले। 

    मरहट्ठा घिट्ठा लग्गिअ कट्ठा सोरट्ठा भअ पाउ पले।। 

    चंपारण कंपा पब्बअ झंपा उत्थी उत्थी जीव हरे। 

    कासीसर राणा किअउ पआणा, बिज्जाहर भण मंतिवरे।। 

    चतुर्मुख 

    • हरिषेण ने धम्म परीक्खा में अपभ्रंश के तीन कवियों का उल्लेख किया है- चतुर्मुख, स्वयंभू और पुष्यदंत। 
    • स्वयंभू ने चतुर्मुख को पद्धड़िया बंध का प्रवर्तक और सर्वश्रेष्ठ कवि कहा है। 

    मुनि रामसिंह 

    • मुनि रामसिंह को अपभ्रंश का सर्वश्रेष्ठ रहस्यवादी कवि माना जाता है। 
    • डॉ. हीरालाल ने इनका आविर्भाव का समय 1000 . माना है। 
    • इनकापाहुड दोहाग्रंथ चर्चित रहा है। 

    हेमचंद्र 

    • हेमचंद्र (जन्म 1088 .) अपने समय के सबसे प्रसिद्ध जैन आचार्यथे। 
    • गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह और उनके भतीजे कुमारपाल के यहाँ इनका बड़ा मान था। 
    • इन्हेंप्राकृत का पाणिनिकहा जाता है। 
    • इन्होंने अपभ्रंश के भाषिक और व्याकरणिक रूप का स्पष्ट, सुव्यवस्थित और मानक विवेचन किया। 
    • राजा सिद्धराज के समय में रचितसिद्ध हेम/शब्दानुशासन (‘प्राकृत व्याकरण’) इनका प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है। इसमें संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों को उदाहरणों के रूप में समावेश किया गया है। 
    • अपने व्याकरण के उदाहरणों के लिये हेमचंद्र ने भट्टी के समान एकद्वयाश्रय काव्यकी भी रचना की है जिसके अंतर्गतकुमारपालचरितनामक एक प्राकृत काव्य भी है। इस काव्य में भी अपभ्रंश के पद्य रखे गए हैं। 
    • इनके अन्य ग्रंथ हैं- योगशास्त्र, छंदानुशासन, देशी नाममाला कोश द्वयाश्रय काव्य। 

    जिनदत्त सूरि 

    • जिनदत्त सूरि से पहले अपभ्रंश में चरित काव्यों की परंपरा ही प्रसिद्धथी। 
    • इन्होंने अपने ग्रंथउपदेशरसायनरास(1114 .) से रास काव्य- परंपरा का प्रवर्तन किया। 
    • यह 80 पद्यों का नृत्य गीत रासलीला काव्य है। 

    सोमप्रभ सूरि 

    • ये भी एक जैन पंडित थे। 
    • कुमारपालप्रतिबोध’ (1184 .) नामक एक गद्यपद्यमय संस्कृत-प्राकृत-काव्य लिखा जिसमें समय समय पर हेमचंद्र द्वारा कुमारपाल को अनेक प्रकार के उपदेश दिये जाने की कथाएँ लिखीहैं। 
    • यह ग्रंथ अधिकांश प्राकृत में ही है। बीच-बीच में संस्कृत श्लोक और अपभ्रंश के दोहे आए हैं। अपभ्रंश के पद्यों में कुछ तो प्राचीन हैं और कुछ सोमप्रभ और सिद्धिपाल कवि के बनाए हुएहैं। 

    पुष्यदंत 

    • पुष्यदंत मूलतः शैव थे, परंतु बाद में अपने आश्रयदाता के अनुरोध से जैन हो गए थे। 
    • इनके समय को लेकर विवाद है। शिवसिंह सेंगर ने सातवीं शताब्दी और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने नौवीं शताब्दी माना। सामान्यतः 972 . (10वीं शती) इनका समय माना जाता है। 
    • इनकी तीन रचनाएँ मिलती हैं1. तिरसठी महापुरिस गुणालंकार (महापुराण), 2. णयकुमारचरिउ (नागकुमारचरित), 3. जसहरचरिउ (यशधर चरित्र)। 
    • रामचंद्र शुक्ल ने इनके दो और ग्रंथों का उल्लेख किया है- आदिपुराण और उत्तरपुराण। 
    • इन दोनों को चौपाइयों में रचित बताया है। 
    • महापुराणमें 63 महापुरुषों का जीवन चरित है। 
    • तीनों चरित्र/आख्यान काव्य हैं और चौपाइयों में हैं। 
    • जैन साहित्य में चरित काव्य प्रचुर मात्रा में लिखे गए। पुष्पदंत के दोनोंचरिउके अलावा कनकामर मुनि कृतकरकंड-चरित’ (11वीं शती) भी प्रसिद्ध है। 
    • अपभ्रंश में चौपाई 15 मात्राओं का छंद था। 
    • स्वयं कोअभिमान मेरु’, ‘काव्य रत्नाकार’, ‘कविकुल तिलकआदि उपाधियाँ दी हैं। 
    • डॉ. भयाणी ने इन्हेंअपभ्रंश का भवभूतिकहा है। 
    • पुष्यदंत ने साहित्य रचना शुद्ध धार्मिक भाव से की है, किंतु काव्यत्व में किसी प्रकार की कमी नहीं मिलती। 
    • डॉ. तगारे ने पुष्यदंत की भाषा कोमराठी की जननीमानाहै। 
    • शिवसिंह सेंगर ने इन्हेंभाखा की जड़कहा है। 

    धनपाल 

    • धनपाल को मुंज नेसरस्वतीकी उपाधि दी थी। 
    • दसवीं शती में भविसयत्तकहा की रचना की। 
    • भविसयत्तकहाका संपादन डॉ. याकोबी ने किया था। 
    • इसमें गजपुर के नगरसेठ धनपति के पुत्र भविष्यदत्त की लोककथा वर्णित है। 
    • इस कथा के माध्यम से कवि ने बहुविवाह के दुष्परिणाम के साथ साध्वी और कुटिल स्त्री का अंतर प्रकट किया है। 
    • डॉ. विंटरनित्ज नेभविसयत्तकहारोमांटिक महाकाव्य कहा है। 
    • डॉ. हरदेव बाहरी ने सातवीं शती से ग्यारहवीं शती के अंत तक कोअपभ्रंश का स्वर्णकालमाना है। 
    • अपभ्रंश में तीन प्रकार के बंध मिलते हैं 1. दोहा बंध, 2. पद्धड़िया बंध 3. गेय पद बंध। 
    • अपभ्रंश का चरित काव्य (किसी चरित्र-विशेष पर आधारित काव्य) पद्धड़िया बंध में लिखा गया है। 
    • पद्धरी 16 मात्राओं का छंद है। इसमें लिखे जाने वाले काव्यों को पद्धड़िया बंद कहा गया है। 
    • चरित काव्यों में पद्धड़िया छंद की आठ-आठ पंक्तियों के बाद धत्ता दिया रहता है, जिसेकड़वककहते हैं। 

    जोइंदु (योगींद्र) 

    • छठी शती के कवि जोइंदु से दोहा छंद का आरंभ माना गया है। 
    • अपभ्रंश से दोहे की शुरुआत मिलती है। 
    • जोइंदु की दो रचनाएँ हैं 1. परमात्म प्रकाश 2. योगसार। 

    स्वयंभू 

    • स्वयंभू (783 .) को जैन परंपरा का प्रथम कवि माना जाता है। 
    • इनके तीन ग्रंथ माने जाते हैं 1. पउम चरिउ, 2. रिट्ठणेमि चरिउ 3. स्वयंभू छंद। 
    • पउम चरिउमें राम का चरित्र विस्तार से वर्णित है, जिसमें राम को अंत में मुनींद्र से उपदेश के बाद जैन आदर्शों के अनुकूल निर्वाण प्राप्त करते दिखाया गया है। 
    • पउम चरिउ’ 5 कांड तथा 83 संधियों वाला विशाल महाकाव्यहै।  
    • यह अपभ्रंश का आदिकाव्य माना जाता है। 
    • अपभ्रंश में सर्वप्रथम कड़वक पद्धति (7 अर्धालियों के बाद 1 दोहा) का प्रयोगपउम चरिउमें किया गया है। 
    • स्वयंभू के पुत्र त्रिभुवन ने इसमें 7 और संधियों को जोड़कर इसे 90 संधियों में पूर्ण किया। 
    • तुलसी कृतरामचरितमानसपर इसका प्रभाव पड़ा है। डॉ. भयाणी ने इन्हेंअपभ्रंश का कालिदासकहा है। 
    • अपभ्रंश में कृष्णकथा के आरंभ का श्रेय भी स्वयंभू को ही दिया जाताहै। 
    • स्वयंभू को अपभ्रंश भाषा का वाल्मीकि तथा व्यास कहा जाता है। 
    • इन्होंने अपनी भाषा कोदेशी भाषाकहा है। 
    • "स्वयंभू का रामायण हिंदी का सबसे पुराना और सबसे उत्तम काव्य है।" राहुल सांकृत्यायन 
    • "स्वयंभू हिंदी के सर्वोत्तम कवि हैं।" राहुल सांकृत्यायन 

    अपभ्रंश रचनाएँ 

    रचनाकार 

    रचनाएँ 

    जोइंदु (योगींद्र) 

    1. परमात्म प्रकाश 2. योगसार 

    स्वयंभू 

    1. पउम चरिउ 2. रिट्ठणेमि चरिउ 

    3. स्वयंभू छंद 

    पुष्यदंत 

    1. तिरसठी महापुरिस गुणालंकार(महापुराण 

    2. णयकुमारचरिउ (नागकुमारचरित 

    3. जसहर-चरिउ (यशधर चरित्र) 

    धनपाल 

    भविसयत्तकहा 

    मुनिराम सिंह 

    पाहुड़ दोहा 

    हेमचंद्र 

    1. सिद्ध हेम/ शब्दानुशासन (प्राकृत व्याकरण) 

    2. कुमारपालचरित 3. योगशास्त्र  

    4. छंदानुशासन 5. देशी नाममाला कोश  

    6. द्वयाश्रय काव्य 

    जिनदत्त सूरि 

    उपदेशरसायनरास 

    सोमप्रभ सूरि 

    कुमारपालप्रतिबोध 

    जैनाचार्य मेरुतुंग 

    प्रबंध चिंतामणि 

    लक्ष्मीधर 

    (संकलनकर्त्ता) 

    प्राकृतपैंगलम् 

     

                                                सिद्ध-नाथ साहित्य 

    रचनाकार 

    रचनाएँ 

    सरहपा 

    1. दोहाकोश 2. चर्यागीत कोश 

    शबरपा 

    चर्यापाद 

    लुइपा 

    1. बुद्धोदय 2. अभिसमय 3. गीतिका 

    डोम्भिपा 

    1. डोम्बि-गीतिका 2. योगचर्या  

    3. अक्षरद्विकोपदेश 

    गोरखनाथ 

    संस्कृत ग्रंथ 

    1. सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति 2. विवेक मार्तंड  

    3. शक्ति संगम तंत्र 4. निरंजन पुराण  

    5. वैराट पुराण 6. गोरक्षशतक 7. योगसिद्धांत  

    8. योग चिंतामणि 

    गोरखबानी (सं. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल) 14 ग्रंथों का संकलन 

     

    जैन साहित्य 

    रचनाकार 

    रचनाएँ 

    देवसेन 

    1. श्रावकाचार  

    2. बृहत नयचक्र (दब्ब-सहाय-पवास 

    3. नयचक्र (लघुनयचक्र) 4. दर्शनसार  

    5. आराधना सार 6. तत्त्वासार 

    7. भाव संग्रह 8. सावयधम्म दोहा 

    शालिभद्र सूरि 

    1. बुद्धिरास (शिष्य शिवि संग्रहकर्त्ता) 

    2. भरतेश्वर बाहुबली रास 

    आसगु कवि 

    1. चंदनबालारास 2. जीव-दया रास 

    विनयचंद्र सूरि 

    नेमिनाथ चउपई 

    जिनधर्म सूरि  

    (जिणधाम) 

    स्थूलिभद्र रास 

    मुनि सुमतिगण 

    नेमिनाथ रास 

    विजयसेन सूरि 

    रेवंतगिरि रास 

    कल्हण 

    आबू रास 

    जिनचंद सूरि 

    जिनचंद सूरि फागु 

    राजशेखर सूरि 

    1. श्री नेमिनाथ फागु 2. विरह देसावरी फागु 

    देल्हण 

    गय सुकुमार रास 

    चंद्रमुनि 

    पुराण-सार 

    योगचंद्र मुनि 

    योगसार 

    आदिकाल का नामकरण 

    प्रस्तोता 

     

    चारण काल 

    प्रारंभिक काल 

    बीजवपन काल 

    वीरगाथाकाल 

    सिद्ध-सामंत काल 

    वीरकाल 

    संधिकाल एवं चारण काल 

    आदिकाल 

    जयकाल 

    आधार काल 

    अपभ्रंश काल 

    उद्भव काल 

    संक्रमण 

    जॉर्ज ग्रियर्सन, एफ. . के 

    मिश्रबंधु,गणपतिचंद्र गुप्त 

    महावीरप्रसाद द्विवेदी 

    रामचंद्र शुक्ल 

    राहुल सांकृत्यायन 

    विश्वनाथ प्रसाद मिश्र 

    रामकुमार वर्मा 

    हजारीप्रसाद द्विवेदी 

    रमाशंकर शुक्लरसाल 

    सुमन राजे, मोहन अवस्थी 

    धीरेंद्र वर्मा, बच्चन सिंह 

    वासुदेव सिंह 

    राम खेलावन पाण्डे 

     

    हिंदी का प्रथम कवि 

    प्रस्तोता 

    पुष्यदंत/पुंड 

    शिवसिंह सेंगर 

    शालिभद्र सूरि 

    स्वयंभू 

    सरहपा 

    अब्दुल रहमान 

    विद्यापति 

    मुंज 

    गणपतिचंद्र गुप्त 

    रामकुमार वर्मा 

    राहुल सांकृत्यायन 

    हजारीप्रसाद द्विवेदी 

    डॉ. बच्चन सिंह 

    चंद्रधर शर्मागुलेरी 

    • देवसेन कृतश्रावकाचारको हिंदी की प्रथम रचना माना जाताहै। 
    • जॉर्ज ग्रियर्सन ने आदिकाल के अंतर्गत नौ कवियों को शामिल किया था। 
    • आचार्य शुक्ल ने आदिकाल कोअनिर्दिष्ट लोक प्रवृत्ति का युग’ कहाहै। 
    • आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल कोअत्यधिक विरोधी और व्याघातोंका युग घोषित किया है। 
    • रामचंद्र शुक्ल- "उस समय जैसेगाथाकहने से प्राकृतकाबोध  
      होता था वैसे हीदोहायादूहाकहने से अपभ्रंश का पद्य समझाजाताथा।" 
    • हजारीप्रसाद द्विवेदी- "दोहा या दूहा अपभ्रंश का अपना छंद है। उसी प्रकार जिस प्रकार गाथा प्राकृत का अपना छंद है।" 
    • हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपने ग्रंथहिंदी साहित्य का आदिकालमें लिखा है, "इस प्रकार दसवीं से चौदहवीं शताब्दी का काल, जिसे हिंदी का आदिकाल कहते हैं, भाषा की दृष्टि से अपभ्रंश का ही बढ़ाव है।" 
    • हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार, "डिंगल कवियों की वीर-गाथाएँ, निर्गुणिया संतों की वाणियाँ, कृष्ण भक्त या रागानुगा भक्तिमार्ग के साधकों के पद, राम-भक्त या वैधी भक्तिमार्ग के उपासकों की कविताएँ, सूफी साधना से पुष्ट मुसलमान कवियों के तथा तिहासिक हिंदी कवियों के रोमांस और रीति काव्य- ये छहों धाराएँ अपभ्रंश कविता का स्वाभाविक विकास है।" 
    • हजारीप्रसाद द्विवेदी, गणपतिचंद्र गुप्त प्रभृति कुछेक विद्वानों ने अपभ्रंश और हिंदी के मध्य निर्णायक रेखा खींचना कठिन मान कर भक्तिकाल से ही हिंदी साहित्य की शुरुआत मानने का मत प्रकट किया है। 
    • प्राकृतानुशासनपुरुषोत्तमदेव की रचना है। 

    विद्यापति 

    • तीन भाषाओं में काव्य-रचना की संस्कृत, अपभ्रंश और देशभाषा। पर जिसकी रचना में अपने समय की प्रचलित मैथिली भाषा का प्रयोग करने के कारण येमैथिल कोकिलकहलाए वह इनकी पदावली है। 
    • विद्यापति को बंगभाषा वाले अपनी ओर खींचते हैं। सर जॉर्ज ग्रियर्सन ने बिहारी और मैथिली कोमागधी’ (अपभ्रंश) से निकली होने के कारण हिंदी से अलग माना। "पर केवल भाषाशास्त्र की दृष्टि से कुछ प्रत्ययों के आधार पर ही साहित्य-सामग्री का विभाग नहीं किया जा सकता। कोई भाषा कितनी दूर तक समझी जाती है, इसका विचार भी तो आवश्यक होता है। किसी भाषा का समझा जाना अधिकतर उसकी शब्दावली (Vocabulary) पर अवलंबित होता है। यदि ऐसा होता तो उर्दू और हिंदी का एक ही साहित्य माना जाता। जिस प्रकार हिंदी साहित्यबीसलदेवरासोपर अपना अधिकार रखता है उसी प्रकार विद्यापति की पदावली पर भी।" 
    • "आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों नेगीतगोविंदके पदों को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी। सूर आदि कृष्णभक्तों के  शृंगार पदों की भी ऐसे लोग आध्यात्मिक व्याख्या चाहते हैं। पता नहीं बाल लीला के पदों का वे क्या करेंगे। इस संबंध में यह अच्छी तरह समझ रखना चाहिये कि लीलाओं का कीर्तन कृष्णभक्ति का एक प्रधान अंग है। जिस रूप में लीलाएँ वर्णित हैं उसी रूप में उनका ग्रहण हुआ है। इन लीलाओं का दूसरा अर्थ निकालने की आवश्यकतानहींहै। 
    • विद्यापति के पदों को प्रायः  शृंगार का माना जाता है। राधा-कृष्ण नायिका और नायक हैं। जयदेव के गीतकाव्य के अनुकरण पर इनकी रचना की संभावना व्यक्त की और इनके माधुर्य को अद्भुत माना। विद्यापति को शैव माना। 
    • "विद्यापति को कृष्णभक्तों की परंपरा में समझना चाहिये।"
      शुक्ल जी ने राजा हम्मीर तक वीरगाथाकाल को माना। उनके पीछे भी वीरकाव्य की रचना तो हुई, किंतु कवि की प्रवृत्ति बदल चुकी थी। इसे लक्ष्य करते हुए शुक्ल जी ने लिखा, "हिंदी साहित्य के इतिहास की एक विशेषता यह भी रही कि एक विशिष्ट काल में किसी रूप की जो काव्यसरिता वेग से प्रवाहित हुई, वह यद्यपि आगे चलकर मंद गति से बहने लगी, पर 900 वर्षों के हिंदी साहित्य के इतिहास में हम उसे कभी सर्वथा सूखी हुई नहीं पाते।" 

    अमीर खुसरो 

    • "ये फारसी के बहुत अच्छे ग्रंथकार और अपने समय के नामी कविथे।" 
    • "ये बड़े ही विनोदी, मिलनसार और सहृदयी थे, इसी से जनता की सब बातों में पूरा योग देना चाहते थे।" 
    • "इनकी पहेलियाँ और मुकरियाँ प्रसिद्ध हैं। इनमें उक्तिवैचित्र्य की प्रधानता थी, यद्यपि कुछ रसीले गीत और दोहे भी इन्होंने कहेहैं।" 
    • "खुसरो के नाम पर संगृहीत पहेलियों में कुछ प्रक्षिप्त और पीछे की जोड़ी पहेलियाँ भी मिल गई हैं, इसमें संदेह नहीं।" (उदाहरण- हुक्के वाली पहेली; हुक्का तंबाकू खुसरो के बहुत बाद जहाँगीर के समय प्रचारित हुआ।) 
    • "इन्होंने ग्यासुद्दीन बलबन से लेकर अलाउद्दीन और कुतुबुद्दीन मुबारकशाह तक कई पठान बादशाहों का ज़माना देखा था।" 
    • "जिस ढंग के दोहे, तुकबंदियाँ और पहेलियाँ आदि साधारण जनता की बोलचाल में इन्हें प्रचलित मिलीं उसी ढंग के पद्य पहेलियाँ आदि कहने की उत्कंठा इन्हें भी हुई।" 

       "‘काव्य भाषाका ढाँचा अधिकतर शौरसेनी या पुरानी ब्रजभाषा का ही बहुत काल से चला आता था। अतः जिन पश्चिमी प्रदेशों की बोलचाल खड़ी होती थी, उनमें भी जनता के बीच प्रचलित पद्यों, तुकबंदियों आदि, की भाषा ब्रजभाषा की ओर झुकी हुई रहती थी। अब भी यह बात पाई जाती है। 

    • इनकी हिंदी की रचनाओं में दो प्रकार की भाषा का प्रयोग मिलताहै- 
    • ठेठ खड़ी बोलचाल, पहेलियों, मुकरियों और दो सुखनों में ही मिलती है यद्यपि उनमें भी कहीं-कहीं ब्रजभाषा की झलक है। 
    • गीतों और दोहों की भाषा ब्रज या मुख-प्रचलित काव्यभाषा ही है। (यही ब्रजभाषापन देख उर्दू साहित्य के इतिहास-लेखक प्रो. आजाद को यह भ्रम हुआ था कि ब्रजभाषा से खड़ी बोली (अर्थात् उसका अरबी-फारसी-ग्रस्त रूप उर्दू) निकल पड़ी। 
    • खुसरो की भाषा दीर्घ मुख्यपरंपरा के बीच किसी अंश तक शायद कुछ बदल गई होगी, उसका पुरानापन कुछ निकल गया होगा; पर यह निश्चित है कि उसका ढाँचा कवियों और चारणों द्वारा व्यवहृत प्राकृत की रूढ़ियों से जकड़ी काव्यभाषा से भिन्न था। 
    • "कबीर की अपेक्षा खुसरो का ध्यान बोलचाल की भाषा की ओर अधिक था; उसी प्रकार जैसे अंग्रेज़ों का ध्यान बोलचाल की भाषा की ओर अधिक रहता है। खुसरो का लक्ष्य जनता का मनोरंजन था। पर कबीर धर्मोपदेशक थे, अतः उनकी बानी पोथियों की भाषा का सहारा कुछ--कुछ खुसरो की अपेक्षा अधिक लिये हुए है।" 

    नेट, जून 2015 

    जगनिक 

    • "साहित्यिक रूप में रहने पर भी जनता के कंठ में जगनिक के संगीत की वीरदर्पपूर्ण प्रतिध्वनि अनेक बल खाती हुई अब तक चली रही है। इस दीर्घ काल-यात्रा में उसका बहुत कुछ कलेवर बदल गया है। देश और काल के अनुसार भाषा में ही परिवर्तन नहीं हुआ है, वस्तु में भी अधिक परिवर्तन होता आया है। बहुत से नए अस्त्रों (जैसे, बंदूक, करिचि), देशों और जातियों (जैसे, फिरंगी) के नाम सम्मिलित हो गए हैं और बराबर होते जाते हैं।" 
    • "यदि यह ग्रंथ साहित्यिक प्रबंधपद्धति पर लिखा गया होता तो कहीं कहीं राजकीय पुस्तकालयों में इसकी कोई प्रति रक्षित मिलती।" 
    • "यह गाने के लिये ही रचा गया था इससे पंडितों और विद्वानों के हाथ इसकी रक्षा की ओर नहीं बढ़े, जनता ही के बीच इसकी गूँज बनी रही पर यह गूँज मात्र है, मूल शब्द नहीं।" 
    • "आल्हा का प्रचार यों तो सारे उत्तर भारत में है पर बैसवाड़ा इसका केंद्र माना जाता है; वहाँ इसके गानेवाले बहुत अधिक मिलते हैं। बुदेलखंड में- विशेषतः महोबे के आसपास- भी इसका चलन बहुतहै।" 
    • "इन गीतों के समुच्चय को सर्वसाधारणआल्हा-खंडकहते हैं जिससे अनुमान होता है कि आल्हा-संबंधी ये वीर-गीत जगनिक के रचे उस बड़े काव्य के एक खंड के अंतर्गत थे जो चंदेलों की वीरता के वर्णन में लिखा गया होगा। आल्हा और ऊदल परमाल के सामंत थे और बनाफर शाखा के क्षत्रिय थे।" 

    प्रकरण-4 (फुटकल रचनाएँ) 

    • आदिकाल में मोटे तौर पर तीन तरह की भाषा मिलती है- 

    प्राकृत की रूढ़ियों से बहुत कुछ बद्ध भाषाअपभ्रंश। इसके भी तीन रूप मिलते हैं 

    प्रचलित काव्यभाषा-सिद्ध 

    सधुक्कड़ी-नाथ 

    शारंगधर, विद्यापति की बोली-अपभ्रंश  

    • प्राकृत की रूढ़ियों से बहुत कुछ मुक्त भाषा देशभाषा। इसके दो रूप हैं पिंगल और डिंगल। 
    • प्राकृत की रूढ़ियों से लगभग मुक्त भाषा। विद्यापति पदावली, खुसरो की पहेलियाँ आदि इसके उदाहरण हैं। 
    • देशभाषा पर भाषा संबंधी पुरानी रूढ़ियों के प्रभाव को लक्षित करते हुए शुक्ल जी ने लिखा था, "जैसे पुराना चावल ही बड़े आदमियों के खाने योग्य समझा जाता है वैसे ही अपने समय से कुछ पुरानी पड़ी हुई परंपरा के गौरव से युक्त भाषा ही पुस्तक रचने वालों के व्यवहार योग्य समझी जाती थी।" नेट, जून 2019 
    • विद्यापति ने अपनी पदावली और अमीर खुसरो ने अपनी विभिन्न रचनाओं में जनता की बहुत कुछ असली बोलचाल और उसके बीच कहे-सुने जाने वाले पद्यों की भाषा के बहुत कुछ असली रूप का प्रयोग किया। खुसरो ने पश्चिम और विद्यापति ने पूरब की भाषा का प्रयोग किया। उसके पीछे फिर भक्तिकाल के कवियों ने प्रचलित देश-भाषा और साहित्य के बीच पूरा-पूरा सामंजस्य घटित कर दिया। 
    • "बहुत से राजाओं के साथ पृथ्वीराज के युद्ध और अनेक राज-कन्याओं के साथ विवाह की कथाएँ रासो में भरी पड़ी हैं।" 
    • "पृथ्वीराज विजय के कर्त्ता जयानक ने पृथ्वीराज के मुख्य भाट या बंदिराज का नामपृथ्वी भट्टलिखा है, चंद का उसने कहीं नाम नहीं लिया है। यही कहा जा सकता है किचंदबरदाईनाम का यदि कोई कवि था तो पृथ्वीराज की सभा में रहा होगा या जयानक के काश्मीर लौट जाने पर आया होगा। अधिक संभव यह जान पड़ता है कि पृथ्वीराज के पुत्र गोविंदराज या उनके भाई हरिराज अथवा इन दोनों में से किसी के वंशज के यहाँ चंद नाम का कोई भट्ट-कवि रहा हो जिसने उनके पूर्वज पृथ्वीराज की वीरता आदि के वर्णन में कुछ रचना की हो।" 
    • "यह ग्रंथ तो भाषा के इतिहास के और साहित्य के इतिहास के जिज्ञासुओं के काम का है।" 
    • "यह पूरा ग्रंथ वास्तव में जाली है।" 

    भट्टकेदार, मधुकर कवि 

    • "जिस प्रकार चंदबरदाई ने महाराज पृथ्वीराज को कीर्तिमान किया है उसी प्रकार भट्टकेदार ने कन्नौज के सम्राट जयचंद का गुण गायाहै।" 
    • "रासो में चंद और भट्टकेदार के संवाद का एक स्थान पर उल्लेख भी है।"   
    • "इनके जयचंद प्रकाश का उल्लेख सिघायच दयालदास कृतराठौड़ाँ री ख्यातमें मिलता है जो बीकानेर के राजपुस्तक-भंडार में सुरक्षित है। इस ख्यात में लिखा है कि दयालदास ने आदि से लेकर कन्नौज तक का वृत्तांत इन्हीं दोनों ग्रंथों के आधार पर लिखा है। 
    • "भट्ट-भणंत पर यदि विश्वास किया जाय तो केदार महाराज जयचंद के कवि नहीं, सुलतान शहाबुद्दीन गौरी के कविराज थे।शिवसिंहसरोजमें भाटों की उत्पत्ति के संबध में यह विलक्षण कवित्त उद्धृत है 

    प्रथम विधाता ते प्रगट भए वदीजन,  
    पुनि पृथुजज्ञ तें प्रकास सरसात है।  

    माने सूत सौनक , वाँचत पुरान रहे,  
    जस को बखाने महासुख सरसात है।  

    चंद चौहान के, केदार गोरी साह जू के  

    गंग अकबर के बखाने गुन गात है।  

    काव्य कैसे माँस अजनास धन भाँटन को,  
    लूटि धरै ताको खुरा-खोज मिटि जात है।" 

     

    पृथ्वीराजरासो 

    • "ये (चंदबरदाई) हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनकापृथ्वीराजरासोहिंदी का प्रथम महाकाव्य है।" 
    • "इनके पूर्वजों की भूमि पंजाब थी जहाँ लाहौर में इनका जन्म हुआ था। इनका और महाराज पृथ्वीराज का जन्म एक ही दिन हुआ था और दोनों ने एक ही दिन यह संसार भी छोड़ा था। 
    • "ये महाराज पृथ्वीराज के राजकवि ही नहीं उनके सखा और सामंत भी थे; तथा षड्भाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंदःशास्त्र, ज्योतिष, पुराण, नाटक और अनेक विद्याओं में पारंगत थे।" 
    • "इन्हें जालंधरी देवी का इष्ट था जिसकी कृपा से ये अदृष्टकाव्य भी कर सकते थे।" 
    • "इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला जुला था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में सदा महाराज के साथ रहते थे, और जहाँ जो बातें हेाती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे।" 
    • "पृथ्वीराजरासो ढाई हज़ार पृष्ठों का बहुत बड़ा ग्रंथ है।" 
    • "प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों का व्यवहार हुआ है। मुख्य छंद हैंकवित्त (छप्पय), दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या।" 
    • "जैसेकादंबरीके संबंध में प्रसिद्ध है कि उसका पिछला भाग बाण के पुत्र ने पूरा किया है, वैसे ही रासो के पिछले भाग का भी चंद के पुत्र जल्हण द्वारा पूर्ण किया जाना कहा जाता है। रासो के अनुसार जब शहाबुद्दीन गौरी पृथ्वीराज को कैद करके गजनी ले गया, तब कुछ दिनों पीछे चंद भी वहीं गए। जाते समय कवि ने अपने पुत्र जल्हण के हाथ में रासो की पुस्तक देकर उसे पूर्ण करने का संकेत किया। जल्हण के हाथ में रासो को सौंपे जाने और उसके पूरे किए जाने का उल्लेख रासो में है
      पुस्तक
      जल्हन हत्थ दै चलि गज्जन नृप-काज। 
      रघुनाथचरित हनुमंतकृत भूप भोज उद्धरिय जिमि।। 
      पृथिरास-सुजस कवि चंद कृत चंद-चंद उद्धरिय तिमि।।" 
    • "पृथ्वीराजरासो में आबू के यज्ञकुंड से चार क्षत्रियकुलों की उत्पत्ति तथा चौहानों के अजमेर में राजस्थान से लेकर पृथ्वीराज के पकड़े जाने तक का सविस्तार वर्णन है।" 

     

    • "भाषा साहित्यिक नहीं है, राजस्थानी है। इस ग्रंथ से एक बात का आभास अवश्य मिलता है कि शिष्ट काव्य भाषा में ब्रज और खड़ी बोली के प्राचीन रूप का ही राजस्थान में भी व्यवहार होता था। साहित्य की सामान्य भाषाहिंदीही थी जो पिंगल भाषा कहलाती थी। बीसलदेव रासो में भी बीच-बीच में बराबर इस साहित्यिक भाषा (हिंदी) को मिलाने का प्रयत्न दिखाई पड़ता है।" 
    • "भाषा की प्राचीनता पर विचार करने के पहले यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि गाने की चीज होने के कारण इसकी भाषा में समयानुसार बहुत कुछ फेरफार होता आया है। पर लिखित रूप में रक्षित होने के कारण इसका पुराना ढाँचा बहुत कुछ बचा हुआ है।" 
    • "इसमें आये हुए कुछ फारसी, तुरकी शब्दों की ओर भी ध्यान जाता है। जैसे महल, इनाम, नेजाताजनों (ताजियाना) आदि। ये शब्द पीछे से मिले हुए भी हो सकते हैं और कवि द्वारा व्यवहृत भी। कवि के समय से पहले ही पंजाब में मुसलमानों का प्रवेश हो गया था और वे इधर-उधर जीविका के लिये फैलने लगे थे। अतः ऐसे साधारण शब्दों का प्रचार कोई आश्चर्य की बात नहीं। बीसलदेव के सरदारों में ताजुद्दीन मियाँ भी मौजूद हैं 

          मंहल पलाण्यो ताँजदीन। खुरसाणा चढ़ि चाल्यो गोंड।।" 

    • "राय बहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इसे हम्मीर के समय की रचना कहा है।" 
    • "बीसलदेवरासो में काव्य के अर्थ मेंरसायणशब्द बार-बार आया है। अतः हमारी समझ में इसीरसायणशब्द से होते-होतेरासोहो गया है।" 
    • "नाल्ह के इस बीसलदेव में, जैसा कि होना चाहिये था, तो उक्त वीर राजा की ऐतिहासिक चढ़ाइयों का वर्णन है, उसके शौर्य-पराक्रम का। (दिल्ली और हाँसी के प्रदेश इन्हीं ने अपने राज्य में मिलाये थे)।  शृंगार रस की दृष्टि से विवाह और रूठकर विदेश जाने का (प्रोषित पतिका के वर्णन के लिये) मनमाना वर्णन है।" 
    • "इस छोटी-सी पुस्तक को बीसलदेव ऐसे वीर कारासोकहना खटकता है। पर जब हम देखते हैं कि यह कोई काव्य ग्रंथ नहीं है, केवल गाने के लिये इसे रचा गया था, तो बहुत कुछ समाधान हो जाता है।" 
    • "यह पुस्तक तो वस्तु के विचार से और भाषा के विचार से अपने असली और मूलरूप में कही जा सकती है।" 
    • "इनके (बीसलदेव/विग्रहराज चतुर्थ) वीर चरित्र का बहुत कुछ वर्णन इनके राजकवि सोमदेव रचितललित विग्रहराज नाटक’ (संस्कृत) में है।"
      "प्रादेशिक बोलियों के साथ-साथ ब्रज या मध्य देश की भाषा का आश्रय लेकर एक सामान्य साहित्यिक भाषा भी स्वीकृत हो चुकी थी, जो चारणों मेंपिंगलभाषा के नाम से पुकारी जाती थी। अपभ्रंश के योगसे शुद्ध राजस्थानी भाषा का जो साहित्यिक रूप था वहडिंगलकहलाता था।" 

     

    बीसलदेवरासो (राजमती और बीसलदेव) 

    • बीसलदेवरासो के निर्माणकाल को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है 

    बारह सै बहोत्तरा मझारि। जैठबदी नवमी बुधवारि। 

    नाल्ह रसायण आरंभइ। शारदा तूठी ब्रह्मकुमारि। 

    बारह सै बहोत्तराका स्पष्ट अर्थ वि. सं. 1212 है। 

    • बीसलदेवरासो में चार खंड है। यह काव्य लगभग 2000 चरणों में समाप्त हुआ है। इसकी कथा का सार यों है 

    खंड 1: मालवा के भोज परमार की पुत्री राजमती से साँभर के बीसलदेव का विवाह होना। 

    खंड 2: बीसलदेव का राजमती से रूठकर उड़ीसा की ओर प्रस्थान करना तथा वहाँ एक वर्ष रहना। 

    खंड 3: राजमती का विरह वर्णन तथा बीसलदेव का उड़ीसा से लौटना। 

    खंड 4: भोज का अपनी पुत्री को अपने घर लिवा ले जाना तथा बीसलदेव का वहाँ जाकर राजमती को फिर चित्तौड़ लाना। 

    • दिये हुए संवत् के विचार से कवि अपने नायक का समसामयिक जान पड़ता है। पर वर्णित घटनाएँ, विचार करने पर, बीसलदेव के बहुत पीछे की लिखी जान पड़ती हैं, जबकि उनके संबंध में कल्पना की गुंजाइश हुई होगी। 
    • यह घटनात्मक काव्य नहीं है, वर्णनात्मक है। इसमें दो ही घटनाएँ हैंबीसलदेव का विवाह और उनका उड़ीसा जाना। 
    • इनमें से पहली बात तो कल्पनाप्रसूत प्रतीत होती है। बीसलदेव से एक सौ वर्ष पहले ही धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज का देहांत हो चुका था। अतः उनकी कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह किसी पीछे के कवि की कल्पना ही प्रतीत होती है। 
    • उस समय मालवा में भोज नाम का कोई राजा नहीं था। बीसलदेव की एक परमार वंश की रानी थी, यह बात परंपरा से अवश्य प्रसिद्ध चली आती थी, क्योंकि इसका उल्लेख पृथ्वीराजरासो में भी है। 
    • इसी बात को लेकर पुस्तक में भोज का नाम रखा हुआ जान पड़ता है। अथवा यह हो सकता है कि धार के परमारों की उपाधि ही भोज रही हो और उसी आधार पर इन्हीं में से किसी की कन्या के साथ बीसलदेव का विवाह हुआ हो। 
    • परमार कन्या के संबंध में कई स्थानों पर जो वाक्य आये हैं, उन पर ध्यान देने से यह सिद्धांत पुष्ट होता है कि राजा भोज का नाम कहीं पीछे से मिलाया गया हो; जैसे–‘जननी गोरी तू जेसलमेर’, ‘गोरड़ी जेसलमेर की’। 
    • आबू के परमार भी राजपूताने में फैले हुए थे। अतः राजमती का उनमें से किसी सरदार की कन्या होना भी संभव है पर भोज के अतिरिक्त और भी नाम इसी प्रकार जोड़े हुए मिलते हैं; जैसे–‘माघ अचारज, कवि कालीदास’। 

    "राजा भोज की सभा में खड़े होकर राजा की दानशीलता का लंबा-चौड़ा वर्णन करके लाखों रुपये पाने वाले कवियों का समय बीत चुका था। राजदरबारों में शास्त्रार्थों की वह धूम नहीं रह गई थी। पांडित्य के चमत्कार पर पुरस्कार का विधान भी ढीला पड़ गया था। उस समय तो जो भाट या चारण किसी राजा के पराक्रम, विजय, शत्रुकन्या-हरण आदि का अत्युक्तिपूर्ण (अतिशयोक्तिपूर्ण) आलाप करता या रणक्षेत्रों में जाकर वीरों के हृदय में उत्साह की उमंगें भरा करता था, वही सम्मान पाता था।" 

    प्रशस्तिमूलक काव्य (वीरगाथाओं) की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकारहैं- 

    • दो रूपों में मिलता है - प्रबंधकाव्य के साहित्यिक रूप में और वीरगीतों (बैलेड्स) के रूप में। 
    • वीररस के पद्य प्रचलित छंद दोहे की बजाय प्रायः छप्पय में लिखे जाते थे। 
    • यूरोप की वीरगाथाओं की तरह ही मुख्य विषययुद्ध और प्रेमरहा। इस प्रकार इन काव्यों में  शृंगार का भी मिश्रण रहता था, पर गौण रूप में; प्रधान वीर रस ही होता था। 
    • "प्रधान रस वीर ही रहता था। शृंगार केवल सहायक के रूप में रहता था। जहाँ राजनीतिक कारणों से भी युद्ध होता था, वहाँ भी उन कारणों का उल्लेख कर कोई रूपवती स्त्री ही कारण कल्पित करके रचना की जाती थी। जैसे शहाबुद्दीन के यहाँ से एक रूपवती स्त्री का पृथ्वीराज के यहाँ आना ही लड़ाई की जड़ लिखी गयी है। हम्मीर पर अलाउद्दीन की चढ़ाई का भी ऐसा ही कारण कल्पित किया गया है।" 
    • आश्रित कवि अपने राजाओं के शौर्य आदि गुणों का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते थे। इससे इन काव्यों में प्रथानुकूल कल्पित घटनाओं की बहुत अधिक योजना रहती थी। 
    • रासो काव्य के प्रायः सभी ग्रंथों की सामग्री की प्रामाणिकता संदिग्ध है। कुछ ग्रंथ तो अप्राप्य ही हैं और जो प्राप्त भी हैं उनकी सामग्री का बहुत-सा हिस्सा बाद का जोड़ा हुआ मालूम पड़ता है। इस फेरफार का एक कारण शुक्ल जी ने रेखांकित किया है, "भट्ट, चारण जीविका के विचार से उन्हें अपने उत्तराधिकारियों के पास भी छोड़ जाते थे। उत्तरोत्तर भट्ट, चारणों की परंपरा में चलते रहने से उनमें हेरफेर भी बहुत कुछ होतारहा।" 

    प्रकरण 3 (देशभाषा काव्य/वीरगाथाकाल) 

    • इस प्रकरण में देशभाषा, उसमें रचितरासोकाव्य और सात ग्रंथों का विवेचन किया गया है। ये सात ग्रंथ इस प्रकार हैं- खुमानरासो (दलपत विजय), बीसलदेवरासो (नरपति नाल्ह), पृथ्वीराजरासो (चंदबरदाई), जयचंदप्रकाश (भट्टकेदार), जयमयंक जस चंद्रिका (मधुकर कवि), परमालरासो (जगनिक) और रणमल्ल छंद (श्रीधर)। 
    • शुक्ल जी द्वारा अपने ग्रंथ के आरंभ में दी गई बारह पुस्तकों की सूची में से आठ कोदेशभाषा काव्यमें रखा गया था, जिनमें से छह का वर्णन इस प्रकरण में किया गया है। शेष दो (विद्यापति की पदावली और खुसरो की पहेलियाँ आदि) कोप्रकरण 4 (फुटकल रचनाएँ)’ में स्थान दिया गया है। इसका कारण उनमें विषयवस्तु एवं भाषा संबंधी भिन्नता है। 
    • प्रशस्ति-काव्य को हीरासोकहा गया। इसे शुक्ल जी ने आदिकाल के प्रकरण 1 में ही स्पष्ट करते हुए लिखा था, "राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार नीतिशृंगार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन भी किया करते थे। यही प्रबंध परंपरारासोके नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने, ‘वीरगाथाकालकहा है।" 
    • "गुप्त साम्राज्य के ध्वस्त होने पर हर्षवर्धन (मृत्यु संवत् 704) केउपरांत भारत का पश्चिमी भाग ही भारतीय सभ्यता और बलवैभव का केंद्र हो रहा था। कन्नौज, अजमेर, अन्हिलवाड़ा आदि बड़ी-बड़ी राजधानियाँ उधर ही प्रतिष्ठित थीं। उधर की भाषा ही शिष्ट मानी जाती थी और कवि-चारण उसी भाषा में रचना करते थे। प्रारंभिक काल का जो साहित्य (रासो) हमें उपलब्ध है उसका आविर्भाव उसी भू-भाग मेंहुआ।" 
    • हर्षवर्धन के बाद केंद्रीय सत्ता रहने से छोटे-छोटे राज्य खुद को स्वतंत्र घोषित कर चुके थे। लड़ाई आम हो गई थी। कभी साम्राज्यवादी इच्छा से तो कभी-कभी शौर्य प्रदर्शन मात्र से ही लड़ाई मोल ली जाती थी। बीच-बीच में मुसलमानों (विदेशी आक्रांताओं) के हमले भी होते रहते थे। इस प्रकार जिस समय से हमारे हिंदी साहित्य का अभ्युदय होता है, वह लड़ाई-भिड़ाई का समय था, वीरता के गौरव का समय था। ऐसे में केवल वीरगाथाओं की उन्नति ही संभव थी। 
    • सधुक्कड़ीका ढाँचा खड़ी बोली लिये राजस्थानी का था। 
    • नाथों की देशभाषा की इन पुस्तकों में पूजा, तीर्थाटन आदि के साथ हज, नमाज आदि का भी उल्लेख मिलता है, जैसे काफिर बोधमें। 

    इतिहास और जनश्रुति से इस बात का पता लगता है कि सूफी फकीरों और पीरों के द्वारा इस्लाम को जनप्रिय बनाने का उद्योग भारत में बहुत दिनों तक चलता रहा। पृथ्वीराज के पिता के समय में ख्वाजा मुईनुद्दीन के अजमेर आने और अपनी सिद्धि का प्रभाव दिखाने के गीत मुसलमानों में अब तक गाये जाते हैं। चमत्कारों पर विश्वास करने वाली भोली-भाली जनता के बीच अपना प्रभाव फैलाने में इन पीरों और फकीरों को सिद्धों और योगियों से मुकाबला करना पड़ा, जिनका प्रभाव पहले से जमा चला रहा था। भारतीय मुसलमानों के बीच, विशेषतः सूफियों की पंरपरा में, ऐसी अनेक कहानियाँ चलीं जिनमें किसी पीर ने किसी सिद्ध या योगी को करामात में पछाड़ दिया। कई योगियों के साथ ख्वाजा मुईनुद्दीन का भी ऐसा ही करामाती दंगल कहा जाता है। 

    अन्य 

    • शुक्ल जी के अनुसार, अपभ्रंश की रचनाओं की परंपरा लगभग 1340 . में शारंगधर (ग्रंथ- ‘शारंगधर पद्धतिऔरहम्मीररासो’) पर खत्म हो जाती है। हालाँकि इसके 50-60 वर्ष पीछे विद्यापति के दो ग्रंथ मिलते हैं, पर उस समय तक अपभ्रंश का स्थान देशभाषा ले चुकी थी। 
    • विद्यापति के इन प्रशस्तिमूलक दो छोटे-छोटे ग्रंथों का प्रथम परिचय जॉर्ज ग्रियर्सन को उनके पदों का संग्रह करते हुए हुआ। किंतु उन्हें ये मिले नहीं। 
    • महामहोपाध्याय पंडित हरप्रसाद शास्त्री को नेपाल के राजकीय पुस्तकालय मेंकीर्तिलताप्राप्त हुई। 
    • कीर्तिपताकाकी सूचना-मात्र है। 
    • कीर्तिलताकी रचना बीच-बीच में देशभाषा के पद्य रखते हुए, अपभ्रंश भाषा के दोहा, चौपाई, छप्पय, छंद गाथा आदि छंदों में की गई है। 

    विद्यापति के अपभ्रंश की दो विशेषताएँ हैं- 

    • यह पूरबी अपभ्रंश है। 
    • प्रायः देशभाषा कुछ अधिक लिये है और उसमें तत्सम, संस्कृत शब्दों का वैसा बहिष्कार नहीं है। वह प्राकृत की रूढ़ियों से उतनी अधिक बंधी नहीं है। 
    • "ज्यों-ज्यों काव्यभाषा (अपभ्रंश से) देशभाषा की ओर अधिक प्रवृत्त होती गई त्यों-त्यों तत्सम संस्कृत रखने में संकोच भी घटता गया। शारंगधर के पद्यों औरकीर्तिलतामें इसका प्रमाण मिलता है।" 

    काव्य-रचना के लिये भाषा, अपभ्रंश से देशभाषा की ओर उन्मुख हो रही थी, जिससे भाषा में लगातार बदलाव देखने को मिलता है। विशेष रूप से अपभ्रंश के तीन रूप मिलते हैं- 

    पुरानी व्यापक काव्यभाषा: इसका ढाँचा शौरसेनी प्रसूत अपभ्रंश अर्थात् ब्रज और खड़ी बोली (पश्चिमी हिंदी) का था। सिद्धों की भाषा यही थी। 

    सधुक्कड़ी : इसका ढाँचा खड़ी बोली लिये राजस्थानी का था। नाथों ने इसे प्रयोग किया। 

    शारंगधर और विद्यापति की प्राकृत की रूढ़ियों से लगभग मुक्त होने की प्रक्रिया की शुरुआत का परिचय देती भाषा।  

    इसका सर्वाधिक प्रधान लक्षण तत्सम शब्दों के प्रयोग में घटता संकोचथा। 

     

     

    • नाथों की संख्या नौ मानी जाती है। ये कान की लौ में बड़े-बड़े छेद करके स्फटिक के भारी-भारी कुंडल पहनते हैं, इससेकनफटेकहलाते हैं। 
    • "जिस प्रकार सिद्धों की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है, उसी प्रकार नाथों की संख्या नौ। अब भी लोगनवनाथऔरचौरासी सिद्धकहते सुने जाते हैं।" 
    • महाराष्ट्र के संत ज्ञानदेव ने खुद को गोरखनाथ की शिष्य परंपरा में कहा है। 
    • शुक्ल जी ने गोरखनाथ का गुरु मत्स्येंद्रनाथ और मत्स्येंद्रनाथ का गुरु जलंधरनाथ को माना है। 
    • "सब बातों पर विचार करने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जलंधर ने ही सिद्धों से अपनी परंपरा अलग की और पंजाब की ओर चले गए। वहाँ काँगड़े की पहाड़ियों तथा स्थानों में रमते रहे। पंजाब का जलंधर शहर उन्हीं का स्मारक जान पड़ता है।" 
    • गोरखनाथ ने हिंदू-मुस्लिम के विद्वेषभाव को दूर करके साधना का एक सामान्य मार्ग निकालने की संभावना समझी थी। वे इसका संस्कार अपनी शिव परंपरा में भी छोड़ गए थे। उनकी हठयोग साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी तथा उसमें मुस्लिम धर्म में वर्जित  मूर्तिपूजा और बहुदेवोपासना की आवश्यकता थी, इसलिये मुसलमानों के लिये भी आकर्षण था। 
    • "इतिहास से इस बात का पता लगता है कि महमूद गजनवी के भी कुछ पहले सिंध और मुलतान में भी कुछ मुसलमान बस गये थे जिनमें कुछ सूफी भी थे। बहुत-से सूफियों ने भारतीय योगियों से प्राणायाम आदि की क्रियाएँ भी सीखीं, इसका उल्लेख मिलता है। अतः गोरखनाथ चाहे विक्रम की दसवीं शताब्दी में हुए हों, चाहे तेरहवीं में उनका मुसलमानों से परिचित होना अच्छी तरह माना जा सकता है, क्योंकि जैसा कहा जा चुका है, उन्होंने अपने पंथ का प्रचार पंजाब और राजपूताने की ओर किया।" 
    • पश्चिमी भाग में सक्रियता के कारण नाथों ने वहीं राजपूताना पंजाब की भाषा को अपनाया। साथ ही मुस्लिमों को भी अपनी बानी सुनाने के लिये खड़ी बोली का समावेश किया (क्योंकि उनकी बोली अधिकतर दिल्ली के आसपास की खड़ी बोली थी)। इस प्रकार नाथों ने परंपरा साहित्य की काव्यभाषा (जिसका ढाँचा नागर अपभ्रंश या ब्रज का था) से अलगसधुक्कड़ीभाषा का प्रयोग किया। 

    नाथ 

    • "गोरखनाथ ने पतंजलि के उच्च लक्ष्य, ईश्वर प्राप्ति को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया।" 
    • गोरखनाथ का नाथपंथ बौद्धों की वज्रयान शाखा से ही निकला है। नाथों ने वज्रयानी सिद्धों के विरुद्ध मद्यमाँस मैथुन के त्याग पर बल देते हुए ब्रह्मचर्य पर ज़ोर दिया। साथ ही शारीरिक-मानसिक शुचिता अपनाने का संदेश दिया। 
    • अलबत्ता शिव शक्ति की भावना के कारण कुछ  शृंगारमयी वाणी भी नाथपंथ के किसी--किसी ग्रंथ (जैसे, शक्ति संगम के तंत्र) में मिलती है, लेकिन फिर भी इनका मार्ग सिद्धों से कुछ समानता रखते हुए भी अलग था। इसी से नाथों और सिद्धों में ये समानताएँ मिलती हैं- 
    • दोनोंनादऔरबिंदुके योग से जगत् की उत्पत्ति मानते थे। 
    • बाह्य पूजा-विधान, तीर्थाटन आदि को व्यर्थ मानते हुए अंतर्मुखी साधना पर बल दिया- 

    घट में ही बुद्ध है। 

    जोइ-जोइ पिण्डे सोइ ब्रह्मण्डे। 

    • अपने को रहस्यदर्शी (मूल ज्ञान के ज्ञाता) प्रदर्शित करने केलिये वे शास्त्र पंडितों और विद्वानों को फटकारना ज़रूरी समझतेथे। 
    • सद्गुरु का माहात्म्य दोनों में बहुत अधिक था। 
    • दोनों ने जाति-पाँति का विरोध किया। 
    • शुक्ल जी ने लिखा, "84 सिद्धों में बहुत से मछुए, चमार, धोबी, डोम, कहार, लकड़हारे, दरज़ी तथा बहुत-से शूद्र कहे जानेवाले लोग थे। अतः जाति-पाँति के खंडन तो वे आप ही थे। नाथ संप्रदाय भी जब फैला, तब उसमें भी जनता की नीची और अशिक्षित श्रेणियों के बहुत से लोग आए जो शास्त्र संपन्न थे।" 
    • "सिद्धों ने घर के भीतर चक्र, नाड़ियाँ, शून्य देश आदि मानकर साधना करने की बात फैलाई और नाद, बिंदु, सुरति, निरति, ऐसे शब्दों की उद्धरणी करना सिखाया। यही परंपरा अपने ढंग पर नाथपंथियों ने भी जारी रखी।" 
    • योग संबंधी अंतर्मुखी साधना के कारण दोनों ने संधा भाषा-शैली का प्रयोग किया। (ध्यान रहे कि नाथों की भाषा सिद्धों से भिन्न थी, जिसका आगे वर्णन किया जाएगा।) 
    • सिद्धों का प्रभाव भारत के पूरबी भाग (बिहार से लेकर असम, ओडिशा बंगाल तक) में था। नाथों ने देश के पश्चिमी भागों-राजपूताने और पंजाब को अपना क्षेत्र बनाया। 
    • पंजाब में नमक के पहाड़ों के बीच बालनाथ योगी का स्थान बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। जायसी की पद्मावत मेंबालनाथ का टीलाआया है। 

    "प्रज्ञा और उपाय के योग से महासुख दशा की प्राप्ति मानी गई। इसे आनंद-स्वरूप ईश्वरत्व ही समझिये। निर्माण के तीन अवयव ठहराए गए- शून्य, विज्ञान और महासुख। निर्वाण के सुख का स्वरूप ही सहवाससुख के समान बताया गया।" नेट, जुलाई 2019 

    • प्रथम सिद्ध सरहपा सहज जीवन पर बहुत बल देते थे। इसी से वज्रयान शाखा को सहजयान भी कहा जाता है। 
    • सिद्ध सिद्धियों और विभूतियों के लिये प्रसिद्ध थे। लोग इन्हें अलौकिक शक्ति संपन्न समझते थे। 
    • "जनता पर सिद्धों का प्रभाव विक्रम की दसवीं शताब्दी से ही पाया जाता है, जो मुसलमानों के आने पर पठानों के समय तक कुछ बनारहा।" 
    • सिद्धों नेऋजु’ (सीधा, दक्षिण मार्ग) को छोड़ करबंक’ (टेढ़ा, वाम मार्ग) अपनाने का उपदेश दिया। 
    • "कैसा ही शुद्ध और सात्त्विक धर्म हो, ‘गुह्यऔररहस्यके प्रवेश से वह किस प्रकार विकृत और पाखंडपूर्ण हो जाता है, वज्रयान इसका प्रमाण है।" 
    • अपने मत का संस्कार जनता पर डालने के लिये वे (सिद्ध) संस्कृत रचनाओं के अतिरिक्त अपनी बानी (रचनाएँ) अपभ्रंश मिश्रित देशभाषा में भी बराबर सुनाते रहे।’ (इसे शुक्ल जी नेदेशभाषा मिश्रित अपभ्रंश या पुरानी हिंदीभी कहा है।) 
    • सिद्ध सरहपा की उपदेश की भाषा तो पुरानी टकसाली हिंदी (देशभाषा मिश्रित अपभ्रंश) है, पर गीत की भाषा पुरानी बिहारी या पूरबी बोली मिली है। कबीर कीसाखी’ (उपदेशधर्मी दोहों) की भाषा तो खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य भाषासधुक्कड़ीहै पर रमैनी के पदों में काव्य की ब्रजभाषा और कहीं-कहीं पूरबी बोली भी है। 
    • उस समय की सर्वमान्य व्यापक काव्यभाषा (नागर अपभ्रंश) का ढाँचा शौरसेनी प्रसूत अपभ्रंश अर्थात् ब्रज और खड़ी बोली (पश्चिमी हिंदी) का था। 
    • सधुक्कड़ीइससे अलग थी। उसका ढाँचा कुछ खड़ी बोली लिये राजस्थानी था। 
    • सिद्धों नेसंधाभाषा-शैली का प्रयोग किया है। यह अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों का संकेत करने वाली प्रतीकात्मक भाषा शैली है। 
    • सिद्धों नाथों की रचनाओं का वर्णन दो कारणों से किया है- भाषा और सांप्रदायिक प्रवृत्ति और उसके संस्कार की परंपरा। "कबीर आदि संतों को नाथपंथियों से जिस प्रकारसाखीऔरबानीशब्द मिले उसी प्रकारसाखीऔरबानीके लिये बहुत कुछ सामग्री औरसधुक्कड़ीभाषा भी।" 
    • जैन, सिद्ध नाथों के अलावा अपभ्रंश के सामान्य साहित्य कीसामग्री का उल्लेख उनके संग्रहकर्त्ताओं और रचयिताओं के इस क्रम सेकिया गया है- हेमचंद्र, सोमप्रभ सूरि, जैनाचार्य मेरुतुंग, विद्याधर, शारंगधर (‘हम्मीररासो’) और विद्यापति कीकीर्तिलताएवंकीर्तिपताका’। 
    • जैन ग्रंथकारों में देवसेन (ग्रंथ- ‘श्रावकाचार’, ‘दब्ब-सहाव-पयासद्रव्य-स्वभाव प्रकाश’) और पुष्यदंत (ग्रंथ- ‘आदिपुराण’, ‘उत्तरपुराण’) का ही उल्लेख शुक्ल जी ने किया है। इनके अतिरिक्त पीछे की परंपरा के उदाहरणस्वरूपश्रुतिपंचमी कथा’, ‘योगसार’, ‘जसहरचरिउऔरणयकुमारचरिउका नाम भर दिया है। 
    • "चरित्रकाव्य या आख्यान काव्य के लिये अधिकतर चौपाई, दोहे की पद्धति ग्रहण की गई है। चौपाई-दोहे की यह परंपरा हम आगे चलकर सूफियों की प्रेम कहानियों में, तुलसी केरामचरितमानसमें तथाछत्रप्रकाश’, ‘ब्रजविलास’, सबलसिंह चौहान केमहाभारतइत्यादि अनेक अख्यान काव्यों में पाते हैं।" 

    सिद्ध 

    • बौद्ध धर्म ने धीरे-धीरे तांत्रिक रूप धारण कर लिया था। तब उसमें पाँच ध्यानी बुद्धा और उनकी शक्तियों के अतिरिक्त अनेक बोधिसत्वों की भावना की गई जो सृष्टि का परिचालन करते हैं। आगे बौद्ध धर्म से ही वज्रयान शाखा निकलती है। 
    • बौद्ध धर्म से निकली वज्रयान शाखा के तांत्रिक योगियों को सिद्ध कहा गया। सिद्धों की संख्या 84 मानी गई है। 
    • राजेशखर नेकर्पूरमंजरीमें भैरवानंद के नाम से एक ऐसे ही सिद्ध योगी का समावेश किया है। 
    • बिहार के नालंदा और विक्रमशिला नामक प्रसिद्ध विद्यापीठ इनके अड्डे थे। बख़्तियार खिलजी ने इन दोनों स्थानों को जब उजाड़ा तब से ये तितर-बितर हो गये। बहुत-से तिब्बत आदि अन्य देशों को चले गये। 
    • वज्रयान बौद्ध धर्म का विकृत रूप था। इसमें सिद्धि प्राप्ति के लिये मद्य तथा स्त्री विशेषतः डोमिनी, रजकी आदि का (जिसे शक्ति योगिनी या महामुद्रा कहते थे) योग या सेवन आवश्यक था। 
    • इसी से सिद्धों नेमहासुखवादका प्रवर्तन किया।महासुह’ (महासुख) वह दशा बताई गई जिसमें साधक शून्य में इस प्रकार विलीन हो जाता है जिस प्रकार नमक पानी में। इस दशा का प्रतीक खड़ा करने के लियेयुगनद्ध’ (स्त्री-पुरुष का आलिंगनबद्ध जोड़ा) की भावना की गई। नेट, जुलाई 2018 

    प्रकरण 2 (अपभ्रंश काव्य 

    • "जब से प्राकृत बोलचाल की भाषा रह गई तभी से अपभ्रंश साहित्य का आविर्भाव समझना चाहिये।" 
    • "पुरानी प्रचलित काव्यभाषा (अपभ्रंश) में नीति, शृंगार, वीर आदि की कविताएँ तो चली ही आती थीं, जैन और बौद्ध धर्माचार्य अपने मतों की रक्षा और प्रचार के लिये भी इसमें उपदेश आदि की रचना करते थे।" 
    • "प्राकृत से बिगड़कर जो रूप बोलचाल की भाषा ने ग्रहण किया वह भी आगे चलकर कुछ पुराना पड़ गया और काव्य रचना के लिये रूढ़ हो गया। अपभ्रंश नाम उसी समय से चला। जब तक भाषा बोलचाल में थी तब तक वह भाषा या देशभाषा ही कहलाती रही, जब वह भी साहित्य की भाषा हो गयी तब उसके लिये अपभ्रंश शब्द का व्यवहार होने लगा।" 

    अपभ्रंश के नाम का इतिहास इस प्रकार है 

    • भरतमुनि ने अपभ्रंश नाम देकरदेशभाषाही कहा है। 
    • वररुचि केप्राकृतप्रकाशमें उल्लेख नहीं है। 
    • "अपभ्रंश नाम पहले पहल बल्लभी के राजा धारसेन द्वितीयकेशिलालेख में मिलता है, जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि.सं. 650 के पहले) को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है।" 
    • भामह ने तीनों भाषाओं का उल्लेख किया। 
    • बाण नेहर्षचरितमें संस्कृत कवियों के साथ भाषा-कवियों का भी उल्लेख किया। 
    • जैन, सिद्ध एवं नाथों का वर्णन इसी प्रकरण में किया गया है। 

    शुक्ल जी की स्पष्ट मान्यता है

    • "अपभ्रंश की पुस्तकों में कई तो जैनों के धर्म-तत्त्व निरूपण ग्रंथ हैं जो साहित्य की कोटि में नहीं आतीं और जिनका उल्लेख केवल यह दिखाने के लिये ही किया गया है कि अपभ्रंश भाषा का व्यवहार कब से हो रहा था।" 
    • "उनकी रचनाएँ (सिद्धों नाथों की) तांत्रिक विधान, योगसाधना, आत्मनिग्रह, श्वास-निरोध, भीतरी चक्रों और नाड़ियों की स्थिति, अंतर्मुख साधना के महत्त्व इत्यादि की सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, जीवन की स्वाभाविक अनुभूतियों और दशाओं से उनका कोई संबंध नहीं। अतः वे शुद्ध साहित्य के अंतर्गत नहीं आतीं। उनको उसी रूप में ग्रहण करना चाहिये जिस रूप में ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ग्रंथ।" नेट, दिसंबर 2018 

     

    • "जनश्रुति इस काल का आरंभ और पीछे ले जाती है और संवत् 770 में भोज पूर्वपुरुष राजा मान के सभासद पुष्य नामक किसी बंदीजन का दोहों में एक अलंकार ग्रंथ लिखना बताती है (दे. शिवसिंह सरोज), पर इसका कहीं कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।" 
    • "प्रायः लोक में प्रचलित बोलचाल की भाषा और साहित्य की भाषा में अंतर रहा है। अपभ्रंश भी उस समय की ठीक बोलचाल की भाषा नहीं थी जिस समय की रचनाएँ मिलती हैं, बल्कि उस समय के कवियों की भाषा थी। शुक्ल जी ने अपभ्रंश के संबंध में लिखा है, कवियों ने काव्य परंपरा के अनुसार साहित्यिक प्राकृत के पुराने शब्द तो लिये ही हैं (जैसे पीछे की हिंदी में तत्सम संस्कृत शब्द लिये जाने लगे), विभक्तियाँ, कारकचिह्न और क्रियाओं के रूप आदि भी बहुत कुछ अपने समय से कई सौ वर्ष पुराने रखे हैं।  "बोलचाल की भाषा घिस-घिसकर बिल्कुल जिस रूप में गई थी सारा वही रूप लेकर कवि और चारण आदि भाषा का बहुत कुछ वह रूप व्यवहार में लाते थे जो उनसे सौ वर्ष पहले से कवि परंपरा रखती चली आती थी। 
    • "अपभ्रंश के जो नमूने हमें पद्यों में मिलते हैं वे उस काव्य भाषा के हैं जो अपने पुरानेपन के कारण बोलने की भाषा से कुछ अलग बहुत दिनों तक आदिकाल के अंत क्या उससे पीछे तक पोथियों में चलती रही।" नेट, जून 2019 
    • उस समय रचनाओं की भाषा में बहुत विविधता थी। एक ही समय (विक्रम की 14वीं शती के मध्य) में शारंगधर अपभ्रंश और खुसरो देशभाषा (खड़ी बोली हिंदी) का प्रयोग कर रहे थे विद्यापति दोनों प्रकार की भाषाओं (अपभ्रंश के रूप अवहट्ठ और देशभाषा मैथिली) का प्रयोग करते हैं। इनके समांतर ही कबीर की रचनाओं का आरंभिक दौर भी शुरू हो जाता है। 
    • भाषिक-वैविध्य की स्थिति में अपभ्रंश की परंपरा विक्रम की 15वीं शती के मध्य (विद्यापति के समय) तक चलती रही। 
    • उस समय की बोलचाल की भाषा को विद्यापति नेदेशी भाषाकहा। उन्हीं की प्रेरणा से शुक्ल जी नेदेशभाषाशब्द का प्रयोग किया। 
    • उस समय की बोलचाल की भाषा (देशभाषा) के दो रूप आदिकालीन रचनाओं में मिलते हैं- प्राकृत की रूढ़ियों से बहुत कुछ मुक्त और पूरी तरह मुक्त। अमीर खुसरो और विद्यापति की भाषा प्राकृत की रूढ़ियों से मुक्त है। देशभाषा की अन्य रचनाओं पर प्राकृत की रूढ़ियों का थोड़ा बहुत प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। 

    शुक्ल जी द्वारा निर्दिष्ट आदिकाल की दो मूल विशेषताएँ निम्नलिखित हैं 

    • अनिर्दिष्ट लोक प्रवृत्ति’ ("आदिकाल की दीर्घ परंपरा के बीच डेढ़ सौ वर्षों के भीतर रचना की किसी विशेष प्रवृत्ति का निश्चय नहीं होता है- धर्म, नीति, शृंगार, वीर सब प्रकार की रचनाएँ दोहों में मिलती हैं।") 
    • "इस काल की जो साहित्यिक सामग्री प्राप्त है, उसमें कुछ तो असंदिग्ध है और कुछ संदिग्ध है। असंदिग्ध सामग्री जो कुछ प्राप्त है, उसकी भाषा अपभ्रंश अर्थात् प्राकृताभास हिंदी है। 

    आचार्य शुक्ल ने अपने ग्रंथ केवक्तव्यमें आदिकाल के नामकरण पर विचार किया है 

    • आदिकाल में (भाषा के आधार पर मुख्यतः) दो प्रकार की रचनाएँ मिलती हैंः अपभ्रंश की और देशभाषा (बोलचाल) की। इसी आधार पर शुक्ल जी ने आदिकाल का विभाजन किया हैः अपभ्रंश काव्य और देशभाषा काव्य। इनके अंतर्गत केवल बारह ग्रंथों को ही साहित्यिक मानते हुए इस प्रकार वर्गीकृत किया हैः 
    • अपभ्रंश काव्यः विजयपालरासो, हम्मीररासो, कीर्तिलता, कीर्तिपताका 
    • देशभाषा काव्यः खुमानरासो, बीसलदेवरासो, पृथ्वीराजरासो, जयचंद्रप्रकाश, जयमयंक जस चंद्रिका, परमालरासो (आल्हा का मूल रूप), खुसरो की पहेलियाँ आदि और विद्यापति पदावली। 
    • उपर्युक्त बारह पुस्तकों के आधार पर ही आदिकाल का नामकरणवीरगाथाकालकरते हुए लिखा, "इनमें से अंतिम दो तथा बीसलदेव रासो को छोड़कर सब ग्रंथ वीरगाथात्मक ही हैं। अतः आदिकाल का नामवीरगाथाकालही रखा जा सकता है।" 
    • शुक्ल जी ने आदिकाल को चार प्रकरणों (अध्यायों) के अंतर्गत विवेचित किया है 

                   प्रकरण 1 (सामान्य परिचय) 

                   प्रकरण 2 (अपभ्रंश काव्य) 

                   प्रकरण 3 (देशभाषा काव्य 

                   प्रकरण 4 (फुटकल रचनाएँ) 

    प्रकरण 1 (सामान्य परिचय) 

    प्रकरण 1 में आदिकाल के आरंभ, अवधि और उसकी दो मूल विशेषताओं का वर्णन किया है।  

    प्राकृत भाषा की तीन अवस्थाएँ मानी जाती हैं। प्रथम अवस्था को पालि, दूसरी को प्राकृत और अंतिम अवस्था को अपभ्रंशकहाजाताहै। 

    आचार्य शुक्ल के अनुसार, "प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव माना जा सकता है। उस समय जैसेगाथाकहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे हीदोहायादूहाकहने से अपभ्रंश या प्रचलित काव्यभाषा का पद्य समझा जाता था।" 

    आचार्य शुक्ल ने अपभ्रंश के लियेप्राकृताभास हिंदी’, ‘प्राकृत की अंतिम अवस्थाऔरपुरानी हिंदीजैसे शब्दों का प्रयोग किया है। 

    "अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी के पद्यों का सबसे पुराना पता तांत्रिक और योगमार्गी बौद्धों (सिद्धों) की सांप्रदायिक रचनाओं के भीतर विक्रम की सातवीं शताब्दी के अंतिम चरण में लगता है। मुंज और भोज के समय (संवत्1050) के लगभग तो ऐसी अपभ्रंश या पुरानी हिंदी का पूरा प्रचार शुद्ध साहित्य या काव्य रचनाओं में भी पाया जाता है। अतः हिंदी साहित्य का आदिकाल संवत् 1050 से लेकर संवत् 1375 तक अर्थात् महाराज भोज के समय से लेकर हम्मीरदेव के समय के कुछ पीछे तक माना जा सकता है।" 

    हालाँकि प्रथम सिद्ध सरहपा का समय राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सामान्यतः 769 . स्वीकार किया जाता है, किंतु शुक्ल जी ने उनका समय 633 . (वि.सं. 690) माना है। अतः इसी आधार पर उन्होंने आठवीं शताब्दी की बजाय सातवीं शताब्दी से सिद्धों की रचनाओं में अपभ्रंश के पद्यों की प्राप्ति को माना है। 

    • उदयनारायण तिवारी कृतहिंदी भाषा का उद्भव और विकासतथा डॉ. भगीरथ मिश्र कृतहिंदी काव्यशास्त्र का इतिहासउल्लेख्य ग्रंथहैं। 
    • रामनरेश त्रिपाठी नेकविता-कौमुदी’ (1928 .) के 8 भागों में हिंदी, उर्दू, बांग्ला और संस्कृत की कविताओं तथा लोकगीतों का संकलन-संपादन किया था। 
    • तज़किरा--शुअरा--हिंदीको अंग्रेजी में उर्दू कवियों का इतिहास और उर्दू में हिंदी शायरी का तजकिरा कहा गया है। 
    • पदुमलाल पुन्नालाल बख्शीहिंदी साहित्येतिहास को आलोचनात्मक ढंग से समझाने के लिये प्रसिद्ध हैं। 
    • हिंदी के मुसलमान कविनामक साहित्येतिहास ग्रंथ गंगाप्रसाद सिंह का है। 
    • ब्रजमाधुरी सारके संपादन की प्रेरणा वियोगी हरि को पंडित राधाचरण गोस्वामी से मिली। 
    • माताप्रसाद गुप्त काहिंदी पुस्तक साहित्यनामक ग्रंथ आधुनिक साहित्य काबीजककहलाता है। 
    • एफ. . के. ने हिस्ट्री ऑफ़ हिंदी लिटरेचरमें हिंदी साहित्येतिहास को चार कालों में बाँटा है। 
    • एफ. . के. ने हिंदी की शैशवावस्था के वृत्तों का वर्णन करने के बाद काल विभाजन का आधार हिंदी साहित्य के महत्त्वपूर्ण आंदोलनों को बनाया। 

    साहित्येतिहास संबंधी अन्य उल्लेख्य ग्रंथ हैं- 

    राजस्थानी भाषा और साहित्य (डॉ. मोतीलाल मेनारिया) 

    राजस्थान का पिंगल साहित्य (डॉ. मोतीलाल मेनारिया) 

    राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा (डॉ. मोतीलाल मेनारिया) 

    चैतन्य मत और ब्रज साहित्य (प्रभुदयाल मीतल) 

    राधावल्लभ संप्रदायः सिद्धांत और साहित्य (डॉ. विजयेन्द्रस्नातक) 

    पंजाब प्रांतीय हिंदी साहित्य का इतिहास (चंद्रकांत बाली) 

    • आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के विषय में डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त ने लिखा, "वस्तुतः वे पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने आचार्य शुक्ल की अनेक धारणाओं और स्थापनाओं को चुनौती देते हुए उन्हें सबल प्रमाणों के आधार पर खंडित किया। निश्चय ही आचार्य द्विवेदी हिंदी के सबसे अधिक सशक्त इतिहासकार रहे हैं।" 
    • हिंदी के साहित्येतिहास-लेखन के संदर्भ में नलिन विलोचन शर्मा के निम्नलिखित मत स्मरणीय हैं- 

    "हिंदी साहित्य का पहला इतिहास लेखक गार्सां तासी था, यह निर्विवाद है।" 

    "हिंदी के विधेयवादी साहित्येतिहास के आदम प्रवर्तक शुक्ल जी नहीं, प्रत्युत ग्रियर्सन हैं।" 

    हिंदी साहित्येतिहास संबंधी प्रमुख ग्रंथ एवं ग्रंथकार (क्रमानुसार)
    ग्रंथ (समय ई. में) ग्रंथकार
    इस्तवार द ला लितरेत्यूर ऐन्दुई ए ऐन्दुस्तानी (1839) गार्सां द तासी
    तज़किरा-ई-शुअरा-ई-हिंदी / तबकाश्शुअरा (1848) मौलवी करीमुद्दीन
    भाषा काव्य संग्रह (1873) महेशदत्त शुक्ल
    शिवसिंह सरोज (1883) शिवसिंह सेंगर
    द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ़ नॉर्दर्न हिंदुस्तान (1888) जॉर्ज ग्रियर्सन
    हिंदी कोविद रत्नमाला(दो भाग- 1909, 1914) श्यामसुंदर दास
    मिश्रबंधु विनोद (1913) मिश्रबंधु
    ए स्केच ऑफ़ हिंदी लिटरेचर (1917) एडविन ग्रीव्स
    ए हिस्ट्री ऑफ़ हिंदी लिटरेचर (1920) एफ. ई. के.
    हिंदी साहित्य विमर्श (1923) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
    ब्रजमाधुरी सार (1923) वियोगी हरि
    हिंदी भाषा का विकास (1924) श्यामसुंदर दास
    सुकवि सरोज (1927) गौरीशंकर द्विवेदी
    कविता-कौमुदी (1928) रामनरेश त्रिपाठी
    हिंदी साहित्य का इतिहास (1929) रामचंद्र शुक्ल
    हिंदी भाषा एवं साहित्य (1930) श्यामसुंदर दास
    हिंदी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास (1930) सूर्यकांत शास्त्री
    हिंदी साहित्य का इतिहास (1931) रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’
    हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास (1931) अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
    हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास (1931) नंददुलारे वाजपेयी (संकलनकार) मूल लेखक (श्यामसुंदर दास)
    हिंदी साहित्य का इतिहास (1932) ब्रजरत्न दास
    हिंदी साहित्य (1933) सं. डॉ. धीरेंद्र वर्मा
    आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास (1934) कृष्णशंकर शुक्ल
    साहित्य की झाँकी (1936) गौरीशंकर सत्येन्द्र
    पुरातत्व निबंधावली (1939) राहुल सांकृत्यायन
    हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास (1937) गुलाबराय
    हिंदी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास (1938) गोपाललाल खन्ना
    हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (1938) डॉ. रामकुमार वर्मा
    राजस्थानी साहित्य की रूपरेखा (1939) मोतीलाल मेनारिया
    मॉडर्न हिंदी लिटरेचर (1939) डॉ. इंद्रनाथ मदान
    हिंदी साहित्य की भूमिका (1940) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    खड़ी बोली हिंदी साहित्य का इतिहास (1941) ब्रजरत्नदास
    आधुनिक हिंदी साहित्य (1941) डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय
    आधुनिक हिंदी साहित्य का विकास (1942) डॉ. कृष्णलाल
    हिंदी साहित्य: बीसवीं शताब्दी (1942) नंददुलारे वाजपेयी
    हिंदी काव्यधारा (1945) राहुल सांकृत्यायन
    हिंदी वीरकाव्य (1945) डॉ. टीकम सिंह तोमर
    रीतिकाव्य की भूमिका (1949) डॉ. नगेंद्र
    आधुनिक हिंदी साहित्य (1950) नंददुलारे वाजपेयी
    उत्तरी भारत की संत परंपरा (1951) परशुराम चतुर्वेदी
    हिंदी साहित्य का आदिकाल (1952) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    हिंदी साहित्यः उद्भव और विकास (1952) हजारीप्रसाद द्विवेदी
    हिंदी साहित्य का अतीत (1960) विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
    साहित्य का इतिहास-दर्शन (1960) नलिन विलोचन शर्मा
    हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास (16 भाग) (1961) नागरी प्रचारिणी सभा
    हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास (1965) डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त
    हिंदी साहित्य का इतिहास (1973) सं. डॉ. नगेंद्र, डॉ. हरदयाल
    आधुनिक हिंदी का आदिकाल (1973) नारायण चतुर्वेदी
    साहित्य एवं इतिहास दृष्टि (1981) मैनेजर पाण्डेय
    हिंदी साहित्य का सरल इतिहास (1985) विश्वनाथ त्रिपाठी
    हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (1986) रामस्वरूप चतुर्वेदी
    हिंदी साहित्य का समीक्षात्मक इतिहास (1993) प्रो. वासुदेव सिंह
    हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास (1996) बच्चन सिंह
    हिंदी साहित्य का आधा इतिहास (2003) सुमन राजे
    हिंदी साहित्य का मौखिक इतिहास (2004) सं. नीलाभ
    हिंदी साहित्य का विवेचनपरक इतिहास (2008) मोहन अवस्थी
    हिंदी साहित्य का परिचयात्मक इतिहास (2010) भगीरथ मिश्र
    हिंदी साहित्य का ओझल नारी इतिहास (2012) नीरजा माधव
    हिंदी साहित्य का इतिहास (2015) हेमतं कुकरेती
    हिंदी साहित्य का समग्र इतिहास (2019) रामकिशोर शर्मा

    हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास 

    डॉ. रामकुमार वर्मा 

    (1938 .) 

    छायावादी कवि रामकुमार वर्मा द्वारा रचित इस इतिहास-ग्रंथ में उनकी काव्यात्मक भाषा ने पाठकों को आकर्षित किया था। अपनी विस्तृत सामग्री, उसकी आकर्षक प्रस्तुति एवं भाषा के कारण यह ग्रंथ प्रभाव छोड़ने में सफल रहा। 

    इसमें सिर्फ आदिकाल भक्तिकाल (693 . से 1693 .) तक की अवधि को ही स्थान मिला है। आगे का भाग वे नहीं लिख पाए। 

    निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखाको संतकाव्य तथानिर्गुण प्रेमाश्रयी शाखाको सूफीकाव्य नाम दिया। 

    इसमें अपभ्रंश साहित्य के बड़े हिस्से को भी शामिल कर संधि काल शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया था। वर्मा जी ने इसी से आदिकाल कोसंधिकाल एवं चारणकालकहाथा। 

    हिंदी साहित्य की भूमिका 
    (1940 .) 

    हिंदी साहित्यः उद्भव और विकास(1952 .) 

    हिंदी साहित्य का आदिकाल 
    (1952 .) 

    हजारीप्रसाद द्विवेदी 

    हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कोई स्वतंत्र इतिहास-ग्रंथ नहीं लिखा, किंतु उल्लिखित तीनों ग्रंथ साहित्येतिहास संबंधी ही हैं एवं इनमें एक निश्चित साहित्येतिहास-दृष्टि भी मिलती है। 

    आचार्य द्विवेदी इतिहास को परंपरा के विकास के रूप में व्याख्यायित करते थे। 

    इन्होंने विश्व भारती के गैर-हिंदी भाषी साहित्य-जिज्ञासुओं को हिंदी साहित्य से परिचित करवाने हेतु जो व्याख्यान दिये थे, उन्हें ही संशोधित-परिवर्द्धित करहिंदी साहित्य की भूमिकानामक ग्रंथ तैयार किया गया था। 

    आदिकाल का स्वरूप-निर्धारण; भक्तिकाल के उदय की पृष्ठभूमि; पूर्ववर्ती सिद्धांतों से भक्तिकालीन संत काव्यधारा का संबंध-उद्घाटन; हिंदी सूफी काव्य का आधार संस्कृत, प्राकृत- अपभ्रंश की काव्य- परंपराओं को मानना आदि उनकी साहित्येतिहासकार के रूप में उपलब्धियाँहैं। 

    हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास 

    डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त 

    (1965 .) 

    आचार्य शुक्ल द्वारा प्रतिपादित ढाँचे में आमूलचूल परिवर्तन करने का एक सार्थक प्रयास इस ग्रंथ के माध्यम से किया गया। 

    संपूर्ण इतिहास को तीन कालों में विभक्त किया गया- प्रारंभिक काल, मध्यकाल और आधुनिककाल। 

    इसमेंसाहित्येतिहास के विकासवादी सिद्धांतों की प्रतिष्ठा करते हुए, उसके आलोक में हिंदी साहित्य की नूतन व्याख्या प्रस्तुत करने की चेष्टा की गई है। 

    हिंदी साहित्य का इतिहास 

    सं. डॉ. नगेंद्र एवं डॉ. हरदयाल 

    (1973 .) 

    डॉ. नगेंद्र के संपादन में 26 विद्वानों के सहयोग से यह विशद ग्रंथ रचा गया था। 

    इतने विद्वानों के कारण एक ऐतिहासिक दृष्टि संपूर्ण ग्रंथ में आद्योपांत नहीं हो पाई है किंतु फिर भी प्रत्येक काल उससे जु\ड़े रचनाकारों पर सरल भाषा में अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक व्यवस्थित सामग्री के कारण यह विद्यार्थियों में विशेष रूप से प्रचलित है। 

    हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास 

    रामस्वरूप चतुर्वेदी 

    (1986 .) 

    साहित्येतिहास लेखन के लिये व्यास सम्मान सहित कई पुरस्कार प्राप्त करने वाला यह ग्रंथ अपनी लोकप्रियता एवं आकर्षण में अद्वितीय है। 

    रामस्वरूप चतुर्वेदी मूलतः आचार्य शुक्ल की दृष्टि से प्रभावित हैं फिर भी उन्होंने शुक्लजी के युगीन दृष्टिकोण और द्विवेदी जी के परंपरावादी दृष्टिकोण में परस्पर संबंध बनाते हुए लिखाहै। 

    शुक्ल जी की बहुत-सी स्थापनाओं को स्थापित करने के प्रयास से भी उनकी मौलिकता क्षरित नहीं होती। शुक्ल जी की परंपरा को गंभीरता से पुनर्परिभाषित किया है। 

    भाषा और साहित्य के गहरे संबंधों की खोज उनकी प्रमुख विशेषता है। भाषिक प्रवृत्तियों की गहरी समीक्षा से साहित्यिक परंपराओं के संदर्भ व्याख्यायित किये हैं। 

    मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ़ नार्दर्न हिंदुस्तान 

    (जॉर्ज ग्रियर्सन) (1888 .) 

    इस ग्रंथ का प्रकाशनएशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगालकी पत्रिका के विशेषांक के रूप मेंहुआथा। 

    बहुत-से विद्वानों ने इसे सही अर्थों में हिंदी साहित्य का पहला इतिहास ग्रंथ माना। 

    इसमें सर्वप्रथम हिंदी साहित्य का भाषा की दृष्टि से क्षेत्र निर्धारित करते हुए हिंदी के इतिहास को संस्कृत-पालि-प्राकृत एवं अरबी-फारसी मिश्रित उर्दू से पृथक किया गया था। 

    इसमें पहली बार कवियों को कालक्रमानुसार वर्गीकृत करते हुए उनकी प्रवृत्तियों को उद्घाटित भी किया गया। 

    संपूर्ण ग्रंथ 12 अध्यायों में विभक्त है, जिसके शुरुआती 11 अध्याय भिन्न-भिन्न काल के सूचकहैं। शुरुआती 11 अध्यायों का नामकरण भी किया गया है। 

    इसमें कुल 952 कवियों को शामिल किया गया है, जिनमें से 886 कवियों के विवरण का आधारशिवसिंह सरोजहै। 

    इन्होंने सर्वप्रथम भक्तिकाल (16वीं-17वीं शती) कोस्वर्ण युगकहा था। 

     डॉ. किशोरीलाल गुप्त ने इसका अनुवादहिंदी साहित्य का प्रथम इतिहासके नाम से 1957 . में प्रकाशित करवाया। 

    साहित्येतिहास में यह ग्रंथनीवं का पत्थरमाना गया है। 

    मिश्रबंधु विनोद 

    (मिश्रबंधु) 

     

    इसमें 4591 कवियों को शामिल किया गया। 

    ग्रियर्सन यद्यपि काल-विभाजन एवं नामकरण कर चुके थे किंतु व्यवस्थित रूप से इसका श्रेय मिश्रबंधुओं को जाता है। इन्होंने संपूर्ण इतिहास को पाँच कालों में विभाजित किया। 

    मिश्रबंधु तीन भाई थेगणेश बिहारी मिश्र, श्याम बिहारी मिश्र एवं शुकदेव बिहारी मिश्र। 

    हिंदी साहित्य का इतिहास 

    (रामचंद्र शुक्ल) 

    (1929 .) 

    यह ग्रंथ मूलतः नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित हिंदी शब्दसागरकी भूमिका के रूप में लिखा गया था। इस भूमिका को हिंदी साहित्य का विकास नाम दिया गया था। 

    यह हिंदी का सर्वाधिक प्रख्यात इतिहास-ग्रंथ है। 

    इसमें रचनाकारों के इतिवृत्त की बजाय उनके रचनात्मक-वैशिष्ट्य पर अधिक बल दिया गया। 

    विधेयवादी पद्धति का प्रयोग करते हुए तत्कालीन युगीन परिस्थितियों के संदर्भ में हिंदी साहित्य के इतिहास को विश्लेषित किया गया। 

    अपभ्रंश साहित्य को हिंदी से अलगाते हुए पूर्वपीठिका के रूप में वर्णित किया गया। 

    संपूर्ण इतिहास का इतना तार्किक एवं सुव्यवस्थित काल विभाजन किया कि परवर्ती इतिहास-ग्रंथों में प्रायः उसका ही प्रयोग किया गया। 

    ग्रंथ (ग्रंथकार) एवं समय 

    संबंधित उल्लेख बिंदु 

    इस्तवार ला लितरेत्यूर ऐन्दुई 
    ऐन्दुस्तानी(गार्सां तासी) 

     

    इसमें उर्दू और हिंदी के 738 कवियों का विवरण उनके अंग्रेज़ी वर्ण के क्रम से दिया गया था। केवल 72 कवि हिंदी से संबंधित थे। 

    यह फ्रेंच भाषा में लिखा गया था।ऐन्दुईका अर्थहिंदवी’ (हिंदी) औरऐन्दुस्तानीकाहिंदुस्तानी’ (उर्दू) था। इसे ब्रिटेन और आयरलैंड की प्राच्य साहित्य-अनुवादक समिति की ओर से पेरिस में प्रकाशित किया गया था, जिसमें काल-विभाजन और नामकरण का कोई प्रयास नहीं किया गया था। 

    डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने इस ग्रंथ में वर्णित हिंदी रचनाकारों संबंधी सामग्री का हिंदी अनुवादहिंदुई साहित्य का इतिहासशीर्षक से 1952 . में प्रकाशित कराया। 

    तज़किरा--शुअरा--हिंदी 

    (मौलवी करीमुद्दीन) 

    (1848 .) 

    देहली कॉलेज द्वारा प्रकाशित इस ग्रंथ में 1004 कवियों का विवरण दिया गया है जिनमें 62 कवि ही हिंदी से संबंधित हैं। 

    इस ग्रंथ का महत्त्व इस बात में है कि इसमें सर्वप्रथम कालक्रम का ध्यान रखा गया है। किंतु नामकरण नहीं किया गया है। 

    इसेतबकाश्शुअराभी कहा जाता है। 

    भाषा काव्य संग्रह 

    (महेशदत्त शुक्ल) (1873 .) 

    यह हिंदी भाषा में लिखा गया प्रथम हिंदी साहित्येतिहास संबंधी ग्रंथ था। 

    यह नवल किशोर प्रेस, लखनऊ से प्रकाशित हुआ था। 

    शिवसिंह सरोज 

    (शिवसिंह सेंगर) 

     

     

    इस ग्रंथ में सर्वप्रथम एक हज़ार से ज़्यादा (1003) भाषा कवियों का विवरण दिया गया। इसी से यह बाद के इतिहासकारों के लिये आधार भी रहा। 

    इसके पूर्वार्द्ध में 838 कवियों की रचनाओं के नमूने तथा उत्तरार्द्ध में 1003 कवियों का जीवन परिचय दिया गया है। 

    इसमें वर्णानुक्रम पद्धति का प्रयोग किया गया है। काल विभाजन एवं नामकरण का प्रयास नहीं किया गया है। 

    इस ग्रंथ को हिंदी साहित्य के इतिहास काप्रस्थान बिंदुकहा गया है। 

     वक्तव्य एवं काल-विभाजन 

    • आचार्य शुक्ल ने अपने से पहले लिखे गए साहित्येतिहास-ग्रंथों कोकवि-वृत्त-संग्रहकहा है- 
    • शिवसिंह सरोजकवि-वृत्त-संग्रह  
    • मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ़ नार्दर्न हिंदुस्तान बड़ा कवि-वृत्त-संग्रह  
    • मिश्रबंधु विनोद बड़ा भारी/प्रकांड कवि-वृत्त-संग्रह। 

    नामकरण दो आधारों पर किया- 

    • काल-विभाग के भीतर प्राप्त होने वाली विशेष ढंग की रचनाओं की प्रचुरता उनके स्वरूप के अनुसार। 
    • ग्रंथों की प्रसिद्धि के आधार पर क्योंकिप्रसिद्धि भी किसी काल की लोकप्रवृत्ति की प्रतिध्वनिहै 
    • "किसी काल विस्तार को लेकर यों ही पूर्व और उत्तर नाम देकर दो हिस्से कर डालना ऐतिहासिक विभाग नहीं कहला सकता।" 
    • "किसी काल के कवियों की साहित्यिक विशेषताओं के संबंध में मैंने जो संक्षिप्त विचार प्रकट किये हैं, वे दिग्दर्शन मात्र के लिये। इतिहास की पुस्तक में किसी कवि की पूरी क्या अधूरी आलोचना भी नहीं हो सकती।" 
    • "आधुनिक काल में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान साहित्यिक घटनाहै।" 
    • "वर्तमान लेखकों और कवियों के संबंध में कुछ लिखना अपने सिर एक बला मोल लेना ही समझ पड़ता था।" 
    • "(रीतिकाल के) कवियों के परिचयात्मक विवरण मैंने प्रायःमिश्रबंधु विनोदसे ही लिये हैं।" 
    • मिश्रबंधु विनोदके अतिरिक्त सामग्री-सहयोग के लिये इन ग्रंथों के नाम शुक्ल जी ने दिये हैं 

    हिंदी कोविद रत्नमाला’ (बाबू श्यामसुंदर दास) 

    कविता-कौमुदी’ (रामनरेश त्रिपाठी) 

    ब्रजमाधुरी सार’ (वियोगी हरिजी) 

    • "मेरा उद्देश्य अपने साहित्य के इतिहास का एक पक्का और व्यवस्थित ढाँचा खड़ा करना था, कि कवि कीर्तन करना।" 
    • शुक्ल जी का काल-विभाजन एवं नामकरण इस प्रकार है- 

    आदिकाल (वीरगाथाकाल, संवत् 1050-1375) 

    पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल, संवत् 1375-1700) 

    उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल, संवत् 1700-1900) 

    आधुनिक काल (गद्यकाल, संवत् 1900-1984) 

     

    • जिस प्रकार साहित्य की परंपरा का अध्ययन साहित्येतिहास-लेखन के माध्यम से किया जाता है, उसी प्रकार साहित्येतिहास-लेखन उसकी परंपरा का अध्ययन साहित्येतिहास-दर्शन करता है। 
    • साहित्येतिहास दर्शन से अभिप्राय साहित्य के इतिहास-लेखन में प्रयुक्त दृष्टिकोणों एवं विचारों का अध्ययन करने वाले विषय से है। हिंदी में नलिन विलोचन शर्मा ने इस तरह का उल्लेख्य ग्रंथ लिखा हैः साहित्य-इतिहास का दर्शन  
    • मैनेजर पांडेय काइतिहास एवं साहित्य दृष्टिभी इसी प्रकार का ग्रंथ है।
      साहित्येतिहास-दर्शन का संबंध इतिहास दर्शन से है। इतिहास दर्शन के जनक को लेकर मतभेद है 
    • कालिंगवुड के अनुसारवाल्तेयर (सामान्यतः इन्हें ही माना जाता है।) 
    • प्रोफेसर वाल्श के अनुसारविको (ये इटली के दार्शनिक थे।) 
    • वाल्तेयर के अनुसार इतिहास-दर्शन इतिहास के चिंतन की विधि है। इसमें इतिहासकार ऐतिहासिक घटनाओं को दोहराने की बजाय उनके विषय में चिंतन करता है। 
    • कालिंगवुड के अनुसारइतिहास का दर्शन इतिहास और इतिहासकार के विचारों का पारस्परिक तालमेल है। 
    • इतिहास-दर्शन के संदर्भ में हीगेल के विचार परिवर्तनकारी माने जातेहैं। 
    • प्रोफेसर वाल्शपरिकल्पनात्मक दर्शन के संस्थापक 
    • हीगेल के अनुसारइतिहास घटनाओं का संकलन भर नहीं है, बल्कि घटनाओं के भीतर छिपी कार्य-कारण प्रक्रिया की खोजहै। 
    • हीगेल का इतिहास-दर्शन द्वंद्वात्मक आदर्शवाद कहलाता है। 
    • हिंदी साहित्य के इतिहास की दृष्टि से उल्लेख्य ग्रंथ भक्तिकाल से ही मिलने लगते हैं। जैसे- गोकुलनाथ कृतचौरासी वैष्णवन की वार्ता,’ ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ताऔर नाभादास कृतभक्तमाल किंतु कवियों का विवरण मात्र होने से इन्हें इतिहास-ग्रंथ नहीं माना जाता। 
    • हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की परंपरा का आरंभ 19वीं शती में गार्सां तासी कृतइस्तवार ला लितरेत्यूर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानीसे माना जाता है। 

    हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की चार पद्धतियाँ मुख्य रही हैं- 

    1. वर्णानुक्रम पद्धति 
      • इसमें रचनाकारों का विवरण उनके नाम के प्रथम वर्ण के क्रम से दिया जाता है। उदाहरण के लिये, तुलसीदास, चिंतामणि और केदारनाथ सिंह का समय भले ही भिन्न हो किंतु उनका क्रम इस प्रकार होगाकेदारनाथ सिंह, चिंतामणि, तुलसीदास। 
      • इसे ऐतिहासिक दृष्टि से असंगत माना जाता है क्योंकि यह इतिहास-लेखन नहीं, शब्दकोश-लेखन की तरह होती है। 
      • गार्सां तासी और शिवसिंह सेंगर ने इसका प्रयोग किया है। 
    2. कालानुक्रम पद्धति 
      • इसमें रचनाकारों का विवरण उनके काल (समय) के क्रम से दिया जाता है। रचनाकार की जन्मतिथि को आधार बनाया जाता है। 
      • इतिहास-लेखन की दृष्टि से इसे भी अधूरा समझा जाता है क्योंकि इस पद्धति से लिखे ग्रंथ भी वर्णानुक्रम पद्धति की तरहकवि- वृत्त-संग्रहमात्र होते हैं। 
      • जॉर्ज ग्रियर्सन और मिश्रबंधुओं ने इसका प्रयोग किया है। यद्यपि ग्रियर्सन में विधेयवादी पद्धति के कुछ आरंभिक सूत्र भी मिलने लगतेहैं। 
    3. वैज्ञानिक पद्धति 
      • इसमें ग्रंथकार निरपेक्ष एवं तटस्थ रहकर तथ्य संकलन कर उसे क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है। 
      • इतिहास-लेखन सिर्फ तथ्य संकलन की नहीं, बल्कि उनकी व्याख्या एवं विश्लेषण की भी मांग करता है। अतः इस पद्धति को भी अपरिपक्व माना जाता है। 
    4. विधोयवादी पद्धति 
      • फ्रेंच विद्वान तेन (Taine) ने इसे सुव्यवस्थित सिद्धांत के रूप में स्थापित किया।  
      • तेन ने इस पद्धति को तीन शब्दों के माध्यम से स्पष्ट किया- जाति (Race), वातावरण (Milieu) और क्षण विशेष (Moment)‌ इस पद्धति के अनुसार, ‘किसी भी साहित्य के इतिहास को समझने के लिये उससे संबंधित जातीय परंपराओं, राष्ट्रीय और सामाजिक वातावरण एवं सामयिक परिस्थितियों का अध्ययन-विश्लेषण आवश्यकहै। 
      • इसे इतिहास-लेखन की व्यापक, स्पष्ट एवं विकसित पद्धति माना गया है, क्योंकि, ‘इसके द्वारा साहित्य की विकास-प्रक्रिया को बहुत कुछ स्पष्ट किया जा सकता है। 
      • हिंदी में सर्वप्रथम रामचंद्र शुक्ल ने इस पद्धति का प्रयोग किया। उनके बाद रामस्वरूप चतुर्वेदी, बच्चन सिंह आदि प्रख्यात साहित्येतिहासकारों ने इस पद्धति को आगे बढ़ाया। यह तथ्य उनके निम्नलिखित उद्धरणों से स्पष्ट होता है- 
        रामचंद्र शुक्ल- "जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना हीसाहित्य का इतिहासकहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होतीहै।" 
        रामस्वरूप चतुर्वेदी- "कवि का काम यदिदुनिया में ईश्वर के कामों को न्यायोचित ठहराना हैतो साहित्य के इतिहासकार का काम है कवि के कामों को साहित्येतिहास की विकास-प्रक्रिया में न्यायोचित दिखा सकना।" 

    संस्थागत प्रयास 

    संस्थागत प्रयासों में सबसे पहला प्रयास 1935 में हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से हुआ। सम्मेलन ने इस वर्ष महात्मा गांधी के सभापतित्व मेंनागरी लिपि सुधार समितिबनाई जिसके संयोजक काका कालेलकर थे। समिति की प्रमुख सिफारिशें ये थीं- 

    • सावरकर बंधुओं द्वारा सुझाई गई बारहखड़ी को स्वीकार किया जाए। 
    • और में गुजराती घुंडी लगाई जाए (, ) 
    • व्यंजन संयोग में ऊपर-नीचे की स्थिति को समाप्त कर दिया जाए।  
    • द्द, द्ध आदि के स्थान पर क्रमशः द्-द, द्-ध का प्रयोगहो। 
    • शिरोरेखा लेखन में रहे, पर मुद्रण में बनी रहे। 
    • की मात्रा जैसी है, वैसी ही रहे। अन्य मात्राएँ, रेफ और अनुस्वार चिह्न व्यंजन के बाद हटाकर अलग से लिखे जाएँ, जैसे- 

             (रानी) 

                (संगीत) 

    • 1945 . में काशी नागरी प्रचारिणी सभा नेनागरी लिपि सुधार उपसमितिका निर्माण किया। इस समिति ने श्रीनिवास और गोरखनाथ के सुझावों को अस्वीकार कर दिया। 

    देवनागरी के मानकीकरण के संबंध में सबसे बड़ा और पहला सरकारी प्रयास 1947 . में किया गया। इस वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस समिति को अभी तक दिये गए सभी सुझावों के आधार पर संतुलित राय व्यक्त करने को कहा गया। सभी सुझावों का गहरा विश्लेषण करने के बाद समिति ने जो संस्तुतियाँ दीं, वे इस प्रकारहैं- 

    • की बारहखड़ी का प्रयोग ठीक नहीं है। 
      • मात्राएँ यथास्थान (यानी ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ) बनी रहें, पर उन्हें व्यंजन से हटाकर लिखा जाए। 
      • पंचमाक्षर (, , , , ) के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाए। 
      • व्यंजन संयोग में व्यंजनों को नीचे की ओर जोड़ा जाए।  
      • व्यंजन संयोग की स्थिति में या तो व्यंजन की पाई को हटा दिया जाए या हलन्त का प्रयोग किया जाए। 
      • शिरोरेखा लगाई जाए। 

    1953 . में हिंदी भाषी प्रदेशों के शिक्षामंत्रियों का सम्मेलन हुआ जिसने समिति की सिफारिशों पर विचार किया। सम्मेलन में दो नए सुझाव दिये गए- 

    • की मात्रा पाई छोटी करके दाहिनी ओर लिखी जाए। 
    • रवकोके रूप में लिखा जाए ताकि इसेरवके रूप में पढ़ने का खतरा रहे। 
    • इनमें से पहले सुझाव का कड़ा विरोध हुआ और बाद में (1957 में) अस्वीकृत कर दिया गया। दूसरा सुझाव सामान्य रूप से स्वीकार किया गया। 
    • भारत सरकार ने 1955 . में इन सुझावों को मान्यता दे दी। राजकीय संदर्भों में भाषा प्रयोग में लिपि के इन्हीं नियमों को स्वीकार किया जाता है। 
    • भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने इस दिशा में कई स्तरों पर प्रयास किया है। सन् 1966 मेंमानक देवनागरी वर्णमालाप्रकाशित की गई। इसमें मूलतः उन वर्णों पर ध्यान दिया गया जिनको एकाधिक तरीके से लिखा जाता था। ऐसे वर्णों के लिये एक रूप निश्चित कर दिया गया। इसी मंत्रालय की ओर से 1967 मेंहिंदी वर्तनी का मानकीकरणका प्रकाशन हुआ। 

    देवनागरी लिपि के संबंध में महत्त्वपूर्ण कथन 

    "संसार में यदि कोई सर्वांगपूर्ण अक्षर हैं तो देवनागरी के हैं। 

    सर आइजक पिटमैन 

    "नागरी लिपि से बढ़कर वैज्ञानिक लिपि मैंने पाई नहीं।" 

    आचार्य विनोबा 

    देवनागरी दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। 

    राहुल सांकृत्यायन 

     

    स्वाधीनता आंदोलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा प्राप्त होने के साथ ही देवनागरी लिपि के मानकीकरण का सवाल उठना शुरू हुआ। इस संबंध में कई वैयक्तिक और संस्थागत प्रयास हुए। 

    वैयक्तिक प्रयास 

    • सबसे पहला प्रयास संभवतः बाल गंगाधर तिलक ने किया। उन्होंने अपने पत्रकेसरीके लिये एक फॉन्ट तैयार किया जिसेतिलक फॉन्टके रूप में प्रसिद्धि मिली। इस फॉन्ट में अनावश्यक संकेतों को काट-छाँट दिया गया और पूरी देवनागरी के लिये 190 टाइपों का फॉन्ट सामने आया। 
    • 20वीं शताब्दी के आरंभ में ही जस्टिस शारदाचरण मित्र नेलिपि विस्तार परिषदका निर्माण किया जिसका उद्देश्य सभी भारतीय भाषाओं के लिये एक लिपि का निर्माण करना था। देवनागरी में वे ऐसे सुधार करने के पक्ष में थे जिससे अन्य भारतीय भाषाओं के सारे संकेत इस लिपि में समाहित हो जाएँ। 
    • 20वीं सदी के आरंभ में ही सावरकर बंधुओं ने स्वरों के लियेकी बारहखड़ी तैयार की। इसमें सारे स्वरों कोसे ही मात्रा जोड़कर लिखा जाता था, जैसे- अी, ε, अे, अै, अु, अू आदि। यह प्रयोग महाराष्ट्र में काफी प्रचलित हुआ। महात्मा गांधी ने भी अपने पत्रहरिजन सेवकमें इस शैली का प्रयोग किया। 
    • अन्य वैयक्तिक प्रयासों में काशी के श्रीनिवास का प्रयास महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने सुझाव दिया कि सारे महाप्राण व्यंजनों को हटा दिया जाए तथा अल्पप्राण व्यंजनों के नीचे 'S' का संकेत करके ही महाप्राण व्यंजनों को व्यक्त कर दिया जाए। 
    • डॉ. गोरखनाथ का सुझाव भी इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने कहा कि मात्राओं के वर्णों के ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ होने से जो समस्या पैदा होती है, उसके निराकरण के लिये मात्राओं को वर्णों के बाद अलग से दाहिनी ओर लिख देना चाहिये, जैसे-   (दीपा),       (मैना) आदि। 
    • डॉ. श्यामसुंदर दास नेअनुस्वारके प्रयोग को व्यापक बनाकर देवनागरी को सरल बनाने का सुझाव दिया। विशेष रूप सेङ्तथाके स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग किया जाना चाहिये क्योंकि ये संकेत काफ़ी जटिल हैं। ऐसा करने से उच्चारण तो समान ही रहेगा, पर लिपि सरल हो जाएगी, जैसे- 

           गङ्गा - गंगा 

           चञ्चल - चंचल 

     

    • देवनागरी में कई अनावश्यक वर्ण हैं, जैसे- लृ, आदि। इन वर्णों का मूल उच्चारण अब विस्मृत हो चुका है। अबरिऔरमें तथाऔरमें कोई अंतर नहीं बचा है। अतः वर्णों की अनावश्यक वृद्धि इनकी वजह से हो रही है। 
    • कई वर्ण लेखन में प्रायः एक जैसे प्रतीत होते हैं। ऐसी स्थिति में कई बार भ्रम होने लगता है। उदाहरण के लियेमें होने का खतरा बना रहता है।औरमें तथाऔरमें भ्रम की संभावना बनी रहती है। 
    • अनुस्वार और अनुनासिक के प्रयोग को लेकर भी भ्रम की स्थिति लगातार बनी हुई है। प्रत्येक नासिक्य व्यंजन के लिये अनुस्वार का प्रयोग करने का फैशन-सा चल पड़ा है, जैसे- 

              सम्बन्ध  संबंध गङ्गा  गंगा 

              कञ्चन > कंचन गम्भीर  गंभीर 

    • देवनागरी में वर्णों को संयुक्त करने का कोई निश्चित नियम नहीं है। कभी-कभी वर्णों को आमने-सामने रखने से संयुक्तीकरण की प्रक्रिया चलती है, जैसे- कत्त, कन्त आदि। कहीं-कहीं वर्णों को ऊपर-नीचे रखा जाता है, जैसे- दर्प, अर्ज और भद्दा, गड्डी आदिमें। 
    • मात्राएँ लगाने की कोई निश्चित पद्धति नहीं है। कोई मात्रा वर्ण से पहले लगती है (ε ) तो कोई बाद में ( )। कोई ऊपर लगती है ( ) तो कोई नीचे ( )। अतः वैज्ञानिक आधार का अभाव होने के कारण इससे लिपि के स्तर पर जटिलता पैदा हो जाती है। 
    • की मात्रा वर्ण से पहले लगती है जबकि उसका उच्चारण बाद में होता है। इससे वैज्ञानिकता का हनन होता है। 
    • क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञऔरश्रसंयुक्ताक्षरों का प्रयोग देवनागरी को और जटिल बनाता है। किन्हीं भी दो व्यंजनों के जुड़ने के लिये जब सामान्य नियम हैं तो इनके लिये विशेष संकेत क्यों हैं? 
    • हल् चिह्न को लेकर भ्रम की स्थिति लगातार बनी रहती है।जगतजैसे शब्दों में कुछ लोग हलंत का प्रयेाग करते हैं, कुछ नहीं करते। 

     

    • इसके अक्षरों की बनावट बड़ी जटिल बताई गई है। इन अक्षरों को लिखना और सीखना-सिखाना बहुत कठिन तथा परिश्रम-साध्य है। कहा गया है कि नन्हे बच्चों के मस्तिष्क पर इससे बहुत बोझ पड़ताहै। 
    • कुछ भाषावैज्ञानिकों के अनुसार इसकी वर्णमाला बहुत लम्बी है अर्थात् इसके अक्षरों की संख्या अधिक है। स्वरों की मात्राओं, आधे अक्षरों, द्वित्व अक्षरों तथा विभिन्न अक्षरों के नीचे अथवा ऊपर लगने वाले चिह्नो की संख्या इससे पृथक है। इतनी बड़ी वर्णमाला को स्मरण रखना, समझना और ठीक-ठीक प्रयोग करना एक सामान्य विद्यार्थी के लिये तो कठिन है ही, साथ ही मुद्रण (छपाई) और टंकण (टाइप) के लिये भी बहुत दुरूह है।  
    • व्यावहारिक स्तर पर देवनागरी लिपि के अनेक अक्षर अनावश्यक बताए गए हैं। उन्हें हटाकर अक्षरमाला की संख्या कम करने के सुझाव दिये गए हैं। उदाहरणतः कुछ विद्वान कहते हैं कि सभी स्वरों का केवलके साथ उनकी मात्राएँ लगाकर काम चलाया जा सकता है। , , , , , , , आदि की आवश्यकता नहीं है, ये क्रमशः , अी, अु, अू आदि के रूप में लिखे जा सकतेहैं। 
    • कुछ भाषावैज्ञानिक मात्राओं की व्यवस्था में भी अवैज्ञानिकता खोजते हैंउनका कहना है कि कुछ मात्राएँ बाईं ओर और कुछ दाईं ओर क्यों लगती हैं? इसी प्रकार कुछ मात्राएँ अक्षरों के नीचे और कुछ ऊपर लगाई जाती हैं। यह भी अवैज्ञानिक है।  
    • देवनागरी लिपि में मुद्रण तथा टंकण कठिन है क्योंकि वर्णों और मात्राओं को मिलाकर चार सौ से भी अधिक टाईप रखने पड़ते हैं। 
    • शिरोरेखा का प्रयोग अनावश्यक है। इसके कारण समय की बर्बादी होती है। 
    • देवनागरी के अंकों को लेकर भी भ्रम की स्थिति बनी रहती है, जैसे- 9 के लिये दो संकेत मिलते हैं। 
    • नागरी लिपि की दूसरी विशेषता यह है कि इसके अक्षरों के नाम तथा इनके लिखित एवं उच्चरित रूप में भिन्नता नहीं है जैसा कि अन्य लिपियों में है।  
    • उदाहरणतः रोमन लिपि मेंकी ध्वनि का बोधयू(U) अक्षर से भी होता है (Put) और द्वित्व(OO) से भी (Foot)इसके अतिरिक्तके लिये कहीं रोमन लिपि का(E) अक्षर प्रयुक्त होता है (Begin), कहीं आई (I) (This)साथ ही एक ही अक्षर कई ध्वनियों का सूचक है। जैसे- ‘यू(U) की ध्वनि भी देता है (But) औरकी भी (Put)देवनागरी लिपि में ऐसी अवैज्ञानिकता नहीं है।  
    • विश्वभर की भाषाओं की कोई ऐसी ध्वनि नहीं जिसके उच्चारण का सूचक अक्षर देवनागरी में हो। जो अपवाद थे, उन्हें मानकीकरण-प्रक्रिया में दूर कर दिया गयाहै। 
    • देवनागरी लिपिकी उल्लेखनीय विशेषतामात्रा-व्यवस्थाभी है।को छोड़कर, अन्य सभी स्वरों की ध्वनि को अन्य वर्णों के साथ उच्चरित करने के लिये उन्हें (स्वरों को) नहीं लिखना पड़ता, बल्कि उनकी मात्रा से वही ध्वनि उच्चरित हो जाती है।  
    • उदाहरणतयाअमेरिकाशब्द मेंके बादध्वनि बोली जाती है  औरके साथतथाके साथध्वनि का उच्चारण होता है, पर इन्हें, ‘ ’, ‘िऔर से सूचित कर दिया जाता है।रोमनलिपि की भाँति के बाद  और के बाद  या  के बाद  अर्थात् पूरा वर्ण नहीं लिखना पड़ता। यदि हम देवनागरी मेंअमएरइकआलिखेंगे तो उच्चारण भीअमेरिका होकरअमएरइकआहोगा। 
    • देवनागरी लिपिको सीखना एकदम आसान है। केवल एक सीधी रेखा (।), एक आड़ी रेखा () और अर्द्धवृत्त ( ) सीख लेने पर प्रायः सभी देवनागरी अक्षर बनाना सीखा जा सकता है। 
    • देवनागरी लिपिमें हर अक्षर शिरोरेखा युक्त है जो उसकी अलग पहचान और अर्थवत्ता का द्योतक है। 
    • शिरोरेखा की उपयुक्त व्यवस्थादेवनागरीमें प्रत्येक एकल शब्द कीइकाईको अक्षुण्ण और शुद्ध प्रयोग में सक्षम बनाए रखती है।कपड़ा सूख रहा हैवाक्य केचारोंशब्द शिरोरेखा द्वारा अलग अस्तित्वयुक्त हैं, इसलिये वाक्य सार्थक है। शिरोरेखा के बिनाकप ड़ासू खर हा हैआदि पढ़े जाने की आशंका है। 
    • देवनागरी में एक वर्ण से एक ही ध्वनि संकेतित होती है। उर्दू या अंग्रेज़ी में ऐसा नहीं है। 
    • देवनागरी में प्रत्येक ध्वनि के लिये एक ही वर्ण है। यह विशेषता भी केवल वैज्ञानिक लिपियों में पाई जाती है। 
    • व्यंजनों के एक साथ होने पर देवनागरी में व्यंजन-संयोग की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जैसे- प्र, क्ष, त्र, ज्ञ आदि। ऐसा होने के कारण लेखन में स्थान बचता है। अंग्रेज़ी में ऐसे शब्दों में स्थान बहुत अधिक घिरता है, जैसे- क्षत्रिय > Kshatriya आदि। 

     

    • देवनागरी लिपि का सर्वप्रथम प्रयोग गुजरात के राजा जयभट्ट (7वीं-8वीं शती) के एक शिलालेख में हुआ है। 
    • देवनागरी लिपि के नामकरण के संबंध में अनेक मत हैं 
    • ललित विस्तारनामक बौद्धग्रंथ में उल्लिखितनागलिपिके आधार परनागरीनाम पड़ा। 
    • चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त को देव तथा उनकी राजधानी पाटलिपुत्र को नागर कहा जाता था। इसी सेदेवनागरीनाम अस्तित्व में आया। 
    • कुछ विद्वान गुजरात केनागरब्राह्मणों से भी नागरी के नामकरण को जोड़कर देखते हैं। 
    • डॉ. धीरेंद्र वर्मा का मत है कि मध्ययुग की स्थापत्य शैलीनागरके नाम परनागरीनाम पड़ा। 
    • रुद्रपट्टण शामाशास्त्री के अनुसार, "देवताओं की प्रतिमाओं के बनने के पूर्व उनकी उपासना सांकेतिक चिह्नों द्वारा होती थी, जो कई प्रकार के त्रिकोणादि यंत्रों के मध्य में लिखे जाते थे। वे यंत्रदेवनागरकहलाते थे और उनके मध्य लिये जाने वाले अनेक प्रकार के सांकेतिक चिह्नवर्णमाने जाने लगे। इसी से उनका नाम देवनागरी हुआ।" 
    • मुद्रण के लिये देवनागरी टाइप सबसे पहले यूरोप में बने। 
    • चाइना इलस्ट्रेटा (1667 .) देवनागरी में प्रकाशित होने वाली प्रथम पुस्तक है। 
    • चार्ल्स विलिकन्स और पंचानन को भारत में नागरी टाइप बनाने का श्रेय दिया जाता है। 

    देवनागरी लिपि की विशेषताएँ 

    • यह एक अक्षरात्मक लिपि है। 
    • इसके ध्वनि-चिह्न संस्कृत व्याकरण के अनुसार वैज्ञानिक रूप से इस प्रकार वर्गीकृत हैं कि एक स्थान-विशेष से उच्चरित होने वाले अक्षर एक ही वर्ग में सम्मिलित हैं। उदाहरणतः मनुष्य के मुख-विवर में से ध्वनियों के उच्चारण में सहायक होने वाले स्थानों का यदि वैज्ञानिक विवेचन किया जाए तो उसका क्रम इस प्रकार होगाकंठ > तालु > मूर्धा > दंत > ओष्ठ > नासिका। 
    • देवनागरी लिपि की अक्षरमाला भी इसी क्रम से वर्गीकृत है। 
    • अक्षरों के क्रम की वैज्ञानिकता से संबंधितदेवनागरीकी यह विशेषता भी उल्लेखनीय है कि इसमें पहले क्रमानुसार स्वर रखे गए हैं। कंठ से श्वास सीधे स्वरों के रूप में निकलता है। उसके पश्चात् ही व्यंजनों का क्रम है। रोमन लिपि में कोई स्वर कहीं है और कोई कहीं।(A) सबसे पहले है तो(E) पाँचवे, ‘आई(I) नौवें और(O) पंद्रहवें क्रम पर है। 

     

    • लिखावट/भाषा की सभी ध्वनियों के लिये निर्धारित प्रतीक चिह्नों को लिपि कहते हैं। 
    • कामताप्रसाद गुरु के अनुसार– "लिखित भाषा में मूल ध्वनियों के लिये जो चिह्न मान लिये गए हैं, वे वर्ण कहलाते हैं, पर जिस रूप में लिखे जाते हैं उसे लिपि कहते हैं।" 
    • भारत में प्राचीन समय में तीन लिपियाँ प्रसिद्ध थीं 

    1. सिंधु घाटी लिपि 2. खरोष्ठी लिपि 3. ब्राह्मी लिपि

    • सिंधु घाटी लिपि कुछ चित्राक्षर थी, कुछ ध्वन्याक्षर। इसके प्राचीनतम नमूने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुए हैं। 
    • सिंधु घाटी लिपि की ध्वनि चिह्न संख्या को लेकर विद्वानों के मतों में भेद है। हंटर इसकी संख्या 253, लैंडन 228 तथा गैड एवं स्मिथ 396 मानते हैं। 
    • विभिन्न प्राचीन भारतीय लिपियों का उल्लेख बौद्ध ग्रंथललित विस्तरमें मिलता है। इस ग्रंथ में अशोक के समय की लिपि का नाम ब्राह्मी बताया गया है। 
    • नित्यषोडविकार्णव के भाष्यसेतुबंध में भास्करानंद ने ब्राह्मी का नाम नागर (नागरी) लिपि माना है। 
    • बूलर के अनुसार– "भारतीयों ने सामी लिपि के आधार पर 500 .पू. के लगभग ब्राह्मी लिपि का निर्माण किया था।" इनके अनुसार– "ब्राह्मी लिपि में 41 अक्षर थे, जिनमें 9 स्वर तथा 32 व्यंजन थे।" 
    • कनिंघम के अनुसार– "आर्यों ने किसी प्राचीन चित्रलिपि के आधार पर ब्राह्मी लिपि बनाई है।" 
    • एडमर्ड थॉमस के अनुसार– "ब्राह्मी लिपि का निर्माण द्रविड़ों ने किया है।" 
    • ब्राह्मी लिपि के प्राचीनतम नमूने पिपराला के स्तूप (बस्ती) और बड़ली गाँव (अजमेर) से प्राप्त हुए हैं। 
    • लिपि के आचार्य डॉ. राजबली पांडेय का मत है कि ब्राह्मी का आविष्कार ब्रह्म या वेद की रक्षा के लिये हुआ था। 
    • खरोष्ठी लिपि का प्रचलन उत्तर पश्चिम भारत में एक हज़ार वर्ष तक रहा। इसके प्राचीनतम नमूने शाहबाजगढ़ी और मानसेरा में अशोक के अभिलेख से प्राप्त होते हैं। 
    • अरमाइक लिपि से खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति हुई है। प्राचीन भारत में खरोष्ठी लिपि दाईं ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी। 
    • चीनी विश्वकोश फास्वान-शु-लीन के अनुसार ब्राह्मी लिपि का नामकरण आचार्यब्रह्मके नाम पर हुआ। 
    • कुछ लोग ब्रह्मा से जोड़कर भी ब्राह्मी को देखते हैं। 
    • विकास की दृष्टि से ब्राह्मी लिपि को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- 

    प्रागैतिहासिक कालवैदिक काल से छठी शती .पू. तक 

    बौद्ध कालजब ब्राह्मी लिपि गोल आकार लेने लगी 

    गुप्त कालजिसके बाद ब्राह्मी आधुनिक लिपि में विकसितहुई। 

    • गुप्तकाल के आरंभ में ब्राह्मी के दो भेद हो गएदक्षिणी औरउत्तरी। 
    • सिद्ध मात्रिक लिपि को डॉ. बूलर ने न्यून कोणीय लिपि नाम दिया है। यही लिपि कालांतर में कुटिल लिपि के नामसेजानीगई। 

     

    • वर्तमान समय में हिंदी के तकनीकी विकास का अर्थ प्रायः कंप्यूटरीकरण से ही लिया जाता है। 
    • कंप्यूटर के दो अंग होते हैं- हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर। हार्डवेयर का संबंध कंप्यूटर की मशीन से है। मशीन के स्तर पर हिंदी अथवा अंग्रेज़ी का कोई अंतर नहीं पड़ता। 
    • सॉफ्टवेयर का अर्थ उन सभी प्रोग्रामों से है जो कंप्यूटर को संचालित करते हैं। ये प्रोग्राम दो तरह के होते हैं- सिस्टम सॉफ्टवेयर (डॉस, विंडोज़ आदि) और ऐप्लिकेशन सॉफ्टवेयर 
    • जहाँ तक सिस्टम सॉफ्टवेयर का संबंध है, हिंदी में अपना सिस्टम सॉफ्टवेयर विकसित नहीं हुआ। 
    • ऐप्लिकेशन सॉफ्टवेयर ही वह क्षेत्र है जो सीधे-सीधे हिंदी के कंप्यूटरीकरण से जुड़ा है। इस क्षेत्र में दो तरह के कार्य कंप्यूटर प्रमुख रूप से करता है- आँकड़ा संसाधन (डाटा प्रोसेसिंग) तथा शब्द संसाधन (वर्ड प्रोसेसिंग)। 
    • 1977 तक हिंदी में ऐसा कोई कार्यक्रम उपलब्ध नहीं था। 1977 में हैदराबाद की .सी.आई.एल. नामक कंपनी नेफोरट्राननामक कंप्यूटर भाषा में पहली बार हिंदी को कंप्यूटर पर उतारा। 
    • 1980 के आस-पास दिल्ली की डी.सी.एम. नामक कंपनी ने सिद्धार्थ नामक मशीन पर शब्दमाला कार्यक्रम तैयार किया। यह हिंदी-मशीन द्विभाषी शब्द-संसाधक थी, एक साथ दोनों भाषाओं में सामग्री संसाधन की सुविधा देती थी। 
    • इसी समय हैदराबाद की सी.एम.सी. नामक कंपनी ने तीन भाषाओं (अंग्रेज़ी, हिंदी और एक भारतीय भाषा) में शब्द संसाधन के लियेलिपिनामक मशीन तैयार की। 
    • इन सभी कार्यक्रमों में प्रायः दो कमियाँ थीं- 
    • एक तो ये लेज़र मुद्रण या फोटो कम्पोज़ि्ांग में प्रयुक्त नहीं हो सकते थे। 
    • इनके कुंजीपटल अलग-अलग थे और अक्षरों की बनावट में भी अंतर था। 
    • इस संदर्भ में पुणे स्थित भारत सरकार की कंपनी सी-डैक(C-DAC- Centre for Development of  Advanced Computing) का योगदान महत्त्वपूर्ण है। 
    • इस कंपनी ने 1984 के आसपास GIST (Graphic based Indian Standard Terminology) नामक तकनीक का विकास किया। जिस्ट एक कंप्यूटर कार्ड है, जिसे कंप्यूटर में लगा देने पर हिंदी तथा सभी भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर के पर्दे पर अक्षर छापे जा सकते हैं।
    • हिंदी के कंप्यूटरीकरण में कुछ और क्षेत्रों को भी जोड़ा गया है जिनमें अनुवाद तथा शिक्षण प्रमुख हैं
    • मोदी ज़ीरोक्स ने ऐसे ही एक कार्यक्रम का प्रयोग करते हुए एक ऐसी फोटोकॉपी मशीन बनाई है जो अंग्रेज़ी के पाठ को हिंदी में फोटोकॉपी करती है। 
    • नए लोग हिंदी को कंप्यूटर के माध्यम से सीख सकें, इसके लिये लीला नामक एक पैकेज तैयार किया गया है जो उच्चारण, लिपि तथा चित्रों के माध्यम से बच्चों तथा विदेशियों को हिंदी का ज्ञान कराता है। 
    • 1977 के बाद से हिंदी के कंप्यूटरीकरण में तीव्र प्रगति हुईहै। 
    • इस तीव्र विकास में जिन संस्थाओं का प्रमुख रूप से योगदान है, उनमें राजभाषा विभाग कातकनीकी प्रभागतथाइलेक्ट्रॉनिक विभागप्रमुख हैं। इलेक्ट्रॉनिक विभाग नेभाषा प्रौद्योगिकी मिशनका आरंभ किया था जो आज काफी सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। 
    • कंप्यूटर हिंदी टाइपिंग की मुख्यतः तीन विधियाँ हैं 

    रेमिंग्टन टाइपिंग 

    इनस्क्रिप्ट टाइपिंग 

    फोनेटिक टाइपिंग 

    • इनस्क्रिप्ट भारत की आधिकारिक टाइपिंग पद्धति है, जिसका विकास राजभाषा विभाग ने किया है। 
    • कुछ समय पहले तक हिंदी यूनिकोड का फोनेटिक या ट्रांसलिट्रेशन कीबोर्ड लेआउट वाला केवलबराहासॉफ्टवेयर ही प्रचलित था। 
    • अब भाषा इंडिया का इंडिक आईएमई का प्रयोग बहुतायत में हो रहा है। इसी प्रकार गूगल इनपुट आदि सॉफ्टवेयर भी हिंदी टाइपिंग के लिये प्रयोग में लाए जा रहे हैं। 

     

    • सूचनाओं के आदान-प्रदान का माध्यम संचार माध्यम कहलाता है, जैसे- पत्र-पत्रिकाएँ, मोबाइल आदि। 
    • जन-जन तक समाचारों-सूचनाओं या महत्त्वपूर्ण जानकारियों को पहुँचाना जनसंचार कहलाता है।  

    इसके माध्यम दो प्रकार के होते हैं- 

    प्रिंटसमाचार पत्र, पत्रिकाएँ आदि। 

    इलेक्ट्रॉनिकश्रव्यरेडियोदृश्य-श्रव्यटी.वी. 

    • हिंदी ने तमाम प्रकार के संचार माध्यमों के अनुकूल खुद को बनाया है, जिसका प्रयोग वर्तमान में किया जा रहा है। 

    हिंदी का वैज्ञानिक विकास 

    हिंदी के संदर्भ में विचार करें तो पिछले कुछ दशकों में हिंदी के वैज्ञानिक विकास पर काफी ध्यान दिया गया है। यह मुख्यतः चार स्तरों पर दिखता है- 

    • मानकीकरण के प्रयास 
    • पारिभाषिक शब्दावली का विकास 
    • अनुवाद कार्य की प्रगति 
    • हिंदी के टंकण आदि से जुड़ी तकनीकों का विकास 

    कंप्यूटर और हिंदी 

    • भाषा के संबंध में यांत्रिक उपकरणों के विकास की प्रक्रिया को स्वाभाविक रूप से दो चरणों में बाँटा जा सकता है- कंप्यूटर पूर्व यांत्रिकीकरण और कंप्यूटरीकरण। 

    कंप्यूटर पूर्व यांत्रिकीकरण 

    • भाषा के यांत्रिकीकरण की शुरुआत टाइपराइटर से होती है। 
    • 1960 . में डॉ. वी.के.आर.वी. राव, डॉ. एस.एम.कत्रे, डॉ. वी. राघवन, डॉ. रघुवीर, डॉ. बाबूराम सक्सेना, प्रो. कृपानाथ मिश्र आदि विद्वानों ने देवनागरी का रूप निश्चित किया तथा कुछ निजी कंपनियों ने टाइपराइटरों का विकसित कुंजी पटल बनाया जो कि देवनागरी की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रायः समर्थ था। कुल मिलाकर इस कुंजी पटल में 174 संकेतों की व्यवस्था की गई थी। 
    • 1960 में संचार मंत्रालय के अंतर्गत हिंदुस्तान टेली-प्रिंटर नामक उद्यम प्रारंभ हुआ। तब तक देवनागरी में कुछ प्रारंभिक टेली-प्रिंटर भारतीय तार विभाग को मैसर्स-आलीवेट कंपनी ने दिये थे। 
    • इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर- कुछ ही समय बाद इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर का विकास हुआ। मैनुअल टाइपराइटर में केवल एक लिपि का टंकण संभव था, जबकि इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर एकाधिक लिपियों के लिये काम में आता है। इसमें अशुद्धियों को ठीक करने की स्वचालित व्यवस्था होती है। 

     

    अनुच्छेद-348 

    • अनुच्छेद-348 में कहा गया है कि जब तक संसद विधि द्वारा कोई और उपबंध करे, तब तक उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेज़ी में ही होंगी।  

          इसके अतिरिक्त, निम्नलिखित विषयों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेज़ी में होंगे- 

    • संसद के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधानमंडल के प्रत्येक सदन में प्रस्तुत किये जाने वाले सभी विधेयक या उनके प्रस्तावित संशोधन। 
    • संसद या किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा पारित सभी अधिनियम और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा जारी किये गए अध्यादेश। 
    • संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन जारी किये गए सभी आदेश, नियम, विनियम और उपविधियाँ। 
    • इसी अनुच्छेद में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से उच्च न्यायालय की कार्यवाही के लिये हिंदी भाषा या उस राज्य में मान्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा, पर यह बात उस न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय, डिक्री या आदेश पर लागू नहीं होगी। 

    अनुच्छेद-349 

    • अनुच्छेद-349 के अनुसार संसद यदि राजभाषा से संबंधित कोई विधेयक या संशोधन प्रस्तावित करना चाहे तो राष्ट्रपति की पूर्व मंज़ूरी लेनी पड़ेगी और राष्ट्रपति आयोग की सिफारिशों पर और उन सिफारिशों पर गठित रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् ही अपनी मंज़ूरी देगा, अन्यथा नहीं। 

    अनुच्छेद-350 

    • अनुच्छेद-350 के अंतर्गत उन वर्गों पर विशेष ध्यान दिया गया है जो भाषायी आधार पर अल्पसंख्यक वर्ग में आते हैं। इस अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति करेगा जो इन वर्गों से संबंधित विषयों पर रक्षा के उपाय करेगा। इसके साथ ही, अल्पसंख्यक बच्चों की प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में दिये जाने की पर्याप्त सुविधा सुनिश्चित की जाएगी। 

    अनुच्छेद-351 

    • अनुच्छेद-351 में कहा गया है- "संघ का यह कर्त्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किये बिना हिंदुस्तानी के और आठवीं अनुसूची में बताई गई अन्य भाषाओं के प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात् करते हुए, और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो, वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिये मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।" 

    संविधान में कुल भाषाएँ 

    • संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी सहित 14 भारतीय भाषाएँथीं। 
    • 21वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1967 के तहत सिंधी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। 
    • 71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत आठवीं अनुसूची मेंनेपाली’, ‘मणिपुरीऔरकोंकणीको जोड़ा गया। 
    • 92वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के तहत आठवीं अनुसूची मेंमैथिली’, ‘डोगरी’, ‘बोडोऔरसंथालीको शामिल किया गया। 
    • संविधान के अनुच्छेद-344 (1) और अनुच्छेद-351 में आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारतीय भाषाओं का संदर्भ आया है, जो संख्या में बाईस हैं- 1. असमिया, 2. नेपाली, 3. मणिपुरी, 4. बांग्ला, 5. ओडिया, 6. कश्मीरी, 7. सिंधी, 8. पंजाबी, 9. संस्कृत, 10. हिंदी, 11. उर्दू, 12. गुजराती, 13. मराठी, 14. कन्नड़, 15. कोंकणी,  
      16. मलयालम, 17. तेलुगू, 18. तमिल, 19. बोडो, 20. मैथिली, 21. संथाली और 22. डोगरी। 

     

    अनुच्छेद-210 

    • संविधान के अनुच्छेद-210(1) में कहा गया है- “ राज्य के विधान-मंडल में कार्य राज्य की राज्यभाषा या राजभाषाओं  में या हिंदी में या अंग्रेजी में किया जाएगा।”   
    • आगे कहा गया है कि विधानसभा का अध्यक्ष या विधान-परिषद का सभापति ऐसे किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकता है जो उपर्युक्त भाषाओं में से किसी में भी विचार प्रकट नहीं कर सकता। 

    अनुच्छेद-343 

    • संविधान के अनुच्छेद-343 में कहा गया है- "संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।“  
    • इसके अतिरिक्त “संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिये प्रयोग होने वाले भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।“  
    • इसी अनुच्छेद में यह भी संकेत किया गया है कि शासकीय प्रयोजनों के लिये अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग 15 वर्षों तक होता रहेगा। 

    अनुच्छेद-344 

    • संविधान के अनुच्छेद-344 के अंतर्गत व्यवस्था की गई है कि संविधान के आरंभ के पाँच वर्ष बाद राष्ट्रपति एक आयोग गठित करेगा जो हिंदी के प्रयोग के विस्तार पर सुझाव देगा, जैसे-किन कार्यों के लिये हिंदी का प्रयोग किया जा सकता है, न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग कैसे बढ़ाया जा सकता है, अंग्रेज़ी का प्रयोग कहाँ किस प्रकार सीमित किया जा सकता है आदि।  
    • इसी प्रकार का आयोग संविधान के आरंभ से 10 वर्षों के बाद भी गठित किया जाएगा। ये आयोग भारत की उन्नति की प्रक्रिया तथा अहिंदी भाषी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए अनुशंसा करेंगे।  
    • आयोग की सिफारिशों पर संसद की एक विशेष समिति राष्ट्रपति को राय देगी। राष्ट्रपति पूरी रिपोर्ट या उसके कुछ अंशों को लागू करने के लिये निर्देश जारी कर सकेगा। 

    अनुच्छेद-345 

    • अनुच्छेद-345 के अनुसार किसी राज्य का विधान मंडल, विधि द्वारा, उस राज्य में प्रयुक्त होने वाली या किन्हीं अन्य भाषाओं को या हिंदी को शासकीय प्रयोजनों के लिये स्वीकार कर सकेगा। यदि किसी राज्य का विधानमंडल ऐसा नहीं कर पाएगा तो अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग यथावत किया जाता रहेगा। 

    अनुच्छेद-346 

    • अनुच्छेद-346 के अनुसार संघ द्वारा निर्धारित भाषा एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच में तथा किसी राज्य और संघ की सरकार के बीच पत्र आदि की राजभाषा होगी। यदि दो या अधिक राज्य परस्पर हिंदी भाषा को स्वीकार करना चाहें तो उसका प्रयोग किया जा सकेगा। 

    अनुच्छेद-347 

    • अनुछेद-347 के अनुसार यदि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह चाहता हो कि उसके द्वारा बोली जानेवाली भाषा को उस राज्य में (दूसरी भाषा के रूप में) मान्यता दी जाए और इसके लिये लोकप्रिय माँग की जाए, तो राष्ट्रपति यह निर्देश दे सकेगा कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिये जो वह विनिर्दिष्ट करे, शासकीय मान्यता दी जाए। 
    • स्वाधीनता प्राप्ति के बाद राजभाषा और राष्ट्रभाषा के अतिरिक्त एक अन्य शब्दसंपर्क भाषाका प्रयोग हिंदी के संबंध में अक्सर होने लगा है। 
    • संपर्क भाषा का अर्थ होता है- ऐसी भाषा जो दो विभिन्न भाषिक क्षेत्रों के बीच संपर्क सूत्र का कार्य करे। स्वाभाविक रूप से हिंदी सारे देश में संपर्क भाषा का कार्य करती रही है। 
    • संपर्क भाषा एवं राष्ट्रभाषा में अंतर है। जिन देशों में भाषिक वैविध्य कम होता है, वहाँ संपर्क भाषा की आवश्यकता कम होती है तथा राष्ट्रभाषा ही संपर्क भाषा का कार्य करती है। 
    • वर्तमान समय में प्रायः राजनीतिक आधार पर यह विचार स्वीकार किया जा चुका है कि हिंदी भारत की संपर्क भाषा है। वह भारत की राष्ट्रभाषा भी है, किंतु उसके साथ-साथ संविधान की आठवीं सूची में शामिल सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ अथवा राष्ट्र की भाषाएँहैं। 

    हिंदी की संवैधानिक स्थिति  

    • 14 सितंबर, 1949 ई. को भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। 
    • भारतीय संविधान के भाग 5, 6 और 17 में राजभाषा संबंधी उपबंध हैं।  
    • भाग 17 का शीर्षक राजभाषा है। इस भाग में चार अध्याय हैं जो अनुच्छेद-343 से 351 के अंतर्गत समाहित हैं। यह मुंशी-आयंगर फार्मूला के नाम से विख्यात है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद-120 (1) और 210 हैं जिनमें संसद एवं विधान मंडलों के भाषा संबंधी विवरण हैं। 

    अनुच्छेद-120 (1), (2) 

    • संविधान के अनुच्छेद-120 (1) में कहा गया है- “संसद में कार्य हिंदी या अंग्रेजी में किया जाएगा।“¸ आगे कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदी में या अंग्रेज़ी में विचार प्रकट करने में असमर्थ है तो लोकसभा का अध्यक्ष या राज्यसभा का सभापति उसे अपनी मातृभाषा में बोलने की अनुमति दे सकता है। 
    • अनुच्छेद-120 (2) में उपबंध है, “जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस संविधान के प्रारंभ के पंद्रह वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् यह अनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो ‘ या अंग्रेजी में’ शब्दों का उसमें लोप कर दिया गया हो।“ (अर्थात् 26 जनवरी, 1965 से संसद का कार्य केवल हिंदी में होगा।) 
    • "यदि दक्षिण भारतीय क्रियात्मक रूप से पूरे देश के साथ एकसूत्र में बँधकर रहना चाहते हैं और अखिल भारतीय मामलों से तथा तत्संबंधी निर्णयों के प्रभाव से अपने को दूर नहीं रखना चाहते हैं तो उन्हें हिंदी पढ़ना ज़रूरी है।" सी. राजगोपालाचारी 
    • "दक्षिण भारतीयों को पूरे भारत में सरकारी तथा व्यावसायिक नौकरियाँ पाने के लिये भी हिंदी बोलने, समझने और लिखने का ज्ञान प्राप्त करना ज़रूरी होगा।" सी. राजगोपालाचारी 

    • "हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। यद्यपि मैं बंगाली हूँ तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिये वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ हिंदी में वार्तालाप कर सकूँ।"    –न्यायमूर्ति शारदाचरण मित्र 

    • "भारत के सभी धर्मों और विभिन्न भाषाभाषियों ने हिंदी के विकास में योगदान दिया है, वह किसी विशिष्ट वर्ग, प्रदेश या समुदाय की भाषा होकर भारतीय जनता की भाषा है। फादर कामिल बुल्के 

    • "हिंदी केवल देश के करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक और संपर्क भाषा है वरन् बोलने और समझने वालों की संख्या की दृष्टि से दुनिया की तीसरी भाषा है।" फादर कामिल बुल्के 

    • "राष्ट्र के संगठन के लिये आज सी भाषा की आवश्यकता है जिसे सर्वत्र समझा जा सके।" –   बाल गंगाधर तिलक 

    • "हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं, समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है।"सेठ गोविन्द दास  
                   
       
    • "चाहे व्यावहारिक दृष्टि, सैद्धांतिक दृष्टि या राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाए, हिंदी का कोई दूसरा प्रतिद्वन्द्वी संभव नहीं है।........किसी दक्षिण भारतीय से व्यक्ति को शिक्षित नहीं मानना चाहिये जिसने हिंदी में कोई लिखित या मौखिक परीक्षा पास की हो।" -सर टी. विजयराघवाचार्य 

    • "मैं हिंदी के प्रचार, राष्ट्रभाषा के प्रचार को राष्ट्रीयता का मुख्य अंग मानता हूँ। मैं चाहता हूँ कि यह भाषा ऐसी हो, जिसमें हमारे विचार आसानी से साफ-साफ स्पष्टतापूर्वक व्यक्त हो सकें। राष्ट्रभाषा सी होनी चाहिये, जिसे केवल एक जगह के ही लोग समझें, बल्कि उसे देश के सभी प्रांतों में सुगमता से पहुँचा सकें।" -राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन [इन्हें हिंदी का प्रहरी कहा गया है।] 

    • "भारत को एक सूत्र में बाँधने के लिये हिंदी को ही राष्ट्रभाषा होना चाहिये।" जवाहरलाल नेहरू 

    • "आपको मालूम है कि इस राष्ट्र के लिये राष्ट्रभाषा की सख्त ज़रूरत है, हिंदी भारत की अधिकांश जनता की भाषा है, इसलिये कांग्रेस ने उसे राष्ट्रभाषा मान लिया है।" जवाहरलाल नेहरू 

    • "हिंदी और उर्दू में कोई अंतर नहीं है, सिवाय इसके कि हिंदी नागरी लिपि में लिखी जाती है और उर्दू फारसी लिपि में।" जवाहरलाल नेहरू 

    •  "हिंदी को ऊँची-से-ऊँची शिक्षा का माध्यम होना चाहिये।"  डॉ. भीमराव अम्बेडकर 

    • "हिंदी वह धागा है, जो विभिन्न मातृभाषाओं रूपी फूलों को पिरोकर भारतमाता के लिये सुंदर हार का सृजन करेगा।" डॉ. जाकिर हुसैन 

    • "हिंदी के बिना भारत की राष्ट्रीयता की बात करना व्यर्थ है।"  वी. वी. गिरि
       
    • "हिंदी किसी भी भाषा का अहित नहीं करती, अपितु वह तो सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास एवं समृद्धि में सहयोग देकर समन्वय का मार्ग खोलती है।" ज्ञानी जैलसिंह 

    • "हिंदी का स्वभाव प्रेम एवं सहिष्णुता से ओतप्रोत है और यही उसकी विशेषता है।"ज्ञानी जैलसिंह 

    • "ये सभी भाषाएँ भारत की सांस्कृतिक संपत्ति की समान उत्तराधिकारी हैं। ये भारत की राष्ट्रभाषाएँ हैं और इनमें से हिंदी भारत की राष्ट्रीय संपर्क भाषा, क्योंकि इस भाषा का परिवार सबसे बड़ा है।"  श्रीमती इन्दिरा गांधी 

    • "हिंदी को जानना हमारा राष्ट्रधर्म है।" डॉ. शंकरदयाल शर्मा 

    • "मैं कुंजी कहता हिंदी को, खुलता जिससे सामूहिक मन। 
    •  क्षेत्रवृत्ति से उठकर ही हम, कर सकते जन राष्ट्र संगठन।।"  –सुमित्रानंदन पंत (लोकायतन) 

    • "दक्षिण भारत में गांधी जी और उनके अनुयायियों-सहयोगियों ने जितना हिंदी प्रचार किया, उतना और किसी नेता, राजनीतिक पार्टी या सांस्कृतिक संस्था ने नहीं किया।" -रामविलास शर्मा 

     

    • "अगर स्वराज्य अंग्रेज़ी बोलने वाले भारतीयों का और उन्हीं के लिये होने वाला हो तो निस्संदेह अंग्रेज़ी ही राष्ट्रभाषा होगी, लेकिन अगर स्वराज्य करोड़ों भूखे मरने वालों, निरक्षरों, दलितों और अंत्यजों का हो और उन सबके लिये होने वाला हो तो हिंदी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है।" महात्मा गांधी 

    • "मेरी आँखें उस दिन को देखने को तरस रही हैं जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा (हिंदी) समझने और बोलने लग जाएँ।" महर्षि दयानंद सरस्वती 

    • "हिंदी अखिल भारत की जातीय भाषा या राष्ट्रभाषा बनने योग्य है।" केशवचंद्र सेन (ब्रह्म समाज) 

    • "अभी जितनी भाषाएँ भारत में प्रचलित हैं, उनमें हिंदी भाषा लगभग सभी जगह प्रचलित है। हिंदी को अगर भारत की एकमात्र भाषा बनाया जाए तो देश में एकता स्थापित करने का काम सहज और शीघ्र सम्पन्न हो सकता है।" केशवचंद्र सेन (ब्रह्म समाज) 

    • "इस समय देश की एकता के लिये हिंदी अनिवार्य है।" राजा राममोहन राय 

    • "अपनी-अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए हिंदी को सामान्य भाषा के रूप में जानकर हम प्रांतीय भेदभाव नष्ट कर सकते हैं।"  महायोगी अरविन्द 

    • "हिंदी प्रचार का उद्देश्य केवल यही है कि आजकल जो काम अंग्रेज़ी से लिया जाता है, वह आगे चलकर हिंदी से लिया जाएगा।" नेताजी सुभाषचंद्र बोस

    • "प्रांतीय ईर्ष्या-द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता इस हिंदी प्रचार से मिलेगी उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती।" नेताजी सुभाषचंद्र बोस 

    • "हिंदुस्तान की सभी जीवित और प्रचलित भाषाओं में मुझे हिंदी ही राष्ट्रभाषा बनने के लिये सबसे अधिक योग्य दीख पड़ती है।" सर टी. विजयराघवाचार्य
       
    • "हिंदी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों के मध्य में जो ऐक्य-बंधन संस्थापन करने में समर्थ होंगे वही सच्चे भारत बंधु पुकारे जाने योग्य हैं।" बंकिमचंद्र चटर्जी  

    • "दक्षिण की भाषाओं ने संस्कृत से बहुत कुछ लेन-देन किया है, इसलिये उसी परंपरा में आई हुई हिंदी बड़ी सरलता से राष्ट्रभाषा होने के लायक है।" एस. निजलिंगप्पा 

    • "हमें उस भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में ग्रहण करना चाहिये जो देश के सबसे बड़े भूभाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने के लिये महात्माजी ने हमसे आग्रह किया, वह हिंदी है।"  रवीन्द्रनाथ टैगोर 

    • "भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिये।"  एनी बेसेंट (थियोसोफिकल सोसाइटी) 

    • "प्रजातंत्रीय देश में अधिकतम जनसमुदाय द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा ही कार्य कर सकती है। हिंदी इस कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है।" अनंतशयनम् आयंगर 

     

    • राष्ट्रभाषा की आवश्यकता किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक एकता की जागृति एवं अक्षुण्णता के लिये होती है। 
    • हमारे देश में अकबर के समय से लेकर लगभग तीन शताब्दियों तक फारसी राजभाषा रही और सन् 1833 के बाद से निचले स्तर पर उर्दू और उच्च स्तर पर अंग्रेज़ी राजभाषा रही है, परंतु सारे देश की संपर्क भाषा हिंदी ही रही है। 
    • 19वीं शताब्दी में ईसाई मिशनरियों, फोर्ट विलियम कॉलेज एवं सामाजिक-धार्मिक नवजागरण ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 
    • सबसे प्रमुख राजनीतिक संगठन अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं ने राष्ट्रीय चेतना के जागरण हेतु एक भाषा की आवश्यकता पर बल देते हुए इसके लिये हिंदी को उपयुक्तबताया। 
    • कांग्रेस के 1925 के कानपुर अधिवेशन में यह प्रस्ताव स्वीकृत हुआ कि कांग्रेस अपने सभी कार्यों में प्रादेशिक भाषाओं और हिंदी का प्रयोग करे। 
    • 1864 . में बंबई फ्री चर्च कॉलेज के प्राध्यापक श्री पेठे नेराष्ट्रभाषानामक मराठी पुस्तक लिखी थी, जिसमें उन्होंने भारत के लिये एक भाषा की आवश्यकता की बात की थी और उनके मत से हिंदी इस दृष्टि से खरी उतरती थी। 
    • सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1936 . में हिंदी वर्ग का आरंभ किया औरकाठियावाड़ राष्ट्रभाषा प्रचार समितिनामक संस्था स्थापितकी। 
    • सुभाषचंद्र बोस ने हिंदी या हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय एकता की आवश्यक शर्त- "यदि हम लोगों ने तन-मन-धन से प्रयत्न किया तो वह दिन दूर नहीं है जब भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी- हिंदी।" 
    • 1918 . में कांग्रेस के इंदौर अधिवेशन में गांधी जी ने अपना स्पष्ट मत व्यक्त किया- "हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिये।" वे मानते थे, "हिंदी का प्रश्न स्वराज्यकाप्रश्नहै।" 
    • महात्मा गांधी की प्रेरणा से ही वर्धा और मद्रास में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित हुईं। 
    • 1929 . में ही सी. राजगोपालाचारी ने दक्षिणवालों को हिंदी सीखने की सीख दी थी। उनका कहना था, "हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतंत्रात्मक भारत में राजभाषा भी होगी।" 
    • उन्होंने 1937 . में मद्रास में सम्पन्न हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा था कि कांग्रेस की सारी कार्यवाहीहिंदीमेंहो। 

    राष्ट्रभाषा से तात्पर्य किसी देश की उस भाषा से है जिसे वहाँ के अधिकांश लोग बोलते हैं तथा जिसके साथ उनका सांस्कृतिक और भावात्मक जुड़ाव होता है। 

    राष्ट्रभाषा की कसौटियाँ 

    • वह भाषा देश के सभी या अधिकतम व्यक्तियों द्वारा बोलीजासकतीहो। 
    • उसे बोलने वाले देश के किसी एक हिस्से में नहीं बल्कि विभिन्न हिस्सों में हों ताकि वह भाषा पूरे देश में संपर्क सूत्र स्थापित करने में सक्षम हो सके। 
    • वह भाषा राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को धारण करने में सक्षम हो अर्थात् देश के विभिन्न सांस्कृतिक पक्षों की अभिव्यक्ति उसमें हो पाती हो। 
    • उसका शब्द भंडार इतना व्यापक हो कि देश के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित शब्दावली उसमें शामिल हो सके। उसमें यह प्रवृत्ति भी होनी चाहिये कि देश की भाषाओं के अन्य शब्दों को वह सहजतापूर्वक शामिल करे, कि उनसे परहेज। 
    • उस भाषा का व्याकरण सरल होना चाहिये ताकि देश के अन्य हिस्सों के निवासी यदि उसे सीखना चाहें तो सीखने की प्रक्रिया कठिनहो। 
    • उसकी ध्वनि संरचना व्यापक तथा लचीली होनी चाहिये। यदि अन्य भाषाओं की कुछ ध्वनियाँ उसमें प्रयुक्त होती हों तो उन्हें स्वीकारने की क्षमता उसमें होनी चाहिये। 
    • उसकी लिपि भी राष्ट्रीय लिपि होनी चाहिये अर्थात् ऐसी लिपि जिसमें देश की सभी भाषाओं में प्रयुक्त होने वाले ध्वनि संकेत लिखे जा सकते हों। 
    • उस भाषा में साहित्य की रचना व्यापक तौर पर हुई हो तथा साहित्य देश के विभिन्न क्षेत्रों में रचा गया हो। 
    • उस भाषा ने राष्ट्र के प्रमुख आंदोलनों में सक्रिय सहभागिता की हो अर्थात् सामाजिक विकास की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाई हो। 

    राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की ऐतिहासिक विकास यात्रा 

    • आदिकाल और भक्तिकाल का साहित्य सिर्फ हिंदी प्रदेशों में ही नहीं अपितु हिंदीतर प्रदेशों में भी रचा गया। 
    • हमारे देश के सामाजिक विकास में दो आंदोलनों की सबसे बड़ी भूमिका रही हैभक्ति आंदोलन और स्वतंत्रता आंदोलन। ये दोनों आंदोलन हिंदी के माध्यम से संपन्न हुए। 
    • स्वतंत्रता के बाद क्षेत्रवादी प्रकृतियाँ उभरने लगीं। 1956 . में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ। 
    • 1953 . के बाद से आज तक राष्ट्रभाषा का मुद्दा कभी प्रभावी ढंग से नहीं उठ सका। 

    1976 के बाद राजभाषा की प्रगति 

    • 1976 से अब तक राजभाषा की प्रगति का विश्लेषण विभिन्न मंत्रालयों के अनुसार किया जा सकता है। भारत सरकार के तीन मंत्रालय राजभाषा संबंधी कार्यों में संलग्न हैं- गृह मंत्रालय (राजभाषा विभाग), विधि मंत्रालय तथा शिक्षा मंत्रालय। 

    गृह मंत्रालय का राजभाषा विभाग 

    • राजभाषा विभाग प्रत्येक वर्ष अपने उद्देश्य तय करता है तथा सभी मंत्रालयों पर उद्देश्य पूरे करने के लिये दबाव बनाता है। वर्ष के कार्यक्रमों में कई बातों पर ध्यान दिया जाता है, जैसे- कितने प्रतिशत कर्मचारी हिंदी में काम करने लगे, कितने टंकण और आशुलिपिक अपने तकनीकी ज्ञान का हिंदी में प्रयोग करने लगे, हिंदी के लिये काम करने वाली स्वैच्छिक संस्थाओं ने कितने कार्य संपन्न किये आदि। 
    • यह विभाग हिंदी नहीं जानने वाले अधिकारियों के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाता है, जिसके लिये इस विभाग के अंतर्गत केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की गई है। कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिये तीन पाठ्यक्रम-प्रबोध, प्रवीण और प्राज्ञ बनाए गए हैं। 
    • इसी विभाग के अंतर्गत केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो की स्थापना भीकी गई है, जिसका कार्य प्रशासनिक प्रकार के प्रत्येक साहित्य काअनुवाद करना है। ब्यूरो सरकारी सामग्री के अतिरिक्तसार्वजनिकउपकरणों, प्रतिष्ठानों तथा बैंकों की सामग्री का अनुवाद भी करताहै।इनकेअतिरिक्त अनुवादकों को प्रशिक्षित करने का कार्य भी इसी को सौंपा गया है। 
    • राजभाषा विभाग का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि वह केंद्रीय हिंदी समिति और मंत्रालयों की हिंदी समितियों की बैठकों का आयोजन करके उनमें तालमेल बैठाता है, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों के कामकाज को निर्धारित करता है। इसके अतिरिक्त जो अन्य मंत्रालय राजभाषा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं उनके साथ संपर्क बनाए रखकर राजभाषा के विकास में आने वाली सभी बाधाओें को दूर करता है। 

    विधि मंत्रालय 

    • विधि मंत्रालय का विधायी विभाग मूलतः विधि साहित्य के अनुवाद से संबंधित कार्य करता है। यह विभाग लगभग सारे विधि साहित्य का अनुवाद कर चुका है।  
    • इसके अतिरिक्त संसद में आने वाले सभी विधेयक पहले से हिंदी अनुवाद तैयार करके पेश किये जाते हैं।  
    • अपनी एक और योजना के तहत अब यह विभाग समस्त विधि-अनुवाद को इंटरनेट यानिकनेटके माध्यम से पूरे भारत में उपलब्ध कराने में सक्षम हो गयाहै। 

    शिक्षा मंत्रालय 

    • शिक्षा मंत्रालय और इसके अंतर्गत स्थापित केंद्रीय हिंदी निदेशालय मुख्य रूप से शिक्षा के क्षेत्र में राजभाषा हिंदी की संभावनाओं को तलाशने और तराशने में जुटा है।  
    • उच्च शिक्षा में प्रयुक्त होने वाली पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, स्तरीय पुस्तकों का हिंदी में प्रकाशन, द्विभाषी त्रिभाषी कोशों का निर्माण आदि तो इसके कार्य हैं ही, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली का निर्माण भी इसका एक प्रमुख कार्य है।  
    • इसकी पहल पर सरकार ने वर्ष 1997 में हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की स्थापना की, जो उच्च शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में हिंदी के विकास तथा शोध कार्य में अत्यंत महती भूमिका निभा रहा है। 

    संकल्प 1968 

    1967 के संशोधन के बाद अहिंदीभाषी राज्यों की चिंता तो समाप्त हो गई, किंतु उन लोगों की चिंता बढ़ने लगी जो देश की एकता के लिये हिंदी को एकमात्र राजभाषा के रूप में स्वीकार करना चाहते थे। ऐसी जटिल स्थिति में संसद के दोनों सदनों में एक संकल्प पारित किया गया, जिसके अनुसार- 

    • सरकार हिंदी के तीव्र विकास और प्रयोग के लिये एक व्यापक कार्यक्रम तैयार करेगी जिसकी प्रगति की रिपोर्ट प्रति वर्ष संसद में प्रस्तुत की जाएगी। 
    • भारत सरकार राज्यों के सहयोग से त्रिभाषा सूत्र लागू करेगी। इसके अंतर्गत हिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी और अंग्रेज़ी के अतिरिक्त एक अन्य भारतीय भाषा (विशेषतः दक्षिण भारतीय भाषा) का अध्ययन अनिवार्य होगा तथा अहिंदीभाषी क्षेत्रों में प्रादेशिक भाषा और अंग्रेज़ी के अतिरिक्त हिंदी का अध्ययन अनिवार्य होगा। 
    • केंद्रीय सेवा में भर्ती के लिये हिंदी अथवा दोनों भाषाओं का ज्ञान आवश्यक होगा। 
    • सरकार आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी भाषाओं के समन्वित विकास के लिये कार्यक्रम तैयार करेगी। 

    राजभाषा नियम, 1976 

    भारत सरकार ने राजभाषा अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने का दायित्व गृह मंत्रालय को सौंपा। इसके लिये गृह मंत्रालय के अधीन एक राजभाषा अनुभाग की स्थापना हुई जो बाद में स्वतंत्र राजभाषा विभाग हो गया। राजभाषा विभाग ने सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिये 12 नियम निर्धारित किये जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं- 

    • देश भर के केंद्रीय सरकार के कार्यालयों को तीन वर्गों में बाँटा गया- वर्ग, वर्ग तथा वर्ग।  
    • वर्ग में वे राज्य आते हैं जिनकी पहली भाषा हिंदी है। ये राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली।  
    • वर्ग में प्रायः वे राज्य आते हैं जिनमें हिंदी समझी जाती है किंतु पहली भाषा के रूप में प्रयुक्त नहीं होती। इनमें प्रमुख हैं- पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और केंद्रशासित प्रदेशों में चंडीगढ़ और अंडमान-निकोबार।  
    • वर्ग में शेष सभी राज्य आते हैं। इन राज्यों में प्रायः हिंदी नहीं समझी जाती है। ये राज्य हैं- पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा, उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के सभी राज्य तथा दक्षिण भारत के चारों राज्य। 
    • -क्षेत्र के पत्रों आदि के लिये निश्चित किया गया कि उनमें हिंदी का प्रयोग हो। अगर अंग्रेज़ी का प्रयोग किया जाए तो साथ में हिंदी अनुवाद भी भेजा जाए। -क्षेत्र के साथ पत्राचार समान्यतः हिंदी में हो तथा -क्षेत्र के साथ पत्राचार अंग्रेज़ी में ही होता रहे।  
    • हिंदी में कहीं से प्राप्त पत्र का उत्तर हिंदी में ही देना होगा। 
    • सभी दस्तावेज़ हिंदी अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में साथ-साथ निकाले जाएंगे। इसका उत्तरदायित्व दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी का होगा। 
    • केंद्र सरकार के सभी फॅार्म, नामपट्ट, सूचनापट्ट, पत्रशीर्ष, मुहरें आदि हिंदी अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में होंगे। 
    • प्रत्येक कार्यालय के प्रधान का यह दायित्व होगा कि वह भाषा संबंधी नियमों और आदेशों का अनुपालन कराए और जाँच-पड़ताल करता रहे। 

    संसदीय राजभाषा समिति 
    इन सुझावों का परीक्षण करने का दायित्व संसद कीराजभाषा समितिको सौंपा गया। समिति ने 1959 . में जो सुझाव दिये, वे इस प्रकार हैं- 

    • जब तक कर्मचारी और अधिकारी हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कर लें, तब तक वे अंग्रेज़ी में कार्य करते रहें। 
    • पैंतालीस वर्ष के ऊपर की उम्र वाले सरकारी कर्मचारियों को हिंदी के प्रशिक्षण से छूट दे देनी चाहिये। 
    • उच्च न्यायालयों के निर्णयों, आदेशों आदि को अंग्रेज़ी में ही रहना चाहिये। 
    • केंद्रीय सेवाओं में परीक्षाओं के माध्यम के रूप में अंग्रेज़ी को ही बने रहने देना चाहिये।  
    • 1965 के बाद हिंदी प्रधान भाषा हो जाए। 

    उपर्युक्त दोनों सिफारिशों पर राष्ट्रपति का आदेश 
    राजभाषा आयोग तथा संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिशों पर विचार करने के उपरांत राष्ट्रपति ने जो आदेश जारी किया, उसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं- 

    • पैंतालीस वर्ष से कम उम्र वाले कर्मचारियों के लिये हिंदी का प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया जाए। 
    • अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती के लिये परीक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी बना रहे। धीरे-धीरे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को माध्यम बनाने की व्यवस्था की जाए। 
    • हिंदी में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली के विकास के लिये एक स्थायी आयोग का निर्माण किया जाए। 
    • विधायी आयोगकी स्थापना की जाए जो विधिकोश का निर्माण करे ताकि विधि संबंधी शब्द हिंदी में अनूदित हो सकें।  
    • शिक्षा मंत्रालय हिंदी के प्रचार की व्यवस्था करे। इस कार्य में गैर-सरकारी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है। 
    • राजकाज में हिंदी के प्रगामी प्रयोग के लिये गृह मंत्रालय योजना तैयार करे। 
    • इस आदेश के तहत दो आयोगों की स्थापना कर दी गई- वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, विधायी आयोग। 
    • प्रशासनिक तथा विधि-साहित्य का अनुवाद होने लगा, साथ ही कर्मचारियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था भी शुरू हो गई। 

    राजभाषा अधिनियम, 1963 (1967 में यथासंशोधित) 

    • संविधान के उपबंधों के अनुसार 1965 में हिंदी को भारत की एकमात्र राजभाषा बनना था, पर इससे ठीक पहले अहिंदी क्षेत्रों, विशेषतः पश्चिमी बंगाल तथा तमिलनाडु में हिंदी विरोधी आंदोलन प्रारंभ हो गए। ऐसी स्थिति में जवाहरलाल नेहरू ने अहिंदी भाषी क्षेत्रों को आश्वासन दिया कि हिंदी को एकमात्र राजभाषा स्वीकार करने से पहले अहिंदी क्षेत्रों की सहमति प्राप्त की जाएगी। इसी आश्वासन की पूर्ति के लिये यह अधिनियम बनाया गया जिसके प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं- 
    • 26 जनवरी, 1965 के बाद भी हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग यथावत् चलता रहेगा। 
    • उच्च न्यायालयों के निर्णयों में हिंदी या किसी राज्यस्तरीय राजभाषा का प्रयोग किया जा सकेगा। 
    • संघ के संकल्पों, अधिसूचनाओं, विज्ञापनों आदि दस्तावेज़ों को हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में जारी करना अनिवार्य होगा। 
    • जब तक अहिंदी भाषी राज्य अंग्रेज़ी को समाप्त करने का संकल्प नहीं ले लेंगे, तब तक अंग्रेज़ी का प्रयोग चलता रहेगा। 
    • यह 27 अप्रैल, 1963 को लोकसभा में तथा 7 मई, 1963 को राज्यसभा में पारित हुआ। 
    • यह 10 मई, 1963 को अधिनियमित हुआ। 
    • सन् 1949 . में सी. राजगोपालाचारी ने भारतीय संविधान सभा में नेशनल लैंग्वेज के समांतरस्टेट लैंग्वेजशब्द का प्रयोग किया।  
    • संविधान सभा की कार्यवाही के हिंदी प्रारूप मेंस्टेट लैंग्वेजका हिंदी अनुवादराजभाषाकिया गया। 
    • राजभाषा से तात्पर्य है– "संविधान द्वारा सरकारी कामकाज, प्रशासन, संसद और विधान मंडलों तथा न्यायिक कार्यकलापों के लिये स्वीकृतभाषा।" 

    राजभाषा हिंदी के प्रयोग की प्रगति 
    संविधान के लागू होने के बाद राजभाषा के प्रयोग के संबंध में जो प्रमुख घटनाएँ घटीं, वे इस प्रकार हैं- 

    राष्ट्रपति का आदेश 

    • 1952 में राज्यपालों, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के अधिपत्रों के लिये हिंदी का प्रयोग प्राधिकृत। 
    • 1955 में यह आदेश जारी किया गया कि जहाँ तक संभव हो, जनता के साथ पत्र-व्यवहार में तथा प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के प्रयोग को अंग्रेज़ी के साथ बढ़ावा दिया जाए, पर साथ ही यह बात भी लिख दी जाए कि अंग्रेज़ी पाठ ही प्रामाणिक माना जाएगा। 
    • 1955 में कुछ प्रयोजनों के लिये अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी का प्रयोग निर्धारित, जैसे- (1) जनता के साथ पत्र-व्यवहार में, (2) प्रशासनिक रिपोर्ट, सरकारी पत्रिकाओें संसदीय रिपोर्ट में, (3) संकल्पों (resolutions) विधायी नियमों में, (4) हिंदी को राजभाषा मान चुके राज्यों के साथ पत्र-व्यवहार में, (5) संधिपत्र और करार में, (6) राजनयिक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भारतीय प्रतिनिधियों के नाम जारी किये जाने वाले पत्रों में। 

    राजभाषा आयोग 
    1955 में राष्ट्रपति ने संविधान के प्रावधानों के अनुसार बालासाहेब गंगाधर खेर की अध्यक्षता में एक आयोग की स्थापना की। इस आयोगने राजभाषा के प्रयोग के बारे में जो सुझाव दिये, उनमें से प्रमुख इस प्रकारहैं- 

    • पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की गति तीव्र होनी चाहिये। अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली को थोड़े हेर-फेर के साथ स्वीकार कर लेना चाहिये। 
    • हिंदी क्षेत्र के विद्यार्थियों को एक और भाषा, विशेषतः दक्षिण भारत की भाषा, अवश्य सीखनी चाहिये। 
    • चौदह वर्ष की आयु तक प्रत्येक विद्यार्थी को हिंदी का ज्ञान करा दिया जाना चाहिये। 
    • प्रशासनिक कर्मचारियों को निश्चित अवधि के अंदर हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त होना चाहिये। इसके लिये पुरस्कार और दंड की व्यवस्था की जानी चाहिये। 
    • प्रतियोगी परीक्षाओं में हिंदी का एक अनिवार्य प्रश्न-पत्र रखा जाना चाहिये। 
    • देवनागरी लिपि को अखिल भारतीय लिपि के रूप में विकसित किया जाना चाहिये। 
    • हिंदी के विकास का दायित्व सरकार की एक प्रशासकीय इकाई पर डालना चाहिये। 
    • भारत की भाषाओं में निकटता लाने के प्रयास करने चाहिये। 
    • उच्च न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषाओं का प्रयोग होना चाहिये।  

     

    • व्याकरण का चौथा तथा अंतिम पक्ष होता है- वाक्य संरचना। इसके अंतर्गत वाक्य निर्माण के नियम तथा वाक्यों के भेद आदि पढ़ेजातेहैं। 
    • वाक्य सार्थक शब्दों या पदों का वह व्यवस्थित क्रमबद्ध समूह होता है जो किसी पूर्ण अर्थ को व्यक्त करने में सक्षम हो। व्याकरणिक दृष्टि से अर्थबोधन की मूल इकाई वाक्य को ही माना गया है। 

    सार्थक वाक्य की शर्तें 

    भारतीय भाषाविज्ञान में सार्थक वाक्य के निर्माण की तीन शर्तें मानी जाती हैं- आकांक्षा, योग्यता तथा सन्निधि।  

    संरचना की दृष्टि से वाक्यों का वर्गीकरण 

    हिंदी व्याकरण में वाक्यों को संरचना की दृष्टि से तीन प्रकार का माना गया है- सरल वाक्य, संयुक्त वाक्य तथा मिश्रित वाक्य। 

    • सरल वाक्यः ये वे वाक्य हैं जिनमें एक उद्देश्य तथा एक विधेय होता है, जैसे- "राम लंबा है।" ऐसे वाक्यों में सामान्यतः उद्देश्य के रूप में कर्त्ता तथा विधेय के रूप में गुण या क्रिया विद्यमान होतेहैं। 
    • संयुक्त वाक्यः जब एक से अधिक वाक्य आपस में जुड़ते हैं तो उनके बीच दो ही प्रकार के संबंध संभव हैं -समानाधिकरण तथा व्याधिकरण संबंध।  
    • समानाधिकरण संबंध पर आधारित वाक्य-समुच्चय को संयुक्त वाक्य कहते हैं। इसमें सामान्यतः दो स्वतंत्र वाक्यों को योजक शब्द से जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिये- "पिछले कई दिनों से निरंतर बरसात हो रही है जिसके कारण सड़कों की हालत जर्जर हो गई है।" 
    • मिश्र वाक्यः एक से अधिक उपवाक्य यदि व्याधिकरण संबंध में व्यवस्थित किये जाएँ तो मिश्र वाक्य का निर्माण होता है। इसका अर्थ हुआ कि इन उपवाक्यों में से एक उपवाक्य मूल या आधार उपवाक्य तथा शेष उपवाक्य उस पर निर्भर होने के कारण आश्रित उपवाक्य कहलाते हैं। उदाहरण के लिये, "राम के पास आकर श्याम ने बताया कि कल अवकाश का दिन है।" 

    अभिव्यक्ति शैली की दृष्टि से वाक्यों का वर्गीकरण 

    • विधेयात्मक या निश्चयात्मक वाक्यः वे वाक्य जो कोई सकारात्मक सूचना देते हों। उदाहरण के लिये- "राम दयालु हैं।" 
    • निषेधात्मक वाक्यः वे वाक्य जो कोई नकारात्मक सूचना देते हों, जैसे- "हवा में नमी नहीं है।" 
    • प्रश्नवाचक वाक्यः वे वाक्य जो प्रश्नाकुलता व्यक्त करते हों, जैसे- "क्या आज बरसात होगी?" 
    • संदेहवाचक वाक्यः वे वाक्य जिनमें संदेह दिखाई दे, जैसे- "शायद आज बरसात होगी।" 
    • इच्छावाचक वाक्यः वे वाक्य जिनमें हृदयगत इच्छाएँ व्यक्त हों, जैसे- "ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान करे।" 
    • विधिवाचक/आदेशवाचक वाक्यः वे वाक्य जिनमें किसी को आदेश दिया जाता है, उदाहरणार्थ- "खड़े रहो।" 
    • विस्मयादिबोधक वाक्यः वे वाक्य जिनमें आश्चर्य या विस्मय व्यक्त किया जाए, उदाहरण के लिये- "अरे वाह! क्या बात है!" 
    • संकेतवाचक/शर्तवाचकः वे वाक्य जिनमें कोई शर्त प्रस्तुत की जाए, जैसे- "यदि तुम पढ़ोगे तो मिठाई मिलेगी।" 
    • विकारी शब्दों में विकार उत्पन्न करने वाले कारक तत्त्वों की संख्या 6 है– लिंग, वचन, काल, पुरुष, वाच्य तथा भाव।

    लिंग

    • हिंदी व्याकरण में मूलतः दो ही लिंग माने गए हैं- पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग।
    • संस्कृत में इन दोनों के अतिरिक्त तृतीय लिंग के रूप में नपुंसक लिंग को भी स्वीकारा गया है।
    • इसी प्रकार अंग्रेज़ी में ‘नपुंसक लिंग’ के साथ-साथ चौथे लिंग के रूप में ‘उभय लिंग’ को भी स्वीकार किया गया है।
    • संस्कृत से सरलीकरण की प्रक्रिया में नागर अपभ्रंश वह अंतिम अवस्था थी जहाँ नपुंसक लिंग के कुछ प्रयोग विद्यमान थे। उसके बाद से मराठी और गुजराती भाषाओं में तो नपुंसक लिंग बचा रहा किंतु हिंदी में दो ही लिंग शेष बचे।
    • नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द पुल्लिंग शब्दों में शामिल हो गए तथा कुछ शब्द, विशेषतः आकारांत (गंगा) एवं ईकारांत (धरती) स्त्रीलिंग में शामिल हो गए। कुछ भाषा वैज्ञानिकों का मानना है कि हिंदी में भी कुछ शब्द उभयलिंगी हैं, जैसे- राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, डॉक्टर इत्यादि।

    वचन

    हिंदी में दो ही वचन स्वीकार किये गए हैं- एकवचन तथा बहुवचन।

    पुल्लिंग शब्दों में वचन संरचना

    • आकारांत पुल्लिंग एकवचन शब्द बहुवचन में एकारांत हो जाते हैं। उदाहरण के लिये-  लड़का >लड़के बेटा > बेटे
    • शेष सभी पुल्लिंग शब्द बहुवचन में भी अपरिवर्तित रहते हैं। केवल क्रिया व सर्वनाम के परिवर्तन से ही वचन परिवर्तन का ज्ञान होता है। उदाहरण के लिये- यह उसका घर है > ये उसके घर हैं।

    स्त्रीलिंग शब्दों में वचन संरचना

    • ईकारांत एकवचन शब्द बहुवचन में ‘इयाँ’ हो जाते हैं, जैसेः- मिठाई > मिठाइयाँ नदी > नदियाँ
    • इकारांत स्त्रीलिंग शब्दों में बहुवचन में ‘याँ’ जुड़ जाता है,जैसे- नीति > नीतियाँ रीति >रीतियाँ
    • आकारांत शब्दों में बहुवचन में ‘एँ’ जुड़ता है, जैसे- अबला > अबलाएँ कामना > कामनाएँ
    • अकारांत एकवचन शब्दों में बहुवचन में ‘अ’ का ‘एँ’ हो जाता है, जैसे- बहन > बहनें, आँख > आँखें
    • ध्यातव्य है कि हिंदी में संस्कृत की तरह वचनानुसार क्रिया परिवर्तन होता है, जबकि अंग्रेज़ी में ऐसा मात्र सहायक क्रियाओं के साथ वर्तमान काल व भूतकाल में होता है।
      उदाहरण के लिये-

    संस्कृतः 

    सः गच्छति > ते गच्छन्ति 

    हिंदीः 

    वह जाता है > वे जाते हैं 

    English: 

    He is going > They are going 

     

    I was going > We were going 

     

    I shall go > We shall go 

    • व्याकरण में पद संरचना के बाद दूसरा पक्ष कारक व्यवस्था का होता है। सार्थक वाक्यों के निर्माण के लिये कारक व्यवस्था का कठोर अभ्यास आवश्यक होता है। 
    • किसी भी भाषा में कारक व्यवस्था का अर्थ उस संरचना से है जिसमें कोई संज्ञा पद या सर्वनाम पद किसी वाक्य में निश्चित संबंध से युक्त स्थान ग्रहण करता है। उदाहरण के लिये, "राम ने रावण को मारा" वाक्य में यद्यपि राम और रावण दोनों संज्ञा पद हैं किंतु निश्चित संबंध होने के कारणरामकर्त्ता पद है जबकिरावणकर्म पद। इसलियेरामके कारकीय संबंध कोनेपरसर्ग तथारावणके निश्चित स्थान कोकोपरसर्ग व्यक्त करते हैं। इसी संबंध व्यवस्था को कारक संरचना कहते हैं। यहाँ कारक शब्द का अर्थ यही है कि वाक्य में होने वाली क्रिया के साथ कोई संज्ञा पद या सर्वनाम पद किस रूप में संबंधित है? 

    हिंदी के आठों कारकों तथा उनके परसर्गों (या विभक्तियों) का सामान्य परिचय-  

    कर्त्ता कारक 

    • कर्त्ता कारक का अर्थ है वह संज्ञा या सर्वनाम पद जो किसी क्रिया को करता है।  
    • हिंदी में कर्त्ता कारक की अभिव्यक्ति या तोनेपरसर्ग से होती है या बिना किसी संकेत के।  
    • इस संबंध में नियम यह है कि भूतकालीन क्रियाओं में कर्त्ता के साथ प्रायःनेका प्रयोग किया जाता है जबकि वर्तमान या भविष्य काल की क्रियाओं में नहीं किया जाता-           

     

    भूतकाल 

    भविष्य काल 

    वर्तमान काल 

    उत्तम पुरुष  

    मैंन खाना खाया। 

    मैं खाना खाऊँगा। 

    मैं खाना खा रहा हूँ। 

    मध्यम पुरुष 

    तुमने खाना खाया। 

    तुम खाना खाओगे। 

    तुम खाना खा रहे हो। 

    अन्य पुरुष  

    उसने खाना खाया। 

    वह खाना खाएगा। 

    वह खाना खा रहा है। 

    • ध्यातव्य है कि बिहारी हिंदी में भूतकालीन क्रिया के प्रसंग में भीनेपरसर्ग का प्रयोग नहीं किया जाता। उदाहरण- 

    उत्तम पुरुष  

    मैं खाना खाया हूँ। 

    मध्यम पुरुष 

    तुम खाना खाए हो। 

    अन्य पुरुष 

    वह खाना खाया है। 

    कर्म कारक 

    • कर्म कारक उस संज्ञा या सर्वनाम पद को कहते हैं जिसके प्रति कोई क्रिया की जाती है। उदाहरण के लिये "राम ने रावण को मारा" वाक्य मेंरावणकर्म पद है।  
    • कर्म कारक की अभिव्यक्तिकोपरसर्ग से की जाती है हालाँकि कई वाक्यों में कर्म कारक भी बिना किसी परसर्ग के जाता है। उदाहरण के लिये ‘‘मैंने सीता को पुस्तक दी’’ तथा "मैंने आम खाया’’ वाक्यों में प्रथम वाक्य मेंकोपरसर्ग है जबकि दूसरे में नहीं।  
    • कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कर्म कारक के लिये प्रयुक्त होने वाले परसर्गकोका प्रयोग अनुचित तरीके से कर्त्ता पद के लिये किया जाता है। उदाहरण के लिये "मुझको आपको समझाना है" तथा "हमको घर जाना है" वाक्यों में। 

    करण कारक 

    करण कारक वह संज्ञा या सर्वनाम पद है जो किसी क्रिया में साधन के रूप में प्रयुक्त होता है, जैसेराम ने रावण को तीर से मारावाक्य मेंतीरकरण पद है एवं इसका परसर्गसेहै। 

    संप्रदान कारक 

    संप्रदान कारक वह संज्ञा या सर्वनाम पद है जो किसी क्रिया का उद्देश्य होता है। उदाहरण के लिये "राम ने रावण को सीता के लिये मारा" वाक्य मेंसीतासंप्रदान पद है एवंके लियेउसका परसर्ग है। 

    अपादान कारक 

    अपादान कारक वह संज्ञा या सर्वनाम पद है जो किसी क्रिया का आरंभिक आधार होता है किंतु आगे चलकर क्रिया उससे अलग हो जाती है। उदाहरण के लिये "पेड़ से अँगूठी गिरी" वाक्य मेंअँगूठी का गिरनाक्रिया है और इस क्रिया का आरंभ जिस आधार से हुआ है वहपेड़है। अतः यहपेड़अपादान कारक है औरसेइसे व्यक्त करने वाला परसर्ग है। 

    संबंध कारक 

    • संबंध कारक का अर्थ है, वह संज्ञा या सर्वनाम पद जिसका क्रिया या क्रिया से संबंधित अन्य कारक के साथ संबंध होता है।  
    • इसकी अभिव्यक्तिका’, ‘की’, ‘के’, ‘रा’, ‘री’, ‘रेइत्यादि परसर्गों के माध्यम से की जाती है। व्याकरण की दृष्टि से इसे गौण कारक माना जाता है।  
    • यह अकेला कारक है जिसके परसर्ग लिंग एवं वचन के अनुसार परिवर्तनशील होते हैं। उदाहरण के लिये "सीता का भाई राम के दर्शन करना चाहता है" वाक्य मेंकाएवंकेसंबंध कारक के परसर्ग हैं। 

    अधिकरण कारक 

    • यह वह संज्ञा या सर्वनाम पद है जो किसी क्रिया का भौगोलिक, कालिक या मानसिक आधार होता है।  
    • इसकी अभिव्यक्तिमें’, ‘पेतथापरपरसर्गों से की जाती है। उदाहरण- ‘‘मैं आधुनिक काल में हूँ’’ (कालिक आधार), मेरा घर पृथ्वी पर है (भौगोलिक आधार), ‘‘सीता भावनात्मक रूप से राम पर आश्रित है’’ (मानसिक आधार) आदि। 

    संबोधन कारक 

    • संबोधन कारक वह संज्ञा या सर्वनाम पद है जिसे संबोधित करके वाक्य की शुरुआत की जाती है।  
    • कहीं-कहीं औपचारिक वाक्यों में इसका प्रयोग होता है किंतु सामान्यतः विस्मयादिबोधक वाक्यों में इसका प्रयोग दिखाई पड़ता है।  
    • संबोधन की एक विशेषता यह भी है कि यह हमेशा वाक्य के आरंभ में आता है।  
    • हेतथाअरेइस कारक के लिये प्रचलित परसर्ग हैं। उदाहरण के लिये- "हे मित्रो! हमें कल युद्ध लड़ना है" वाक्य मेंमित्रोसंबोधन कारक है तथाहेउसका परसर्ग।  
    • संबोधन कारक की एक विशेषता यह है कि इसमें परसर्ग का प्रयोग पूर्ववर्ती होता है, उत्तरवर्ती नहीं। यह भी ध्यातव्य है कि संबोधन कारक के बहुवचन मेंअनुनासिकका प्रयोग व्याकरणिक रूप से गलत होता है। अतःहे साथियोठीक है जबकिहे साथियोंगलत। 

    जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलाता है, विशेषण कहलाता है, यथाकाला, पीला, लम्बा, नाटा आदि। 

    हिंदी व्याकरण में प्रायः 4 प्रकार के विशेषण स्वीकृत हैं 

    1. गुणवाचक विशेषणः जो विशेषण संज्ञा के गुणों (जैसे- रंग, आकार, स्थान, काल आदि) का बोध कराते हैं, गुणवाचक विशेषण कहलाते हैं। ध्यातव्य है कि यहाँ गुण का अर्थ विशेषता से है, अच्छाई से नहीं। उदाहरण के लिये- ‘मोटा’, ‘पतला’, ‘बुरा’, ‘ऊँचा’, ‘नीचा’, ‘काला’, ‘पुरानाआदि गुणवाचक विशेषण हैं।

    2. सार्वनामिक विशेषणः वे विशेषण जो अपने सार्वनामिक रूप में ही संज्ञा की विशेषता बताते हैं, ‘सार्वनामिक विशेषणकहलाते हैं। उदाहरण के लिये "कितने लंबे हो तुम", "अपनी दुनिया में रहो", "तुम्हारी स्थिति कैसी है" आदि वाक्यों मेंकितने’, ‘अपनीतुम्हारीसार्वनामिक विशेषण हैं। सार्वनामिक विशेषण के चार उपभेद हैं-

    (i) निश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण - वह किताब दो। 

    (ii) अनिश्चयवाचक सार्वनामिक विशेषण - कोई किताब दो। 

    (iii) प्रश्नवाचक सार्वनामिक विशेषण - कौन सी किताब चाहिये? 

    (iv) संबंधवाचक सार्वनामिक विशेषण - जो कल माँगी थी, ‘वहीदो। 

    3. परिमाणबोधक विशेषणः ये विशेषण प्रायः तब आते हैं जब विशेष्य के रूप में कोई द्रव्यवाचक संज्ञा हो। ये भी दो प्रकारकेहैं-

    (i) निश्चित परिमाणबोधक - एक मीटर कपड़ा दो। 

    (ii) अनिश्चित परिमाणबोधक - थोड़ा पानी पिलाओ। 

    4. संख्यावाचक विशेषणः यह विशेषण भी लगभग परिमाणबोधक विशेषण के समान है किंतु यह तब आता है जब विशेष्य के रूप में कोई जातिवाचक संज्ञा हो। ये भी दो प्रकार के हैं-

    (i) निश्चित संख्यावाचक - बीस राक्षस आए थे। 

    (ii) अनिश्चित संख्यावाचक - कुछ देवता आए थे। 

    विकारी तथा अविकारी विशेषण 

    विशेषण के इन चारों प्रकारों में से पहले दो प्रकार के विशेषण विकारी हैं जबकि अंतिम दो अविकारी। गुणवाचक सार्वनामिक विशेषण लिंग-वचनानुसार परिवर्तित होते हैं जबकि परिमाणबोधक संख्यावाचक विशेषण परिवर्तित नहीं होते। 

    हिंदी की विशेषण व्यवस्था की कुछ और विशेषताएँ 

    • विशेषणों के दो भेदउद्देश्य विशेषणविधेय विशेषणभी किये जाते हैं।  
    • यदि विशेषण विशेष्य से पूर्व आता है तो उद्देश्य विशेषण कहलाता है, जैसे- "वह काला लड़का है" मेंकाला’।  
    • यदि विशेषण विशेष्य के बाद आए तो उसे विधेय विशेषण कहते हैं, जैसे- "वह लड़का काला है" वाक्य मेंकाला’।  
    • ध्यातव्य है कि विधेय विशेषण भी तार्किक रूप से संज्ञा की ही विशेषताबतातेहैं। 
    • कभी-कभी कुछ विशेषण, विशेषण की ही विशेषता बताते हैं, ऐसे विशेषणों कोप्रविशेषणकहते हैं। उदाहरण के लिये "वह बहुत चालाक है" मेंचालाकविशेषण एवंबहुतप्रविशेषण है। 
    • कहीं-कहीं विशेषण का प्रयोग संज्ञा रूप में किया जाता है। उदाहरण के लिये - "उस लंबू को देखो" एवं "बड़ों की बात माननी चाहिये" वाक्यों मेंलंबूएवंबड़ोंका संज्ञावत् प्रयोग किया गया है। 
    • हिंदी में कुछ विशेषण तो मूलतः विशेषण शब्द ही हैं, जैसे- सुंदर, काला, मोटा इत्यादि। शेष विशेषण संज्ञा, सर्वनाम क्रिया से निर्मित होते हैं। उदाहरण के लिये-
      संज्ञा से विशेषण - बनारस > बनारसी
      सर्वनाम से विशेषण - मैं > मेरा
      क्रिया से विशेषण - खाना > खाऊ, लड़ना > लड़ाकू 

    क्रिया 

    जिस शब्द या पद से किसी काम का करना या होना सूचित हो उसे क्रिया कहते हैं, यथाखाना, पीना, खेलना, घूमना आदि। 

    क्रिया के दो भेद हैं 

    अकर्मक क्रियाः जब कोई क्रिया बिना कर्म की अपेक्षा के हो तो अकर्मक क्रिया कहलाती है। उदाहरण के लियेराम हँसा’, ‘पक्षी उड़ रहे हैंआदि। 

    सकर्मक क्रियाः यह वह क्रिया है जिसके साथ कर्त्ता ही नहीं कर्म भी विद्यमान होता है। उदाहरण के लिये "राम ने रावण को मारा" वाक्य में कर्त्तारामएवं क्रियामाराके साथ कर्म के रूप मेंरावणभी विद्यमान है। यदि कर्म व्यक्त हो, किंतु कर्म की अपेक्षा विद्यमान हो तो भी क्रिया सकर्मक ही होगी, जैसे- ‘राम ने खायामेंखानाकर्म की अपेक्षाविद्यमानहै। 

     

    संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम कहते हैं, यथा– मैं, वह, तुम, वे आदि।

    सर्वनाम के 6 भेद हैं-

    1. पुरुषवाचक सर्वनाम  हिंदी तथा अन्य भाषाओं में 3 पुरुष स्वीकार किये गए हैं- उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष व अन्य पुरुष। इन तीनों के लिये हिंदी में निम्नलिखित सर्वनाम प्रचलित हैं-

    पुरुष        एकवचन         बहुवचन

    उत्तम पुरुष      मैं            हम

    मध्यम पुरुष     तू             तुम

    अन्य पुरुष      वह             वे

    2. निजवाचक सर्वनामः जो सर्वनाम उत्तम पुरुष, मध्यम पुरुष या अन्य पुरुष के संबंध में अपनेपन का बोध कराते हैं, वे निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं, जैसे- "यह मेरा अपना काम है" वाक्य में ‘अपना’ निजवाचक सर्वनाम है। ‘अपना’, ‘अपनी’, ‘अपने लिये’, ‘अपने आप का’ जैसी शब्दावली का प्रयोग निजवाचक सर्वनाम में प्रायः किया जाता है।

    3. निश्चयवाचक सर्वनामः ये सर्वनाम किसी संज्ञा की निश्चयात्मकता को व्यक्त करते हैं। ये प्रायः अकारांत (यह, वह) होते हैं परंतु इनमें प्रायः ईकारांत होने की गहरी प्रवृत्ति विद्यमान होती है, जैसे- यही, वही, यहीं, वहीं इत्यादि।

    4. अनिश्चयवाचक सर्वनामः ये सर्वनाम संज्ञा पद की अनिश्चितता को व्यक्त करते हैं, जैसे "कोई है" वाक्य में ‘कोई’ पद। ‘कभी’ और ‘कहीं’ भी अनिश्चयवाचक सर्वनामों की तरह प्रयुक्त होते हैं।

    5. प्रश्नवाचक सर्वनामः ये वे सर्वनाम हैं जो किसी वस्तु या व्यक्ति के संबंध में प्रश्नवाचकता को व्यक्त करते हैं, जैसे- "राम कहाँ गया" में ‘कहाँ’ प्रश्नवाचक सर्वनाम है, जो कि "राम अयोध्या गया" की व्यक्तिवाचक संज्ञा ‘अयोध्या’ के स्थान पर प्रयुक्त हुआ है।

    6. संबंधवाचक सर्वनामः इस सर्वनाम का प्रयोग प्रायः मिश्र वाक्यों में होता है जहाँ एक से अधिक वाक्यों के संबंध जोड़ने के लिये इनकी आवश्यकता पड़ती है। उदाहरण के लिये, "जो पढ़ेगा, वह सफल होगा’’ वाक्य में ‘जो’ तथा ‘वह’ संबंधवाचक सर्वनाम हैं।

    किसी भाषा में निहित व्यवस्था उसके व्याकरण पर निर्भर होती है। व्याकरण का अध्ययन चार भागों में बाँटकर किया जाता है- 

    1. पदसंरचना
    2. कारक व्यवस्था
    3. विकारोत्पादक तत्त्व
    4. वाक्य संरचना

    पद संरचना 

    शब्द और पद प्रायः समानार्थक शब्द हैं। इनमें अंतर यह है कि व्याकरण की व्यवस्था से युक्त होने पर शब्द को ‘पद’ कहा जाता  है। 

    पद के दो प्रकार हैं– विकारी और अविकारी। 

    विकारी पदों में चार चीज़ें शमिल हैं– 

    1. संज्ञा
    2. सर्वनाम
    3. विशेषण
    4. क्रिया

    संज्ञा 

    किसी भी वस्तु, व्यक्ति, भाव, विचार, द्रव्य, समूह आदि के नाम को व्यक्त करने वाला पद (शब्द) संज्ञा कहलाता है। 

    वाक्य में प्रयुक्त होने से पहले संज्ञा पद ‘प्रातिपदिक’ कहलाता है फिर कारक की विभक्ति या परसर्ग से जुड़कर ‘संज्ञापद’ कहलाता है। 

    संज्ञा के मुख्यतः तीन भेद हैं– 

    1. व्यक्तिवाचक संज्ञा 
    2. जातिवाचक संज्ञा
    3. भाववाचक संज्ञा 
    कुछ विद्वान इनके अतिरिक्त दो भेद और मानते हैं– (1) द्रव्यवाचक संज्ञा (2) समूहवाचक संज्ञा। लेकिन अब इसे स्वतंत्र संज्ञा का भेद न मानकर इसे जातिवाचक संज्ञा का उपभेद मानते हैं। 

    1. व्यक्तिवाचक संज्ञाः जिस संज्ञा से किसी खास व्यक्ति, वस्तु, स्थान, प्राणी आदि के नाम का बोध हो, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं, यथा– राम, श्याम, सीता, राधा, दिल्ली, बिहार, नर्मदा, गंगा, चेतक इत्यादि।

    2. जातिवाचक संज्ञाः जिस संज्ञा से किसी वर्ग विशेष का बोध हो, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं, यथा– मनुष्य, पशु, पक्षी आदि। जातिवाचक संज्ञा के दो भेद हैं–

    (i)द्रव्यवाचक संज्ञाः जब कोई संज्ञा द्रव्य या पदार्थ का बोध करवाती है तो उसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं, यथा– पानी, तेल, दूध आदि। 

    (ii) समूहवाचक संज्ञाः जब कोई शब्द किसी व्यक्ति, वस्तु, प्राणी आदि के समूह का बोध करवाए तो उसे समूहवाचक संज्ञा कहते हैं, यथा– गुच्छा, ढेर, झुंड, सेना, विद्यार्थी, पुलिस, शिक्षक आदि। 

    3.भाववाचक संज्ञाः जिस शब्द से किसी व्यक्ति या वस्तु के स्वभाव गुण या स्थिति का पता चलता है, भाववाचक संज्ञा कहलाता है, यथा–विनम्रता, प्रेम, घृणा, मानवता, बचपन, बुढ़ापा आदि। 

    1658 ई. में मिर्ज़ा खाँ कृत ‘ब्रजभाषा व्याकरण’ को हिंदी व्याकरण का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है। 

    • खड़ी बोली हिंदी का प्रथम व्याकरण 1715 ई. के लगभग ‘जोहानस जोशुआ केटलर’ ने लिखा। 
    • ग्रियर्सन तथा सुनीति कुमार चटर्जी ने जॉन गिलक्राइस्ट कृत ‘हिंदुस्तानी ग्रामर’ (1790 ई.) को हिंदी का प्रथम व्याकरण ग्रंथ माना है। यह अंग्रेज़ी ढंग में लिखा हिंदी का पहला व्याकरण ग्रंथ है। 
    • हिंदी व्याकरण को प्राकृत के आधार पर लिखने का पहला प्रयास संभवतः अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने किया। 
    • कामता प्रसाद ‘गुरु’ को ‘हिंदी व्याकरण का पाणिनी’ की उपाधि से विभूषित किया गया है। 
    • किशोरीदास वाजपेयी का ‘हिंदी शब्दानुशासन’ हिंदी का पहला व्याकरण ग्रंथ है जो भाषा विज्ञान से संवलित है। 
    • किशोरीदास वाजपेयी कृत ‘ब्रजभाषा का व्याकरण’ को अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने ‘हिंदी के व्याकरणों का व्याकरण’ की संज्ञा दी है। 

    प्रमुख हिंदी व्याकरण ग्रंथ 

    ग्रंथ 

    ग्रंथकार 

    डिक्शनरी ऑफ़ हिंदुस्तानी लैंग्वेज़ 

    जान फर्ग्युसन 

    ग्रामर ऑफ़ हिंदुस्तानी लैंग्वेज, ओरिएण्टल लिंग्विस्ट 

    जॉन बार्थनिक गिलक्राइस्ट 

    ग्रामर ऑफ़ हिंदी लैंग्वेज (1875 .) 

    एस. एच. केलाग 

    आधुनिक हिंदी व्याकरण (1896 .) 

    . ग्रीव्ज 

    शार्ट ग्रामर ऑफ़ मूर्स लैंग्वेज (1779 .) 

    हडले 

    हिंदी कवायद 

    लल्लू लाल 

    भाषा चंद्रोदय (1853 .) 

    श्री लाल 

    भाषा-तत्त्व-बोधनी (1858 .) 

    रामजतन 

    नवीन चंद्रोदय (1869 .) 

    नवीनचंद्र राय 

    हिंदी व्याकरण (1870 .) 

    राजा शिवप्रसादसितारे हिंद 

    भाषातत्व दीपिका 

    पं. हरिगोपाल 

    भाषा भास्कर 

    पादरी एथरिंगटन 

    हिंदी व्याकरण 

    केशवराम भट्ट 

    भाषा प्रभाकर 

    ठाकुर रामचरण सिंह 

    हिंदी व्याकरण 

    रामावतार शर्मा 

    भाषा तत्त्व प्रकाश 

    विश्वेश्वर दत्त शर्मा 

    प्रवेशिका हिंदी व्याकरण 

    राम दहिन मिश्र 

    विभक्ति विचार 

    गोविंद नारायण मिश्र 

    हिंदी कौमुदी 

    अंबिका प्रसाद वाजपेयी 

    हिंदी व्याकरण 

    कामता प्रसादगुरु 

    ब्रजभाषा का व्याकरण (1943 .), राष्ट्रभाषा का प्रथम व्याकरण (1949 .), हिंदी शब्दानुशासन (1957 .) 

    किशोरी दास वाजपेयी 

    ब्रजभाषा व्याकरण 

    धीरेंद्र वर्मा 

     

    अन्य हिंदी व्याकरण ग्रंथ 

    ग्रंथ 

    ग्रंथकार 

    आधुनिक हिंदी का आधारव्याकरण  

    आर्येन्द्र शर्मा 

    अच्छी हिंदी 

    रामचंद्र वर्मा 

    हिंदी व्याकरण का विधिवत विवरण 

    शिवेंद्र कुमार वर्मा 

    व्याकरण-दर्पण 

    शिवपूजन सहाय 

    हिंदी व्याकरण की रूपरेखा 

    दीमशित्स 

    हिंदी का मौलिक व्याकरण 

    स्वामी निगमानंद 

    हिंदी एक मौलिक व्याकरण 

    रमाकान्त अग्निहोत्री 

    परिष्कृत हिंदी व्याकरण 

    बदरीनाथ कपूर 

    व्यावहारिक हिंदी व्याकरण तथा रचना 

    हरदेव बाहरी 

    वृहद हिंदी भास्कर 

    वचनदेव कुमार 

    आधुनिक हिंदी व्याकरण और रचना 

    वासुदेव नंदन प्रसाद 

    हिंदी भाषा का वृहद एेतिहासिक व्याकरण 

    हजारीप्रसाद द्विवेदी 

    जब दो शब्द अपनी विभक्ति को छोड़कर आपस में मिल जाते हैं तो इसे समास कहते हैं। इस प्रकार से निर्मित शब्द को सामासिक शब्द कहा जाता है।

    • सामासिक शब्द को उनकी विभक्ति के साथ पुनः लिखना विग्रह कहलाता है।
    • समास के मुख्यतः चार भेद हैं-

    (क) अव्ययीभाव समास

    (ख) तत्पुरुष समास

    (ग) द्वंद्व समास

    (घ) बहुव्रीहि समास

    अव्ययीभाव समास

    जिस समास का पहला पद प्रधान हो और अव्यय हो तथा उत्तर पद गौण हो, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं, यथा–

    यथाविधि आजन्म परोक्ष

    यथास्थान आमरण समक्ष

    यथाक्रम प्रतिदिन प्रत्यक्ष

    यथासंभव प्रतिमान व्यर्थ

    यह पूरा शब्द क्रियाविशेषण अव्यय होता है।

    तत्पुरुष समास

    • जिस समास का दूसरा पद प्रधान हो, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं, यथा– घुड़सवार, हस्तलिखित।
    • इस समास का पहला पद बहुधा संज्ञा अथवा विशेषण होता है।
    • तत्पुरुष समास के दो भेद हैं– व्याधिकरण तत्पुरुष और समानाधिकरण तत्पुरुष।
    • व्याधिकरण तत्पुरुष ही तत्पुरुष समास है। द्विगु समास इसी तत्पुरुष का उदाहरण है।
    • द्विगु समास जिस समास का पहला पद संख्या वाचक हो, उसे द्विगु समास कहते हैं। यथा–

    चौराहा सतसई पंचवटी

    चतुर्भुज दुराहा षष्ठमुखी

    अष्टावक्र तिराहा नवरात्रि

    • समानाधिकरण तत्पुरुष का प्रचलित नाम कर्मधारय समास है।
    • कर्मधारय समास का पहला पद विशेषण तथा दूसरा पद विशेष्य होता है, यथा–

    पीतांबर तलघर नीलपीत दहीबड़ा

    नीलकमल पुरुषोत्तम शीतोष्ण चन्द्रमुख

    नीलगाय प्रभुदयाल शुद्धाशुद्ध कर्मबंध

    खड़ीबोली शिवदीन मृदुमंद धर्मसेतु

    कालापानी रामदहिन धर्मबुद्धि पुरुषरत्न

    • तत्पुरुष समास के प्रकारों में एक ‘नञ् तत्पुरुष समास’ भी होता है जिसका पहला पद निषेधात्मक होता है। इसके कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं–

    अकर्मक अनाथ अचेत

    अप्राप्य अनमोल अमान

    असार अजान अनगिनत

    द्वंद्व समास

    जिस समास का दोनों पद प्रधान हो अर्थात् पूर्वपद और उत्तर पद बराबर महत्त्व के हों, उसे द्वंद्व समास कहते हैं, यथा–

    गाय-बैल दाल-भात भूल-चूक जीव-जंतु

    बेटा-बेटी घटी-बढ़ी हाथ-पाँव साग-पात

    राधा-कृष्ण माता-पिता रुपया-पैसा आचार-विचार

    बहुव्रीहि समास

    जिस समास का कोई भी पद प्रधान नहीं होता और जो अपने-अपने पदों से भिन्न तीसरे अर्थ की व्यंजना करता है, बहुव्रीहि समास कहलाता है, यथा–

    चन्द्रमौलि – चन्द्र है सिर पर जिसके अर्थात् शिव

    वीणापाणि – वीणा है पाणि में जिसके अर्थात् सरस्वती

    चक्रपाणि – चक्र है पाणि में जिसके अर्थात् विष्णु

    बहुव्रीहि समास के कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण-

    लम्बोदर चतुर्भज

    पीताम्बर नीलकंठ

    दिगम्बर श्वेताम्बर

    नोटः योगरूढ़ शब्द ही एक प्रकार से बहुव्रीहि समास कहलाते हैं।

    • परसर्ग या प्रत्यय उन शब्दांशों को कहते हैं जो शब्द के अंत में लगकर शब्द का अर्थ परिवर्तित कर देते हैं। उदाहरणार्थ– ‘पन’ प्रत्यय से बना शब्द लड़कपन, बचपन आदि।
    • संस्कृत प्रत्यय को दो भागों में बाँटा गया है- कृदंत और तद्धित।

    कृदंतः ये वे प्रत्यय हैं जो किसी क्रिया या धातु के अंत में लगते हैं, जैसे- अक, एरा, आक इत्यादि। इनके उदाहरण निम्नलिखित हैं-

    अक- लेखक, पाठक

    आक- तैराक

    एरा- लुटेरा

    आलू- झगड़ालू

    तद्धित ये वे प्रत्यय हैं जो क्रियाओं के अतिरिक्त संज्ञा, विशेषण आदि में जुड़ते हैं, जैसेः पा, पन, आ इत्यादि। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

    पा- बुढ़ापा, बहनापा

    आ- प्यासा, निराशा

    पन- बचपन

    • हिंदी के अपने प्रत्यय भी काफी मात्रा में हैं। इस संदर्भ में एक विशेष बात यह भी है कि संस्कृत से हिंदी के विकास की प्रक्रिया में जिन क्षेत्रों में सर्वाधिक विकास हुआ है, उनमें से एक क्षेत्र प्रत्ययों का भी है। ऐसे प्रत्ययों में आरी, आहट, अक्कड़ इत्यादि प्रमुख हैं। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

    अक्कड़- भुलक्कड़, पियक्कड़

    आहट- फुसफुसाहट

    आरी- पुजारी, बीमारी

    संधि

    • दो वर्णों के मेल से उत्पन्न विकार को संधि कहते हैं।
    • संधि एक शब्द व दूसरे शब्दांश के बीच भी हो सकती है।
    • इसके तीन भेद हैं- 1. स्वर संधि, 2. व्यंजन संधि, 3. विसर्ग संधि।

    1. स्वर संधिः दो स्वरों के मिलने से होने वाली संधि, स्वर संधि कहलाती है; जैसे- विद्या+आलय; = विद्यालय आदि।

    2. व्यंजन संधिः व्यंजन के साथ स्वर अथवा व्यंजन की संधि, व्यंजन संधि कहलाती है; जैसे- जगत् + नाथ = जगन्नाथ आदि।

    3. विसर्ग संधिः विसर्ग के साथ स्वर अथवा व्यंजन की संधि, विसर्ग संधि कहलाती है; जैसे- दुः + शासन = दुःशासन या दुश्शासन आदि।

    • उपसर्ग उस शब्दांश को कहा जाता है जो शब्द के पूर्व में जुड़कर उस शब्द के अर्थ को परिवर्तित कर देता है।
    • हिंदी में उपसर्ग प्रायः तीन स्रोतों से आए हैं– संस्कृत (लगभग 22 उपसर्ग), उर्दू-फारसी से और हिंदी से।
    संस्कृत के उपसर्ग
    उपसर्ग अर्थ उदाहरण
    अति अधिक अतिकाल, अतिरिक्त, अतिशय, अत्यंत, अत्याचार
    अधि ऊपर अधिकरण, अधिकार, अध्यात्म, अधिराज
    अनु पीछे अनुकरण, अनुग्रह, अनुज, अनुस्वार, अनुपात
    अप बुरा, हीन, अपकीर्ति, अपभ्रंश, अपशब्द, अपहरण, अपमान
    अभि ओर, पास अभिप्राय, अभिमुख, अभिलाषा, अभ्यागत
    अव नीचे, हीन अवगाह, अवगुण, अवतार, अवनत, अवलोकन
    तक, ओर, समेत आकर्षण, आकार, आकाश, आक्रमण, आगमन
    उत् ऊपर, ऊँचा, श्रेष्ठ उत्कर्ष, उत्कंठा, उत्तम, उन्नति
    उप निकट, सदृश उपकार, उपदेश, उपनाम, उपनेत्र, उपभेद, उपयोग
    दुर् बुरा, कठिन, दुष्ट दुराचार, दुर्गुण, दुर्जन, दुर्दशा, दुर्बल, दुर्दिन,
    दुस बुरा, कठिन दुष्कर्म, दुष्प्राप्य, दुःसह
    नि भीतर, नीचे, बाहर निकृष्ट, निदर्शन, निबंध, नियुक्त, निरूपण, निपात
    निर् बाहर, निषेध निर्मम, निरपराध, निर्भय, निराकरण, निर्दोष
    निस् बाहर, निषेध निश्चल, निश्चय, निष्काम, निस्संदेह
    प्र अधिक, आगे, ऊपर प्रकाश, प्रख्यात, प्रयोग, प्रभु, प्रसार, प्रस्थान
    परा पीछे, उलटा पराक्रम, पराजय, पराभव, परामर्श, परावर्तन
    परि आसपास, चारों ओर परिक्रमा, परिणाम, परिपूर्ण, परिणय, परिवर्तन
    प्रति विरुद्ध, सामने प्रतिकूल, प्रतिक्षण, प्रतिध्वनि, प्रतिकार, प्रत्यक्ष
    वि भिन्न,  विशेष,  अभाव विज्ञान, विदेश, विधवा, विवाद, विशेष, विस्मरण
    सम् अच्छा, साथ, पूर्ण संकल्प, संगम, संग्रह, संतोष, संरक्षण, संहार
    सु अच्छा, सहज सुकर्म, सुकृत, सुगम, सुलभ, सुदूर, स्वागत
    उद् ऊपर, श्रेष्ठ, ऊँचा उद्यम, उद्देश्य
    उर्दू-फारसी के उपसर्ग
    अल निश्चित अलगरज, अलबत्ता
    ऐन ठीक ऐनजवानी, ऐनवक्त
    कम थोड़ा, दीन कमउम्र, कमकीमत, कमज़ोर, कमबख्त, कमहिम्मत
    खुश अच्छा खुशबू, खुशदिल, खुशकिस्मत
    गैर भिन्न, विरुद्ध गैरहाज़िर, गैरमुल्क, गैरवाजिब, गैरसरकारी
    दर में दरअसल, दरकार, दरखास्त, दरहकीकत
    ना अभाव नाउम्मीद, नादान, नापसंद, नाराज़, नालायक
    फी में, प्रति फीआदमी, फीज़माना, फीसाल
    ओर, में, अनुसार बनाम, बइजलास, बदस्तूर
    बद् बुरा बदकार, बदकिस्मत, बदनाम, बदमाश,
    बर ऊपर बरखास्त, बरदाश्त, बरबाद, बरकरार
    बा साथ बाज़ाब्ता, बाकायदा, बाइज़्ज़त
    बिल साथ बिलकुल, बिलमुक्ता
    बिला बिना बिलाकसूर, बिलाशक, बिलावजह
    बे बिना बेईमान, बेचारा, बेतरह, बेवकूफ, बेरहम
    ला बिना, अभाव लाचार, लावारिस, लाजवाब, लामजहब
    सर मुख्य सरकार, सरताज, सरनाम, सरहद
    हम साथ, समान हमउम्र, हमदर्दी, हमराह, हमवतन
    हर प्रत्येक हररोज़, हरचीज़, हरसाल, हरतरह
    हिंदी के उपसर्ग
    उपसर्ग अर्थ उदाहरण
    निषेध अजान, अथाह, अबेर, अलग
    अध आधा अधकच्चा, अधखिला, अधपका, अधमरा
    उन एक कम उन्नीस, उनतीस, उनचास, उनसठ, उन्नासी
    हीन, निषेध औगुन, औघट, औसर
    दु बुरा, हीन दुकाल, दुबला
    नि रहित निकम्मा, निडर, निरोगी, निहत्था
    बिन निषेध, अभाव बिनजाने, बिनबोया, बिनब्याहा
    भर पूरा, ठीक भरपेट, भरदौड़, भरपूर, भरसक, भरकोस

    निर्माण या गठन (बनावट) की दृष्टि से शब्द भंडार

    निर्माण या गठन की दृष्टि से शब्दों के तीन भेद किये जाते हैं- रूढ़, यौगिक तथा योगरूढ़ शब्द।

    रूढ़ शब्द

    ये वे शब्द हैं जिनकी ध्वनियों को अलग करके कोई अर्थ नहीं निकाला जा सकता या जिनकी व्युत्पत्ति ज्ञात न हो, जैसे- हाथ, पेट, किताब इत्यादि।

    यौगिक शब्द

    ये वे शब्द हैं जो दो या दो से अधिक रूढ़ शब्दों से मिलकर बनते हैं तथा जिनका अर्थ दोनों के अर्थ जुड़ने से निर्धारित होता है, जैसे- पुस्तकालय, हथगोला, जलज इत्यादि।

    योगरूढ़ शब्द

    ये ऐसे शब्द हैं जो संरचना की दृष्टि से यौगिक हैं किंतु इनका अर्थ एक विशेष रूप में रूढ़ हो चुका है। उदाहरण के लिये पंकज शब्द का यौगिक दृष्टि से अर्थ होगा- कीचड़ में जन्म लेने वाला, किंतु इसका प्रचलित अर्थ है कमल, जो कि रूढ़ हो चुका है। ऐसे ही नीलकंठ इत्यादि शब्द भी इसी प्रकार के हैं।

    प्रयोग के संदर्भ की दृष्टि से शब्द भंडार

    प्रयोग क्षेत्र के आधार पर शब्द के तीन वर्ग हैं– सामान्य शब्द, पारिभाषिक शब्द, अर्द्ध-पारिभाषिक शब्द।

    सामान्य शब्द

    • सामान्य शब्द सामान्य व्यवहार की भाषा में प्रयुक्त होते हैं।
    • सामान्य शब्द का निश्चित और वस्तुनिष्ठ अर्थ होना ज़रूरी नहीं है।
    • सामान्य शब्दों के पर्यायवाची शब्दों को एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है, यथा- चलना, फिरना, भरा, खाली, उलटा, टेढ़ा, पानी, दाल, रोटी, चाय, शरबत, लिखाई, पढ़ाई, दूकान, दफ्तर, गाड़ी, बस, साइकिल, ताँगा, धोती, पाजामा, कोट, कॉलर, किताब, पुस्तक, कलम, स्याही, कागज़ आदि सामान्य शब्द हैं।

    पारिभाषिक शब्द

    • पारिभाषिक शब्दों का अर्थ और संदर्भ पूर्णतः परिभाषित रहता है।
    • इन शब्दों का अर्थ एकदम निश्चित और वस्तुनिष्ठ होता है।

          प्रत्येक विषय क्षेत्र का अपना पारिभाषिक शब्द होता है, यथा–

    • शासन में– वरीयता, वरिष्ठता, शासन, प्रशासन, अनुशासन, आय-व्यय, अधिनियम, नियम, उपविधि, विधान, प्रावधान, सचिव, निदेशक, न्यायाधीश, न्यायमूर्ति, वादी, प्रतिवादी इत्यादि।
    • विज्ञान में– संकरण, परासंकरण, अणुसंकरण, परागण, परनिषेचन, पारसंयुग्मन, एक्स-रे, अणुसूत्र, तुल्यभार इत्यादि।
    • आयुर्वेद में–जाति जैविकी, प्रजातीय एकक, अल्परक्तता, रक्तचाप, अस्थिद्विभंग, पैत्तिक ज्वर, सतत ज्वर, विरामी ज्वर इत्यादि।
    • अर्थशास्त्र में– अनिवार्य, अर्जन, मुद्रास्फीति, चेक, धनादेश, अर्थव्यवस्था, अधिशेष, प्रतिभूति, अभ्यर्पणमूल्य इत्यादि।

    अर्द्ध-पारिभाषिक शब्द

    वे शब्द जो किसी संदर्भ में पारिभाषिक शब्द बन जाते हैं और किसी संदर्भ में सामान्य शब्दों-सा व्यवहार करते हैं, यथा– रस, मांग, बल, तेज़, धातु, ऊर्जा।

    रूप के प्रयोग के आधार पर शब्दों के भंडार

    रूप के प्रयोग के आधार पर शब्दों के दो प्रकार होते हैं- विकारी शब्द और अविकारी शब्द।

    विकारी शब्द

    कुछ शब्द ऐसे हैं जिनका वाक्य में प्रयोग करने पर ‘रूप’ बदलता है, विकारी शब्द कहलाते हैं।

    जिन शब्दों का रूप लिंग, वचन या काल आदि के परिवर्तन के कारण बदलता है, यथा–

    संज्ञा – लड़का, लड़के, लड़कियाँ इत्यादि।

    सर्वनाम – वह, वे, वही इत्यादि।

    विशेषण – काला, काले, काली इत्यादि।

    क्रिया – जाता है, जाती है, जाते हैं इत्यादि।

    अविकारी शब्द

    अविकारी शब्दों का रूप किसी भी स्थिति में परिवर्तित नहीं होता है, यथा-

    क्रिया विशेषण–धीरे, आज, कल, यहाँ, वहाँ, इधर, उधर आदि।

    संबंधबोधक शब्द–में, से, पर, से आगे, की ओर, के नीचे आदि।

    समुच्चयबोधक शब्द–और, परंतु, या, इसलिये, तो, यदि आदि।

    विस्मयादिबोधक शब्द–अरे!, उफ!, अल्लाह!, राम राम! आदि।

    देशज शब्द

    • देशज शब्द वे शब्द हैं जिनका जन्म देश में ही हुआ है।
    • देशज शब्द की एक विशेषता यह भी है कि उसमें लोक या अंचल की संस्कृति की महक महसूस की जा सकती है।
    • भारत में दूसरी भाषा से लिये गए शब्द भी देशज कहलाएंगे अगर उस भाषा का जन्म भारत में हुआ हो।

    द्रविड़ भाषाओं से 

    अपने गठन से 

    उड़द, ओसारा, कच्चा, कज्जल, कटोरा, काका, केड, कुटी, कुप्पी, केतकी, चक्का, चिकना, चूड़ी, झंझा, झूठ, टंटा, टोपी, ठेस, डंका, नीर, पापड़, पिंड, पेट, भंगी, माला, मीन, मुकुट, लाठी, लोटा, सूजी, इडली, डोसा, सांभर, पिल्ला आदि। 

    अनुकरणात्मक या ध्वन्यात्मक शब्द-अंडबंड, ऊटपटाँग, कड़क, किलकारी, खटपट, खर्राटा, गड़गड़, चटक, चटपटा, चिड़चिड़ा, चुटकी, छिछला, झंकार, टंकार, ठठेरा, भभक, भोंपू, कटकटाना, खटखटाना, खुरचना, घुड़की, सनसनाहट, हिनहिनाना आदि। 

    विदेशज शब्द

    • विदेशज शब्द वे शब्द हैं जो हमारे देश में नहीं उपजे बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया में हिंदी भाषा में स्वीकार किये गए हैं।
    • हालाँकि विदेशज और देशज, दोनों ही प्रकार के शब्द दूसरी भाषाओं से संबद्ध होते हैं, किंतु देशज शब्दों का संबंध इसी देश की भाषाओं और विदेशज का विदेशी भाषाओं से होता हैं।

    तुर्की शब्द 

    उर्दू, काबू, कैंची, कुली, कुर्की, चाकू, चिक, चम्मच, चकमक, चेचक, तमगा, तलाश, तुर्की, तोप, तोशक, नौकर, बारूद, बहादुर, बेगम, मुगल, लफंगा, लाश, सराय, सुराग। 

    अरबी शब्द 

    अजब, अजीब, अदालत, अक्ल, अल्लाह, असर, आखिर, आदमी, आफत, इनाम, इजलास, इज़्ज़त, इलाज, ईमान, उम्र, एहसान, औरत, औसत, कब्र, कमाल, कर्ज़, किस्मत, कालीन, कीमत, किताब, कुरसी, खत, खत्म, खिदमत, ख्याल, जिस्म, जुलूस, जलसा, जवाब, जहाज़, जलेबी, ज़िक्र, तमाम, तकदीर, तारीख, तकिया, तरक्की, दवा, दावा, दिमाग, दुनिया, नतीजा, नहर, नकल, फकीर, फिक्र, फैसला, बहस, बाकी, मुहावरा, मदद, मजबूर, मुकदमा, मौसम, मौलवी, मुसाफिर, यतीम, राय, लिफाफा, वारिस, शराब, हक, हजम, हाजिर, हिम्मत, हुक्म, हैजा, हौसला, हकीम, हलवाई। 

    फारसी शब्द 

    आबरू, आतिशबाज़ी, आराम, आमदमी, आवारा, आवाज़, उम्मीद, उस्ताद, कारीगर, किशमिश, कुरता, कुश्ती, कूचा, खाक, खुद, खुदा, खामोश, खुराक, गरम, गज, गवाह, गिर­फ्तार, गिर्द, गुलाब, चादर, चापलूस, चालाक, चश्मा, चेहरा, ज़हर, जलसा, जूलूस, ज़ोर, ज़िंदगी, जागीर, जादू, जुरमाना, जोश, तबाह, तमाशा, तनख़ाह, ताज़ा, तेज़, दंगल, दफ्तर, दरबार, दारोगा, दाग, दवा, दिल, दीवार, दूकान, नापसंद, नापाक, पाजामा, परदा, पैदा, पुल, पेश, बारिश, बीमार, बुख़ार, बर्फ़ी, मज़ा, मलाई, मकान, मज़दूर, मुश्किल, मोरचा, याद, यार, रंग, राह, लगाम, लेकिन, वापिस, शादी, सितार, सरदार, समोसा, साल, सरकार, हफ्ता, हज़ार। 

    अंग्रेज़ी शब्द  

    अपील, कोर्ट, मजिस्ट्रेट, जज, पुलिस, टैक्स, कलक्टर, डिप्टी, ऑफ़िसर, वोट, पेंशन, कॉपी, पेंसिल, पेन, पिन, पेपर, लाइब्रेरी, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, डॉक्टर, कंपाउंडर, नर्स, ऑपरेशन, वार्ड, प्लेग, मलेरिया, कालरा, हार्निया, डिपथीरिया, कैंसर, कोट, कॉलर, पैंट, हैट, बुशर्ट, स्वेटर, हैट, बूट, जंपर, ब्लाउज़, कप, प्लेट, जग, लैंप, सूटकेस, गैस, माचिस, केक, टॉफ़ी, बिस्कुट, टोस्ट, चॉकलेट, जैम, जेली, ट्रेन, बस, कार, मोटर, लॉरी, स्कूटर, साइकिल, बैटरी, ब्रेक, इंजन, यूनियन, रेल, टिकट, पार्सल, पोस्ट कार्ड, मनी ऑर्डर, स्टेशन, ऑफ़िस, क्लर्क, गार्ड, एजंट। 

    अन्य भाषाओं के शब्द 

    चीनी शब्दचाय, लीची। 

    जापानी शब्दझम्पान, रिक्शा। 

    पुर्तगाली शब्दअनन्नास, आलपीन, गमला, गिरजा, चाबी, नीलाम, पपीता, पाव(रोटी), पादरी, बंबा, बाल्टी, फीता, आलमारी। 

    फ्रेंच शब्दअंग्रेज़, कारतूस, कूपन, फ्रांसीसी, रेस्तरां, रिपोर्ताज। 

    डच शब्दतुरुप, बम (ताँगे का एक पुरजा)। 

    रूसी शब्दरूबल, वोडका, स्पुतनिक। 

    संकर शब्द

    • कुछ शब्द दो भाषाओं के मिलने से बन जाते हैं, जिन्हें संकर शब्द कहा जाता है। सामान्यतः इनका विवेचन कम ही किया जाता है किंतु कुछ विद्वान इन्हें स्वीकृति प्रदान करते हैं। ऐसे कुछ शब्द इस प्रकार हैं-

    थानेदार (हिंदी + फारसी) परदानशीन (अरबी + फारसी)

    वोटदाता (अंग्रेज़ी + तत्सम) लाजशरम (हिंदी + फारसी)

    फैशन परस्त (अंग्रेज़ी + फारसी) मोटरगाड़ी (अंग्रेज़ी + देशज)

    बदहज़मी (फारसी + अरबी)

    • ध्वनियों का वह समूह शब्द कहलाता है जिसका कोई विशेष अर्थ हो।
    • हिंदी की शब्द संपदा का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जा सकता है। उनमें कुछ आधार निम्नवत हैं–
    • स्रोत (उत्पति/व्युत्पत्ति) की दृष्टि से
    • निर्माण या गठन (बनावट) की दृष्टि से
    • प्रयोग के संदर्भ की दृष्टि से
    • परिवर्तनशीलता या परिवर्तनीयता की दृष्टि से / रूप या प्रयोग का आधार

    स्रोत (उत्पत्ति) की दृष्टि से शब्द भंडार

    • हिंदी में उत्पत्ति के आधार पर शब्दों के चार प्रकार हैं- तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशज।

    तत्सम शब्द

    ‘तत्सम’ अर्थात् तत् (उसके) + सम (समान)। यहाँ ‘उस’ का तात्पर्य संस्कृत है। तत्सम शब्द वे शब्द हैं जिन्हें सस्ंकृत से उसी रूप में लिये गए हैं जैसे वे संस्कृत में मिलते थे।

    कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं- माता, जल, तप, दान, अन्न, अंग, अंधकार, उदार, सत्य, हानि आदि।

    तद्भव शब्द

    तद्भव दो शब्दों के मेल से निर्मित है- तत् (उससे) + भव (निर्मित) । जो शब्द संस्कृत के समान नहीं हैं, लेकिन कुछ परिवर्तन के साथ हिंदी में लिये गए हैं।

    कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं- अंधकार से अँधेरा, अग्नि से आग, अष्ट से आठ आदि।

    प्रमुख तत्सम और तद्भव शब्द
    तत्सम तद्भव तत्सम तद्भव तत्सम तद्भव तत्सम तद्भव
    अंगरक्षक अँगरखा आखेट अहेर तड़ाग तालाब तृण तिनका
    अग्निष्ठिका अँगीठी अक्षि आँख तैल तेल प्रस्तर पत्थर
    अंगुष्ठ अँगूठा आर्चि आँच स्तन थन परीक्षा परख
    अंधकार अँधेरा आँत्र आँत पल्लव पल्ला दधि दही
    अश्रु आँसू आमलक आँवला धूम्र धुआँ पृच्छ पूछना
    अष्ट आठ अग्नि आग नग्न नंगा पुच्छ पूँछ
    अर्धपूरक अधूरा आश्चर्य अचरज नृत्य नाच पाशिका फाँसी
    आम्रचूर्ण अमचूर अन्नाद्य अनाज महिष भैंसा वक्र बाँका
    इंधन ईंधन अम्लिका इमली बुभुक्षा भूख व्याघ्र बाघ
    काष्ठ काठ अंगुलि उँगली भ्रमर भौंरा श्मशान मसान
    उज्ज्वल उजला कर्ण कान वृद्ध बूढ़ा भाडागार भंडार
    उत्तिष्ठ उठना कृष्ण कान्ह मस्तक माथा मुख मुँह
    उच्च ऊँचा कर्म काम मौक्तिक मोती मयूर मोर
    कूप कुआँ इक्षु ईख सर्प साँप श्वास साँस
    ओष्ठ ओंठ/होंठ कुंभकार कुम्हार शाक साक रात्रि रात
    काक कौआ कमल कँवल राज्ञी रानी राशि रास
    कंटफल कटहल कच्छप कछुआ सप्त सात श्याल साला
    कर्पास कपास खर्जूर खजूर रिक्त रीता श्रावण सावन
    छत्रक छाता क्षेत्र खेत रजनी रैन साधु साहू
    छिद्र छेद गर्दभ गधा शृंगार सिंगार शृगाल सियार
    गोधूम गेहूँ गृद्ध गिद्ध लज्जा लाज शूकर सूअर
    जिह्वा जीभ घट घड़ा सत्य सच शुक सुआ
    घृत घी घृणा घिन सौभाग्य सुहाग संध्या साँझ
    चर्मकार चमार घोटक घोड़ा शुष्क सूखा सूर्य सूरज
    चुंबन चूमना चंद्र चाँद हस्त हाथ, हथौड़ा शय्य सेज
    हस्ती हाथी ताम्र ताँबा

    उच्चारण स्थान के आधार पर ध्वनियों का वर्गीकरण 

    उच्चारण स्थान 

    वर्ण 

    स्वर 

    व्यंजन 

    कंठ से उच्चरित ध्वनियाँ (कंठ्य) 

    , , और विसर्ग (:)* 

    , , , , , , ,  

    तालु से उच्चरित ध्वनियाँ (तालव्य) 

    ,  

    , , , , , , ,  

    मूर्धा से उच्चरित ध्वनियाँ (मूर्धन्य) 

     

    , , , , , , ,  

    दंत से उच्चरित ध्वनियाँ (दंत्य) 

    •  

    , , , ,  

    ओष्ठ से उच्चरित ध्वनियाँ  (ओष्ठ्य) 

    ,  

    ,  , , , ,  

    नासिका से उच्चरित ध्वनियाँ (अनुनासिक) 

    अनुस्वार (.)* 

    , , , ,  

    वर्त्स से उच्चरित ध्वनियाँ (वर्त्स्य) 

     

    , , ,  

    कंठ और तालु से उच्चरित ध्वनियाँ (कंठतालव्य) 

    ,  

     

    कंठ और ओष्ठ से उच्चरित ध्वनियाँ (कंठोष्ठ्य) 

    , ,  

     

    स्वरयंत्रमुखी/काकल्य 

     

     

    दंतोष्ठ से उच्चरित ध्वनियाँ (दंतोष्ठ्य) 

     

    व़ 

    * हालाँकि मूलतः ये अयोगवाह ध्वनियाँ हैं, किंतु सामान्यतः इन्हें स्वर में ही गिन लिया जाता है। 

    • संयुक्त व्यंजन  ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञ’ और ‘श्र’ मूल व्यंजन नहीं हैं। इनकी रचना दो व्यंजनों के मेल से हुई है। इसलिये इन्हें संयुक्त व्यंजन कहते हैं। जैसे- क्+ष = क्ष, त्+र = त्र, ज्+ञ = ज्ञ, श्+र = श्र 
    • द्विगुण व्यंजन  ‘ड’ और ‘ढ’ के नीचे बिंदु लगाकर दो नए व्यंजन ‘ड़’ और ‘ढ़’ बनाए गए हैं। इन्हें द्विगुण व्यंजन कहते हैं। 

    ‘ड़’ और ‘ढ़’ उत्क्षिप्त व्यंजन भी हैं। 

    अयोगवाह ध्वनियाँ 

    • ये वे ध्वनियाँ हैं जो न स्वर हैं और न ही व्यंजन। ये स्वर इसलिये नहीं हैं कि इनकी स्वतंत्र गति नहीं है और व्यंजन इसलिये नहीं हैं कि ये स्वरों के बाद आती हैं, उनसे पहले नहीं। ऐसी तीन ध्वनियाँ हैं- 1. अनुस्वार, 2. अनुनासिक, 3. विसर्ग।  

    अनुस्वार 

    • अनुस्वार एक नासिक्य ध्वनि है। अनुस्वार का अर्थ है - अनु + स्वर, अर्थात् स्वर के बाद आने वाला। ये नासिक्य ध्वनियाँ स्वर के उच्चारण के बाद आती हैं, जैसे- गंगा (गङ्गा) आदि।  
    • अनुस्वार के रूप में वर्गीय व्यंजनों के संदर्भ में नियम यह है कि अनुस्वार अपने से बाद में आने वाले व्यंजन के वर्ग का ही पाँचवा व्यंजन होगा। उदाहरण के लिये- 
      •   गंगा > गङ्गा खंभा > खम्भा 
      •  गंदा > गन्दा गंजा > गञ्जा 

    अनुनासिक 

    • वह नासिक्य ध्वनि जो स्वर के साथ जोड़कर बोली जाती है। इसके संकेत के रूप में अ, आ के साथ चंद्रबिंदु तथा ए, ओ की मात्रा के साथ बिंदु का प्रयोग किया जाता है, जैसे- बाँस, जोंक आदि। 

    विसर्ग 

    • यह वह ध्वनि है जो कुछ तत्सम शब्दों में स्वर के बाद ‘ह’ रूप में उच्चरित होती है, जैसे- दुःख, छः, प्रायः, अतः आदि। 

    नोटः यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वर्णमाला में अनुस्वार और अनुनासिक ध्वनियों की गणना एक ध्वनि के रूप में ही की जाती है। इस प्रकार अयोगवाह ध्वनियाँ दो ही बचती हैं। 

    व्यंजन वर्ण वे वर्ण (ध्वनियाँ) हैं जिनके उच्चारण में स्वर वर्ण की सहायता लेनी पड़ती है।

    प्रयत्न के आधार पर व्यंजन के भेद

    आभ्यंतर प्रयत्न

    ध्वनि उत्पन्न होने के पहले वागिंद्रिय की क्रिया को आभ्यंतर प्रयत्न कहते हैं। आभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के तीन भेद हैं– स्पर्श, अंतःस्थ तथा ऊष्म या संघर्षी।

    • स्पर्श व्यंजनः ये वे व्यंजन हैं जिनके उच्चारण में जीभ है। इन व्यंजनों को उच्चारण स्थान के आधार पर पाँच वर्गों में पाँच-पाँच की संख्या में बाँटा गया है। यथा-कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग 

    आभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर 

    बाह्य प्रयत्न के आधार पर 

    स्पर्श व्यंजन 

    ( वर्ग)  

    ( वर्ग)  

    ( वर्ग)  

    ( वर्ग)  

    ( वर्ग)  

    अंतःस्थ व्यंजन  

    ऊष्म व्यंजन  

    अर्धस्वर  

    पार्श्विक  

    लुंठित/प्रकंपित  

    अनुनासिकप्रत्येक वर्ग का अंतिम वर्ण (, , , , ) 

     

     

     

    • अंतःस्थ व्यंजनः ये वे व्यंजन हैं जिनका उच्चारण स्वर और व्यंजन का मध्यवर्ती होता है। इन व्यंजनों में श्वास का अवरोध बहुत कम होता है। ये संख्या में चार हैं-य, र, ल, व। इनमें भी ‘य’ और ‘व’ में यह प्रवृत्ति अधिक है। इस विशेष योग्यता के कारण इन दोनों को ‘अर्द्धस्वर’ भी कहा जाता है।
    • ऊष्म या संघर्षी व्यंजनः ये वे व्यंजन हैं जिनके उच्चारण में विशेष रूप से श्वास का घर्षण होता है। वस्तुतः जीभ तथा होठों के निकट आने के कारण इनके उच्चारण में वायु रगड़ खाती हुई बाहर निकलती है व इसी से संघर्ष / घर्षण होता है। ये संख्या में चार हैं- श, ष, स, ह।
    • आभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर व्यंजन के ये भी भेद हैं-

    अर्द्धस्वर - य, व पार्श्विक -

    लुंठित/प्रकंपित - र अनुनासिक - ङ, ञ, ण, न, म

    बाह्य प्रयत्न

    ध्वनि उत्पन्न होने की अंत की क्रिया को बाह्य प्रयत्न कहते हैं। बाह्य प्रयत्न के आधार पर वर्णों के चार भेद हैं-

    • घोष/सघोष वर्ण के उच्चारण में स्वरतंत्री के अधिक कंपन के कारण आवाज़ भारी हो जाती है। व्यंजन माला में अंतिम तीन वर्ण और य, र, ल, व, ह, क्ष, त्र, ज्ञ, श्र घोष वर्ण हैं।
    • अघोष वर्ण के उच्चारण में कम कंपन के कारण आवाज़ अधिक भारी नहीं होती। इसके उच्चारण में केवल श्वास का प्रयोग होता है। प्रत्येक वर्ग के प्रथम दो वर्ण और श, ष, स अघोष वर्ण हैं।
    • महाप्राण व्यंजनों के उच्चारण में ज़्यादा ऊर्जा, श्वास और वायु खर्च होती है। स्पर्श व्यंजनों में प्रत्येक वर्ग का दूसरा व चौथा वर्ण और ऊष्म वर्ण, ‘महाप्राण व्यंजन’ हैं।
    • अल्पप्राण व्यंजनों के उच्चारण में कम ऊर्जा, श्वास और वायु खर्च होती है। स्पर्श व्यंजनों में प्रत्येक वर्ग का प्रथम, तृतीय व पंचम वर्ण और अंतःस्थ व्यंजन, ‘अल्पप्राण व्यंजन’ हैं।
    • वर्ण उस मूल ध्वनि को कहा जाता है जिसके खंड नहीं हो सकते। यथा- अ्, क्, ख्, च्, य् इत्यादि।
    • कामताप्रसाद गुरु ने वर्णों की संख्या 44 मानी है, जिनमें 11 स्वर तथा 33 व्यंजन हैं।
    • डॉ. वासुदेवनन्दन प्रसाद ने हिंदी भाषा में 11 स्वरों सहित 52 वर्ण माने हैं।

    स्पर्श व्यंजन (25), अंतःस्थ व्यंजन (4) और ऊष्म व्यंजन (4); कुल तैंतीस व्यंजन हिंदी में मूल रूप से स्वीकार किये गए हैं, किंतु विकास की प्रक्रिया में आठ और व्यंजन भी हिंदी में स्वीकृत हुए हैं। इनकी सूची स्रोतों के साथ इस प्रकार है-

    1. मराठी से ळ

    2. फारसी से क़ ख़ ग़ ज़ फ़ (नुक्ते के साथ)

    3. अपभ्रंश से ड़ ढ़

    इन इकतालीस व्यंजनों के अतिरिक्त हिंदी में चार संयुक्त व्यंजन स्वीकृत हैं- क्ष त्र ज्ञ श्र

    व्यंजन (45), स्वर (11) और अयोगवाह (2) ध्वनियों को जोड़ने पर हिंदी भाषा में 58 ध्वनियाँ हो जाती हैं।

    स्वर वर्ण

    जिन वर्णों (ध्वनियों) का उच्चारण बिना किसी अन्य ध्वनि की सहायता के होता है, उन्हें स्वर वर्ण कहते हैं।

    उत्पत्ति के आधार पर स्वर के दो भेद

    • मूल स्वर – जिन स्वरों की उत्पत्ति बिना किसी दूसरे स्वर के होती है। ह्रस्व स्वर ‘मूल स्वर’ हैं। अ, इ, उ और ऋ ये चारों मूल स्वर हैं।
    • संधि स्वर – मूल स्वरों के मेल से बनने वाले स्वरों को संधि स्वर कहते हैं। आ, ई, ए, ऐ, ओ तथा औ संधि स्वर हैं।
    • संधि स्वर के दो भेद हैं– (i) दीर्घ स्वर (ii) संयुक्त स्वर
    • एक मूल स्वर में उसी मूल स्वर के मिलने से जो स्वर बनता है, उसे दीर्घ स्वर कहते हैं, यथा- आ, ई, ऊ।
    • अ + अ = आ इ + इ = ई उ + उ = ऊ
    • दो अलग-अलग स्वर के मिलने से बनने वाला स्वर संयुक्त स्वर कहलाता है, यथा- ए, ऐ, ओ, औ।
    • अ + इ = ए अ + ए = ऐ
    • अ + उ = ओ आ + ओ = औ

    जाति के अनुसार स्वरों के दो भेद

    • सवर्ण स्वरः एक ही स्थान और प्रयत्न से उत्पन्न स्वर ‘सवर्ण स्वर’ या सजातीय स्वर कहलाते हैं, यथा- अ-आ, इ-ई, उ-ऊ।
    • असवर्ण स्वरः जिन स्वरों के उच्चारण स्थान और प्रयत्न समान नहीं होते हैं, उन्हें ‘असवर्ण स्वर’ या विजातीय स्वर कहते हैं, यथा- अ-इ, अ-ऊ, इ-ऊ।

    जिह्वा की स्थिति के अनुसार स्वरों के तीन भेद

    • अग्र स्वर - जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का अग्र (अगला) भाग ऊपर उठता है, उन्हें ‘अग्र स्वर’ कहते हैं, जैसे- ‘इ’, ‘ई’, ‘ए’, ‘ऐ’।
    • मध्य स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ समान अवस्था में बनी रहती है, उन्हें ‘मध्य स्वर’ कहते हैं, जैसे- ‘अ’।
    • पश्च स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में जीभ का पश्च (पिछला) भाग उठता है, उन्हें ‘पश्च स्वर’ कहते हैं, जैसे- ‘आ’, ‘उ’, ‘ओ’, ‘औ’।

    उच्चारण के कालमान (मात्रा) के अनुसार स्वरों के दो भेद

    • लघु स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा का समय लगता है, उन्हें ‘लघु स्वर’ कहते हैं, जैसे- अ, इ, उ, ऋ।
    • गुरु स्वर- जिन स्वरों के उच्चारण में दो मात्राओं का समय लगता है, उन्हें ‘गुरु स्वर’ कहते हैं, जैसे- आ, ई, ऊ ए, ऐ, ओ, औ।

    (सब मूल स्वर लघु स्वर हैं और सभी संधि स्वर गुरु स्वर हैं)

    अंतर का आधार खड़ी बोली ब्रजभाषा अवधी
    उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश के उत्तरी रूप से शौरसेनी अपभ्रंश से अर्धमागधी अपभ्रंश से
    उपभाषा वर्ग पश्चिमी हिंदी का प्रतिनिधि रूप पश्चिमी हिंदी से संबद्ध; पर अवधी से अत्यन्त निकटता पूर्वी हिंदी उपभाषा का प्रतिनिधि रूप
    भौगोलिक विस्तार मेरठ केंद्र है; दिल्ली से देहरादून तक तथा अम्बाला से हिमाचल के आरंभ तक का संपूर्ण क्षेत्र। ब्रजमंडल का संपूर्ण क्षेत्र। मूलतः मथुरा, वृंदावन,आगरा में प्रयुक्त। हरियाणा का भी कुछ भाग, जैसे- पलवल, होडल इत्यादि। लखनऊ, फैज़ाबाद, अयोध्या, सीतापुर सुल्तानपुर, रायबरेली तथा आसपास का क्षेत्र। विदेशों में भी प्रयुक्त- फिजी, त्रिनिदाद आदि में।
    साहित्यिक विकास 19वीं सदी से पूर्व विशेष नहीं- सिद्ध, नाथ, खुसरो, रहीम, संत काव्य, दक्खिनी हिंदी में आरंभिक रूप; 19वीं सदी से तीव्र आरंभ- अब कोई प्रतिस्पर्धा नहीं। मानक हिंदी का मूल आधार।

    आदिकाल में ‘पिंगल’ की परंपरा में उपस्थित- प्राकृत पैंगलम, उक्तिव्यक्तिप्रकरण, पृथ्वीराज रासो में आरंभिक रूप; नाथ साहित्य व खुसरो की कविताओं में भी द्रष्टव्य। सूरदास 
    -> रीतिकाल -> अखिल भारतीय साहित्यिक भाषा -> सबसे लंबा इतिहास।

    राउलवेल, उक्तिव्यक्तिप्रकरण में आरंभिक रूप -> पुनः सूफियों के बाद ही ->सूफी काव्यधारा -> रामकाव्यधारा ->हिंदू प्रेमाख्यानकार -> अभी भी कुछ कवि -> बलभद्र प्रसाद दीक्षित आदि।

    ध्वनि व्यवस्था 

    उच्चारण की प्रवृत्ति आकारांतता (चला, गया)

    ओकारांतता (चलौ, गयौ)

    उकारांतता (चलु, कहतु)
    ऐ, औ का उच्चारण ए, ओ की तरह   (औरत  >  ओरत)

    सामान्य रूप में  (आवै, जावौ)

    संध्यक्षरों के रूप में (चउड़ा, आवइ)
    प्रारंभिक स्वर लुप्त होते हैं (इकट्ठा > कट्ठा), (सियाना > स्याणा)

    सामान्य रूप में

    सामान्य रूप में
    ध्वनियों का परिवर्तन न > ण  (मानस > माणस)ल > ळ (बालक > बाळक)र > ड़ (चपरासी > चपड़ासी)श > स (शमशेर > समसेर)

    र > ड़ (परे > पड़े)ण > न (बाण > बान)

    ण > न (कौण > कौन) (बाण > बान)ड़ > र (सड़क > सरक)ष > स (ऋषि > रिसि)व > ब (विश्व > बिस्व)
    अल्पप्राण - महाप्राण

    अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति 
    (धोखा > धोका), (झूठ > झूट)

    अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति (मुझ > मुज)

    --------
    व्याकरण 
     
    संज्ञा संज्ञा का एक रूप (प्रायः आकारांत)

    संज्ञा का एक ही रूप। 

    संज्ञा के तीन रूप मिलते हैं, जैसे- 

    • लरिका-लरिकवा-लरिकउना 

    • नदी-नदिय-नदीवा

    सर्वनाम एकवचन बहुवचन

    एकवचन     बहुवचन

    एकवचन   बहुवचन

    उत्तम पुरुष 

    मध्यम पुरुषअन्य पुरुषअनिश्चयवाचक

    मैं, मुज, में म्हारा, हमारा 

    तू, तैं, तम तम, थारा, तारा 

    वो, वू, उस्का वे, उन्का, उन्की 

    कोण, कूण, किस्का 

    मैं, हौं, मोहिं, मेरौ हम, हमन, हमारौ 

    तू, तूँ, तोहि, तेरौ, तिहारौ तुम, तुम्हैं, तुम्हारौ,  

    वौ, वह, वाकौ, ताहि वे, वै, उन, उनकौ 

    कैसो, कौन 

    में, मह, मो हम, हमहिं, हमारतू, तूँ, तोर तुम, तुम्ह, तुम्हार, तुहारवह, ऊ, ओकर वेह, ओनकर, ओनकाकवन, कउन, कइसो
     लिंग व्यवस्था  स्त्रीलिंग के लिये ई, अन, नी प्रत्यय प्रमुख- शेर > शेरनी, माली 
    > मालन, जाट > जाटनी, अहीर 
    > अहीरन

    स्त्रीलिंग के लिये ई, इया, आइन तथा आनी प्रत्यय- गोरी, ललाइन, देवरानी, अखियाँ/बिटिया। कहीं-कहीं नपुंसकलिंग का प्रयोग भी, जैसे- सोना > सोनो।

    प्रायः इया परसर्ग (बिटिया); ई, इनि, इनी, अनी, नी परसर्ग भी (बकरी, बाघिनि, साधिनी, महारानी, चोरनी)
     वचन व्यवस्था पुल्लिंग ब.व. में ‘ए’ प्रत्यय - बेटा > बेटे; स्त्रीलिंग ब.व. में ‘याँ’, ‘एँ’ प्रत्यय-> रोटी > रोटियाँ, किताब > किताबें

    एँ, अन, इन प्रत्ययों का प्रयोग किताब 
    > किताबें, किताबन, रोटी > रोटिन

    एँ, न तथा न्हि प्रत्ययों का प्रयोग(i) एँ ->बात > बातें, 
    (ii) न ->लरिका > लरिकन, 

    (iii) न्ह, न्हि- सबन्हि, जुवतिन्ह 

    क्रिया व्यवस्था

    वर्तमानकाल  ‘ऊ’ रूप -> जाऊँ हूँ; ‘व’ रूप -> जावै है! 

    त रूप ->करत, उठत, जात 

    त रूप -> करत, बैठत 
    भूतकाल  ‘या’ रूप -> चल्या, गया, कर्या 

    औ रूप ->कियौ, उठौ;  न रूप->लीना, दीनी

    स रूप -> कीन्हेसि; व रूप - आवा, जावा 
    भविष्यकाल  ‘गा’ रूप (द्वित्वीकृत) -> ‘जाऊंग्गा’  

    ग रूप -> करैगो;->ह रूप -> करिहैं, मरिहैं

    ब रूप -> जाब, चलब;->ह रूप 
    -> करहिं, चलहिं

    सहायक क्रियाएँ  वर्तमान -> ह, स -> है, सै भूत -> या -> होयाभविष्य -> गा -> होवेगा

    वर्तमान- ह रूप (हैं/हौं);भूतकाल - त रूप (हुतौ, हुती)भविष्य- ‘ग’ (होवैगो)

    वर्तमान->  ह - हओं, आहि भूतकाल -> भ -> भएउ, भए, भइलभविष्य -> ब - होब, होबउ
    संज्ञार्थ क्रियाएँ  ण रूप - जाण, करण 

    न रूप - चलन, खेलन 

    बो, इबो - जाइबो 
    कारक व्यवस्था

    विभक्ति/परसर्ग  होते हैं

    होते हैं

    कहीं-कहीं नहीं होते, जैसे- "राम दरस मिटि गई कलुषाई"
    कर्त्ता  ने, नै, णे ->

    केवल भूतकालिक सकर्मक क्रिया में ‘ने’, नै

    कोई परसर्ग/विभक्ति नहीं
    कर्म को, ने

    कु, कूँ, को

    का, के, कूँ, कः

    संबंध  का, के, की, रा, रे, री

    प्रायः का, के, की, कभी-कभी केर, केरा

    केर, केरा, केरे अत्यधिक प्रयुक्त; कहीं-कहीं का, के, की
    विशेषण व्यवस्था

    आकारांत विशेषण विकारी हैं  (छोटा > छोटी, छोटे) 

    अन्य विशेषण अविकारी बने रहते हैं, विशेषतः स्त्रीलिंग 

    बहुवचन में पूर्णतः अविकारी रहते हैं, जैसे- मोटी लड़की > मोटी लड़कियाँ (मोटियाँ लड़कियाँ नहीं)

    विशेषण विशेष्यानुसार विकारी होते हैं, जैसे- कालो छोरो > काली छोरी, काले छोरे

    विशेषण प्रायः अविकारी बने रहते हैं, जैसे- छोट लरकवा, छोट बिटिया

    • खड़ी बोली के सभी स्वर दक्खिनी हिंदी में मिलते हैं।
    • खड़ी बोली के सभी व्यंजन इसमें भी मिलते हैं। इनके अतिरिक्त, ‘ग़’ तथा ‘फ़’ जैसी ध्वनियाँ अत्यधिक मात्रा में दिखाई देती हैं।
    • ड़ के स्थान पर ड प्रयोग करने की प्रवृत्ति मिलती है, जैसे- पड़ा > पडा आदि।
    • महाप्राण ध्वनियों का अल्पप्राणीकरण काफी ध्वनियों में दिखाई देता है, जैसे- मूरख > मूरक, मुझे > मुजे, धोखा > धोका आदि।
    • कहीं-कहीं अल्पप्राण ध्वनियों का महाप्राणीकरण भी होता है। उदाहरण के लिये- पलक > पलख, पहचान > पछान आदि।
    • एक शब्द की विभिन्न ध्वनियों के विपर्यय की प्रवृत्ति दक्खिनी की एक प्रमुख विशेषता है। उदाहरण के लिये-
    • लखनऊ > नखलऊ, कीचड़ > चीकड़, मतलब > मतबल आदि।
    • सर्वनाम व्यवस्था इस प्रकार है-
      उत्तम पुरुष– मेरेकूँ, हमन, मंज, मुज
      मध्यम पुरुष– तुज, तुमें, आपहिं
      अन्य पुरुष– उनन, उनने
      अन्य सर्वनाम– जित्ता, जित्ती, उत्ता, उत्ती।
    • क्रिया व्यवस्था के प्रमुख प्रयोग इस प्रकार हैं-
      वर्तमान काल– अहै, है, हैं, हूँ, हैगा
      भूतकाल– कह्या, बोल्या, था, थ्या
      भविष्य काल– होगा, होंगे, होंगी, चलसीं, चलसूँ।
    • भूतकाल की क्रियाओं में ‘यकर’ प्रत्यय का प्रयोग भी काफी मात्रा में होता है, जैसे- आकर > आयकर, रोकर > रोयकर आदि।
    • दक्खिनी हिंदी में आरंभिक काल में खड़ी बोली की शब्दावली ही सर्वाधिक प्रचलित रही। इसमें फारसीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती गई। इसके अतिरिक्त, मराठी, तेलुगू और कन्नड़ के स्थानीय शब्द भी सीमित मात्रा में शामिल होते गए।

    हिंदुस्तानी

    • हिंदुस्तानी शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- ‘हिंदुस्तान + ई’।
    • धीरेन्द्र वर्मा, ग्रियर्सन आदि विद्वानों का मत है कि यह नाम अंग्रेज़ों ने दिया है।
    • ‘तुज़ुक-ए-बाबरी’ में भाषा के अर्थ में हिंदुस्तानी शब्द का प्रयोग हुआ है। प्रारंभ में यह शब्द ‘हिंदी’ या ‘हिंदवी’ का समानार्थी था, किंतु आगे चलकर इसका वह अर्थ हो गया जो आज उर्दू का है।
    • हिंदुस्तानी में तद्भव तथा बहुप्रचलित संस्कृत तत्सम और अरबी-फारसी के वे शब्द होते हैं, जो बोलचाल में भी प्रयुक्त होते हैं।
    • हिंदी की वह शैली जो दक्षिण भारत में विकसित हुई ‘दक्खिनी’ कहलाई।
    • सन 1327 ई. में दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा राजधानी को दिल्ली से लगभग 1400 किमी. दूर दक्षिण में दौलताबाद ले जाने का फरमान जारी किया गया। इससे दिल्ली और आसपास के इलाकों के समस्त महत्त्वपूर्ण और अनेक सामान्य लोग-जिनमें राजदरबारी, मंत्री, सैनिक, व्यापारी, ज्योतिषी, शिल्पकार, सूफी संत तथा फकीर आदि शामिल थे- दक्षिण भारत जाकर बस गए।
    • चूँकि अधिकांश लोगों की भाषा हरियाणवी या खड़ी बोली ही थी, अतः दक्षिण में भी इनके लिये सामान्य बोलचाल की भाषा वही रही।
    • सूफी संतों तथा मुस्लिम फकीरों ने भी अपनी मूल भाषा जिसमें अवधी, ब्रज, पंजाबी, हरियाणवी बेलियाँ तथा अरबी-फारसी मिश्रित शब्दावली थी– में धर्म-प्रचार किया। इसी मिश्रित भाषा को कालांतर में ‘दक्खिनी’ कहा गया।
    • ‘दक्खिनी’ का संबंध दक्कन से जुड़ता है। दक्कन नर्मदा के पार का क्षेत्र था, जिसमें महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना तथा कर्नाटक के कुछ हिस्से आते थे। इसी को उत्तर भारत के लोगों ने ‘दक्खिन’ कहा तथा इस भू-भाग में बोली जाने वाली मिश्रित हिंदी ‘दक्खिनी’ कहलाई। यह मूलतः हिंदी का ही एक पूर्व रूप है।
    • धीरे-धीरे दक्खिनी की पहुँच केरल और तमिलनाडु के इलाकों तक भी हो गयी।
    • ‘दक्खिनी’ का विकास दक्खिन के बहमनी तथा परवर्ती शासकों के संरक्षण में हुआ। बहमनी शासन में तो ‘दक्खिनी’ को राजभाषा के पद पर सुशोभित किया गया।
    • मध्यकाल में दक्खिन के दो राजवंशों– आदिलशाही (1400-1686 ई.) तथा कुतुबशाही (1508-1687 ई.) में अनेक प्रतिष्ठित कवि हुए। उनकी कालजयी रचनाओं के कारण ही इस काल को ‘दक्खिनी का स्वर्णयुग’ कहा जाता है।
    • दक्खिनी आम तौर पर फारसी लिपि में ही लिखी जाती थी।
    • दक्खिनी हिंदी के अन्य नाम हैं- दकनी, देहलवी, हिन्दवी, गूजरी।
    • हैदराबाद में दक्खिनी हिंदी का एक विशिष्ट रूप प्रचलित है जिसे ‘हैदराबादी हिंदी’ कहा जाता है।
    • ‘गूजरी’ इसका वह रूप है जो गुजरात के कवियों के साहित्य में प्रयुक्त है, यथा- मुहम्मद शाह कादरी के काव्य में।
    • दक्खिनी हिंदी के प्रमुख स्थान आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक व मद्रास हैं।
    • दक्खिनी हिंदी की मुख्य उपबोलियाँ हैं- गुलबर्गी, बीदरी, बीजापुरी, हैदराबादी।
    • दक्खिनी की अधिकांश गद्य रचनाएँ मुस्लिम सूफी संतों तथा फकीरों द्वारा की गयी हैं। इनमें ख्वाज़ा बंदा नेवाज़ गेसूदराज, शाहमीरां जी, शाह बुरहानुद्दीन जानम, शरफुद्दीन-बू-अली कलंदर, सैयद हुसैन अली, मुहम्मद शाह कादरी, मुहम्मद शरीफ़ आदि प्रमुख हैं।
    • दक्खिनी हिंदी के गद्य के विकास को तीन चरणों में बाँटा गया है–
    • प्रारंभिक काल (1300-1400 ई.)
    • मध्यकाल (1401-1687 ई.)
    • उत्तरकाल (1688-1850 ई.)
    • प्रारंभिक गद्य काल का सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम ‘ख्वाजा बंदा नेवाज़ गेसूदराज़’ (1318-1422 ई.) है।
    • मध्यकाल में सुप्रसिद्ध गद्यकार मुल्लावजही हुए।
    • तीसरे चरण (उत्तर काल) के लेखकों ने भी मुल्लावजही की ही परंपरा को आगे बढ़ाया। इनमें सैयद हुसैन अली खाँ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
    • शरफुद्दीन-बू-अली कलंदर दक्खिनी का एक बड़ा नाम है।
    • दक्खिनी में गज़ल रचनाएँ भी मिलती हैं। कुली कुतुबशाह की प्रसिद्ध गज़ल की पंक्तियाँ हैं–

    "पिया बाज़ प्याला पिया जाए ना,

    पिया बाज़ एक पल जिया जाए ना।

    मैं कैसे पिया बिन सबूरी करूँ,

    खया जाए अमां, किया जाए ना।

    नहीं इश्क जिस वह बड़ा कूड़ है,

    कंघी उससे मिल बैसिया जाए ना।

    कुतुबशाह न दे मुंज दिवाले कूँ पंद

    दिवाले कूँ कुच पर दिया जाए ना।"

    • खड़ी बोली, दक्खिनी हिंदी के सर्वाधिक निकट मानी जाती है।
    • बुरहानुद्दीन जानम ‘इरशादनामा’ में दक्खिनी को हिन्दी बताते हुए कहते हैं–

                        "ये बस बोलूं हिन्दी बोल, पन तूं अनभौ खेती खोल।"

    • कालांतर में ‘दक्खिनी’ पर उर्दू हावी हो गयी और इसकी अपनी विशेषता धीरे-धीरे लुप्त हो गयी।

    बुंदेली

    • बुंदेली बुंदेलखंड की बोली है। बुंदेलखंड नाम बुंदेला राजपूतों के आधिपत्य के कारण पड़ा।
    • भू-भाग की व्यापकता की दृष्टि से बुंदेली पश्चिमी हिंदी की सबसे व्यापक बोली है।
    • ग्रियर्सन ने बुंदेली की अनेक उपबोलियों का उल्लेख किया है। इनमें लोधांती, पंवारी, बनाफरी, खटोला, निभह, कुंदी, भदौरी तथा दक्षिण की मिश्रित बोलियाँ शामिल हैं।
    • साहित्यिक दृष्टि से बुंदेली काफी संपन्न है। राजपूतों के समय में इसे राजकीय संरक्षण भी प्राप्त हुआ।
    • छत्रसाल बुंदेला के कहने पर लालकवि ने ‘छात्रप्रकाश’ की रचना बुंदेली में की।
    • केशवदास और पद्माकर जैसे प्रसिद्ध कवि बुंदेली क्षेत्र से आते हैं। यद्यपि उनकी रचनाएँ बुंदेली से प्रभावित ब्रजभाषा में हैं।
    • बुंदेली में लोक साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में है। ‘ईशुरी के फाग’ बहुत प्रसिद्ध है।
    • ‘आल्हा’ एक प्रसिद्ध लोकगाथा है, जिसे बुंदेली की ही एक उपबोली ‘बनाफरी’ में लिखा गया है।
    • धीरेंद्र वर्मा मानते हैं कि ‘बुंदेली’, कन्नौजी के समान ही ब्रज की एक उपबोली है।
    • इसके उच्चारण में अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति मिलती है, जैसे- आधा > आदा, दूध > दूद आदि।

    कन्नौजी

    • ‘कन्नौजी’ शब्द संस्कृत के ‘कान्यकुब्ज’ शब्द से विकसित हुआ है। (कान्यकुब्ज >कण्णउज्ज >कन्नौज)
    • कन्नौजी का केंद्र उत्तर प्रदेश का जनपद कन्नौज है।
    • कन्नौज का पुराना नाम पांचाल था इसलिये कन्नौजी को ‘पांचाली’ भी कहा जाता है।
    • कन्नौजी अपने परिनिष्ठित रूप में कन्नौज तथा आसपास के ज़िलों में बोली जाती है।
    • कन्नौजी अवधी, ब्रज तथा बुंदेली से घिरी हुई है। अपने सीमाई क्षेत्रों में कन्नौजी पर इन बोलियों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
    • कुछ विद्वान कन्नौजी को ब्रजभाषा का ही रूप मानते हैं। डॉ. धीरेंद्र वर्मा इनमें से एक हैं। जबकि ग्रियर्सन ने इसे अलग बोली माना है।
    • इस बोली में मध्यम ‘ह’ का लोप हो जाता है, जैसे- जाहि > जाइ, करहु > करउ आदि।
    • हिंदी की अंतिम महाप्राण ध्वनि का यहाँ अल्पप्राणीकरण हो जाता है, जैसे- हाथ > हाँत आदि।
    • कन्नौजी में अनुनासिकीकरण की प्रवृत्ति अत्यधिक मात्रा में मिलती है, जैसे- बात > बाँत आदि।

    हरियाणी (हरियाणवी)

    • इसका मूल संबंध हरियाणा राज्य से है।
    • ग्रियर्सन ने इसे बांगरु कहा।
    • धीरेंद्र वर्मा ने हरियाणी को स्वतंत्र बोली नहीं मानकर खड़ी बोली का ही एक रूप माना है।
    • हरियाणी कई बोलियों से घिरी हुई है। इनमें खड़ी बोली, अहीरवाटी तथा मारवाड़ी शामिल है।
    • हरियाणी को ‘पंजाबी’ से प्रभावित भी माना जाता है।
    • हरियाणा और उसके आसपास के क्षेत्रों में जाटों का बाहुल्य है। इसलिये हरियाणी को ‘जाटू’ भाषा भी कहते हैं।
    • हरियाणी में ‘लोक साहित्य’ पर्याप्त मात्रा में है किंतु लिखित साहित्य अपेक्षाकृत कम है।

    ‘पश्चिमी हिंदी’ हिंदी भाषा का सबसे बड़ा उपवर्ग है, जिसका क्षेत्र अंबाला से कानपुर तक तथा देहरादून से महाराष्ट्र के आरंभ तक विकसित है।

    इसकी बोलियाँ निम्नलिखित हैं-

    ब्रजभाषा

    • ब्रज का अर्थ है- पशुओं या गायों का समूह या चरागाह। पशुपालन की अधिकता के कारण यह क्षेत्र ब्रज कहलाया और इसकी बोली ब्रजभाषा।
    • ब्रज या ब्रजी के एक बोली होने पर भी मध्ययुग में हिंदी प्रदेश से बाहर पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में इसका प्रयोग हुआ और इसमें साहित्य रचा जाता रहा, इस कारण भाषा शब्द ब्रज के साथ जुड़ गया और ‘ब्रजभाषा’ शब्द बना।
    • इस बोली का आरंभिक रूप आदिकालीन साहित्य में ‘पिंगल’ तथा मध्यकाल में ‘भाखा’ नाम से मिलता है।
    • भूक्सा, अंतर्वेदी, भरतपुरी, डांगी, माथुरी ब्रजभाषा की मुख्य उपबोलियाँ हैं तथा ग्वालेरी, मध्यदेशी, जादोबाटी आदि अन्य उपबोलियाँ हैं।
    • 1354 ई. में सुधीर अग्रवाल द्वारा रचित ‘प्रद्युम्नचरित’ ब्रजभाषा की प्राचीनतम ज्ञात कृति मानी जाती है।
    • बंगाली कवि ईश्वरचन्द्र गुप्त ने ‘ब्रजबुलि’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया था। बंगाल और असम में ब्रजभाषा से प्रभावित बांग्ला और असमिया को ‘ब्रजबुलि’ कहा जाता था।
    • ब्रजभाषा का विकास तीन कालों में विभाजित किया गया है।
    • आरंभ से 1525 ई. तक आदिकाल, 1525 से 1800 ई. तक मध्यकाल और 1800 ई. से अब तक आधुनिक काल।
    • हेमचंद्र के ‘प्राकृत व्याकरण’ में शौरसेनी अपभ्रंश के दोहों में ब्रजभाषा का पूर्वरूप मिलता है।
    • संक्रमणकालीन रचनाओं जैसे ‘संदेशरासक’ तथा ‘प्राकृत पैंगलम’ आदि में पुरानी ब्रजभाषा मिलती है।
    • दक्षिण में केरल के महाराजा रामवर्मा ने ब्रजभाषा में रचनाएँ कीं। वे ‘स्वाति तिरुनाल’ नाम से लिखते थे।
    • कच्छ के महाराजा ‘राव लखपत सिंह’ ने 1749 ई. में ‘ब्रजभाषा काव्यशाला’ की स्थापना की। इसका उद्देश्य नवोदित कवियों को ब्रजभाषा में काव्य-रचना सिखाना था।
    • डॉ. धीरेंद्र वर्मा तो पृथ्वीराज रासो की भाषा को भी ब्रजभाषा ही मानते हैं– "पृथ्वीराज रासो मध्यकालीन ब्रजभाषा में ही लिखा गया है, पुरानी राजस्थानी में नहीं, जैसा कि साधारणतया इस विषय में माना जाता है।"

    खड़ी बोली

    • सुनीति कुमार चटर्जी ने खड़ी बोली को ‘मर्दानी भाषा’ तथा जनपदीय हिंदुस्तानी* कहा।
    • ग्रियर्सन ने खड़ी बोली को ‘देशी हिंदुस्तानी’ अथवा ‘वर्नाक्युलर हिंदुस्तान’ की संज्ञा दी है।
    • महामति प्राणनाथ ने खड़ी बोली के नवीन रूप को सर्वप्रथम ‘हिंदुस्तानी’ की संज्ञा दी।
    • बीम्स, सुनीति कुमार चटर्जी, धीरेंद्र वर्मा आदि भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार खड़ी बोली का आधार कौरवी है।
    • खड़ी बोली मानक हिंदी का आधार कोलबुक ने ‘कन्नौजी’ को माना, इस्टाविक तथा मुहम्मद हुसैन ने ‘ब्रजभाषा’ को माना और मसऊद हसन खाँ ने ‘हरियाणी’ को माना है।

    विद्वानों के अनुसार खड़ी बोली का अर्थ

    विद्वान 

    खड़ी बोली का अर्थ 

    सुनीति कुमार चटर्जी 

    कामताप्रसाद गुरु 

    अब्दुल हक 

    गिलक्राइस्ट 

    किशोरीदास वाजपेयी 

    अन्य भाषा वैज्ञानिक 

    सीधी’ 

    कर्कश’ 

    गँवारू 

    मानक या परिनिष्ठित 

    खड़ी ‘पाई’ से संबंधित 

    खरी या शुद्ध 

    • वर्तमान हिंदी, उर्दू, हिंदुस्तानी और दक्खिनी कुछ सीमा तक खड़ी बोली पर आधारित हैं।
    • पूर्वी हिंदी का क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ तक फैला हुआ है।
    • प्राचीन समय में जिस क्षेत्र को उत्तरी कोसल तथा दक्षिणी कोसल कहा जाता था, वही क्षेत्र पूर्वी हिंदी का क्षेत्र है।
    • इसकी सीमाओं का निर्धारण कानपुर से मिर्ज़ापुर तथा लखीमपुर से बस्तर तक किया जाता है।
    • ‘पूर्वी हिंदी’ के अंतर्गत तीन बोलियाँ हैं– अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी।

    अवधी

    • मध्यदेशीय अवहट्ट से अवधी का उदय माना जाता है।
    • ‘अवधी’ अवध क्षेत्र में बोली जाती है। अवध अयोध्या का तद्भव रूप है।
    • लखनऊ मंडल के जनपदों में ही सामान्यतः इसका प्रयोग होता है। ‘हरदोई’ अपवाद है।
    • इस बोली के लिये ‘कोसली’, ‘बैसवाड़ी’ शब्दों का प्रयोग भी होता है।
    • ‘कोसल’ अवध का पुराना नाम था। अतः वहाँ की बोली ‘कोसली’ कहलाई।
    • अवध के क्षेत्र में ‘बैस’ राजपूतों का वर्चस्व था और उनकी बोली ‘बैसवाड़ी’ कहलाई। बैसवाड़ी रायबेरली और उन्नाव के बीच के हिस्से में बोली जाती है।
    • ‘प्राकृत पैंगलम’ में पुरानी अवधी के रूप मिलते हैं।
    • पंडित दामोदर शर्मा कृत ‘उक्तिव्यक्तिप्रकरण’ में यह कोसली के रूप में मिलती है।
    • ‘कुवलयमाला कहा’ में उद्यतन सूरि ने कोसली का प्रयोग ‘देशी भाषा’ के रूप में किया है।
    • बैसवाड़ी, मिर्ज़ापुरी तथा बघौनी डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार, अवधी की मुख्य उपबोलियाँ हैं।
    • फिजी, त्रिनिदाद, गुयाना, मॉरीशस, दुबई आदि देशों में कुछ लोग अवधी में बातचीत भी करते हैं।
    • अवधी के विकास को तीन कालखंडों में विभाजित किया गया है–
    • प्रारम्भ से 1400 ई. तक आदिकाल, 1400 ई. से 1700 ई. तक मध्यकाल और 1700 ई. से अब तक आधुनिक काल।
    • मध्यकाल में अवधी ने प्रौढ़ता को प्राप्त किया। अवधी के दो सबसे बड़े कवि तुलसी और जायसी इसी काल में हुए।
    • तुलसी ने अवधी को गाँव की भाषा कहा है|

    बघेली

    • बघेली का विकास अर्धमागधी अपभ्रंश के एक क्षेत्रीय रूप से हुआ है।
    • रीवा के आसपास का क्षेत्र बघेल राजपूतों के वर्चस्व के कारण बघेलखंड कहलाया और यहाँ पर बोली जाने वाली बोली बघेलखंडी या बघेली कहलाई।
    • रीवा नदी के क्षेत्र में उद्भव के कारण बघेली को रीवाई भी कहते हैं।
    • जुड़ार, गहोरा तथा तिरहारी बघेली की उपबोलियाँ हैं।
    • बाबूराम सक्सेना ‘बघेली’ को ‘अवधी’ की ही एक उपबोली मानते हैं।
    • बघेली को ‘दक्षिणी अवधी’ भी कहा जाता है।
    • अवधी और बघेली में बहुत-सी समानताएँ हैं।
    • लोक साहित्य की दृष्टि से बघेली संपन्न बोली है परंतु इसमें लिखित साहित्य का अभाव-सा है।
    • रीवा नरेश महाराजा विश्वनाथ सिंह द्वारा रचित ‘परमधर्म निर्णय’ बघेली बोली की महत्त्वपूर्ण कृति है।
    • बघेली में सामान्यतः आरंभिक स्वर का लोप रहता है तथा व्यंजनों में ‘व’ का ‘म’ और ‘व’ का ‘ब’ मिलता है।

    छत्तीसगढ़ी

    • छत्तीसगढ़ी का उदय अर्धमागधी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से हुआ है।
    • छत्तीसगढ़ी बोली वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य की भाषा है। इतिहास में इस क्षेत्र को दक्षिणी कोसल भी कहा गया है।
    • छत्तीसगढ़ी को ‘लरिया’ या ‘खल्टाही’ भी कहते हैं।
    • सरगुजिया, सदरी, बैगानी, बिंझवाली मुख्य उपबोलियाँ हैं।
    • भोजपुरी, मगही, बघेली, मराठी, उड़िया भाषी क्षेत्रों से घिरा होने के कारण इनका प्रभाव स्पष्ट रूप से छत्तीसगढ़ी पर देखा जा सकता है।
    • छत्तीसगढ़ी में कुछ शब्दों में महाप्राणीकरण का प्रचलन दिखायी देता है। जैसे- इलाका-इलाखा
    • इसमें अघोषीकरण की प्रवृत्ति मिलती है। जैसे- शराब-शराप,खराब-खराप, बंदगी-बंदकी आदि।
    • इसमें ‘स’ के स्थान पर ‘छ’ तथा ‘छ’ की जगह बोला जाता है। जैसे- सीतापुर-छीतापुर; छेना-सेना।
    • पहाड़ी हिंदी उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों- मुख्यतः कुमाऊँ तथा गढ़वाल में बोली जाती है।
    • ‘पहाड़ी हिंदी’ पर आर्यभाषा संस्कृत, तिब्बती, चीनी तथा खस का भी प्रभाव रहा है। इसकी साहित्यिक परंपरा नहीं मिलती है।
    • इस उपवर्ग की बोलियों में सानुनासिक स्वरों की प्रधानता है।
    • इसकी बोलियाँ प्रायः ओकारांत हैं, यथा- घोड़ो, कालो, चल्यो आदि।
    • ‘पहाड़ी हिंदी’ के अंतर्गत दो बोलियाँ आती हैं– कुमाऊँनी और गढ़वाली।

    कुमाऊँनी

    • नैनीताल, अल्मोड़ा तथा पिथौरागढ़ क्षेत्र का पारंपरिक नाम कूर्मांचल है जिसे कुमाऊँ कहते हैं। इसकी बोली कुमाऊँनी है।
    • खसपरजिया, कुमैयाँ, फल्दकोटिया, पछाईं, चौगरखिया, गंगोला, दानपुरिया, सीराली, सोरियाली, अस्कोटी, जोहारी, रउचोभैंसी, भोटिया आदि कुमाऊँनी की उपबोलियाँ हैं।
    • कुमाऊँनी बोली दरद, खस, राजस्थानी तथा खड़ी बोली हिंदी से प्रभावित है।
    • राजस्थानी के प्रभाव के कारण ‘ण’ और ‘ळ’ ध्वनियाँ भी शामिल हैं। कौरवी के प्रभाव के कारण अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है।
    • तिब्बत-चीनी परिवार की भाषाओं जैसे-‘किरज’ तथा ‘भोट’ का प्रभाव भी कुमाऊँनी पर रहा है।
    • कुमाऊँनी लोक साहित्य की दृष्टि से संपन्न है।
    • कुमाऊँनी में प्राचीन साहित्य तो नहीं मिलता किंतु आधुनिक काल में पर्याप्त रूप से साहित्य-सृजन हो रहा है।
    • पुल्लिंग एकवचन में ‘ओ’ का बहुवचन रूप कुमाऊँनी में ‘न’ होता है; यथा- घोड़ो-घोड़न आदि।
    • कुमाऊँनी में कारक चिह्नों के रूप में कर्त्ता के साथ ‘ले’ कर्म के साथ ‘कणि’ तथा करण के साथ ‘थे’ का प्रयोग होता है।
    • सहायक क्रिया ‘छ’ रूप में प्रयुक्त होती है।

    गढ़वाली

    • बावन गढ़ियों में बँटे होने के कारण ‘केदारखंड’ क्षेत्र को गढ़वाल कहा जाता है और यहाँ की बोली ‘गढ़वाली’ कहलाती है।
    • उत्तराखंड राज्य के टिहरी गढ़वाल की बोली गढ़वाली का आदर्श रूप मानी जाती है।
    • गढ़वाली बोली में भोटिया, शक, किरात, नागा और खस जातियों की भाषाओं के अनेक तत्त्व शामिल हैं।
    • इस पर पंजाबी और राजस्थानी का प्रभाव दिखाई पड़ता है।
    • गढ़वाली में लोकसाहित्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
    • वर्तमान में गद्य तथा पद्य की विभिन्न विधाओं में गढ़वाली साहित्य लिखा जा रहा है।
    • स्वरों के अनुनासिकीकरण की प्रवृत्ति इसमें बहुतायत दिखाई पड़ती है; यथा- छायाँ, दैंत, पैंसा आदि।
    • कारक चिह्नों के रूप में कर्त्ता के साथ ‘ल’, कर्म के साथ ‘कूँ’, ‘कुणी’ तथा करण के साथ ‘से’, ‘तीं’ परसर्गों का प्रयोग होता है।

    ग्रियर्सन ने तीन बोलियों को बिहारी हिंदी माना है– भोजपुरी, मगही और मैथिली। 

    • बिहारी हिंदी को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है– ‘पूर्वी बिहारी’ तथा ‘पश्चिमी बिहारी’। 
    • मैथिली और मगही पूर्वी बिहारी की, जबकि भोजपुरी पश्चिमी बिहारी की बोली है। 

    भोजपुरी 

    • भोजपुरी का बोली के अर्थ में सर्वप्रथम प्रयोग 1789 ई. में काशी के राजा चेतसिंह के सिपाहियों की बोली के लिये हुआ। 
    • भोजपुरी का केंद्र बिहार प्रांत का भोजपुर ज़िला है। 
    • भोजपुर के ही नाम पर इस बोली का नाम भोजपुरी पड़ा। 
    • बिहारी हिंदी उपभाषा की सबसे अधिक बोले जानेवाली बोली भोजपुरी है। 
    • बिहारी हिंदी उपवर्ग की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बोली भोजपुरी है। 
    • लोकप्रचलन की दृष्टि से यह हिंदी की सबसे बड़ी बोली है। 
    • भोजपुरी में लोकसाहित्य का व्यापक भंडार है। इसमें लोकगीतों की समृद्ध मौखिक परंपरा चली आई है। 
    • भारत के बाहर भी मॉरिशस, फिजी आदि देशों में यह अत्यधिक प्रचलित है। 
    • भिखारी ठाकुर भोजपुरी के सबसे प्रसिद्ध लोककवि और नाटककार हैं। इन्होंने ‘बिदेसिया’ सहित बारह नाटकों की रचना की है। इन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा जाता है। 
    • महेंद्र मिसिर भोजपुरी लोकसाहित्य का अन्य बड़ा नाम है। इनके पूरबी लोकगीत, विवाह के विदाई गीत तथा मुजरे अत्यंत लोकप्रिय हैं। 
    • भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद तथा जयशंकर प्रसाद आदि साहित्यकार इसी क्षेत्र से संबंधित हैं। हालांकि उन्होंने साहित्य में इसका प्रयोग नहीं किया। 

    मगही 

    • मगही या मागधी का अर्थ है ‘मगध’ की भाषा। मगही शब्द मागधी का विकसित रूप है। 
    • बिहार का पटना जनपद मगही का केंद्र है। 
    • पटना की मगही उर्दू, भोजपुरी तथा मैथिली से प्रभावित है। 
    • मगही का परिनिष्ठित रूप गया ज़िले में प्रयुक्त होता है। 
    • बिहार की सीमाओं का प्रभाव मगही पर भी पड़ता है। पश्चिमी सीमा की मगही भोजपुरी से, पूर्वी सीमा की मगही बंगाली से तथा दक्षिणी सीमा की मगही उड़िया से प्रभावित है। 
    • लोकसाहित्य मगही में पर्याप्त भाषा में उपलब्ध है। इसमें ‘लोरिक’ और ‘गोपीचंद’ के लोकगीत बहुत लोकप्रिय हैं। 
    • मगही में अधिकरण कारक में ‘मों’ का प्रयोग तथा सर्वनाम में ‘आप’ का प्रयोग होता है। 

    मैथिली 

    • मैथिली का उद्भव मागधी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से हुआ है।  
    • मिथिला की बोली को मैथिली कहा जाता है। 
    • मिथिला भोजपुरी क्षेत्र के पूर्व तथा मगध क्षेत्र के उत्तर में स्थित है। 
    • उत्तरी मैथिली, दक्षिणी मैथिली, पूर्वी मैथिली, पश्चिमी मैथिली, छिकाछिकी और जोलहा– मैथिली की छः उपबोलियाँ हैं। 
    • साहित्यिक दृष्टि से मैथिली बिहारी हिंदी की सबसे संपन्न बोली है। 
    • मैथिली में आदिकाल से ही श्रेष्ठ साहित्य रचा जाता रहा है। 
    • मैथिली कोकिल’ विद्यापति ने पदावली की रचना मैथिली में की। 
    • मैथिली संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है। 
    • मैथिली में ‘छ’ और ‘ल’ ध्वनियों का अत्यधिक प्रयोग होता है। 
    • एकवचन और बहुवचन रूपों में अंतर दिखाने के लिये सब, सबहि, लोकन जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। 
    • मैथिली में प्रयुक्त सर्वनाम हैं- अहाँ, ओकर, एकर आदि। 
    • इसकी क्रियाओं में कोई लिंगभेद नहीं होता। 
    • राजस्थानी हिंदी उपभाषा राजस्थान, मालवा जनपद और सिंध के कुछ क्षेत्रों तक फैली है।
    • इसको लगभग 4 करोड़ लोग बोलते हैं।
    • ‘राजस्थानी हिंदी’ उपभाषा ‘ट’ वर्ग बहुला उपभाषा है। मराठी में प्रयुक्त ‘ळ’ ध्वनि भी इसमें प्रयुक्त होती है।
    • इसमें पुल्लिंग एकवचन शब्द प्रायः ओकारांत होते हैं, यथा- हुक्को, तारो आदि।
    • पुल्लिंग और स्त्रीलिंग शब्दों के बहुवचन में अंत में ‘आँ’ का प्रयोग होता है, यथा- ताराँ, राताँ आदि।
    • इसमें ‘को’ परसर्ग के स्थान पर ‘नै’ तथा ‘से’ परसर्ग के स्थान पर ‘सूँ’ का प्रयोग होता है।
    • राजस्थानी हिंदी उपभाषा के अंतर्गत चार बोलियाँ आती हैं-
      (i) मारवाड़ी (ii) जयपुरी (iii) मालवी (iv) मेवाती
    • मारवाड़ी
      • मारवाड़ी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश के नागर रूप से हुआ है।
      • राजस्थानी हिंदी की चारों बोलियों में मारवाड़ी प्रमुख बोली है। यह पश्चिमी राजस्थान तथा पाकिस्तान के सिंध राज्य के पूर्वी भाग में बोली जाती है।
      • मेवाड़ी, सिरोही, बागड़ी, थली, शेखावटी आदि ‘मारवाड़ी’ की प्रमुख उपबोलियाँ हैं।
      • पुरानी मारवाड़ी को ही ‘डिंगल’ कहा जाता है।
      • उद्यतन सूरि कृत ‘कुवलयमाला कहा’ में ‘मरुभाषा’ नाम से ‘मारवाड़ी’ का उल्लेख हुआ है।
      • आदिकालीन चारण कवियों द्वारा वीरगाथा काव्य इसी शैली में लिखे गए।
      • मारवाड़ी बोली लोक साहित्य की दृष्टि से बहुत समृद्ध है। इसमें शृंगार, वीर, भक्ति तथा नीतिपरक साहित्य का भंडार है।
      • मारवाड़ी में देशज तथा तद्भव शब्दों की बहुलता है। जैसे- डीकरो (पुत्र), करसो (किसान), गण्डक (कुत्ता), माची (खाट), जीमणो (भोजन करने वाला) आदि।
      • मीरा के पद कहीं ‘ब्रजभाषा’ और कहीं ‘मारवाड़ी’ में हैं।
      • पहले मारवाड़ी की लिपि महाजनी थी किंतु अब यह देवनागरी में लिखी जा रही है।
    • जयपुरी (ढूँढाणी)
      • जयपुरी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से हुआ है।
      • यह पूर्वी राजस्थान के इलाकों में बोली जाती है तथा इसका केंद्र जयपुर है।
      • जयपुर का पुराना नाम ढूँढ़ाण है, इस कारण से जयपुरी को ढूँढ़ाणी भी कहते हैं।
      • ‘ढूँढाणी’ शब्द ‘ढूँढ़’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- टीला। इस इलाके में टीलों की अधिकता है।
      • हाड़ौती, तोरावटी, काठँड़ा, चौरासी, अजमेरी, जयपुरी की उपबोलियाँ हैं।
      • ‘हाड़ौती’ इसकी प्रमुख उपबोली है जो कोटा, बूँदी, बारन और झालवाड़ में बोली जाती है।
      • इस इलाके में एक समय पर ‘हाड़ा’ राजपूतों का प्राधान्य था जिस कारण उनकी बोली का ‘हाड़ौती’ पड़ा।
      • हाड़ौती पर मेवाड़ी और मालवी का प्रभाव दिखाई देता है।
      • ढूँढाणी में गद्य तथा पद्य साहित्य का प्रचुर भंडार है।
      • संत कवियों में दादू तथा उनके शिष्यों ने ढूँढाणी में ही रचनाएँ कीं।
    • मालवी
      • मालवी दक्षिणी राजस्थान की प्रतिनिधि बोली है।
      • इसका विस्तार राजस्थान के झालवाड़ से मध्यप्रदेश के मालवा इलाके तक है।
      • लंबे समय तक उज्जैन के आस-पास का क्षेत्र ‘मालव’ या ‘मालवा’ नाम से प्रसिद्ध रहा, इस कारण यहाँ की बोली को ‘मालवी’ कहते हैं।
      • मालवी बोली का अधिकांश क्षेत्र मध्यप्रदेश में है किंतु इसकी भाषागत विशेषताओं के कारण इसे ‘राजस्थानी’ में रखा जाता है।
      • ‘मालवी’ को बुंदेली और मारवाड़ी के बीच का पुल माना जाता है।
      • सोंडवाड़ी, राँगड़ी, पाटबी, रतलामी आदि मालवी की मुख्य उपबोलियाँ हैं।
      • इसमें शब्द के शुरू के अक्षर में स्वर का दीर्घीकरण किया जाता है, यथा- लकड़ी - लाकड़ी, कपड़ा - कापड़ा आदि।
      • ‘ऐ’ तथा ‘औ’ के स्थान पर ‘ए’ तथा ‘ओ’ का प्रयोग होता है।
      • मालवी के प्रमुख सर्वनाम हैं- के (कौन), कीने (किसने), के (क्या) आदि।
      • कारको में कर्म के साथ ‘खे’ तथा करण के साथ ‘ती’ का प्रयोग होता है।
    • मेवाती
      • मेवाती बोली ‘मेव’ जाति के निवास स्थान मेवात क्षेत्र की बोली है।
      • मेवाती राजस्थान के उत्तर-पूर्वी इलाके में बोली जाती है।
      • यह राजस्थानी और पश्चिमी हिंदी के बीच सेतु की भूमिका निभाती है।
      • मेवाती की एक मिश्रित उपबोली ‘अहीरवाटी’ है।
      • अहीरवाटी गुड़गाँव, दिल्ली, करनाल के पश्चिमी क्षेत्र आदि में बोली जाती है।
      • अहीरवाटी को बाँगरू (हरियाणी) और मेवाती के बीच की बोली माना जाता है।
      • मेवाती की हरियाणी से निकटता प्रायः विद्वानों ने स्वीकार की है।
      • राठी, नहरे, कठर, गुजरी आदि मेवाती की अन्य उपबोलियाँ हैं।

    बोली 

    नामकरणकर्त्ता 

    कौरवी (खड़ी बोली का नाम) 

    राहुल सांकृत्यायन 

    राजस्थानी (भाषा) 

    ग्रियर्सन 

    डिंगल 

    बाँकीदास 

    ब्रजबुलि 

    ईश्वरचन्द्र गुप्त 

    बिहारी 

    ग्रियर्सन 

    भोजपुरी 

    रेमण्ड 

    मैथिली 

    कोलब्रुक 

    हिंदी की प्रमुख बोलियों का उच्चारणगत वर्गीकरण

    उच्चारणगत विशिष्टता 

    बोली 

    ओकार बहुला 

    ब्रजभाषा, बुँदेली, कन्नौजी, मारवाड़ी, कुमाऊँनी, गढ़वाली, मालवी 

    आकार बहुला 

    कौरवी, दक्खिनी 

    उदासीन आकार बहुला 

    अवधी, बघेली 

    इकार बहुला 

    भोजपुरी 

    • भाषावैज्ञानिक भाषा और बोली के बीच एक और वर्ग को स्वीकारते हैं, जिसे उपभाषा कहते हैं।
    • हिंदी भाषा का वर्गीकरण पाँच उपभाषाओं में किया जाता है।

    इन पाँचों उपभाषाओं तथा बोलियों को आरेख के माध्यम से समझ सकते हैं-

    हिंदी की उपभाषाएँ तथा बोलियाँ

    अपभ्रंश उपभाषा बोली क्षेत्र
    शौरसेनी 











    राजस्थानी हिंदी [टवर्ग बहुला]

    मारवाड़ी जोधपुर, अजमेर, मेवाड़, सिरोही, बीकानेर, जैसलमेर, उदयपुर, चुरू, नागौर, पाली, जालौर, बाड़मेर, पाकिस्तान के सिंध प्रांत के पूर्वी भाग में
    मालवी उज्जैन, इंदौर, देवास, रतलाम, भोपाल, होशंगाबाद, प्रतापगढ़, गुना, नीमच, टोंक
    मेवाती अलवर, गुड़गाँव, भरतपुर
    जयपुरी/ढूँढाणी कोटा, बूँदी, बारन, झालावाड़

    पहाड़ी हिंदी

    कुमाउँनी नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़
    गढ़वाली गढ़वाल, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी के आसपास के क्षेत्र

    पश्चिमी हिंदी

    [ओकार बहुला]

    ब्रजभाषा

    उत्तर प्रदेश मथुरा, आगरा, अलीगढ़, मैनपुरी, एटा, बदायूँ, बरेली

    मध्य प्रदेश ग्वालियर का पश्चिमी भाग

    राजस्थान भरतपुर, करौली, धौलपुर, जयपुर का पूर्वी भाग

    कन्नौजी

    फर्रुखाबाद, कानपुर, हरदोई, पीलीभीत, इटावा, शाहजहाँपुर

    बुंदेली

    झाँसी, जालौन, हमीरपुर, बाँदा, छत्तरपुर, सागर, ग्वालियर, भोपाल, ओरछा, नरसिंहपुर, सिवनी, होशंगाबाद

    [आकार बहुला]

    कौरवी/खड़ी बोली/दहलवी

    कुरु प्रदेश दिल्ली, आगरा, मेरठ, पानीपत, अंबाला आदि। (रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, देहरादून, मुज़फ्फरनगर, पटियाला के पूर्वी भाग)

    हरियाणवी

    दिल्ली, कुरुक्षेत्र, करनाल, जींद, हिसार, रोहतक, नाभा, पटियाला

    दक्खिनी/हिंदवी/गूजरी

    प्रमुख स्थान आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व महाराष्ट्र (अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा, बीदर, बरार, मुंबई)

    अर्धमागधी

    पूर्वी हिंदी

    अवधी/पूर्वी कोसली/बैसवाड़ी

    अयोध्या, लखनऊ, लखीमपुर खीरी, बहराइच, गोंडा, सीतापुर, उन्नाव, फैजाबाद, सुल्तानपुर, रायबरेली, इलाहाबाद, जौनपुर, मिर्ज़ापुर, प्रतापगढ़, बाराबंकी

    बघेली

    मध्य प्रदेश दमोह, जबलपुर, रीवा, मुंडला, बालाघाट उत्तर प्रदेश बाँदा, फतेहपुर, हमीरपुर आदि ज़िलों के कुछ भागों में

    छत्तीसगढ़ी

    सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़, दुर्ग, नंदगाँव, काँकेर, रायपुर, खैरागढ़, कोरिया

    मागधी

    बिहारी हिंदी

    भोजपुरी

    उत्तर प्रदेश वाराणसी, गाज़ीपुर, देवरिया, बलिया, आज़मगढ़, महाराजगंज, मऊ, चंदौली, संत कबीरनगर, सोनभद्र, कुशीनगर (पडरौना), जौनपुर, मिर्ज़ापुर, बस्ती ज़िले का पूर्वी भाग

    बिहार छपरा, सिवान, गोपालगंज, भोजपुर, भभुआ, रोहतास, सासाराम, मोतिहारी, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण।

    झारखंड राँची, पलामू

    मगही

    बिहार पटना, गया, मुंगेर, जहानाबाद, नालंदा, नवादा, जमुई, शेखपुरा, औरंगाबाद, लखीसराय, भागलपुर

    झारखंड पलामू, हज़ारीबाग

    मैथिली

    पूर्वी चंपारण, मुज़फ्फरपुर, मुंगेर, भागलपुर, दरभंगा, पूर्णिया, उत्तरी संथाल परगना, माल्दह, दिनाजपुर, तिरहुत सबडिविजन की सीमा के पास नेपाल की तराई में

    आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ

    • डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने ध्वनि और व्याकरण को आधार बनाकर ग्रियर्सन के वर्गीकरण की आलोचना की है और अपना वर्गीकरण इस प्रकार प्रस्तुत किया है-
      • उदीच्य - सिंधी, लहँदा, पंजाबी
      • प्रतीच्य - राजस्थानी, गुजराती
      • मध्यदेशीय - पश्चिमी हिंदी
      • प्राच्य - पूर्वी हिंदी, बिहारी, असमिया, बंगला, उड़िया
      • दाक्षिणात्य - मराठी
    • डॉ. चटर्जी ने पहाड़ी समुदाय की कुमाउँनी, गढ़वाली तथा नेपाली भाषा को राजस्थानी का रूपांतर माना है।
    • भीली तथा खानदेशी को डॉ. चटर्जी स्वतंत्र भाषा नहीं मानते।
    • ‘उदीच्च्य’ के अंतर्गत उन्होंने सिंधी, लहँदा, तथा पंजाबी की चर्चा की है।
    • डॉ. धीरेंद्र वर्मा ने सुनीति कुमार चटर्जी के वर्गीकरण में सुधार कर अपना वर्गीकरण प्रस्तुत किया–
      • उदीच्य - सिंधी, लहँदा, पंजाबी
      • प्रतीच्य - गुजराती
      • मध्यदेशीय - राजस्थानी, पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी
      • प्राच्य - उड़िया, असमिया, बंगला
      • दाक्षिणात्य – मराठी

    हरदेव बाहरी का वर्गीकरण 

    हिंदी वर्ग 

    मध्य पहाड़ी, राजस्थानी, पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी हिंदी 

    हिंदीतर 

    उत्तरी-नेपाली 

    -हिंदीवर्ग 

    पश्चिमी - पंजाबी, सिंधी, गुजराती 

    दक्षिणी - सिंहली, मराठी 

    पूर्वी - उड़िया, बंगला, असमिया 

    भोलानाथ तिवारी का अपभ्रंश आधारित वर्गीकरण 

    अपभ्रंश 

    आधुनिक निर्मित भाषाएँ 

     

    सिंधी 

    लहँदा 

    पंजाबी 

    शौरसेनी (मध्यवर्ती) 

    राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती, पश्चिमी हिंदी 

    अर्धमागधी (मध्यपूर्वीय) 

    पूर्वी हिंदी 

    मागधी (पूर्वीय) 

    बिहारी, बंगाली, उड़िया, असमिया 

    महाराष्ट्री (दक्षिणी) 

    मराठी 

     

                                             प्रमुख आधुनिक आर्यभाषाओं की विशेषताएँ 

    लहँदा 

    अन्य नामहिंदकी, जटकी, मुल्तानी, चिभाली, पोठवारी 

    लिपिलंडा (शारदा लिपि की एक उपशाखा) 

    लहँदा का शाब्दिक अर्थपश्चिमीहोता है। 

    पंजाबी 

    यह पैशाची अपभ्रंश से विकसित हुई है। 

    इसकी लिपि लंडा थी जिसमें सुधार कर गुरु अंगद ने गुरुमुखी लिपि बनाई। 

    इसमें आज भी अनेक प्राकृत शब्दों का प्रयोग होता है। जैसेइक्क, सन्त, अट्ठ, गड्डी आदि। इसलिये कई विद्वान पंजाबी को सबसे प्राचीन आधुनिक भारतीय आर्यभाषा मानते हैं। 

    पंजाबी अपने परिनिष्ठित रूप में अमृतसर के पासमाझाइलाके में बोली जाती है। 

    मुख्य बोलियाँमाझी, डोगरी, दोआबी, राठी आदि। 

    सिंधी 

    यह सिंधु नदी के दोनों किनारों पर बोली जाती है। 

    इसकी अपनी लिपिलंडाहै, लेकिन यह गुरुमुखी और फारसी में भी लिखी जाती है। 

    बोलियाँविचोली, लासी, सिराइकी, थरेली, लाड़ी। 

    गुजराती 

    इसकी लिपि गुजराती के नाम से ही जानी जाती है। गुजराती कैथी से मिलती-जुलती लिपि में लिखी जाती है। इसमें शिरोरेखा नहीं होती। 

    प्रमुख बोलियाँनागरी, सुरती, बंबइया, काठियाबाड़ीगामडिया 

    मराठी 

    बोलियाँकोंकणी, नागपुरी, कोष्टी, माहारी। 

    लिपि देवनागरी है किंतु कुछ लोग मोड़ी लिपि का प्रयोग भी करते हैं। 

    असमी 

    मुख्य बोली विश्नुपुरिया और लिपि बंगला है। 

    बांग्ला 

    बांग्ला प्राचीन देवनागरी से विकसित लिपि बंगला में लिखी जाती है। 

    बंगाली को दो भागों में विभाजित किया गया है– (1) पूर्वी बंगाली, जिसका केंद्र ढाका है। (2) पश्चिमी बंगाली, जिसका केंद्र कोलकाता है। 

    साहित्यिक दृष्टि से बंगाली भाषा, आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में सर्वाधिक समृद्ध है। इसमें संस्कृत शब्दों का बाहुल्य है। 

    उड़िया 

    उड़िया प्राचीन उत्कल तथा उड़ीसा की भाषा है। 

    उड़िया की लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली से विकसित लिपि है। 

    इसमें मराठी और तेलुगू शब्दों का बाहुल्य है। 

    प्रमुख बोलियाँ- गंजामी, सम्भलपुरी, भत्री आदि। 

    शब्दकोशीय विशेषताएँ (अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिंदी का संबंध)

    तुलना का आधार 

    अपभ्रंश 

    अवहट्ट 

    पुरानी हिंदी 

    तद्भव शब्द 

    तद्भव शब्द सबसे अधिक हैं, क्योंकि अपभ्रंश का विकास ही संस्कृत के तद्भवीकरण की परंपरा में हुआ है। 

    तद्भव शब्द सर्वाधिक बने रहे किंतु उनका अनुपात कम हो गया। 

    तद्भव शब्द अभी भी सर्वाधिक बने रहे किंतु अनुपात कुछ और कम हो गया। 

    देशज शब्द 

    देशज शब्दों का विकास आरंभ हुआ [विशेषतः कुछ ध्वन्यात्मक शब्द, जैसे- किल-किल, खुण-खुण; तथा कुछ क्रियाएँ, जैसे- तडपडई (तड़पता है), थक्कई (थकता है)] 

    देशज शब्दों का विकास और बढ़ा। 

    देशज शब्दों का विकास और बढ़ा। 

    विदेशज शब्द 

    अरबी-फारसी परंपरा के विदेशज शब्दों का आगमन होना आरंभ हुआ, जैसे- कमाल, नौबत, तहसील आदि। 

    विदेशज शब्द बढ़ते रहे। 

    विदेशज शब्दों की मात्रा और बढ़ी। 

    विदेशज शब्द 

    सरलीकरण से पैदा हुई दुरूहता तथा ब्राह्मण वर्ग के पुनरुत्थान के कारण अपभ्रंश के अंतिम काल में तत्समी शब्दों का पुनः विकास हुआ। 

    प्रायः अपभ्रंश जैसी स्थिति ही बनी रही। 

    प्रायः अवहट्ट जैसी स्थिति ही बनी रही। 

    • अवहट्ठ में सरलीकरण की प्रक्रिया द्रुतगति से चलती रही है।
    • संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया की विकारी रचना में इतना बदलाव हुआ कि अवहट्ट और पुरानी हिंदी में अंतर धूमिल हो गया।

    आधुनिक भारतीय आर्यभाषाएँ

    • आधुनिक आर्यभाषाओं का विकास अपभ्रंश से हुआ है।
    • सर्वप्रथम 1880 ई. में आधुनिक आर्यभाषाओं का वर्गीकरण हार्नले ने किया।

    हार्नले का आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का वर्गीकरण-

    वर्ण 

    भाषाएँ 

    पूर्वी गौडियन 

    पूर्वी हिंदी, बंगला, असमी, उड़िया 

    पश्चिमी गौडियन 

    पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, गुजराती, सिंधी, पंजाबी 

    उत्तरी गौडियन 

    गढ़वाली, नेपाली, पहाड़ी 

    दक्षिणी गौडियन 

    मराठी 

    हार्नले ने मध्य देश तथा केंद्र के आर्य को भीतरी आर्य और चारों ओर फैले आर्य को बाहरी आर्य कहा। 

    जॉर्ज ग्रियर्सन कालिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडियामें प्रदत्त वर्गीकरण 

    1. बाहरी उपशाखा 

    उत्तरी पश्चिमी समुदाय - (i) लहँदा (ii) सिंधी 

    दक्षिणी समुदाय - मराठी 

    पूर्वी समुदाय - (i) उड़िया (ii) बिहारी (iii) बंगला (iv) असमिया 

    2. मध्य (केंद्रीय) उपशाखा 

    मध्यवर्ती समुदाय - पूर्वी हिंदी 

    3. भीतरी उपशाखा 

    केंद्रीय समुदाय - (i) पश्चिमी हिंदी (ii) पंजाबी (iii) भीरनी (iv) राजस्थानी (v) खानदेशी (vi) गुजराती 

    पहाड़ी समुदाय - (i) पूर्वी पहाड़ी (नेपाली) (ii) मध्य पहाड़ी/केंद्रीय पहाड़ी (iii) पश्चिमी पहाड़ी 

    अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिंदी का संबंध-

    तुलना का आधार 

    अपभ्रंश 

    अवहट्ट 

    पुरानी हिंदी 

    कालगत अंतर 

    7वीं से 9वीं शताब्दी (लगभग) 

    9वीं से 11वीं शताब्दी (लगभग) 

    12वीं से 14वीं शताब्दी (लगभग) 

    ध्वनियों का अंतर

    और का प्रयोग 

    और का अभाव 

    और मिलने लगते हैं, यथा-बैल, चौड़ा आदि। 

    और का अत्यधिक प्रयोग हुआ है, यथा-मौर, चखै आदि। 

    का प्रयोग 

    का , , , में परिवर्तन होता है, जैसे- कृष्ण > कण्ह, ऋण > रिण, 

    इसी प्रवृत्ति का और अधिक विकास हुआ। 

    विकास की यही प्रक्रिया चलती रही। 

    द्वित्वीकरण दीर्घीकरण की प्रवृत्ति 

    संयुक्त व्यंजनों के स्थान पर द्वित्वीकरण की प्रवृत्ति दिखती है, जैसे- चक्र > चक्क, कर्म > कम्म आदि। 

    क्षतिपूरक दीर्घीकरण का आरंभ होता है, जैसे- कम्म > काम, धम्म > धाम आदि। 

     

    क्षतिपूरक दीर्घीकरण का और अधिक  विकास हुआ। 

    व्यंजनों का प्रयोग 

    इसमें निम्नलिखित पाँच व्यंजनों का अभाव है- , , , और ष। 

    , का विकास हुआ परंतु शेष का नहीं। 

    और का विकास नहीं हुआ, शेष व्यंजनों का विकास हुआ। 

    वर्ग की प्रधानता 

    अपभ्रंश एकवर्ग प्रधान भाषा है। 

    अवहट्ट मेंवर्ग की व्यापकता है किंतु सीमित मात्रा में। 

    पुरानी हिंदी में भी अवहट्ट जैसी स्थिति है। 

    क्षमें परिवर्तन 

    क्ष का ख्ख हो गया। उदाहरण - 

    द्राक्ष > दाख्ख 

    यही प्रवृत्ति बनी रही। 

    क्ष दो रूपों में विकसित हुआ- (पश्चिमी रूप) तथा (पूर्वी रूप) उदाहरण - लक्ष्मण > लखन (पश्चिमी), लछमन (पूर्वी) 

    तथाकी उपलब्धता 

    1. अपभ्रंश मेंमिलता है, ‘नहीं मिलता। 

    2. अपभ्रंश मेंव्यंजन ध्वनि मिलती है। 

     

    यही प्रवृत्ति बनी रही। 

    पूर्वी पुरानी हिंदी में पश्चिमी पुरानी हिंदी मेंकी व्यापकता दिखाई देती है। 

    संज्ञा तथा कारक व्यवस्था 

    1. निर्विभक्तिक प्रयोग आरंभ हो गए।  

    2. परसर्गों का आरंभिक विकास होने लगा तथा संबंध कारक मेंकापरसर्ग का विकास अपभ्रंश की प्रमुख घटना है। 

    3. संस्कृत के 17 और प्राकृत के 12 कारकों से घटकर यहाँ उनकी संख्या 6 ही है। 

    1. यही प्रवृत्ति बनी रही।  

    2. परसर्गों का विकास और बढ़ा। कर्त्ता कारक के लियेनेतथा करण अपादान के लियेसेपरसर्ग का विकास प्रमुख घटनाएँ हैं।   

    1. यही प्रवृत्ति बनी रही।  

    2.परसर्गों का और विकास हुआ। कर्म कारक के लियेकोतथा अधिकरण के लियेपरपरसर्ग का विकास प्रमुख घटनाएँ हैं। 

    लिंग व्यवस्था 

    संस्कृत के तीन लिंगों के स्थान पर दो लिंगों (पुल्लिंग स्त्रीलिंग) की व्यवस्था, यद्यपि नागर अपभ्रंश में नपुंसक लिंग कहीं-कहीं बना रहा। 

    दो लिंगों की व्यवस्था ही बनी रही। नपुंसक लिंग समाप्त होने लगा। 

    वही + स्त्रीलिंग शब्द ईकारांत होने लगे। 

    वचन व्यवस्था 

    द्विवचन का लोप हो गया। संस्कृत के तीन वचनों के स्थान पर दो ही वचन (एकवचन एवं बहुवचन) बचे। 

    वही + संज्ञा बहुवचन के लिये न्ह, न्हि परसर्गों का प्रयोग होने लगा, जैसे- हाथन्ह, पुहुपुन्हि।   

    वही + बहुवचन बनाने के नियम निश्चित होने लगे। पुल्लिंग संज्ञाओं के लियेअनतथा स्त्रीलिंग संज्ञाओं के लियेअन’, ‘न्हप्रत्ययों का प्रयोग व्यापक रूप से होने लगा। उदाहरण- बेटा > बेटे (पुल्लिंग) सखी > सखिअन (स्त्रीलिंग) 

    सर्वनाम व्यवस्था 

    हिंदी के सर्वनामों के आरंभिक चिह्न दिखाई देने लगे, जैसे- ‘तुम्हें’ (मध्यम पुरुष बहुवचन कर्त्ता) इसके अलावामहारऔरतुहारजैसे सर्वनाम भी। 

    वही + मेरा, मैं, तुम, वह और उन्हें जैसे सर्वनाम भी दिखाई देने लगे।   

    सर्वनामों का अत्यधिक विकास हुआ। इस काल में आधुनिक हिंदी के प्रायः सभी सर्वनाम दिखाई देते हैं, जैसे- वे, कौन, जो, तेरा इत्यादि। 

    विशेषण व्यवस्था 

    संख्यावाची विशेषणों का विकास विशेषतः हुआ, उदाहरण - दस, बारह, इगारह आदि। 

    कृदंतीय विशेषणों की परंपरा का विकास होने लगा।आइस’, ‘उत्त’, ‘कित्ताजैसे सार्वनामिक विशेषण भी विकसित हुए।    

    कृदंतीय विशेषणों की वृद्धि होने लगी, उदाहरण - पीतवसन > पीरोवसन। 

    काल संरचना 

    वर्तमान काल संस्कृत की परंपरा में, भूतकाल कृदंत की परंपरा में तथा भविष्यकाल दोनों परंपराओं में चलता है। भविष्यकाल के लिये दो रूप मिलते हैं - ‘रूप औररूप, जैसे- चलिसई, चलिहिय। 

    1. कृदंतीय प्रयोगों की अधिकता है। 

    2. पूर्वी और पश्चिमी हिंदी में अंतर स्पष्ट होने लगे। पूर्वी अवहट्ट - जात (‘रूप-वर्तमान काल), चलल (‘रूप-भूतकाल), खाइब (‘रूप-भविष्य काल); पश्चिमी अवहट्ट- करन्ता (‘न्तारूप-वर्तमान काल), थका (‘रूप-भूतकाल), करहि (‘रूप-भविष्य काल) 

    प्रायः अवहट्ट के समान प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। 

    अवहट्ट

    • ‘अवहट्ट’ भाषा का समय 900 ई. से 1100 ई. तक निश्चित किया गया है।
    • साहित्य में 14वीं शती तक इसका प्रयोग होता रहा।
    • साहित्यिक अपभ्रंश को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘पुरानी हिंदी’ कहा था।
    • "अवहट्ट भाषा अपभ्रंश और पुरानी हिंदी के बीच की कड़ी मानी जाती है।" - सुनीति कुमार चटर्जी
    • ‘अवहट्ट’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ‘वर्णरत्नाकर’ (ज्योतिरीश्वर ठाकुर) में मिलता है।
    • ‘संदेशरासक’ (अद्दहमाण) में अवहट्ट का उल्लेख मिलता है।
    • ‘प्राकृतपैंगलम्’ के टीकाकार वंशीधर ने इसकी भाषा को अवहट्ट माना है।
    • ‘वर्णरत्नाकार’, ‘कीर्तिलता’ और ‘कीर्तिपताका’ में पूर्वी अवहट्ट का उपयोग किया गया है।
    • भोलानाथ तिवारी ने अपभ्रंश और ‘अवहट्ट’ को एक ही भाषा माना है– ‘अपभ्रंश का विकास अवहंस के रूप में हुआ और अपभ्रष्ट का विकास अवहट्ट के रूप में।’
    • कुछ विद्वान इन्हें भी अवहट्ट का ग्रंथ मानते हैं–
      • ज्ञानेश्वरी (संत ज्ञानेश्वर)
      • राउलवेल (रोड कवि)
      • अवहट्ट के तीन भेद माने गये हैं– ‘पूर्वी’, ‘मध्यवर्ती’ और ‘पश्चिमी’।
    • ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ में अवहट्ट के मध्यदेशीय रूप का उपयोग किया गया है।
    • डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने ‘उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण’ की भाषा को ‘प्राचीन कोसली’ कहा।
    • ‘प्राकृतपैंगलम्’ में पश्चिमी अवहट्ट का प्रयोग मिलता है।
    • डॉ. तगारे ने कर्ता ‘ए’ की विभक्ति को अवहट्ट भाषा की विशेषता स्वीकार किया है।
    • अपभ्रंश (अवहट्ट) में घनाक्षरी छंद का उपयोग नहीं मिलता।
    • अपभ्रंश और अवहट्ट में ‘चउपई’ छंद में 15 मात्राएँ होती हैं।

    पुरानी / प्रारंभिक हिंदी

    • चंद्रधर शर्मा गुलेरी ने परवर्ती अपभ्रंश को ही पुरानी हिंदी कहा है।
    • 8वीं, 9वीं शताब्दी में सिद्धों की भाषा में हमें अपभ्रंश से निकलती हिंदी स्पष्टतः दिखाई पड़ती है।
    • कुछ विद्वानों ने पुष्पदंत को हिंदी का कवि कहा है लेकिन वे निस्संदेह अपभ्रंश के कवि हैं। उनकी कृतियों में कहीं-कहीं विकासमान हिंदी के प्रयोग अवश्य मिलते हैं।
    • पउमचरिउ में भी उदीयमान हिंदी के छिटपुट उदाहरण मिलते हैं।
    • विद्यापति और ज्योतिरीश्वर ठाकुर के यहाँ भी पूर्वी हिंदी के बीज मिल जाते हैं।
    • नाथों और जोगियों की वाणी में आरंभिक हिंदी का निखरा रूप दिखाई पड़ता है।
    • शुद्ध खड़ी बोली के प्रारंभिक नमूने अमीर खुसरो की शायरी में मिलते हैं-

    "सजन सकारे जाएँगे, नैन मरेंगे रोय।

    बिधना ऐसी रैन कर, भोर कधौं न होय।"*

            नोट *इस दोहे का रचनाकार शरफुद्दीन बू अली कलंदर (मृत्यु 1343 ई.) भी बताया जाता है, किंतु बच्चन सिंह और यू.जी.सी. नेट दिसंबर, 2012 के तृतीय प्रश्न-पत्र के 7वें प्रश्न के संस्था द्वारा उत्तर के अनुसार अमीर खुसरो को इसका रचाकार माना जाना चाहिये।

    • हरदेव बाहरी ने लिखा– "हम डॉ. माताप्रसाद गुप्त और डॉ. कैलाश चन्द्र भाटिया के विचार से सहमत हैं कि रोड कवि कृत राउलवेल एक मात्र ऐसी कृति है जिसमें एक भाषा के लक्षण मिलते हैं।"
    • अवधी, खड़ी बोली और दक्खिनी, किसी का भी ‘एक भाषी’ ग्रंथ 1250 ई. से पहले का उपलब्ध नहीं है और यही तीन भाषाएँ ऐसी हैं जिनकी परंपरा आगे चली है।

    अपभ्रंश के भेदों के बारे में विवाद की स्थिति सर्वाधिक देखने को मिलती है।

                                      विभिन्न विद्वानों के अनुसार अपभ्रंश के भेद 

      विद्वान 

                     पुस्तक 

                           अपभ्रंश के भेद 

    नमिसाधु 

                         _ 

    (1) उपनागर (2) आभीर (3) ग्राम्य 

    मार्कण्डेय 

    प्राकृत सर्वस्व 

    (1) नागर (2) उपनागर (3) ब्राचड़ 

    याकोबी 

     

    सनत्कुमार चरिउकी भूमिका 

    (1) पूर्वी (2) पश्चिमी (3) दक्षिणी (4) उत्तरी 

    तगारे 

     

    हिस्टॉरिकल ग्रामर ऑफ़ अपभ्रंश 

    (1) पूर्वी (2) पश्चिमी (3) दक्षिणी 

    नामवर सिंह 

                      – 

    (1) पूर्वी (2) पश्चिमी 

     

    • डॉ. नामवर सिंह दक्षिणी अपभ्रंश को निराधार और अवैज्ञानिक मानते हैं। इसीलिये उन्होंने अपभ्रंश के सिर्फ दो भेद बताए हैं।
    • नमिसाधु की ‘उपनागर अपभ्रंश’ परिनिष्ठित भाषा थी।
      इनको यह भी कहा जाता है–
      • नागर या सौराष्ट्री – गुजरात की बोली
      • उपनागर – राजस्थान की बोली
      • ब्राचड़ – सिंध की बोली
    • मार्कण्डेय ने ब्राचड़ को ‘सिन्धुदेशोद्भव’ कहा है।
    • भाषाशास्त्रीय दृष्टि से पैशाची पर ‘दरद’ का प्रभाव है।
    • वररुचि पैशाची का आधार संस्कृत को मानते हैं।
    • मार्कण्डेय पैशाची के तीन भेदों का उल्लेख करते हैं- कैकेय, पांचाल और शौरसेनी।
    • भारत में पैशाची की रचनाएँ उत्तर-पश्चिम कश्मीर के निकटवर्ती क्षेत्रों में मिलती हैं।

                             अपभ्रंश की रचनाएँ 

    पउमचरिउ (8वीं शती) 

     

     स्वयंभू 

    इसमें 90 संधियाँ तथा 5 कांड हैं। रामकथा का विशाल प्रबंध काव्य है। यह अपभ्रंश का प्रथम रामकाव्य है। 

    महापुराण (10वीं शतीं) 

    पुष्पदंत 

    इसमें 102 संधियाँ हैं। 63 महापुरुषों का चरित्र वर्णित है। इसके दो भाग हैं– (1) आदिपुराण और (2) उत्तरपुराण। 

    • पौराणिक गाथाओं की जानकारी के लिये अपभ्रंश का सबसे बड़ा ग्रंथ ‘तिसट्टी महापुरिस गुणालंकार’ है।
    • धनपाल द्वारा रचित ‘भविस्स्यत्त कहा’ अपभ्रंश का पहला प्रबंध काव्य है।
    • अपभ्रंश साहित्य का पहला संपादक डॉ. रिचर्ड पिशेल को माना जाता है।
    • डॉ. हरदेव बाहरी ने ‘7वीं शती से 11वीं शती’ तक के समय को अपभ्रंश का स्वर्णकाल कहा है।
    • अपभ्रंश का सबसे बड़ा वैयाकरण हेमचन्द्र को कहा जाता है।
    • राम शर्मा और मार्कण्डेय ने ‘प्राच्या’ को अपभ्रंश के भेद के रूप में माना है।
    • डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी और धीरेंद्र वर्मा ने अपभ्रंश को भारतीय आर्यभाषा के विकास की एक स्थिति माना है। इनके अनुसार 6-11वीं शती तक प्रत्येक प्राकृत का अपना अपभ्रंश रूप रहा होगा।
    • धीरेंद्र वर्मा ने यह भी माना कि प्रत्येक प्राकृत की एक अपभ्रंश रही होगी। इस दृष्टि से वे अपभ्रंशों की पाँच स्थिति स्वीकारते हैं-
      • शौरसेनी प्राकृत - शौरसेनी अपभ्रंश
      • पैशाची प्राकृत - पैशाची अपभ्रंश
      • मागधी प्राकृत - मागधी अपभ्रंश
      • अर्धमागधी प्राकृत - अर्धमागधी अपभ्रंश
      • महाराष्ट्री प्राकृत - महाराष्ट्री अपभ्रंश
    • पैशाची अपभ्रंश को ‘केकय’ भी कहा जाता है।
    • सिंघली के आदि रूप को ‘एलू’ कहा जाता है।
    • मागधी अपभ्रंश से ‘बांग्ला’ का विकास हुआ है।
    • पुरुषोत्तम देव ने ‘प्राकृतानुशासन’ नामक ग्रंथ की रचना की।
    • साहित्यिक रूप में अपने विकास और विस्तार के समय अपभ्रंश से सबसे अधिक प्रभावित होने वाली भाषा ‘शौरसेनी प्राकृत’ है।
    • अपभ्रंश ग्रंथ ‘अपभ्रंश काव्यत्रयी’ की रचना लालचन्द्र गांधी ने की थी।
    • अपभ्रंश के ‘अर्धमागधी’ रूप से सिद्ध कवियों की भाषा का विकास हुआ।
    • अपभ्रंश उकारबहुला भाषा है। अवधी में लिखु (लिख), बैठु (बैठ), कालु (काल) आदि रूप अपभ्रंश से गृहीत हैं।
    • अपभ्रंश के ‘खस’ रूप से ‘पहाड़ी हिंदी’ उपभाषा का विकास हुआ। ‘खस’ को ‘दरद’ नाम से भी जाना जाता है।
    • ‘कोंकणी’ भाषा का विकास महाराष्ट्री अपभ्रंश से हुआ।
    • अपभ्रंश भाषा का प्रियतम छंद ‘दोहा’ है।
    • अपभ्रंश और अवहट्ठ से हिंदी के कवियों को काव्य में चमत्कार लाने और वाग्वैचित्र्य के प्रदर्शन की प्रवृत्ति मिली है।

                                               प्राकृत के भेदों को लेकर विद्वानों की राय 

    विद्वान 

    ग्रंथ 

    प्राकृत के भेद 

    भरतमुनि 

    नाट्यशास्त्र 

    मुख्य प्राकृत- मागधी, अवन्तिजा, प्राच्या, सूरसेनी (शौरसेनी) अर्धमागधी, बाह्लीक, दाक्षिणात्य (महाराष्ट्री) 

    गौण विभाषा- शाबरी, आभीरी, चाण्डाली, सचरी, द्राविड़ी, उद्रजा, वनेचरी 

    वररुचि 

    प्राकृत प्रकाश 

    शौरसेनी प्राकृत, महाराष्ट्री प्राकृत, मागधी प्राकृत, पैशाची प्राकृत 

    हेमचन्द्र# 

    प्राकृत व्याकरण 

    आर्षी (अर्धमागधी),  चूलिका पैशाची*, अपभ्रंश 

    *चूलिका पैशाची को दण्डी नेभूत भाषाकहा है। 

    #हेमचन्द्र को प्राकृत का पाणिनि कहा जाता है। 

    अपभ्रंश मधयकालीन आर्यभाषा की तीसरी अवस्था

    • अपभ्रंश मध्यकालीन और आधुनिक आर्यभाषाओं के बीच की कड़ी है। भाषा के अर्थ में इसका प्रयोग छठी शती से होने लगता है।
    • अपभ्रंश को अवहंस, ग्रामीण भाषा, देशी भाषा, आभीर, आभीरोक्ति आदि नामों से भी जाना जाता है।
    • ‘अपभ्रंश’ तत्सम शब्द है। इसी तरह, ‘अपभ्रष्ट’ शब्द भी तत्सम है।
    • अपभ्रंश में 8 स्वर हैं, जो दो भागों– ‘ह्रस्व’ और ‘दीर्घ’ में विभाजित हैं। ह्रस्व स्वर हैं– अ, इ, उ, ए, ओ। दीर्घ स्वर हैं– आ, ई, ऊ।
    • ‘वाक्यपदीयम्’ में भर्तृहरि ने बताया कि सर्वप्रथम व्याडि ने संस्कृत के मानक शब्दों से भिन्न संस्कार च्युत, भ्रष्ट और अशुद्ध शब्दों को अपभ्रंश कहा है। व्याडि का ग्रंथ ‘लक्षश्लोकात्मक संग्रह’ अनुपलब्ध है।
    • पतंजलि के महाभाष्य में अपभ्रंश का सर्वप्रथम प्रामाणिक प्रयोग हुआ है। पतंजलि ने अपभ्रंश का प्रयोग अपशब्द के समानार्थक रूप में किया है।
    • अपभ्रंश के भाषिक और व्याकरणिक रूप का स्पष्ट और सुव्यवस्थित विवेचन हेमचन्द्र ने किया।
    • डॉ. उदयनारायण तिवारी और भोलानाथ तिवारी के अनुसार, अपभ्रंश शब्द का भाषा के अर्थ में प्रयोग सर्वप्रथम चण्ड (6 शती) ने अपने ग्रंथ ‘प्राकृत लक्षण’ में किया है।
    • रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार- "अपभ्रंश नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है, जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि.सं. 650 से पहले) को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है।“

    विद्वानों द्वारा अपभ्रंश के लिए प्रयुक्त शब्द 

    आचार्य दण्डी - आभीरों की भाषा / आभीर* 

    भरतमुनि - आभीरोक्ति  

    वाग्भट्ट और हेमचन्द्र - ग्रामभाषा 

    *कीथ ने अपभ्रंश का संबंध आभीरों तथा गुर्जरों से माना है। 

    • अपभ्रंश भाषा के प्राचीनतम उदाहरण भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलते हैं।
    • रुद्रट ने ‘काव्यालंकार’ में जिन छः भाषाओं का उल्लेख किया है, उनमें अपभ्रंश भी है।
    • दामोदर पण्डित ने ‘उक्तिव्यक्तिप्रकरण’ में कोसल की भाषा को ‘अपभ्रष्ट’ कहा है।
    • स्वयंभू ने ‘अपभ्रंश’ को अपनी रामायण में ‘अवहत्थ’ कहा है।
    • ग्रियर्सन, पिशेल, भंडारकर, चटर्जी, वुलनर आदि विद्वानों ने अपभ्रंश को देश भाषा माना है, जबकि कीथ, याकोबी, ज्यूलब्लाख, अल्सडार्फ आदि विद्वानों ने अपभ्रंश को देश भाषा नहीं माना है।
    • महाकवि कालिदास की कृति ‘विक्रमोर्वशीयम्’ के चतुर्थ अंक में अपभ्रंश के कुछ छंद मिलते हैं।
    • ‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण’ में अपभ्रंश भाषा के लिये ‘अपभ्रष्ट’ शब्द का उपयोग किया गया है।
    • मध्यदेशीय या शौरसेनी अपभ्रंश को उस समय की परिनिष्ठित भाषा माना गया।
    • सिद्धों की अपभ्रंश रचनाओं का संपादन हरप्रसाद शास्त्री ने किया।

    प्राकृत मध्यकालीन आर्यभाषा की दूसरी अवस्था

    • मोटे तौर पर प्राकृत का समय सन् 1 ई. से 500 ई. तक माना जाता है।
    • प्राकृत के विकास की अवस्थाओं को किशोरीदास वाजपेयी आदि वैयाकरणों ने तीन चरणों में बाँट कर देखा है–

    प्रथम प्राकृत-

    • प्राकृत प्राचीन प्रचलित जनभाषा है।
    • नमि साधु ने प्राकृत के संबंध में लिखा है - ‘प्राक् पूर्व कृतं प्राकृत’ अर्थात् पहले से बनी हुई भाषा।

    द्वितीय प्राकृत-

    • कुछ विद्वान ऐसा मानते हैं कि संस्कृत भाषा के सरलीकरण के कारण प्राकृत भाषा बनी।
    • हेमचंद्र ने लिखा है ‘प्रकृतिः संस्कृतं तत्र भवं तत आगतं वा प्राकृतम्’- अर्थात् प्रकृति का मूल संस्कृत है और जो संस्कृत से आगत है, वह प्राकृत है।
    • द्वितीय प्राकृत को ‘साहित्यिक प्राकृत’ भी कहते हैं।

    तृतीय प्राकृत-

    • प्राकृत के बाद की भाषा अपभ्रंश को कुछ विद्वान तृतीय प्राकृत भी कहते हैं।
    • सामान्य रूप से वर्तमान काल में ‘प्राकृत’ नाम उस भाषा के लिये रूढ़ हो गया है, जो ईस्वी सन् की शुरुआत से पाँचवी शताब्दी तक प्रमुख साहित्यिक भाषा के रूप में प्रचलित रही।

    निष्कर्षतः

    प्राकृत की प्रथम अवस्था – पालि

    प्राकृत की द्वितीय अवस्था – प्राकृत

    प्राकृत की तृतीय अवस्था – अपभ्रंश

    प्राकृत की विशेषताएँ-

    • ध्वनि संरचना संबंधी विशेषताएँ
      प्राकृत की ध्वनि संरचना पालि के समान ही है। जो बातें पालि से अलग हैं, वे इस प्रकार हैं–
      • विसर्ग के लुप्त होने की प्रक्रिया पालि में ही शुरू हो गई थी। प्राकृत में इस संबंध में एक और विकास हुआ तथा विसर्गयुक्त अकारांत शब्द विसर्गहीन ओकारांत शब्दों में परिवर्तित होने लगे। उदाहरण के लिये– वीरः > वीरो, प्रश्नः > प्रश्नो, देवः > देवो।
      • पालि में ‘य’ व्यंजन का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में होता था, जबकि प्राकृत में प्रायः ‘य’ समाप्त होने लगा और उसके स्थान पर ‘ज’ प्रयुक्त होने लगा। उदाहरण– यश > जस, यः > जो।
      • पालि में संस्कृत के संयुक्त व्यंजनों को सरल करने के लिये द्वित्वीकरण की प्रकिया आरंभ हुई थी। प्राकृत में पहली बार इससे अगले चरण के रूप में एक नई परंपरा शुरू हुई जिसे ‘क्षतिपूरक दीर्घीकरण’ कहा जाता है।
      • इसके अंतर्गत द्वित्वीकृत रूप में प्राप्त व्यंजन का भी मूल व्यंजन बचा रहा किंतु दूसरे व्यंजन के स्थान पर वह स्वर से युक्त होकर दीर्घरूप में व्यक्त होने लगा। उदाहरण– मृत्यु > मिच्चु > मीच, जिव्हा > जिब्भा > जीभ।
      • आचार्य राजशेखर ने प्राकृत को मीठी तथा संस्कृत को कठोर भाषा कहा है।
      • क्षतिपूरक दीर्घीकरण संस्कृत से हिंदी के विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। प्राकृत का योगदान यह है कि उसी स्थिति से यह प्रक्रिया दिखाई देने लगी।
    • व्याकरणिक संरचना संबंधी विशेषताएँ
      • प्राकृत में परसर्गों का विकास पालि की तुलना में काफी अलग स्तर पर दिखाई देता है। उदाहरण के लिये, इस काल में ‘कए’, ‘केरक’ तथा ‘मज्झ’ परसर्ग दिखते हैं, जो आगे चलकर ‘का, के, की’ और ‘में’ के रूप में विकसित हुए।

    प्राकृत की शब्दकोशीय प्रवृत्तियाँ

    शब्दकोशीय प्रवृत्तियों के स्तर पर जो मूल विशेषता इस काल में दिखती है, वह यह है कि संस्कृत के सरलीकरण की प्रक्रिया में जो शब्द परिवर्तित हुए थे, उनमें पुनः तत्समीकरण की प्रवृत्ति शुरू हुई। ऐसा इसलिये करना पड़ा कि संस्कृत से सरल किये गए कई शब्दों को ध्वनि साम्य के कारण अन्य शब्दों से अलग करना मुश्किल हो गया। शब्दों के पुनर्तत्समीकरण की यह प्रवृत्ति अपभ्रंश में काफी अधिक मात्रा में दिखाई देती है। उदाहरण के लिये- ‘उचित’ और ‘उदित’ दोनों शब्द सरल होकर ‘उइत’ हो गए, अतः अर्थ के स्पष्टीकरण के लिये पुनः तत्समीकरण करना पड़ा। इसी प्रकार ‘अति’ से ‘अइ’ हो गया था और निरर्थक होने के कारण इसे पुनः परिवर्तित करके ‘अति’ करना पड़ा।

    पालि से संबंधित महत्त्वपूर्ण ग्रंथ 

    ग्रंथ 

    रचयिता   

    समय   

    अन्य बिंदु 

    अट्ठकथा साहित्य 

    विसुद्धिमग्ग* 

    कच्चायन व्याकरण+ 

    मोग्गलान व्याकरण# 

    सद्यनीति व्याकरण 

    आचार्य बुद्धघोष 

    आचार्य बुद्धघोष 

    महाकच्चायन  

    मोग्गलान 

    अग्गवंश 

    5वीं सदी 

    5वीं सदी 

    7वीं सदी 

    12वीं सदी 

    1154 . 

     

     

    675 सूत्र 

    817 सूत्र 

    27 अध्याय, 1341 सूत्र 

    * विसुद्धिमग्ग को बौद्ध सिद्धांतों का कोश भी कहते हैं। 

    + इसेसुसन्धिकप्पऔरकच्चान गंधभी कहा जाता है। 

    # यह पालि का सर्वश्रेष्ठ व्याकरण माना जाता है। 

    ‘पालि’ की विशेषताएँ-

    • ध्वनि संरचना संबंधी विशेषताएँ
      • कच्चायन के अनुसार पालि में 41 ध्वनियाँ हैं, जिनमें 8 स्वर तथा 33 व्यंजन हैं।
      • मोग्गलान के अनुसार पालि में ध्वनियों की संख्या 43 है, जिनमें 10 स्वर तथा 33 व्यंजन हैं

            पालि में प्रयुक्त वर्ण 

        स्वर वर्ण 

        • ह्रस्व स्वर , , , ,  
        • दीर्घ स्वर , , , ,  

        व्यंजन वर्ण 

         

         

         

         

         

         

          

          

          

          

         

         

          

         

         

         

         

         

          

          

         

         

         

         

          

          

          

          

          

         

          

          

          

         

         

                 अं  


        • संयुक्त व्यंजनों में भी अत्यधिक परिवर्तन हुए क्योंकि संस्कृत की जटिलता का एक बड़ा कारण यही है। सरलीकरण के प्रयासों में संयुक्त व्यंजनों का रूप परिवर्तन होना स्वाभाविक ही था।

    पालि की व्याकरणिक संरचना

    • पालि में संस्कृत के नपुंसक लिंग का लोप होने लगा।
    • पालि में संस्कृत के द्विवचन का भी लोप होने लगा।
    • अधिकतर व्यंजनांत प्रातिपदिक स्वरांत होने लगे। इस प्रक्रिया में अंतिम हलंत व्यंजन हटने लगा या उसमें स्वर जोड़ा जाने लगा, यथा– जगत् > जग, राजन् > राज, चल् > चल।
    • विभक्तियों और परसर्गों की जटिलता को दूर करने का प्रयास अन्य तरीकों से भी हुआ।
      • पालि की क्रिया रचना से ही हिंदी में प्रयुक्त होने वाली क्रियाओं का विकास होना प्रारंभ हो गया था।
        यथा– स्थितः > थिअ (‘था’ रूप में हिंदी में विकास), भवंति > हुअंति (‘होता’ रूप में हिंदी में विकास), भूतः > हुआ (‘हुआ’ या ‘हुई’ रूप में हिंदी में विकास)।

    शब्दकोशीय प्रवृत्तियाँ

    • पालि की शब्द संपदा का मूल आधार स्वाभाविक रूप से तद्भव शब्द हैं।
    • स्थानीय व देशज शब्दों का विकास तेज़ी से हुआ, यथा– धण (स्त्री), बप्प (पिता), ढेकणी (ढक्कन)।

    पालि : मध्यकालीन आर्यभाषा की प्रथम अवस्था

    पालि शब्द की उत्पत्ति के संदर्भ में विद्वानों में मतभेद है-

    • ‘पल्लि’ से पालि शब्द की व्युत्पत्ति हुई है। पल्लि का अर्थ है- ‘ग्राम’। इस प्रकार पालि का अर्थ होगा- ‘ग्रामीण भाषा’।
    • कुछ विद्वान ‘पल्लि’ को प्राकृत का तद्भव रूप मानते हैं। उनके अनुसार, प्राकृत से पहले ‘पाइल’ तथा अंत में पालि हुआ।
    • पालि शब्द की उत्पत्ति ‘पाटलि’ (पाटलिपुत्र) से भी मानी जाती है। इस संदर्भ में पालि का अर्थ हुआ ‘मगध की भाषा’।
    • कुछ विद्वज्जन पालि को ‘पाठ’ का रूपांतरित शब्द मानते हैं।
    • पालि शब्द का एक संबंध ‘पंक्ति’ से माना गया है। बुद्ध वचनों में जो पंक्तियाँ प्रयुक्त की गई हैं, उन्हें भी ‘पालि’ कहा जाता है।
    • कुछ विद्वान पालि को बौद्ध साहित्य को पालने वाली या रक्षा करने वाली भाषा मानते हैं। इसका प्रमाण है–

    ‘पा रक्खतीति बुद्धवचन इति पालि’ अर्थात् जिसमें बुद्ध के वचनों की रक्षा की गई, वही पालि है।

    • डॉ. हरदेव बाहरी के अनुसार– भाषा के अर्थ में ‘पालि’ शब्द का उपयोग सबसे पहले आचार्य बुद्धघोष (5वीं शती) ने किया था।
    • माना जाता है कि ‘पालि’ शब्द का उपयोग यूरोप में सर्वप्रथम हुआ, किंतु ‘कच्चायन’ और ‘भोग्लान’ नामक दो पालि वैयाकरणों ने पालि का उपयोग भाषा के अर्थ में किया है।

    ‘पालि’ शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विद्वानों की राय

    विद्वान  

    व्युत्पत्ति 

    विधुशेखर भट्टाचार्य 

    पङ्कित > पन्ति > पत्ति > पट्ठिपल्लि > पालि 

    मैक्स वालेसर 

    पाटलि > पाडलि > पाअलि > पालि 

    भिक्षु जगदीश काश्यप 

    परियाय > पलियाय > पालियाय > पालि 

    भंडारकर वाकर नागल 

    प्राकृत > पाकट > पाअड > पाउल > पालि 

    भिक्षु सिद्धार्थ 

    पाठ > पाळ > पाε > पालि 

    कोसाम्बी 

    पाल् > पालि 

    उदयनारायण तिवारी 

    पा + णिञ् + लि = पालि 

    बौद्ध धर्म से संबंधित ये तीनों महत्त्वपूर्ण ग्रंथ पालि में हैं–

    • ‘सुत्त पिटक’ बुद्ध के उपदेशों का संग्रह है। इसके अंतर्गत पाँच निकाय आते हैं–
      1. खुद्दक निकाय
      2. दीघ निकाय
      3. मञ्झिम निकाय
      4. संयुक्त निकाय
      5. अंगुत्तर निकाय
    • ‘विनय पिटक’ संघ संचालन के लिये दी गई शिक्षाओं का संकलन है। विनय पिटक में निम्न ग्रंथ हैं-
      1. महावग्ग
      2. चुल्लवग्ग
      3. पाचित्तिय
      4. पाराजिक और
      5. परिवार।
    • अभिधम्म पिटक में धर्मों का विशद् और दार्शनिक विश्लेषण किया गया है।
    • बौद्ध धर्म का प्रभाव होने के कारण सम्राट अशोक की राजभाषा ‘पालि’ थी।

    भारतीय आर्यभाषाएँ और हिंदी भाषा-

    अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से भारतीय आर्यभाषाओं के 3500 वर्षों के विकासक्रम को सामान्यतः तीन चरणों में विभाजित करते हैं–

    भारतीय आर्यभाषाओं के तीन चरण

               चरण  

               भाषा  

               समय  

    प्राचीन आर्यभाषाएँ (2000 .पू. - 500 .पू.) 

    वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत 

    2000 .पू. - 1000 .पू., 1000 .पू. - 500 .पू. 

    मध्यकालीन  आर्यभाषाएँ (500 .पू. - 1000 .) 

    पालि, प्राकृत, अपभ्रंश तथा अवहट्ट 

    500 .पू. - 1 ., 1 . - 500 ., 500 . - 1000 . 

    आधुनिक आर्यभाषाएँ 

    हिंदी, बांग्ला, उड़िया मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी आदि। 

     

    1000 . से अब तक 

    भारत में भाषा का प्राचीनतम रूप संस्कृत है और भाषिक विशेषता के आधार पर इसे दो भागों में विभाजित किया गया है– वैदिक संस्कृत और लौकिक संस्कृत।

    • वैदिक भाषा –

    वैदिक साहित्य

    संहिता  

    1.ऋक संहिता* 

    2. यजुः संहिता 

    3. साम संहिता 

    4. अथर्व संहिता 

    ब्राह्मण  

    • ब्राह्मणमें कर्मकांड की व्याख्या की गई है। 
    • हर संहिता के अलग-अलग ब्राह्मण ग्रंथ हैंऋग्वेद काएतरेय ब्राह्मण’, सामवेद कातांडवअथवापंचविंश ब्राह्मण’, शुक्ल यजुर्वेद काशतपथ ब्राह्मण’, कृष्ण यजुर्वेद कातैत्तरीय ब्राह्मणग्रंथ महत्त्वपूर्ण हैं। 

    उपनिषद 

    • ब्राह्मण ग्रंथों का अंतिम भाग 
    • इनकी संख्या 108 है। इनमें से 12 उपनिषद् मुख्य हैं 

    1. ईश 

    2. केन 

    3. कठ 

    4. प्रश्न 

    5. वृहदारण्यक 

    6. ऐतरेय 

    7. छांदोग्य 

    8. तैत्तरीय 

    9. मुण्डक 

    10. माण्डूक्य 

    11. कौषीतकी 

    12. श्वेताश्वेतर 

    • उपनिषदों में वैदिक मनीषियों का पारमार्थिक चिंतन निहित है। 

    *नोट- ‘ऋक संहिता’ सबसे महत्त्वपूर्ण है।

      • इस भाषा में वेद, वेदांग, आरण्यक तथा लिखे गए।
      • वैदिक भाषा में कुल 52 ध्वनियों (13 स्वर, 39 व्यंजन) का प्रयोग होता था। इस प्राचीन भाषा में तीन लिंग, तीन वचन और आठ कारकों का उल्लेख होता है।
      • डॉ. हरदेव बाहरी वैदिक स्वरों की संख्या 14 मानते हैं।
    • लौकिक भाषा –
      • वैदिक संस्कृत के तीन रूप हैं– पश्चिमोत्तरी, मध्यवर्ती और पूर्वी।
      • ‘लौकिक संस्कृत’ पश्चिमोत्तरी बोली पर आधारित थी।
      • उस समय की प्रामाणिक भाषा पश्चिमोत्तरी बोली मानी जाती थी।
      • लौकिक संस्कृत का प्राचीनतम काव्यग्रंथ ‘रामायण’ माना जाता है। इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि हैं।
      • वैदिक संस्कृत में ए, ऐ, ओ, औ संयुक्त स्वर थे। लौकिक संस्कृत में ए, ओ मूल स्वर रह गए जबकि ऐ, औ का उच्चारण अइ, अउ हो गया। इससे संस्कृत में दो संयुक्त स्वर ऐ, औ शेष बचे।
      • वैदिक संस्कृत में केवल अनुस्वार ही शुद्ध नासिक्य था, संस्कृत में यह अनुस्वार (.) और अनुनासिक ( ँ ) के रूप में विभाजित हो गया।
      • भाषा विकास में वैदिक संस्कृत के बाद की अवस्था लौकिक संस्कृत की है। इस भाषा को संस्कृत या क्लासिक संस्कृत भी कहते हैं। लौकिक भाषा का भाषिक विवेचन सर्वप्रथम पाणिनि कृत ‘अष्टाध्यायी’ में मिलता है। ‘अष्टाध्यायी’ इसी भाषा का व्याकरण रूप है।
      • इस भाषा में रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र, अभिज्ञानशाकुंतलम्, कादम्बरी आदि प्रसिद्ध रचनाएँ लिखी गई हैं।
      • वैदिक संस्कृत की 4 ध्वनियों क, ल्ह, जिह्वमूलीय और उपध्यानीय के लुप्त होने से लौकिक संस्कृत में 48 ध्वनियाँ ही शेष रह गईं। विदित है कि इस काल में संस्कृत भाषा का स्पष्ट व्याकरण मिलना शुरू हो जाता है।

    संसार में बोली जाने वाली भाषाओं की निश्चित संख्या बता पाना संभव नहीं है। फिर भी यह अनुमान है कि विश्व में लगभग छः हजार भाषाएँ बोली जाती हैं। ध्वनि, व्याकरण तथा शब्द-समूह के आधार पर भौगोलिक दृष्टि से इन भाषाओं का वर्गीकरण पारिवारिक संबंधों के अनुसार किया गया है।

    • संसार की सभी भाषाओं का अध्ययन दो प्रकार के वर्गीकरण के तहत किया जाता है-

          

      आकृतिमूलक वर्गीकरण 

      पारिवारिक वर्गीकरण  

    आधार  

    रचना तत्त्व(वाक्य और पद रचना) 

    रचना तत्त्व+अर्थतत्त्व(इतिहास) 

    अन्य नाम  

    रूपात्मक वर्गीकरण, रचनात्मक वर्गीकरण, व्याकरणिक वर्गीकरण, वाक्यात्मक वर्गीकरण, पदात्मक वर्गीकरण, पदाश्रित वर्गीकरण। 

    वंशात्मक वर्गीकरण, वंशानुक्रमिक वर्गीकरण, कुलात्मक या ऐतिहासिक वर्गीकरण।  

    उल्लेख बिंदु 

    विश्व की भाषाओं का आकृतिमूलक वर्गीकरण सबसे पहले प्रो. श्लेगल ने किया 

    आकृतिमूलक वर्गीकरण में भाषा के दो भाग किये जाते हैं- अयोगात्मक भाषा और योगात्मक भाषा। 

    पारिवारिक वर्गीकरण में निम्न छः बातों को आधार बनाया जाता है- पद रचना, वाक्य रचना, ध्वनि, अर्थ, शब्द और स्थानिक समीपता।  

    • विश्व में भाषा-परिवारों की संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद है।
      • भोलानाथ तिवारी और विल्हेम वॉन हम्बोल्ट ने भाषा-परिवारों की संख्या 13 मानी है।
      • फ्रिड्रीश म्यूलर ने भाषा-परिवारों की संख्या 100 मानी है।

    निर्विवाद रूप से चार भौगोलिक क्षेत्रों के अंतर्गत 18 भाषा-परिवारों को महत्त्व दिया जाता है।

    भौगोलिक क्षेत्र  

    भाषा-परिवार  

    यूरेशिया  

    1.भारोपीय(भारत-यूरोपीय) 2.द्रविड़ परिवार 3.काकेशी परिवार 4.बुरुशस्की 5.उराई-अल्ताई परिवार 6.चीनी परिवार 7.जापानी कोरियाई परिवार 8.अत्युत्तरी(हाइपस्बोरी) 9.बास्क परिवार 10.सामी-हामी परिवार    

    अफ्रीका भूखंड  

    1.सुदानी परिवार 2.बन्तू परिवार 3.होतेंतोत-बुशमैनी परिवार  

    प्रशांत महासागरीय भूखंड  

    1.मलय-पोलिनेशियाई परिवार 2.पापुई परिवार 3.औस्ट्रेलियन परिवार 4.दक्षिण-पूर्व एशियाई परिवार 

    अमेरिकी भूखंड  

    अमेरिकी परिवार  

    भारोपीय भाषा परिवार–

    भारोपीय भाषा परिवार के अन्य नाम हैं- इंडो जर्मनिक, भारत हित्ती परिवार तथा आर्य परिवार। इस वर्गीकरण में भारोपीय भाषा-परिवार बोलने वालों की संख्या, क्षेत्रफल और साहित्यिकता की दृष्टि से सबसे बड़ा परिवार है और यह भारत से यूरोप तक फैला हुआ है।

    ध्वनि के आधार पर भारोपीय परिवार की दस भाषाएँ-

    सतम वर्ग –

    1. भारत-ईरानी- ईरानी(फारसी, पहलवी, ईरानी, पश्तो, अवेस्ता, बलोची, पामीरी), दरद तथा भारतीय

    2. बाल्टो-स्लाविक-महारुसी, यूक्राइनी, चेक, स्लोवाक, वुल्गारी, पोली, सर्बो-क्रोती, स्लोवेनी।

    3.अर्मिनी

    4. अल्बानी(इलीरियन)

    केतुक वर्ग-

    5. जर्मनिक – जर्मन, अंग्रेजी, डच, फ्लेमी(बेल्जियम), आइसलैंडी, डेनी, नारवेई, स्वीडी।

    6. केल्टिक- आइरिश, स्कॉच गेलिक, वेल्श, ब्रिटन, कॉर्निश।

    7. ग्रीक(हेलेनिक)

    8. तोख़ारी

    9. हितों(हिटाइट)

    10. इटालिक(रोमानी)- इतालवी, फ्रांसीसी, स्पेनी, पुर्तगाली, रोमन